http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: प्राणहीन हुआ बॉलीवुड

Saturday, July 13, 2013

प्राणहीन हुआ बॉलीवुड

चला गया कर्मनिष्ठ, ईमानदार भला आदमी
-राजेश त्रिपाठी

अगर किसी एक ऐसे शख्स का नाम जानना हो जो एक साथ कई व्यक्तित्व जी चुका हो, जिसे फिल्मी परदे पर देख बड़ों-बड़ों के दिल सहम जाते थे और जो परदे के बाहर बहुत ही प्यारा, मददगार और सबका यार हो तो आपकी तलाश बस एक नाम पर आकर टिक जायेगी। वह नाम है प्राण। प्राण जिन्होंने 6 दशक तक के लंबे अपने फिल्मी कैरियर में जिन अमर पात्रों को जिया, उनके साथ इस कदर खुद को आत्मसात कर लिया कि उन्हें उस किरदार से अलग नहीं किया जा सकता था। हालांकि उन्होंने 93 साल की लंबी जिंदगी पायी लेकिन उनके जाने से फिल्मों के एक युग का अंत हो  गया है। आज बॉलीवुड प्राणहीन हो गया है। प्राण हिंदी फिल्मों के एकमात्र ऐसे खलनायक थे जिन्होंने अपने चरित्रों को जितनी विविधता दी शायद ही कोई दे पाया हो। शायद यही वजह थी कि उनको फिल्मो के बड़े-बड़े नायकों तक से ज्यादा पारिश्रमिक मिलता था। आज जब वे नहीं हैं तो सब उन्हें अपने ढंग से याद कर रहे हैं। अभिनेता रजा मुराद ने उनके बारे में कहा कि-ताजमहल एक है, कश्मीर एक है,  हिमालय एक है, लता मंगेशकर एक है उसी तरह प्राण एक हैं। दूसरा प्राण अब नहीं पैदा होगा। वे परदे पर दानव और परदे के बाहर महामानव थे। सांसद और मंत्री राजीव शुक्ल ने कहा-इस शताब्दी में दूसरा प्राण नहीं होगा।
    अमिताभ, सुषमा स्वराज, प्रियंका चोपड़ा और बॉलीवुड व राजनीति से  जुड़ी कई हस्तियों ने प्राण साहब के निधन पर शोक जताया और उन्हें अनुपम और अतुलनीय बताया। प्राण ने अपने जीवन में फिल्मफेयर, पद्मभूषण, विलेन आफ मिलेनियम जैसे अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले लेकिन फिल्मों के लिए सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान दादा साहब फालके पुरस्कार को उन तक पहुंचने में काफी देर लगी। यों तो यह पुरस्कार कई कलाकारों तक  पहले पहुंच गया लेकिन उन तक जब यह मई 2013 में पहुचा इनकी जिदगी ह्वीलचेयर में सिमट कर रह गयी थी और स्मृति  भी उनका साथ छोड़ चुकी थी। जिन लोगों ने भी टीवी चैनल्स पर केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी द्वारा उनके मुंबई स्थिति घर में उनको दादा साहब फाल्के पुरस्कार देते देखा है, उन्होंने देखा होगा कि प्राण किस तरह चेतनाहीन से मूक दर्शक बने बैठे थे। शायद उन्हें यह भान भी नहीं हो रहा होगा कि वे देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजे जा रहे हैं। प्राण के बारे में जितना कुछ कहा जाये कम है। फिल्मी कलाकारों के बारे में फिल्म निर्माता और निर्देशकों की ज्यादातर यही शिकायत रहती थी कि वे सेच पर देर से आते हैं लेकिन प्राण साहब समय के इतने पाबंद कि 10 बजे के शेड्यूल के लिए
 साढ़े 9 बजे ही पहुंच जाते हैं। कहते हैं एक बार निर्माता-निर्देशक सुभाष घई ने उन से हाथ जोड़ कर कहा था- प्राण साहब आपकी शूटिंग दो बजे शरू होनी है आप साढ़ें नौ बजे आने का कष्ट न किया करें।
    पर प्राण क्या करते काम तो उनके लिए पूजा की तरह था और स्टूडियो जैसे मंदिर। वे अभिनय नहीं किया करते थे बल्कि उन चरित्रों को जिया करते थे जो उन्हें दिये जाते थे। वे अपनी भूमिकाओं के प्रति कितने गंभीर थे इसका पता इसी से चलता है कि वे अपने चरित्र का गेटअप वगैरह खुद तय किया करते थे। उनकी सबसे बड़ी ताकत थी उनकी बुलंद आवाज, रग-रग से उभरते अभिनय के सजीव रंग। प्राण परदे की जिंदगी में चाहे जितने भी खूंखार दिखते हों असल जिंदगी में वे उतने ही भले, भद्र और परोपकारी पुरुष थे। कई हस्तियों को उनका उपकार मिला लेकिन प्राण साहब ने कभी इसका प्रचार नहीं किया। क्रिकेटर कपिल देव एक बार काफी चोटिल हो गये। इस इलाज के लिए उस वक्त बीसीसीआई के पास पैसा नहीं था। जब इसका पता प्राण साहब को चला तो उन्होंन कहा कि कपिल के इलाज में जो भी खर्च आयेगा, वे देंगे। यह कपोल कल्पित कहानी नहीं खुद कपिल की जुबानी इसे सुना गया है।
