Tuesday, May 29, 2018

डॉ. रुक्म की व्यंग्य कविताएं भाग-3

,
भाग-3

क्यों?
आज सभी यह सोचा करते,
आगे जाने क्या होना है।
महंगाई यों उछल पड़ी क्यों,
बहुतों का बस यह रोना है।।

पहले ऐसा कभी न होता,
गुजर-बसर हो जाया करता।
पर गरीब आहें भर कर अब,
आजादी को कोसा करता।।

सोच रहा पहले अच्छे थे,
लोग नहीं भूखे मरते थे।
अन्न, दाल, चीनी सस्ती थी,
लोग प्रशासन से डरते थे।।

अब किसान खुदकुशी कर रहे,
जिसे अन्नदाता हैं कहते।
सरकारी गोदामों में जब,
बहुत अन्न सुनते हैं सड़ते।।

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देवतुल्य है पूजा जाता

एक बात पर कायम रहता,
सबसे अच्छा कहलाता है।
ऐसा व्यक्ति सराहा जाता,
जहां जाय इज्जत पाता है।।

अवसर देख मुकर जाता जो,
गिरगिट जैसा रंग बदलता।
उससे दूर भागते हैं सब,
कुछ कहता है कुछ है करता।।

झूठ बोलने से बढ़ कर के,
कहलाता है पाप ना दूजा।
सदा सत्य जो बोला करता,
उसकी जग में होती पूजा।।

पर सेवा को धर्म समझता,
भेदभाव न मन में लाता।
जो उपकार सदा करता वह,
देवतुल्य है पूजा जाता।।

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चाह

बड़ी चाह है बड़ी लगन है,
अभिनेत्री बन नाम कमाऊं।
जैसा कहिए वैसा अभिनय,
अभी यहीं पर कर दिखलाऊं।।

कलकत्ता से बंबई आयी,
जरा सोचिए कितनी दूरी।
मुझे पता है, सिर्फ आप ही,
कर सकते हैं आशआ पूरी।।

सखी, सहेली मुझसे कहती,
ड्रीम गर्ल, तुम स्वप्न सुंदरी।
रग-रग में मादकता छायी,
बोली जैसे हो स्वर लहरी।।

आंखें ऐश्वर्या सी स्वप्निल,
चाल तुम्हारी है मुमताजी।
चांस तुरत निर्माता देगा,
पल भर में वह होगा राजी।।

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हितोपदेश

उपदेशक कहते हैं बच्चा,
कुछ भी साथ नहीं जायेगा।
आज जिसे अपना कहता तू,
वह सब यहीं छूट जायेगा।।

धन-दौलत तो आनी-जानी,
जिसको प्रभु ने नहीं बनाया।
यह मनुष्य की निर्मित माया,
जिस पर तू फिरता इतराया।।

हम तो यही देखते आये,
तुमको छल-प्रपंच है भाया।
जितना लूट सके लूटे हो,
दोनों हाथ परायी माया।।

लेकिन नहीं कभी सॆचा है,
सब तो यहीं छूट जायेगा।
जो तूने सत्कर्म किया है,
केवल वही साथ जायेगा।।

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आस्तिक-नास्तिक

स्वर्ग-नर्क वे नहीं मानते,
नहीं मानते हैं वैतरणी।
जब कोई भगवान नहीं है,
स्वयं बनी है सारी धरती।।

जाव-जंतु जितने दुनिया में,
वे भी अपने आप पधारे।
नहीं विधाता इन्हें बनाये,
ये भी स्वयं प्रकट हैं सारे।।

किंतु आस्तिक जन कहते हैं,
सारी है यह प्रभु की माया।
जीव-जंतु के पहले जिसने,
यह महान ब्रह्मांड बनाया।।

पुनर्जन्म भी निश्चित होता,
नास्तिक उसको भी झुठलायें।
इनकी अन्य मान्यता होती,
अपनी डफली अलग बजायें।।
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चक्रपाणि

जो कुछ हुआ और होता है, अब हम नहीं चाहते वैसा।
भारत देवभूमि कहलाती , किंतु काम असुरों के जैसा।।
सरेआम हत्याएं होतीं, भय से होती नहीं गवाही।
कुछ आतंकी नक्सलवादी, नंगा नाचें करें तबाही।।

