http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी भाग-26

Monday, June 27, 2016

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी भाग-26


नीरू भाभी को बहुत चाहते थे भैया

राजेश त्रिपाठी

 इस जीवनगाथा को एक बार फिर बांदा वापस ले चलते हैं। वहीं मेरी भाभी निरुपमा देवी त्रिपाठी से भैया रुक्म की भेंट हुई। परिचय बढ़ा जो बाद में प्रेम में बदल गया। भैया उन दिनों बांदा शहर की प्रसिद्ध रामलीला में लक्ष्मण की भूमिका करते थे और निरुपमा देवी रामलीला की नियमित दर्शक हुआ करती थीं। तभी तो जब एक बार रामलीला के मंचन के दौरान महिलाओं के लिए बनाया गया विशेष मचान टूट गया तो भैया रुक्म उस दुर्घटना में बदहवास भागती महिलाओं में से एक जिस खास चेहरे को ढूंढ़ रहे थे वह चेहरा निरुपमा जी का ही था। शादी के बाद दोनों जब कलकत्ता आये तो भाभी और भैया दोनों के लिए यह बड़ा शहर अजनबी था। साथ ही अजनबी थे वहां के तौर-तरीके। बांदा में छोटी-मोटी मोटरें वगैरह देखने वाली भाभी ने जब कलकत्ता में छोटी ट्रेन यानी ट्राम को चलते देखा तो अवाक रह गयीं। भैया बताते थे कि कई बार तो वे दुर्घटना का शिकार होते बचीं क्योंकि ट्राम की घंटी बजने के बावजूद वे रास्ते से नहीं हटीं। कारण, ट्राम की घंटी को वे किसी मंदिर का घंटा समझ बैठी थीं। भाभी बहुत की धार्मिक प्रवृत्ति की और साफ-सफाई पसंद थीं। वे हर सोमवार को नीमतला के भगवान भूतनाथ के मंदिर में जरूर जाती थीं चाहे भले ही आंधी और तूफान ही क्यों ना आया हो। उनका यह क्रम आजीवन चलता रहा। यों तो भैया-भाभी में अटूट प्रेम था पर कभी-कभी उनमें आपस में नोंकझोंक भी हो जाती थी। यह नोंकझोंक इस ब्लागर के कलकत्ता आने और अपने इस परिवार से जुड़ने के बाद भी जारी रही। अक्सर भाभी को भैया के लिए एक वाक्य कहते सुनता-खैर मनाओ मेरा साथ है वरना लोग आपको बेच डालते। भैया जवाब दिये बगैर मुसकरा कर चले जाते।
इस ब्लागर पर भी नीरू भाभी के बड़े एहसान हैं। भाभी ने ही मुझे मेरी जिंदगी वंदना तक पहुंचाया। वे अक्सर कहतीं –मेरा देवर गांव का सीधा-साधा लड़का है। उसके लिए मैं गांव की ही अच्छी-सी लड़की लाऊंगी कोई बॉब कट मेम मेरे घऱ में नहीं चलेगी।और अपने वादे के मुताबिक मेरे लिए जीवनसंगिनी खोजने नीरू भाभी ही बजबज के पास एक गांव गयीं। वहां उनकी पहचान की सहेली रहती थी जो अक्सर उनके पास आती थी उसी ने उन्हें लडकी के बारे में बताया। भाभी जाकर लड़की को देख कर आयीं तो बराबर मुझसे कहने लगीं लड़की बहुत अच्छी है,तुम भी देख लो मेरा जवाब होता आपने देख लिया, समझो मैंने देख लिया, आपकी पसंद मेरी पसंद। लेकिन उनकी जिद के चलते मुझे और भैया को भी जाना ही पड़ा। जब उनकी पसंद की लड़की से मेरी शादी हुई तो परिवार में शायद सबसे ज्यादा खुश वही थीं। मैं गांव से जब कलकत्ता आया था तो मेरे लिए यहां भैया-भाभी का रिश्ता तो इन दोनों से था ही ये मेरे अभिभावक भी थे। मैं चाहता था कि जो लड़की मेरी जिंदगी में आये वह मेरे भैया-भाभी के छोटे से परिवार को संभाल ले और उन्हें यह ना महसूस होने दे कि उनके घर कोई दूसरे परिवार की लड़की आयी है। वंदना बंगाल से है लेकिन उसने हिंदी थोड़ी-बहुत पढ़ी थी और पढ़ना और बोलना