    प्राण साहब के बारे में तरह-तरह की बातें प्रचलित हैं। कहते हैं कि वे जब अपनी कार में मुंबई की सड़कों पर गुजरते तो सड़क पर खड़े लड़के डर कर भागते और कहते -भागो साला प्राण आ रहा है। कहते हैं जब किसी ने उनसे िसके बारे में पूछा कि क्या उन्हें इस तरह की गालियां सुन कर गुस्सा नहीं आता तो वे हंसते हुए कहते- ये गाली नहीं पुरस्कार है। यह मेरी कामयाबी की मिसाल है कि मेरा खौफ परदे से बाहर समाज तक में उतर आया है। लोग तो सिनेमाघर के बाहर आते ही फिल्म और फिल्म के किरदार को भूल जाते हैं लेकिन मुझे तो लोग परदे के बाहर भी उसी रूप में देख रहे हैं।
    वे लोगों से कहते कि जब कभी उनके दोस्त अपने बच्चों को लेकर उनसे मिलने आते तो उनके बच्चे अपने माता-पिता के पीछे दुबके रहते। ये प्राण को अच्छा लगता था क्योंकि वे मानते थे कि जिस दिन इन बच्चों का भय खत्म हो जायेगा और ये सामने आ जायेंगे उस दिन मैं समझूंगा कि अब मैं नाकाम हो गया। बॉलीवुड के इस सबसे बड़े खलनायक की जिंदगी भी अजीब थी। वे बनना चाहते थे फोटोग्राफर यानी कैमरे के पीछे की जिंदगी उन्होंने चुनी थी लेकिन उन्हें तो कैमरे के सामने छाना और नाम कमाना था। अमिताभ बच्चन आज सदी का सितारा है लेकिन यह हकीकत है कि उनकी फिल्मी जिंदगी ने अगर कामयाबी की रोशनी देखी  तो उसका श्रेय भी प्राण को ही जाता है। कहते हैं कि फिल्म जंजीर  का रोल प्रकाश
 मेहरा देव आनंद को देना चाहते थे लेकिन अमिताभ का नाम उन्हें प्राण ने ही सुझाया। कहना नहीं होगा कि फिल्म जंजरी सुपर-डुपर हिट हुई ओर उसके बाद अमिताभ ने पीचे मुड़ कर नहीं देखा और लगातार कामयाबी की ऊंचाइयां छूते हुए सदी का सितरा बनने का गौरव हासिल किया। अमिताब प्राण साहब का बहुत ही सम्मान करते थे।
    प्राण हिंदी फिल्मों के प्राण थे। उनका पार्थिव शरीर आज भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन अपनी फिल्मों और अपने जानदार अभिनय के बल पर वे आनेवाली कई सदियों तक याद आते और लोगों में जिंदगी का जज्बा भरते रहेंगे। प्राण साहब जैसे लोग तो अमर हो जाते हैं। उन्होंने जमाने को इतना दिया है, उनके लोगों पर इतने उपकार हैं कि वे रहती दुनिया तक लाखों लोगों में उम्मीद और हौसला बन कर जीते रहेंगे।
    प्राण साहब का पुरा नाम प्राण किशन सिकंद था। उनका जन्म 12 फरवरी 1920 को दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में हुआ था। उनके पिता लाला केवलकिशन सिकंद सिविल इंजीनियर  थे। उनकी तबादले की नौकरी थी इसलिए प्राण को भी जहां-जहां पिता तबादले में जाते जाना पडता था। इस तरह उनकी शिक्षा भी-मेरठ, कपूरथला, उन्नाव, देहरादून व रामपुर में हुई। प्राण साहब को फोटोग्राफी का बड़ा शौक था, उन्होंने इसके लिए दिल्ली की दास एंड कंपनी में एप्रेंटिश फोटोग्राफर के रूप में नौकरी शुरू की। बाद में उनका तबादला शिमला कर दिया गया। वहीं उन्होंने अपने अभिनय जिंदगी की एक तरह से शुरुआत की। वहां रामलीला पर आधारित एक नाटक में उन्होंने सीता की भूमिका निभायी थी जिसमें उनके साथी अभिनेता थे मदन पुरी। उनके फिल्मी अभिनय की शुरुआत लाहौर में पंजाबी फिल्म यमला जाट (1940) से हुई । इसके बाद तकरीबन 21 पंजाबी फिल्मों में वे हीरो के रूप में आये और ये फिल्में बहुत हिट रहीं। हिंदी फिल्म में उनकी शुरुआत खानदान (1942) से हुई। इसमें उनकी हीरोइन नूरजहां थीं जो उम्र में उनसे काफी छोटी थीं। 