http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: गीत

Saturday, December 17, 2016

गीत

सीरत कुछ की काली देखी
           राजेश त्रिपाठी
हमने  इस जग की हरदम रीत निराली देखी।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत* कुछ की काली देखी।।
     कुछ खाये-अघाये इतने  खा-खा कर  जो बने हैं रोगी।
     शील, सौम्यता खो  गयी  बने आज ज्यादातर भोगी।।
     परमार्थ का भाव खो गया  सभी बन गये  सुविधावादी।
     पानी पीकर देश को कोसें चाहें गाली देने की आजादी।।
ऐसे लोगों में गुरूर भरा कंठ तक, तर्क की कोठी खाली देखी।
अपनी बात  मनाने को  लड़ते, आदत अजब  निराली देखी।।
     कितना लूटें, कितना समेंटे बस इनका यही  है धंधा।
     ये अपनों तक को ना छोड़ें मानस इनका होता गंदा।।
     मक्कर से ये दुनिया चलाते इनकी ऐसी होती चालें।
     लाख जतन कर बच ना पाये जिस पर फंदा डालें।।
पैसे के हित कुछ भी करते हरकत चौंकानेवाली देखी।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत कुछ  की काली देखी।।
     खून-पसीना एक कर जो बनाते हैं भवन निराले।
     अक्सर खाली पेट ही देखा मिलने नहीं निवाले।।
     ठंडे घऱों में श्रीमंत राजते वैभव से भरा खजाना।
     कभी-कभी श्रमिकों के घर होता एक न दाना ।।
उसकी जिंदगी  की झोली देखी अक्सर रहती खाली।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत कुछ की काली देखी।।
     धूप, शीत, बरसात  झेल कर खेती करे किसान।
     मौसम, महाजन की मार से जो रहता हलकान।।
     उसका श्रम कभी-कभी  जाता एकदम  बेकार ।
     जब उसे पड़ती है झेलनी सूखे-बाढ़  की मार।।
फसल के सही दाम कम मिलते उसकी थैली रहती खाली।
सूरत  देखी  साफ, मगर सीरत  कुछ की  काली देखी।।
     सब होवैं खुशहाल यहां सबको मिले सही सम्मान।
     सच कहें तो तभी बनेगा अपना पावन देश महान।।
     कोई  कमाये कोई खाये कोई हरदम करता फांका।
     इसका मतलब किसी के हक पर डाले कोई डाका।।
यह हालत ज्यादा अरसे तक अब नहीं है चलनेवाली।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत कुछ की काली देखी।।
सीरत*= स्वभाव, चरित्र, प्रकृति

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