Saturday, December 4, 2021

जब मैं तेज उफनती नदी में बह गया

 आत्मकथा-14

कुछ भूल गया कुछ याद रहा

 राजेश त्रिपाठी

(भाग 14)

आत्मकथा

गांव साथी में मेरी शिक्षा चल रही थी। आचार्य जी अब वहां एक तरह से अभिभावक की भूमिका निभाने लगे थे। वे सदा पूछते रहते –तुम्हें अगर तुम्हारे परिचितों के यहां रहने में कोई परेशानी हो तो तुम यहां रह सकते हो। तुम्हारे कई सहपाठी रह रहे हैं हम व्यवस्था करा देंगे।

 मैंने जवाब दिया –नहीं गुरु जी कोई परेशानी नहीं, सब ठीक है। अगर परेशानी हुई तो आपसे ही कहूंगा मैं यहां किसी और को तो जानता नहीं।

  हम लोगों में अभी बात हो ही रही थी कि वहां एक अजनबी आया और उसने गुरु जी को प्रणाम किया और उनके पास ही बैठ गया।

  गुरु जी उसको पहचानते थे वह उनके परिचितों में था।

अचानक गुरु जी ने उससे कहा-देखो यही लड़का है जिसके बारे में मैंने तुमसे बात की है। इसका हिंदी का उच्चारण भी अच्छा है यह उस भूमिका के लिए ठीक रहेगा।

  मैं हक्का-बक्का सुन रहा था कि पता नहीं गुरु जी मेरे लिए किस भूमिका की बात कर रहे हैं। गुरु थे उनसे कोई प्रश्न करने का साहस नहीं हो  रहा था।

  अचानक गुरु जी मुझसे बोले-यह बगल के गांव की रामलीला कमेटी के मैनेजर हैं। यह मेरे पुराने परिचित हैं इनको अपनी रामलीला के लिए लक्ष्मण की भूमिका के लिए एक लड़के की आवश्यकता है।इन्होंने मुझसे बात की थी तो मैंने इनको तुम्हारा नाम सुझाया था उसीलिए यह तुम्हें देखने आये हैं।

   मैं बोला-गुरु जी मैं तो अभिनय का अ तक नहीं जानता।

 गुरु जी बोले-यह तुम्हारी चिंता नहीं है। यह सब सिखा लेंगे। ऐसा करो कि तुम आज इनके साथ चले जाओ। वहां कुछ दिन रह कर अभिनय का अभ्यास आदि कर लो फिर वापस आकर अपना अध्ययन प्रारंभ कर देना।

  गुरु जी से मैंने कहा-इनको रुकने को कहिए, मैं जहां रहता हूं उन्हें तो यह सूचना दे दूं कि मैं गुरु जी के कहने पर कुछ दिन के लिए साथी गांव से बाहर जा रहा हूं ।

  मैं गया और घर में गयाप्रसाद भैया से सारी बातें बतायीं पहले तो वह राजी नहीं हुए पर जब मैंने बताया कि गुरु जी का आदेश है तो वे राजी हो गये। मैंने अपने कुछ कपड़े लिये और गुरु जी के परिचित व्यक्ति के साथ चल दिया। जहां तक याद आ रहा है उस गांव का नाम कोर्रम था।

 कोर्रम में पहुंच कर दूसरे दिन से ही मेरा अभिनय का प्रशिक्षण शुरू हो गया। मुझे पता नहीं था कि दो-चार दिन बाद ही वहां रामलीला का मंचन भी शुरू हो जायेगा। वहां जाकर पता चला था कि वहां की रामलीला पूरी तहसील में प्रसिद्ध थी।

  जो सज्जन मुझे गुरु जी से लाये थे उनसे मैंने एक दिन पूछा- अच्छा राम, लक्ष्मण की भूमिका के लिए केवल ब्राह्मणों को ही क्यों लिया जाता है।

उन्होंने कहा-केवल राम, लक्ष्मण ही नहीं सीता और रावण की भूमिका भी ब्राह्मण ही करते हैं।

  इसका कारण उन्होंने बताया था कि रामलीला के दौरान राम, लक्ष्मण, सीता की आरती लोग उतारते हैं, चरण स्पर्श करते हैं इसलिए इस भूमिका के लिए ब्राह्मण ही रखे जाते हैं।

 दूसरे दिन से रामलीला शुरू हो गयी। पहला दृश्य विश्वमित्र के साथ राम, लक्ष्मण के उनके यज्ञ की रक्षा के लिए वन से गुजरने का था। मंच पर वन का दृश्य दरसाने वाले परदे लगाये गये थे। मैं राम और विश्वमित्र बने पात्रों के साथ धनुष बाण लिये चल रहा था। हम लोगों को यह भी सिखाया गया था कि राम, लक्ष्मण को मंच पर कैसे चलना होता है।

 हम मंच पर इस तरह चल रहे थे जैसे प्रतीत हो कि हम वन में कहीं दूर जा रहे हैं। मंच पर मेरा पहला दिन था। कहीं मुझसे कुछ गलती ना हो जाये मेरा ध्यान इसी में था कि अचानक परदे के पीछे से भयानक आवाज करती ताड़का आयी और मैं भय से झिझक गया।

  तभी मेरे साथ चल रहे राम बने पात्र ने धीरे से कहा-तुम लक्ष्मण हो, डरो नहीं।

 राम की बात सुन मैं तन कर खड़ा हो गया। किसी तरह उस दिन का मंचन समाप्त हुआ। निर्देशक ने मुझे समझाया –अभिनय में सफलता का सबसे पहसा गुर यही है कि तुम कौन हो यह भूल जाओ और उस वक्त क्या हो उसी सोच के साथ जियो तब तुम कामयाब हो जाओगे।

  एक सप्ताह बाकायदा रामलीला में भूमिका निभा कर मैं वापस साथी लौट आया और गुरु जी से बोला-गुरु जी अगर आप आज्ञा दें तो एक सप्ताह के लिए अपने गांव जुगरेहली हो आऊं, बहुत दिन से मां से नहीं मिला वे भी चिंतित होंगी।

  गुरु जी मुसकराते हुए बोले-मां की याद आ रही है, जाओ हो आओ एक सप्ताह में लौट आना।

  गुरु जी की आज्ञा पाकर मैं बहुत खुश हुआ। घर लौट कर मैंने गांव जाने की अपनी इच्छा साथी में अपने आश्रयदाता गयाप्रसाद भैया को बतायी तो उन्होंने भी अनुमति दे दी।

*

दूसरे दिन सुबह की मैं अपने गांव जुगरेहली की ओर चल पड़ा। उस वक्त आने-जाने का कोई साधन बस आदि तो थी नहीं मैं पैदल चल पड़ा। बरसात के दिन थे साथी से कुछ दूर आने के बाद ही बरसात होने लगी। मैं किरमिच  के जूते (केट्स) पहने था जो कीचड़ से पूरी तरह लथपथ हो गये थे। राह में मटियारा नाला पड़ता था जो बरसात में बहुत खतरनाक हो जाता था। हालांकि उसका पाट (एक किनारे से दूसरे किनारे की दूरी)तकरीबन 25 फुट थी किन्तु बरसात में जब वह उफनने लगता तो उसकी धार का वेग बहुत प्रखर हो जाता था।

  मैं नदी के किनारे पहुंचा तो उसकी धार की तीव्रता देख कर मेरा दिल कांप गया। सोचने लगा कि क्या किया जाये नदी तैरना तो मां ने सिखाया नहीं,तालाब में तैरना जरूर सिखा दिया था। 

  मैं नदी के किनारे किनारे चलने लगा कि कहीं धार पतली हो तो पार किया जायेगा अचानक मैंने देखा कि महुए का एक पेड़ गिरा हुआ है जिसने नदी के इस पार से उस पार तक एक पुल जैसा बना दिया है। मैंने सोचा लो भगवान ने मेरी सहायता के लिए प्राकृतिक पुल बना दिया है।

  मैं महुए के पेड़ पर चढ़ कर नदी पार करने लगा। मुझे इस बात का ध्यान नहीं रहा कि मेरे जूते कीचड़ से भरे हैं। वही हुआ जो होना था। मैं नदी के मझधार के ऊपर था कि तभी कीचड़ सने जूते के चलते मेरा पैर फिसला और मैं नदी के बीच में गिर कर तेज धार के करंट में बहने लगा। मैं उस वक्त अकेला इसलिए डर रहा था कि कहीं मर-मरा गया तो घर वालों को पता तक नहीं चलेगा। 

  जैसे भी बन पड़ा मैं हाथ-पैर मार कर खुद को डूबने से बचाने की भरपूर कोशिश करता रहा। साथ ही यह कोशिश भी कहीं किसी पेड़ की जड़ वगैरह मिल जाये तो उसका सहरा लेकर तेज धारा के प्रहार से मुक्त हो किनारे जाया जा सके।

 मैं तेज लहरों के थपेड़े खाते लगभग आधा मील तक बह गया तभी मेरे हाथ किसी लकड़ी  के पाये जैसी चीज से टकराये। उसे पकड़ मैं थोड़ा सुस्ताने लगा क्योंकि लहरों से लड़ते-लड़ते मैं हांफ गया था। उस पाये जैसी वस्तु के सहारे मैं किसी तरह किनारे आया। बाहर आया तो देखा उसका एक पाया ऊपर किनारे में फंसा है। वह चारपायी थी। पास ही एक कोरा घड़ा पड़ा था। मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गयी। हमने माता-पिता से सुना था कि कुछ लोग अपने परिजनों के शरीर का दाह संस्कार नहीं करते जल में प्रवाहित कर देते हैं। मुझे समझते देर ना लगी कि वह किसी मुर्दे की खाट थी जिसने नदी की तेज धार से मेरी जिंदगी बचायी।

  गांव जुगरेहली तक पहुंचते-पहुंचते मेरा शरीर गर्म हो गया था। मां से बताया तो उन्होंने कहा कि –तुम बरसात में भीगते हुए आये हो इसलिए ठंड से हरारत हो गयी है। ठीक हो जायेगा। मैंने डरते-डरते मां से सारी घटना बता दी मैंने नदी के तेज बहवा से बचने के लिए जिसे पकड़ा वह मुर्दे की खाट थी।

 दूसरे दिन से मुझे तेज बुखार रहने लगा। मां को मैं सारी घटना बता चुका था इसलिए उन्होंने गुनी को बुला कर झाड-फूंक करायी मैं तकरीबन एक सप्ताह बाद ही ज्वर से मुक्त हो पाया। बहुत कमजोरी हो गयी थी तो मां ने कहा- एक सप्ताह और रुक जाओ फिर वापस जाना।

*

गांव में कुछ समय बिता कर मैं जब वापस साथी के संस्कृत विद्यालय के लिए लौटने लगा तो मां रोने लगीं । फिर यह सोच कर कि उनके आंसू कहीं मुझे कमजोर ना कर दें उन्होंने आंसू पी लिये। सचमुच माताएं कितने मजबूत हृदय की होती हैं। बेटे को कुछ बना देने का उनका सपना था।

