http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: जागो सोनेवालो, कहीं देर न हो जाए

Sunday, January 6, 2013

जागो सोनेवालो, कहीं देर न हो जाए


देश की बहू-बेटियों की रक्षा के लिए आगे आओ
-राजेश त्रिपाठी
उस अनाम बेटी को देश ने कई नाम से पहचाना। किसी के लिए वह अमानत थी तो किसी के लिए निर्भया और किसी के लिए दामिनी। उसका जो भी नाम रहा हो लेकिन हमारे देश की वह बहादुर और अदम्य हौसले वाली बेटी को मैं तो दामिनी ही कहना पसंद करूंगा। दामिनी जो समाज में जहां नारियों के प्रति सम्मान और समानता का भाव रखने के लिए एक लौ की तरह कौंधी वहीं तथाकथिक प्रगतिशील और सभ्य समाज को न जाने कितने अनसुलझे सवालों में भी घेर गयी। सवाल कुछ ऐसे की उनके आगे बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों को भी लाजवाब हो जाना पड़े। दामिनी के साथ जो कुछ भी हुआ वह इस सभ्य समाज पर ऐसा तमाचा है जिसकी गूंज और दर्द तब तक कायम रहेगा जब तक समाज में स्त्रियों को सम्मान और सुरक्षा से जीने का अधिकार नहीं मिल जाता। आखिर क्या चाहा था दामिनी ने एक व्यवस्थित और सुखी जीवन। अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करना जिन्होंने उसे सफल बनाने के लिए अपनी जीविका का साधन जमीन तक बेच डाली थी। एक गरीब परिवार से आयी यह बच्ची दिल्ली को हमदर्दों का नगर मान अपनी जिंदगी संवारने आयी थी पर यहां उस पर हुई दरिंदगी ने न सिर्फ उसके सपने तोड़ दिये अपितु उसकी जिंदगी का दीपक ही बुझा गया। बलात्कार की घटनाएं तो देश में पहले भी होती रही हैं लेकिन क्या वजह है कि दामिनी के साथ हुई घटना ने पूरे देश को उद्वेलित और आंदोलित कर दिया। हर दिल में दामिनी जुल्म के खिलाफ उठ खड़े होने, संघर्ष करने का जज्बा बन कर धड़कने लगी। इस जुल्म के खिलाफ देश भर के कोने-कोने में न सिर्फ आधी आबादी बल्कि स्त्री सम्मान के प्रति समर्पित उनके पुरुष साथी भी सड़को पर उतर आये। जाड़े की ठिठुरती रातों में एक महान के उद्देश्य के लिए हड्डियां गलाते रहे और आज भी गला रहे हैं। लोग इन्हें पागल या नासमझ समझें लेकिन सच तो यह है कि ये समाज के वे लोग हैं जिन्हें उसके अच्छे-बुरे की चिंता है। जो चलता है चलने दें से अब आगे बढ़ने का वक्त आ गया है। यह बात इन्हें बखूबी मालूम है। ये खुद भी किसी बेटी के बाप, किसी बहू के ससुर या किसी मां की संतान हैं जिनकी इज्जत आज इस देश में सुरक्षित नहीं है। क्या जाने कब आपके पड़ोस का ही कोई शख्स इंसानियत का जामा उतार पल भर में वहशी दरिंदा बन जाये और आपके परिवार की इज्जत तार-तार कर दे। उसके लिए तो यह क्षणिक आवेश शांति करते का वहशियाना काम ठहरा पर जिस स्त्री पर यह जुल्म हुआ वह तो ताजिंदगी तिल-तिल कर मरती रहेगी। कानून अपना काम सही ढंग से करेगा नहीं और वह समाजित ताने झेलने या फिर इनसे टूट कर आत्महनन करने को मजबूर होगी।
