http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: निहत्थे सत्याग्रहियों पर सत्ता की लाठी

Monday, June 6, 2011

निहत्थे सत्याग्रहियों पर सत्ता की लाठी

क्या टाला नहीं जा सकता था यह वहशियाना हमला?
राजेश त्रिपाठी
चार-पांच जून की दरम्यानी रात को नयी दिल्ली में जो कुछ हुआ उसे किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। शासन-प्रशासन में बढ़ते भ्रष्टाचार के खिलाफ और विदेशों में जमा भारतीयों के काला धन को देश में वापस लाकर राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने व ऐसी ही कई अन्य उचित और अनिवार्य मांगों पर बाबा रामदेव अपने समर्थकों के साथ सत्याग्रह-अनशन कर रहे थे। आधी रात को उनके निहत्थे समर्थकों पर लाठी बरसा कर, टीयर गैस चला कर उस आंदोलन को खत्म करने का जघन्य कार्य आखिर केंद्र सरकार ने क्यों किया। बाबा रामदेव आज जो मांग कर रहे हैं वह मांग हर सच्चे भारतीय की है। बाबा तो एक प्रतीक हैं उनके मुंह से भारत की जनता बोल रही है जो चाहती है कि उसके पुण्य देश भारत की सत्ता और प्रशासन पुनीत और जनहितैषी बने। देश के धन की अंधाधुंध लूट बंद हो। अगर यह जन-जन की आवाज न होती तो बाबा रामदेव अकेले पड़ जाते। देश के कोने-कोने से लाखों लोग उनके इस अभियान में शामिल न होते। आज जिस तरह से मंत्री से लेकर नौकरशाह तक लाखों करोड़ों रुपये घूस में डकार रहे हैं और देश की अर्थव्यवस्था को बदहाल कर रहे हैं वह अक्षम्य तो है ही निंदनीय भी है। जनता के धन की जिस तरह से लूट और बंदरबांट हो रही है उसके खिलाफ किसी को तो आवाज उठाना ही होगा। अगर यह आवाज अन्ना हजारे या बाबा रामदेव के मुख से निकलती है तो फिर इस पर इतना हंगामा और एतराज क्यों। सरकार इन आमजनों से खौफ क्यों खाती है। भ्रष्टाचार के घटाटोप अंधेरे के खिलाफ किसी को तो खड़ा होना ही पड़ेगा। ऐसे किसी भी प्रयास से संप्रग सरकार की नींद क्यों उड़ जाती है। क्यों ऐसे हर आंदोलन को कुचलने या निष्क्रिय करने की चालें सरकार क्यों शुरू कर देती है। ऐसे आंदोलनों से वर्तमान संप्रग सरकार इतना खौफ क्यों खाती है? क्या इसलिए कि हाल के दिनों में उसकी सरकार में शामिल कई मंत्री भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ धंसे पाये गये हैं। इनमें से कुछ आज तिहाड़ में विराज रहे हैं। अन्ना हजारे के आंदोलनों को भी पहले दबाने या नाकाम करने की कोशिश की गयी लेकिन उनको मिले प्रबल जनसमर्थन के आगे केंद्र सरकार की एक न चली और लोकपाल विधेयक के बारे में उनके सुझाव सरकार को स्वीकारने पड़े हालांकि उसमें भी देश के जो सर्वोच्च पदों को शामिल करने की अन्ना और उनके सहयोगियों की मांग नहीं मानी गयी। एक तरह से उन्हें भी भुलावे में रखा गया। आज अन्ना खुद भी यह कह रहे हैं कि सरकार भरोसा करने लायक नहीं है। कुछ कहती है फिर मुकर जाती है। सवाल यह उठता है कि लोकपाल विधेयक के दायरे से किसी को भी क्यों बाहर रखा जाये। अगर व्यक्ति दूध का धोया है, निश्कलंक है, निश्छल है तो उसका लोकपाल क्या बिगा़ड़ लेगा। बाबा रामदेव दिल्ली आये थे, दो-चार दिन अनशन करते और बात बनती तो ठीक नहीं संभव था वापस लौट जाते। लेकिन सरकार ने पुलिस ले लाठी चलवा कर बाबा को इतनी लोकप्रियता और प्रचार दिला दिया जितना शायद उन्हें कभी नहीं मिलता। आज स्थिति यह है कि विदेश के अखबारों तक में बाबा छाये हैं जहां भारत से संबंधित खबरें कभी-कभार ही सिंगल या