Monday, August 20, 2018

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी भाग-30



उन्हें खोकर हर दिल रोया, हर आंख हुई नम

राजेश त्रिपाठी

  2 नवंबर 2014 का वह दिन जिस दिन हमारे भैया रुक्म जी हमें छोड़ कर चले गये हमारी जिंदगी का सबसे मनहूस दिन था। इसके पहले मैं अपनी मां और फिर भाभी को खो चुका था। हमारे परिवार में बुजुर्ग भैया ही बचे थे जिनकी सलाह लेकर ही हम कोई काम करते थे। उनका होना हमारे लिए बड़ा संबल था लेकिन भाग्य पर कोई जोर नहीं चलता। जिसे जीवन में जितनी सांसें मिली हैं उतनी सांसों तक ही उनकी जिंदगी की सीमा होती है।
  

भैया रुक्म जी के साथ ब्लागर राजेश त्रिपाठी

  रुक्म जी को पहचानने वाले जितने लोगों तक संभव हो सका हमने उनके निधन का समाचार पहुंचाया। सभी बेहद दुखी हुए क्योंकि वे अजातशत्रु थे और उनका सबसे बड़ा गुण था नये लेखकों को प्रोत्साहित करना, उनकी कहानियां ठीक करके छापना। उनसे संबंधित सभी लोग उनके व्यवहार के कायल थे। किसी अपरिचित से भी वे ऐसे मिलते जैसे वर्षों से पहचान हो। कुछ लोगों ने कविताएं लिख कर उऩको श्रद्धांजलि दी तो कुछ ने भाव भरे शब्दों में अपनी संवेदना व्यक्त की।
 तृणमूल कांग्रेस के तत्कालीन सांसद श्री विवेक गुप्त   (जो सन्मार्ग हिंदी दैनिक के निदेशक भी हैं) रुक्म जी को वर्षों से जानते थे। उनके सन्मार्ग में रुक्म जी ने आधी सदी गुजारी थी और आज जितने परिशिष्ट निकलते हैं सबकी शुरुआत वर्षों पहले उन्होंने ही की थी। उन्होंने भाल भरे शब्दों में अपना दुख व्यक्त करने के साथ ही सन्मार्ग में उनके योगदान को याद किया। उन्होंने लिखा-राजेश जी, श्री रुक्म त्रिपाठी जी के निधन से काफी मर्माहत हूं। यह आपके परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनकी कमी परिवार को खलती रहेगी। उनके रिक्त स्थान को समय शायद ही भर पायेगा। इस दुखद घड़ी में मैं शोकसंतप्त हूं तथा उनके निधन पर अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करता हूं।
रुक्म जी सन्मार्ग से दशकों तक जुड़े रहे तथा संपूर्ण निष्ठा, समर्पण, ईमानदारी और निपुणता के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। रिटायरमेंट के बाद भी वे अपनी रचनओं के माध्यम से सन्मार्ग से जुड़े रहे तथा पत्र के सर्वाधिक लोकप्रिय स्तंभों में से एक चकल्लससे वे पाठकों तथा सन्मार्ग की सेवा करते रहे।यह क्रम उनके जीवन के अंतिम दिन तक जारी रहा। निश्चित रूप से उनके निधन से एक शून्य पैदा हुआ है। मैं परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि दिवंगत  आत्मा  को  शांति प्रदान करें तथा आपको , आपके परिवार के सदस्यों, मित्रों को संकट की इस घड़ी तथा इस असामयिक दुख से उबरने की शक्ति दे।
 आपका
विवेक गुप्त
शिक्षक अगम शर्मा जी भैया के परिचितों में थे। वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। वे भैया को कितना मानते थे, कितनी श्रद्धा करते थे उसका अंदाजा उनकी ऩिम्नांकित कविता से मिल जायेगा जो उन्होंने रुक्म जी को श्रद्धांजलि देते हुए लिखी थी-
आदरणीय रुक्म जी के प्रति शब्दांजलि
आसमान से तारा जो आया जमीन पर।
अपनी चमक दिखा कर वापस चला गया।
धरती के आंचल में कम हो गया उजाला।

चांद शिकायत करता है ,वो छला गया है।
वो तारा जब गुलशन के फूलों में हंस कर ।
खुशबू के कंधों पर वीणा बजा रहा था।
एक गंधर्व समूह गुलिस्तां में छुप छुप कर।