 मेरे लौटते वक्त उन्होंने इतना भर कहा-बीच-बीच में आ जाया करो तुम्हारे ना रहने से पूरा घर सूना लगता है।

  मैं भी भीतर ही भीतर रो रहा था, मेरे आंसू मां को और दुखी ना कर दें मैं तेज कदमों से उस मंजिल की ओर बढ़ चला जो अभी मेरा गंतव्य मेरा आश्रय स्थल था।

साथी पहुंच कर मैंने थके होने के कारण एक दिन के लिए विश्राम किया फिर दूसरे दिन संस्कृत विद्यालय पहुंचा तो गुरू जी ने कहा-तुम तो एक सप्ताह  के लिए गये थे।

 जब मैंने उनको नदी में बहने और फिर तेज बुखार में पीड़ित होने की कहानी बतायी तो वे भी दुखी हो गये। उन्होंने मुझे सलाह दी कि अब से मैं अकेले गांव ना जाऊं अपने पहचान वाले किसी व्यक्ति को साथ ही लेकर जाऊंगा।

 मैं कोर्रम की रामलीला का अभिन्न अंग बन गया था और लक्ष्मण की भूमिका में पसंद किया जाने लगा था। मेरे गुरु जी इस बात को लेकर प्रसन्न थे कि उनका छात्र अभिनय में भी अपनी योग्यता दिखा रहा है। (क्रमश:)

 

 

Wednesday, December 1, 2021

जिस कश्मीर को आप नहीं जानते

डल लेक श्रीनगर (कश्मीर)
    धरती के स्वर्ग कश्मीर के वर्तमान स्वरूप, स्थिति के बारे में आप सब जानते हैं आपमें से शायद कुछ लोगों को ही इसके गौरवशाली अतीत के बारे में पता हो। कश्मीर का इतिहास बहुत पुराना है। इसका उल्लेख पुराणों और प्राचीन धर्मग्रंथों में भी है। इसके संस्थापक के रूप में जो नाम प्रमुखता से लिया जाता है वह है कश्यप ऋषि का। आइए आपको कश्मीर के शताब्दियों पुराने अतीत में ले चलते हैं। जिसके बारे में पुराण व धर्मग्रंथों में दिये गये विवरण की पुष्टि विज्ञान ने भी कर दी है। 220 वर्ष ईसा पूर्व से भी पहले से है कश्मीर। 8 वीं सदी में यहां के राजा आदित्य हुए थे जिन्होंने यहां सूर्य मंदिर बनवाया। 220 वर्ष ईसा पूर्व आदि शंकराचार्य ने श्रीनगर की पहाड़ी शंकराचार्य हिल पर शिव मंदिर बनवाया। कश्मीर के नाम के बारे में एक पौराणिक कथा है। नीलमत पुराण के अनुसार इस क्षेत्र का नाम पहले सतिदेश था जिसका आकार किसी बांध की तरह था। इसके दोनों और विशाल पर्वत थे और बीच में बड़ी झील थी।इस झील का नाम सतिसर था। कभी एक बालक सतिदेश में आया था। इसका नाम जलोद्भव था। जलोद्भव का अर्थ है जल से जो उत्पन्न हुआ हो। जलोद्भव ने जल में रह कर ही ब्रह्मा जी की तपस्या की और उनसे वरदान मांगा कि वह जब तक जल में रहे तब तक उसे कोई मार ना सके। ब्रह्मा जी ने उसे वरदान देते हुए कहा-ऐसा ही होगा। कुछ दिन बाद जलोद्भव युवा हुआ। इसके बाद ही वह दुर्दांत हो गया लोगों को मारने लगा। वह हठी और क्रूर हो गया। सभी उसकी इस विनाशलीला से त्रस्त हो गये। जलोद्भव के पिता नील को यह बर्दाश्त नहीं था। नील ने इसकी शिकायत अपने पिता कश्यप ऋषि से की। कश्यप ऋषि ब्रह्मा जी के पास मदद के लिए पहुंचे। उन्होंने जलोद्भव के आतंक के बारे में उन्हें बताया और प्रार्थना की कि वे उसकी विनाशलीला से लोगों की रक्षा करें। कश्यप ऋषि ने ब्रह्मा के साथ ही विष्णु और शिव से प्रार्थना की कि वे जलोद्भव का अंत कर लोगों को उसके भय से मुक्त करें। विष्णु ने पहले अकेले ही उसका वध करने का प्रयत्न किया लेकिन उसे तो ब्रह्मा का वरदान प्राप्त था कि जब तक वह पानी में रहेगा उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकेगा। देवता जब-जब जलोद्भव को मारने आते वह सतिसर झील में जा छुपता। अब देवता चिंतित हो गये कि आखिर इसे कैसे मारा जाये। नीलमत पुराण में ऐसी कथा आती है कि देवताओं ने तय किया कि क्यों ना सतिसर को ही सुखा दिया जाये। कहते हैं कि इसके लिए बलराम जी की सहायता ली गयी जिन्होंने अपने हल से उस झील को बारह जगहों से काट दिया और उस झील से आकाश छूती जल की लहरें नीचे की ओर हरहराती हुई बहने लगीं। कहते हैं जहां बारह सुरंगों से पानी निकला था वहीं आज बारामूला बसा है। झील का जल सूख गया तो जान बचाने के लिए जलोद्भव इधर उधर भागने लगा उस वक्त विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया।उसके आतंक से पीड़ित लोगों ने भी चैन की सांस ली। झील का पानी बह जाने के बाद पृथ्वी की सतह भी निकल आयी। उसके बाद कश्यप ऋषि ने अपने पुत्र नील से कहा कि अब लोग यहां बस सकते हैं। वे कैसे और कहां बसेंगे इसका प्रबंध वह करे। कश्यप ऋषि से ब्रह्मा जी बहुत प्रसन्न हुए। उनके नाम पर ही इस स्थान का नाम कश्मीरा पड़ा। जब यह क्षेत्र पूरी तरह समतल हो गया, वितस्ता नदी के किनारे घाट इत्यादि तैयार हो गए, तब कश्यप मुनि ने भारत के अन्य क्षेत्रों से लोगों को यहां आकर बसने का विधिवत निमंत्रण भेजा। इस निमंत्रण को स्वीकार करके भारत के कोने-कोने से सभी वर्गों एवं जातियों के लोग यहां आकर बसने के लिए तैयार हो गए. उद्योगपति, कृषक, श्रमिक, वैद्य, ग्रह एवं मार्ग बनानेवाले कारीगर आदि ने भूमि आरक्षण के लिए प्रयास प्रारंभ कर दिये। योग्यतानुसार, नियमानुसार एवं क्रमानुसार कश्यप के ऋषि मण्डल ने सब को भूमि आबंटित कर दी। कश्यप मुनि की नाग जाति तथा अन्य वर्गों के लोगों ने नगर – ग्राम बसाए और देखते ही देखते सुंदर घर, मंदिर आदि बन गए। जियो मार्फोलाजी ने भी कश्मीर पर शोध किया था जिसमें यह पाया गया कि कश्मीर पहले बड़ा जलाशय था। कुछ अरसे बाद पानी बह गया फिर उसके ऊपर पृथ्वी की सतह आयी। कश्मीर में सदियों पहले कई राजवंशों का शासन था। कहते हैं कि प्राचीन काल में कश्मीर क्षेत्र में देवकी नदी बहती थी जो आज भी विद्यमान है। मान्यता यह है कि कश्यप ऋषि ने ही कश्मीर को बसाया था। कश्मीर के प्राचीन इतिहास को समझने के लिए जो स्रोत उपलब्ध हैं उनमें छठी से आठवीं शताब्दी के बीच लिखे गए ‘नीलमत पुराण’ का स्थान महत्वपूर्ण है। बारहवीं सदी में कल्हण द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’ में में भी कश्मीर का उल्लेख है। पुराणों में जिन बातों का उल्लेख है उसका सत्यापन जियो मार्फोलोजी द्वारा कश्मीर पर किये गये शोध से भी हुआ है। उसकी खोज में भी यह सिद्ध हुआ है कि कश्मीर में अतीत में बहुत बड़ा जलक्षेत्र था। 2017 में दिल्ली में हुए अंतरराष्ट्रीय मार्फोलोजी सम्मेलन में इस विषय में विस्तृत विचार-विमर्श हुआ था। आप पुराणों या धर्मग्रंथों में दिये गये विवरण को नकार कर सकते हैं लेकिन जब विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि धर्मग्रंथों, पुराणों में कश्मीर का जैसा वर्णन है विज्ञान के अध्ययन पर भी कश्मीर अतीत में वैसा ही था। 1960 में प्रकाशित एचएच विल्सन द्वारा लिखित ‘दी हिन्दू हिस्ट्री ऑफ़ कश्मीर’ हो या फिर 1962 में पृथ्वी नाथ कौल बम्ज़ाई द्वारा लिखित ‘ए हिस्ट्री ऑफ कश्मीर’ इन सभी पुस्तकों में मथुरा के कृष्ण का जिक्र आता है।नीलमत पुराण और राजतरंगिणी में एक प्रमुख कहानी महाभारतकालीन राजा गोनंद की है। कल्हण तो यहीं से अपना इतिहास शुरू करते हैं। इन ग्रंथों के मुताबिक कश्मीर का राजा गोनंद प्रथम कृष्ण का समकालीन था और वह मगध के राजा जरासंध का रिश्तेदार था। जब यमुना के तट पर कृष्ण और जरासंध का युद्ध चल रहा था तो गोनंद अपनी विशाल सेना के साथ जरासंध की मदद के लिए पहुंचा। गोनंद ने कृष्ण के किले पर कब्जा कर कृष्ण की घेराबंदी कर दी। लंबे समय तक गोनंद की सेना ने युद्ध किया, लेकिन आखिरकार गोनंद कृष्ण के भाई बलराम या बलभद्र के हाथों मारा गया। गोनंद के बाद उसका बेटा दामोदर कश्मीर का राजा बना। वह कृष्ण से अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए बेचैन था, उसने सही मौके की प्रतीक्षा की। थोड़े समय बाद सिंधु के तट पर गांधार के राजा ने एक स्वयंवर का आयोजन किया। इस स्वयंवर में कृष्ण ने भी अपने बाकी यदुवंशी सगे-संबंधियों के साथ भाग लिया। स्वयंवर के बाद जब दुल्हन को लेकर सभी लौट रहे थे, तो दामोदर ने इसे उपयुक्त अवसर मानकर कृष्ण पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण की अफरा-तफरी में दुल्हन मारी गई और क्रोध में आकर दूल्हे और उसके साथियों ने दामोदर की सेना को पराजित कर दिया. कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से दामोदर का अंत कर दिया। लेकिन दामोदर की पत्नी यशोवती उन दिनों गर्भवती थी. कृष्ण ने यशोवती की चिंता दूर करने के लिए ब्राह्मणों को कश्मीर भेजा। कृष्ण ने यशोवती को कश्मीर की रानी बना दिया. यह बात दरबारियों को स्वीकार नहीं थी कि कोई महिला शासक बने। इन दरबारियों को शांत करने के लिए कृष्ण ने जो कहा उसका वर्णन नीलमत पुराण के इस श्लोक में मिलता है. कश्मीराः पार्वती तत्र राजा ज्ञेयो हरांशजः। नावज्ञेयः स दुष्टोपि विदुषा भूतिमिच्छता।। पुंसां निर्गौरवा भोज्ये इव याः स्त्रीजने दृशः। प्रजानां मातरं तास्तामपश्यन्देवतामिव।। अर्थात् कश्मीर की धरती पार्वती है। यह जान लो कि उसका राजा शिव का ही एक अंश है. वह यदि दुष्ट भी हो, तो भी विद्वतजनों को चाहिए कि राज्य के कल्याण के लिए उसका अपमान न करें। स्त्री को भोग की वस्तु माननेवाला पुरुष भले ही उसका सम्मान करना न जानता हो, लेकिन प्रजा उसमें अपनी माता या एक देवी को ही देखेगी। कृष्ण के ऐसा कहने पर दरबारी या मंत्रीगण शांत हो गए और यशोवती को कश्मीर की रानी, देवी और प्रजा की माता की तरह मानने लगे. थोड़े समय बाद यशोवती ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम गोनंद द्वितीय रखा गया. बचपन में ही उसका राज्याभिषेक कर दिया गया. जब महाभारत का युद्ध लड़ा जा रहा था तो गोनंद द्वितीय बहुत छोटा था, इसलिए उसे कौरव या पांडव किसी की ओर से आमंत्रित नहीं किया गया. यही कारण है कि महाभारत युद्ध के दौरान विभिन्न राज्यों का जिक्र तो मिलता है, लेकिन कश्मीर का नहीं मिलता। परीक्षित पुत्र जनमेजय ने ऋषि वैशंपायन से यही प्रश्न किया था कि महाभारत युद्ध में सभी जगह के राजा हमारी मदद के लिए आये पर कश्मीर नहीं आया। तब वैशंपायन ने बताया था कि वहां का राजा छोटा था इसलिए कश्मीर को महाभारत के युद्ध में आमंत्रित ही नहीं किया गया था। कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी में 35 वर्षों तक राज करने वाले गोनंद तृतीय को एक महान राजा बताते हुए उसकी तुलना अयोध्या के महान राजा राम से की है। मत्स्य पुराण में अच्छोद सरोवर और अच्छोदा नदी का जिक्र मिलता है जो कि कश्मीर में स्थित है। अच्छोदा नाम तेषां तु मानसी कन्यका नदी ॥ अच्छोदं नाम च सरः पितृभिर्निर्मितं पुरा । अच्छोदा तु तपश्चक्रे दिव्यं वर्षसहस्रकम्॥ मरीच पुत्र कश्यप के नाम से पूर्व मेँ कश्यपमर या कशेमर्र नाम था। इससे भी पूर्व मत्स्य पुराण में कहा गया है- मरीचि के वंशज देवताओं के पितृगण जहां निवास करते हैं वे लोग सोमपथ के नाम से विख्यात हैं। यह पितृ अग्निष्वात्त नाम से ख्यात है। जिनके सौन्दर्य से आकर्षित होकर इन्हीँ पितरोँ की मानस कन्या अमावसु नामक पितर युवक के साथ रहना चाहती थी। जिस दिन अमावसु ने अच्छोदा को मना किया। तब से वह तिथि अमावस्या नाम से प्रसिद्ध हुई और अच्छोदा नदी रूप हो गई। अमावस्या तभी से पितरोँ की प्रिय तिथी है। इससे पहले काश्मीर को 'सती 'या 'सतीसर' कहते थे। यहां सरोवर में सती भगवती नाव में विहार करती थीं। श्रीनगर जिसका पुराना नाम प्रवर पुर है, इसी शहर की दोनों ओर हरीपर्वत और शंकराचार्य पर्वत हैं आदि शंकराचार्य ने इसी पहाड़ी पर भव्य शिवलिंग, मंदिर और नीचे मठ बनाया। माना जाता है कि कश्यप ऋषि के नाम पर ही कश्यप सागर (कैस्पियन सागर) और कश्मीर का प्राचीन नाम था। शोधकर्ताओं के अनुसार कैस्पियन सागर से लेकर कश्मीर तक ऋषि कश्यप के कुल के लोगों का राज फैला हुआ था। कश्यप ऋषि का इतिहास प्राचीन माना जाता है। कैलाश पर्वत के आसपास भगवान शिव के गणों की सत्ता थी। उक्त इलाके में ही दक्ष राजा का भी साम्राज्य भी था। जम्मू का उल्‍लेख महाभारत में भी मिलता है। अखनूर से प्राप्‍त हड़प्‍पा कालीन अवशेषों तथा मौर्य, कुषाण और गुप्‍त काल की कलाकृतियों से जम्मू के प्राचीन इतिहास का पता चलता है।

