Wednesday, May 23, 2018

डॉ. रुक्म जी की व्यंग्य कविताएं







मेरे बड़़े भैया और गुरु रुक्म त्रिपाठी 'सन्मार्ग' हिंदी दैनिक मेें साहित्य संपादक रहते वक्त अनेक कहानियां, उपन्यास लिखने के साथ ही इस लोकप्रिय दैनिक के दैनिक स्तंभ 'चकल्लस' में  अपने उपनाम रुक्म त्रिपाठी से सम सामयिक, राजनीतिक, सामाजिक स्थितियों, विषयों में चुटीली व्यंग्य कविताएं लिखते रहे। यह क्रम निरंतर जारी रहा यहां तक कि जिस दिन उनकी इस जग की इहलीला समाप्त हुई उस दिन भी उन्होंने कविता लिख कर मुझे दी जो दूसरे दिन के अंक में प्रकाशित हुई और उसके पास में ही उनके निधन का समाचार प्रकाशित हुआ। इन कविताओं के बारे में मैं कुछ कहूं तो शायद उचित ना होगा। रुक्म जी कोलकाता के जिस कांकुड़गाछी अंचल में रहते थे वहां पर एक बड़ा सा पार्क है आचार्य प्रफुल्ल चंद्र पार्क (जो बड़ापार्क या सुभाष मेला पार्क के रूप में भी मशहूर है)। वहां रुक्म जी रोज प्रात: भ्रमण करने जाते तो वहां उनकी कविताओं के कई प्रशंसक मिल जाते थे। उन प्रशंसकों का इन व्यंग्य कविताओं के बारे में कहना था कि हम जब समाचारपत्र में इन कविताओं को पढ़ते हैं तो लगता है कोई उपदेशक हमें अपनी रचनाओं के माध्यम से जमाने के ऊंच-नीच, अच्छे-बुरे से आगाह करता चलता है। मुझसे मेरे कुछ साहित्यिक और पत्रकार बंधुओं ने जो रुक्म जी के प्रति श्रद्धा-भाव रखते हैं कई बार आग्रह किया कि मैं उनकी कुछ चुनिंदा कविताओं को लोगों के सामने लाऊं। उन सबके आग्रह का परिणाम है यह प्रयास। संभव है सुधीजनों को अतीत की ये रचनाएं वर्तमान की स्थितियों का भी दर्पण लगें।



बात ऐसी हो !

अब उन्हें छोड़ो की अब वे हीन हैं,
कल तलक जो शाह थे अब दीन हैं।
भूल जाओ माफ कर दो जो हुआ,
गुनहगारों की शकल गमगीन है।।


रंग लायी है सियासत देख लो,
अब कहां है वह लियाकत देख लो।।
जुल्म कर के आंख दिखलाते रहे,
अब  कहां है हिमाकत देख लो।।


तुम नये आये हो प्यारे सोच लो,
काम जो करना है सारे सोच लो।
नाव का कुछ भी भरोसा है नहीं,
इसलिए अपने किनारे खोज लो।।


जिद नहीं अच्छी इसे तुम त्याग दो,
क्रोध के बदले सदा अनुराग दो।
वोटरों का क्या ठिकाना बंधुओ,
बात ऐसी हो कि मिश्री पाग दो।।
🔻



घपलेबाजी

आजादी के बाद बढ़ी है,
सबसे अधिक दिखावट।
रहन-सहन में घपलेबाजी,
चलती खूब मिलावट।।


जब जनमे थे तब लगते थे,
बिल्कुल शुद्ध स्वदेशी।
होश संभलते केंचुल बदली,
दिखने लगे विदेशी।।


नहीं विदेशी तज सकते जब,
अपनी प्रिय पोशाक।
तब हम उनकी नकल करें क्यों,
और कटायें नाक।।


बड़ी चाह है निकले कोई ,
ऐसा अध्यादेश।
नहीं बदल सकता है कोई,
अपना देशी वेश।।

🔻

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार नहीं मिटने का,

इसको हमसे अतिशय प्यार।

आजादी के संग मिला है,

सबसे बड़ा यही उपहार।।



अनुशासन गोरों संग भागा,

उसकी रही ना हमसे यारी।
तब से अतिशय निर्भय होकर,
बढ़े देश में भ्रष्टाचारी।।

केवल भीषण भाषण से ही,
भ्रष्टाचार नहीं मिट पाता।
जब तक शासन नहीं कड़ा हो,
भ्रष्टाचार नहीं रुक पाता।।