आलापों से वासंती रुत सजा रहा था।
वो ऐसा तारा था जिसकी ज्योति शलाका।
शब्दों के प्यालों में अरुण वारुणी ढाले।
वो तारा एक रोज सूर्य से आंख मिला कर।

बोल था, अपनी किरणें गिन कर रक्खो।
मैं सहरा के कण कण में रोशनी भरूंगा।
सारी धूप समेटो सूरज घर पर रक्खो।
उस तारे ने शबनम को रागिनी सिखायी।
मौसम की अलमस्त अदा को दी अंगडाई।
चंदन वन में नागों का अभिमान दूर कर।
लहर लहर पर ऊर्जा की बांसुरी बजायी।
भूल नहीं जाना धरती की याद सितारे।
कभी कभी आशीष रश्मियों से खत लिखना।
कोई युवती अर्घ्य चढ़ाये जब सूरज को।
वहीं पास में तुम कविता लिखते दिखना।
अगम शर्मा
शर्मा जी ने भैया रुक्म को कितने भाव भरे, अलंकारमय शब्दों में याद किया इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है उनकी कविता।
 मधुर गीतों के रचयिता श्रीकांत कानोड़िया तो भैया रुक्म को न सिर्फ गुरु जी कहते अपितु मानते भी थे। वे अपने लिखे गीत पहले उनको सुनाते थे। उनके गीतों की पुस्तक मन के मीत और हनुमान जी की काव्यमय गाथा के लेखन में वे अक्सर भैया से सलाह लेते रहे और उनके सुझावों को मानते भी रहे। वे जब तक जीवित थे तब तक हर सप्ताह भैया से मिलने आते रहे। उनके पुत्र आदित्य कानोड़िया को भी लेखन कला विरासत में मिली। वे कहानियों के साथ-साथ कविता भी लिखते रहते हैं। उन्होंने तो भैया को श्रद्धांजलि के रूप में पूरी कविता लिख डाली और उसे लैमनेट कर के मुझे दिया। उनकी कविता यहां दे रहा हूं-
काव्यांजलि गीतों की
महाप्रयाण दिवस
2 नवंबर 2014
हुआ दीप साहित्य जगत का मध्यम छाया भारत माता  के आंगन में भी गम।
त्याग मृत्युलोक को जब हुए ब्रह्मलीन सरस्वतीपुत्र कपूत कलकतिया रुक्म।।
बना सदा  कलम को  हथियार, हर कुमार्ग को दिखलाया मार्ग  सन्मार्ग का।
कागजों  के  मैदानों पर  सदा  कर शंखनाद, धड़काया दिल पाप के बाप का।।
सदा होठों पर हंसी चेहरे पर मुस्कान बड़प्पन पाने पर किया नहीं कभी अभिमान।

