Tuesday, May 17, 2022

जब कलकत्ता की बस में मैं गुंडों से घिर गया

 आत्मकथा-33

जब कलकत्ता की बस में मैं गुंडों से घिर गया

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

भाग-33

ट्रेन बांदा स्टेशन से जितना दूर जा रही थी मेरे दिल में तमाम तरह के विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। मैं अपने घर, अपनी जमीन से तकरीबन एक हजार किलोमीटर दूर जा रहा था। मन में यही सोच रहा था कि बाबा और अम्मा से दूर जा रहा हूं पता नहीं मेरे बाद वे किस तरह से रहेंगे। अपने खेत-खलिहान सब एक-एक कर दिमाग में आ-जा रहे थे। मैं एक नयी अनजानी दुनिया की ओर बढ़ रहा था और पीछे छूट रहे थे मेरे सहपाठी, मेरे मित्र और वह आंगन जहां मैं खेला, बड़ा हुआ। ट्रेन का सफर भी मैं पहली बार ही कर रहा था वह भी इतना लंबा। बचपन में जब मुझे तेज बुखार के दौरान अचानक बेहोशी आ जाती तो मां दुर्गा माता को याद कर हाथ जोड़ कर कहतीं-मोहि पुकारत देर हुई जगदंब विलंब कहां करती हो। अम्मा बताया करतीं कि मां की प्रार्थना शेष होते ही मुझे होश आ जाता और मैं मां कह चिल्ला पड़ता। उस समय अम्मा ने मन्नत मानी थी कि अगर अब मुझे बुखार के वक्त बेहोशी नहीं आयेगी तो वे मुझे मां विंध्यवासिनी के दर्शन कराने मिर्जापुर ले जायेंगी। विंध्यवासिनी देवी की कृपा से तेज बुखार के वक्त आने वाला बेहोशी का दौरा ठीक हो गया। उसके बाद बाबा और अम्मा मुझे विंध्यावासिनी देवी के दर्शन कराने ले गये। वह मेरी पहली लंबी यात्रा थी. तब मैं बैलगाड़ी को छोड़ कर ट्रेन के बारे में नहीं जानता था। अम्मा ही बताती थीं कि जब ट्रेन रुक जाती तो मैं चिल्लाने लगता –हांक,हांक। हमारी तरफ बैलगाड़ी में जुटे बैलों को हांकना पड़ता है।

  अब फिर ट्रन का सफर। जिन सहदेव भैया के साथ  कलकत्ता जा रहा था वे मुझे गुमसुम देख कर बोले-अम्मा, बाबा की याद आ रही है क्या, क्यों चुपचाप बैठे हो।

  मैंने कहा-नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।

  इस पर सहदेव भैया की श्रीमती मोहिनी बोलीं-परेशान मत होना तुम्हारे भैया-भाभी बहुत अच्छे हैं, तुम्हें जान-सा पायेंगे।

 तब तक मानिकपुर स्टेशन आ गया था। सहदेव भैया ने स्टेशन से अंकुरित चने खरीदे। एक दोना मुझे थमा कर एक बच्चियों को दिया एक मोहिनी भाभी को थमा दिया।

मैं बेमन-सा चने चुभलाने लगा।

 मुझे परेशान देख सहदेव भैया ने कलकत्ता के बारे में बताना शुरू किया-जानते हो कलकत्ता बहुत बड़ा शहर है। सैकड़ों किलोमीटर तक फैला है। तुम्हारे गांव जैसे सैकड़ों गांव उसमें समा जायेंगे। शहर में हजारों बसें चलती हैं। दो डिब्बे की एक छोटी ट्रेन भी बिजली से चलती है जिसे वहां ट्राम कहते हैं। बहुत भीड़ है दिन भर शोर-शोर और शोर। वहां बड़े-बड़े कारखाने जूट मिल हैं जिनमें ज्यादातर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के श्रमिक काम करते हैं। कलकत्ता में हुगली नदी यानी गंगा की ही एक धारा पर हावड़ा स्टेशन के पास विश्व प्रसिद्ध हावड़ा पुल है।

 मैं सहदेव भैया की बातें ध्यान से सुन रहा था।हम लोग स्टेशन दर स्टेशन आगे बढ़ते जा रहे थे।

  मैंने सहदेव भैया से पूछा- भैया हम कब तक कलकत्ता पहुंच जायेंगे।

 भैया बोले –अगर रास्ते में ट्रेन लेट ना हुई तो सुबह सुबह पहुंच जायेंगे।

  दिन भर स्टेशन पर स्टेशन गुजरते रहे। रात आयी तो हम सभी अपने-अपने स्लीपर सो गये। मैं लेट तो गया पर ट्रेन की खटर-पटर में नींद तो आना दूर मुझे झपकी तक नहीं आयी और मैं यों ही लेटा रहा।

  सुबह हमारी गाड़ी हावडा स्टेशन पहुंची। मैंने पहली बार इतना बड़ा स्टेशन देखा था। कई ट्रेन लाइने और उन पर खड़ीं तमाम ट्रेनें। कुछ ट्रेनें स्टेशन से छूट रही थीं और कुछ स्टेशन में घुस रही थीं। चारों ओर शोर-शोर और शोर। भीड़ इतनी कि आदमी-आदमी से टकरा जाये। हमारे पास हलका-फुलका सामान था। स्टेशन से बाहर आकर मैं पहली बार एक अजूबे हवाड़ा पुल देखा जिसके नीचे से गंगा की एक धारा हुगली बह रही थी।

  सहदेव भैया ने एक पीली कार पकड़ी उसमें हम लोग बैठ गये। सहदेव भैया ने बताया कि कलकत्ता में इसे टैक्सी कहते हैं।

 करीब आधा घंटे में हम सभी सहदेव भैया के घर पहुंच गये। वे एक ऊंची ब्लिडिंग के छत पर बने घर में रहते थे।थोड़ी देर हम लोग उनके घर में रुके फिर सहदेव भैया पत्नी और बच्चियों को घर पर छोड़ मुझे लेकर भैया-भाभी से मिलाने चल पड़े। झिर-झिर कर बारिश हो रही थी। बारिश की फुहारों में भीगते हुए पैदल ही चल पड़े। सहदेव भैया अरसे से कलकत्ता में रह रहे थे। उनका प्लाईवुड का बिजनेस था। वे कलकत्ता की  हर गली और मोहल्ले से परिचित थे। रास्ते में फर्राटे से दौड़ती कारें, बसें और दूसरे वाहन दिखाई दिये। पहली बार मैं दोतल्ला बस देख कर चौंक गया।

