http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-16

Monday, March 9, 2015

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-16

भाग (16)
राजेश त्रिपाठी
जब मालिक के लड़के तक को उन्होंने कार्यालय से भगा दिया


       पहले ही बता आये हैं कि रुक्म जी की पत्रकारिता सन्मार्ग के अलावा अन्य पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पल्वित-पुष्पित हुई। इनमें सबसे आगे आर.के. पोद्दार की हिंदी फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन  का नाम आता है। पोद्दार जी स्क्रीन को हिंदी के साथ-साथ बंगला भाषा में भी निकालते थे। इसके अलावा वे एक और पत्रिका नीति भी निकालते थे। स्क्रीन का आफर स्वीकारते वक्त रुक्म जी की एक ही शर्त थी कि उन्हें काम की आजादी मिलनी चाहिए और संपादकीय कार्यों में मालिक की बेवजह दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। पोद्दार जी इस बात पर सहर्ष राजी हो गये थे।


उन्होंने रुक्म जी से साफ-साफ कह दिया था-रुक्म जी आज से यह स्क्रीन आपकी है। आप जिसे चाहे रखें, जितना चाहें पैसा दें, जैसी चाहें पत्रिका निकालें। आज से मैं इस सिर दर्द से छुट्टी लेता हूं और सारी जिम्मेदारी आपकी। कहना ना होगा कि पोद्दार जी ने इस बात का अक्षरशः पालन किया । वे रुक्म जी के संपादकीय कार्य में कतई हस्तक्षेप नहीं करते थे। उनको जब किसी स्टाफ या पैसों की जरूरत होती पोद्दार जी तुरत मुहैया करा देते थे।
स्क्रीन कोलकाता के सुखलाल जौहरी लेन से निकलती थी। यह गली सर हरीराम गोयनका स्ट्रीट में कुछ कदम चलते ही दायीं ओर  निकलती है। गली जहां जाकर खत्म होती है वहीं एक बड़ी बिल्डिंग के निचले तल्ले में इसका आफिस हुआ करता था। घुसते ही बायीं तरफ इसका संपादकीय कार्यालय, कंपोजिंग सेक्शन था और दायीं ओर प्रेस था। इस कार्यालय में ही रुक्म जी बैठा करते थे।
एक पुरानी तस्वीर में "स्क्रीन" कार्यालय में रुक्म जी (बायें से दूसरे) और आर.के. पोद्दार (बायें से तीसरे) साथ में बंगला स्क्रीन के संपादक व अन्य
     स्क्रीन में कार्य करते वक्त रुक्म जी का परिचय पत्रकार प्रेम उपाध्याय से हुआ जो सिने पत्रकारिता के प्रति बेहद रुचि रखते थे। बाद के दिनों में उनकी रुचि का यह आलम था कि वे कोलकाता से बाहर भी होने वाले अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों को देखने, उसका कवरेज करने दौड़े चले जाते थे। प्रेम उपाध्याय जी भी अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनका थोड़ा सा परिचय देकर फिर आगे बढ़ते हैं। लंबे चटख गौर वर्ण के उपाध्याय जी भंग के बड़े शौकीन थे। हर समय भंग छाने रहते और उसकी तरंग में धाराप्रवाह अनथक बोलते जाते। वे पल भर में रोष में आ जाते। बातचीत में उनका स्वर ऊंचा था ही जब कुपित हो जायें तो गाल सुर्ख पड़ जाते और वाणी की तीक्ष्णता और गूंज और भी बढ़ जाती। रुक्म जी उनके इसी गुण के कारण उनको अक्सर लखनलाल (लक्ष्मण) कह कर पुकारते थे। तो ये लखनलाल जी भी रुक्म जी के साथ स्क्रीन में लग गये। उनको गुरु मानते रहे और रुक्म जी भी उन्हें वैसा ही स्नेह देते रहे। जीवन के आखिरी दिनों तक से कुछ पहले तक वे रुक्म जी से मिलने उनके घर आते रहे।
    उपाध्याय जी बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन से काफी अरसे तक जुड़े रहे। वे बागीश्वर झा (जिन्हें सभी बी झा के नाम से पुकारते थे) का भी बड़ा सम्मान करते थे। बी झा से रुक्म जी का भी जुड़ाव रहा। उनके साथ उन्होंने काफी अरसा बिताया। बी झा विशालकाय शरीर के और बड़े रौब-दाब वाले व्यक्ति थे, किसी के नमस्कार का जवाब दे दें तो समझो वह धन्य हो गया। उनका व्यक्तित्व बहुत ही प्रभावी था। वे बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन (बीएफजेए) के संस्थापक सदस्य व अध्यक्ष थे। उन्होंने इसकी ओर से अंग्रेजी में एक पुस्तक बीएफजेए फिल्म एलमनक निकाली थी जिसे लोग फिल्म का इनसाइक्लोपीडिया मानते थे। इसमें फिल्म संबंधी तमाम नियम-कानून, कोलकाता और मुंबई के फिल्मी कलाकारों के पतों के अलावा फिल्मों की तकनीक के बारे में भी एक चैप्टर था। इसमें लांग शाट, मिड शाट, क्लोज अप शाट व कैमरे के विविध एंगलों के अलावा अन्य तकनीक पहलुओं की भी जानकारी थी। बीएफजेए हर साल फिल्म पुरस्कार समारोह भी भव्य रूप से आयोजित करता था जिसमें बंगाल और मुंबई के कलाकारों को सम्मानित किया जाता था। इस सम्मान को मुंबई के कलाकार भी बहुत महत्व देते थे। उन्हें पता होता था कि इन पुरस्कारों की चयन समिति में पत्रकार होते हैं और इसमें पुरस्कार के लिए चुना जाना बड़ा सम्मान है। मुंबई के दूसरे पुरस्कारों को तो मैनिपुलेट किया जा सकता था लेकिन बीएफजेए में यह संभव नहीं था। बी झा जब तक रहे बीएफजेए ठीकठाक चला उसके बाद कुछ दिन तक पत्रकार निर्मल धर ने इसे संभाला अब तो शायद इसका कोई अस्तित्व ही नहीं रहा।
     रुक्म जी ने कुछ दिनों में ही स्क्रीन को जमा दिया। कोलकाता से लेकर मुंबई तक इसकी धूम मच गयी। पोद्दार जी और रुक्म जी में अच्छा तालमेल बैठ गया था। एक दिन की बात है कि रुक्म जी सुखलाल जौहरी लेन के अपने आफिस में बैठे काम कर रहे थे तभी एक किशोर अपने कुछ साथियों के साथ धड़धड़ाता हुआ आया और कार्यालय में बिना पूछे घुस गया और रुक्म जी के सामने वाली कुरसी में धंस गया।
वह किशोर अपने साथियों को परिचय देने लगा- देखो, यह हमारा अखबार है।
इसके बाद वह और उसके दोस्त वहां गपशप करने लगे। रुक्म जी ने थोड़ी देर तक तो यह बरदाश्त किया उसके बाद उन लोगों से बोले-तुम लोग अभी, इसी वक्त यहां से निकल जाओ।
            इस पर गोल-मटोल शरीर वाला वह किशोर बोला-आप शायद जानते नहीं कि मैं कौन हूं।
           
कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में "स्क्रीन" पढ़ते अभिनेता भारत भूषण
    रुक्म जी बोले – अच्छी तरह जानता हूं कि तुम पोद्दार जी के लड़के हो लेकिन इस कार्यालय का मालिक मैं हूं।. यह तुम्हारे पिता जी भी अच्छी तरह जानते हैं। चाहो तो जाकर पूछ लो। यह कार्यालय है गपशप की जगह नहीं। आये, कार्यालय देखा और फर्ज बनता कि हमें शांति से काम करने देते और बाहर निकल जाते। अफसोस मुझे तुम्हें बाहर जाने के लिए कहना पड़ा।
            वह किशोर कोई और नहीं बल्कि आर. के. पोद्दार जी के बड़े बेटे महावीर प्रसाद पोद्दार हैं। आर. के. पोद्दार जी के तीन बेटे हैं-महावीर प्रसाद, ओमप्रकाश पोद्दार और पवन पोद्दार।
     तो महावीर बाबू ने घर जाकर पिता जी से शिकायत की- पिता जी, हम कल अपने दोस्तों के साथ अपने आफिस गये वहां आपके संपादक ने हमें भगा दिया।
            इस पर पोद्दार जी बोले-सिर्फ भगाया, मारा नहीं। मारना चाहिए था। तुम लोग वहां उनको डिस्टर्ब करने क्यों गये। पता है बहुत जरूरी काम न हो तो मैं भी उनको डिस्टर्ब नहीं करता।
            दूसरे दिन कार्यालय जाकर पोद्दार जी ने रुक्म जी से कहा- बहुत अच्छा किया रुक्म जी जो महावीर और उसके साथियों को भगा दिया। कान पकड़ कर एक थप्पड़ क्यों नहीं रसीद कर दिया।
            ‘ अरे नहीं, बच्चे हैं। वो तो काम में डिस्टर्ब हो रहा था इसलिए भगा दिया।
            ‘ आपने एकदम सही किया। पोद्दार जी बोले।
     बाद के दिनों में महावीर जी रुक्म जी से मिलने कांकुड़गाछी तक आते थे। उन्होंने एक बार रुक्म जी के सामने ही इस ब्लागर से हंसते हुए उस घटना का जिक्र किया था जो उनके साथ घटी थी, जिसका जिक्र ऊपर कर आये हैं। महावीर प्रसाद पोद्दार जी रुक्म जी को परिवार के सदस्य के रूप में मानते रहे और घर के किसी भी शुभ कार्य में उनको न्योता देना नहीं भूलते थे। जिस स्क्रीन का जिक्र हम कर रहे हैं उसके प्रबंध संपादक के रूप में काम करने का सौभाग्य इस ब्लागर को भी मिला था। जब यह किसी तरह घिसट रही थी तो महावीर बाबू ने ही कहा था कि आप रुक्म जी के शुरू किये गये इस साप्ताहिक को संभाल लीजिए। आनंद बाजार प्रकाशन समूह के साप्ताहिक रविवार से जुड़ने के पूर्व कुछ दिनों तक इस ब्लागर ने स्क्रीन को संभाला। उसी कुरसी पर बैठ कर कार्य करता रहा, जिस पर रुक्म जी बैठते थे। यह अनुभव अपने आप में एक रोमांच पैदा करता रहा।
 स्क्रीन से एक और शख्स को रुक्म जी ने जोड़ा था। उसका नाम था कलाकार सूरज। कलाकार सूरज फिल्मों के प्रति काफी दिलचस्पी रखते थे और पटकथा वगैरह लिखते रहते थे हालांकि उनको कोई बड़ी सफलता नहीं मिली लेकिन अंत तक उनका हौसला बुलंद रहा। वे जब भी रुक्म जी से मिलने उनके घर आते कोई नया प्लाट, नयी योजना सुनाने बैठ जाते। उनका मन रखने के लिए रुक्म जी भी चाव से सुनते। कलाकार सूरज भी अब इस दुनिया में नहीं हैं।