      .....................................
इसी तरह अन्य कई लोगों ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी और उनकी यादों को ताजा किया। कई ऐसे लोग जो उनसे उपकृत हुए उन्होंने भी उन्हें और उनसे मिले सहयोग प्रोत्साहन को याद किया।
    2 नवंबर 2014 को केवल मेरे बड़े भैया, गुरु रुक्म जी का ही ऩिधन नहीं हुआ, उनके रूप में एक समर्थ लेखक, संपादक और नये लेखकों को प्रोत्साहन देनेवाला शख्स चला गया। ऐसे शख्स जब जाते हैं तो अपने पीछे ऐसा शून्य छोड़ जाते हैं जिसका भरना मुमकिन नहीं होता। उनकी कही बातें हमारे लिए आज पाथेय हैं। सन्मार्ग हिंदी दैनिक को सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले श्री रामअवतार गुप्त और उसके बाद प्रिंटिंग और अखबार की साज-सज्जा में आधुनिकता और नवीनता लाने वाले उनके नाती विवेक गुप्त के समय तक वे इस समाचार से जुड़े रहे। वे सन्मार्ग से ओतप्रोत ढंग से जुड़े रहे। उनके द्वारा शुरू किये गये इस समाचारपत्र के सारे परिशिष्ट कामयाब रहे जिसका जिक्र रामअवतार गुप्त जी अक्सर किया करते थे। वे कहते -रुक्म जी तो मेरे लिए पारस पत्थर हैं, इन्हें जो भी पेज दिया इन्होंने चमका दिया। इसी क्रम में जब एक बार उन्होने रुक्म जी कहा-रुक्म जी अपना कोई शिष्य बना लीजिए। किसी को अपना काम सिखा दीजिए तो अच्छा रहेगा।
इस पर रुक्म जी का उत्तर था-गुप्ता जी, हमने तो गुरु के चरणों में बैठ कर सीखा है , अब के लड़के तो धौंस दिखायेंगे-सिखाता है या नहीं। कोई भी कला, कोई भी विद्या विनम्रता से और शिक्षक को आदर दिये बगैर नहीं सीखी जा सकती।
   रुक्म जी अपने आप में एक संस्था थे। दिन भर कुछ न कुछ लिखते रहते। इस ब्लागर ने उनसे जो सीखा उसके लिए वह आजीवन उनका ऋणी रहेगा। सिद्धांत के इतने पक्के थे कि जब तक सन्मार्ग के साहित्य संपादक रहे रविवारी परिशिष्ट या किसी दूसरे परिशिष्ट में मेरी रचनाएं नहीं छापीं। मेरी वही रचनाएं छपती थीं जो मान्यवर रामअवतार गुप्त जी के निर्देश से मैं लिखता था। मैं भी भैया के आदर्श का आदर करता था इसलिए रचनाएं बाहर ही भेजता था। अब उनका आदर्श ही हमारे पाथेय हैं और उनसे जो थोड़ा –बहुत सीख पाया वही मेरे लेखन का आधार है जिसकी बुनियाद उनकी छत्रछाया में ही पड़ी। उन्हें पुण्य स्मरण कर इस जीवनगाथा को यहीं विराम देता हूं। जानता हूं उनके जीवन के कई प्रसंग अनकहे रह गये होंगे लेकिन जितना बन सका उनके जीवन के विविध भावों, रंगों को समेटने की कोशिश की। (समाप्त)





Friday, July 20, 2018

दिमाग से नहीं दिल से लिखते थे नीरज


उनका एक-एक बोल सीधे दिल में उतर जाता था


राजेश त्रिपाठी

नीरज जी

नीरज जी का जाना हिंदी गीत विधा के एक सशक्त अध्याय की परि समाप्ति जैसा है। कारण, नीरज जी जैसे गीतकार और जन-जन के कवि धरा पर बार-बार नहीं आते। नीरज यह नाम गीतों की दुनिया में ऐसे अमर हो गया कि उनका मूल नाम गोपाल प्रसाद गौण हो गया। उनके मूल नाम को भले ही गिने-चुने लोग जानते हों लेकिन सरस गीतों, भाव-भरी और सशक्त कविताओं के रचयिता नीरज से शायद ही कोई हिंदी साहित्य प्रेमी अपरिचित हो। गीतकार तो बहुत हैं लेकिन उनमें कुछ ही हैं जो पढ़ने-सुनने वालों से सीधे जुड़ पाते हैं। नीरज जब गीत गाते या अपनी कविताएं पढ़ते तो सुनने वालों से उनका सीधा तादाम्य होता था। मंत्रमुग्ध हो जाता था श्रोता उनके भाव,उनके सशक्त शब्द सुन कर क्योंकि नीरज दिमाग से नहीं दिल से लिखते थे। उनका एक-एक शब्द सुनने वालों के दिल में उतर जाता था।
     नीरज का जीवन खुली किताब था, कुछ भी ढंका-छिपा नहीं रहा इसलिए उनसे जुड़ी हर अच्छी-बुरी चीजें बाहर आती रहीं। इस प्रसंग में विस्तार से न जाते हुए खुद उन्हीं के शब्दों में इस बारे में कहें जो स्वीकारोक्ति ही लगते हैं-
इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में।
लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में ।।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर।
ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में।।
     नीरज समानता, समरसता के हामी थे। वे चाहते थे कि विकास का उजाला जन-जन तक पहुंचे। धरा का कोई भी कोना अंधेरा न रह जाये। इन सार्थक भावों को समेटे उनका गीत प्रस्तुत है-
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहां रोज आए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेगे तभी यह अंधेरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए
नीरज का कवि हृदय में जमाने में व्याप्त विषमता, जाति, वर्ग को लेकर दिनों-दिन बढ़ते अंतर, विद्वेष से भीतर तक मर्माहत था। मानव-मानव में भेद को कवि बरदाश्त नहीं कर पा रहा था इसीलिए उसका दिल बड़ी अकुलाहट, बड़ी बेचैनी से कह उठता है-
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए। 
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए। 
आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहां जाके नहाया जाए। 
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अंधेरे को उजाले में बुलाया जाए। 
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए। 