1945 में उनकी शादी शुक्ला अहलूवालिया से हुई। प्राण साहब के दो बेटे  और एक बेटी है। प्राण साहब देश विभाजन के बाद वे काम की तलाश में बंबई (अब मुंबई) चले आये। यहां लेखक शहादर हसन मंटो और अभिनेता श्याम की मदद से उन्हें शाहिद लतीफ की फिल्म जिद्दी (1948) में खलनायक की भूमिका मिली। इसमें देव आनंद और कामिनी कौशल की प्रमुख भूमिकाएं थीं। यह उनके अभिनय की दूसरी शुरुआत थी(लाहौर फिल्म कंपनी के बाद)। उनका यह प्रयास सफल रहा और 1948 से 1954 तक लगातार खलनायक की भूमिकाएं निभाते हुए उन्होंने इतनी कामयाबी हासिल की कि फिल्मों के सफलता के लिए उनको रखना जरूरी माना जाने लगा। फिल्मों के स्टारकास्ट का नाम देते वक्त अंत मे मोटे अक्षरों में लिखा जाने लगा - एंड प्राण। जैसे सारे कलाकारों पर यह एक नाम ही भारी पड़ने लगा। फिल्म की सफलता की गारंटी बन गया प्राण का नाम। उस समय के बड़े सितारों के साथ भी प्राण साहब ने काम किया। उस वक्त के बड़ें सितारों दिलीप कुमार , राज कपूर, देव आनंद में से कोई रहा हो उनकी फिल्मों में जब भी परदे पर प्राण आते दर्शक उनका स्वागत तालियों से करते। कई दृश्यों मे तो वे इन बड़े नामों पर इतने भारी पड़ते कि प्राण साहब के सामने वे पासंग लगने लगते।
    प्राण साहब ने एक से बढ़ कर एक भूमिकाएं हिंदी फिल्मों में निभायीं। उन्होंने कभी एक जैसा चरित्र नहीं निभाया। भले ही भूमिका खलनायक की रही हो लेकिन उन्होंने हर भूमिका में नया गेटअप, नया रंग भरने की कामयाब कोशिश की। देश विभाजन के बाद उन्होंने पिलपिली साहब (1954), हलाकू (1956) व कई अन्य फिल्में। कई फिल्मों में उन्होंने प्रमुख भूमिकाएं कीं जैसे -धर्मा, जंगल में मंगल, गद्दार, राहु केतु, एक कुंआरी एक कुंआरा70 के दशक में विनोद खन्ना, अमिताभ बच्चन, रणधीर कपूर, ऋषि कपूर, नवनी निश्चल और राजेश खन्ना के साथ कई फिल्में कीं। इनमें राजेश खन्ना को छोड़ कर बाकी सभी कलाकारों से ज्यादा पारिश्रमिक प्राण साहब को मिलता था। खलनायक की भूमिका में प्राण इस तरह रमे कि लगा जैसे वे इसके लिए ही बने हों। वे अपने अभिनय कैरियर से बहुत ही संतुष्ट थे इसीलिए जब उनसे किसी पत्रकार ने पूछा कि अगले जन्म में वे क्या बनना चाहेंगें उनका जवाब था-अगला ही क्यों मेरा वश चले तो आने वाले हर जन्म में मैं प्राण ही बनना चाहूंगा।
    उनकी प्रमुख फिल्में हैं- कश्मीर की कली, खानदान, औरत, बड़ी बहन, जिस देश में गंगा बहती है, हॉफ टिकट, उपकार, पूरब और पश्चिम, डॉन । उन्होंने तकरीबन 400 पिल्मों में काम किया.। खानदान (1942), पिलपिली साहेब (1954) और हलाकू (1956) जैसी फ़िल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभायी। उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय मधुमति (1958), जिस देश में गंगा बहती है (1960), उपकार (1967), शहीद (1965), आँसू बन गये फूल (1969), जॉनी मेरा नाम (1970), विक्टोरिया नम्बर 203 (1972), बेईमान (1972), ज़ंजीर (1973), डॉन (1978) और दुनिया (1984) फ़िल्मों में माना जाता है। राम और श्याम, धर्मा, साधू और शैतान, नन्हा फरिश्ता, परिचय आदि में भी उनकी भूमिकाएं खूब सराही गयीं।  राम और श्याम  के कड़क खलनायक के रूप में वे दर्शकों में अपनी खलनायकी का खौफ जमाने में खूब कामयाब रहे। मानाकि इसमें उनके साथ उस वक्त के ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार डबल रोस में थे लेकिन कई दृश्यों में प्राण साहब दिलीप पर भारी पड़े।
 