Monday, November 29, 2021

कुत्ते के काटने के कष्ट के बाद एक सुख भी मिला

 आत्मकथा-13

कुछ याद रहा, कुछ भूल गया

राजेश त्रिपाठी

(भाग-13)

चौदह इंजेक्शन मैं किसी तरह झेल गया और कुत्ते के काटने के बाद होनेवाली दूसरी तकलीफों का डर नहीं रहा।    एक दिन की बात है अम्मा मुझसे बोली-उस दुश्मन (अम्मा-बाबा जब गुस्सा होते वे भैया रामखिलावन को यही कहते थे) को चिट्ठी लिख दो कि तुम्हें कुत्ते ने काटा है। हम लोग तो जैसे उसके लिए मर गये, देखो शायद भाई का मोह उसे यहां तक खींच लाये।

 अम्मा के कहने पर मैंने चिट्ठी लिख कर भैया के पते पर डाल तो दी लेकिन मुझे उम्मीद नहीं थी कि वे आयेंगे।

 चिट्ठी भेज कर मैं भूल भी गया। दो हफ्ते बीत गये लेकिन कलकत्ता से भैया ने चिट्ठी का जवाब नहीं दिया।

 एक दिन सुबह मैं घर के बाहर चबूतरे पर बैठा था कि एक लड़का दौड़ते हुए आया और बोला-कुन्नू (बचपन में मुझे गांव में इसी नाम से बुलाया जाता था। कुन्नू का मतलब छोटा) भैया चलौ टेरियां बनिया के घर के सामने कोई बाहर से आपसे  मिलने के लिए आया है। काशीप्रसाद काका ने आपको बुलाया है।

  मुझसे मिलने कोई आया है सुन कर मैं उस लड़के साथ चल दिया। टेरियां बनिया के घर के सामने देखा काफी भीड़ जुटी है। उस भीड़ में एक ओर लंबा-सा अजनबी कमीज और पैंट पहने चुपचाप खड़ा है। मैं भी जाकर चुपचाप खड़ा हो गया।

  वहां हमारे गणमान्य काशीप्रसाद काका भी बैठे थे। उन्होंने बाहर से आये उस अजनबी से कहा-रामखेलावन, पहचानो तुम्हारा भाई कौन है।

  अब मुझे पता चला कि मेरी चिट्ठी काम कर गयी। यह तो मेरे कलकत्ता वाले भैया हैं जो मुझे कुत्ता काटने की खबर सुन कर देखने आये हैं। मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा पर मैं चुपचाप खड़ा रहा।

   शहर से कोई अजनबी आया है यह देख-सुन कर वहां अच्छी-खासी भीड़ जुट गयी थी।

 काशीप्रसाद काका के प्रश्न करने के बाद भैया की नजरें उस भीड़ में अपने भाई को खोजने लगीं। भीड़ में मेरे समवयसी साथी भी थे लेकिन संयोग देखिए भैया की आंखों ने मुझे पहचान लिया और मेरी ओर इशारा करते हुए वे काशीप्रसाद काका से बोले-मामा मेरा भाई तो यही हो सकता है।

   काशीप्रसाद काका मुसकराये और बोले- अरे रामखेलावन तुमने तो इसे कभी देखा नहीं फिर भी पहचान लिया। ठीक कहा है कि नजरें अपने-पराये में भेद करना जानती हैं।

  इसके बाद काका मेरी ओर देखते हुए बोले-जाओ बेटा भैया को घर ले जाओ, लंबी यात्रा करके आया है आराम कर लेगा।

    मैं आगे चल पड़ा और भैया मेरे साथ चलते हुए घर पहुंचे। भैया को देखते ही अम्मा और बाबा लिपट कर बिलखने लगे- अरे दुश्मन एक बार भी देखने नहीं आये कि हम मरे या जिंदा हैं।

  भैया बोले-मामा काम में इस तरह फंस गया कि फुरसत ही नहीं मिली। फिर दूर इतना है कि वहां से आना मुश्किल भले ना हो कठिन तो है। मैं आप लोगों को भूला नहीं हूं। मामा आप ना होते तो शायद मेरे रिश्तेदारों ने जमीन हड़पने के लिए जाने कब मुझे मार दिया होता। मैं कुछ भी करूं आपके ऋण से उऋण नहीं हो सकता।

   खैर थोड़ी देर में स्थिति सामान्य हो गयी और अम्मा भैया के लिए नाश्ता बनाने में लग गयी।

  अम्मा ने मुझसे कहा-भैया को लेकर बाबूलाल (हमारे अभिन्न मित्र अब सेवानिवृत जज) के कुएं में जाकर नहलाओ लाओ।

  भैया ने मुझसे कहा- चलो तुम भी अपने कपड़े ले लो वहां नहा लेना।

  मैं भैया के साथ हो लिया। हम जब बाबूलाल भाई के कुएं पहुंचा तो बाबूलाल जी भी वहां मौजूद थे। उस कुएं के आसपास उन्होंने अच्छा बगीचा लगा रखा था। अब वह बगीचा तो नहीं पर टूटा-फूटा ही सही वह कुआं मौजूद है। उसके पास ही एक हैंडपंप लगा दिया गया है। भैया कलकत्ता से एक साबुन लेकर गये थे जो कुछ-कुछ पारदर्शी थी। वे उसे लगा-लगा कर मेरी पीठ धोते और बड़े प्यार से नहलाते।



 उसकी भीनी-भीनी सुगंध और पारदर्शी रूप देख बाबूलाल जी ने भैया से पूछा- भैया जी यह कौन सी साबुन है।

  भैया जी ने बताया-यह बंगलक्खी साबुन है कलकत्ता की बनी। यह पारदर्शी इसलिए है क्योंकि यह ग्लिसरीन से बनी है।

