Friday, June 1, 2018

रुक्म जी की व्यंग्य कविताएं भाग-4


भाग-4
मानव – कृत्य

सृष्टि-विनाशक ताप अब बढ़ता जाता नित्य।
नहीं प्रकृति की देन यह, मानव का है कृत्य।।
मानव  का  है  कृत्य  प्रदूषण  जो फैलाता।
पिघल रहे  हिमखंड,  प्रलय वह स्वयं बुलाता।
कहें रुक्म कविराय जलधि की वक्र देखते दृष्टि।
जलप्लावन से जलमग्न करके नष्ट करेगा सृष्टि।।
भ्रूण हत्या

कन्या भ्रूण विनष्ट कर,बनते हैं जो शूर।
दुनिया में उनसे बड़े , और नहीं हैं क्रूर।।
और  नहीं  हैं क्रूर, वक्त ऐसा आयेगा।
वधू बिना ही पुत्र, कुंआरा रह जायेगा ।।
कहें रुक्म कविराय,बचेगी जो भी धन्या।
वह मुंहमांगा ही दहेज, मांगेगी कन्या ।।

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सीख

बॉस  नहीं  हूं  चपरासी, मेरी  बात अगर तुम मानो।
सच कहता हूं, मजा करोगे, सदा नौकरी पक्की जानो।।

क्या कहते हो, पढ़े लिखे हो,इससे क्या होता है भैया ।
डिगरी शहद लगा कर चाटो, यहां न उसका बाबा, मैया।।

जनरल नालिज में माहिर हो, हृष्ट पुष्ट हो, फुर्तीले हो।
साहब यह सब सुन लेंगे तो, कह देंगे ,बुद्धू, ढीले हो।।

देखो, यहां  वही  जम पाता, जो मेरे कहने पर चलता।
जिसने मेरी बात न मानी, चला गया वह आंखें मलता।।
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क्या मिला?

अब नहीं हमको गिला, उनसे रहा,
आदतों से वे बहुत मजबूर हैं।
दिल लगाना दिल्लगी उनके लिए,
हुस्न के गैरत से चकनाचूर हैं।।

जो किये वादे सभी बेकार थे,
यही आदत लीडरों को पड़ गयी।
लग रहा अनजान में या भूल से,
नजर दोनों की कहीं पर लड़ गयी।।

एक से नखरे करें, वादे गजब,
क्या मिला दोनों से हमको सोचिए।
फायदा उनको हुआ, हमको नहीं,
क्या कमी हममें है, किब्लां खोजिए।।

इश्क से अब तक हुआ किसका भला,
लीडरों से क्या मिला सुख-चैन है।
वक्त दोनों कर रहे बरबाद हैं, कुछ सोचिए,
बड़ी मुश्किल से कटे दिन-रैन हैं।।
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गुरु-शिष्य

याद आ रहा हमें जमाना,जब हम छात्र हुआ करते थे,
अपने घर वालों से ज्यादा, अध्यापक जी से डरते थे।।

बेंत हथेली पर पड़ता था, रोते थे पर बुरा न माने।
नहीं ठीक उत्तर दे पाये,गलती हुई यही हम जानें।।

अगर साइकिल से जाते हों,पास दिखें गुरुदेव हमारे।
तुरत उतर पग छू लेते थे,हम भी लगते उनको प्यारे।।

किंतु आज  के  छात्र कहां हैं, जो अध्यापक को गुरु जाने।
ऐसा गजब जमाना आया, शिष्य स्वयं गुरु का गुरु माने।।
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चाह यही है

चाह नहीं मैं बनूं मिनिस्टर घर भरना कहलाऊं,
चाह नहीं झूठे वादे कर, सोने से तोला जाऊं।।

चाह नहीं फिल्मी एक्टर बन, रह रह कूल्हे मटकाऊं,
चाह नहीं धर्मेंद्र बन कर, हेमाओं को फुसलाऊं।।

चाह नहीं चमचा बन कर, व्यर्थ किसी के गुण गाऊं,
चाह नहीं गुंडा बन कर के,चमचम छूरा चमकाऊं।।

चाह  नहीं  माला बन कर  के,  जूड़े में गूंथा जाऊं,
चाह नहीं छप्पन प्रकार के, नित्य-नित्य भोजन पाऊं।।

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समस्या

कितनी सरकारें आयी हैं, किंतु समस्या जस की तस है,
लौटा ले कश्मीर हमारा, लगता नहीं किसी का वश है।।

 बातें  ही  होती  रहती हैं, बातों  से क्या होना जाना।
       लगता कोई नहीं चाहता, जटिल समस्या को सुलझाना।।


