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Monday, September 12, 2016

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी भाग-27

वह रात हम सब पर पहाड़-सी बीती

राजेश त्रिपाठी

 हम सबका भरा-पूरा परिवार सुख-शांति से चल रहा था। बेटी अनामिका की शादी हो गयी थी। मझला बेटा अनुराग और छोटा बेटा अवधेश भी ब्याह गये थे और अच्छी जगह नौकरी करने लगे थे। छोटे बेटे अवधेश के एक बेटी हुई जिसका नाम लोगों ने बड़े प्यार से अनुश्री यानी हमारी छोटी लक्ष्मी रखा था। बेटी अनामिका को शादी के ग्यारह साल बाद एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। उसके संतान प्राप्ति के लिए हर मंदिर में माथा टेका, खूब इलाज कराया और फिर हमारे घर प्रभु के वरदान स्वरूप एक नाती आया। सब उसके नाम को लेकर परेशान थे कि इसका नाम क्या रखा जाये। जब किसी नाम पर आम सहमति नहीं बनी तो मैंने कहा जब यह हमारे लिए देवताओं का ही आशीष है तो फिर इसे हम आज से देवांश के नाम से ही जानेंगे। और नाती का नाम देवांश हो गया। उसी नाम को थोड़ा संक्षिप्त कर के उसका पुकारू देवा हो गया। अब अनुश्री और देवांश भाभी निरुपमा के लूडू खेल के साथी हो गये। दोनों बच्चे उनसे इस तरह घुल-मिल गये कि जब भी उन्हें खाली पाते, लूडू सजा कर उनके सामने बैठ जाते। भाभी भी कभी उन बच्चों का दिल नहीं  तोड़तीं और घंटों उनके साथ खेलती रहतीं। भाभी को अरसे से पेट की तकलीफ थी साथ ही उनकी गांठों और जोड़ों में असह्य दर्द होता था। इस दर्द के लिए उनको जो जब जैसे दवा बताता, वे खा लेतीं  कभी आयुर्वेदिक तो कभी होम्योपैथी लेकिन उनकी आस्था एलोपैथी दवाओं में ज्यादा थी तो वे जब भी दर्द असह्य हो जाता कोई न कोई पेन किलर खा लेती थीं। धीरे-धीरे  यह उनका नित्य का क्रम हो गया। रोज-रोज पेन किलर लेने से उनके पेट की तकलीफ बहुत बढ़ गयी। जब बराबर दर्द रहने लगा तो मेरे दामाद मुकेश और पत्नी वंदना उनको कोलकाता के साल्टलेक में डाक्टर रंजन श्रीवास्तव को दिखाने ले गये। रंजन श्रीवास्तव नगर के जाने-माने कार्डियोलोजिस्ट और डाक्टर हैं। वे मेरे अभिन्न मित्र अभिनेता अंजन श्रीवास्तव के भाई हैं।  उन्होंने भाभी को देखा और बताया कि शायद उनके ज्यादा पेन किलर और मिर्च मसाला खाने की वजह से अल्सर जैसी स्थिति बनने लगी है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि दिल भी थोड़ा बड़ा है लेकिन यह चिंता की बात नहीं, बहुतों का दिल थोड़ा बड़ा होता है। चिंता की बात तो अल्सर की प्राथमिक स्थिति है। इसके लिए सावधानी बरतनी होगी अन्यथा तकलीफ बढ़ सकती है। उन्होंने लाल स्याही से मोटे अक्षरों में स्पष्ट शब्दों में लिख दिया –Stop pain killer immediately .  पेनकिलर तत्काल बंद कर दें। भाभी उनका प्रेसक्रिप्शन लेकर घर वापस आयीं तो मैंने देखा और कहा-आज से इसी वक्त से पेन किलर बंद। इस पर वे कुछ नहीं बोलीं लेकिन मुसकराते हुए बोलीं-राजेश जानते हो डाक्टर ने कहा कि मेरा दिल बहुत बड़ा है. चलो अब मुझे कोई छोटे दिलवाली नहीं कह सकेगा।
