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Sunday, December 15, 2013

'आप' और अरविंद की सफलता के निहितार्थ


भ्रष्टाचार-कुशासन के अंधेरे में आशा की एक किरण 
राजेश त्रिपाठी

भारत की राजनीतिक विकल्पहीनता के टूटने का आभास है 'आप' और अरविंद केजरीवाल की विजय व उत्कर्ष। अनाचार-भ्रष्टाचार में डूबी देश की राजनीति और सत्ता को भविष्य में यह कौन-सी दिशा देगी यह तो भविष्य ही बतायेगा। स्वयं इस पार्टी का भविष्य क्या है यह भी भविष्य के ही गर्भ में निहित है लेकिन यह सच है कि इस पार्टी की अपार सफलता ने एक नयी उम्मीद तो जगायी है। भ्रष्टाचार और कुशासन के अंधेरे में डूबे इस देश को 'आप' में आशा की एक किरण दिखाई दी है। अगर यह कहें  कि यह अरविंद केजरीवाल के मुसलसल परिश्रम और लगन का फल है तो अतियुक्ति नहीं होगी। दरअसल यह वन मैन शो है। अरविंद केजरीवाल ने इस पार्टी का गठन किया, इससे कुछ आम आदमियों को जोड़ा और इसे विजयश्री दिलाने के लिए भगीरथ प्रयास किया। यह अलग बात है कि दिल्ली की सत्ता इससे त्रिशंकु की स्थिति में आ गयी। अब लोगों को इसके सामने सिर्फ राष्ट्रपति शासन और दोबारा चुनाव कराने का विकल्प ही नजर आ रहा है।

     अरविंद केजरीवाल एक ऐसा नाम है जो कुशल रणनीतिकार है और जिसका दिमाग व्यवस्थित है और सही दिशा में सोचता है। उन्होंने राजनीति को चुनौती के रूप में लिया। यह चुनौती उन्हें उस वक्त मिली जब वह पिछले साल अन्ना के जनलोकपाल आंदोलन में शामिल थे। वे केंद्र सरकार से अन्ना के जनलोकपाल विधेयक को पास करने की गुजारिश कर रहे थे और कई राजनेता उनसे कह रहे थे कि राजनीति का परिष्कार चाहते हैं तो सदन के अंदर चुन कर आइए। बाहर खड़े रह कर आप इसकी सफाई नहीं कर सकते। हालांकि उस वक्त इस चुनौती पर अन्ना से सकारात्मक संकेत नहीं दिये थे और कहा था कि वे किसी राजनीतिक पार्टी का गठन नहीं करेंगे लेकिन लगता है कि अरविंद केजरीवाल ने उसी दिन से मन बना लिया था कि तैराकी सीखना है तो तालाब में उतरना ही होगा। किनारे पर खड़े रह कर तो आप जिंदगी भर तैराकी नहीं सीख पायेंगे। यही सोच कर अरविंद ने आम आदमी पार्टी (आप) का गठन किया और उसे विजयश्री भी दिलायी। पार्टी को गठित हुए जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुए होंगे कि इसने दिल्ली विधानसभा चुनावों में अपार सफलता हासिल की। यही नहीं इसके उम्मीदवारों ने कांग्रेस और भाजपा जैसी प्रतिष्ठित और जमी-जमायी पार्टी के उम्मीदवारों को भारी मतों से हरा कर सबको चौंका दिया। एक एकदम नयी और अनजान पार्टी की यह विजय सबके लिए अप्रत्याशित थी लेकिन अरविंद के लिए नहीं जिन्हें अपनी सफलता का पहले दिन से ही यकीन था। इस यकीन का आधार था जनलोकपाल आंदोलन के दौरान उन लोगों को मिला अपार जन समर्थन। लोगों को उस समय इन लोगों से उम्मीद बंधी थी इसलिए उनहोंने विकल्प के तलाश में इस नये दल का साथ देने का मन बना लिया था। अरविंद भी अपनी पार्टी की जीत को आम आदमी की जीत बताते हैं और उनकी सरकार बनी तो आम आदमी के हित के लिए ही काम करने का संकल्प उन्होंने लिया है।

