http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-6

Thursday, November 27, 2014

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-6

  
झेला आजादी के बाद के कलकत्ता दंगों का कहर
(भाग-6)
राजेश त्रिपाठी
   कलकत्ता में रुक्म जी की कहानी को कुछ देर के लिए विराम देकर उनके अतीत की कुछ घटनाओं की ओर लौटते हैं जो उनके जीवन के उस कालखंड से जुड़ी हैं जो बांदा और उनके मामा मंगल प्रसाद के गांव जुगरेहली में गुजरा। बांदा में अपनी क्रांतिकारी कविताओं और अंग्रेज सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वाले रुक्म जी को कई बार पुलिस की लाठियां खानी पड़ीं और जुल्म सहने पड़े। वे बांदा में मामा जी के संरक्षण में रह कर पढ़ा करते थे। मामा जी नहर विभाग में नौकरी करने के साथ-साथ पूजा पाठ भी किया करते थे। जब वे व्यस्त होते तो यह काम किशोर रुक्म जी को करना पड़ता। वे अपनी सामर्थ्य भर आजादी की अलख भी जगाते रहे। देश प्रेम की कविताएं लिख कर युवकों को अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ मुस्तैदी से लड़ने को प्रेरित करते रहे। इतना सब करने के बावजूद उन्होंने कभी स्वाधीनता सेनानी होने का ना दावा किया और ना ही कभी उन्हें मिलनेवाली सुविधाओं की ही मांग की। उनसे पूछा जाता कि इतने लोगों ने ताम्रपत्र पा लिया, पेंशन पा रहे हैं, आपने इसके लिए कोशिश क्यों नहीं की।
      इस पर रुक्म जी का जवाब होता –हमने जो किया वह देश प्रेम में, देश की सेवा के लिए किया, उसकी कीमत लेंगे, इतने अधम हो गये हैं हम? हमें पता है कि क्रांतिकारियों के थैले ढोनेवाले भी क्रांतिकारी के रूप में पेंशन पा रहे हैं लेकिन हमारा ध्येय यह नहीं था। हम तो देश को आजाद कराना चाहते थे, वह आजाद हो गया वही हमारी सबसे बड़ी प्राप्ति है।
     रुक्म जी जब कोलकाता चले आये तो कुछ दिन बाद मंगलप्रसाद अपने पैतृक गांव जुगरेहली लौट गए। उनके साथ उनकी पत्नी मीरा त्रिपाठी भी थीं। जिस गांव में उनके पिता मुखराम त्रिपाठी के कई बीघे खेत थे, वह अब खुद उनके लिए ही पराया हो गया था। इतने साल तक वह गांव से दूर थे, अपने भांजे की रक्षा और उनकी जिंदगी संवारने में लगे थे इधर गांव में उनका सब कुछ लुट गया था। उनकी अपनी जिंदगी तबाह हो गयी थी। लेकिन बहादुरी और हिम्मत में बेमिसाल मंगलप्रसाद हारे नहीं। तिनका-तिनका जुटा कर उन्होंने जिंदगी को फिर संवारने की कोशिश की। प्रयास करके फिर जमीन ली और उनकी जिंदगी चलने लगी। उन्हें दिन रात भांजे रुक्म जी की चिंता लगी रहती जो कलकत्ता में थे। भांजे से अब सिर्फ चिट्ठी-पत्री का रिश्ता रह गया था। वर्षों से रुक्म जी कलकत्ता से नहीं लौटे थे।