रंजन श्रीवास्तव ने उनको जो लिक्विड दवाएं और टेबलेट लिखीं उनसे उनके पेट की तकलीफ काफी हद तक ठीक हो गयी थी लेकिन उनके घुटनों का दर्द किसी भी तरह से काबू में नहीं आ रहा था। डाक्टरों से पूछने पर वह कहते कि इस उम्र में जो घुटनों का दर्द होता है वह बहुत कम ही ठीक होता है उनको पेन किलर की मदद से बस दबा कर ही रखा जा सकता है। और भाभी भी वही करती रहीं। इसके लिए उन्होंने डाक्टर रंजन श्रीवास्तव की चेतावनी की भी परवाह नहीं की। मैं कभी गुस्सा हो जाता तो कहता –जाओ मैं नहीं लाता पेनकिलर। मैं जानता हूं कि इससे तुम्हें थोड़ी देर के लिए भले ही आराम मिले लेकिन उससे अधिक नुकसान ये गोलिया शरीर के भीतर कर रही होती हैं। जानती हो डाक्टर कहते हैं कि अगर खाली पेट पेनकिलर लिया जाये तो वह पेट में घाव तक कर सकता है। क्यों अपने आपको किसी मुसीबत में डालना चाहती हो।
वे जवाब देतीं-क्या तुम चाहते हो कि मैं अपंग हो जाऊं, चलने फिरने लायक भी न रह जाऊं। देखते हो न एक जगह बैठ गयी तो फिर उठने में दर्द के मारे प्राण जाते हैं। इसके बाद जाहिर है कि मैं चाह कर भी कुछ न बोल पाता। उनका पेन किलर खाने का सिलसिला चलता ही रहा। उनके लिए पेनकिलर और एंटासिड की टेबलेट न चाहते हुए भी हमें घर में रखनी ही पड़ती। कई बार भैया से भी कहा कि वे उनको समझायें कि वे अपने को धीरे-धीरे मौत के मुंह में धकेल रही हैं क्योंकि पेनकिलर कोई इलाज नहीं तकलीफ को दबा कर महसूस न होने देने का एक जरिया है। इससे दूसरे जो कंप्लीकेशन होंगे उनसे निपटना मुश्किल हो जायेगा। इस पर भैया का जवाब होता- देखो न वह तो कुछ सुनना ही नहीं चाहती। कहती है कि हम लोग उसको अपंग बना देना चाहते हैं।
कई साल तक वे पेनकिलर पर टिकी रहीं। उनके घुटनों का दर्द न ठीक होना और न हुआ। हां, पेनकिलर खा लेतीं तो उनको आराम का एहसास जरूर हो जाता। आगे बढ़ने से पहले मैं हर एक से हाथ जोड़ कर निवेदन करना चाहता हूं कि अगर बहुत ही मजबूरी न हो तो अपने किसी भी प्रियजन को लंबे अरसे तक पेनकिलर न खाने दीजिएगा। इससे लाभ तो होना नहीं संभव है कि और नुकसान ही हो जाये। भाभी पेनकिलर नहीं छोड़ पायीं और धीरे-धीरे उनके पेट का दर्द फिर वापस आ गया और अब वह पहले से ज्यादा प्रचंड और पीड़ादायक होने लगा। अब पेनकिलर भी आराम नहीं देते तो वे घंटों लेटे कराहती रहतीं। ऐसे ही 11 जनवरी 2013 की सुबह से ही उनके पेट में असह्य दर्द होने लगा। एक स्थानीय डाक्टर को बुलाया गया तो उन्होंने दर्द कम करने की दो टेबलेट दीं लेकिन उनसे भी फायदा नहीं हुआ। हम सभी भाभी से आग्रह करने लगे कि वे अस्पताल चलें ताकि ठीक से जांच-परख कर पता लगाया जा सके कि आखिर पेट दर्द का कारण क्या है लेकिन वे राजी नहीं हुईं। हमने डाक्टर रंजन श्रीवास्तव से संपर्क किया और कहा कि क्या हम भाभी को उनके पास ले जा सकते हैं। उन्होंने कहा –मुझे आज एक एंजियोग्राफी करनी है। अभी वक्त नहीं निकाल पाऊंगा, शाम तक ले आइएगा, अभी दो टेबलेट बताये देता हूं, दे दीजिएगा दर्द कम हो जायेगा। उनकी दवा भी दे गयी लेकिन भाभी का दर्द कम नहीं हुआ। फिर उनसे अनुरोध किया गया कि वे अस्पताल चलें लेकिन वे राजी नहीं हुईं। दूसरे दिन नाती देवांश को स्कूल में भर्ती करना था जिसके लिए आइडेंटी कार्ड की खातिर उसकी फोटो खिंचवानी थी इसलिए मैं बेटी, नाती के साथ इलाके के ही एक फोटो स्टूडियो चला गया। हम लोग स्टूडियो से वापस लौट रहे थे तभी मेरे मोबाइल पर भैया का फोन आया-जल्दी आ जाओ, नीरू अस्पताल जाने को राजी हो गयी है। उसकी तकलीफ बहुत बढ़ गयी है। दर्द के मारे उसे सांस लेने तक में कठिनाई हो रही है।