 हमारे परम मित्र बाबूलाल यादव जी (सेवानिवृत जज) को अब तक उस साबुन का नाम याद है। जब भी उनके साथ भैया रामखिलावन का जिक्र होता है तो वे बंगलक्खी साबुन को याद कराना नहीं भूलते।

   भैया जिस दिन से आये मैं कुत्ता काटे का सारा दुख भूल गया। मैं सोच रहा था कि कुत्ते के काटने और फिर चौदह इंजेक्शन पेट में चुभवाने का दुख तो मैंने झेला लेकिन इसने मुझे एक सुख भी दिया, सुख मेरे उस भाई से साक्षात करने और उनका प्यार पाने का जिनसे मेरा परिचय अब तक केवल पत्रों के जरिये होता था।

 भैया आये तो हमारे सूने से घर में लोगों का जमघट लगने लगा। कुछ लोग भैया को देखने को आते तो कुछ उनसे कलकत्ता के किस्से सुनने।

  भैया कलकत्ता के किस्से सुनाते हुए बताते शहर इतना बड़ा है कि हमारे गांव जुगरेहली जैसे सैकड़ों गांव समा जायेंगे फिर भी शहर को पूरा नहीं ढंक पायेंगे।

   भैया स्वाधीनता संग्राम के किस्से सुनाते जिसमें देश के बंटवारे के समय हुए भीषण दंगों का भी जिक्र आ जाता। भैया ने बताया था कि जब देश स्वाधीन हुआ उन दिनों वे और भाभी निरुपमा जुगरेहली में थे।वहां वह कुछ अरसे तक रहने के लिए आये थे। 15 अगस्त 1947 के दिन हमारे गांव जुगरेहली में घनघोर वर्षा हो रही थी। भाभी कागज काट कर रंग कर छोटे-छोटे तिरंगे बना कर बंदनवार की तरह दीवारों और द्वार पर टांग रही थीं और भैया आजादी पर अपनी अमर कविता लिख रहे थे। पूरी कविता तो नहीं याद पर उसमें जिस दिन, जिस घड़ी जिस नक्षत्र में देश स्वाधीन हुआ था उसका पूरा ब्यौरा था और अंतिम पंक्ति थी-हिंद की गुलामी का रुक्म आज बेड़ा पार है। रुक्म भैया का साहित्यिक उपनाम था। भैया ने बाद में मुझे बताया था कि उन दिनों उन्हें अक्सर कवि सम्मेलनों में बुलाया जाता और उनसे लोग आजादी वाली कविता सुनाने का आग्रह करते और जब वे कहते –हिंद की गुलामी रुक्म आज बेड़ा पार है उस वक्त वहां उपस्थित सारे लोग उनके साथ यह पंक्ति दोहराते।

  *

कुछ दिन रह कर जब भैया वापस जाने लगे तो मुझसे बोले-थोड़े और बड़े हो जाओ फिर तुम्हें कलकत्ता घुमाने ले जाऊंगा। मैं और तुम्हारी भाभी भी तो अकेले हैं। मैं मामा से तुम्हें मांग लेता लेकिन फिर ये दोनों अकेले रह जायेंगे। हां, मैं बीच-बीच में आकाशवाणी के कलकत्ता स्टेशन से वार्ता पढ़ता हूं जो यहां भी तुम रेडियो में सुन सकते हो। मैं पत्र में पहले से उसकी डेट टाइम और स्टेशन लिख भेजूंगा।

   भैया जिस दिन वापस जाने लगे मैं उनसे लिपट कर बहुत रोया। मैंने पाया अम्मा,बाबा भी सिसकियां भर कर रो रहे हैं। भैया भी रो रहे थे। वे बाबा से बोले-मामा रोइए मत मैं जल्दी-जल्दी आने की कोशिश करूंगा। जाते-जाते भैया अम्मा से कहते रहे –मामी भाई को बैठा कर मत रखो जैसे भी हो इसे पढ़ाओ जरूर। अम्मा ने सिर हिला कर हामी भर ली।

  भैया चले गये,कुछ दिन की खुशी देकर हम सबको फिर घोर उदासी के माहौल में छोड़ कर जहां परिवार का भार अकेली उठाने वाली मां और धीरे-धीरे आंखों की ज्योति खोते बाबा हैं जो यह सोच कर दुखी रहते कि उनके बढ़ते बेटे को जब उनके हाथों का सहारा चाहिए वे अपने स्वास्थ्य को लेकर विवश थे। सात-सात लोगों का अकेले मुकाबला करने वाला व्यक्ति आज अपना खुद का ख्याल रखने लायक नहीं रहा।

  भैया ने कलकत्ता वापस लौटने के कुछ दिनों बाद ही पत्र भेजा जिसमें उन्होंने अपनी रेडियो वार्ता की डेट और समय व स्टेशन का नाम लिख भेजा था। संयोग से उन दिनों अमरनाथ भैया गांव में ही थे। मैं शाम को भैया का पत्र लेकर उनके पास गया। उनके पास एक बड़ा-सा रेडियो था जिस पर काठ का बक्सा था। उसके अंदर तीन लंबे से बल्ब थे जो जलते रहते थे। अमरनाथ भैया ने स्टेशन खोज कर लगाया तो वहां से घोषणा सुनायी दी-यह आकाशवाणी का कलकत्ता केंद्र है अब आप रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म से सुनिए वार्ता। अब वार्ता का शीर्षक तो याद नहीं आ रहा लेकिन उस वार्ता को वहां बैठे सभी लोगों ने आश्चर्य और हर्ष से सुना। आश्चर्य इस बात का कि हजारो मील दूर बैठे उनके व्यक्ति की आवाज वे सुन पा रहे हैं। हर्ष इस बात का कि गांव के मान रामखिलावन उनसे दूर रह कर पास हैं वे उनको सुन पा रहे हैं।

  काशीप्रसाद काका भी बड़े आश्चर्य से वार्ता को सुन रहे थे। वे बोले-अरे भाई द्याखौ कितनी दूर बैठा रामखिलावन बोल रहा है और हम सुन पा रहे हैं। भाई कमाल है।

*

 भैया चले गये। कई दिन तक घर में उदासी छायी रही। अम्मा-बाबा अपने भांजे की याद में खोये-खोये रहे फिर धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो गयी।

 पिता जी की आंखों की बिगड़ती स्थिति से मैं और अम्मा बहुत परेशान थे। करते तो क्या आसपास कोई आंख का अस्पताल ही नहीं था। गांव में जो कोई कुछ बताता वही करते। अम्मा आंख का अच्छा अंजन बनाना जानती थीं उसे आजमाया गया लेकिन फायदा नहीं हुआ। वह कहते हैं ना कि अपनी दवाई अपने को नहीं लगती।

 एक दिन पास के एक गांव से एक बुजुर्ग वैद्य आया जो लौकी का बना कमंडल हर वक्त लिये रहता था। इसी वजह से लोग उसे लोग लउकहवा (लौकी का कमंडल रखनेवाला) वैद्य कहते थे। कुछ लोगों के कहने पर बाबा को उनको दिखाया तो वे बोले आंखें ठीक हो जायेंगी। उन्होंने निर्गुंडी और ऐसी ही कुछ औषधियों का सेवन करने को कहा इसके अलावा लहसुन का काढ़ा पिलाने को कहा। हमें कोई समझ नहीं थी हम जून के महीने में लहसुन का काढ़ा पिलाते रहे। तब मुझे यह पता नहीं था कि लहसुन की तासीर गरम होती है। जो होना था वही हुआ। कुछ दिन में बाबा की बाईं आंख की पुतली में सूजन आ गयी। एक दिन अचानक उनकी उसी आंख से खून रिसने लगा। संयोग से उन दिनों अमरनाथ भैया गांव में ही थे। मैं दौड़ा-दौड़ा उनके घर गया और रोते-रोते सारा हाल बताया। उन्होंने मुझे चुप कराते हुए कहा-चिंता मत करो सब ठीक हो जायेगा।

 घर पहुंचते ही उन्होंने हमारे पड़ोसी झल्ला बापू को बैलगाड़ी तैयार करने को कहा। इसके बाद मेरी अम्मा से बोले-काकी काका को बांदा ले जाना पड़ेगा वहीं इनका आपरेशन हो पायेगा। सड़क तक बैलगाड़ी में ले जायेंगे फिर वहां से बस पकड़ लेंगे।

 वह लोग बाबा को बांदा ले गये इधर हम चिंता में बैठे रहे अम्मा और मैं दोनों ने वह वक्त रोते गुजारा जब तक बाबा बांदा के अस्पताल से वापस नहीं आ गये। उनकी वह आंख निकालनी पड़ी थी। हम लउकहवा वैद्य के लहसुन के काढ़े को दोष देते या अपनी तकदीर को कोई लाभ नहीं था जो नुकसान होना था वह तो हो ही गया था।

मेरे बाबा (पिता जी) स्वर्गीय मंगल प्रसाद तिवारी
 बाबा एक-दो हफ्ते में ठीक हो गये। इस बीच अमरनाथ भैया हर दूसरे दिन उनकी आंख की पट्टी बदल जाते नये ढंग से टिंचर और दवा डाल कर। जब बाबा का घाव भर गया तो भैया अमरनाथ ने बाबा से कहा-काका अब आप ठीक हैं। चिंता की कोई बात नहीं अब मुझे इलाहाबाद कालेज लौटना है।

  बाबा बोले-बेटा भगवान तुम्हारा भला करें। तुमने मेरी जिंदगी बचा ली। कोई बात नहीं तुम जाओ जैसा तुम बता जाओगे दवाई खाता रहूंगा। बाबा को प्रणाम कर अमरनाथ जी लौट गये और दूसरे दिन इलाहाबाद के लिए रवाना हो गये।

*

काफी दिनों से मेरे पढ़ाई छोड़ घर में बैठे रहने से अम्मा भी बहुत परेशान थीं। वे चाह रही थीं कि किसी ना किसी तरह से मेरी आगे की पढ़ाई शुरू हो।

  हमारे घर की दायीं ओर एक घर था जिसमें मथुरा प्रसाद कुर्मी रहते थे। उनके एक भाई गयाप्रसाद हमारे गांव से तकरीबन आठ किलोमीटर दूर गांव साथी में रहते थे। वे अक्सर अपने भाई मथुरा प्रसाद के पास आते थे और हम सब उनसे अच्छी तरह परिचित थे।

 एक दिन अचानक गयाप्रसाद अपने भाई से मिलने हमारे गांव जुगरेहली आये। जब वे अपने भाई के घर आये उस समय हम लोग घर के सामने ही खड़े थे। अम्मा को देख कर गयाप्रसाद ने कहा-तिवारिन दाई पांयलागी (चरण स्पर्श)।

अम्मा ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इसके बाद गयाप्रसाद ने पूछा-तिवारिन दाई बेटा कहां पढ़ रहा है।