      यह आजादी के पहले का दौर था। अरसे बाद जब आजादी की सुगबुगाहट हुई तब रुक्म जी मामा के गांव जुगरेहली में थे। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ जुगरेहली में जम कर बरसात हुई। रुक्म जी जिस कमरे में रहते थे, उसके अंदर तक पानी भर गया। उस वक्त रुक्म जी आजादी पर कविता लिख रहे थे और उनकी सहधर्मिणी निरुपमा त्रिपाठी कागज को रंग कर छोटे-छोटे तिरंगे बना रही थीं जो घर के आस-पास सजाने थें। उस दिन रुक्म जी ने जो कविता लिखी थी वह पूरी तो याद नहीं लेकिन उसकी आखिरी पंक्ति (जो कविता की हर पंक्ति की टेक के रूप में थी) याद है। इस कविता में आजादी मिलने का दिन, तिथि, नक्षत्र आदि के उल्लेख के साथ ही एक पंक्ति आती थी-हिंद की गुलामी का रुक्म आज बेड़ा पार है। बाद के दिनों में स्थिति यह हो गयी थी कि रुक्म जी जब भी लोगों के बीच इस कविता को पढ़ते तो लोग आखिरी पंक्ति-हिंद की गुलामी का रुक्म आज बेड़ा पार है खुद दोहरा देते। चाहे उनका बचपन का शहर बांदा रहा हो या उनके मामा के गांव जुगरेहली के पास का कस्बा बबेरू हर जगह कवि सम्मेलनों में उन दिनों उनसे यही कविता सुनने की मांग होती।  
रुक्म जी के मामा जब उनकी जान बचाने के लिए उनके गांव बिलबई से बांदा ले गये तो उनके उन परिजनों ने जो उनकी जान के पीछे पड़े थे, उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया। यहां लोभ और संपत्ति की अंधी चाह की एक दास्तान भी कहते चलें। रुक्म जी कलकत्ता चले आये तो कुछ अरसे बाद उनके उन परिजनों ने जमीन के दस्तावेजों में उनको लापता के रूप में लिखवा दिया ताकि संपत्ति का बेरोकटोक और बेधड़क इस्तेमाल कर सकें। उऩ लोगों को यह पता था कि रुक्म जी कलकत्ता में हैं। इनसानियत किस कदर गिर गयी है इस घटना से इसका पता चलता है। रुक्म जी सरकारी दस्तावेज में लापता हैं इसका पता उस वक्त चला जब जमीन की चकबंदी का दौर आया। रुक्म जी को पता चला तो वे कलकत्ता से भागे-भागे बिलबई गये और अपने परिजनों से मिलने से पूर्व चकबंदी कार्यालय में जाकर अधिकारियों से मिले। अधिकारी उन्हें देख कर बहुत खुश हुए और उनको रजिस्टर दिखाया जिसमें उनके परिजनों ने उनको लापता बताया था।
एक चकबंदी अधिकारी ने कहा-पंडित जी हमारे रिकार्ड में तो आप लापता बताये जा रहे हैं और यह आपके सगों की करतूत है जो आपकी जमीन को हमेशा के लिए हड़पना चाहते हैं। वह तो हम आपके उपन्यास पढ़ते हैं , उसमें आपकी फोटो और परिचय देखा तो पता चला कि आपके बारे में दर्ज जानकारी गलत है और इरादतन डाली गयी है।
    यह सुन कर रुक्म जी चौंक गये और पूछा- तो मुझ तक चकबंदी की खबर आपने भेजी थी।
जी हां, हमें आपके एक परिचित का पता चला और हमने उनसे कहा कि आप तक यह खबर भेजी जाये कि आपकी जमीन की चकबंदी हो रही है और आपका यहां होना जरूरी है।
    चकबंदी अधिकारियों ने रुक्म जी के परिजनों को खूब फटकारा और कहा कि –अगर ये शिकायत कर दें तो तुम लोग जीवित आदमी को लापता और उसकी जमीन हड़पने के जुर्म में जेल जा सकते हो।
     अधिकारियों ने रुक्म जी को उनके हिस्से की जमीन के कागजात सौंपते हुए कहा-यह जमीन आपकी है, आप जैसे चाहें इसका इस्तेमाल करें।
    काली मिट्टी वाली वह जमीन सोना उगलती है। रुक्म जी चाहते तो वहां खेती करा के आराम से बैठे-बैठे जिंदगी काट सकते थे लेकिन खेती उनके बस की बात नहीं थी। कलकत्ता में रह चुका आदमी भला गांव में रह कर खेती कैसे करा सकता था जिसका उसे थोड़ा भी ज्ञान नहीं था। उनके परिजनों ने भांप लिया कि वे जमीन बेच कर जायेंगे।
