http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: इनके विष के बोल समाज में जहर घोल रहे हैं

Saturday, October 31, 2015

इनके विष के बोल समाज में जहर घोल रहे हैं



इन कालिदासों को रोकिए मोदी जी !

-ये वही डाल(भाजपा) काट रहे हैं जिस पर बैठे हैं
- इनके विष के बोल समाज में जहर घोल रहे हैं
- बोल ये रहे हैं सवाल आप पर उठ रहे हैं
राजेश त्रिपाठी
   इस लेख के प्रारंभ में मैं एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि ना मैं किसी राजनीतिक दल का समर्थक हूं और ना ही विरोधी। वह विचारधारा वह व्यक्ति जो राष्ट्रवाद की बात करे, विकास की बात करे और सबका साथ लेकर आगे बढ़ने की बात करे उसका समर्थन करने में मुझे कोई गलती नहीं दिखती ना ही यह मुझे किसी भी तरह से अटपटा या अनुचित लगता है। बस इसी विचराधारा ने मुझे पिछले साल उस वक्त नरेंद्र मोदी के विचारों का समर्थक बना दिया जब सारे देश ने अपार बहुमत के साथ अपने सपनों और देश की बागडोर उनके हाथ में सौंप दी। मैं उस वक्त उनका मुखर समर्थक बन गया था और इसके लिए मैंने अपने ब्लाग कलम का सिपाही का स्लोगन अनाचार की आंधी आयी चारों ओर अंधेरा है, भेदभाव के दानव ने मानवता को घेरा हैसे बदल कर नवयुग आया ले आशाएं विहंस रही हैं दिशाएं.....एक व्यक्ति बन युग नायक लाया यह संदेश, रामराज्य अब आनेवाला मिट जायेंगे क्लेशकर दिया। सुधी पाठक निश्चित ही समझ जायेंगे कि यहां मेरे युग नायक नरेंद्र मोदी ही हैं। जब लोकसभा के चुनाव चल रहे थे और जब मोदी जी देश की बागड़ोर संभाल चुके थे उस वक्त भी उनके विचारों के मुखर समर्थन के लिए मुझे कुछ बुद्धिजीवियों से गाली तक सुननी पड़ी थीं, मुझे मोदी-मोह से ग्रस्त बीमार व्यक्ति कहा गया। मुझे बुरा नहीं लगा क्योंकि मैं इस बात का पक्षधर हूं कि हर व्यक्ति स्वतंत्रचेता होता है, उसका अपना विवेक होता है और वह इतना भी लाचार नहीं होता कि किसी और कि विचारधारा या वाद से प्रभावित या संचालित हो। सो मैं चुप रहा, वैसे मानव सुलभ गुण के अनुसार यथासाध्य प्रतिरोध भी करता रहा और यह भी साबित करता रहा कि मैं व्यक्ति पूजा विरोधी हूं किंतु जो विचार मुझे उचित और सार्थक लगेंगे उनके समर्थन से भी मुझे कोई नहीं रोक सकता। मुझे नहीं लगता कि सबका साथ सबका विकास जैसा सार्थक और ताकतवर नारा देनेवाले मोदी जी कभी ऐसा कदम उठा सकते हैं जो किसी वर्ग , किसी संप्रदाय या जाति के हित में ना हो। उनके इस नारे को प्रभावी मान कर ही विश्व के नेता तक दोहराने लगे हैं। जब अपने ब्लाग के मास्टहेड का स्लोगन बदला था तब सोचा था कि पांच साल तक मोदी या उनके दल, उनके लोगों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं लिखूंगा और अपने देश की केंद्रीय सत्ता के इस नायक को पांच साल तक अपने सपनों का भारत गढ़ने में जो भी बन पड़ेगा समर्थन करूंगा लेकिन इनके लोगों के कृत्यों, ऊल-जलूल विषवमन ने कुछ लिखने को बाध्य कर दिया। वैसे यह सिलसिला पिछले कुछ अरसे से चल रहा है लेकिन हद तब हो गयी जब बाहरी देश हमें यह सिखाने लगे कि भारत में सहिष्णुता घट रही है इसे अक्षुण्ण रखने की जरूरत है। मोदी जी के दल के कुछ बड़बोले लोग समाज में विष घोल रहे हैं, भाईचारे, गंगा-जमनी संस्कृति के उस ताने-बाने के तोड़ रहे हैं जो भारत की शान रहा है। हम गर्व से कहते रहे हैं कि हमारा देश विश्व में शायद ऐसा पहला और अकेला देश है जहां विविधता में एकता है। यह अब भी ऐसा है लेकिन लगता कि कुछ लोग इसकी इस छवि को दागदार करने पर आमादा हैं। इन पर अंकुश लगना जरूरी है वरना यह देश, सत्ता और सुशासन के लिए मुसीबत बन जायेंगे।
