http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: कहानी

Tuesday, February 21, 2017

कहानी


पैसा बोलता है

राजेश त्रिपाठी

            बर्तन मांजती सुखिया ने रेखा से कहा- मालकिन बच्चा किसना के लिए चिंटू बाबा का कोई पुराना कपड़ा मिल जाता तो बड़ी किरपा होती। दीवाली के लिए उसके नये कपड़े नहीं ले सकती।'
            ‘अच्छा देखूंगी।
            रेखा की बात पर पास बैठी सास ने भौंहें तान लीं। सुखिया के जाने के बाद बहू को डांटा-खबरदार जो चिंटू का कोई कपड़ा उसे दिया।
            रेखा चौंकी, ‘क्यों मां? कितने कपड़े हैं चिंटू के जो उसे अब छोटे पड़ रहे हैं। गरीब है खरीद नहीं सकती। पेट ही भरने का पैसा नहीं जुटता।
            सास ने कहा, -‘मैं क्यों मना कर रही हूं, जानती हो?’
            ‘नहीं मां।
            ‘उसकी सास की सूरत डायन जैसी है। चिंटू के कपड़े पाकर पता नहीं वह क्या टोटका कर बैठे? ना, ना, भूल कर भी न देना।
            रेखा ने फिर कुछ नहीं कहा। वह नये विचारों की थी। डायन-वायन, टोटका-वटका नहीं मानती थी। एक दिन उसने चिंटू के नये दिखने वाले चार जोड़ी कपड़े चुपके से सुखिया को देकर कहा,- ‘छिपा कर ले जा। मां जी देख न पायें।
            सुखिया कुल चार घरों में बर्तन मांजने और झाडू-पोंछा का काम करती थी। सब मिला कर वह ढाई हजार कमा लेती थी।
            पति सरजू ईंट भट्ठे में मजदूरी करता था, जो पाता उसे दारू में उड़ा देता था। घर में फूटी कौड़ी तक न देता। चार जनों के उस परिवार के सभी आधा पेट खा पाते। सुखिया ने कई बार पति से प्रार्थना की, ‘मेहरबानी कर के दारू छोड़ दीजिए। मेरी कमाई से किसी को भरपेट खाना नहीं मिलता।
            यह सुनते ही सरजू बिगड़ जाता-जब देखो तब तू मेरी दारू के पीछे पड़ी रहती है, जैसे वह तेरी सौतन हो। आगे कुछ बोलेगी, तो अच्छा न होगा।
            सुखिया और कुछ बोलती, तो पति की लातें खा जाती। वह जानती थी कि उसका पति सास की लापरवाही से शराबी बना है। शादी के पहले वह दारू को हाथ तक नहीं लगाता था। जब वह पहले दिन पीकर आया  तो वह चौंक उठी। उसने सास से कहा- मां जी! आपका बेटा दारू पीकर आया है। मना कीजिए। यह बरबादी के लक्षण हैं।
            तब सास ने मुस्करा कर कहा-तुम भी बहू। छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही हो। दोस्तों की संगत में थोड़ी सी पी ली होगी। रोज-रोज थोड़े पियेगा?’
            और जब वह रोज-रोज पीकर आने लगा और घर में एक पैसा भी न देता, कुछ मांगने पर मारने को आमादा हो जाता, तब सुखिया को मजबूरन दूसरों के बर्तन मांजना पड़ा। फिर उसने पति के खिलाफ सास से कुछ नहीं कहा। उसकी सास दो चार दिन भूखी रहती तब उसे पता चलता कि बेटे को दारू पीने से न रोकने की वजह से भूखे सोना पड़ रहा है।
*
            रेखा बहुत दयालु थी। वह सुखिया को हर माह दो सौ रुपये अधिक दे देती थी। वह प्राय: कहती- सुखिया, तेरा नाम तो दुखिया होना चाहिए था। सुखिया किसने रखा।
            दीवाली के दो दिन पहले रेखा ने उसके बच्चे के लिए कुछ फुलझडि़यां, पटाखे और मिठाई दी थीं।
            तब सुखिया ने खुश होकर कहा था-भगवान आपका भला करे मालकिन। आप जैसा बड़ा दिल सबको दे। आपने चिंटू बाबा के जो कपड़े हमारे बचुवा के लिए दिये थे, वे उसके ठीक नाप के थे। उसे बहुत पसंद आये। कहता था,-मां! मेरे लिए ऐसे ही कपड़े खरीदा करो। मालकिन वह उन कपड़ों को नया समझ रहा है।