  उनमें से एक ने कहा-हमसे गलती हुई लेकिन अब ऐसा भी ना करना कि किसी और को जमीन बेच कर हमारे सिर पर दुश्मन बैठा दो। तुम्हारी भतीजियां हैं उनका तो खयाल करो। जमीन हमें ही दे दो।
1947 के कलकत्ता दंगे के दौरान पुलिस एक्शन
     रुक्म जी कुछ नहीं बोले उन्होंने उऩको औने-पौने दामों पर जमीन बेच दी।
    15 अगस्त 1947 को जब रुक्म जी जुगरेहली में आजादी के गीत गा रहे थे, उनके दिल में कलकत्ता में 1946 के उन दंगों की टीस थी जो उन्होंने देखा था। एक ऐतिहासिक भूल ने देश के दो टुकड़े क्या किये दो कौमों के दिलों के भी टुकड़े कर दिये। पास-पास भाइयों के रूप में रहनेवाले लोग पल भर में एक-दूसरे की जान के दुश्मन बन गये। कुछ नेताओं की महत्वाकांक्षा ने देश का बंटवारा करा दिया। विभाजन के बाद भारत से और नये बने देश पाकिस्तान से लोगों का पलायन शुरू हुआ। हिंदू, सिख पाकिस्तान छोड़ कर भारत आ रहे थे और मुसलिम भारत से पाकिस्तान जा रहे थे। लोगों का घर, संपत्ति पीछे छूट रही थी, अपने भी छूट रहे थे। बंटवारे से उभरी नफरत और दर्द ने दो कौमों को दुश्मन बना दिया। लोगों के बीच ऐसी मारकाट मची जिससे बंटवारे के चलते हुए दंगों में तकरीबन दो लाख लोग तक मौत के घाट उतार दिया।
   बंटवारे के बाद हुए इन दंगों की लपट कलकत्ता तक भी पहुंच गयी। कलकत्ता के दंगे इतने भयानक थे कि इससे गांधी जी तक चिंतित और दुखी हो गये थे। उन्होंने इससे दुखी होकर आमरण अनशन तक किया था। उन्होंने दुखी होकर कहा था-मैंने इस तरह की खंडित आजादी तो नहीं चाही थी।
   दंगे में झुलस रहे कलकत्ता की हालत बहुत खराब थी। गली-गली, सड़क-सड़क में लाशें बिछी थीं। मानवता क्रंदन कर रही थी, भाईचारा तार-तार था और हिंसा का नंगा नाच गली कूचों में हो रहा था। रुक्म जी उन दिनों सलकिया में रहा करते थे। वे वहां से कलकत्ता काम करने आते थे। वे हाफ पैंट और कमीज पहनते थे और हाथ में एक डंडा ले लेते थे। वह रात जब तक सलकिया घर वापस ना लौट आते उनकी पत्नी दीवार से टिकी खड़ी रहती। उन दिनों आलम यह था कि राह में चलनेवाले किसी आदमी को हलकी सी आहट तक कंपा जाती थी, कलेजा मुंह को आता था। पल-पल यह आशंका बनी रहती की पता नहीं किस गली से कोई भीड़ निकल आये और जिंदगी पल भर में तमाम हो जाये। दंगे के उन दिनों में भी वे रोज कलकत्ता काम पर आते रहे। कई बार दंगाइयों से सामना भी हुआ लेकिन किसी तरह वे हमेशा बचते रहे। जितने दिन यह मार काट चली वे दिन जितने रुक्म जी पर भारी गुजरे उससे कहीं ज्यादा भारी उनकी पत्नी निरुपमा पर गुजरे। जब तक वे सुरक्षित घर न पहुंच जाते, निरुपमा की तो जैसे जान पर बन आती। खैर गांधी जी का अनशन काम आया और लोगों को अपनी भूल का एहसास हो गया, दंगे थम गये लेकिन सैकड़ों कीमती जानें चली गयीं, नगर की लाखों की संपत्ति स्वाहा हो गयी। लोगों को यह एहसास हुआ कि अफवाहें मानवता का कितना बड़ा नुकसान करती हैं। आज भी दंगों को हवा अफवाहें ही देती हैं जो कुछ स्वार्थी तत्व अपने निजी या राजनीतिक स्वार्थ को साधने के लिए उड़ाते हैं। (शेष अगले भाग में)







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