http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-4

Monday, November 17, 2014

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-4


जिनको दी बंबई जाने की प्रेरणा
राजेश त्रिपाठी
 (भाग-4)
         सिर्फ संगीतकार रविंद्र जैन ही नहीं कलकत्ता से उन्होंने दो और लोगों को भी बंबई जाकर भाग्य आजमाने को प्रेरित किया। इनमें एक थे अभिनेता संजीव कुमार (वास्तविक नाम हरीभाई जरीवाला) जो कलकत्ता के नाटकों में भाग लिया करते थे। रुक्म जी सन्मार्ग के सिने संपादक थे इसलिए अपनी खबर छापने का अनुरोध लेकर अक्सर 160 बी चित्तरंजन एवेन्यु पर स्थित सन्मार्ग के कार्यालय पहुंच जाते  थे। अक्सर वे रुक्म जी से अनुरोध करते कि वे उनकी तस्वीर और परिचय अपने अखबार में छाप दें। रुक्म जी अक्सर उनको टालते रहते थे। जब उनके आग्रह के सिलसिले ने थमने का नाम नहीं लिया तो एक दिन रुक्म जी ने समझाया-तुममें टैलेंट है, अच्छे अभिनेता बनने की सारी खूबियां हैं , क्यों यहां अपना समय और मेरा भी बरबाद करते हो। बंबई जाओ, ऐसा अभिनेता बनो कि मैं तुम्हारी तस्वीर खोज-खोज कर छापने को मजबूर हो जाऊं। संजीव कुमार को उनकी यह बात जंच गयी। उन दिनों राधेश्याम (शायद यही नाम था उनका) झुनझुनवाला एक फिल्म बनाने जा रहे थे। वे अपने साथ संजीव कुमार को ले गये। वह फिल्म तो शायद बनी नहीं पर धीरे-धीरे संजीव कुमार की फिल्मों की गाड़ी चल पड़ी। बंबई में वे इप्टा (इंडियन प्यूपिल्स थिएटर एसोसिएशन ) से जुड़े और नाटकों व फिल्म में काम करते रहे। धीरे-धीरे वे शीर्ष नायक बने। वे ऐसे अभिनेता के रूप में ख्यात हुए जो अभिनय नहीं करते थे बल्कि कथानक के उस पात्र को जीते थे जो उन्हें दिया जाता था। उनके अभिनय में वह खूबी थी कि उनके परदे पर आते ही सामने खड़ा अभिनेता उन्नीस हो जाता था। दर्शकों का सारा ध्यान संजीव कुमार पर टिक जाता था। संजीव कुमार ने रात और दिन, राजा और रंक, कोशिश, शोले, आंधी, मौसम, संघर्ष, आपकी कसम, पति पत्नी और वह, अंगूर, सीता और गीता, नया दिन नयी रात (जिसमें उन्होंने 9 भूमिकाएं निभायीं), अनामिका, त्रिशूल व कई अन्य फिल्मों में भूमिकाएं कीं। उनको श्रेष्ठ अभिनेता के रूप में कई सम्मान मिले जिनमें दो राष्ट्रीय पुरस्कार भी शामिल हैं।  
संजीव कुमार
अभिनेता संजीव कुमार बड़े अभिनेता बन गये लेकिन फिर भी वे अपने पथप्रदर्शक रुक्म जी को नहीं भूले। एक बार जब वे कलकत्ता किसी फिल्म की शूटिंग के लिए आये तो फिल्म प्रचारक ने उनको पत्रकारों से मिलवाया। उन स्थानीय पत्रकारों में रुक्म जी भी थे। सबसे मिलते-मिलाते संजीव कुमार जब उनके पास पहुंचे तो बाकायदा उनको चरण स्पर्श किया और याद किया कि उन्होंने ही उनको बंबई जाने के लिए प्रेरित किया था। यह संजीव जैसे महान अभिनेता की सदाशयता ही थी कि उन्होंने यह बात याद रखी वरना आज कि दुनिया का दस्तूर यह है कि लोग उस सीढ़ी को ही भूल जाते हैं जिस पर चढ़ वे शीर्ष पर पहुंचते हैं।
अंजन श्रीवास्तव आज फिल्मों की दुनिया का जाना-पहचाना नाम है। फिल्में हों या धारावाहिक हर एक में उन्होंने अपने अभिनय से लोगों की प्रशंसा पायी है। अंजन ने कोलकाता में बी काम और एलएलबी करने के बाद इलाहाबाद बैंक में नौकरी कर ली। उन्हें अभिनय से लगाव था इसलिए वे हिंदी, बंगला नाटकों में काम करने लगे। जिन संस्थाओं के साथ कलकत्ता (अब कोलकाता) में नाटक करते थे उनमें संगीत कला मंदिर और अदाकार जैसी प्रसिद्ध संस्थाएं भी थीं। रुक्म जी भी अक्सर उनके नाटकों को समालोचक के रूप में देखने जाते थे। धीरे-धीरे उनकी अंजन श्रीवास्तव से गहरी पहचान हो गयी। फिर अंजन रुक्म जी से मिलने अक्सर सन्मार्ग कार्यालय ( कोलकाता के चित्तरंजन एवेन्यू ) में जाने लगे। वहां वे भी औरों की तरह अपने बारे में अखबार में छापने का अनुरोध करने लगे। रुक्म जी ने उनका अनुरोध रखा तो लेकिन उन्हें भी यही राय दी कि समुद्र में तैरने का हुनर रखनेवाली मछली को तालाब से बाहर निकलना चाहिए। उनका आशय था कि इतना अच्छा अभिनय कर लेते हैं तो इसकी कदर तो बंबई (अब मुंबई) में ही होगी। यहां कुछ नहीं रखा। नाटकों में काम करके आप एक सीमित दायरे में सिमट कर रह जायेंगे। फिल्मों में आये तो अभिनय का व्यापक फलक मिलेगा। अंजन को भी बात समझ में आ गयी। पहले तो कुछ दिन तक उन्हें बंबई जाने के लिए पिता की इजाजत नहीं मिली लेकिन बाद में पिता ने अनुमति दे दी।
       