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आंसू तेरी पलकों से उठाया जाए।
  नीरज के बारे में जितना कुछ कहा-लिखा जाये वे जग के हर उपमान से बड़े थे क्योंकि वे यथार्थ के धरातल पे खड़े थे। उनके शब्द उनकी मुकम्मल पहचान होते थे और कवि सम्मेलनों में उनका होना सुकून का सबब बनता था। श्रोता उन्हें सुन धन्य होता था क्योंकि उनकी कविता उसके दिल, उसके एहसास पर गहरा असर छोड़ती थी। एक लेख में उनके महान व्यक्तित्व को समेटना आसान नहीं, यह तो सूरज को दीपक दिखाने के समान है।
     अब उनके फिल्मी गीतकार के रूप में मशहूर होने के प्रसंग में आते हैं। मेरे बड़े भाई साहब स्वर्गीय रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म कोलकाता के हिंदी पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े लोगों में जाना-पहचाना नाम था। उन्होंने प्रसिद्ध हिंदी दैनिक सन्मार्ग में रहते हुए कुछ पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। इनमें कुछ फिल्मी पत्र-पत्रिकाएं भी थीं जिनके लिए उनको अक्सर बंबई (अब मुंबई) जाना पड़ता था। इस क्रम में अशोक कुमार, राज कपूर, धर्मेंद्र ( जो उनको गुरु जी कहते थे और जिन्हें भैया ने उनका पहला सचिव दीनानाथ शास्त्री दिया था), दिलीप कुमार, भारत भूषण (बैजू बावरा फेम), हसरत जयपुरी, देव आनंद, मनोज कुमार व अन्य से उनका परिचय था। उन्होंने नीरज जी से जुड़ा एक संस्मरण मुझे सुनाया जो मैं यहां प्रस्तुत करता हूं- भैया किसी एक निर्माता (नाम जानते हुए भी देना नहीं चाहता) के कार्यालय में गये। उन्होंने देखा कि नीरज जी बाहर सोफे पर बैठे हैं।
 भैया ने उनको नमस्कार किया और पूछा-नीरज जी आप यहां?’
  नीरज जी बोले-हां, निर्माता से मिलने आया हूं। भीतर विजिटिंग कार्ड भेजा है, कोई जवाब नहीं आया।
        निर्माता भैया के परिचित थे। उन्होंने भीतर जाकर उनसे कहा-अरे भाई आपने जिनको बाहर बैठा रखा है वे हिंदी के महान गीतकार हैं। उन्हें तुरत अंदर बुलाइए।
        निर्माता को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने तुरंत नीरज जी को अंदर बुलाया। बाद में फिल्म पहचान के टाइटिल सांग पैसे की पहचान यहां इनसान की कीमत कोई नहीं बच के निकल जा इस बस्ती में करता मुहब्बत कोई नहीं में नीरज जी ने अपने उस उपेक्षा की शिकायत की जो बहुत से मशहूरो-मारूफ लोगों को उनके हाथों झेलने पड़ती है जिनका साहित्य से कोई नाता नहीं और जो सस्ते, सतही, फूहड़ गाने ही पसंद करते और फिल्मों में भरते हैं।
     फिल्मी गीतों को जो ऊंचाई शकील बदायूंनी, कैफी आजमी, शैलेंद्र, गुलजार,इंदीवर जैसे गीतकारों ने दी वह अब जावेद अख्तर के अलावा किसी और में नहीं दिखती। फिल्मी गीतों के गिरते स्तर के बारे में एक बार प्रसिद्ध गीतकार इंदीवर ( अब स्वर्गीय) से चर्चा हुई। यहां यह बताना अप्रासंगिक न होगा कि श्यामलाल बाबू राय यानी इंदीवर मेरे बांदा जिले के पड़ोसी जिले झांसी के थे।  