http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-5

Tuesday, November 18, 2014

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-5


'तीसरी कसम' के लिए शैलेंद्र को दी सलाह
राजेश त्रिपाठी
 (भाग-5)
      बंबई में रुक्म जी की पहचान मशहूर गीतकार शैलेंद्र से भी हो गयी थी। पहले शैलेंद्र भी हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन की तरह राज कपूर के आर. के. बैनर में मासिक वेतन पर काम करते थे। शुरू में जब स्टार सिस्टम शुरू नहीं हुआ था बड़े-बड़े कलाकार भी प्रोडक्शन कंपनियों के वेतनभोगी कलाकार होते थे। स्टार सिस्टम शुरू होने के बाद कलाकारों का पारिश्रमिक पहले लाखों और अब करोड़ों तक में हो गया है। हसरत जयपुरी (असली नाम इकबाल हुसेन) के आर. के. बैनर में शामिल होने की कहानी भी कुछ अजीब है। हसरत जयपुरी बंबई में बस कंडक्टरी करते थे। शेरो-शायरी करने का शौक था इसलिए मुशायरों आदि में भी हिस्सा लेते रहते थे। ऐसे ही किसी मुशायरें में श्रोता के रूप में पृथ्वीराज कपूर भी मौजूद थे। उन्होंने जब हसरत को सुना तो उनको उनकी शायरी बहुत पसंद आयी। उन्होंने हसरत साहब से कहा कि वे उनके बेटे राज कपूर से मिल लें। राज साहब उन दिनों एक संगीतमय  प्रेम कहानी बरसात बना रहे थे। उन्होंने हसरत जयपुरी को उसके गीत लिखने का भार सौंप दिया। उन्होंने उसका मशहूर गीत जिया बेकरार है, छायी बहार है लिखा और गीतकार के रूप में छा गये। आर. के. बैनर के लिए उन्होंने कई यादगार गीत लिखे। हसरत साहब भी रुक्म जी के अच्छे दोस्तों में थे।
      वापस गीतकार शैलेंद्र की कहानी पर आते हैं। बंबई आते-जाते रुक्म जी की उनसे भी अच्छी पहचान हो गयी थी। एक बार शैलेंद्र जी ने उनसे जिक्र किया कि वे फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी मारे गये गुलफाम उर्फ तीसरी कसम पर फिल्म बना रहे हैं। इस फिल्म का नाम उन्होंने तीसरी कसमरखा है यह भी बताया।
      रुक्म जी ने उनसे पूछा- आप इसमें हीरो किसे रख रहे हैं?’
    शैलेंद्र ने जवाब दिया-राज कपूर साहब को। किसी दूसरे हीरो को देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं। राज साहब के यहां मेरा कुछ वेतन बाकी है, वे उसी पर काम करने को राजी हो गये हैं।
  रुक्म जी ने कहा- क्या कहा, राज साहब को ? वह चाकलेटी हीरो निपट देहाती हीरामन गाड़ीवान के रूप में भला कैसे जंचेगा?’
     शैलेंद्र बोले-मेरे पास और कोई चारा नहीं है।
      रुक्म जी का अगला सवाल था- और हीरोइन।
     शैलेंद्र जी ने जवाब दिया-हीरोइन तो वहीदा रहमान जी हैं। फिल्म नौटंकी में नाचनेवाली हीराबाई पर आधारित है, उसमें नृत्य के दृश्य हैं इसलिए उनसे बेहतर और कोई नजर नहीं आया।
       रुक्म जी ने कहा –शैलेंद्र जी, कुछ भी कीजिएगा लेकिन कहानी में हीरामन शरमा कर जो इस्सस बोलता है उसे जरूर रखिएगा। वह कहानी की जान है।
         शैलेंद्र ने जवाब दिया-अवश्य, मैं आपके सुझाव पर पूरा ध्यान रखूंगा।
          शैलेंद्र ने रुक्म जी के सुझाव को पूरा सम्मान देते हुए हीरामन के इस्सस संवाद को बरकरार रखा। कहना ना होगा कि हीरामन का शरमाना और इस्सस फिल्म के दृश्य को और भी प्रभावी बनाते हैं। फिल्म जब बन गयी तो एक बार रुक्म जी की बंबई यात्रा में खार की बनारसी स्वीट मार्ट दुकान में शैलेंद्र मिल गये। उनके साथ लंबे केशों वाले फणीश्वनाथ रेणु भी थे। रुक्म जी ने रेणु जी को नमस्कार किया तो शैलेंद्र जी ने रेणु जी से बताया-ये रुक्म जी हैं, इन्होंने मुझे सुझाव दिया था कि में हीरामन का संवाद इस्सस फिल्म में अवश्य रखूं और मैंने इनकी राय मानी।
       रेणु जी मुसकराये जैसे कह रहे हों-अच्छा किया। दुर्भाग्य से यह फिल्म नहीं चली और शैलेंद्र असफलता का आघात नहीं झेल पाये और असमय ही इस दुनिया के अलविदा कह  गये। बाद में यह फिल्म न सिर्फ फिल्म समालोचकों में समादृत हुई अपितु इसे राष्ट्रपति का पुरस्कार भी मिला।
     
