http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: जीने की अभिलाषा

Tuesday, July 27, 2010

जीने की अभिलाषा

कविता

राजेश त्रिपाठी

एक अंकुर

चीर कर

पाषाण का दिल

बढ़ रहा आकाश छूने।

जमाने के

थपेड़ों से

निडर और बेखौफ।

उसके अस्त्र हैं

दृढ़ विश्वास,

अटूट लगन

और

बड़ा होने की

उत्कट चाह।

इसीलिए वह

बना पाया

पत्थर में भी राह।

उसका सपना है

एक वृक्ष बनना,

आसमान को चीर

ऊंचे और ऊंचे तनना।

बनना धूप में

किसी तपते की छांह,

अपने फलों से

बुझाना

किसी के पेट की आग।

इसीलिए

जाड़ा, गरमी, बारिश

की मार सह रहा है वह

जैसे दूसरों के लिए

जीने की सीख

दे रहा है वह।

है नन्हा

पर बड़े दिलवाला,

इसीलिए बड़े सपने

देख रहा है

एक अंकुर।

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