 सहदेव भैया से पूछा-भैया यहां दो तल्ला बसें भी चलती हैं।

भैया बोले-हां, यहां ऐसी बसें भी चलती हैं।

 कलक्त्ता में गगनचुंबी इमारतों, बड़ी-बड़ी दूकानों के बीच से गुजरते हुए लगभग आधे घंटे बाद हम लोग उस कालोनी में पहुंच गये जहां भैया-भाभी एक फ्लैट में रहते थे। हम जब पहुंचे तब भाभी घर में अकेली थीं। भैया सन्मार्ग अखबार में रात ड्यूटी पर थे।

  हमने गांव से चलने से पहले कोई चिट्ठी वगैरह नहीं भेजा था। भाभी सहदेव भैया को पहचानती थीं क्योंकि वे अक्सर उनके यहां आया-जाया करते थे। उनके साथ एक अजनबी युवक को देख उनके चेहरे पर तमाम तरह के प्रश्न उभरने लगे।

  सहदेव भैया ने उनके चेहरे को पढ़ लिया और बोले-पहचानों भाभी यह कौन है।

 भाभी ने मुझे कभी देखा नहीं था। उनके पास मेरा जो फोटो भी था वह बहुत छोटी उम्र का था।

 थोड़ी देर तक मुझे पहचानने की कोशिश करने के बाद वे सहदेव भैया से बोलीं –लाला (हमारी तरफ देवर के लिए यही संबोधन किया जाता है) नहीं पहचान पायी आप ही बता दो।

 सहदेव भैया मुसकराते हुए बोले –हार गयी ना। अरे यह तुम्हारा देवर है रामहित तिवारी जुगरेहली वाला।

 भाभी ने यह सुना तो उनके चेहरे पर एक मुसकान दौड़ गयी।

  मैंने भाभी को चरण स्पर्श किया। उन्होंने पास रखी एक गद्देदार कुर्सी पर बैठने को कहा।

 मैं ज्यों ही कुर्सी पर बैठा कई बार चट-चट की आवाज हुई। मेरी समझ में नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ।

 भाभी बोलीं-देवर जी आते ही मेरी स्प्रिंग वाली कुर्सी तोड़ दी।

 वे मुसकुरा रही थीं। क्रोधित नहीं थीं।

 सहदेव भैया ने कहा अरे यह तो गांव में पहलवानी करता था। कुश्ती लड़ता था और खूब व्यायाम करता था इसीलिए शरीर से मजबूत है।

  भाभी बोलीं –कोई बात नहीं कुर्सी भी पुरानी हो चुकी थी।

भाभी ने चाय बनायी और बिस्किट के साथ मुझे और सहदेव भैया को भी दिया।

 चाय पीकर सहदेव भैया जाने को हुए तो भाभी ने कहा-थोड़ा रुक जाओ तुम्हारे भैया आते ही होंगे।

  सहदेव भैया रुक गये। थोड़ी देर में ही भैया आ गये। मैंने आगे बढ़ कर उनके चरण स्पर्श किये तो उन्होंने कहा-अरे तुम अचानक, अरे चिट्ठी तो भेज देते।

  उत्तर सहदेव भैया ने दिया-अरे यह आना थोड़े चाहता था, अम्मा-बाबा भी तैयार नहीं थे। मैं यह कर लाया हूं कि भैया-भाभी से मिला कर लौटा लाऊंगा।

 भैया ने  कहा-अच्छा किया, जब इसे कुत्ते ने काटा था तो मैं इसे देखने गांव गया था। मैं बोल आया कि थोड़े बड़े हो जाओ फिर मैं तुम्हें कलकत्ता ले जाऊंगा।

 भैया से थोड़ी देर बात कर के सहदेव भैया वापस लौट गये। भैया-भाभी मेरे पहुंचने से बहुत खुश थे। थोड़ी देर में मुझे नाश्ते में मक्खन लगी पावरोटी  दी गयी। पैकेट में बंद रोटी भी मिलती है यह मैं पहली बार देख रहा था।

  जिस कालोनी में भैया-भाबी रहते थे उसमें नौ बिल्डिंगें हैं। हर ब्लिडिंग चार तल्ले की है।

भाभी पास-पड़ोस के लोगों से मेरा परिचय कराने लगीं। भैया-भाभी एकाकी रहते थे उनके घर कोई रिश्तेदार आया है यह सुन कर आस-पास के लोग, महिलाएं देखने आने लगीं। वह दिन लोगों से मिलते-मिलाते बीता।

 शाम को भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म रात ड्यूटी में सन्मार्ग अखबार चले गये।

 *

कलकत्ता में रहते हुए मुझे एक सप्ताह ही बीता था। भैया-भाभी के फ्लैट का नंबर दो था। एक नंबर फ्लैट में एक बंगाली सज्जन चटर्जी बाबू रहते थे। वे एक दिन भाभी से बोले-भाभी तुम्हारा ठाकुरपो (पता चला देवर को बांग्ला भाषा में ठाकुरपो कहते हैं) को काली जी का दर्शन नहीं करायेगा।

 भाभी बोलीं-आप साथ चलिए तो दिखा लाते हैं।

 चटर्जी बाबू बोले-कल चलो।

 दूसरे दिन सुबह ही हम लोग बस में सवार होकर काली जी के मंदिर की ओर चल पड़े। कलकत्ता में यह मेरी पहली बस यात्रा थी। बस में भारी भीड़ थी। चटर्जी बाबू और भाभी आगे की तरफ चढ़ गये। मै पिछले दरवाजे से चढ़ गया। यही गलती हो गयी। कलकत्ता में पहली बस यात्रा वह भी  मैं अपनों से अलग हो गया। वे लोग बस के अगले हिस्से में थे और  भीड़ भरी बस में पिछली ओर रह गया। वहां कुछ शोहदे या कहें गुंड्डे टाइप के आठ-दस लड़के इस तरह खड़े थे कि उनसे पार जाना मुश्किल था। मैं इस बात के लिए घबड़ा रहा था कि पता नहीं भाभी लोग कब उतर जायें  और मैं बस में फंसा रह जाऊं। अनजान शहर, अनजान डगर उनसे ना मिल पाया तो मेरा क्या होगा। उस पर बांग्ला भाषा जो मेरी समझ में नहीं आती।

  कुछ देर बाद भाभी की आवाज सुनाई दी-उतरो, उतरो हमारा स्टापिज आ गया।

 भाभी की आवाज सुन मैंने उन बदमाश लड़कों से कहा जाने दीजिए। वे हंसने लगे और बदमाशी कर के और रास्ता रोक कर खड़े हो गये। वे टस से मस नहीं हो रहे थे और मेरी घबराहट बढ़ती जा रही थी। मुझे यह पता चल गया था कि भाभी और चटर्जी बाबू उतर गये हैं। मैंने अचानक अपने दोनो हाथों को जोरदार झटके के साथ फैलाया और उसके धक्के से वे सभी भरभरा कर इधर उधर हो गये। बस थोड़ी धीमी हुई थी रास्ता पाते ही मैं बस से कूद गया। वे लड़के खिड़की से चिल्लाये-देखे नेबो। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मैं बस की उलटी दिशा में दौड़ पड़ा कि भाभी और चट्रर्जी बाबू पीछे ही बस से उतरे हैं। वे भी मेरे लिए दौड़े आ रहे होंगे।