      माफ कीजिएगा हम भारतीय हैं। यहां बलात्कार जैसी घटनाओं की शिकार महिलाओं को न तो सहानुभूति की दृष्टि से देखा जाता है, न ही कोई उनकी मदद के लिए आगे आता है। शुक्र है कि हमारे देश में कुछ महिला संगठन हैं जो इस तरह की घटनाओं के प्रति सजगता से काम कर रहे हैं लेकिन इनकी पहुंच  बहुत सीमित तबके तक है। गांवों में जहां बलात्कार की घटनाएं अधिक होती हैं वहां की अनपढ़ और पुरुष शासित समाज में सबसे दबी हुई महिलाएं तो अपने ऊपर हुए बलात्कार की घटना को लोकलाज या परिवार की इज्जत खराब होने की डर से जाहिर नहीं करतीं और अक्सर इस जुल्म को खामोशी से झेलती रहती हैं। प्रशासन या पुलिस किसी से उनको मदद नहीं मिलती। जरूरत इस बात की है कि गांवों में ग्राम रक्षिका जैसे पद बनाये जायें और इसमें महिलाओं को नियुक्त किया जाये जो गांव की महिलाओं को अपने विश्वास में लें और उनसे उनका दर्द उनकी समस्या जान कर उसका समाधान करें। जाहिर है एक महिला के सामने अपना दिल खोलने में उनका आपत्ति नहीं होगी।
विदेश में भले न हो हमारे देश में सेक्स अभी भी टैबू है। संभव है दूसरे देशों में बलात्कार पीड़ित महिला को उतनी बुरी दृष्टि से न देखा जाता हो जैसा हमारे यहां देखा जाता है लेकिन सच यह है कि बलात्कार पीड़ित महिला दोषी नहीं कही जा सकती । दोष तो उन नराधमों का है जो उसके साथ ऐसा कुकृत्य करते हैं। पता नहीं हमारे देश को किसकी नजर लग गयी है कि बलात्कार का अपराध शहर दर शहर , गांव  दर गांव महामारी की तरह फैल रहा है। शर्म की इंतिहा हो गयी है, बेटा बेटी से , ससुर बहू से बलात्कार कर रहा है। तीन-तीन साल की अबोध बालिकाएं तक इन वहशी दरिंदों की शिकार हो रही हैं। इन्हें किसी का खौफ नहीं न समाज का न पुलिस या कानून का। दामिनी  की घटना के बाद से भी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बलात्कार और हत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता। देश के अन्य क्षेत्रों में भी इस अपराध की बाढ़ आ गयी है। इसका सिर्फ और सिर्फ कारण यह है कि हमारे समाज का एक हिस्सा बीमार हो गया है। वह ऐसी कुप्रवृत्ति का शिकार है जिससे अगर वह उबर न पाया तो समाज की कोई बहू-बेटी सुरक्षित नहीं रह पायेगी। यत्र नार्यास्तु पूज्यंते की अवधारणा देने वाले देश में आज नारी को सिर्फ भोग की वस्तु बना दिया गया है। बलात्कारी सिर्फ अपनी सेक्स की भूख मिटाने के किसी कन्या या स्त्री का सतीत्व नष्ट करता हो ऐसा नहीं है पुरुष शासित समाज में पुरुष स्त्री से अपने को श्रेष्ठ और ताकतवर दिखाने के लिए भी ऐसा करता है। इससे उसके कुत्सित मानस को एक राक्षसी शांति और सुख मिलता है। हद तो यह है कि समाज के कुछ लोगों को यह दर्दनाक घटनाएं तक डरा नहीं पातीं। वे इसको उपहास का विषय बना इससे घिनौना और निंदनीय आनंद पाते हैं। समाज को ऐसे तत्वों को भी पहचानना चाहिए क्योंकि बलात्कारी का उपहास उड़ाना भी एक तरह से मानसिक बलात्कार की ही संज्ञा में आता है।