  अम्मा ने जवाब दिया-कहीं नहीं घर में बैठा है किसी स्कूल में नहीं भेज पा रहे।

 गयाप्रसाद-अरे इसमें चिंता की क्या बात है। हमारे साथी में एक संस्कृत गुरुकुल है जहां संस्कृत की पढ़ाई होती है। गुरुजी भी बहुत अच्छे हैं। आप मेरे साथ चलो बेटे को लेकर चिंता की क्या बात है अपना घर है हम लोगों के साथ रहेगा मानो अपने घर में रहेगा। ऐसे तो विद्यालय में भी रहने की व्यवस्था है लेकिन जब अपना घर है तो यह वहां में क्यों रहेगा।

 मां बहुत देर तक आनाकानी करती रही। वह मुझे अपनी नजरों से दूर नहीं भेजना चाहती थी लेकिन मेरे भविष्य को लेकर भी उसे चिंता थी। बहुत समझाने पर अम्मा मान गयी हालांकि मेरा गांव से जाने का मन नहीं था  लेकिन अम्मा के समझाने पर मन मार कर मैं मान गया। अम्मा ने बाबा की देखरेख का जिम्मा अपनी एक विश्वसनीय प़ड़ोसन को सौंप दिया।

 दूसरे दिन अम्मा, मैं और गयाप्रसाद साथी गांव के लिए रवाना हो गये। किसी सवारी वगैरह की कोई सुविधा तो थी नहीं हम तीनों को आठ किलोमीटर का लंबा सफर पैदल तय करना पड़ा। अम्मा मुझे संस्कृत विद्यालय में छोड़ कर वापस जाने लगी तो मैं यह सोच कर रोने लगा कि अम्मा तो जा रही है अब ना जाने कितने दिन बाद गांव लौटना और मां से मिलना हो सकेगा। मां को अपने से जितना दूर होते देखता मेरा रोना उतना जोर होता जाता था।

 संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य गौर वर्ण,हृष्ट पुष्ट शरीर वाले थे। उन्होंने मुझे बहुत देर तक प्रेम से समझाने का प्रयत्न किया पर मेरा रोना बंद  ना हुआ। जब मां आंखों से ओझल हो गयी तो मैं और जोर-जोर से रोने लगा। हमारे आचार्य जी का धैर्य टूट गया। उन्होंने जोरदार चांटा मेरे मुंह पर मारा और कहा-अब चुप हो जाओ वरना मेरा गुस्सा बढ़ जायेगा। तुम्हारी मां तुम्हें यहां पढ़ने और अपना भाग्य बनाने के लिए रख गयी है। तुम्हें अब यहां रह कर पढ़ना है।

  मैं सिसकते-सिसकते चुप हो गया तो आचार्य ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-बेटा मुझे क्षमा करना मैंने तुम पर हाथ उठाया। मैं तुम्हें रोते नहीं देख पाया। बेटे हमें भी पढ़ने के लिए गृहत्याग करते समय रोना आ गया था। अच्छा यह बताओ तुम्हारे रहने का प्रबंध यहां अन्य विद्यार्थियों के साथ करना होगा ना।

 मैंने आचार्य जी के चरण छुए और कहा-नहीं गुरु जी यहां मेरे परिचितों का घर है मैं वहीं रह लूंगा।

 उस दिन गुरु जी ने मुझे कुछ पुस्तकें दीं जिनमें पाणिनी की लघुसिद्धांत कौमुदी, रघुवंश महाकाव्य, हितोपदेश, अभिज्ञान शाकुंतलम् आदि थीं।

  मैं संस्कृत विद्यालय से वापस अपने परिचित गयाप्रसाद के घर आ गया जो अब साथी गांव में मेरा ठिकाना था। गयाप्रसाद के घर में उनकी पत्नी, बेटा और बहू थे। मेरे वहां जाने से उनके घर के सदस्यों में एक और जुड़ गया था।

  अम्मा की याद बराबर आती लेकिन अब मैंने रोना बंद कर दिया था क्योंकि रोता तो मेरे आश्रयदाता गयाप्रसाद को भी बुरा लगता और संस्कृत विद्यालय के गुरु जी को भी।

 संस्कृत मेरे लिए ऐसी भाषा थी जिससे अब तक मेरा कोई संबंध नहीं था। अब लघुसिद्धांत कौमुदी का एक-एक सूत्र याद करने में पसीने छूट रहे थे। उदाहरण के लिए एक सूत्र था –इको यणचि अर्थात संधि होने पर इ का य हो जाता है या अक:सवर्णे दीर्घ: अगर अ और अ हों तो दोनों मिल कर दीर्घ अर्थात आ हो जाते हैं। कठिनाई इन्हें याद करने में नहीं थी इसकी पूरी प्रक्रिया के लिए जो सूत्र होता था वह इतना लंबा होता की उसे याद करने में पसीने छूट जाते थे।

 धीरे-धीरे चीजें संस्कृत विद्यालय में सहज होने लगीं। गुरु जी मुझसे विशेष स्नेह करने लगे थे शायद यह सोच कर कि में विद्यालय में सहज हो सकूं। मैं तो अपने आश्रयदाता गयाप्रसाद के घर में ही खाता था मेरे बाकी सहपाठी विद्यालय में बने कमरों में रहते थे वही भोजनालय में भोजन बनाते और पाते थे।

 हमारे गुरु जी भी विद्यालय में ही रहते थे और वहीं के भोजनालय में भोजन ग्रहण करते थे। मैं देखता था कि वे दोपहर को जब भोजन ग्रहण करने जाते तो पहले नीम की पिसी पत्तियों का एक गोला पानी के सहारे गटक लेते फिर भोजन पाते।

  हमारे विद्यालय में एक गोरा-चिट्टा सहपाठी था जिसका चेहरा सुर्ख रंग का था लगता था थोड़ा जोर से खरोंच लगे तो खून टपकने लगे। उसका नियम था वह रोज शौच आदि से निवृत होकर एक उपले का अंगारा लाता और विद्यालय के प्रांगण में रख कर उसमें दो हरड़ भूनता और पानी के साथ निगल जाता। यह उसका नित्य का नियम था। वह ऐसा क्यों करता है बाद में पता चला जब कहीं यह पढ़ा कि-हरत हरड़ सब रोग।

  संस्कृत विद्यालय के प्रांगण में एक बड़ा पीपल का पेड़ था। जब पतझड़ का मौसम आता तो उससे झड़े पत्तों से उसके नीचे का परिसर भर जाता। ऐसे में हम लोगों को झाड़ू से वे सूखे पत्ते साफ करने पड़ते थे। इसमें एक के बाद एक छात्र की बारी पड़ती थी। ऐसे ही एक दिन उन सूखे पत्तों की सफाई करने की मेरी बारी आयी। मैं झाड़ू लेकर पत्ते साफ कर रहा था सामने हमारे आचार्य जी बैठे थे। मैं पूरे बांह वाली शर्ट पहने था। अचानक मेरी दायीं बांह के अंदर कुछ कुलबुलाता महसूस हुआ। मैंने आचार्य जी को बताया उन्होंने कहा-बांह की बटन खोल कर झिटक दो।

    मैंने वैसा ही किया। मेरे बांह झटकते ही सामने एक सपोला (सांप का बच्चा) धरती पर गिर कर तिनतिनाने लगा।

  गुरु जी उसे देखते ही चौंक गये और बोले –देख लो इसने काटा तो नहीं।

मैंने बांह सिकोड़ कर देखा और पूरी तरह से आश्वस्त होकर बोला-नहीं गुरु जी काटा तो नहीं।

  वे भी आश्वस्त हुए और बोले-छोड़ दो और सफाई नहीं करनी होगी। कल कोई मजदूर लगवा कर सफाई करा लेंगे। अब से किसी छात्र को इस काम में नहीं लगाया करेंगे।

 *

 संपोले वाले प्रसंग से मुझे अपने बाबा की याद आ गयी जो सांप काटे का मंत्र जानते थे और उनके कुछ शिष्य भी उनके साथ मिल कर सांप काटे व्यक्ति को झाड़ते और औषधि देते थे। हमारे गांव से सांप के काटे किसी व्यक्ति को कभी अस्पताल नहीं जाना पड़ा। बाबा और उनके शिष्य शाबर मंत्र और आयुर्वेद की औषधि से विषैले से विषैले सांप के काटे व्यक्ति को ठीक कर देते। यह हमने प्रत्यक्ष देखा है।

 शाबर मंत्र विचित्र होता इसमें सांप झाड़नेवाले कई व्यक्ति धीरे-धीरे मंत्र बोलते और अंत में सांप काटे व्यक्ति के कान के पास जाकर जोर से चिल्लाते-विष खरररा। अगर विष ज्यादा चढ़ गया होता और सांप काटे व्यक्ति को बार-बार तंद्रा सी आने लगती तो उसके पैर के नाखूनों को संडसी से जोर से दबा कर उसे हर हालत में जगाये रहने की कोशिश की जाती। इसके बारे में मुझे बताया गया था कि अगर व्यक्ति सो जाता है तो इसका मतलब यह कि विष पूरे शरीर में व्याप गया है और फिर उसे विष से उबारना मुश्किल हो जायेगा। जब रोगी विषमुक्त हो होश में आ जाता तो उसे एक जड़ी बूटी का घोल पिलाया जाता। यह जडी-बूटी बाबा और उनके शिष्य खोद कर लाते थे। इसे लाने का भी एक विधान था। पहले दिन उस औषधि के पास जाकर प्रणाम कर उसे आमंत्रित किया जाता है कि कल हम आपको लेने आयेंगे। दूसरे दिन कुदाल लेकर उस औषधि की ज़ड़ काट कर ले आते थे। सांप काटे व्यक्ति को इसी को पीस कर पिलाया जाता था।

  एक बार अम्मा ने बाबा से कहा-अरे एक बार बेटे को भी ले जाइए इसे भी औषधि की पहचान करा दीजिए।

 बाबा बोले-इसे मत भेजो, यह डर जायेगा।

 अम्मा बोली- इसमें डरने की क्या बात है ले जाइए ना।

 बाबा मुझे ले जाने के पक्ष में नहीं थे लेकिन अम्मा की जिद के आगे उन्होंने हामी भर ली।

  जिस दिन औषधि को खोद कर लाना था उस दिन सूरज उगने से पहले उन्होंने मुझे जगाया और बोले-चलो औषधि लेने जाना है।

   मेरी जाने की इच्छा नहीं थी लेकिन अम्मा की जिद के आगे मन मार कर मैं बाबा और उनके शिष्यों के साथ चल दिया। उनके हाथ में एक कुदाल था। गांव से तकरीबन डेढ़ मील दूर हम एक जंगल में पहुंचे। वहां एक जगह मोटे पत्तों वाली वह औषधि दिखी। यह एक छोटे आकार का पौधा था। वहां जाकर बाबा के एक शिष्य ने औषधि को प्रणाम कर जैसे ही उसकी जड़ में पहला कुदाल चलाया। अब तक साफ पड़ी उस जगह में  अचानक जाने कहां से कई सपोले (सांप के बच्चे) निकल कर तिनतिनाने लगे उन्हें देखते ही मेरे होश उड़ गये मैं उलटे पैर घर की ओर भागा। देखा बाबा और उनके शिष्य बिना डरे औषधि की जड़ की संग्रह में लगे हैं।