     जो अरविंद के सत्य और सुशासन के लिए किये गये संघर्ष और उनके स्वभाव से वाकिफ हैं वे जानते हैं कि यह शख्स एक बार जो ठान लेता है, उसे सार्थक परिणति तक पहुंचाये बगैर चैन नहीं लेता। चाहे आरटीआई (राइट टू इन्फारमेशन- सूचना का अधिकार) आंदोलन हो या अन्ना का जनलोकपाल आंदोलन हर एकमें अरविंद का अध्यवसाय और उनकी लगन किसी से छिपी नहीं है। आरटीआई में उन्होंने सफलता पायी और लोगों को एक ऐसा हथियार दिया जिससे वे सरकारी कामकाज के बारे में वह जानकारी भी पा सकते हैं जिस पर उनका पहले हक नहीं था। यह और बात है कि लोगों ने इस अधिकार का दुरुपयोग करना भी शुरू कर दिया है लेकिन इससे इस बड़े अधिकार की महत्ता तो कम नहीं हो जाती। अरविंद को इस सफलता के लिए प्रतिष्ठित मैगसाय साय सम्मान मिला।

     कुछ लोगों का कहना है कि अन्ना के जनलोकपाल आंदोलन के रूपकार, रणनीतिकार और योजनाकार भी अरविंद केजरीवाल ही हैं। अगर वे सक्रिय नहीं होते तो शायद यह आंदोलन इतना व्यापक और राष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंच पाता। वैसे यह भी सच है कि इसकी सफलता का एक कारण यह भी है कि इसे अन्ना हजारे जैसे अदम्य और जुझारू गांधीवादी का साथ मिला। अन्ना जिन्होंने जन हित में अपने शरीर को अनशन में तपाया जिससे सत्ता पर एक ऐसा दबाव बना कि उसे लोकपाल विधेयक लाना पड़ा। डाइबिटीज से पीड़ित होने के बावजूद अरविंद उस समय अन्ना के आंदोलन में सम्मिलित हुए। आज लोग भले ही अन्ना और अरविंद के बीच मतभेद या मनभेद के संकेत देखते हों लेकिन अरविंद ने अपनी सफलता का श्रेय भी अन्ना के आंदोलन को दिया। अरविंद की जीत पर अन्ना ने भी खुशी जतायी। मानाकि आप पार्टी का फलक अभी सीमित और छोटा है लेकिन एक बड़ा वटवृक्ष भी नाचीज से छोटे बीज से ही बनता है। सब कुछ ठीक रहा और 'आप' की सत्ता बनी और वह अपने सिद्धांतों पर काम कर पायी तो उसे आगामी लोकसभा चुनावों में भी अपार सफलता मिलने की उम्मीद है। हालिया जीत से पार्टी बेहद उत्साहित है और देश भर में अपना विस्तार करने की योजना बना रही है। इसमें क्षेत्रीय कार्यालय खोलना, प्रांतीय समितियों का गठन और पार्टी के सदस्य बनाना शामिल है। 'आप' जैसी नितांत नयी पार्टी की जीत से बहुत-सी प्रतिष्ठित पार्टियां बौखला-सी गयी हैं और उनके नेता अरविंद और उनकी पार्टी पर लगातार आक्षेप और व्यंग्य कसे जा रहे हैं। चुनाव के ऐन पूर्व 'आप' को एक स्टिंग में फंसाने की कोशिश की गयी जो टिक नहीं पायी।

     अरविंद की सफलता के निहितार्थ खोजें तो वह भ्रष्टाचार, अनाचार, घोटाला से जनता में उपजी ऊब और खीझ में मिलेंगे। इस सबसे मुक्ति पाने के लिए निराश-हताश जनता ने अरविंद को त्राता के रूप में देखा और पुरानी प्रतिष्टित पार्टियों से छिटक कर नितांत नयी 'आप' पार्टी की ओर मुड़ गयी।