डबल कालम पाती हैं। कई अखबारों ने तो अपने इंटरनेट संस्करण में फोटो के साथ बाबा के आंदोलन की वीडियो क्लिप तक डाली है। मिसाल के तौर पर आस्ट्रेलिया के अखबार द एज को लिया जा सकता है। पूरे विश्व में यह संदेश पहुंच गया कि भारत ने भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे एक योग गुरु को लाठियों के बल पर भगा दिया। अब यह तो संप्रग सरकार ही जानती होगी कि इससे उसको कैसा और कितना लाभ हुआ। उसकी छवि कितनी निर्मल हुई। गणतांत्रिक देश में गणतंत्र के इस हनन को जो महिमामंडित कर रहे हैं वे भी आज नहीं तो कल कठघड़े में होंगे। वे बाबा रामदेव को भ्रष्टाचारी बता रहे हैं अगर यह सच है कि बाबा रामदेव भी देश के कानून में बंधे हैं और वह उनके खिलाफ भी कार्रवाई करेगा लेकिन उनका अपराध साबित हुये बगैर उन पर कीचड़ उछालना कहां तक ठीक है।
    बाबा और सत्याग्रहियों पर पुलिस कार्रवाई की सर्वत्र  निंदा हो रही है। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (जिन पर बाबा ने आरोप लगाया है कि उन्होंने राष्ट्रधर्म नहीं निभाया) का यह कहना है कि काश यह कार्रवाई टाली जा सकती। सोनिया गांधी ने भी इस पर दुख जाताया है। कांग्रेस को चाहिए कि अपने सलाहकार बदल ले या उन्हें सुधार ले क्योंकि उनकी शह या सलाह पर जो कुछ हुआ उससे उसकी बड़ी किरकिरी  हो रही है। बाबा रामदेव को भी चाहिए की वे राजनीतिक दलों के हाथों की कठपुतली न बनें क्योंकि उन दलों के न दिल बाबा से मिलते हैं न विचार। वे तो उनकी संगत में अपना राजनीतिक लाभ देख रहे हैं। इससे बाबा को बचना चाहिए उसी तरह जिस तरह अन्ना बच कर रहे थे। बाबा रामदेव का आंदोलन जनता का आंदोलन है और जनता की ताकत ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है जिसके बल पर बड़े-बड़े दल सत्ता के सिंहासन पर पहुंचते हैं। अगर योगगुरू का उद्देश्य भी देश की राजनीति में पैठ की है तो वह उसी दिशा में काम करें और संसद में अपना प्रतिनिधित्व बढ़ा कर वहां अपनी बात जोरदार ढंग से उठायें। तब उनकी बातें संसद और देश दोनों सुन रहे होंगे। अभी गूंगी-बहरी सत्ता तक उनकी आवाज पहुंचाने की राह पर तरह-तरह की बाधाएं खड़ी की जायेंगी जिससे उनके साथ जुड़ें लोगों का उत्साह ढीला भी पड़ सकता है। उन्हें भविष्य की रूपरेखा सोच-समझ कर बनाना चाहिए ताकि सरकार उनके आड़े न  सके।
      बाबा रामदेव के सत्याग्रह से डरी सरकार अब उनकी संपत्ति आदि की जांच करवाने की बात कर रही है। ठीक है अगर बाबा रामदेव ने कानून से बाहर जाकर कुछ किया है तो उसकी जांच की जानी चाहिए क्योंकि कोई भी व्यक्ति देश के कानून से बढ़ कर नहीं होता लेकिन ऐसी कोई जांच अब तक क्यों नहीं करायी गयी। अब उठाया गया ऐसा कोई भी कदम क्या बाबा के पक्ष में ही नहीं जायेगा। लोग समझेंगे कि केंद्र सरकार बदले की कार्रवाई कर रही है। बाबा रामदेव का सत्याग्रह जब चल रहा था उस वक्त मंत्रियों के साथ उनकी वार्ता और समझौते के प्रयास भी चल रहे थे। खुद बाबा कह रहे थे कि 99 प्रतिशत मुद्दों पर सहमति बन गयी है। कपिल सिब्बल को बाबा के सहयोगी बालकृष्ण का पत्र जारी करने की क्या हड़बड़ी थी। पांच जून की सुबह तक का इंतजार किया जा सकता था। बाबा और उनके समर्थकों पर आधी रात को पुलिस क्यों टूट पड़ी। शायद सिब्बल साहब के पास इसका कोई जवाब हो। क्या वे एक तरफ अपने दूतों को भेज कर संधि वार्ता चला रहे थे और दूसरी ओर बाबा रामदेव को बेनकाब