आखिर इस अपराध से निपटने के लिए किया क्या जाये। इस तरह के अपराधों के लिए जितना हमारे देश का लचर कानून और उसकी जटिल प्रक्रिया जिम्मेदार है उसके कहीं पुलिस प्रशासन  जिम्मेदार है। नियम तो यह बनता है कि बलात्कार पीड़ित महिला की शिकायत महिला पुलिस अधिकारी सुने और उसके प्रति मदद की भूमिका अदा करे दबंग पुलिस अधिकारी की नहीं। पुलिस अधिकार की हेकड़ी और दबंगई के चलते बहुत -सी महिलाएं डर के मारे मुंह ही नहीं खोल पातीं। पुलिस अधिकारी उन्हें शिकायत लिखे बगैर भगा देते हैं। होना चाहिए कि क्रास एक्जामिनेशन अपराधी का हो पर थाने में पहले पीडित महिला पर ही ऐसे प्रश्नों की बौछार होती है कि वह अपनी लड़ाई के पहले पड़ाव में ही हौसला खो बैठती है।
अब वक्त आ गया है कि समाज ने जो आंदोलन ऐसे अपराधों के खिलाफ शुरू किया है उन अहिंसक आंदोलनों को एक सफल और सार्थक परिणति तक ले जाये बगैर रोका न जाये। यह आंदोलन अहिंसक होना चाहिए क्यों हिंसा किसी भी मसले का हल न अतीत में बन पायी है और न ही कभी होगी। हिंसा होगी तो उसका प्रशासनिक तौर पर दमन किया जायेगा। गणतंत्र में अहिंसक आंदोलनों की रोक नहीं। जरूरी नहीं कि सही आवाज उठाने के लिए हिंसक होना पड़े।
  समाज को अपने बीच के दरिंदों को पहचानना और उनका सामाजिक बहिष्कार करना होगा। जिस पर बलात्कार का आरोप लगा है उनको पहचान कर समाज का सड़ा हिस्सा मान काट कर समाज से बाहर फेंकना होगा। अगर आप बेटी के बाप हैं या आपके घर की महिलाओं की इज्जत आपको प्यारी है तो अपने घर के नाते-रिश्तेदारों या घर आने वाले दोस्तों से भी सावधान रहें। देखिए ये पंक्तियां लिखते वक्त बेहद अफसोस हो रहा है लेकिन आंकड़े गवाह हैं कि अबोध बच्चियों, बहुओं पर अपने घर-परिवार या रिश्तेदारों की ओर से बलात्कार करनी की असंख्य घटनाओं की खबरें अक्सर आती रहती हैं। इससे तो आपको अंदाजा मिल ही गया होगा कि समाज के कुछ लोगों का मानस कितना दूषित, कलुषित और गंदा हो गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने कलियुग में आनेवाले इस व्यभिचार के बारे में आज से तकरीबन चार सौ साल पहले ही अपनी इन पंक्तियों से सावधान कर दिया था-कलिकाल बिहाल किये मनुजा, नहीं मानत हैं अनुजा तनुजा। वही  तो हो रहा है। कामांध लोग बहू-बेटियों तक को नहीं छोड़ रहे। अब वक्त आ गया है कि गांवों में ग्राम पंचायतें ऐसे संगठन बनायें जो महिलाओं पर ऐसे हमले करनेवालों को पहचाने और उन्हें पुलिस के हवाले करें। क्षेत्र के विधायक या सांसद का परम कर्तव्य है कि अपने इलाके में होनेवाली ऐसी घटनाओं को रोकने का भरसक प्रयास करें। संसद या विधानसभाओं में इसके खिलाफ आवाज उठायें और कड़े कानून बनाने की सिफारिश करें। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि जब जनहित के कानून बनाने की बात आती है तो राजनीतिक दल उसमें भी एकजुट नहीं हो पाते और उसे भी राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू में तौलने लगते हैं। जनता को इन अवसरवादियों , सुविधावादियों को पहचानना है और यह सुनिश्चित करना है कि ये अगली बार विधानसभा या संसद में न जा सकें। आपके अपने अधिकार में है कि ऐसे विधायक या सांसद