  घर पहुंचा तो अम्मा ने पूछा-क्या हुआ भाग आये।

 मैं बोला-क्या करता वहां सांप निकलने लगे थे।

 बाबा जब लौटे तो अम्मा को डांटने लगे- कहा था ना इसे मत भेजो डर  कर भाग आया। हम लोगों का तो रोज का काम है। वे सपोले एक तरफ भाग गये और यह देखो हम दवा ले आये।

  मैंने देखा उनके हाथ में सफेद रंग की कई जड़ें थी। इसे ही पीस कर वे उस व्यक्ति को पिलाते थे जिसे सांप ने काटा होता था। यह भी देखा करता था कि उस व्यक्ति का जहर उतरा है या नहीं इसके लिए उसे सूर्य लहर दिलायी जाती थी। सूर्य लहर दिलाने के लिए उस व्यक्ति को काठ के पीड़े पर खड़ा कर के सूर्य की ओर देखने को कहा जाता था। सूर्य की ओर ताकते समय अचानक उसके शरीर में एक झटका सा लगता वह एक ओर झुकते हुए कांपता और फिर धीरे से सीधा खड़ा हो जाता। इसका मतलब यह लगाया जाता कि वह व्यक्ति विषमुक्त हो गया है। अपने बचपन में हमने बाबा और उनके शिष्यों को सांप काटे कई व्यक्तियों को ठीक करते और सूर्य लहर लिवाते देखा था।

  बाबा से एक बार सांप काटे के उपचार में प्रयोग आने वाले शाबर मंत्र के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यह मंत्र स्वयं शिवजी द्वारा बनाया गया है। इस बारे में एक कथा प्रचलित है कि एक बार शंकर जी को भी सृष्टि की रचना की इच्छा हुई तो उन्होंने सांप, बिच्छू जैसे जहरीले जंतु रच डाले। इस पर पार्वती जी बोलीं-संसार के लिए आपने यह मुसीबत तो रच दी अब इससे बचने का भी कोई उपाय बता दीजिए जिससे इनके काटने से व्यक्ति को मरने से बचाया जा सके। इसके बाद शिवजी ने शाबर मंत्र की रचना की जो निरर्थक होते हुए भी सार्थक कार्य करते हैं। इन मंत्रों को दीपावली की मध्यरात्रि को सिद्ध किया जाता है। यह काम हर वर्ष दीपावली के दिन करना पड़ता है। बाबा भी अपने शिष्यों के साथ हर वर्ष यह मंत्र सिद्ध करते थे जिसे वे लोग मंत्र जगाना कहते थे। (क्रमश:)

Sunday, November 28, 2021

क्या अर्जुन का संपर्क परग्रही लोगों से था?




स्विस लेखक एरिक वान डेनिकेन की पुस्तक ‘चैरिएट आफ गॉड’ में परग्रहियों यानी एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल का उल्लेख मिलता है। अर्थात हमारे ग्रह पृथ्वी से अलग किसी और ग्रह के लोग।इतना ही नहीं एरिक का तो यहां तक कहना है कि वे हमारी दुनिया पर बराबर नजर रख रहे हैं। उनके अनुसार वे बीच-बीच में हम लोगों से संपर्क करने का प्रयत्न भी करते हैं। यह भी कि कभी ना कभी उनका पृथ्वी के लोगों से संपर्क अवश्य होगा। डेनिकेन का कहना है कि भारत में महाभारत युद्ध के योद्धा अर्जुन का इन परग्रहियों से संबंध था। दुनिया में आज भी कई ऐसे लोग हैं जो इनके बारे में जानते हैं। ये परग्रही बुद्धि बल और ज्ञान-विज्ञान के मामले में पृथ्वी लोक के मानवों से बहुत-बहुत आगे हैं। उनके पास उन्नत किस्म के स्पेसशिप और अस्त्र आदि हैं। एरिक का कहना है कि पृथ्वी में पिरामिड जैसे व ऐसे अन्य प्राचीन निर्माण में इन परग्रहियों की भूमिका हो सकती है। वे यहां तक मानते हैं कि पृथ्वी पर अनेक बड़ी-बड़ी चट्टानों आदि में उत्कीर्ण अद्भुत से चित्र और मूर्तियां या अक्षर इन परग्रहियों द्वारा पृथ्वी के लोगों से संपर्क साधने का साधन भी हो सकते हैं। उड़नतश्तरियां भी इस तरह के दावे की पुष्टि करती सी लगती हैं। पृथ्वी पर कई जगह उड़नतश्तरियों के उतरने और उनसे विचित्र शक्ल के व्यक्तियों के निकलने की खबरें अक्सर पश्चिमी देशों से आती रही हैं। इन लोगों को एलियंस कहा जाता है। यह भी एक तरह से परग्रही ही होंगे। धर्म ग्रंथों में उल्लखित पुष्पक विमान आदि भी इस बात का प्रमाण हैं कि उन दिनों विज्ञान कितना आगे था। लोग पुष्पक विमान को काल्पनिक मानते थे लेकिन हमारे राष्ट्रपति रहे एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था कि पुष्पक विमान कल्पना नहीं हकीकत थी। सुना है कलाम साहब की बतायी तकनीक के आधार पर हमारे वैज्ञानिक क्रयोजेनिक इंजन विकसित करने की दिशा में काफी आगे बढ़ गये हैं। अगर प्राचीन धर्मग्रंथों पर विश्वास करें तो महाभारत काल में कुंती के पुत्र अर्जुन वस्तुत: इंद्र को वरदान से हुए थे। इस बारे में कहा जाता है कि जब पाण्डु संतान उत्पन्न करने में असफल रहे तो कुन्ती ने उनको एक वरदान के बारे में याद दिलाया। कुन्ती को कुंआरेपन में महर्षि दुर्वासा ने एक वरदान दिया था जिसमें कुंती किसी भी देवता का आवाहन कर सकती थीं और उन देवताओं से संतान प्राप्त कर सकती थी। पाण्डु एवं कुन्ती ने इस वरदान का प्रयोग किया और इन्द्र देवता का आवाहन किया। इस प्रकार अर्जुन इन्द्र के पुत्र थे। उल्लेख मिलता है कि वे इंद्र के दरबार में भी गये थे जहां उनकी भेंट इंद्र के दरबार की अप्सरा उर्वशी से भेंट हुई। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन को पृथ्वी लोक से इंद्रलोक जाने की कला आती थी। यह भी सिद्ध होता है कि उसका परग्रहियों से संपर्क था। कहते हैं कि मंगल ग्रह से आए एक उल्कापिंड के कुछ ढांचे बैक्टीरिया के जीवाश्म जैसे लगते हैं। कुछ वैज्ञानिकों ने इसके परग्रही जीवन के चिन्ह होने का दावा किया। परग्रही जीवन या पथ्वी से इतर जीवन (एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रिटल) वह सम्भावित जीवन है जो पृथ्वी से अलग किसी अन्य पिण्ड पर विद्यमान हो और जिसकी उत्पत्ति भी पृथ्वी से न हुई हो। यह परिकल्पित जीव सरल अकेन्द्रिक हो सकते हैं या मानवों से कहीं अधिक विकसित व शक्तिशाली सभ्यता वाले जीव भी हो सकते हैं। जिन कल्पनाओं में ऐसे परग्रही जीवन में बुद्धि की उपस्थिति मानी जाती है उसे "परग्रही चेतना" या एक्सट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस कहते हैं। नासा चीफ बिल नेल्सन का कहना है कि ब्रह्मांड में हैं एलियन एक दिन उनसे होगा संपर्क। बिल नेल्सन पूर्व एस्ट्रोनॉट भी रहे हैं। उनका कहना है कि है इस ब्रह्मांड में इंसान अकेले सभ्य जीव नहीं हैं। इनके अलावा और भी बुद्धिमान जीवों के होने की जिन्हें हम इंटेलिजेंट लाइफ कहते हैं या आम भाषा में कहें तो एलियन कहा जाता है। मानव की एक दिन अवश्य इन एलियंस से भेंट होगी। नेल्सन का यह बयान पेंटागन द्वारा एलियन यानों पर दी गई रिपोर्ट के कुछ ही हफ्ते बाद आया है। रिपोर्ट में कहा गया था कि एलियन यानों की पुष्टि नहीं कर सकते, लेकिन धरती के अलावा भी कुछ ग्रहों पर इंटेलिजेंट जीवन का वास जरूर होगा। नासा लगातार इन चीजों पर नजर रख रही है। साथ ही अंतरिक्ष से आने वाले सिग्नलों, संदेशों का भी अध्ययन करने की कोशिश की जा रही है। नेल्सन का कहना है कि जब आपके सामने 13.5 बिलियन साल पुराना ब्रह्मांड हो तो इस बात की पूरी संभावना रहती है कि दूसरे सूरज भी होंगे। दूसरी धरती भी होगी, अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा लगातार अपने सौर मंडल और उससे बाहर के ग्रहों और तारों में ऐसे इंटेलिजेंट लाइफ को खोजने का काम कर रही है। हर धर्म के धर्मग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि पृथ्वी के लोगों संदेश देने महान आत्माएं पृथ्वी पर आती थीं। इन्हें कोई देवता कहता है कोई देवदूत या फिर कोई एंजेल। इनका काम विश्व को शांति और प्रेम का संदेश देना था। हिस्ट्री चैनल की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्षों के वैज्ञानिक शोध के बाद यह पता चला कि 12 हजार वर्ष ईसा पूर्व धरती पर देवता या दूसरे ग्रहों के लोग पृथ्वी पर उतरे थे। हिस्ट्री चैनल की एक सीरिज अनुसार ऐसा माना जा सकता है कि वे अलग-अलग काल में अलग-अलग धर्म और समाज की रचना कर धरती के देवता या कहें कि फरिश्ते बन बैठे। सचमुच इंसान उन्हें अपना देवता या फरिश्ता मानता है।अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें कहा था कि एलियन के यान यूएफओ के बारे में पुख्ता जानकारी नहीं पर पृथ्वी के चारों ओर मौजूद लगभग दो हजार तारों के चारों तरफ एलियंस चक्कर लगा रहे हैं। ये तारे पृथ्वी से 325 प्रकाश वर्ष की दूरी के अंदर स्थित हैं। इनमें से 1402 तारे ऐसे हैं जहां पृथ्वी से पिछले 100 सालों में जितनी भी रेडियो तरंगें अंतरिक्ष में भेजी गई हैं, उन्हें 75 तारों के आसपास रोका गया है। ये तारे धरती से काफी पास हैं। स्टीवेन स्पेलबर्ग की एक बहुचर्चित अंग्रेजी फिल्म ‘एनकाउंटर आफ थर्ड काइंट’ आयी थी जो अनआइडेंटीफाइड आब्जेक्ट या यूएफओ पर आधारित थी। इसमें धरती के एक व्यक्ति का सामना यूएफओ से होता है तो उसके बाद क्या होता है यह दर्शाया गया है। अनजाने तथ्यों को जानने की उत्कट अभिलाषा ने ही मनुष्य को इस संधान के लिए प्रेरित किया कि हमारे विश्व के आसपास कोई दूसरी दुनिया है क्या है तो वहां के लोग कैसे हैं। प्राचीन सभ्यता के अनुसार इजिप्ट और माया सभ्यता के कुछ लोग मानते थे कि अंतरिक्ष से हमारे जन्मदाता एक निश्चित समय पर पुन: लौट आएंगे। उन्हें विश्वास था कि उनके देवता ओसाइशिरा उन्हें लेने जल्द वापस आयेंगे। यही वजह है की मिस्र के गिजा के निवासियों की मृत्यु के बाद उनके शरीर को ममी बना दिया जाता ‍कि उनके आकाशदेव उन्हें अं‍तरिक्ष में ले जाकर उन्हें फिर से जीवित कर देंगे। इजिप्ट के पिरामिडों की लिखावट से पता चलता है कि स्वर्ग से आए थे देवता और उन्होंने ही धरती पर जीवों की रचना की। इजिप्ट के राजा उन्हें अपना पूर्वज मानते थे। उन्होंने इजिप्टवासियों को कई तरह का ज्ञान दिया। उनकी कई पीढ़ियों ने यहां शासन किया। भारतीय, मिस्र, ग्रीस, मैक्सिको, सुमेरू, बेबीलोनिया और माया सभ्यता के अनुसार वे कई प्रकार के थे, जैसे आधे मानव और आधे जानवर। इंसानी रूप में वे लंबे-पतले थे। उनका सिर पीछे से लंबा था। वे 8 से 10 फीट के थे। अर्धमानव रूप में वे सर्प, गरूड़ और वानर जैसे थे। दूसरे वे थे जो राक्षस थे, जो बहुत ही खतरनाक और लंबे-चौड़े थे। चीन में पवित्र ड्रेगन को स्वर्गदूत माना जाता है, स्वर्गदूत मनुष्यों से बिलकुल अलग स्तर के प्राणी हैं। मनुष्य मरने के बाद स्वर्गदूत नहीं बन जाते हैं। स्वर्गदूत भी कभी मनुष्य नहीं बनेंगे और न कभी मनुष्य थे। परमेश्वर ने ही स्वर्गदूत की सृष्टि की, जैसे कि उसने मानव जाति को बनाया। रूस में आज भी पुरातत्त्ववेताओं को कभी-कभी खुदाई करते हुए प्राचीन रूसी देवी-देवताओं की लकड़ी या पत्थर की बनी मूर्त्तियाँ मिल जाती हैं। कुछ मूर्त्तियों में दुर्गा की तरह अनेक सिर और कई-कई हाथ बने होते हैं। रूस के प्राचीन देवताओं और हिन्दू देवी-देवताओं के बीच बहुत ज़्यादा समानता है। यह हो सकता है कि रूस में भी पहले लोग हिन्दू ही होंगे। बाद में उन्होंने दूसरे धर्म स्वीकार कर लिये होंगे। ब्रह्मा को सृष्टि का सर्जक विष्णु को पालक और शिव को संहारक माना जाता है। परग्रही यानी दूसरी दुनिया के लोगों या एलियंस के अस्तित्व को लेकर भले ही अभी संदेह हो लेकिन इनको लेकर अक्सर कई तरह की बातें सुनने में आती ही रहती हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि पृथ्वी से बाहर अंतरिक्ष में मौजूद एलियंस और अन्य जीव पृथ्वी के लिए खतरा हैं। भविष्य में ये जीव पृथ्वी पर आक्रमण भी कर सकते हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि अभी तक एलियंस या बाह्य जीवों का धरती पर हमला करना सिर्फ एक कल्पना मात्र था. लेकिन अब जल्द ही ये कल्पना हकीकत में बदल सकती है। सच्चाई कुछ भी हो लेकिन यह तय है कि व्यक्ति का स्वभाव सदा से अज्ञात को जानने के प्रति लालायित रहा है। वह दिन दूर नहीं जब हम परग्रहियों के बारे में और अधिक जानकारी हासिल करने में सफल होंगे। यह भी सच है कि हमारे धर्मग्रंथों में भगवान के अनेक अवतारों के रूप में पृथ्वी पर आने का उल्लेख मिलता है।