करना चाह रहे थे कि लिख कर देने के बावजूद वे अनशन खत्म नहीं कर रहे। अगर ऐसा है भी तो उन्हें इसके लिए पांच जून की सुबह तक का इंतजार करना था अगर तब बाबा अपने अनशन पर अ़डिग रहते तो प्रशासन कोई और कदम उठा सकता था। एक बात यह भी कही जा रही है कि बाबा की जान को खतरा था। पता नहीं कौन और क्यों बाबा को मारना चाहता था। अब तो बाबा कह रहे हैं कि पुलिस उनका एनकाउंटर करना चाहती थी इसीलिए उन्हें मां-बहनों के वस्त्र पहन कर छिपना पड़ा। बातें तरह-तरह की हैं लेकिन एक जो सबसे अहम बात है वह यह कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उठी हर आवाज को यहां कुचलने की कोशिश की जा रही है। शायद इसलिए कि इससे सत्तासीन दल को कहीं असुविधा होती है। होना यह चाहिए कि खुद सरकार आगे बढ़ कर आये और भ्रष्टाचारियों को दंड दे लेकिन इसके लिए जनता को आवाज उठानी पड़ती है और बदले में न्याय नहीं पुलिस की लाठिया मिलती हैं। कांग्रेस को पता नहीं क्या हो गया है इसके नेता प्रवक्ता अलग-अलग राग अलापते, अलग-अलग बरताव करते नजर आते हैं। सवाल यह उठता है कि अगर बाबा रामदेव के सत्याग्रह आंदोलन का यही हस्र करना था तो फिर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हवाई अड्डे पर उनकी आगवानी करने क्यों गये। इसका तो यही मतलब निकलता है न कि कांग्रेस उनके सत्याग्रह के विरोध में नहीं थी। लेकिन उसी दल के एक महासचिव बाबा को ठग तक कहने में नहीं हिचकते। गौरतलब है कि इन्हीं महाशय ने आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के ओसामा जी कह कर संबोधित किया था और इसके लिए इनकी चौतरफा निंदा हुई थी। आज नहीं तो कल पार्टी इनके वक्तव्य से पल्ला झाड़ लेगी लेकिन ऐसे जिम्मेदार व्यक्ति से इस तरह के टुच्चे बयान अच्छे लगते हैं। बाबा रामदेव अगर वाकई गलत हैं उन्होंने अपराध किया है तो इसका विचार कानून या देश की जनता करेगी ये महाशय उन्हें सार्टिफिकेट देने क्यों बैठ गये।
प्रशासन की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि बाबा ने योग शिविर के लिए रामलीला मैदान लिया था फिर वहां अनशन क्यों करने लगे। पूरा देश गवाह है, इलेक्ट्रानिक मीडिया में हफ्तों पहले से यह कहा जा रहा था कि रामदेव जी वहां योग शिविर तो चलायेंगे ही अनशन भी करेंगे। इस आशय के बैनरों से दिल्ली पट गयी थी पता नहीं प्रशासन कहां सोया था कि उसकी आंखों को न ऐसे बैनर नजर आये और न ही अनशन की रात-दिन की जाने वाली घोषणाएं ही सुनाई दीं। अगर दिल्ली की शांति भंग हो रही थी तो इस सत्याग्रह को शुरू ही क्यों होने दिया गया। क्या सरकार इस इंतजार में थी कि रामदेव उनके मनमाफिक बातें मान लें तो ठीक नहीं फिर उनका तंबू उखाड़ फेंके। केंद्र सरकार खुश हो रही होगी कि उसने बाबा की लीला खत्म कर दी लेकिन सच यह है कि दिल्ली के रामलीला मैदान में पुलिस कार्रवाई में हटाये गये रामदेव अब सरकार के लिए और भारी पड़ेगे। जिस तरह से उन्हें हटाया गया, जिसे रामदेव बर्बर कार्रवाई की संज्ञा देते हैं और उनके कुछ समर्थक इसे आपात्काल से जोड़ते हैं उससे रामदेव का कद और ऊंचा हो गया है। इस कार्रवाई के बाद उनके विरोधी भी इस अत्याचार के धुर विरोधी और रामदेव के समर्थक हो गये हैं। भाजपा, विहिप, आरएसएस तो खुल कर उनके समर्थन में आ गयी है वामपंथी दलों ने भी पुलिस कार्रवाई की सख्त निंदा की है।