 वही हुआ जो मैंने सोचा था। मैं दौड़ता चला जा रहा था उधर भाभी और चटर्जी बाबू मेरी ओर दौड़े आ रहे थे।

 जब पास आये तो चटर्जी बाबू बोले-तुम कहां रह गया था।

 मैंने कहा-कुछ गुंडों ने मुझे घेर लिया था। वे बस से उतरने ही नहीं दे रहे थे।

चट्रर्जी बाबू बोले-फिर कैसे उतरा।

मैंने उन लोगों को धक्का मारा तो सभी बस में ही गिर गये और मुझे निकलने की जगह मिल गयी।

 भाभी बोलीं-हम लोग तो बहुत डर गये थे कि तुम इस शहर से एकदम अनजान हो पता नहीं कहां चले जाओगे।

  मैंने चटर्जी बाबू से पूछा- दादा, मेंने जब उन लोगों को गिरा दिया तो उनमें से एक चिल्लाया- देखे नेबो। इसका मतलब क्या है।

 चटर्जी बाबू बोले-तुमको देख लेने का धमकी दिया वो लोग।

मैंने मुसकरा कर कहा-दादा आपके यहां बदला उधार रखा जाता है। हम बुंदलखंडी इसे उधार नहीं रखते। दुश्मन सामने हो तो तत्काल उससे निपट लेते हैं पता नहीं कल मिले ना मिले इसलिए तुरत उचित जवाब दे देना ही उचित है। इस तरह कलकत्ता का मेरा बस यात्रा का पहला अनुभव ही बहुत कड़वा रहा।(क्रमश:)

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अपनों से अपनी बात

अपनी आत्मकथा की तैंतीसवीं किश्त आपसे साझा करते हुए मैं कुछ कहना चाहता हूं। मैं बहुत ही सामान्य व्यक्ति हूं, मैं नहीं मानता कि मैंने कोई ऐसा तीर मारा है कि अपनी कहानी औरों को सुनाऊं। इस उम्मीद से कि लोग इससे प्रेरणा लें। इसे लिखने का सिर्फ और सिर्फ यही उद्देश्य है कि एक व्यक्ति को जीवन में कितना संघर्ष करना पड़ता है वह भी आज के स्वार्थी युग में जहां आपकी बांह थाम आगे बढ़ने में मदद करनेवाले कम आपकी प्रगति की रफ्तार में टांग अड़ाने वाले ज्यादा हैं। मैंने जब इसकी पहली किश्त डाली तो जनसत्ता में मेरे सहकर्मी रहे भाई मांधाता सिंह ने यह कह कर मेरा हौसला बढ़ाया-इसे जारी रखिए आखिरकार आज की पीढ़ी यह तो जाने हम लोगों ने कितना संघर्ष किया  है। सच कहता हूं उनके इस प्रोत्साहन ने ही दशकों बाद यादों के गलियारे में  लौटने का हौसला मुझे दिया। जो कुछ याद रहा उसे ही आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। आप इसे पसंद कर रहे हैं यह मेरे लिए आशीष की तरह है। इसके लिए आपका अंतरतम से आभार।

 

 

 

 

 

Monday, May 9, 2022

जन्मभूमि को प्रणाम,सफर कलकत्ता की ओर

 आत्मकथा-32

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

भाग-32




हमारे गांव से हमारी तहसील बबेरू आठ किलोमीटर दूर थी। जिन दिनों की यह बात है उन दिनों हमारे यहां से बबेरू जाने का कोई संसाधन नहीं था। एक या दो बसें बबेरु और हमारे जनपद बाबा के बीच चलती थीं। ऐसे में पैदल बबेरू तक जाने-आने में जाड़े में तो कोई परेशानी नहीं होती थी लेकिन कभी-कभी गरमी के दिनों में वापस लौटने में हालत खराब हो जाती थी। परीक्षा के दिनों में दोपहर को जब हम वापस लौटते तो अप्रैल-मई की तपती सड़कें और गरम हवा के थपेड़े हालत पस्त कर देते। बीच-बीच में पेड़ों के नीचे बैठ कर सुस्ताना पड़ता था। दोपहर को जब तीखी धूप और गरमी अपने चरम पर होती तो हमें चिलचिलाती गरमी दिखाई देती। नजरों से दूर गरमी की लहरें स्पष्ट चिल-चिल करती दिखाई देती थीं। शायद इसी से रेगिस्तानी इलाकों में मृगतृष्णा की सृष्टि होती होगी जिसे पानी समझ मृग उसके पीछे तब तक भागता रहता  है जब तक प्यास और थकान से थक कर दम नहीं तोड़ देता। गरमी के ये दिन हम पर बहुत भारी गुजरते थे। माता-पिता सलाह देते थे कि लू से बचने के लिए सफेद प्याज पास में जरूर रखा करो। वह कहते थे कि प्याज लू से बचाती है।
 हम उन दिनों चार बजे उठ जाते थे क्योंकि पहले अखाड़े में कसरत करते फिर थोड़ा सुस्ता कर नहाते-नहाते कालेज का वक्त हो जाता। गांव के हम सभी लड़के साथ जाते थे, बातें करते चले जाते थे तो आठ किलोमीटर का फासला कब तय हुआ पता तक नहीं चलता था।

  गरमी के मौसम में एक खतरा और रहता था ओले पड़ने का। एक बार मैं इसकी चपेट में आ गया था। पिताजी ने बताया था कि चैत-बैसाख के मौसम में अगर भूरे-भूरे बादल घिर आये हों और बादल जांत के चलने की घुरर-घुरर आवाज लगातार करने लगें तो सावधान हो जाना चाहिए यह ओले पड़ने का संकेत है। एक बार जब मैं कालेज से वापस घर लौट रहा था तो भूरे बादल घिरे थे और बादल घुरर-घुरर की आवाज में लगातार गरजे जा रहे थे। मैं डर गया कि इस वक्त कहीं ओले पड़ने लगे तो मैं क्या करूंगा, कहां छिपूंगा। मेरी यह आशंका थोड़ी देर में ही सही साबित हो गयी। अचानक बड़े-बड़े ओले पड़ने लगे। मेरे पास छाता भी नहीं था कि मैं ओलों से अपनी रक्षा कर पाता। मेरे पास तेज दौड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं था। मैं दौड़ता रहा और बायीं तरफ के गाल में  तड़ातड़ ओले गोली  की तरह पड़ते रहे। मैं जितना तेज दौड़ सकता था दौड़ा और गांव के बाहर बने खलिहान के पास पहुंचा जहां लोग झोपड़ी बना कर वहां रहते हैं और मंडाई के पहले वहां रखी फसल की रखवाली करते हैं। उन लोगों ने देखा कि मेरा उस तरफ का गाल सूज गया था जिधर से ओले पड़े थे। उन लोगों ने मुझे तब तक बिठाये रखा जब तक ओले पड़ते रहे। ओले थमे तो मैं घर वापस आया। मां ने मेरी हालत देखी तो नमक डाल कर पानी गरम किया और मेरे फूले हुए गाल की सिंकाई की तब कहीं मेरा दर्द कम हुआ। दो-तीन दिन में तकलीफ ठीक हो गयी।