     अरविंद की जीत उनकी जनता में उस विश्वसनीयता की जीत है जो उन्होंने अथक परिश्रम से कमायी है। दिल्ली की बिजली-पानी और अन्य असुविधाओं से जूझती-तड़पती जनता के साथ-साथ खड़े रहे अरविंद और अपने तईं जितनी हो सके मदद की। जिनके बिजली के कनेक्शन काट दिये गये उनके घर बिजली के कनेक्शन जोड़ने दौड़े चले गये। इस तरह लोगों में यह विश्वास जगाया कि कौन आदमी है जो हर वक्त उनकी मदद के लिए तत्पर है। पानी जैसी नितांत नित्य प्रयोजनीय और आवश्यक सेवा भी हर एक तक नहीं पहुंच पा रही और दिल्ली के कई इलाके में लोग पानी बड़ी कीमत में खरीदने के मजबूर हैं। अरविंद को उनकी तकलीफ ने भी परेशान किया और इस मुद्दे के प्रति भी वे सतर्क और सचेत हैं और जितना बन सके इस स्थिति को सुधारना चाहते हैं। महंगाई-कालाबाजरी पर रोक लगाना भी उनके कार्यक्रम में है।

     आप की सफलता का एक और कारण आप द्वारा जनसाधारण के बीच से अपने उम्मीदवारों की तलाश और चुनाव के लिए जनसाधारण से खुले चंदे के जरिये जरूरी धनराशि इकट्ठा करने की रणनीति थी। एक कारण यह भी था कि साधारण और आम घोषणापत्रों के बजाय इस पार्टी ने हर विधानसभा क्षेत्र की समस्याओं को चिह्न्ति करनेवाले विशिष्ट घोषणापत्र पेश किये। इसने घर-घर जाकर प्रचार किया। लोगों से सीधा संपर्क  किया । धन बल और बाहुबल के बजाय जनबल और जन सहयोग को इस पार्टी ने चुनाव प्रचार का जरिया बनाया।

     'आप' की सफलता में जहां अन्ना के आंदोलन से उभरे अपार जन समर्थन की अहम भूमिका है वहीं अरविंद केजरीवाल का निश्छल और कलंकहीन चरित्र भी इसका एक अहम कारण है। अरविंद की आम आदमी पार्टी  प्रशासन और सत्ता में आमूल-चूल परिवर्तन की हामी है जिससे इसे जनोन्मुख बनाया जाये। देश में सत्ता का वह स्वरूप प्रतिष्ठित हो जिसमें शासक या सरकारी पदाधिकारी खुद को शासक या सर्वशक्तिमान न मान कर जनसेवक माने। 'आप' के सिद्धांत आम आदमी से जुड़े हैं और उसके हित की बात करते हैं इसलिए उसकी बातें सीधे लोगों के दिल तक पहुंचते हैं।

     'आप' को दिल्ली में सरकार बनाने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों ने समर्थन देने का वादा किया था लेकिन अरविंद ने साफ कर दिया था कि वे न किसी से समर्थन लेंगे न देंगे। इसके बाद दिल्ली के उप राज्य़पाल के पास कांग्रेस ने निस्शर्त समर्थन की चिट्ठी भेज दी। अरविंद इस पर भी राजी नहीं हुए। उन्होंने कहा अगर कांग्रेस या भाजपा तैयार हो तो उसका समर्थन लेने के लिए उनकी भी कुछ शर्तें हैं। अरिवंद ने जो शर्तें भाजपा और कांग्रेस के सामने रखी हैं वे हैं-