  जो कुछ अभी चल रहा है, समाज जिस तरह उद्वेलित, विचलित और चिंतित है, उसे देख कर भी शायद मैं खामोश रहता यह मान कर कि यह सामयिक है, सब कुछ सामान्य हो जायेगा लेकिन इसके व्यापक असर ने चौंका दिया। इसका असर विश्वस्तर तक हो जायेगा सोचा नहीं था लेकिन वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडी के इस एलान ने चौंका दिया जिसमें उसने भारत को आगाह किया है कि मोदी जी अपने दल के लोगों को विवादास्पद बयान देने से रोकें वरना भारत विश्व में और खुद अपने देश में विश्वसनीयता खो बैठेगा। अभी कुछ अरसा पहले ही भारत को निवेश के लिए बेहतर जगह बताया गया और विश्वस्तर पर यह बारह स्थान की उछाल पाकर 130 वें स्थान पर आ गया। ऐसे में मूडी का यह एलान निश्चित ही भारत के लिए एक चेतावनी है जिस पर खुद मोदी जी को ध्यान देने की जरूरत है जो भारत में विदेशी निवेश लाने को प्रयासशील हैं। उनके उन लोगों को भी ध्यान देने और तदनुसार आचरण करने की जरूरत है जो अपने विवादास्पद बयानों से अपने शीर्ष नेता की नाकों में दम किया हुए हैं। विवादास्पद बयान वे देते हैं और सवाल मोदी जी पर उठने लगते हैं कि वे चुप क्यों हैं। इसका जवाब भाजपा देती है कि जरूरी नहीं प्रधानमंत्री हर सवाल का जवाब दें। यह सच भी है कि प्रधानमंत्री के जिम्मे और भी काम हैं। दरअसल होना यह चाहिए कि ऐसी दुविधा की स्थिति ही क्यों पैदा की जाये वह भी अपने ही लोगों की ओर से कि प्रधानमंत्री तक को जवाब देने के लिए कहा जाये। इन कालिदासों की जुबान पर लगाम लगाना जरूरी है जो उसी डाल (भाजपा) को काट रहे हैं, जिस पर ये बैठे हैं। क्या .ये इतने अबोध हैं कि इन्हें इतना भी पता नहीं कि अगर इनके ऊल-जलूल वक्तव्यों से देश में आग लगी तो उसकी तपिश सत्ता के शीर्ष  तक जाय़ेगी। मूल्य वृद्धि और तमाम तरह की परेशानियों से त्रस्त जनता का भी धैर्य खो जायेगा अगर इनके कृत्यों से उसकी शांति भी छिन गयी।
 किसी संवेदनशील घटना पर इनकी अप्रासंगिक और ऊल-जलूल टिप्पणी उस स्थानीय घटना को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना देती है। इससे इनका अपना दल और उसका शीर्षस्थ नेतृत्व भी सवालों के कठघरे में खड़ा हो जाता है। ऐसा करते वक्त इनको यह भान नहीं रहता कि विपक्ष सत्ता पक्ष की एक-एक बात पर गौर कर रहा है और उसे घरेने, परेशानी में डालने का एक भी मौका गंवाना नहीं चाहता। ताजुब्ब तो यह है कि भाजपा की परेशानी का सबब उसके ही वे कुछ लोग हैं जिन्हें खबरों में बने रहने का जुनून है अब अपने इस सपने को पूरा करने के लिए किसी को गाली देना पड़े या समाज में वैमनस्य फैलाने का काम करना पड़े तो इन्हें उससे भी गुरेज नहीं। भाजपा को और केंद्रीय सत्ता को भी