http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: बिहार में नीतीश सरकार

Monday, November 9, 2015

बिहार में नीतीश सरकार



    हारे सारे कुप्रचार    
बिहार में नीतीश सरकार
  • फूट डालो राज करो फार्मूला हुआ फेल,मैथ, केमिस्ट्री चुस्त जम गया नीतीश-लालू का खेल

  • डीएनए की गाली का जनता ने दे दिया जवाब, टूटे कितने दिग्गजों के ख्वाब

  • बड़बोलों की बकबास ने कर दिया सत्यानाश, जनता ने दिखा दिया वह कितनी है खास

  • भाजपा और मोदी जी की कठिन है आगे की राह, आनेवाले चुनावों में बदलनी होगी निगाह

  • लालू-नीतीश गढ़ेंगे अब नया बिहार, गर टिक पाया अरसे तक इनका ये प्यार

  • हिट हुआ नीतीश का बिहारी और बाहरी का नारा, चौपट हुआ ध्रुवीकरणका खेल सारा
दिल्ली तक मोद विजय-रथ ले जानेवाले प्रशंत किशोर,नीतीश के बन सारथी ले गये विजय की ओर


राजेश त्रिपाठी
 
  टेलीविजन चैनलों के तमाम एक्जिट पोल अनुमानों को ठेंगा दिखा बिहार की जनता ने स्वाभिमान की रक्षा की और एक बार फिर अपने राज्य का और अपना भाग्य नीतीश कुमार के हाथों  सौंप दिया है। उन्हीं नीतीश कुमार के हाथ जिनका सुशासन वह देख चुकी है और जिन्होंने बिहार को अपराध मुक्त करने का सराहनीय और साहसी कार्य किया है। भाजपा और उसके सहयोगी दलों की अभूतपूर्व पराजय की समीक्षा करने के पहले उन पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है जिन्होंने लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के महागठबंधन को 178 सीटें देकर अपार विजय प्रदान की है। लालू प्रसाद यादव को जो लोग राजनीतिक दृष्टि से अस्त समझ चुके थे उनकी आंखें तब फटी की पठी रह गयीं जब राज्य की जनता ने उनके प्रति अपार समर्थन देकर उन्हें 80 सीटों के साथ राज्य का सबसे अधिक सीटें हासिल करनेवाला दल बना दिया। और तो और कांग्रेस भी जो बेहद कमजोर पड़ी थी उसे भी 27 सीटें आक्सीजन के रूप में मिलीं और अब वह भी नये उत्साह से राज्यों और राष्ट्रीय राजनीति में पुख्ता ढंग से अपन कदम जमाने और मोदी जी के समक्ष सक्षम विपक्ष के रूप में खड़ी होने की भरपूर कोशिश करेगी।

    दरअसल नीतीश कुमार को खुद भाजपा ने ही जिताया है। चौंकिए मत, साबित किये देते हैं कैसे। भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार को किसी एक जनता से सीधा और सार्थक सरोकार रखनेवाले मुद्दे पर केंद्रित नहीं रखा। वह हर चरण के बाद मुद्दे बदलती रही और जनता को लगा कि जो हर दिन मुद्दे बदलते हैं वह बाद में हर बात से ना मुकर जायें इसकी क्या गारंटी। और वह उसके साथ नहीं गयी। दूसरी बात आरक्षण का मुद्दा। आरक्षण पर हालांकि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इतना ही कहा था कि आरक्षण नीति की समीक्षा होनी चाहिए। सही है, हर एक तक इसका लाभ पहुंचे इसके लिए जरूरी है कि इसकी समीक्षा हो और आवश्यक हो तो परिवर्तन भी हो। विपक्ष ने उनके इस बयान को अपने पक्ष में भुनाने के लिए सीधे एक धमाका किया-भाजपा तो आरक्षण खत्म करने की बात करती है, यह आयी तो आरक्षण खत्म हो जायेगा। अपने इस बयान से लालू-नीतीश के महागठबंधन ने उन लोगों को अपनी ओर खींच लिया जिन्हें अभी आरक्षण का लाभ मिल रहा है। भाजपा को जब  अपनी इस गलती का पता चला तो उसने डैमेज कंट्रोल की कोशिश शुरू की और इस आपाधापी और बेचैनी में वह और अनर्थ कर बैठी। उसने तरह-तरह के फार्मूले बताने शुरू कर दिये कि हम इससे खींच कर उसे आरक्षण देंगे, उससे खींच कर उसे देंगे। इससे भ्रम की स्थिति पैदा हुई और बाकी लोग भी इनसे खिसक गये। गोमांस को लेकर भाजपा नेताओं की ओर से की गयी अप्रासंगिक और बेतुकी बयानबाजी भी उलटा पड़ी। इससे एक वर्ग जो शायद पहले की स्थितियों में भाजपा को वोट दे सकता था उससे पूरी तरह छिटक गया। यहां यह स्पष्ट कर दें कि यह गणतंत्र देश है जहां सब अपने ढंग से जीने, खाने, पीने के लिए आजाद हैं, तब तक जब तक इससे किसी का नुकसान ना होता हो। गौधन-संरक्षण का मुद्दा अलग है जो अपनी जगह बरकरार है और उचित है लेकिन किसी के खानपान पर नियंत्रण करना या उससे उसे रोकना वैयक्तिक स्वतंत्रता पर हस्तक्षेप  हो सकता है जो नहीं होना चाहिए। इस मुद्दे पर भाजपा नेताओं के बयान भी अटपटे और बेतुके रहे। किसी किसी ने तो कुछ लोगों को पाकिस्तान तक जाने की सलाह दे डाली। जाहिर है जिन्हें यह सलाह दी गयी उन्होंने ईवीएम में अपना जवाब दर्ज कर दिया।