फिल्म सरस्वतीचंद्र के गीत चंदन सा बदन, चंचल चितवन  लिखनेवाले इंदीवर जब झोपड़ी में चारपाई जैसा सस्ता, फूहड़, निम्न कोटि का गीत लिखते हैं तो मेरे जैसे व्यक्ति को जो चंदन सा बदन लिखनेवाले इंदीवर का भक्त था, गहरी चोट पहुंचती है। इंदीवर जी एक फिल्म (जो बनी नहीं, मुहूर्त तक ही सिमट कर  रह गयी) के गीत लिखने कोलकाता आये थे। मुहूर्त कवरेज के लिए मैं भी गया था। उनसे भेंट हुई तो मैंने  शिकायती लहजे में कहा-क्या इंदीवर जी चंदन सा बदन लिखनेवाला लेखक इतनी नीचे उतर गया झोपड़ी में चारपाई यह साहित्य का कौन-सा उत्कर्ष है।
        उन्होंने जो उत्तर दिया वह दिल का दुख और गहरा कर गया। उन्होंने कहा-भैया ऐसा पेट की खातिर करना पड़ा। अब कोई भी चंदन सा बदन नहीं  लिखाना चाहता। ऐसे सस्ते, फूहड़ गानों का दौर है, न लिखें तो भूखों मरें।
        उनका जवाब सुन कर मैं स्तब्ध रह गया। मेरे सवाल का जवाब मुझे मिल गया था। इस प्रसंग को लिखने का एक ही मतलब था कि फिल्मी दुनिया में अब साहित्यकारों की कोई इज्जत नहीं। वैसे दृष्टांत है कि अतीत में भी कई बड़े-बड़े साहित्याकारों का जिन्होंने फिल्मों की ओर रुख किया था जल्द ही मोहभंग  हो गया।
     यह जरूर है कि नीरज जी जब फिल्मी दुनिया में गये तो छा गये। उनका एक-एक गीत हिट हुआ। सुना है कि फिल्मों में उन्हें लाने का श्रेय देव आनंद को जाता है। उनकी फिल्म प्रेम पुजारी में उन्होंने शानदार गीत लिखा रंगीला रे तेरे रंग में क्यूं रंगा है मेरा मन जिसे सचिन देव बर्मन ने संगीत से सजाया और लता मंगेशकर ने गाया था बहुत हिट हुआ। वैसे फिल्म नयी उमर की नयी फसल के गीत कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे को जितनी तारीफ मिली शायद ही किसी गीत को मिली हो। इस गीत का एक-एक बंद जिंदगी का आईना है जिसमें उभरते अक्स किसी के भी हो सकते हैं। इसकी स्थितियां बहुत ही जानी-पहचानी लगती हैं और यह गीत सीधे दिल में उतरता है।
          नीरज के लिखे हर फिल्मी गीत में उनकी अपनी अलग पहचान थी। चाहे वह कन्यादान फिल्म का लिखे जो खत तुझे हो या शोखिय़ों में घोला जाये फूलों का शवाब (फिल्म प्रेमपुजारी) या कहता है जोकर सारा जमाना (मेरा नाम जोकर) या इसी फिल्म का ये भाई जरा देख के चलो गीत दोनों ही प्रासंगिक, कथानक से ओतप्रोत जुड़े और जीवन के ऊंच-नीच की कहानी कहते सार्थक गीत हैं।
     नीरज जी का व्यक्तित्व अथाह सागर है जिसमें अवगाहन करना हम जैसे अकिंचन के लिए आसान नहीं। उनके बारे में जो जाना-सुना उसके आधार पर उनके व्यक्तित्व का एक खाका खींचने की कोशिश की। जानता हूं बहुत कुछ छूट गया होगा क्योंकि नीरज जी के जीवन को शब्दों में समेटना आसान नहीं। जितना कह पाया उतना ही उनको श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित है। इस महान व्यक्तित्व को शतश: नमन। 
 राजेश बादल द्वारा राज्यसभा टीवी के लिए निर्मित 'उनकी नजर उनका शहर' शृंखला  में नीरज जी पर बनी नायाब फिल्म राज्यसभा टीवी से साभाऱ।
फिल्म देखने के लिए कृपया नीचे के लि्ंक पर क्लिक करें
https://youtu.be/43uB7fRoChQ?t=1