अभिनेता राजेंद्र कुमार के साथ रुक्म जी
अंजन बंबई पहुंचे  तो उनके लिए अभिनय की कई दिशाएं एक साथ खुल गयीं। वहां वे इप्टा से जुड़ गये फिर वे इसके महासचिव और उपाध्यक्ष तक बन गये। इस दौरान उन्होंने कई नाटकों में काम किया और लोगों की प्रशंसा भी पायी। बाद में वे पृथ्वी थिएटर से जुड़े और वहां भी नाटकों में अभिनय करते रहे। इप्टा में एम एस सथ्यू के निर्देशन में
सफेद कुंडली नामक नाटक की भूमिका में उन्हें काफी प्रशंसा मिली। इसके बाद कुंदन शाह की फिल्म सजाए मौत और हृषिकेश मुखर्जी की शानदार कामेडी फिल्म गोलमाल से उनका हिंदी फिल्मों प्रवेश हुआ। इसके बाद जेपी दत्ता की गुलामी में उन्हें भूमिका मिली। फिल्मों के साथ-साथ वे हिंदी धारावाहिकों में भी समान रूप से काम करते रहे। इनमें ये जो है जिंदगी’, ‘मनोरंजन, कथासागर, नुक्कड़, अल्प विराम, भंवर, विरुद्ध, न बोले तुम न हमने कुछ कहाब्याह हमारी बहू का । उन्हें आर.के. लक्ष्मण के कार्टून आम आदमी के रूप में अभिनय करने के लिए वागले  की दुनिया धारावाहिक मिला। कहते हैं कि इस सीरियल में आम आदमी की भूमिका निभाने के लिए कलाकारों का इंटरव्यू स्वयं आर. के. लक्ष्मण ने लिया था। उन्होंने कई अभिनेताओं का इंटरव्यू लिया लेकिन जब उनके सामने अंजन आये तो उन्होंने उनसे बातें करने के बाद कहा-यही है मेरा आम आदमी। और कहना ना होगा कि वागले के चरित्र ने अंजन श्रीवास्तव को रातों रात स्टार बना दिया। उन दिनों जब वे कलकत्ता आये तो अपने परम प्रिय रुक्म जी से मिलने उनके कलकत्ता में कांकुड़गाछी के फ्लैट में गये तो भारी भीड़ ने उन्हें घेर लिया जो वागले, वागले चिल्ला रही थी। बड़ी मुश्किल से उन्होंने समझाया –भाई अभी मैं वागले नहीं हूं। अभी तो मैं अपने बड़े भैया रुक्म जी मिलने आया हूं।
अपने उन्ही रुक्म जी के निधन की खबर पाकर अंजन विह्वल हो गये। उन्होंने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी और कहा-आज मैं जहां भी हूं वहां पहुंचाने में उनका बड़ा योगदान है।
अंजन श्रीवास्तव