    सबसे बड़ी और पहली गलती तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही अपने प्रारंभिक चुनाव प्रचार में कर बैठे। शायद उनके किसी रणनीतिकार ने यह बताया हो कि गाली देकर, बेतुके बयानों से धाक जमा कर भी चुनाव जीते जाते हैं। उन्होने अपने एक शुरूआती भाषण में कह डाला कि नीतीश कुमार के डीएनए में ही खोट है। नीतीश कुमार पढ़े-लिखे, सुलझे हुए, चालाक राजनेता हैं। मोदी जी ने अनजाने में उन्हें चुनाव जीतने का एक बड़ा मुद्दा थमा दिया। नीतीश के जिस डीएनए में खोट बतायी जा रही थी उसे उन्होंने जम कर भुनाया और इसे पूरी राज्य की जनता से जोड़ दिया। वे अपनी हर चुनावी सभाओं में कहने लगे भाइयो, बहनों आपके डीएनए पर सवाल उठा तक मुझे और आपको गाली दी गयी है। आपको इसका जवाब देना है। जनता ने न सिर्फ जवाब दिया बल्कि कहते हैं कि वे बिहारियों के डीएनए की जांच के लिए दिल्ली पीएमओ में अपने सैंपल तक भेजने लगे थे। मोदी जी का डीएनए का ब्रहामास्त्र ना सिर्फ फेल हुआ बल्कि इसने चुनाव प्रचार में लालू-नीतीश के महागठबंधन को बढ़त दे दी। इस चुनाव ने एक बात यह भी साबित कर दी कि भीड़ वोटों में कभी नहीं बदलती क्योंकि भीड़ मोदी जी की जनसभाओं में दिखी लेकिन उसने वोट महागठबंधन को दिया। अगर भीड़ वोट पर्याय होती तो आज आंकड़ा ठीक उलटा होता।

    भाजपा को चाहिए था कि वह जंगलराज और लालू-नीतीश को कोसने की बजाय राज्य की जनता को अपनी भावी योजनाओं और उनको दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में बताती और उसका एक मजबूत खाका खींचती लेकिन उसका प्रचार गाय और पाकिस्तान जैसे मुद्दों शब्दों में फंस कर रह गया और इसी में उनका बिहार का राजनीतिक भविष्य भी फंस कर रह गया।

    इतिहास गवाह है कि सिर्फ पार्टियां भी नहीं प्याज भी चुनाव हराती रही है। इस बार भाजपा के लिए अरहर की दाल की आसमान छूती कीमत भी खलनायक बनीं। हालांकि अरहर की फसल भारत में ही होती है  लेकिन महीनों से लोगों की थाली इस दाल से खाली रही बाद में पता चला कि टनों दाल तो उन जमाखोरों ने छिपा रखी है जो किसी भी चीज की कृत्रिम कमी दिखा कर जम कर मुनाफा लूटते हैं। हालांकि भाजपा सरकार ने तत्परता दिखा कर लाखों टन अरहर दाल जब्त की लेकिन तब तक उसका जो नुकसान होना था, हो चुका था। लालू-नीतीश के गठबंधन और कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी ने दाल को लेकर भाजपा की खूब खिंचाई की और चूंकि यह जनता की थाली से सीधा जुड़ा हुआ मुद्दा था क्लिक कर गया और विपक्ष को भाजपा से अधिक फायदा दे गया।