Thursday, June 28, 2018

रुक्म जी की व्यंग्य कविताएं भाग-5

भाग-5

तब क्यों होता फर्क

कितने जन भोजन बिना तड़प-तड़प मर जांय।
सरकारी  गोदाम  में  अन्न पड़ा सड़ जाय ।।
सब जन प्रभु की देन हैं, तब क्यों होता फर्क।
कुछ  तो सिंहासन चढ़े, कुछ का बेड़ा गर्क ।।

कलियुग में  सब  जनों  पर नहीं करें विश्वास।
मधुर मधुर बतियाय कुछ सज्जन को ले फांस।।
सदा  खुशी  रहता  वही  जिसमें  हो  संतोष ।
जिसे अधिक की लालसा, देय भाग्य को दोष।।

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श्रद्धांजलि

याद किया जाता वीरों को जिस दिन वे शहीद होते हैं।
मालाएं  पहना  कर  नेता, घड़ियाली आंसू रोते हैं ।।
लंबे  चौड़े  भाषण होते, जम कर होती खूब प्रशंसा ।
अखबारों में नाम छपेगा, असल यही होती है मंशा ।।

शेष तीन सौ चौसठ दिन तक, मूर्ति गंदगी से भर जाती।
पक्षी बैठ बीट करते हैं, नहीं किसी को सुधि तब आती ।।
ऐसा  करने से अच्छा है, करें  मूर्ति  की  सदा सफाई ।
यही श्रेष्ठ श्रद्धांजलि होगी, नेताओं को यदि यह भाई।।

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माया वाला रोग

अपना सब कुछ भूल कर, चलें गैर की चाल।
आज विदेशी लगें वे, अद्भुत उनकी चाल ।।
धनकुबेर तो बन गये, किंतु और की चाह ।
इसीलिए वे आजकल, चलें गलत सब राह।।

जो बन जाता है कभी धन दौलत का दास।
मानवता उससे डरे, कभी न आती पास ।।
नहीं संग कुछ जात है, जानत हैं सब लोग।
किंतु  न पीछा छोड़ता, माया वाला रोग ।।

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साहस हारे कवि से

कविता लिखना बहुत कठिन है, कवि बनना आसान नहीं है।
पंत, निराला, बच्चन  जैसे,  कवियों की अब शान नहीं है।।
बात  नहीं जंचती हमको यह, दिल छोटा क्यों करते प्यारे ।
ऐसा  लिखो  जमाना  चौंके, श्रोता  अर्थ  लगा कर हारे ।।

रबड़  छंद  के  चलते  अब  तो , सारे  टूट  गये  हैं  बंधन।
जहां आग का तुक लिखना हो, साहस कर लिख मारो चंदन।।
पांडे,  बच्चन  ने  लिख  डाली, हल्दीघाटी  मधुशाला
साहस  कर  के तुम  लिख  मारो, चूनाघाटी खटमलशाला।।

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चाह नहीं है

चाह नहीं संपादक बन कर, जो  मन  आये छपवाऊं।
चाह नहीं  आफीसर बन  कर, मनचाही रिश्वत पाऊं।।
चाह  नहीं  घुसखोरी करके, महल  दोमहले बनवाऊं।।
चाह नहीं लीडर बन कर के, जनता को नित भरमाऊं।।

चाह नहीं तस्कर बन कर के, धन कुबेर मैं कहलाऊं।
चाह नहीं दल बदल करॉं फिर, ऊंचा पद पा इतराऊं।।
चाह यही है हे वनमाली, भ्रष्ट जनों से मुझे बचाना।
ऐसों के दर्शन पाकर के , नहीं नर्क हमको है जाना।।

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नारी तुम हो केवल श्रद्धा

नारी तुम अतशिय उदार हो, है महान व्यक्तित्व तुम्हारा।
तुमने  अर्पण ही सीखा है, स्वीकारो  तुम नमन हमारा ।।
एक  और व्यक्तित्व तुम्हारा,आज विश्व भर में है छाया।
विज्ञापन  की तुम हो शोभा, अजब तुम्हारी देखी माया।।

साबुन,  शैंपू,  तेल,   तौलिया,  देखे   तरह-तरह  विज्ञापन।
शर्टिंग, सूटिंग, काजल, सुरमा, मरहम, क्रीम, दांत का मंजन।।
नारी  तुम  केवल  विज्ञापन  समझ रहे,  जो  करते धंधा ।
किंतु तुम्हें  हम  सदा मानते, नारी तुम हो केवल  श्रद्धा ।।