*

अब उस घटना में आते हैं जिसने मेरे जीवन की दशा दिशा दोनों बदल दी। गरमी के दिन थे। कड़ाके की धूप और लू का मौसम था। सब कुछ सामान्य था कि तभी अचानक एक दोपहर को वह हादसा हो गया जो पूरे गांव को रुला गया। हमारे घर के पीछे भरोसा यादव का घर था उसके बाद रघुराज यादव का घर था जिससे लगे चबूतरे पर नीम का एक बड़ा पेड़ था। गांव के बाहर वाले अखाड़े में मुझे ब्रह्मदेव द्वारा उठा कर पटक देने की घटना के बाद से हम लोग इसी चबूतरे पर दंड, बैठक करने लगे थे। जिस दोपहर की यह भयानक, दर्दनाक घटना है उस दिन पश्चिम की ओर से हवा क्या आंधी चल रही थी। रघुराज यादव का घर गांव का आखिरी घर था। सब कुछ सामान्य था अचानक दोपहर बाद खबर आयी कि रघुराज यादव के घर में आग लग गयी है। पश्चिम की ओर से चलती आंधी के चलते कुछ देर में ही आग ने भयानक रूप ले लिया एक तरह से पूरा घर उसकी चपेट में आ गया। सारे गांव में हाहाकार मच गया। जिसे जो मिला बाल्टी, घड़ा उसे लेकर कुएं की ओर दौड़ा और अपनी तरफ से आग बुझाने की कोशिश करने लगा लेकिन पल-पल प्रचंड हो रही आग में वह पानी ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा था।जब कोई चारा नहीं चला तो लोगों ने देवी, देवताओं का नाम लेकर आग पर नारियल, बतासे फेंकने शुरू कर दिये। लोगों ने देखा कि आग के प्रचंड जोर से कई नारियल वापस लौट आये। आग का ताप इतना बढ़ता जा रहा था कि लोगों का वहां खड़ा होना मुश्किल हो रहा था। रघुराज यादव के घर आग लगी है यह खबर उस छोटे से गांव में जल्द ही फैल गयी। सारा गांव दौड़ा आया और जिससे जो बन पड़ा मदद करने लगा लेकिन आग थी कि पल-पल और प्रचंड होती जा रही थी। खबर पाकर हमारे अमरनाथ भैया के पिता जी हमारे श्रद्धेय काशीप्रसाद काका जी भी आ गये थे और हमारे घर के सामने रामलाल कुर्मी के घर के सामने वाले कमरे में बैठे थे। आग लगने के बाद लोगों को याद आया कि रघुराज यादव की बिटिया और उनका बेटा दोनों बच्चे कहीं नहीं दिख रहे। उन लोगों की खोज शुरू की गयी। जितने मुंह उतनी बातें। किसी ने कहा उन दोनो को तालाब की ओर जाते देखा है। गांव का बड़ा तालाब गांव के प्रवेश द्वार की ओर पूर्व दिशा पर है। लोग उधर दौड़ पड़े, किसी ने कहां उन्हें अमुक जगह देखा है। लोगों ने चारों ओर खोज लिया पर बच्चे नहीं मिले। इधर हमारे काशीप्रसाद काका को भी किसी ने बता दिया कि रघुराज यादव के दो बच्चे नहीं मिल रहे। काका भी रोने लगे, वे बच्चों के लिए बेचैन हो गये। उन्हें संभालने के लिए मैं उनके पास ही बैठा था। मैंने उन्हें ढांढस बंधाया- काका,बच्चे मिल जायेंगे। लोग खोज रहे हैं। उन्होंने कहा बच्चे मिलने की खबर मिले तो मुझे तुरत बताना। मैंने देखा कि वे दुख से कांप रहे थे। इसी बीच जब आग थोड़ी धीमी हुई तो किसी ने सुझाव दिया कि घर के भीतर भी देख लिया जाये कि कहीं बच्चे वहां ना फंस गये हों। लोगों का सुझाव मान कर बचते बचाते लोग अंदर गये तो थोड़ी देर की खोजबीन के बाद दोनो बच्चे आनाज  रखने के मिट्टी से बने कोठलों के बीच एक –दूसरे से चिपके हुए मृत पाये गये। दोनों बच्चे छह.सात साल की उम्र के रहे होंगे। जब आग लगी तो डर के मारे वे भीतर की ओर भागे और फिर आग से ऐसे घिर गये कि बाहर निकल नहीं पाये। आग के प्रचंड ताप और धुएं से दम घुटने के कारण उनकी मौत हो गयी। बच्चों के शव बाहर आये तो सब दहाड़ें मार कर रोने लगे। काशीप्रसाद काका बराबर बच्चों के बारे में पूछे जा रहे थे। मैं उनसे सच्चाई बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मैंने उनसे झूठ बोल दिया- लोग खोज रहे हैं मिल जायेंगे आप चलिए आपको आपके बैठके तक छोड़ आता हूं आप यहां कब से परेशान हो रहे हैं।

काका ने मेरी बात मान ली मैं उन्हें उनके बैठके तक छोड़ आया और घर के लोगों को उनका ध्यान रखने के लिए बोल दिया। उन्हें छोड़ कर वापस लौटा तो देखा कि कुछ देर पहले थोड़ा काबू में आयी आग फिर जोरों से धधक उठी है। रघुराज भैया के घर के ठीक बाद भरोसा यादव का घर था और उससे लगा हुआ हमारा घर था। रघुराज यादव के घर से उड़ा आग का कोई गोला भरोसा यादव के घर गिरा तो उसका छप्पर भी जलने लगा। आनन-फानन में लोगों ने उसे बुझाया और उसका छप्पर खोल दिया वरना उससे होती हुई आग हमारे घर को भी चपेट में ले लेती। रघुराज यादव के घर में रोना-धोना लगा था। जिसके घर के दो बच्चे पल भर में उनसे छिन गये हों उनके दुख की कोई सीमा नहीं थी। इस घटना ने पूरे गांव को रुला दिया। चारों ओर बस एक ही चर्चा थी कि लोगों ने गलत जानकारी ना दी होती तो शायद बच्चों को बचा लिया गया होता। लोग अलग-अलग ठिकानों में उन बच्चों के होने की खबर देते रहे और घर-परिवार के लोग वहां-वहां खोजने में उलझे रहे और बच्चे घर के अंदर ही छिपे थे। इस घटना के बाद से पूरे गांव में मरघट का-सा सन्नाटा छा गया।

