http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: खामोश हो गयी शोषित. वंचित समाज के हित में उठनेवाली आवाज

Friday, July 29, 2016

खामोश हो गयी शोषित. वंचित समाज के हित में उठनेवाली आवाज


धरा धाम में अपनी भूमिका संपन्न कर चली गयीं महाश्वेता देवी

इस अदने-से कलम के सिपाही का साहित्य की इस यथार्थ योद्धा को प्रणाम

राजेश त्रिपाठी




महाश्वेता देवी साहित्य की दुनिया का ऐसा नाम जिसके साथ जुड़े हैं ना जाने कितने कीर्तिमान, कितने सम्मान और कितने ही आख्यान। सच और साफ-साफ कहनेवाली महाश्वेता देवी जैसी क्षमता, सामर्थ्य किसी-किसी में ही होता है जो हजार बाधाओं के बावजूद अपने संकल्प से ना डिगे। वे अनन्य थीं, वे अनुपम थीं वे अद्वितीय थीं और एको अहम द्वितीयो नास्ती का कथन उन पर सच और सही बैठता है। वाकई रहती दुनिया तक अब शायद ही कोई दूसरी महाश्वेता भारत भूमि में पैदा हो सके। यह सच है कि किसी के जाने से दुनिया खत्म नहीं हो जाती लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इससे जाने वाले की अहमियत कम नहीं हो जाती। आज अगर उनके जाने से समर्थकों के साथ-साथ विरोधियों की भी आंखे नम हैं तो निश्चित ही उनके व्यक्तित्व में वह जादुई कशिश, वह पराक्रम रहा होगा कि आज दोस्त से लेकर दुश्मन तक उनके मुरीद हैं। उनकी रचनाएं कल्पानलोक में नहीं बल्कि यथार्थ के धरातल में जनमी हैं जहां एक ओर वैभव , विलास का चाकचिक्य और दबदबा है तो दूसरी ओर आदिवासियों, शोषितों, दलितों की मुफलिसी, भुखमरी में तपती, सिसकती जिंदगी है। उन्होंने इनको ही अपनी रचना का आधार बनाया क्योंकि ये यथार्थ से ओतप्रोत थीं और पढ़ने, सुनने वाले के मानस और उसके अंतस को झकझोरने की ताकत उनमें थी।पद्म विभूषण, मैगसायसाय, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित महाश्वेता देवी का व्यक्तित्व इतना विशाल हो गया था कि उनकी जैसी हस्ती के लिए ये पुरस्कार बौने  लगते थे। उनकी रचनाओं में  जो संसार बसता था वह उनका जाना-पहचाना था। अरसे तक उन्होंने आदिवासी जीवन की कठिनाइयों, उनके संघर्ष  को उनके बीच रह कर देखा। वही उनके लेखन में उभरा। उऩ्होंने उन लोगों के साथ भी समय बिताया जो खानों में काम करते हैं। उनके दुख-दर्द की थाह ली जो समाज से उपेक्षित और कटा-कटा-सा समुदाय है। आदिवासियों को प्रशासन और समाज ने उनके हाल पर छोड़ दिया है। उनके हित की ना की सार्थक योजनाएं बनती हैं और अगर बनती भी हैं तो लागू नहीं होतीं। उनको उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। वन-उपज से ही उनका जीवन चलता है और वह अब सुरक्षित नहीं लगती क्योंकि उद्योग की फैलती बांहें इन्हें भी अपने आगोश में लेने को हैं। ऐसे में आदिवासी आश्रय और जीविकाहीन हो जायेंगे। अब उनकी लड़ाई लड़ने के लिए कलम की सच्ची सिपाही महाश्वेता देवी भी जो नहीं हैं। आदिवासियों और शोषितों के हित का संग्राम लड़ने वाली इस महा आरण्य की मां को सश्रद्ध नमन। शोषितों और वंचितों के समर्थन में उठनेवाली एक सशक्त आवाज खामोश हो गयी। अब कौन लड़ेगा शबर और दूसरे वंचित आदिवासियों के हित की लड़ाई। आदिवासी जो समाज से कटे हुए हैं और अब औद्योगिकीकरण की होड़ में उन्हें उनकी जड़ों से उजाड़ा जा रहा है। आखिर आदिवासी जायें तो कहां जायें। सदियों से जो वन प्रांतर उनके प्राण रहे हैं वे भी उनसे छीने जा रहे हैं। विकास हो इसमें कोई हर्ज नहीं पर पहले उस क्षेत्र के विस्थापितों के सही ढंग से पुनर्वास की व्यवस्था हो। अक्सर देखा गया है कि वे अपनी जडों से उजाड़ दिये जाते हैं और वर्षों उन्हें पुनर्वास की सुविधा के लिए लड़ना, व्यस्था से जूझना पड़ता है। महाश्वेता देवी इन्हीं के पक्ष में खड़ी थी तभी उन्हें महाअरण्य की मां की संज्ञा दी गयी। उनकी तरह की जुझारू लेखिका अब शायद ही दूसरी कोई हो। कारण, महाश्वेता होना आसान नहीं। महश्वेता युग में एक ही होती हैं, जो वे थीं। यह साहित्य की अपूरणीय क्षति तो है ही सबसे बड़ी क्षति या आदिवासियों की है जिन्होंने अपनी ममतामयी वह मां खो दी जो उनके हितों के लिए आखिरी दिनो तक लड़ती रही। उसकी रचनाओं में उभरी इस वर्ग की दुर्दशा, दीनता और हीनता। उनकी रचनाओं ने समाज को उद्वेलित किया, शोषितों, वंचितों को लड़ने का साहस दिया और दिया अपने अधिकार के लिए चट्टान की तरह अड़िग, अचल रहने का भाव। आपका कहना सच है कि अब कोलकाता का साहित्यिक क्षितिज उस तरह से ज्योतित, आलोकित नहीं रहेगा जैसा वह महाश्वेता देवी की उपस्थिति में हुआ करता था लेकिन महाश्वेता देवी जैसी प्रतिभाएं अपने पीछे अपनी प्रतिभा, अपनी रचनाओं और कृत्यों का जो आलोक छोड़ जाती हैं, उसका प्रकाश कभी म्लान या मद्धिम नहीं होता। तब तक जब तक इस संसार में सार्थक साहित्य के प्रति श्रद्धा और सम्मान रहेगा, महाश्वेता देवी गर्व और आदर के साथ याद की जाती रहेंगी। इस महान आत्मा को नमन। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और उनके समर्थकों, प्रशंसकों, परिजनों को उनके निधन का दुसह दुख सहने की शक्ति प्रदान करें। इस अदने से कलम के सिपाही का साहित्य की इस यथार्थ योद्धा को प्रणाम।

1 comment:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " सम्मान खोते उच्च न्यायालय “ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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