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शुद्धिकरण

राजनीति में शुद्धिकरण की, लोग सदा करते हैं चर्चा।
भीषण भाषण में नेतागण, शब्द बहुत करते हैं खर्चा।।
नहीं पालते बाहुबली हम, दागी नहीं एक भी रहता।
ताज्जुब खुद अपराधी होता, सो ऐसा ही दावा करता।।

कितने ऐसे  होते  मंत्री, जिनकी  छवि  हो भ्रष्टाचारी।
मालाओं से  लादे  जाते, खूनी,  अपहर्ता,  व्यभिचारी।।
केवल भाषण में सुनते हैं, शुद्धिकरण की अगणित बातें।
जिनके श्रीमुख से यह सुनते वही कर रहे छिप कर घातें।।

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नहीं तरक्की पाय

रुक्मजगत में आय कर, कर लीजै यह काम।
बिना परिश्रम धन जुटे, कष्ट ना पावे चाम ।।
ऐसी  बानी  बोलिए,  अपना   आपा   खोय।
जिसमें दहशत हो भरी, घूस ना  मागे  कोय।।

ज्यों-ज्यों कलियुग बढ़ रहा, नारि उघरती जाय।
त्याग, लाज, संकोच सब  अंग- अंग दर्शाय ।।
ठकुरसुहाती  नहीं कहें, खरी  बात  बक जांय।
बात  बिगाड़े  आपनी,  नहीं  तरक्की  पाय ।।

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फर्ज

इच्छा है या अनंत सागर, जिसका मिलता है छोर नहीं।
मैं तो रानी अब ऊब गया,पर तुम होती हो बोर नहीं।।
फरमाइश फर्ज न बीबी का, यह फर्ज महज महबूबा का।
तुम जब फरमाइश करती हो, करती हो काम अजूबा का।।
पहले  देखो  सोचो, समझो,  कितनी  भूलें कर डाली हैं।
यह घर या ट्रेन की बोगी है, कोई भी जगह न खाली है।।
दिन रात  मचे धक्कम धुक्का, गाली-गलौज मारा पीटी ।
कोई  तो  दांत  निपोर  रहा,  कोई  मारे  लंबी सीटी।।

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आज हमें चाणक्य चाहिए

जन प्रतिनिधि कहलाने वाले अगर सुरक्षा ले चलते हैं।
इसका  अर्थ  यही होता है, जनता से डरते रहते हैं ।।
छोटे  नेताओं  को देखा,  वे  भी चाह  रहे हैं पहरा ।
वह सब देख और सुन कर, हमको लगता सदमा गहरा।।
नेता वह जो  पूजा  जाये, सबकी हो आंखों का तारा ।
नहीं किसी का उसको डर हो,जन-जन का हो राजदुलारा।।
हमें आज चाणक्य  सरीखा, अगर कहीं नेता मिल जाये।
इसमें नहीं जरा भी शक है, अपना देश स्वर्ग बन जाये।।

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कैसे कहें जवान?

कहां गयी अपने तरुणों की, केहरि-सी वह चाल।
इस्पाती वक्षस्थल दिखता, ज्यों राणा की ढाल।।
पदघात  करते  धरती से, बह उठता था नीर ।
अब इतिहासों के पृष्ठों पर मिलते हैं वे वीर ।।
झुका नयन  ऐसे चलते हैं, जैसे चलता दूल्हा।
लज्जा से मुस्काती तरुणी,देख लचकता कूल्हा।।
तरुणायी में कटि झुक जाती, कैसे कहें जवान।
इनसे तो बहु वृद्ध महाशय, दिखते हैं बलवान।।

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बदल न जाये सेक्स

ब्लाउज  सी  बुशर्ट  पहनते,  लड़के  केश बढ़ाते।
रह-रह अलक झटकते चलते,कमर नयन मटकाय।।
कोई  ऐसा  वेश  बनाता,  पतले स्वर में गाता ।
लड़का है या लड़की भैया, भेद समझ ना आता।।
रूप बदलने  की  लगी होड़, बढ़ी आज बीमारी ।
भय है कहीं दिखाई ना दे, लड़कों के तन सारी।।
फैशन की इस प्रदर्शनी पर,अगर  लगी ना रोक।
भय है सेक्स बदल ना जाये,चलेगी यह बेटोक।।