 गरमी के दिन थे हम लोग रात को आंगन में सोते थे। रात को जब भी कभी आंख खुलती तो रघुराज यादव के घर की ओर देखा नहीं जा रहा था। उघड़ा हुआ छप्पड़ और जला हुआ घर उस दिन की भयावह घटना की याद दिला देते। बाद में सुना गया कि आग अपने आप नहीं लगी किसी ने लगायी थी पर किसने लगायी .यह जाहिर नहीं हो पाया।

   उस दिन से पूरा गांव उदास और दुख में डूबा रहने लगा। मुझे भी जब कभी उस घटना की याद आती तो दिल दहल जाता था। रघुराज यादव के घर-परिवार वालों के तो रोते-रोते आंसू सूख गये थे।

 इन्हीं दिनों एक ऐसी घटना हुई जिसने मेरी दशा-दिशा बदलने में बड़ी भूमिका निभायी। हमारे गांव से पश्चिम एक मील दूर बसे आलमपुर गांव के सहदेव साहू अचानक एक दिन हमारे घर आये। वे कलकत्ता में रहते थे और मेरे भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म से भलीभांति परिचित थे। वे आये उन्होंने मेरे बाबा और अम्मा को प्रणाम किया और उनको भैया की खबर सुनाने लगे। भैया की बात बताने के बाद वे अचानक मेरी अम्मा से बोले- दादू (मेरे लिए) तो अब बड़ा हो गया है। मैं वापस लौट रहा हूं इसे भेज दीजिए ना अपने भैया-भाभी से मिल लेगा।यहां बताते चलें हमारी तरफ बच्चों को प्यार से दादू कहते हैं।

 उनकी बात सुनते ही अम्मा सन्न रह गयी। एकमात्र बेटा उसे भी नजरों से दूर कर दें। कोसों दूर भेज दें।

  अम्मा ने साफ मना कर दिया-नहीं भैया।हम दोनों का यही तो एक आसरा है उसे दूर भेज दें तो हमें कौन देखेगा।

 सहदेव साहू ने कहा-मैं कौन कहता हूं कि यह वह रह जाये। भैया, भाभी से मिल लेगा, कुछ दिन रह लेगा फिर जब मैं अपने गांव आलमपुर लौटूंगा तो तुम्हारे दादू को भी लेता आऊंगा।

 अम्मा ने मेरे बाबा से पूछा। उन्हें बहुत दिनों से भैया की चिट्ठी नहीं मिली थी वे परेशान थे वे भारी मन से बोले- हो आने दो, हमारे साथ तो सारे पड़ोसी, गांव वाले हैं।

 मेरा कलकत्ता जाना तय हो गया। सहदेव साहू यह कह कर अपने गांव आलमपुर लौट गये कि-कल तैयार रहना, कल ही हम कलकत्ता के लिए रवाना होंगे।

  दूसरे दिन तय समय में सहदेव साहू आ गये अपने परिवार के साथ। उनकी पत्नी मोहिनी और दो बच्चियां बिट्टू और मिट्ठू साथ थीं दोनों काफी छोटी थीं।

 मां ने रोते हुए मुझे किया। मैंने अम्मा और बाबा के चरण छुए और सहदेव साहू जी के साथ अपने डाननरिया के पास वाले खेतों के पास से बबेरू से बांदा जानेवाली बस पकड़ ली। हमारे गांव से बीस किलोमीटर दूर बांदा पहुंच कर हमने कलकत्ता के हावडा स्टेशन की ओर जाने वाली गाड़ी पकड़ ली जो हमें लेकर कलकत्ता की ओर दौड़ पड़ी। जन्मभूमि को प्रणाम,सफर कलकत्ता की ओर। (क्रमश:)

 

 

 

 

 

Wednesday, April 27, 2022

‘तस्वीरें बोलती हैं’ बाबा की कही यह बात सच निकली

 आत्मकथा-31

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

 राजेश त्रिपाठी

भाग-31

मेरे बाबा ने बांदा में रहते हुए कनाल सेक्सन में अंग्रेज ओवरसियर के सहायक के रूप में काम किया था। वे अक्सर उनन दिनों के किस्से हम लोगों को सुनाया करते थे। उनके पास ऐसे-ऐसे अनुभव थे जो हमारे घर के सामने की डगर से दूसरे गांव जानेवाले लोग भी कुछ पल के लिए उनके पास बैठ कर अंग्रेजों के जमाने के किस्से सुनते थे। बाबा कहा करते थे कि अंग्रेजों ने भले ही हमारे देश में कब्जा कर शासन किया हो लेकिन उनका शासन बहुत अच्छा था। वे मिसाल दिया करते थे कि उस वक्त कोई खुलेआम सोना ले जाये तो भी उसे डर नहीं लगता था क्योंकि उन दिनों कोई चोरी-चकारी करने की हिम्मत तक नहीं कर पाता था।

 बाबा बताते थे कि उन दिनों लाल टोपी वाला पुलिसवाला अगर गांव में  घूम जाये तो दरवाजे बंद हो जाते थे। सन्नाटा खिंच जाता था। वे बताते हैं कि एक बार उनके किसी परिचित सेठ ने अंग्रेज ओवरसियर के पास फल भेंट में भेजे। बाबा अंग्रेज अफसर को फल का टोकरा दे आये और बताया कि सेठ जी ने उनके लिए भेजा है। इस पर अंग्रेज ओवरसियर ने बाबा से कहा- सेठ जी को कह दीजिएगा थैक्यू, धन्यवाद, शक्रिया।

 अब लौटने तक पिता जी को थैंक्यू, धन्यवाद तो याद रहा पर वे तीसरा शब्द भूल गये।

उन्होंने सेठ जी से दो शब्द तो बता दिये पर तीसरा नहीं बता पाये।

सेठ जी ने पूछा- पंडित जी साहब कुछ और बोले।

बाबा बोले- क्या कहूं सेठ जी कुछ और कहे थे पर मैं जानता हूं और वह जानते हैं पर कह नहीं पा रहा, अभी याद नहीं आ रहा।

 दूसरे दिन बाबा जब ड्यूटी से लौट कर आये तो तपाक से सेठ जी से बोले-सेठ जी याद आ गया, साहब ने कहा था-शुक्रिया।