मानवता सहमी रहती है,पता नहीं कब क्या हो जाये।
बेगुनाह की हो किडनैपिंग, निर्भय बलात्कार हो जाये।।
चक्रपाणि सब देख रहे हो, या कर देते हो अनदेखा।
 जितने दुनिया में अपराधी, उन पर चक्र नहीं क्यों फेंका।।

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मतलब की यारी

किस पर अब विश्वास करें हम,
जो भी मिलता, वह है ठगता।
ऐसी हालत हुई हमारी,
अपनी छाया से डर लगता।।

दिल से चाहत वाली बातें,
अब लगती हैं बहुत पुरानी।
बिन मतलब के करे दोस्ती,
लगता है बिल्कुल बेमानी।।

अब  संबंध तभी तक निभते,
जब तक स्वारथ सधता रहता।
मतलब निकल गया ऐसों से,
मिलने-जुलने से डर लगता।।

नहीं रहा उपकारों का युग,
अब सारी मतलब की यारी।
खुदगर्जों को कैसे जाने,
काम न करती अकल हमारी।।

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वह कैसा भोला-भाला

भूजा है उसका ब्रेकफास्ट,
सतुआ का करता लंच, डिनर।
बस यही विटामिन हैं उसके,
बोझा ढोता उसके बल पर।।

वह संतोषी छल-कपट रहित,
कुछ नहीं शिकायत करता है।
कोई भी खबर नहीं लेता,
वह जीता है, या मरता है।।

वह पड़ जाता बीमार कभी,
तो दवा बिन रह जाता है।
जब नहीं कमाई होती है,
तो पानी पी सो जाता है।।

मानव होकर मानव ढोता,
यह कैसा है भोला भाला।
जनता का सच्चा सेवक है,
यह कलकतिया रिक्शावाला।।

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आंखें

आंखों की भाषा सरल नहीं,
जो समझ गया वह पार हुआ।
जिसने थोड़ी-सी गलती की,
उसका ही बंटाधार हुआ।।

बरबस उसके  मन को मोहें,
काली आंखें हो रसवंती।
पतझड़ के पथ से जो गुजरे,
उसको लगती ऋतु बासंती।।

पर कुछ आंखें ऐसी होतीं,
जो बरबस मार खिलाती हैं।
ऐसी आंखों की बहुत कमी,
जो सबका मन ललचाती हैं।।

कुछ आंखें ऐसी होती हैं,
जिनको कहते हैं दगाबाज।
है दृष्टि कहीं पर लक्ष्य कहीं,
इनका मिल पाता नहीं राज।।

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नमस्कार

उनको नमस्कार नहीं करते,
जो बदले में कुछ ना बोलें।
हम विनम्रता दिखलाते हैं,
वे अपनी मस्ती में डोलें।।

हाड़, मांस के पुतले हैं वे,
एक रोज उनको मर जाना।
पर घमंड में ऐसे फूले,
जैसे हरदम यहीं ठिकाना।।

ऐसों को प्रणाम करने से,
घोर पाप अपने को लगता।
नहीं किसी से छिपा हुआ है,
सबके दिल में ईश्वर बसता।।

इससे बेहतर यही मानते,
मंदिर में जा शीश झुकायें।
नहीं अकारथ जायेगा वह,
प्रभु से मनवांछित फल पायें।।

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रहें सुखी भरपूर

सदा वही सुख भोगते,
जो माया से दूर।
हानि-लाभ चिंता रहित,
रहें सुखी भरपूर ।।

यदि मैत्री निभती नहीं,
कदापि न कीजै बैर।
इससे तनिक न हानि हो,
होती सबकी खैर ।।

पहली-पहली भेंट में,
सब जन भले लखांय।
उऩमें कुछ ही साधु हों,
शेष अहित कर जांय।।

नहीं दूसरे की सुनें,
अपनी ही कह जांय।
ऐसे बकबासी कभी,
नहीं किसी को भांय।।
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कैसे कहें जवान?

कहां गयी अपने तरुणों की,
केहरि सी वह चाल।
इस्पाती वक्षस्थल दिखता,
ज्यों राणा की ढाल।।

पदाघात करते धऱती से,
बह उठता था नीर।
झुका नयन ऐसे चलते हैं,
जैसे चलता दूल्हा।।

लज्जा से मुस्काती तरुणी,
देख लचकता कूल्हा।
तरुणायी में कटि झुक जाती,
कैसे कहें जवान।
इनसे तो बहु वृद्ध महाशय,
दिखते हैं बलवान।।
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