अंजन जब भी कलकत्ता आते रुक्म जी से जरूर मिलते थे। उनके घर शादी, ब्याह या कोई मांगलिक कार्य होता तो रुक्म जी को याद किया जाता। वे उनके परिवार की शादियों में भी शामिल होते थे। बंबई में आज अंजन श्रीवास्तव जाना-पहचाना नाम है। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर दूसरे बड़े-बड़े अभिनेताओं के साथ वे तकरीबन डेढ़ सौ फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं। उनकी कुछ फिल्में हैं-कालिया, बेमिसाल, साथ-साथ, गुलामी, जवाब, लव 86, प्यार के दो पल, लोहा, मिस्टर इंडिया, काश, आखिरी अदालत, शहंशाह, सलाम बांबे, दयावान, मैं आजाद हूं, अव्वल नंबर, अग्निपथ, योद्धा, नरसिम्हा, मिसीसिपी मसाला, राजू बन गया जेंटलमैन,  चमत्कार, खुदागवाह, जो जीता वही सिकंदर, कभी हां कभी ना, रूप की रानी चोरों का राजा, दामिनी, घातक, गुप्त, सनम, चाइना गेट, प्यार तो होना ही था, बंधन, पुकार.  आशिक, लज्जा, शरारत, चक दे इंडिया, मित्तल वर्सेस मित्तल, तीसमार खां आदि।
   फिल्मी दुनिया के बारे में तरह-तरह के अनुभवों से रुक्म जी को दो-चार होना पड़ता था । कई घटनाएं जो आदमी को अंदर तक हिला जायें। दिलीप कुमार, राज कपूर के साथ रुक्म जी का परिचय पुराने समय के मशहूर चरित्र अभिनेता मोतीलाल से भी था। कहते हैं कभी मोतीलाल जी का जलवा था लेकिन जब वे अंतिम दिनों में बीमार पड़े तो अपने घर में ही अकेले कैद हो कर रह गये थे। रुक्म जी जब एक बार उनसे मिलने उनके घर गये तो उन्होंने दरवाजे की बेल दबायी। बेल बजते ही भीतर से कुत्ते के भूंकने की आवाज आयी। वह आवाज धीरे-धीरे और करीब आती गयी। थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला तो सामने कुत्ता खड़ा भूंक रहा था। रुक्म जी के रोएं खड़े हो गये। वे डर गये कि कुत्ता अनजान समझ कर काट न ले। अभी वे डर रहे थे कि तभी ऊपर की तरफ से एक धीमी आवाज आयी-घबराइए मत, उसके पीछे-पीछे चले आइए, वह आपको लेने गया है। हिम्मत कर के रुक्म जी कुत्ते के पीछे-पीछे चल दिये। कुत्ता उन्हें मोतीलाल के पलंग के पास छोड़ कर वहीं एक कोने में सिमट कर बैठ गया। मोतीलाल ने बताया कि वे बिस्तर से लग गये हैं। बहुत कम लोग ही ऐसे में हाल पूछने आते हैं। यह कुत्ता इतना आज्ञाकारी है कि यही लोगों की आगवानी करके ले आता है।
      मोतीलाल की हताशा में उम्रदराज और काम न कर सकने या न पाने वाले कलाकारों की दास्तान साफ झलकती थी।

      बंबई आते-जाते रुक्म जी की जान-पहचान माला सिन्हा, मीनाकुमारी, साधना, वैजयंती माला आदि से भी हो गयी। बंबई में अक्सर वे फिल्म की शूटिंग में भी जाते रहते थे। (शेष अगले भाग में)

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