    भाजपा ने अपने प्रचार पर कदम दर कदम व्यक्तिगत आक्षेप करने की कोशिश की हालांकि विरोधियों ने भी उसका माकूल जवाब दिया। लालू प्रसाद को शैतान कहा गया तो उन्होंने भी नरभक्षी जैसे जुमले उछाल दिये। बिहार ने देखा कि चुनाव प्रचार कितने निम्न स्तर तक उतर सकते हैं। प्रचार सार्थक और सुलझा हुआ होना चाहिए क्योंकि आज की जनता चालाक और सजग है वह यह समझना जानती है कि क्या लफ्फाजी है और क्या उसके हित में है। अच्छे दिन के नारे पर भी विरोधियों ने मोदी जी को खूब घेरा और उनकी स्टाइल तक की नकल कर पूछते रहे कि भाइयो अच्छे दिन आये क्या

    भाजपा की ओर से नीतीश कुमार पर लगाये गये तथ्यहीन और ऊलजलूल आरोप भी उलटा पड़ गये। कारण, नीतिश कुमार का पिछला शासन सुशासन और जनता के हित में किये गये कार्यों के लिए प्रसिद्ध रहा है। उनके साथ एंटी इनकम्बैंसी जैसी कोई शिकायत ही नहीं थी। पढ़नेवाली लड़कियों को साइकिल देने के काम ने उन्हें पूरे राज्य में लोकप्रिय कर दिया है। लोग इसके लिए पंचमुख से उनकी प्रशंसा करते हैं ऐसे में उनके खिलाफ बोलने से पहले किसी को भी सौ बार सोचना चाहिए था क्योंकि उनकी छवि जननेता और अच्छे प्रशासक के रूप में बन गयी है। बिहार को अपराध से मुक्त करने का प्रशंसनीय कार्य भी उन्होंने किया है। विकास के लिए उनके प्रयास भी काफी सराहे गये हैं। इन सब तथ्यों को जानते हुए भी उन पर सवाल उठाना निश्चित है बूमरैंग होना ही था, वह हुआ। जिसके कार्य के बारे में लोगों की सकारात्मक राय हो उसे भला-बुरा कहना लोगों को कैसे पचेगा। उन्हें अपना नेता चुनना था, उन्होंने चुन लिया।

 महागठबंधन के पक्ष में एक बात यह जाती है  कि उसने मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में नीतीश कुमार को आगे करके उनके चेहरे के भरोसे चुनाव लड़ा। ऐसी सहूलियत भाजपा के पास नहीं थी, क्यों नहीं थी यह तो पार्टी ही बता सकती है। शायद इसलिए कि उसके पास तो अनेक चेहरे हैं, एक को मनाओ तो दूजा रूठ सकता है जो चुनाव में भारी पड़ता इसलिए उन्होंने मोदी जी के चेहरे पर ही राज्य का भी चुनाव लड़ना चाहा जो लोगों के गले नहीं उतरा। वह तो देखना चाहते थे कि उनके बिहार का भला करनेवाला कौन है और वह शख्स उन्हें नीतिश कुमार में दिख गया।

 डीएनए ने भाजपा खेल इतना बिगाड़ा कि नीतीश कुमार इसके आधार पर यह नारा दे डाला कि आपको बाहरी चाहिए या बिहारी। लोगों ने बता दिया नहीं उन्हें बिहारी ही चाहिए। अगर भाजपा ने बिहार से किसी चेहरे को आगे किया होता तो संभव है तस्वीर कुछ और होती। खैर अब तो चिड़िया चुन गयी खेत। भाजपा को भविष्य के चुनाव नये रणकौशल और सुलझी हुई बुद्धि और विवेक से लड़ना होगा। बिहार के कटु अनुभव को भुलाना है तो अपने रणनीतिकार और सिपहसालारों को बदलना होगा। चुनाव जनता के दिल में पैठने उसे जीतने का युद्ध है जो शिगूफों से नहीं जीते जाते।