फिल्म उपकार में मलंग चाचा के रूप में प्राण
   विक्टोरिया नंबर 203 में उन्होंने अशोक कुमार के साथ मिल कर कामेडी भी खूब की। एक बिन ताले की चाभी पाकर मारे-मारे फिरने वाले दो मस्तमौला दोस्तों की भूमिका में दोनों खूब जमे। इसका एक गाना-दो बेचारे बिना सहारे देखो खोज-खोज कर हारे, बिन ताले की चाबी लेकर फिरते मारे मारे इन पर फिल्माया गया था और इसमें दोनों ने बहुत अच्छा अभिनय किया। प्राण ने बाद में अपनी बुरे आदमी की इमेज से बाहर आने की ख्वाहिश की। इसमें कई लोगों ने उन्हें अलग ढंग का रोल देने का खतरा मोल लिया। एक जमे-जमाये खलनायक को चरित्र भूमिका और सकारात्मक भूमिका में लाना जोखिम ही था। हो सकता था कि अपने खलनायक को लोग उस रूप में पसंद न करें लेकिन प्राण ने जो भी भूमिका की बहुत खूब की। उपकार (1967) में मनोज कुमार ने उन्हें एक पैर से लंगड़े मलंग चाचा की भूमिका दी। मलंग चाचा जो अनाचार, भ्रष्टाचार और अत्याचार के खिलाफ  आवाज बुलंद करता है। वह आगाह करता है कि दुनिया के सारे रिश्ते-नाते, कस्मे-वादे झूठे हैं। यहां सब मतलब का व्यवहार है। कस्मे-वादे प्यार वफा सब बातें है बातों का क्या, कोी किसी का नहीं ये झूठे नाते हैं नातों का क्या गीत उन पर फिल्माया गया। इस पर उन्होंने इतना शानदार अभिनय किया कि पूरी फिल्म में अगर कोई चरित्र किसी के जेहन में असरदार ढंग से उतरा तो वह मलंग चाचा का था। इसके बाद से वे सकारात्मक भूमिकाएं निभाने लगे और उसमें भी अपने अभिनय का उन्होंने लाहा मनवा लिया।
   