     स्क्रीन में रहते हुए रुक्म जी ने फिल्म पत्रकारिता को ऊंचाई तक पहुंचाया। मुंबई में उन्होंने अपने दो सहायक रखे थे। एक का नाम था दीनानाथ शास्त्री (जो बाद में धर्मेंद्र के सचिव बने और फिल्म धरती कहे पुकार केनिर्माण का निर्माण किया) दूसरे का नाम था संदीप शर्मा। दोनों को रुक्म जी चंगू-मंगू के नाम से पुकारते थे। इनमें से संदीप शर्मा बाद में सह निर्माता बन गये। राजेश खन्ना-मुमताज अभिनीत फिल्म रोटी का संदीप ने राजेश के मामा के.के. तलवार के साथ सह निर्माण किया था। जिस चंगू-मंगू के बारे में रुक्म जी बताते थे कि हमेशा पैसे ना होने, खर्च न चलने का रोना रोते थे उनमें से एक संदीप शर्मा के फ्लैट में इस ब्लागर ने कीमती विदेशी कालीन और बहुमूल्य सजावट देखी है।
     बाद के दिनों में संदीप शर्मा से मिलने जब उनके रुक्म जी मुंबई पहुंचे तो वे फिल्म रोटी की शूटिंग दिखाने मुंबई के एक उपनगर चांदीवली ले गये जहां के एक पहाड़ी क्षेत्र को कश्मीर की घाटी के रूप में सजा दिया गया था। घाटी में कुहासे का माहौल तैयार करने के लिए छोटे से एक स्टोवनुमा यंत्र से (जो अक्सर स्वर्णकार झलायी आदि में काम लाते हैं) कोई केमिकल डाल कर कुहासा पैदा किया जा रहा था। मुमताज और राजेश खन्ना पर फिल्म का गीत गोरे रंग में ना इतना गुमान कर, गोरा रंग दो दिन में ढल जायेगा।फिल्माया जाना था। राजेश खन्ना सफेद कुरता और पाजामा व मुमताज नीले रंग की कढ़ाई दार सलवार कमीज पहने थी। सीन कुछ इस तरह से था कि मुमताज पहाड़ी की कंकरीली और घास वाली ढलान पर करवट के बल लेटी हैं। अपना दायां हाथ उन्होंने कान के पास लगा रखा है। बारिश के फुहारों के बीच राजेश खन्ना उनके पास आते हैं और उनके नितंब में एक लात जमाते हैं और वे कंकरीली जमीन पर लुढ़कती हुई नीचे की ओर आती हैं। सीन यह था और इसी की शूटिंग की तैयारी चल रही थी। यूनिट  के कुछ लोग कैमरे की कवरेज के दायरे दूर एक पेड़ के नीचे बैठ कर गीत की पंक्ति बजा रहे थे। डांस डाइरेक्टर के कैमरा, एक्शन कहते ही राजेश खन्ना ज्यों ही मुमताज की ओर बढ़े उन पर पेड़ पर चढ़े कुछ लोगों ने पाइप के जरिये वह पानी बरसाना शुरू किया जो एक मशीन के जरिये ऊपर चढ़ाया जा रहा था।
     अभी राजेश खन्ना पर पानी पड़ा ही था कि वे उछल कर परे हटते हुए चिल्लाये- अरे यार जला डाला। इतना गर्म पानी।
            उनके चिल्लाने पर यूनिट वालों को अपनी गलती का पता चला। मई के महीने में उस छोटे से पोखरे का पानी गरम हो गया था जिससे बनावटी बारिश की जा रही थी। वहां मौजूद के. के.  तलवार ने सुझाव दिया कि पहले कुछ देर तक पानी निकाल दिया जाये तो संभव है गरम पानी निकल जायेगा। वैसा ही किया गया और शूटिंग शुरू हो गयी। राजेश खन्ना उस कृत्रिम बारिश में भींगते हुए मुमताज तक आते जो खुद भी उसी बारिश में भींग रही थीं और उनकी हथेली पकड़ पहले उसे कान में लगा कर उनकी नब्ज सुनने का अभिनय करते और फिर उनके नितंब में एक लात जमाते और वे लुढ़कते हुए तकरीबन दस मीटर नीचे आकर रुकतीं। दोनों इस बीच गीत की पंक्ति पर होंठ भी हिलाते रहते।
    