            रेखा ने मुस्करा कर कहा-चलो अच्छा है। मैं भी यही चाहती थी। दूसरे के उतारे कपड़े सुन कर वह दुखी हो जाता।
            रेखा जब अखबार पढ़ कर सुखिया को सुनाती कि कहां पर कितने लोग जहरीली शराब पीकर मर गये, तो वह कांप उठती और रोकर कहती-मालकिन हमारा खसम भी चोरी से उतारी जा रही दारू पीता है। पता नहीं, कब क्या हो जाये। सास जी से कहती हूं तो वे साफ-साफ कह देती हैं- अब वह दारू छोड़ने वाला नहीं। ज्यादा मना करेंगे तो गुस्से में हम सब को छोड़ कर कहीं चला जायेगा। कभी-कभी मन करता है मालकिन किसना को लेकर हमेशा के लिए मायके चली जाऊं। मगर वहां भी गुजारा नहीं होगा। अम्मा, बापू बूढ़े हो गये हैं। एक बड़ा भाई है। वह घरवाली के इशारे पर चलता है। पांच दिन के लिए जाती हूं तो तीसरे दिन ही भाभी कहती हैं- कब लौट रही हो ससुराल? सुन कर बापू कुछ नहीं बोलते, वे मजबूर हैं। बेटे की कमाई खा रहे हैं। बेचारी अम्मा मन मसोस कर रह जाती हैं।
            रेखा उसे सांत्वना देती-मैं तुम्हारी परेशानी समझ रही हूं सुखिया। तुम्हारे लिए जितना कर सकती थी, कर रही हूं। हम कोई लखपती नहीं हैं। वे एक दफ्तर में क्लर्क हैं। थोड़ा पैसा और मिलता, तो कहती , जिस चीज की जरूरत हो, मांग लेना।
            ‘यह आपकी मेहरबानी है मालकिन। मैं जिन पैसे वालों के यहां काम करती हूं,  मुझसे बात करना पसंद नहीं करते। पैसा बढ़ाने को कहती हूं, तो जवाब मिलता है, आजकल बर्तन साफ नहीं हो रहे। झाड़ू-पोंछा भी ठीक से नहीं लगता। ऐसा कब तक चलेगा। मालकिन वे शादी ब्याह में बची मिठाई कूडादान में फिंकवा देते हैं, लेकिन नौकरों को नहीं देते।
            रेखा ने कहा-जानती हो क्यों ? कुछ पैसे वाले अपने नौकर को यह सोच कर अच्छी चीज नहीं देते, कि अगर उसे उसका स्वाद मिल गया, तो चोरी कर के खाना शुरू कर देगा।
            सुखिया ने माथा ठोंक कर कहा, - ‘ हे भगवान! कैसे -कैसे लोग हैं इस दुनिया में।
            रेखा ने कहा-और भी सुन। एक दिन मैं एक करोड़पति परिवार में किसी पूजा में गयी थी। वहां मैंने कुछ दूर खड़े एक बारह साल के लड़के को अपने पिता से कहते सुना-डैडी ! आप रामू को कम पैसे क्यों देते हैं। उनसे ज्यादा तो मुझे पाकेट खर्च मिलता है। उसे इतना तो दीजिए, जिससे उसका परिवार भरपेट खा सके। जानती हो सुखिया, उसके डैडी ने क्या जवाब दिया?’
            ‘क्या कहा मालकिन?’
            ‘बोले, हम रामू को इतनी तनख्वाह देते हैं, जिससे वह जिंदा रहे, मरे नहीं और तुम्हारी होने वाली संतान की सेवा के लिए एक अदद गुलाम पैदा किये जाये। ज्यादा पैसे देंगे, तो वह अपने बच्चे को पढ़ायेगा, वह बड़ा होने पर किसी दफ्तर में बाबू हो जायेगा। तब तुम्हारी संतान की सेवा के लिए गुलाम कहां से आयेगा।
            सुन कर सुखिया अवाक रह गयी।
            रेखा ने फिर कहा-जानती हो सुखिया! यह उस बच्चे का डैडी नहीं पैसा बोल रहा था।
            ‘लेकिन पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं मालकिन। पैसे वालों में आप जैसे भी लोग होंगे।
            ‘ हा हैं, जो खानदानी रईस होते हैं। जो बेईमानी से नहीं बने। जो तिकड़म कर के बने उन्हीं का पैसा बोला करता है, वे नहीं। लगता है तुम खानदानी रईसों की बात कर रही हो।
            पता नहीं मालकिन। ¢


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