गाड़ी, बड़े बंगले और सुरक्षा नहीं लेंगे।
2. विधायक व पार्षद फंड समाप्त कर मोहल्ला सभाओं को दिया जायेगा।
3. दिल्ली के लिए लोकपाल विधेयक पारित करके 15 साल में कांग्रेस के घोटालों की जांच करवाई जायेगी।
4. भाजपा द्वारा 7 साल में नगर निगम में किये घोटालों की जांच होगी।
5. रामलीला मैदान में विशेष विधानसभा सत्र बुलाकर वहां लोकपाल विधेयक पारित किया जायेगा।
6. बिजली कम्पनियों के आडिट के बाद दरें तय की जायेंगी।
7. दिल्ली में बिजली के मीटर तेज चलने की निष्पक्ष जांच करवायी जायेगी और खराब मीटर पाए जाने पर कम्पनी से पिछला पैसा भी वसूला जाएगा।
8. पानी माफिया को तिहाड़ जेल भेजा जायेगा और आम आदमी को 700 लीटर पानी मुफ्त दिया जायेगा।
9. दिल्ली की अनधिकृत कालोनियां एक साल के अंदर नियमित होंगी।
10. झुग्गी-बस्तियों में रहने वालों को पक्के मकान दिये जायेंगे और शौचालयों की व्यवस्था की जायेगी।
11. आम आदमी पार्टी दिल्ली में रिटेल में एफ.डी.आई. के विरुद्ध है।
12. दिल्ली के किसानों को दूसरे राज्यों की भांति सब्सिडी का लाभ मिलेगा।
13. निजी स्कूलों में डोनेशन सिस्टम बंद होगा। 500 नये स्कूल खोले जायेंगे।
14. नये सरकारी अस्पताल खोले जायेंगे। प्राइवेट अस्पतालों में बेहतर इलाज का प्रबंध किया जायेगा।
15. दिल्ली में नयी अदालतें खोली जायेंगी और नये जजों की नियुक्ति होगी ताकि मामले 6 महीने में निपटाये जा सकें।
16. आम आदमी पार्टी की सरकार व्यापार और उद्योग के लिए बने कानून व नीतियों की समीक्षा करेगी।
17. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले व कांग्रेस केंद्र में इसे पास कराने में मदद करे।
18 वां सवाल केजरीवाल ने केवल राजनाथ सिंह को लिखे पत्र में पूछा है, ‘‘कई शर्तों को लागू करने के लिए दिल्ली नगर निगम के सहयोग की जरूरत होगी जिस पर भाजपा काबिज है। क्या वह सहयोग करेगी?

    अरविंद केजरीवाल ने  इन शर्तों के जरिये कांग्रेस और भाजपा के पाले में गेंद फेंक दी है। यह गेंद क्या एक बम है जिससे दोनों पार्टियों का बिदकना स्वाभाविक है। अगर ये अरविंद की सारी शर्तें जैसी की तैसी मान लेती हैं तो तय है कि कुशासन और भ्रष्टाचार में इनके अपने ही लोगों की गरदन नपनी है। भला कौन इतना साहसी और चरित्रवान है कि जनहित के लिए खुद को नुकसान करने को तैयार हो जाये। अब अरविंद ने ऐसा खेल खेला है कि दोनों पार्टियां अगर उनकी शर्तें ऩही मानती तो लोगों में यह संदेश जाता है कि अरविंद जो जनहित के कार्य करना चाहता है ये दोनों पार्टियां उनके खिलाफ हैं। इससे इन दोनों पार्टियों के जनाधार में दरार आ सकती है। दिल्ली की वर्तमान दुविधा का हल क्या निकलता है यह कुछ दिन में ही साफ हो जायेगा लेकिन 15 दिसंबर को राहुल गांधी का दिल्ली में प्रेस कांफ्रेस कर के लोकपाल विधेयक पास कराने के प्रति अपनी दिलचस्पी और लगन दिखाना भी एक मायने रखता है। लगता है कि आप पार्टी की अप्रत्याशित सफलता ने कांग्रेस की आत्मा तक को झकझोर दिया है। सफलता के दंभ में खोयी यह पार्टी भी अब अपनी आंखें और कान दोनों खोल कर चलना चाहती है। फूंक-फूंक कर पांव रखना चाहती है ताकि उससे कोई जनविरोधी काम न हो जाये। वैसे भी दिल्ली की दयनीय हार के बाद राहुल जी ने भी आप के प्रयास को माना था और कहा था कि आम जनता से उनका सीधा संपर्क और करीबी जुड़ाव ही उनकी सफलता का कारण है। उन्होंने यह भी माना था कि हमें आप से सीखना चाहिए।

  कारण कुछ भी हों यह दिन के उजाले की तरह साफ है कि आप पार्टी भारतीय राजनीति में एक विकल्प की तरह उदित हुई है। अब लोग भाजपा, कांग्रेस या अन्य पार्टियों के अलावा भी सोचने का एक आधार पा चुके हैं। संभव है यह आधार समय पाकर अपना विस्तार भी करे और सर्व भारतीय स्वरूप भी पा सके। आमीन।

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