 सेठ जी उनकी बात सुन कर हंस दिये और बोले-आप भी पंडित जी।

  बाबा हमें भी बांदा में उनके साथ घटी रोचक घटनाएं सुनाते थे। उन्होंने एक बार बताया कि नहर की खुदाई चल रही थी। मजदूर लोग खुदाई कर रहे थे। उन्हें नहर में जहां खुदाई करनी थी वहां एक जंगली भैंसा बैठा था। मजदूर उसे हटाने जाते तो वहा फूं-फां कर के और नथुने बजा कर उन्हें डरा देता था। जब मजदूर तमाम तरह से कोशिश कर हार गये तो उन्होंने ओवरसियर के सहायक मेरे बाबा से कहा-पंडित जी अपने साहब को बुलाइए नहीं तो इस भैंसे के चलते काम नहीं हो पायेगा। बाबा जाकर ओवरसियर को बुला लाये। बाबा ने उस दिन की घटना के बारे में बाताया कि साहब ओवरकोट पहले हुए थे उसकी एक जेब से उन्होंने एकदम छोटा जेबी कुत्ता निकाला, रूमाल से कुत्ते का मुंह पोंछा और भैंसे की ओर दिखा कर सीटी बजा दी। वह जेबी कुत्ता तेजी से दौड़ा और भैंसे की गरदन से चिपक गया।  भैसा दर्द के मारे छटपटाने और गरदन जोर-जोर से हिला कर कुत्ते से मुक्त होने की कोशिश करने लगा लेकिन नाकाम रहा। वह नहर से काफी दूर निकल गया जेबी कुत्ता अब तक उसकी गरदान से चिपका था। जब साहब ने देखा कि भैंसा काफी दूर निकल गया है तो उन्होंने फिर एक सीटी बजायी। सीटी सुनते ही जेबी कुत्ता भैंसे को छोड़ दौड़ता हुआ आया और उछल कर साहब की गोद में बैठ गया। साहब ने फिर उसका मुंह रूमाल से पोंछा और ओवरकोट की जेब में डाल कर घोड़े पर सवार हो वापस लौट गये।

*

मेरे बाबा (पिता जी) शहर बांदा की ऐसी-ऐसी बातें सुनाते थे जिनसे हम लोग बिल्कुल अनजान थे। उन्होंने हमें फिल्मों के बारे में बताया कि पहले अनबोली (बाद में हमने इस अवाक फिल्म के रूप में जाना) फिल्मों के बारे में बताया कि फिल्मी तस्वीरें बोल नहीं पाती थीं उनकी बात कोई और बोलता था जो चलते हुई तस्वीरों के साथ-साथ सुनाई देता था। बाद में फिल्में बोलने लगीं (बाद में हम इन्हें बोलती या सवाक फिल्मों के रूप में जाना)। इसके साथ ही उन्होंने जोड़ा कि चलती फिरती तस्वीरें बोलने लगीं आम आदमी की तरह दौड़ने लगीं।

  इसी मोड़ पर हमने आपत्ति की पहले तो हमें जेबी कुत्ते पर विश्वास नहीं हुआ था अब बाबा ने नयी गप हांक दी कि तस्वीरें,चलती-फिरती और बोलती हैं ठीक आम आदमी की तरह। हमने कहा-बाबा अब तो आपने हद कर दी भला कभी तस्वीरें बोल सकती हैं।

 बाबा कुछ बोले नहीं लेकिन दूसरे दिन जब भैया अमरनाथ उनसे मिलने आये तो बाबा बोले-दादू मेरा एक काम करो। अपने इस भाई और बाबूलाल  को बांदा ले जाओ इन्हें सिनेमा दिखा लाओ इनको विश्वास ही नहीं होता कि तस्वीरें बोलती हैं।

भैया अमरनाथ ने हामी भर ली और कहा बांदा में एक बड़ा सरकस चल रहा है वह भी दिखा दूंगा।

 मेरे मुंह से निकला-भैया सरकस।

भैया बोले-हां,तुम लोग रात को देखते नहीं एक घूमती लाइट यहां तक दिखाई देती है।

मैंने कहा-वह सरकस की लाइट है हम तो उसे भुतहा प्रकाश मान कर डर रहे थे।

 हमारा कोई कसूर नहीं था। हमारा जनपद नगर बांदा बीस किलोमीटर दूर था। वहां जाना नहीं हो पाता था इसलिए सिनेमाघर के बारे में हमें कोई जानकारी नहीं थी फिर हम कैसे विश्वास कर लेते कि तस्वीरें आम आदमी की तरह दौड़ती-बोलती हैं।

दूसरे दिन भैया अमरनाथ मुझे और मेरे सहपाठी बाबूलाल यादव (अब सेवा निवृत जज) के साथ लेकर बांदा गये। तय यह हुआ कि पहले हम सरकस देख लेते हैं उसके बाद सिनेमा देख लेंगे।

 सरकस के पंडाल में घुसते ही अपनी जान सूख गयी। आज तक जिन शेरों को केवल चित्रों के रूप में देखा था वे ना सिर्फ पूरी तरह सजीव सामने खांचे में थे अपितु गरज भी रहे थे। किसी तरह कुर्सी में मैं और बाबूलाल दुबक कर बैठे रहे। भैया अमरनाथ आराम से बैठे थे क्योंकि यह सब वे कई बार देख चुके थे।

 सरकस के कलाकार झूले पर तरह-तरह की कलाबाजियां दिखाईं, जोकर अपनी हरकतों से हंसाते रहे। जब शेर रिंग पर आये तो हम और दुबक गये। हमें यही लग रहा था कि अगर इन शेरों का मन बदल गया तो रिंग पार कर दर्शकों तक आने में इन्हें देर नहीं लगेगी। हमारे पास कोई चारा नहीं था। हम शहर से अनजान थे पंडाल से भागें भी तो कहां जायेंगे। मन मार कर बैठे रहने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

  खैर सरकस खत्म हुआ और हम अब सिनेमाघर की ओर बढ़े। याद आ रहा है वह सिनेमाघर इंदिरा टाकीज था। हम उस अंधेरे हाल में घुसे उस वक्त समाचार दिखाये जा रहे थे। (बाद में जाना कि वह फिल्म्स डिवीजन के समाचार होते थे) उसमें जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कोई समाचार दिखाया जा रहा था जिननका कुछ अरसा पहले निधन हो चुका था। यह सचमुच हमारे लिए ताज्जुब की बात थी कि नेहरू जी कब के गुजर गये फिर यहां चल फिर रहे हैं, बोल रहे हैं।