इन तत्वों से बहुत बड़ा खतरा है। ये अपने दल और दल के शीर्षस्थ नेतृत्व की विश्वसनीयता पर प्रहार कर रहे हैं। इनके बोल समाज में विष घोल रहे हैं और लोग इनके बोलों से मोदी को तोल रहे हैं। हालांकि अब तक मोदी जी ने किसी वर्ग विशेष या जाति विशेष के लिए कभी अनुचित बोल नहीं कहे। दूसरों का कहा उन पर मढ़ दिया जाता है और यह काम विपक्ष बखूबी कर रहा है। भाजपा के जो लोग कुत्सित बोल बोल रहे हैं उन्हें खुद मोदी जी, राजनाथ सिंह, अमित शाह ने डपटा और ऐसा कुछ भी कहने-करने से बाज आने के कहा है जो पार्टी के खिलाफ जाये लेकिन ये अदम्य बयान बीर उस पर भी हतोत्साहित नहीं हुए। इनमें से एक ने तो उस वक्त जब पार्टी बिहार में चुनाव जीतने के लिए जी-जान लगा रही है यह बयानबाजी कर डाली कि उनका गठबंधन चुनाव हार रहा है। मोदी जी, राजनाथ जी अमित जी आपसे एक ही सवाल है-ऐसी बयानबाजी करनेवाले आपकी पार्टी का कौन-सा हित साधन कर रहे हैं। क्या ये विपक्ष को यह कहने का मौका नहीं दिये दे रहे है कि –देखो भाजपा के अपने लोग ही कह रहे हैं कि उनका दल हार रहा है। चुनाव के वक्त यह भीतरघात अक्षम्य है। ऐसे लोगों को एक दिन भी पार्टी में रहने का अधिकार नहीं। पता नहीं किस मजबूरी से इन्हें ढोया जा रहा है। भगवान के लिए ऐसे तत्वों से देश और दल को बचाइए ये दल की और आपकी छवि खराब कर रहे हैं। कहते ये हैं और विपक्ष का निशाना आप बन रहे हैं मोदी जी।
 मोदी जी आपके सपनों का भारत तभी बन पायेगा जब यहां सामंजस्य, सह अस्तित्व और समरसता का भाव होगा। आपके सबका साथ, सबका विकासनारे का मूलमंत्र ही यही है और आज कुछ तत्व इसे ही कलंकित करने में लगे हैं। इन पर लगाम लगना जरूरी है क्योंकि अगर इन्हें रोका ना गया तो इन्हें लगेगा कि ये जो कर रहे हैं, सही कर रहे हैं। इनकी लगातार चल रही हरकतें कहीं देश को ही ना तोड़ने लग जायें। इन दिनों चुनावों के वक्त एक शब्द बहुतायत से उछाला जाता है वह है ध्रुवीकरण। कहते हैं कि इसमें कोई भी दल किसी वर्ग या जाति विशेष के खिलाफ बोल कर उस वर्ग या जाति के वोटों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करना चाहता है जिसे वह अपना समर्थक मानता है। भाजपा या उससे जुड़े दलों के लोगों के ऊलजलूल और विद्वेष फैलानेवाले बयानों को भी लोग इसी दृष्टि से देख ही नहीं रहे इस बारे में कह भी रहे हैं। लेकिन देखा यह भी गया है कि इस तरह के प्रयास कभी-कभी उलटे भी पड़ गये हैं। संभव है कि इस तरह के हथकंडों से वे लोग जो सामाजिक सौहार्द और भाईचारे के पक्षधर हैं उस दल से दूर छिटक जायें।  मुझे नहीं लगता कि नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व को (जिन पर आज भी देश की जनता का भरपूर विश्वास है) इस तरह के शिगूफों की जरूरत है। बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान उनकी सभाओं में उमड़ा विशाल जनसमूह इस बात का गवाह है कि देश आज भी उन्हें सुनना चाहता है, उन पर उसे आज भी पूरा भरोसा है। तमाम विसंगतियों, मुसीबतों के बावजूद पूरा समाज, पूरा देश उनकी ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है ऐसे में यह तत्व उनके मार्ग में बाधक बन रहे हैं। इन्हें थामा ना गया तो ये कहीं जनता के विश्वास को ही ना तोड़ डालें।