जितने बड़े हमारे शासक,
उनमें कितने भ्रष्टाचारी।
तब कैसे यह रुक पायेगी,
जो संक्रामक बनी बीमारी।।
🔻
घपलेबाजी
आजादी के बाद बढ़ी है,
सबसे अधिक दिखावट।
रहन-सहन में घपलेबाजी,
चलती खूब मिलावट।।

जब जनमे थे तब लगते थे,

बिल्कुल शुद्ध स्वदेशी।
होश संभलते केंचुल बदली,
दिखने लगे विदेशी।।

नहीं विदेशी तज सकते जब,

अपनी प्रिय पोशाक।
तब हम उनकी नकल करें क्यों,
और कटायें नाक।।

बड़ी चाह है निकले कोई ,

ऐसा अध्यादेश।
नहीं बदल सकता है कोई,
अपना देशी वेश।।
🔻
ऐसे भी भिखारी!
एक भिखारी ऐसा देखा,
बेटे आलू के आढ़तिया।
जिनके सात-आठ चाकर थे,
चार मंजिला घर था बढ़िया।।

पूछा 'बाबा भीख मांगते,

तुमको लाज जरा ना आती।'
बोला,'आदत है यह बेटा,
ना मांगू तो नींद ना आती।।'

एक भिखारी के तकिए में,

बड़े-बड़े सब नोट भरे थे।
पांच लाख से कम ना होंगे,
रंग-बिरंगे नील हरे थे।।

एक सूद पर रुपये देता,

वह भी दिखे दरिद्र भिखारी।
यह सब देख और सुन कर के,
कहीं खो गयी अकल हमारी।।
महामानव!
मानवता के शत्रु अनेकों,
ईर्ष्या, द्वेष, जलन परनिंदा।
ये ऐसा धीमा विष होते,
रहने दें ना सुख से जिंदा।।

पर की घी से चुपड़ी लख कर,
सूखी रोटी खाने वाले।
ईर्ष्या से जल भुन जाते हैं,
कोस-कोस खा रहे निवाले।।

ऐसा यत्न नहीं करते वे,
जिससे मालपुआ खुद खायें।
नहीं दूसरों को कोसें फिर ,
और ना दूजे को ललचाएं।।

जो पर हित चाहा करते हैं,
उनकी प्रभु करते हैं रक्षा।
वही महामानव कहलाते,
उनकी पूरी हो सब इच्छा।।
🔻
सावधान!
जो  भी झूठी करे प्रशंसा,
उससे सदा दूर ही रहना।
ऐसे अवसरवादी होते,
विदुर नीति का है यह कहना।।

दुश्मन हंसते मिलने आये,
फौरन सावधान हो जाना।
समझें बुरी नीयत है उसकी,
हंसना उसका एक बहाना।।

दुश्मन अक्सर हंस कर मारे,
अब तक यही देखते आये।
हम ही नहीं विदुर जी के संग,
यही सत्य चाणक्य बतायें।।

दुश्मन को भी मित्र बनाते,
वे अक्सर ही धोखा खाते।
वार सदा करता पीछे से,
जिसको पहले समझ ना पाते।।

गरमी के दोहे
सूखी जीभ निकाल कर,
लक लक करता श्वान।
नेत्र बंद कर हांफता,
संकट में हैं प्रान।।

नहीं सुनाई दे रही,

अब कोयल की कूक।
लगता वह भी चल बसी,
लग जाने से लूक।।

धूल बवंडर बन उठे,

सूखे कूप, तड़ाग।
जल-विहीन सरिता दिखे,
बिन सिंदूरी मांग।।

पथ, गलियां सुनसान सब,

सन्नाटा है व्याप।
शनै: शनै:  है बढ़ रहा,
अति प्रचंड रवि ताप।।

🔻
कहां मिले अब छांव
हवा चले अरहर लगे,
ले हर-हर का नाम।
खड़ी अकेली पेड़ पर,
भजती शिव अविराम।।