 नीतीश कुमार के पक्ष में यह भी बात गयी कि जिस प्रशांत किशोर ने गुजरात से लेकर दिल्ली तक की नरेंद्र मोदी की विजय यात्रा में अपनी सुचारू और अत्याधुनिक रणकौशल वाली नीति से रथ की बागडोर संभाली थी उसने नीतीश का रथ संभाल लिया था और हर घर दस्तक’, ‘चौपाल में चर्चा जैसे सार्थक और जनता से सीधे जुड़नेवाले मुद्दों से नीतीश कुमार को घर-घर पहुंचा दिया। प्रशांत ने भाजपा को उसी दांव से मात दी जिससे उसने मोदी जी को अपार विजयश्री दिलायी थी। नीतीश को भी जिताया तो उसने रिकार्ड ही कर के जिताया। पता नहीं क्यों भाजपा अपने इस चामात्कारिक रणनीतिकार को पकड़ कर नहीं रख पायी जिसे उस सारी रणनीति का पता था जिसने भाजपा को लोकसभा चुनाव में भारत-विजय करायी।

    बिहार का समर शेष हुआ जिसने भाजपा को यह संदेश दिया कि आगे जीतना है तो संभल जाओ, जनता से सीधे जुड़ों और मुद्दे वही उठाओ जो उसके दिल और उसके अपने हित के करीब हों। मोदी जी के लिए आगे की राह कठिन है क्योंकि राज्यसभा में उनके संख्या बल नहीं जिसके चलते कई विधेयक अटके पड़े हैं। देश के विकास को गति देनी है तो उसके लिए कई विधेयक पास होने जरूरी हैं। बिहार में अच्छा नतीजा आता तो संभव है भाजपा राज्यसभा में अपना संख्याबल बढ़ाने के कोशिश करती लेकिन वह भी नहीं हो सका। इधर नीतीश और लालू ने राष्ट्रीय विकल्प बनने के संकेत दे दिये हैं, 27 सीटें पाकर कांग्रेस भी नयी ऊर्जा के साथ विपक्षी शक्ति दिखायेगी। पहले के संसद सत्र बी बाधित हुए संभव है विपक्ष शीतकालीन सत्र में भी बाधा पहुंचाये क्योंकि उसे अपनी शक्ति दिखाने का कोई ना कोई तो बहाना चाहिए ही। अब भाजपा और मोदी जी को इनसे पार पाना है और तदनुसार अपना, अपने दल का और अपने कुछ बड़बोले, अपनी ही जड़ें काटनेवाले नेताओं का आचरण तय करना है। कारण, बिहार के चुनाव नतीजे भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। अगले साल पश्चिम बंगाल, उसके बाद उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं उससे पहले भाजपा को नये सिरे से जनहितैषी कार्य कर अपनी छवि सुधारनी होगी। महंगाई को काबू करना होगा और जनता पर बेवजह करों का बोझ ना लाद कर हो सके तो उसे कुछ सुविधा, सहूलियत देने का प्रयास करना होगा जो पहले से ही महंगाई और तरह-तरह की परेशानियों से पिसी जा रही है।
  अभी तो बिहार में सब कुछ शुभ ही शुभ नजर आता है हालांकि कुछ लोग यह शंका कर रहे हैं कि ऐसा तबी संभव है जब महागठबंधन के दो दिग्गजों नीतीश और लालू के बीच सब कुछ ठीक चलता रहे। शायद ऐसा हो पायेगा क्योंकि सबको अपनी राजनीतिक मजबूरियां और खूबियां पता हैं, एक दूसरे को भांजी मारेगा तो खुद भी लड़खडाने का उसे भी डर रहेगा। लेकिन जो लोग लालू की राजनीति और उनकी चालों से परिचित हैं उन्हें लगता है कि कुछ दिनों में ही वे अपने असली रंग में आ जायेंगे। कुछ लोग कयास लगा रहे हैं कि राज्य की सत्ता का रिमोट कंट्रोल उनके हाथों में रहेगा। कयास यह भी लगाया जा रहा है कि उनके बेटे तेजस्वी को मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण स्थान मिल सकता है। लालू के दल ने ज्यादा सीटें जीती हैं तो उनका पलड़ा तो भारी रहेगा ही। वैसे दोनों को यह पता है कि अभी बिहार की सत्ता में स्थायित्व की जरूरत है नहीं तो दोनों का बना खेल बिगड़ जायेगा। वैसे यह बिहार के भी हित में है कि सब कुछ सही और सार्थक हो।

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