Friday, November 26, 2021

पागल कुत्ते ने मेरी जान ही ले ली होती

 आत्मकथा-12

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

(भाग-12)

आलमपुर में पढ़ तो रहा था लेकिन वहां पढ़ने से कोई लाभ नहीं था। मैं वर्णमाला की पढ़ाई से काफी आगे अछाह की पाठशाला में ही पहुंच चुका था। उसी को दोहराना वक्त की बरबादी ही थी इसके अलावा और कुछ नहीं। मुझे आगे की कक्षा में होना चाहिए था। लेकिन कोई उपाय नहीं था।

 उधर एक नय़ी तकलीफ सामने आ गयी थी। पिता जी की आंखों में मोतियबिंद उतर आया था जिसके चलते उनकी नजर धीरे-धीरे कमजोर हो रही थी। जब एक आंख से दिखना लगभग बंद हो गया तो गांव के ही एक व्यक्ति के साथ वे चित्रकूट के सीतापुर गये जहां बहुत बड़ा आई आपरेशन कैंप लगा था। वहां उनका आपरेशन भी हुआ लेकिन वह सफल नहीं हुआ। उस आंख से जो थोड़ा-बहुत दिखता था वह दिखना भी बंद हो गया।

    अब मां के साथ मैं खेतों पर जाता। जो हलवाहा हमारा काम देखता था उसे मां काम समझा देतीं और मैं तब तक झड़बेरी के मीठे बेर तोड़-तोड़ कर इकट्ठा करता। हमारे खेत में ज्वार, बाजरा, अरहर. मूंग आदि खरीफ की फसल होती। खेत के निचले समतल हिस्से में गेहूं,चना, सरसों आदि रबी की फसल होती थी।

*

 मैं अकसर पिता जी को चुपचाप रोते, आंसू बहाते देखता तो उनसे पूछता-बाबा क्यों रो रहे हैं।

वे-कुछ नहीं कह कर टाल देते।

अम्मा (मां) से पूछता-बाबा क्यों रोते हैं ।

अम्मा ने बताया- जब भी अपने जीजा जी और भांजे की याद आती है तो इसी तरह चुपचाप रोते रहते हैं। फिर कलकत्ता से तेरे भैया की चिट्ठी भी कई महीने से नहीं आयी इसलिए और परेशान हैं।

 मैंने कहा-भैया को क्या हो गया है। जानते हैं कि उनके मामा को उनकी कितनी चिता रहती है एक चिट्ठी भेज कर अपनी खबर देने में क्या जाता है।

अम्मा कुछ नहीं बोलतीं बाबा को समझाने लगतीं-वह ठीक होगा आप परेशान ना हों।

 दूसरे दिन हमारे गांव में कहीं से एक जादूगर आया जो मंत्र-तंत्र भी जानता था। वह हमारे गांव के एक बड़े काश्तकार की चौपाल में चमत्कार दिखा रहा था। पहले तो उसने गांव के दो नवयुवकों को एक अंधेरी कोठरी में जाने को कहा और यह हिदायत भी दे दी कि वे जो भी देखें उससे डरें नहीं। वे दोनों युवक डरते-डरते अंधेरी कोठरी में गये और बाहर आये तो उनकी आंखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गयी थीं। सबने उनको हक्का-बक्का बना देख कर पूछा- अरे बोलती क्यों बंद हो गयी। अंदर तुम लोगों ने क्या देखा।

  उन युवकों ने जो बताया उससे वहां उपस्थित सारे लोग दंग रह गये। उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा।

 उन लोगों ने बताया-हमारे अंधेरी कोठरी में घुसने के कुछ देर बाद ही आंख चौंधिया देने वाली रोशनी प्रकट हुई। उस रोशनी के बीच एक सुंदर छोटी कन्या लाल वस्त्र पहने,  लाल चूनर ओढे खड़ी मुसकरा रही थी। उसके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था जिस पर निगाहें टिका पाना हमारे लिए संभव नहीं हो पा रहा था। हम लोग उन्हें प्रणाम कर के बाहर आ गये। वे कोई देवी होंगी ऐसा लगा।

 उनकी बातें सुन जादूगर मुसकराया और बोला-दर्शन कर लिये ना।

 दोनों युवकों ने स्वीकृति में सिर हिला दिया।

 इसके बाद उस जादूगर ने सामने बैठे घर के मालिक से उनकी बंदूक और कारतूस का पट्टा लिया और आगे चल दिया। पास ही एक कुएं में उसने बंदूक और कारतूस का पट्टा फेंक दिया और लौट आया।

    घर के मालिक ने कहा-अरे भाई मेरी बंदूक और कारतूस कहां गयी।

  जादूगर ने कहा-वह तो मैंने आपके कुएं में फेंक दिया।

  घर का मालिक गुस्सा होने लगा उसने कहा-कल ही नये कारतूस लाये थे उनको पानी में फेंक दिया, वे तो बरबाद हो गये।

   जादूगर ने कहा- परेशान मत होइए अभी मंगाये देता हूं।

  इतना कह कर जादूगर ने ऊपर हाथ उठाया और मन ही मन कुछ बुदबुदाया।

 हम लोगों ने देखा कि थोड़ी देर में ही पानी की बौछार रोकने के लिए बने घासफूस के छप्पर के ऊपर से बंदूक और कारतूस का पट्टा नीचे आ गिरा। दोनो एकदम सूखे थे उनमें एक बूंद पानी नहीं था। हम सभी अवाक हो गये कि आखिर हमारी नजरों के सामने कुएं में फेंकी गयी बंदूक और कारतूस का पट्टा कौन शक्ति कुएं से लाकर जादूगर को दे गयी।

 जादूगर का यह चमत्कार देख मैं घर जाकर अम्मा को भी ले आया।

 मैंने अम्मा के सामने ही जादूगर से कहा- मेरे भैया कलकत्ते में हैं। कई महीने से उनकी खबर ना आने से माता-पिता परेशान हैं क्या आप कुछ कर सकते हैं जिससे वे यहां आयें या फिर अपनी खबर दें।

    इस पर जादूगर ने कहा- हां में ऐसा कर सकता हूं। हम लोग इसके लिए उच्चाटन मंत्र का प्रयोग करते हैं लेकिन इसमें परेशानी यह है कि जिस वक्त से मैं किसी व्यक्ति पर इस मंत्र का प्रयोग करूंगा वह यहां आने के लिए बेचैन हो जायेगा। उसे ना खाना अच्छा लगेगा ना सोना। वह जब तक यहां नहीं पहुंचेगा बहुत परेशान रहेगा।