कांटा से ही कांटा निकले,जहर जहर से मारा जाता।
 जो विवाद जैसे उलझा हो, वैसे ही सुलझाया जाता।।

                
शांति-वार्ता सिर्फ ढोंग है, नहीं समस्या को सुलझाते।
 पांच साल पूरा होते ही , जिम्मेदारी से हट जाते ।।

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नेता : तब के अब के

पहले जैसे नेताओं के, शायद कभी न दर्शन होंगे।
आजादी पाने की खातिर, कारागार कष्ट जो भोगे।।

महा क्रूर गोरों ने जिनको, काला पानी में था ठूंसा।
भरे गये कोठरियों में वे, जैसे ठूंसा जाता भूसा।।

बीमारी से मरे अनेकों, जिनको दवा नहीं मिल पायी।
उनकी दशा देख कर गोरे, हंसते थे ज्यों  क्रूर कसाई।।

पर अब के नेता यह भूले, उन्हें दिखाई देता पैसा।
जितना चाहो खूब बटोरो,  मौका नहीं मिलेगा ऐसा।।

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जनता अनाड़ी

जितनी बातें होती रहतीं, उतना काम नहीं है होता।
सरकारी दफ्तर का बाबू, फाइल से मुंह ढंक कर सोता।।

काम किये बिन पैसा मिलता, तो शरीर को कौन खटाये।
नींद तुरत खुल जाया करती, रिश्वत मैया जो सहलाये।।

विकसित राष्ट्र बनेगा भारत, इसे ठिठोली वे सब माने।
जैसा चलता, वही चलेगा, वही सत्य है वे सब जानें।।

मंत्री सांसद और विधायक, इन सबको है कुर्सी प्यारी।
तभी शगूफा छोड़ा करते, जिनको जनता लगे अनाड़ी।।
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सट्टेबाजी

थोड़ा उठते थोड़ा गिरते, चलती रहती सट्टेबाजी।
किंतु अचानक लुढ़का देते,ऐसे भी होते हैं पाजी।।

ऐसा होते देखा सबने, कितने थे इतने घबड़ाये।
साठ गुना पाने की खातिर,प्रभु का पूजा पाठ कराये।।

लाखपती से खाकपती हो, कितने रोते हैं पछताते।
फिर से आज गगन को छू ले, ऐसी हैं वे आश लगाते।।

पर भगवान यही कहते हैं, भक्त नहीं लालच में आओ।
जितना भाग लिखा है तेरे, उतने से संतोष मनाओ।।
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समझ रहे हैं हमें अनारी


किस किस पर विश्वास करें अब, किसको समझें परम हितैषी।
संसद  में  भी  घुसे हुए  हैं, घूसखोर, ठग  सांसद  वेशी।।

जहां समर्थन पाने खातिर मोटी रकम वसूली जाती।
ऐसे नीच अधर्मी नेता, कमबख्तों को शर्म न आती।।

एकमात्र संसद बचती थी, जो थी परम पवित्र कहाती।
दुष्टजनों ने किया कलंकित, जिनकी शान से फूले छाती।।

पूरे  कुएं  में  भंग घुली है, हवा  चली है भ्रष्टाचारी।
चोर उचक्के हैं कुछ नेता, समझ रहे जो हमें अनारी।।
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शहर गांव में घुसा


शहर गांव में घुस आया है, फैशन की बलिहारी।
टेरीकाटन  पहन  रही है,  घुरहू की महतारी ।।

मिस्सी नहीं लिपस्टिक आयी, स्नो की है डिबिया।
पहन मैक्सी मटक  रही,  बुधुआ की है बिटिया ।।

ट्रांजिस्टर  लटकाये  कामता,  भैंस चराने जाता।
आल्हा नहीं रफी के स्वर में, फिल्मी गाने गाता।।

पैंट, शर्ट घुसपैठी बन कर, धोती को दुतकारें।
नहीं बैलगाड़ी अब आती, चलतीं बाइक, कारें।।
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अति भक्ति

अधिक भक्ति जो भी दिखलाता, उससे बड़ा चोर न होता।
जो उसके चक्कर में पड़ता, अपना धन दौलत है खोता।।

बड़ा  चतुर  जो  माना है, जम  कर  चूना  उसे लगाता।
जी हां, हां जी बटरिंग करके, जो चाहे सब कुछ पा जाता।।

ज्यादा भक्ति चोर के लक्षण , सही कहावत है कहलाये।
झूठ नहीं यह बिल्कुल सच है,हम इसको हैं खुद अजमाये।।

चोर चोर से खुश रहता है, उसको वह अपना ही जाने।
लेकिन जो सज्जन होता है, उसे सदा दुर्जन ही माने।।
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