 खैर थोड़ी देर बाद फिल्म शुरू हुई। बाबा की कही सारी बातें सच निकलीं। सचमुच तस्वीरें बोल रही थीं, गां रही थीं साइकिल चला रही थीं। बाद में जब फिल्मों के बारे में जाना-समझा तो पता चला कि जीवन की जो पहली फिल्म हमने बांदा में देखी थी उसका नाम सीमा था। इसकी हीरोइन नूतन थी जिसने फिल्म में एक चोरनी की भूमिका निभायी थी। बलराज साहिनी जेलर की भूमिका में थे। हमें कहानी से कुछ लेना-देना नहीं था हम तो अपने बाबा को झूठा  साबित करने आये थे। मगर हमें यकीन हो गया कि बाबा ने ठीक कहा था। सीमा फिल्म में यों तो कई गाने थे लेकिन तू प्यार का सागर है तेरी एक बूंद के प्यासे हम लौटा जो दिया तुमने चले जायेंगे जहां से हम दूसरा गाना था-मनमोहना बड़े झूठे हमसे ही प्रीति करी हमसे ही रूठे

 हम बांदा से संतुष्ट होकर लौटे कि बाबा ने  जो कहा सच कहा था। हमें फिल्म और सरकस देखने का जिंदगी में पहला अनुभव भी हुआ। (क्रमश:)

Wednesday, April 20, 2022

दिवारी सीखते वक्त जब मैं उंगली तोड़ बैठा

 आत्मकथा-30

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

भाग-30

पहले की किस्त में बता चुका हूं कि मेरे पिता मंगलप्रसाद तिवारी बहुत ही साहसी थे। वे किसी से डरते नहीं थे। छह फुट का गठीला बदन। एक साथ सात जनों से मुकाबला कर उन्हें हरा देने की कूवत। उनमें एक और गुण भी था वे किसी का भी कष्ट सुनते तो मदद के लिए दौड़े जाते थे। अपनी इसी आदत के चलते एक बार वे कानूनी पचड़े में फंसते बचे।

  हुआ यह कि रात हमारे घर के पीछे एक घर छोड़ कर गंगवा नाम का एक व्यक्ति रहता था। जिस घटना का मैं जिक्र कर रहा हूं वह मेरे गांव की है पर मेरे जन्म से पहले की। एक रात कहीं से आये कुछ बदमाशों ने उस पर भाले से हमला कर दिया। भाला उसके गले में लगा था और वह मदद के लिए चिल्ला रहा था। दर्द के मारे उससे बोला ना जा रहा था और वह कटे-कटे स्वर में कराहते हुए मदद के लिए पुकार रहा था। मदद के लिए कोई ना आ सका क्योंकि बदमाशों ने पूरे मोहल्ले के दरवाजों की सांकल बाहर से बंद कर दी थी। संयोग से वे हमारे घर की शांकल बाहर से लगाना भूल गये थे। पिता जी ने दरवाजा खोला और गंगवा के घर की ओर दौड़े वह दर्द से कराह और छटपटा रहा था। मेरे पिता जी ने आसपास के कुछ लोगों की बाहर से लगी शांकल खोली और उन लोगों की मदद से गंगवा को बैलगाड़ी में लाद कर बबेरू के सरकारी अस्पताल ले जाया गया जहां उसकी जान बच गयी। अब इस घटना की शिकायत गांव के चौकीदार ने बबेरू थाने में दर्ज करा दी। दूसरे दिन थानेदार तहकीकात करने आये तो वहां मेरे पिता जी भी पहुंच गये।

 थानेदार ने वहां जुटे लोगों से पूछा-जब हमला हुआ तो सबसे पहले यहां कौन आया था।

 पिता जी ने बड़ी बहादुरी दिखाते हुए कहा-साहब सबसे पहले मैं आया था।

थानेदार बोले- आपका नाम ।

पिता जी ने कहा-जी मंगलप्रसाद तिवारी।

थानेदार-आप ही क्यों आये बाकी लोग तो नहीं आये।

पिता जी-साहब हमला करनेवालों ने सभी के दरवाजों की शांकल बाहर से बंद कर दी थी। हमारे घर की शांकल बंद करना भूल गये थे। गंगवा के चिल्लाने की आवाज सुनी तो मैं दौड़ा आया।

 इस पर थानेदार उनको एक तरफ ले गये और बोले-पंडित जी ऐसा मत किया कीजिए। अब अगर मैं चश्मदीद गवाह के रूप में आपका नाम लिख लूं तो आप कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते-काटते परेशान हो जायेंगे। अब से यह गांठ बांध लीजिए कि ऐसी किसी वारदात में दौड़े-दौड़े नहीं आयेंगे और आ भी गये तो उत्साह में बताने ना बैठ जाइएगा।

 पिता जी ने कहा-जी साहब गलती हुई अब ऐसा नहीं होगा।

वह भगवान का धन्यवाद कर रहे थे कि बेवजह कानून के पच़ड़े में फंसने से बच गये। थानेदार अच्छे थे वरना अगर उनको चश्मदीद गवाह के रूप में लिख लेते तो अदालत के चक्कर लगाते वे परेशान हो जाते।

  जो भी हो इतना अवश्य था कि गंगवा को किसी से पता चल गया था कि अगर मंगलप्रसाद तिवारी ना आते तो शायद वह जिंदा ना बच पाता। जो बदमाश उसे मारने आये थे उन्होंने आसपास के घरों के दरवाजों की शांकल बाहर से बंद कर दी थी। केवल भूल से मंगलप्रसाद तिवारी के घर की शांकल लगाना वे भूल गये थे। अगर तिवारी बाबा नहीं आते तो गंगवा का बच पाना मुश्किल था। उसके बाद से गंगवा पिता जी को बहुत मानने लगा था।

*



हमारे बुंदेलखंड में चैत्र नवरात्रि का पर्व भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। सभी देवी मंदिरों नौ दिन तक श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। कुछ लोग घर में जवारा बोकर मां की आराधना करते हैं। हमारे यहां एक व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी छाती पर मिट्टी का पात्र रख कर जवारा बोकर मां की आराधना की। उनकी तपस्या बड़ी कड़ी थी। उन्हें नौ दिन बिना हिले-डुले लेटे रहना पड़ा। नौरात्रि में हमारी तरफ सांग लेने की प्रथा थी।इसमें एक गुरु होते थे जो बड़ों से लेकर युवाओं को सांग लगा देते थे। लांग लगाते वक्त वे देवी के हवन की विभूति लगा कर सांग गाल या शरीर के दूसरे किसी संग को छेद कर लगा देते और उसकी नोंक के बाहरी छोर पर एक नीबू लगा देते थे। जिसे सांग लगायी जाती उसे ना दर्द होता ना खून निकलता वह घंटों सांग को लगाये पूरे गांव में झूमता कूदता रहता। बाद में शाम को जब सांग निकाली जाती तो ना खून निकलता ना ही घाव में कोई सूजन होती। यह कैसे होता था ईश्वर जाने। जो सांगें लगायी जाती थीं उनमें कुछ तो 20-25 किलो तक भारी होती थी। वे खुले आसमान के नीची किसी पीपल के पेड़ के पास देवी चौरा में गड़ी रहती थीं। पूरी बारिश का पानी यह झेलती थीं। इनमें जंग लगी होती थी पर सांग लेने वाले किसी व्यक्ति को हमने टिटनिस से मरते नहीं देखा। जब वे सांग लिये रहते थे उन पर एक आवेश सा छाया रहता था। वहीं एक व्यक्ति था जो मिट्टी के खप्पर में आग जला कर उसमें लोहे के गोले खूब गरम कर लेता फिर उन्हें हाथ में लेकर करतब दिखाता। उसके हाथ पर ना छाले पड़ते ना ही उसे कोई तकलीफ होती। यह कैसे होता था आज तक नहीं समझ पाया। बस मां दुर्गा का ही कोई प्रभाव मान कर संतोष कर लिया।