    अम्मा ने यह सुन कर कहा- नहीं, नहीं रहने दीजिए। हम नहीं चाहते कि उसे कोई तकलीफ हो।

 घर लौटने से पहले अम्मा को अचानक याद आ गया कि मुझे अक्सर नजर लग जाती है इसका उपचार इन जादूगर से पूछ लेते हैं। उन्होंने उनसे कहा-मेरे बेटे को अक्सर नजर लग जाती है आप इसे कुछ दे सकें तो बहुत अच्छा हो।

  यह सुन कर जादूगर ने अपने थैले से एक ताबीज निकाल कर देते हुए कहा-यह ताबीद इसे पहना दीजिए इससे कोई नजर नहीं लगेगी। यह ताबीज अगर खो गयी तो तीन बार यह इसके बिस्तर के नीचे मिल जायेगी उसके बाद खोयी तो फिर नहीं मिलेगी। सचमुच वैसा ही हुआ मुझे अक्सर लगनेवाली नजर बद हो गयी। ताबीज तीन बार खोने पर बिस्तर के नीचे मिली चौथी बार खोयी तो फिर मिली नहीं।

 

   *

हमारे गांव के वरिष्ठ और गणमान्य व्यक्ति थे काशीप्रसाद दुबे जिन्हें हम प्यार से काका जी कहते थे। एक बार उनकी इच्छा हुई कि क्यों ना गांव के लड़कों और कुछ लोगों को लेकर नाटक किया जाये। तय किया गया कि कंस वध  नाटक खेला जायेगा। काका जी ने सबको सबके संवाद दे दिये और रिहर्सल शुरू हो गया। मेरे हिस्से कृष्ण की भूमिका आयी और हमारे मित्र बाबूलाल यादव (अब सेवानिवृत जज) के हिस्से बलराम, किसी के हिस्से मनसुखा, सुदामा और इसी तरह की भूमिकाएं आयीं। कंस की भूमिका साधौप्रसाद कुर्मी को दी गयी जिन्हें हम प्यार से काका कहते थे।

  सबने अपने-अपने संवाद रटने से शुरू कर दिये। इस काम में मैं और बाबूलाल सबसे आगे रहे बाकी लोग याद नहीं कर पाये थे।तय किया गया उनके डायलाग प्राम्ट करके चलाये जायेंगे।

  संवाद जल्द याद करने के पुरस्कार के रूप में काशीप्रसाद काका ने मुझे और बाबूलाल यादव को बतासे बांटे।

  रिहर्सल शुरू हुआ। जब कंस के केश पकड़ कर सिंहासन से नीचे पटकने की बारी आयी तो मैं संकोच करने लगा कि साधैप्रसाद काका को कैसे बाल पकड़ कर नीचे पटकूं।

   मेरा संकोच देख हमारे निर्देशक काशीप्रसाद काका ने कहा-अरे वह कंस है साधौ नहीं उसे पटक दो, मारो।

 कहना ना होगा कि मुझे अपने निर्देशक का कहा मानना पड़ा।

*

हर साल हमारी तहसील बबेरू में दशहरे का एक माह व्यापी मेला लगता था। यह हम लोगों के लिए सबसे बड़ा मेला होता। बबेरू में माह भर रामलीला होती और विजयादशमी के दिन सरकारी अस्पताल के पास के मैदान में रावण दहन होता। मैं भी अम्मा के साथ मेला देखने गया था।वहां से कुछ खिलौने लाया था जिसमें एक गेंद भी थी।

 एक दिन की बात है अम्मा घर से बाहर थीं और बाबा सो रहे थे। मै अपने घर के बाहर वाले मैदान पर आ गया। जिसके सामने से गांव के पूर्व से पश्चिम के आखिरी छोर तक गली निकलती थी। मैं अपनी खुशी में खोया गेंद सामने वाली दीवाल में पटकता और वह वहां से वापस उछल कर आती और मैं उसे पकड़ कर फिर उधर ही फेंक देता। दायीं ओर से अंधी गली थी यानी उधर से कौन कब आ रहा है पता नहीं चलता था। मैं अभी गेंद फेंक ही रहा था कि अंधी गली की दायी ओर से अचानक एक कुत्ता भूंकता हुआ आया उसने मेरी दायीं कलाई काट ली। हाथ से खून बहने लगा मैं जोर से चिल्लाया-बचाओ, बचाओ।

 मेरी चीख सुन कर बगल के घर से एक बुजुर्ग महिला आयी। उसके हाथ में किवाड़ बंद करके पीछे लगानेवाला काठ का हटका था। वह मेरे पास पहुंची तब तक कुत्ता कलाई छोड़ मेरी छाती पर चढ़ गया था और गला काटने वाला था उस बुजुर्ग महिला ने उसकी पीठ पर जोर से हटके से वार किया तब कहीं वह मुझे छोड़ बायीं तरफ से जंगल की ओर भाग गया। तब तक शोर सुन कर बाबा भी जाग गये थे। वे बाहर निकल कर चबूतरे में बैठ गये थे। लोगों से सारी बात जान कर वे भी बहुत दुखी हुए और रोने लगे। उस दिन वह बुजुर्ग महिला मेरे लिए प्राण रक्षक बन गयी वरना उस दिन वह कुत्ता मेरी जान ही ले लेता। गला तो वह पकड़ ही चुका था।

 उसी वक्त कई लोग लाठी, भाला लिये दौड़ते नजर आये। जब उन्होंने सुना कि कुत्ते ने मुझे काट लिया है तो बोले-यह गांव में एक बैल को काट कर आया है। हम उसे मारने जा रहे हैं। आखिर उन्होंने जंगल में घेर कर उसे मार डाला।

  अम्मा खेतों से लौट कर आयी तो सब कुछ जान कर वह भी रोने लगी। उसके पास जो भी मलहम वगैरह था वह उसने लगाया और लोगों से पूछा कि क्या करना होगा। किसी ने सलाह दी सात कुओं में सींक डलवा दीजिए कुछ नहीं होगा। हमारे गांव में कुल मिला कर तीन कुएं ही थे। उनमें सींक डालने के बाद दूसरे दिन हम पास के गांव आलमपुर में गये जहां कई चाची लोगों से अम्मा का अच्छा परिचय था।

 उन लोगों ने जब सारा हाल सुना तो कुएं में सींक तो डलवा दी फिर अम्मा से पूछा-माटी मिले को मार दिया ना।

अम्मा ने कहा –हां लोगों ने जंगल में घेर कर मार दिया।

हम लोग गांव लौट आये अब कुछ लोग हमें डराने लगे कि कुत्ते को मारना नहीं चाहिए था कुछ दिन उस पर नजर रखनी थी कि उसमें क्या परिवर्तन होता है। हमारे सामने कोई चारा नहीं था।कुत्ता तो मार दिया गया था अब जो होना होगा होगा।

  मेरी जिंदगी को नयी राह देने और मैं आज जो हूं उसका एक पुख्ता आधार देने में जिनकी सबसे बड़ी भूमिका है वे हैं मेरे प्यारे भैया अमरनाथ द्विवेदी जो मुझे इतना प्यार करते थे जितना शायद अपना कोई सगा भी नहीं करता। यह जब की घटना है तब वे इलाहाबाद में पढ़ते थे। वे छुट्टियों में गांव आये थे।उन्हें किसी ने बता दिया कि रामहेती को पागल कुत्ते ने काट लिया है और उनकी अम्मा कुएं में सींक डालती फिर रही हैं।

  यह बात सुनते ही वे दौड़े-दौड़े हमारे घर-घर आये और अम्मा को डांटते हुए बोले-काकी पगला गयी हौ का लड़का का मार डरिहै का। (काकी पागल हो गयी हो क्या,लड़के को मार डालोगी) कुआं में सींक डालने से कुत्ता काटे का असर नहीं जायेगा। मैं चिट्ठी लिख देता हूं कल इसे सरकारी अस्पताल बबेरू ले जाओ और इंजेक्शन लगवाओ।

  कोई और होता तो उसकी बात टाल दी जाती लेकिन अपने मुन्नू भैया (हम सब अमरनाथ जी को प्यार से इसी नाम से पुकारते थे) की बात ना अम्मा ने कभी टाली थी और ना अब टालनेवाली थी।

  दूसरे दिन अम्मा मुझे सरकारी अस्पताल ले गयी। वहां मोटे डाक्टर थे  जहां तक याद आता है उनका नाम राधाकृष्ण द्विवेदी था। उनका कंपाउंडर बेला भी उनकी तरह ही मोटा ताजा था।

  मैं पहले ही बता आया हूं कि इंजेक्शन से मुझे बड़ा डर लगता है लेकिन अब इससे बचने का कोई उपाय नहीं था। पहले तो मुन्नू भैया का आदेश दूसरे मोटा-ताजा डाक्टर वैसा ही कंपाउंडर मैं विरोध करता भी तो वे जबरन इंजेक्शन भोंक देते। मुझे एक बेंच में लिटा दिया गया मैंने डर के मारे आंखें बंद कर लीं। अचानक मेरे पेट में तेजी से कुछ चुभने का दर्द और पेट में ऐसी जलन हुई जैसे किसी ने तेजाब डाल दिया हो। मैं पल भर में बेहोश हो गया। बेहोश होते-होते मुझे सुनायी दिया, डाक्टर कंपाउंडर को चिल्लाये-बेला पानी लाओ, बच्चा बेहोश हो गया।

 बेला घड़े का ठंडा पानी लाया और मेरे सिर पर उंडेल दिया। थोड़ी देर में मुझे होश तो आ गया लेकिन पेट की जलन नहीं गयी। अम्मा को बताया तो उन्होंने डाक्टर से पूछा तो डाक्टर ने कहा यह थोड़ी देर में ठीक हो जाय़ेगी। कुल चौदह इंजेक्शन लगेंगे रोज नियम से लगवा लीजिएगा।

कुल चौदह इंजेक्शन लगने हैं यह सुन कर मेरी आत्मा कांप गयी। पहले इंजेक्शन ने ही बेहोश कर दिया क्या बाकी इंजेक्शन लगवाते वक्त भी यही होगा। मैंने अपनी यह शंका डाक्टर से जाहिर की तो उन्होंने आश्वस्त किया कि अब ऐसा नहीं होगा। मुन्नू भैया ने उनके नाम चिट्ठी लिख दी थी इसलिए डाक्टर ने काफी सहयोग किया और मैंने वह चौदह इंजेक्शन झेल लिये। मेरे इंजेक्शन लेने से जिस व्यक्ति को सबसे ज्यादा खुशी हुई वे मेरे प्यारे भैया अमरनाथ जी थे हमारे प्यारे मुन्नू भैया। (क्रमश:)