फिल्म "रोटी"  के गीत दृश्य की शूटिंग के दौरान राजेश खन्ना व मुमताज
यह क्रम तकरीबन छह-सात बार चला और सीन ओके नहीं हुआ। इतनी देर में मुमताज परेशान हो गयीं थीं, कंकरीली ढलान में फिसलते-फिसलते वे गुस्सा हो गयी थीं। वे कमर में हाथ रख कर तन कर खड़ी हो गयीं और डांस डाइरेक्टर से बोलीं-
तेरी ऐसी की तैसी। मेरा कचूमर निकला जा रहा है और तेरा सीन ही ओके नहीं हो रहा। ठीक है भाड़ में जाये तेरा सीन मैं यह चली।
     वहां मौजूद फिल्म के निर्माता कें.के. तलवार बात बिगड़ते देख अपने एक सहायक से बोले- अरे यार जाओ, मुमताज मैडम को रोको। मेरी इस फिल्म का पैच वर्क भर बाकी है। यह गीत हो जाये तो फिल्म एडिटिंग में चली जायेगी। मुमताज मैडम बहुत बिजी हैं। आज यह सीन ओके नहीं हुआ तो फिर फिल्म कई महीनों के लिए लटक जायेगी, उनकी डेट्स ही नहीं मिलेगी। काका (राजेश खन्ना को उनके करीबी इसी नाम से पुकारते थे) ही बदमाशी कर रहा है। वह बार-बार कैमरे के दायरे से बाहर चला जाता है। उसे कहो बदला किसी और की फिल्म में ले लेगा। मेरी फिल्म क्यों तबाह कर रहा है।
            बदला शब्द सुन कर रुक्म जी चौंके और तलवार  पूछा- बदला, कैसा बदला।
            तलवार बोले- अरे भाई सुनते हैं कि फिल्म दुश्मन में मुमताज ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ राजेश खन्ना के गाल पर जड़ दिया था जिसके उंगलियों के निशान कई दिन तक उभरे रह गये थे। उसी का बदला वह इस तरह से ले रहा था।
            पता नहीं रुक्म जी से कही गयी तलवार की यह बात कितनी सच थी लेकिन रुक्म जी मुमताज के गुस्से के साक्षी थे और इसके भी कि गाने की उस पंक्ति की शूटिंग देर तक चली थी। (शेष अगले भाग में)

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