जानती थी लेकिन जब भाभी कोई सामान हिंदी में बोल कर मंगातीं तो वह चुपचाप खड़ी हो जाती। जैसे भाभी बोलतीं-वंदना जरा कटोरी लाना। अब वंदना के पास चुपचाप खड़े रहने के अलावा और कोई चारा नहीं था। भैया-भाभी लंबे अरसे तक कलकत्ता में रहने के बावजूद बंगला नहीं सीख पाये थे और वंदना को यह पता नहीं था कि कटोरी किस जंतु का नाम है। ऐसे में मुझे दोभाषिया बन कर कहना पड़ता-बाटी निए एसो (बाटी ले आओ)। लेकिन इसे आत्मश्लाघा या पत्नी की प्रशंसा ना समझें मैं जो कह रहा हूं सच कह रहा हूं। वंदना ने अपनी इस भाषागत अज्ञानता को चुनौती के रूप लिया और युद्धस्तर पर घर की वस्तुओं और दूसरे नामों को जानने, सीखने लगी। मुझसे जो बन पड़ा मदद की। बाद में तो स्थिति यह हुई कि वह हिंदी में इतनी अभ्यस्त हो गयी कि मायके जाकर अपने माता-पिता से बांग्ला में बात करते-करते हिंदी शब्दों का इस्तेमाल कर जाती। धीरे-धीरे वह कंप्यूटर में हिंदी में लिखी मेरी कहानियां वगैरह भी कंपोज करने लगी।
नीरू  भाभी
यह ना समझें कि विषयांतर कर रहा हूं। यहां जिनका भी  जिक्र आ रहा है वे भैया-भाभी से किसी ना किसी तरह से ओतप्रोत रूप से जुड़े थे। वंदना आयी तो हम तीन लोगों के परिवार में जैसे रौनक आ गयी।  शादी के बाद वंदना को हमारे पूरे परिवार के साथ बांदा जिले के हमारे गांव जुगरेहली जाना पड़ा। वहां ग्रामदेवी और कुलदेवता की पूजा शादी के बाद जरूरी होती है। मेरी अम्मा और पिता जी तब गांव में ही थे। उस वक्त वहां ठंड का मौसम था। बुंदेलखंड में ठंड और गरमी कुछ इस कदर पड़ती हैं कि बड़ी शिद्दत से अपना एहसास कराती है। जब वंदना गांव गयी वह कड़ाके की ढंड का मौसम था। बंगाल की लड़की भला बुंदेलखंड की ठंड के बारे में क्या जानती। वह सुबह जब सो कर उठती जाड़े से उसकी उंगलियां जम जातीं। वह अलाव सेंक कर उन्हें वापस सही स्थिति में आती। गांव की अपनी उस यात्रा में उसने खेती-बारी का काम देखा, गायों को सानी आदि लगाना सब सीख लिया। बस गाय दुहना नहीं सीख पायी इस डर के मारे कि कहीं लात ना खा जाये। वह काम वो मां पर छोड़ देती थी। हम सब लोग पूजा-पाठ के बाद कलकत्ता वापस लौट आये। भैया बहुत खुश थे कि उनके दो जन के परिवार में पहले भाई आ जुड़ा और फिर बहू भी आ गयी। वंदना जब से आयी उसने भाभी से बराबर अनुरोध किया कि –दीदी अब आप आराम करें, काम मैं करूंगी। लेकिन भाभी कभी बैठी नहीं सदा अपनी बहू का काम में हाथ बंटाती रहीं। कुछ अरसे बाद हमारे घर पहली कन्या रत्न के रूप में अनामिका का अवतरण हुआ तो उसकी किलकारियों से घर गुलजार हो गया। अन्नू कुछ बड़ी हुई तो भैया रुक्म की ड्यूटी हो गयी वे जब भी खाली होते उसे एक छोटी सी चौपहिया गाड़ी में बैठाते और पास के पार्क तक घुमाने ले जाते। उसके लिए नये-नये खिलौने लाते। भैया-भाभी के कोई औलाद नहीं थी मेरे बच्चों ने उनकी यह कमी भी पूरी कर दी। अन्नू के बाद मझले बेटे के रूप में अनुराग हमारे घर आया। उन दिनों गांव में मेरे पिता जी बहुत बीमार चल रहे थे। भैया जाकर अपने मामा को देख आये थे और बता आये थे कि पोती के बाद उनके यहां पोता हुआ है। लेकिन वे उसे देख नहीं पाये। पिता जी का अचानक देहांत हो गया। वे 95 साल की उम्र तक जिए। यह