उमड़-घुमड़ बादल फिरें,
किंतु न हो बरसात।
ताप-त्रास मिटता नहीं,
संध्या हो या प्रात।।

यूपी और बिहार में,
मरे सैकड़ों लोग।
गरमी संग आंधी चले,
रहे कष्ट वे भोग।।

गृह-विहीन हैं खोजते,

ताप मिटावन ठांव।
वृक्ष अनेकों कट गये,
कहां मिले अब छांव।।
🔻

अब और तब!
ऐसा बुरा समय आया है,
अपनी छाया से डर लगता।
भय हो छुरा छिपाये ना हो,
अपने पीछे जो है चलता।।

नहीं रहा विश्वास किसी पर,

कुछ ही हैं जो वचन निभायें।
वरना अक्सर झूठ बोल कर,
आश्वासन देकर बहकायें।।

एक समय ऐसा था जब,
जो कहते थे, पालन करते।
चाहे जो भी पड़े गंवाना,
नहीं कभी भी पीछे हटते।।

पर अब सब कुछ बदल गया है,

अब फरेबों की बन आयी।
झूठ सदा सम्मानित होता,
सत्य कहीं ना पड़े दिखाई।।
🔻
शाप और वरदान

अंत:करण शुद्ध हो जिसका,

वही श्रेष्ठ होता वरदानी।
आशीर्वाद उसी का फलता,
जो भी कहे सत्य हो बानी।।

शाप और वरदान हृदय से,

जो भी नहीं दिये जाते हैं।
उनका असर नहीं होता,
वे सब सदा व्यर्थ जाते हैं।।

ऋषि मुनियों का युग ऐसा था,

वे सब होते थे वरदानी।।
उनका कहा सत्य सब होता,
ऐसे होते थे वे ज्ञानी।।

आज प्रदूषणपूर्ण हृदय में,

केवल कलुषित भाव भरे हैं।
ऐसा नहीं कभी भी देखा,
शाप दिये पर लोग डरे हैं।।
🔻
कैसी मैत्री?
आप जिसे गुलदस्ता देते,
वह पीछे है छुरा छिपाये।
ऐसे में दोनो में मैत्री,
सोचें, कैसे है निभ पाये।।

भारत जितना ही झुकता है,

उतना पाक अकड़ता जाता।
रह-रह धमकी देता रहता,
नहीं चाहता अच्छा नाता।।

भारत क्यों यह सोच ना पाता,

पाक कराता रहता हमला।
तब दुश्मन से कैसी मैत्री,
मारें अब नहले पर दहला।।

'सीधे का मुंह कुत्ता चाटे',

हुई कहावत बहुत पुरानी।
अब तक जो भी भूल हुई है,
वह अब नहीं और दोहरानी।।
🔻

जन्नत बनाम दोजख

ओसामा का अंत हो गया,

पर आतंक अभी है जिंदा।

जिससे दुनिया भय खाती है,

हर कोई करता है निंदा।।


बना जेहादी युवा वृंद को,

बन आका मरवाते पाजी।

ऐसा ब्रेन वास करते हैं,

मरने को हो जाते राजी।।

मरने पर जन्नत पाओगे,

और मिलेगा तुम्हें सवाब।

एसा कह कर बहकाते जब,

वे जन्नत का देखें ख्वाब।।

नहीं समझते हत्या करके,

वे सीधे दोजख जायेंगे।

जो भी पाप हुआ है उनसे,

उसका महादंड पायेंगे।

🔻

सीधा टेढ़ा

हाथ जोड़ते काम सधे ना,

उन हाथों से गर्दन नापें।

आज समय ऐसा है आया,

टेढ़े से सब थर थर कांपे।।


जब तक चांद दिखे है टेढ़ा,

होता उसका बाल ना बांका।

टेढ़ापन जैसे मिट जाता,

तभी राहु दुश्मन बन ताका।।

सांप सदा टेढ़ा ही चलता,
इसीलिए वह है डंस जाता।
टेढ़ी उंगली से घी निकले,
सीधे से कुछ हाथ ना आता।।

हमको भाता सीधा चलना,
किंतु प़ड़ोसी टेढ़ा चलता।
इसीलिए सिर दर्द बना है,
दुश्मन जैसी हरकत करता।।