मेरा दिल किसी आगामी मुसीबत की आशंका से बैठ-सा गया। लंबे-लंबे डग भरते हम घर पहुंचे। तब तक बड़ा बेटा अनुराग, छोटा बेटा अवधेश और मुहल्ले के सारे उनके दोस्त भी जुट गये थे और उन लोगों ने आनन-फानन एक टैक्सी की और पास के ही एक नर्सिंग होम ले गये। वहां आईसीयू नहीं था इसलिए उन्होंने कुछ दवाएं वगैरह देकर कह दिया कि कहीं और ले जाया जाये। इसके बाद सभी उनको लेकर इलाके के ही एक दूसरे नर्सिंग होम ले गये। तब तक भाभी की तबीयत बेहद खराब हो गयी थी। डाक्टरों ने उनको चेक किया और तत्काल आईसीयू में रख दिया। बच्चे लोग काफी देर तक वहां रहे फिर डाक्टरों ने कह दिया कि –आप लोग घर जायें, जरूरत होगी तो खबर कर देंगे।सभी भाभी निरुपमा को डाक्टरों, नर्सों के अधीन आईसीयू में छोड़ कर चले आये। रात भर नर्सिंग होम से कोई फोन न पाकर हमें संतोष हुआ कि चलो भाभी ठीक हैं। दूसरे दिन शाम को मैं, मेरी पत्नी वंदना, बेटी अनामिका उनसे मिलने नर्सिंग होम गये। आईसीयू में एक साथ कई लोग तो जा नहीं सकते इसलिए मैंने वंदना से कहा कि वह जाकर अपनी दीदी को देख आये फिर हम लोग चले जायेंगे। वंदना भीतर गयी तो उनके बेड के पास जाकर उसने पूछा-दीदी अभी कैसी हैं। बड़ी दबी आवाज से उन्होंने कहा-ठीक हूं, दोपहर को खाना खाया है।वंदना ने पूछा-दीदी आपने चाय पी है।उन्होंने  न में सिर हिला दिया और बोली-‘बहू, मुझे घर ले चलो।वंदना ने कहा-जरूर ले चलेंगे दीदी, पहले आप पूरी तरह ठीक तो हो लो। वंदना नर्स को चाय देने के लिए कह कर मुड़ी ही थी कि भाभी ने उसका हाथ पकड़ कर उठने की कोशिश की। वंदना ने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें उठाया ही था कि वे उसकी बांहों में ही निढाल हो गयीं। उनको सांस लेने में तकलीफ हो रही थी वे बेहोश हो चुकी थीं। वंदना घबड़ा गयी उसने डाक्टर को बुलाया डाक्टर ने उनका ब्लडप्रेशर मापा जो तेजी से गिर रहा था। वंदना बाहर आयी तो फफक-फफक कर रोने लगी। किसी भयावह आशंका से मैं कांप गया। मैं पूछूं इससे पहले वह रोती हुई बोली-दीदी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गयी है। वे बेहोश हो गयी हैं।
हम कुछ सोच पाते इससे पहले आईसीयू से किसी ने आकर कहा-आपकी मरीज कोमा में चली गयी है। उसे वेंटिलेशन में रखना है, आपकी अनुमति चाहिए। हमने बिना समय गुजारे कहा-उनके लिए जो जरूरी समझिए सब कुछ करने की इजाजत है। निरुपमा भाभी को वेंटिलेशन में रख दिया गया। हम थोड़ी देर तक वहां रहे तब तक दोनों बेटे और उनके दोस्त आ गये। उन लोगों ने हमें घर भेज दिया और कहा कि वे वहां रहेंगे। हम लोग घर लौटे तो देखा भैया बहुत बेचैन से बैठे थे। उन्हें उतना उदास और उद्विग्न पहले कभी नहीं देखा था। मेरे, वंदना और बेटी अनामिका के घुसते ही उन्होंने तपाक से पूछा-नीरू कैसी है बहू?’ वंदना ने उनसे झूठ बोला-हां, पहले से ठीक हैं। उनके चेहरे से विषाद की छाया हट गयी और चेहरे पर एक संतोष की चमक उभरी। वंदना ने उन्हें कहा- दादा, आप खाना खा कर सो जाइए। चिंता की कोई बात नहीं, सब ठीक हो जायेगा। उसे यह कहते हुए सुन कर मेरा दिल रोने को कर रहा था लेकिन भैया की उम्र और उनकी मन:स्थिति देख कर मैंने दिल पक्का किया और कहा-हां आप सो जाइए। उन्होंने  सबकी बात मान ली और लेट गये। शायद हमारा झूठा आश्वासन ही उन्हें सच लगा और वे निश्चिंत होकर सो गये। तब 11 जनवरी के रात के ग्यारह बज चुके थे। वे लेटे और कुछ देर में सो गये। पर हम सबकी आंखों में नींद कहां। किसी आगत हृदय विदारक दुख की आशंका ने हमारी नींद, हमारा चैन छीन लिया था। भैया दूसरे कमरे में सो गये और हम दूसरे कमरे में दुखी मन से पल-पल गिनने लगे। रात के 12 बजे के बाद बड़ा बेटा अनुराग, छोटा बेटा अवधेश और उसके दोस्त नर्सिंग होम से वापस लौट आये। हमने संकेत से ही उनसे कहा कि अउआ (रुक्म जी को पूरा मुहल्ला इसी नाम से पुकारता था।) सो गये हैं, धीरे से बोलना। अनुराग के दोस्त लौट गये अनुराग ने हमें जो खबर दी वह हमारा दुख बढ़ा ही गयी। उसने बताया कि डाक्टरों ने सारी कोशिश करके देख ली, न भाभी कोमा से वापस लौटीं और न ही उनका ब्लडप्रेशर ही नार्मल हुआ। वह प्रतिपल बस गिरता ही जा रहा है और साथ ही उनके बचने की उम्मीद भी उसी गति से धीमी होती जा रही है। डाक्टरों ने वह महंगा इंजेक्शन तक इस्तेमाल करके देख लिया जो इस तरह से डूबते मरीज को बचा लेने में सक्षम है लेकिन उसका भी रंचमात्र असर नहीं हुआ। डाक्टरों ने अनुराग और उसके दोस्तों को यह कह कर लौटा दिया कि वे घर जायें, कोई खबर होगी तो दे दी जायेगी। वह खबर रात तकरीबन पौने एक बजे आ गयी।  फोन अनुराग ने ही उठाया। उधर से नर्सिंग होम के डाक्टर की आवाज थी-अफसोस हम आपके मरीज को बचा नहीं सके। आप लोग सुबह आकर हिसाब वगैरह कर के उनका पार्थिव शरीर ले जा सकते हैं। मानाकि हम मानसिक रूप से इस खबर के लिए खुद को तैयार कर चुके थे लेकिन सब रोने लगे, मजबूरी यह थी कि रोने की आवाज दूसरे कमरे तक नहीं जानी चाहिए। नींद में खोये भैया को हम रात को यह खबर जगा कर नहीं देना चाहते थे। हम लोगों ने बाकी रात सिसकते हुए गुजारी। उस रात हममें से किसी ने खाना नहीं खाया था, भाभी की जो हालत देखी थी उसके बाद खाना गले से उतरता ही नहीं। कहना नहीं होगा हम सबके लिए वह रात पहाड़-सी गुजरी।
राम-राम करते सुबह हुई, मन पहले से ही भारी था। भैया उठ गये थे और वह व्यंग्य कविता लिखने बैठ गये थे जो सन्मार्ग हिंदी दैनिक में रोज चकल्लस स्तंभ में छपती थी। रसोईघर में वंदना चाय बनाने लग गयी थी, उसने अपने दादा यानी रुक्म जी को चाय दी और फिर उस कमरे में आ गयी जिसमें हम सब सिर झुकाये, नम आंखें लिये बैठे थे। लग रहा था जैसे हमारे साथ-साथ घर की हर वस्तु, हर कोने में बस दुख ही दुख की छाया हो। वंदना ने कहा कि दादा ने फिर दीदी के बारे में पूछा, मैंने फिर कहा दिया ठीक हैं। उनको सच्ची खबर किस तरह दें, मेरी हिम्मत नहीं हो रही। हम सबने भी यही कहा कि –‘हमारी भी हिम्मत नहीं क्या किया जाये।
वंदना ने कहा- मैं मित्रा दी के पास जाती हूं। उनको बुला लाती हूं, उनसे कहेंगे कि वे दादा को समझा कर यह खबर दे दें। हम सबने हामी भर ली।
मित्रा दी मुझे और भैया को भाई की तरह ही मानती और भाई ही कहतीं। हम सब लोगों ने कहा-हां, यही ठीक होगा।