      इस कार्रवाई से आशंका यह पैदा हो रही है कि भविष्य में किसी भी गणतांत्रिक आंदोलन को इसी तरह से कुचला जा सकता है। बाबा रामदेव ने भी सरकार पर भरोसा करके गलत किया हालांकि अन्ना ने उन्हें पहले भी आगाह किया था कि वे केंद्र सरकार के झांसे में न आयें। बाबा रामदेव भारत स्वाभिमान पार्टी बना ही चुके हैं । उन्होंने आगामी लोकसभा चुनाव में अपने दल की भागीदारी की बात भी की है ऐसे में उनको वक्त का इंतजार करना चाहिए और संसद में अपना प्रतिनिधित्व बढ़ा कर वहां अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए तब उनको दिल्ली के रामलीला मैदान जैसी जलालत नहीं झेलनी पड़ेगी। वैसे बाबा अब चाहे हरिद्वार में अनशन करें या कहीं और उन्होंने जन आंदोलन की ज्योति जगा दी है। लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रेरित कर दिया है। वे जो चाहते थे वह उन्होंने अपने अधूरे अनशन-सत्याग्रह से हासिल कर लिया है। आने वाले दिन उन पर मुश्किल हो सकते हैं क्योंकि उन्हें और उनके मनोबल को तोड़ने परास्त करने के लिए कई तरह की कार्रवाइयां हो सकती हैं जिसके लिए उन्हें तैयार रहना होगा। उन्हें अब जो कुछ करना होगा वह पूरी तरह से सुनियोजित और उसका भला-बुरा (बुरा पहले) सोच कर ही करना होगा क्योंकि केंद्र सरकार अब उनके खिलाफ कोई भी कदम उठा सकती है। यह इससे साफ हो गया है कि केंद्र सरकार ने साफ कह दिया है कि वह अब बाबा से कोई बात नहीं करेगी। अन्ना हजारे बाबा के पक्ष में आ गये हैं लेकिन लगता नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ा गया कोई भी जनांदोलन अब अपनी सही और प्रभावी परिणति को प्राप्त हो सकेगा क्योंकि अन्ना के आंदोलन का जो हस्र हुआ वह सबके सामने है।
  गलती बाबा रामदेव से भी हुई। जब तक सरकार से लिखित आश्वासन नहीं मिला उनके सहायाक आचार्य बालकृष्ण को क्या पड़ी थी यह लिख कर देने को कि सरकार से वे सहमत हैं और 4 जून की दोपहर से अनशन खत्म कर रहे हैं। उनके साथ पूरा देश क्या पूरी  दुनिया खड़ी थी, उन्हें किस बात का भय था। दबाव बढ़ता तो जाहिर था कि सरकार को झुकना पड़ता। वैले बाबा रामदेव को भी अपनी रणनीति सही ढंग से बनानी चाहिए। वे ऐसे वर्ग से पंगा ले रहे हैं जो बेहद चालाक और सयाना है। अपने खिलाफ उठे हर कदम को कुचलने में माहिर है। जो भी हो जो हुआ अच्छा नहीं हुआ, भारत गणतंत्र है यहां गनतंत्र को चलाने की कोई भी कोशिश नाकाम होगी, होनी ही चाहिए क्योंकि ऐसा नहीं हुआ तो यह उन शहीदों का अपमान होगा जिन्होंने एक ऐसे देश की कल्पना की थी जहां जनता का राज्य हो और जहां जनता को सच्ची आजादी प्राप्त हो। रामदेव अनाचार के खिलाफ उठी आवाज के प्रतीक हैं, अन्ना भी इस युद्ध के अहिंसक सिपाही हैं। किसका इतिहास क्या है, किससे कहां गलती हुई यह अलग बात है पर सच यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सामूहिक प्रहार आज वक्त का तकाजा है। जनता का अहिंसक आंदोलन भ्रष्टाचार के अंधेरे में दीपशिखा का काम करेगा और आज नहीं तो कल वह सुखद सवेरा आयेगा जब देश भ्रष्टाचार, अनाचार से मुक्त होगा। उस सवेरे के लिए सबको प्रयास करना होगा और इसकी राह में जो आड़े आये उसके खिलाफ आवाज उठानी होगी। अगर कोई इसके विरुद्ध खड़ा नहीं हुआ तो वह भी पाप का भागी होगा राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में-समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।



     


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