जिन पर बलात्कार का अभियोग है उन्हें हर कीमत पर परास्त करें और दोबारा विधायक या सांसद न बनने दें। राजनीतिक दलों से यह उम्मीद मत करिए कि वे अपना परिष्कार करेंगे और दल से ऐसे दरिंदों को हटायेंगे क्योंकि बहुतों की राजनीति ही ऐसे तथाकथित बाहुबलियों या अपराधियों के भरोसे चलती है। आप चाहें तो इन्हें अगले चुनावों  में रोक सकते हैं क्योंकि ऐसा कोई कानुन तो बनने से रहा जो इन मान्यवरों को इनकी सही जगह पहुंचाये।
कानून जब बनेगा तब पर अभी सबसे बड़ा दायित्व समाज और परिवारों पर है। समाज को अपने तईं कोई कदम उठाना होगा ताकि महिलाएं, कन्याएं सुरक्षित रह सकें। माताओं को अपनी बेटियों की प्रति सजग दृष्टि रखनी होगी। कोई नाते-रिश्तेदार आता है तो चुपचाप उस पर नजर रखें। हर व्यक्ति बुरा नहीं होता लेकिन हर व्यक्ति अच्छा भी तो नहीं होता। कब किसका स्नेहिल स्पर्श वहशीपन में बदल जाये और उसके अंदर का शैतान जाग कर आपकी स्नेह-ममता से पली लाड़ली का जीवन तबाह कर दे, कहा नहीं जा सकता। इसलिए सुरक्षा का पहला काम तो परिवार से ही शुरू करना चाहिए। आपकी लाड़ली स्कूल जाती है तो उस पर उसकी भावनाओं पर नजर रखें। वह गुमसुम सी रहने लग, अकेले में डरे तो उससे उसकी वजह पूछिए क्या पता वह सहपाठी छात्रों या शिक्षकों की ओर से छेड़ी जा रही हो। माताएं उसके मन को पढ़ सकती हैं और उसे ढाढ़स बंधा सकती है कि वह डरे नहीं वे उनके साथ हैं। ये पंक्तियां लिखते हुए मैं दिल से दहल और कांप रहा हूं। मेरा भारत किस दिशा में जा रहा है। भोगवादी प्रवृत्ति की मृगमरीचिका के पीछे भागता यह समाज क्या हासिल करना चाहता है। पल भर में सारे भोग भोग लेने की यह हवश कहीं इंसानियत के ताबूत की आखिरी कील न साबित हो।
दामिनी का बलिदान बेकार न जाये यह हिंदुस्तान की जिम्मेदारी है। अगर हमारी आधी आबाद अपना सही सम्मान और सुरक्षा पाती है तो हम किसी और कि नहीं बल्कि अपनी मदद कर रहे होंगे। भला जननी के बगैर समाज की कल्पना भी कैसै की जा सकती है। जागो भारतवासियों, इससे पहले कि देर हो जाये ऐसा समाज गढ़ों जहां बहू-बेटियां निर्भय होकर रह सकें, काम कर सकें और उन्हें पल-पल दहशत में न जीना पड़े। उनके सम्मान और सुरक्षा की राह में जो भी अड़चनें आती हैं उन्हें हटाना न सिर्फ आपका कर्तव्य बल्कि जिम्मेदारी है। वक्त का तकाजा है अब तो जागो और संकल्प लो कि अब से किसी दामिनी को दरिंदगों की हवश का शिकार नहीं होने दिया जायेगा। यकीन मानिए ईश्वर आपको खुशियों से भर देगा। नारी को सम्मान देंगे तो हमारा भारत वाकई महान हो जायेगा वरना इसे नष्ट करने, इसकी संस्कृति को दूषित करने के लिए शैतान तो कोने-कोने में बैठे हैं। समाज तनिक उदासीन हुआ नहीं कि ये पूरे देश को तबाह कर देंगे। उठो जागो और बचा लो देश और माताओं-बहनों की अस्मिता तुम्हें भारतमाता और भारत का वास्ता। अब देर न करो वरना उसके बाद पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

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