उस साल की बात है जब भयानक बाढ़ आयी थी और कई रूट की ट्रेनें तक बंद हो गयी थीं। मैं गांव नहीं जा पाया था मेरी अनुपस्थिति में पिता जी का अंतिम संस्कार किया गया। बाद में जाकर मैंने उनकी अस्थियां संगम में विसर्जित कीं और अन्य कार्य पूरे किये। पिता जी के गुजरने के बाद मां अकेली हो गयी थीं तो उनको भी कलकत्ता ले आये। अब हमारा भरा-पूरा परिवार हो गया था। मां कई वर्षों तक कलकत्ता में रहीं फिर वह भी साथ छोड़ गयीं। वंदना ने उनकी बड़ी सेवा की। कभी वंदना से मैं उंची आवाज में बोलता तो मां डांट देतीं –मेरी बहूं को कुछ मत कहा कर। उसने तुझे दो-दो लाल और एक लक्ष्मी दी है। आश्चर्य मत करिए बड़े लोग इसी तरह से बातें करते हैं। उनके आशीष बहुत ही कल्याणकारी होते हैं। उनके जाने के बाद ऐसा सूनापन जिंदगी में आ जाता है कि जैसे अपना ही कोई हिस्सा हमसे जुदा हो गया हो।
वापस रुक्म जी और निरुपमा भाभी की कहानी पर आते हैं। कुछ दिन तक वे म़टियाबुर्ज में भी रहे। वहां के बारे में अजीब-अजीब अनुभव वे सुनाया करते थे। भैया बताते थे कि वे जिस कमरे में रहते थे उसमें अक्सर उन्हें किसी अशरीरी के होने का एहसास होता रहा। कभी-कभी तो उनको लगता कि कोई बड़े-बड़े कंटीले रोएं वाला जीव उनकी छाती में आ बैठा है जिसके वजन से उनका दम घुटने-सा लगता। वे नीरू को चिल्लाते-देखो नीरू मेरे ऊपर कौन बैठा है। नीरू टार्च लेकर आतीं तो पातीं कहीं कोई नहीं। वे झल्लातीं-छाती पर हाथ रख कर सपना देख रहे हो, यहां तो कोई नहीं है। इसके अलावा रुक्म जी ने बताया था कि एक बार आधी रात को उनके पड़ोस के घरों में आकर पुलिस ने दस्तक दी और कई लोगों को पकड़ ले गयी। बाद में पता चला कि वहां जेबकतरों का कुनबा रहता था। उनमें से ही किसी एक ने रुक्म जी से बातचीत के दौरान बताया था कि जेबकतरी का हुनर सिखाने के लिए कलकत्ता में बाकायदा स्कूल हैं। भैया-भाभी और हम सबका परिवार इसी तरह प्रेम-प्यार से पल रहा था। अब भैया-भाभी का प्यार हम लोगों में बंट गया था। मैं या मेरे बेटे अगर घर वापस लौटने में देर करते तो दोनो छटपटाने लगते थे। जब तक हममें  से सभी लौट ना आते कोई खाना तक ना खाता था। (शेष अगले भाग में )



2 comments:

  1. नीरू भाभी जी की बहुत ही मर्मस्पर्शी यादें हैं ...
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं ...

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  2. धन्यवाद कविता जी, जन्मदिन की बधाई और मेरी भावनाओं को पसंद करने, सराहने के लिए। दरअसल मेरे भैया डॉ, रुक्म त्रिपाठी कोलकाता में पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में जाने-माने व्यक्तित्व रहे हैं। मेरा सौभाग्य यह था कि मुझे पत्रकारिता और साहित्य के गुरु घर में ही मिल गये। उनकी यह आत्मकथा मैं एक लेखक के रूप में नहीं छोटे भाई और उनके शिष्य के रूप में लिख रहा हूं। इसे पढ़ते हुए आप उनके व्यक्तित्व के विविध पहलुओं और उन कालखंडों से जुड़ सकती हैं जो उन्होंने जिये। संभव है इसमें पत्रकारिता और साहित्य के भी कुछ नये रंग उभरते नजर आयें। आपने एक भाग पढ़ा इसके लिए शुक्रिया।–राजेश त्रिपाठी

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