थोड़ी देर में मित्रा दी आ गयीं। वे सीधे भैया के कमरे में गयीं और बिना कोई भूमिका बनाये सीधे उन्हें वह खबर दी जिसे देने की हिम्मत हम रात भर और सुबह भी नहीं जुटा पाये थे। उन्होंने कहा-भैया भाभी हम सबको छोड़ कर चली गयीं।
भैया के कानों में ये शब्द जैसे पिघले हुए रांगे की तरह चुभे। उनके दुख का वह बांध फूट पड़ा जो हमारे झूठे आश्वासनों से अब तक ठहरा हुआ था। वह बिलख पड़े-मित्रा, नीरू मुझे अनाथ कर गयी। अब हम लोग भी रोते-बिलखते साहस कर के उनके पास गये। मैं रोते हुए बोला-भैया, आप अनाथ नहीं हैं, हम सब हैं न आपके साथ, भाभी के जाने का आपसे भी अधिक गम हमें है। हम सबको उनसे कितना आदर और प्यार मिला पर क्या करें कोशिश तो कम नहीं की। प्रारब्ध से कौन जीत सका है। शायद उनका इतने दिनों का ही साथ लिखा था।
वे रोते हुए ही बोले-तुम लोग नहीं होते तो शायद ही बच पाता। नीरू ने सुख-दुख में मेरा इस तरह साथ न दिया होता तो शायद मैं ही पहले उठ गया होता।
उसके बाद का समय भी हम सबका रोते ही बीता। बेटे नर्सिंग होम चले गये थे हिसाब कर के उनका पार्थिव शरीर लाने वे लोग भी कुछ घंटों में आ गये। भाभी का पार्थिव शरीर लाया गया, जो नियम होते हैं वह किये गये। उनके चेहरे को देख कर लगता था जैसे वे किसी पुराने दर्द से निजात पाकर चिरनिंद्रा में निमग्न हो गयी हैं। भैया बस रोये ही जा रहे थे। जो भी उनसे मिलने आता वे उससे ही बिलख पड़ते –‘देखो, मुझे धोखा देकर मुझसे पहले ही चली गयी।लोग सांत्वना देकर चले जाते। यह सिलसिला देर तक चलता रहा फिर भाभी के पार्थिव शरीर को अंत्येष्टि के लिए नीमतल्ला श्मशान घाट ले जाया गया। इस बीच बताता चलूं कि जब भाभी का पार्थिव शरीर घर लाया गया तो दोनों बच्चे अनुश्री और देवांश ऊपरी मंजिल से देख रहे थे। दोनों भी रो रहे थे कि उनकी ताई को क्या हुआ। अनुश्री तो गुस्सा होकर पूछ रही थी-हमसे तो बताया गया  था कि ताई जी को अस्पताल ले गये हैं वहां से ठीक होकर आ जायेंगी फिर अब क्यों कह रहे हैं कि भगवान के पास चली गयीं। हमारे पास उसके इस यक्ष प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। देवांश रो रहा था-अब मेरे साथ लूडू कौन खेलेगा। तुम लोग कहते हो कि ताई भगवान के पास चली गयीं। हम लोग कैसे पहचानेंगे। उसकी मां उसे समझाती- बेटा आसमान में उस जगह एक नया तारा जब दिखेगा तो समझना वही तुम्हारी ताई जी हैं।
उस दिन के बाद  से भैया हमेशा बुझे-बुझे से ही  रहने लगे। फिर उनको कभी मुसकुराते नहीं देखा। लग रहा था जैसे वे तिल-तिल करके खुद को खत्म करते जा रहे हैं। मुझसे कहने लगे- मैं क्या करूं, कैसे जीऊं। मैंने कहा-आप वही करो जो आपका काम है लेखन। उसमें मन रमा रहेगा।उन्होंने नीरू भाभी के गम में एक कविता लिख डाली जिसे यहां पेश कर रहा हूः-


साथी 
पहली बार जिसे पकड़ा था,
वह था मेरा हाथ।
और कहा था , सारा जीवन,
रहना हमको साथ।।
अगणित कष्ट झेल कर तुमने,
हर क्षण साथ निभाया।
मुझे कष्ट हो तुम सह लेती,
ऐसा कभी  न पाया।
रही प्रेरणा जीवन भर तुम,
तभी आज लिख पाता।
वरना पहले छंद काव्य से,
नहीं रहा था नाता।।
तुम वसंत बन कर आयीं,
आंधी बन कर छोड़ा साथ।
साठ बरस तक संग निभाया, 
 अब कर गयीं हठात अनाथ।।
-डॉ. रुक्म त्रिपाठी



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