कलकत्ता में फिल्म 'गंगा जमुना' के प्रीमियर पर रुक्म जी (एकदम दायें) अभिनेता दिलीप कुमार, निर्देशक नितिन बोस व अन्य
अब चूंकि स्क्रीन हिंदी फिल्म साप्ताहिक के संपादक के रूप में रुक्म जी का एक पैर बंबई में ही रहता था तो वहां की फिल्मी दुनिया के ऊंच-नीच पर भी उनकी पैनी नजर रहती थी। स्क्रीन में उस वक्त जब इनवेस्टिगेंटिंग रिपोर्ट या स्कूप का जमाना नहीं था, उन्होंने ऐसी-ऐसी खबरें छापीं जिसने तहलका मचा दिया। इनमें एक मशहूर चरित्र अभिनेता और एक अभिनेत्री की प्रेमकहानी भी थी जिसका उस अभिनेता ने खंडन किया और कहा कि वह अभिनेत्री तो उनकी बेटी के समान है। खबर पक्की थी इसलिए रुक्म जी उसके पक्ष में न सिर्फ खड़े रहे बल्कि उसे प्रमाणित करने के लिए धारावाहिक सचित्र रिपोर्ट छापते रहे। इस पर वह अभिनेता-निर्माता सख्त खफा हो गया। उसने धमकी दी कि वह रुक्म जी को कलकत्ता में उनके दफ्तर में ही गोली से उड़वा देगा।

      यह खबर रुक्म जी को मिली। उनको पता चला कि उस अभिनेता की बनायी एक फिल्म कलकत्ता में रिलीज होने को है जिसमें वही अभिनेत्री उसकी हीरोइन है जिसके बारे में खबर छापने से वह उनकी जान का प्यासा हो गया है। रुक्म जी ने भी कच्ची गोली नहीं खेली थी। इतने दिनों तक बंबई, कलकत्ता की खाक छानने के बाद उनमें भी हर तूफान से मुकाबले का भरपूर जज्बा आ गया था। उन्होंने भी बंबई से लेकर कलकत्ता तक यह खबर पहुंचा दी कि हर उस सिनेमाघर में जहां यह फिल्म प्रदर्शित होने जा रही है, रुक्म जी के लोग रहेंगे और जैसे ही परदे पर उस अभिनेता और अभिनेत्री का दृश्य आयेगा वे लोग परदे पर बम बरसाने लगेंगे। जाहिर है कि यह खबर उस अभिनेता, निर्माता तक भी पहुंची। उसने सुना तो उसकी रूह कांप गयी। यह उसकी अपनी बनायी फिल्म थी और अगर उसके पहले शो में ही इस तरह का हंगामा हो जाये तो कम से कम कलकत्ता में तो फिल्म का पिटना तय था। वह अभिनेता फिल्म के प्रीमियर के लिए कलकत्ता आया हुआ था। बम वाले दर्शकों की खबर पाते ही वह दौड़ा-दौड़ा रुक्म जी के दफ्तर गया और पैर पकड़ कर बोला-मुझसे भूल हुई। मैं आपसे माफी मांगना हूं। आप अपने उन लोगों को हटा लीजिए जो बम लिये सिनेमाघरों में बैठे हैं।
     रुक्म जी ने कहा- तो अब आयी आपको अकल। जाइए, बेखौफ होकर अपनी फिल्म चलाइए, कहीं कोई बम वाला नहीं। यह तो आपकी धमकी के बाद सबक सिखाने का मेरा तरीका था।

      स्क्रीन इतना लोकप्रिय हो गया था कि इसे कालेज के लड़के-लड़कियां ब्लैक में खरीदते थे। इसकी लोकप्रियता से इसके मालिक आर.के. पोद्दार बहुत ही उत्साहित थे, उन्होंने रुक्म जी को पूरी आजादी दे दी थी। सन्मार्ग के प्रबंधक रामअवतार गुप्त जी भी रुक्म जी के स्क्रीन से जुड़े रहने पर कोई एतराज नहीं कर रहे थे क्योंकि रुक्म जी सन्मार्ग के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उसकी कीमत पर स्क्रीन के संपादक की भूमिका कभी नहीं स्वीकार करना चाहते थे। हालांकि पोद्दार जी ने कई बार उनसे कहा कि वे पूरी तरह से स्क्रीन से जुड़ जायें लेकिन वे इसके लिए राजी नहीं  हुए। स्क्रीन की लोकप्रियता का इससे बड़ा और प्रमाण क्या हो सकता है कि बंबई से निकलने वाला एक फिल्म साप्ताहिक उससे प्रभावित हो गया। जब बंबई में स्क्रीन हिंदी पूरी तरह छा गया तो इस साप्ताहिक को बंद कर देना पड़ा। उस वक्त मशहूर अंग्रेजी फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन साप्ताहिक के मालिकों ने इसके नाम पर यह कह कर आपत्ति की थी कि उनके मशहूर ब्रांड का फायदा उठाया जा रहा है। कहते हैं उसके बाद कलकत्ता से निकलनेवाले हिंदी स्क्रीन साप्ताहिक के मास्टहेड के नीचे लिखा जाने लगा इस स्क्रीन का बंबई की स्क्रीन साप्ताहिक से कोई संबंध नहीं यह लिखे जाने के बावजूद स्क्रीन की लोकप्रियता में कोई फर्क नहीं आया। (शेष अगले भाग में)

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