फिल्म जंजीर में शेर खान की भूमिका में प्राण
प्रकाश मेहरा कि फिल्म जंजीर  में शेर खान की भूमिका में उनका अभिनय लोगों को भुलाये नहीं भूलेगा। यारी है ईमान मेरा यारमेरी जिंदगी गाने पर उनके ठुमके और एक काबुली  पठान के रूप में उनका रौबदार अभिनय इस फिल्म की जान था। कहते हैं कि अमिताभ प्राण साहब के रोल और रुतबे से सहमे-सहमे से थे। इस फिल्म के एक सीन में उनको गुस्से से एक कुरसी परठोकर मारनी थी लेकिन वे ऐसा कर नहीं पा रहे थे बाद में खुद प्राण साहब ने उनका हौसला बढ़ाया। प्राण और अमिताभ बच्चन के बीच बहुत ही दोस्ताना संबंध थे। कहते हैं कि मदद मांगने वालों की लाइन उनके द्वार पर हर हमेश लगती थी और वे किसी को निराश नहीं करते थे। सबकी यथा संबव मदद करते थे.। वैसे तो राजनीति पर उनकी कोई रुचि नहीं थी लेकिन राजनीति के नाम पर अनीति, अनाचार या स्वेच्छाचार उनको बरदाश्त नहीं था। यही कारण है कि आपातकाल के समय जब कई मुंह खामोश थे उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठायी। उन्होंने आपातकाल के विरोध में सीदे राष्ट्रपति के पास एक पत्र भेज दिया। इसी तरह मरोरजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता सरकार में भी कुछ ऐसा हुआ कि प्राण साहब को गलत लगा तो उन्होंने खुद मोरारजी देसाई के पास पत्र भेज कर इसकी शिकायत की। वे अपने सहकर्मियों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। यही वजह है कि जब तक हाथ-पैर चलते रहे वे सिने वर्कर्स एसोसिएशन की मदद के लिए प्रयासरत रहे।
उनकी कुछ अन्य फिल्में हैं-सनम बेवफ़ा, दाता , धर्मयुद्ध, धर्म अधिकारी , लव एंड गॉड , दुनिया, शराबी ,नास्तिक, सौतन , क्रोधी , कालिया,      धन दौलत , डॉन , गंगा की सौगन्ध ,अमर अकबर ,एन्थोनी,दस नम्बरी ,शंकर दादा ,सन्यासी ,मज़बूर, कसौटी , ज़ंजीर,बेईमान, हमजोली, यादगार,     जॉनी मेरा नाम     मोती ,    आँसू बन गये फूल ,साधू और शैतान ,एराउन्ड द वर्ल्ड ,दो बदन ,लव इन टोक्यो, सावन की घटा , खानदान , मेरे सनम, गुमनाम,शहीद , मनमौजी ,मुनीम जी        
  अपने अभिनय के लिए प्राण साहब को कई बार फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले।लेकिन कहते हैं कि एक बार फिल्म  बोईमान  के लिए मिलने वाले पुरस्कार को उन्होंने सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि उन्हें बेईमान  के संगीत के लिए शंकर-जयकिशन को  दिये गये पुरस्कार पर एतराज था। उनका विचार था कि पाकीजा  के संगीताकार गुलमा मोहम्मद इस पुरस्कार के ज्यादा हकदार हैं। हर दिल अजीज प्राण साहब को कई बड़े कलाकार तक अपना आदर्श मानते थे। कई लोगों ने तो उनसे वक्त पर स्टूडियो या शूटिंग स्थल पर पहुंचने की बात सीखी। आनेवाली की सदियों तक फिल्म इंडस्ट्री को इस बात का गर्व और गौरव होगा कि उसकी कला को प्राण जैसी एक महान शख्शियत ने समृद्ध किया। लोगों के जेहन में शेर खान का रौबीला चेहरा और मलंग बाबा की नसीहत -कस्मे वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या ताकयामत गूंजती रहेगी और उन्हें दुनिया के ऊंच नीच से आगाह करती रहेगी। प्राण कभी मरा नहीं करते प्राण मरेंगे नहीं। कभी प्राण ने खुद कहा था कि अभिनय तो उनकी आत्मा में व्याप गया है। आत्मा तो कभी मरती नहीं इसलिए प्राण का अभिनय भी अमर है और आनेवाले समय में वे उसके ही सहारे हर दिल में जिंदा रहेंगे।

1 comment:

  1. Film abhineta Pran ke bare me ek behtar jankari is lekh me mily. shukria.

    ReplyDelete