इधर देश में साहित्यकारों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों के पुरस्कार लौटाने का सिलसिला भी थमने का नाम नहीं लेता। वैसे इसमें दुराग्रह और पूर्वग्रह की गंध आती है क्योंकि इससे भी विषम परिस्थितियां गुजरीं पर तब इनका विवेक खामोश रहा। वैसे कोई पुरस्कार रखे या लौटाये यह उसका व्यक्तिगत अधिकार है लेकिन इससे जो संदेश जाता है वह राष्ट्र को ही सवालों में घेर देता है । जो ऐसा कर रहे हैं वे भी उस राष्ट्र का हिस्सा हैं तो सवालों के दायरे में वे भी आ जाते हैं कि उनका विवेक क्या केंद्र में दलों की सत्ता के आधार पर जागता है। यह लंबी बहस का विषय है और अभी से बुद्धिजीवी वर्ग इसमें दो भागों में बंट गया है कुछ इसे सही और समयोचित मानते हैं तो कुछ लोग इस वक्त पुरस्कार लौटानेवालों की मंशा पर शक करते हुए उन्हें विशेष वाद या दल का समर्थक मान रहे हैं।
 भाजपा और उससे जुड़े दलों के कुछ लोगों के बयान से हो यह रहा है कि राष्ट्र में घटनेवाली जो घटना स्थानीय स्तर पर कानूनी तौर पर सुलझ जाती वह राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन जाती । इससे सत्ताधारी दल भी उसका एक पक्ष अनचाहे में ही बन जाता है या कहें बना दिया जाता है। देश में सामाजिक समरसता के ताने-बाने को तोड़ने, विघ्नित करने का काम जो भी दल, वर्ग कर रहा है उससे कानूनी तौर पर निपटना चाहिए। जिस राज्य में ऐसी घटनाएं हों उन्हें तुरत सुलझाना चाहिए। अभी हो यह रहा है कि कहीं कोई सांप्रदायिक घटना घटती है तो वहां सभी दलों के राष्ट्रीय नेता जुट जाते हैं (किसी टीवी चैनल ने हाल ही इसे राजनीतिक पर्यटन की संज्ञा दी थी) ये शांत होते माहौल में आग में घी डालने का काम करते हैं। यह नहीं कि लोगों को समझा कर मामला शांत किया जाये ये उकसानेवाले भाषण देकर देश और देश की सत्ता को मुसीबत में डालने का काम करते है। यह सब बंद होना चाहिए वरना देश की जनता के पास भी एक मौका आता है जब वह ऐसे लोगों को उनकी सही जगह भेजने में भी नहीं चूकेगी।
 मोदी जी आपके विचारों, आपके हर उस कदम के हम साथ हैं जो देश को गढ़ने और एकजुट रखने वा विकास की राह में श्रेष्ठ बनाने के लिए उठ रहा है। हमें आप पर पूरा भरोसा है कि आप अपने सपनों का भारत अवश्य गढ़ेंगे। ऐसा भारत जिसमें महात्मा गांधी के उन सपनों का समावेश हो जिसमें उन्होंने गांवों के संपूर्ण विकास का सपना देखा था। ऐसा विकास जिसका लाभ सीमांत व्यक्ति तक पहुंचे। आपके नेतृत्व में हम ऐसा भारत देखना चाहते हैं जिसकी सीमाएं सुरक्षित हों, जिसकी ओर बुरी नजर से देखने की दुश्मन हिम्मत न कर सके। मोदी जी कितना बुरा लगता है कि हमें समरसता, शांति का पाठ कोई बाहरी देश पढ़ाये, जो पाठ हम विश्व को पढ़ाते रहे हैं। इस स्थिति को जैसे भी बदलना होगा। हमें आप पर पूरा भरोसा है कि आप बसुधैव कुटुंबकम के अपने मूलमंत्र को शब्दशः चरितार्थ करेंगे, आपके नेतृत्व में भारत की विविधता में एकता, गंगा-जमनी संस्कृति और सुदृढ़ व स्थायी होगी। एवमस्तु!
 

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