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दिवारी नृत्य
हमारे बुंदेलखंड की लोक परंपराएं और लोक संस्कृति अन्य जगहों से भिन्न हैं और यही उसे एक अलग पहचान देती हैं। हालांकि बदलती सामाजिक स्थितियों और विषम परिस्थितियों में धीरे-धीरे यह कम होने लगी हैं लेकिन अब भी अस्तित्व में हैं। ऐसी ही एक परम्परा है दिवारी और मौनिया व्रत। इसे मौन चराना भी कहते हैं। दिवारी नृत्य इतना जोशीला होता है कि जब ढोल की धमक में दिवारी नृत्य करने वाले नर्तकों के पैर थिरकते हैं तो देखनेवालों में भी जोश भर जाता है। नर्तक लाठियों से लड़ाई का ऐसा दृश्य उपस्थित करते हैं जिसे देख सभी दंग रह जाते हैं। इसमें ज्यादातर अहीर अर्थात यादव कुल के लोग भाग लेते हैं। मेरे अपने गांव में भी मेरे यादव सहपाठी बड़े शान से दिवारी का प्रदर्शन करते थे। एक बार मेरी भी इच्छा हुई कि मैं भी दिवारी सीखूं। साथियों ने मना किया कि चोट खा जाओगे पर मुझमें तो दिवारी सीखने का जुनून सवार था। फिर क्या था लाठी लेकर कूद पड़े अभ्यास करने। हम नौसिखुआ और हमारे सामने कुशल दिवारी कलाकार। वही हुआ जो होना था। मैंने लाठी के दो तीन वार किसी तरह बचाये पर चौथा वार इतनी जोर से उंगली पर लगा कि मेरी लाठी ही गिर गयी। मैं उंगली दबा कर बैठ गया। मेरे सहपाठी और मित्र बाबूलाल यादव ने कहा –मना किया था ना कि तुमसे नहीं होगा।

मौनिया
मेरा दिवारी कलाकार होनेका जुनून धरा का धरा रह गया। सच कहता हूं दिवारी नृत्य इतना जोशीला होता है कि देखनेवालों के पैर तक थिरकने लगते हैं।

दीपावली के आसपास ही मौनिया व्रत भी होता है। इसे मैं भलीभांति इसलिए जानता हूं कि हमारे गांव के मौनियों के गुरु मेरे बाबा यानी पिता जी ही थे।  मौनिया कौड़ियों से गुंथे लाल, पीले रंग के जांघिये और लाल पीले रंग की कुर्ती या बनियान पहनते हैं, जिस पर झूमर लगी होती है। कमर में घंटियां बांधे रहते हैं। हाथों में मोर पंख का गुच्छा एक लाठी होती है। सुबह से इनका मौन व्रत प्रारंभ होकर शाम को पूरा होता है। इस दौरान इन्हें कम से कम पांच गांवों की सीमा का स्पर्श करना पड़ता है। पूरे  दिन मौन रहना इस व्रत की सबसे महत्वपूर्ण और कड़ी शर्त होती है। अगर भूल से किसी का मौन व्रत भंग हो गया तो गोबर और गोमूत्र मिला कर उसे शुद्ध कराया जाता है।

यह पर्व चरवाहा संस्कृति से जुड़ा है। दीपावली के दूसरे दिन गायों को नहला कर रंग-बिरंगे रंगों से उन्हें सजाया जाता था और उनकी पूजा की जाती थी। कुछ लोग इस पर्व को भगवान कृष्ण से भी जोड़ते हैं क्योंकि वे यदुवंश भूषण और सच्चे गोपालक कहलाते हैं।

दिवारी का चलन  बुंदेलखंड में कब शुरू हुआ यह पता नहीं लेकिन कुछ लोग इसका चलन 10वीं सदी से प्रारंभ हुआ मानते हैं।

दीपावली जिसे हमारी बुंदेली भाषा में दिवारी कहते हैं उस दिन यानी अमावस्या की रात को पिता जी अपने शिष्यों के साथ सांप के काटने के उपचार के मंत्र का आधी रात के बाद पाठ करते थे। इसको मंत्र जगाना कहते हैं। यहां यह बताते चलें कि इनको शाबर मंत्र कहते हैं। इन मंत्रों की रचना के पीछे भी एक कहानी है। कह नहीं सकते कि यह कितनी सच्ची है। कहते हैं ब्रह्मा जी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे तो शंकर जी के मन में भी आया कि वे भी सृष्टि की रचना करेंगे। उन्होंने सृष्टि की रचना में हाथ आजमाया पर उनसे मनुष्य के बजाय सांप, बिच्छू जैसे विषैल जंतु बन गये। इस पर पार्वती ने कहा-यह क्या सृष्टि कर दी आपने यह तो मानव जाति को कष्ट पहुंचाने के अलावा और कुछ नहीं करेगी। अब मानव जाति की रक्षा के लिए कुछ करिये। इसके बाद शंकर जी ने शाबर मंत्र की रचना की और कहाकि इन मंत्रों को सिद्ध करके इनका प्रयोग करने से सांप आदि जहरीले जंतुओं के विष से मुक्ति पायी जा सकेगी। यह मंत्र अटपटे हैं इनका अर्थ समझ नहीं आयेगा लेकिन ये अमोघ हैं। अपने गांव में हमने देखा कि सांप काटे किसी व्यक्ति को अस्पताल नहीं जाना पड़ा। पिताजी और उनके शिष्यों ने मंत्र पढ़ कर और एक विशेष औषधि को खिला कर सांप काटे व्यक्तियों को ठीक कर दिया। इसमें शर्त यह होती है कि सांप काटे व्यक्ति को जगाये रखना पड़ता है। अगर विष के नशे से उसे तंद्रा आने लगती है तो संडसी से उसके नाखूनों को दबा कर उसे होश में लाना पड़ता है। मंत्र की पंक्ति समाप्त.  होने के बाद सभी झाड़ने वाले रोगी के कान पर जोर से चिल्लाते-विष खररररा। बचपन में यह देखा इसलिए विश्वास करना पड़ता है अगर इसमें से किसी की मौत हो जाती तो संदेह होता। इसमें कई कोबरा के काटे लोग भी थे। (क्रमश:)