Saturday, June 18, 2022

इस तरह मैं बन गया साप्ताहिक ‘स्क्रीन’ का प्रबंध संपादक

आत्मकथा-36

भाग-36
 राजेश त्रिपाठी
 सन्मार्ग में मेरा प्रशिक्षण सही ढंग से चल रहा था। मैं वहां के संपादकीय विभाग के वरिष्ठ जनों के लिए अब अपरिचित नहीं रहा था। मैं उनके सहयोगी रामखिलावन त्रिपाठी का भाई हूं इसलिए उनसे भी बड़े भाइयों-सा स्नेह पा रहा था। मेरी कुछ आदतें आज के युग के अनुरूप नहीं हैं। मैं मितभाषी हूं और जब तक किसी से सहजता अनुभव ना करूं बातचीत में पहल करने में असहजसता महसूस करता हूं। सन्मार्ग में जब कोई मुझसे कुछ पूछता तभी मैं उत्तर देता था। अब जरा उस वक्त के संपादकीय विभाग के कुछ ऐसे जनों का परिचय देता चलूं जो अपने मिसाल आप थे। एक हरेंद्रनाथ झा थे जो शिफ्ट इंचार्ज हुआ करते थे और ठीक टेलीप्रिंटर के पास बैठते थे जिस पर लगातार एजेंसी की खबरें अंग्रेजी में आती रहती थीं। झा जी पूरी तरह शूटेड,बूटेड टाई बांधे हुए साहब से ही लगते थे। जब तक वह आफिस में रहते अपनी वजनी आवाज में निर्देश देते रहते। मैं उनसे कभी सहज नहीं हो पाया क्योंकि उनके व्यक्तित्व में सहजता कम दंभ अधिक झलकता था। एक थे लाल जी पांडे मितभाषी, जिनके अधरों पर सदा स्मित हास्य थिरकता रहता था। उदयराज सिंह लक-दक कुरते और धोती में रहते थे। बड़े सज्जन थे। तारकेश्वर पाठक जी समाचार संपादक थे। बड़े ही सज्जन और बहुत धीमे स्वर में बोलने वाले । कभी-कभी तो उनके बोले शब्द समझने में दिक्कत होती थी। संपादकीय विभाग में रमाकांत उपाध्याय जी भी थे जो जब मूड में होते तो अपने सहयोगियों से एक चिरपरिचत गाली के साथ संवाद करते थे। हां जब तक मैं विभाग में रहता वे अपनी वाणी में नियंत्रण रखते थे जो मुझे बहुत अच्छा लगता था। लोग जो उनकी इस आदत से परिचित थे वे उन्हें चिढ़ाने के लिए उन्हें देख कर काफी देर तक खामोश रहते। तब वह अपने चिरपरिचत अंदाज में बोलते****(गाली) बोलते क्यों नहीं मुंह में दही जमा रखा है क्या। इस पर सभी एक साथ खिलखिला उठते और माहौल खुशनुमा हो जाता। उनके लिखे संपादकीय बहुत चर्चित होते थे। लेकिन उसकी लिखावट इतनी अस्पष्ट होती थी कि कंपोजीटर मुश्किल से पढ़ पाते थे। वे वापस उनके पास पूछने आते तो कभी-वे खुद अपना लिखा नहीं पढ़ पाते थे। कहते हैं कि एक बार वे संपादक रामअवतार गुप्ता जी की अनुपस्थिति में उनकी मेज पर कुछ संदेश लिख कर रख गये। गुप्ता जी आये तो उन्होंने उस संदेश को पढ़ने की बड़ी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाये। हार कर उन्होंने एक कंपोजीटर को बुलाया जिसने तुरत वह संदेश पढ़ दिया। रमाकांत जी मुझसे बड़े भाई-सा व्यवहार करते थे इसका एक कारण यह भी था कि वे मेरे भैया रुक्म जी का बहुत आदर करते थे। वे अच्छे कवि भी थे। उन्होंने एक बार बातों बातों में बताया था कि जिस तरह गोस्वामी बिंदु जी ने भजन-कीर्तन की ‘मोहन मोहिनी’ लिखी है उसी तरह मैंने भी एक पुस्तक लिखी है। अब नाम याद नहीं आ रहा लेकिन उन्होंने उसकी कई रचनाएं मुझे सुनायी थीं। * सन्मार्ग में रहते हुए ही मुझ पर एक और दायित्व आ पड़ा। यह था ब्राडशीट पर निकलनेवाले हिंदी फिल्म साप्ताहिक ‘स्क्रीन’ का प्रबंध संपादक बनना। इसके मालिक महावीर प्रसाद पोद्दार जानते थे कि मैं सन्मार्ग में सीख रहा हूं। स्क्रीन महावीर प्रसाद पोद्दार के पिता आर.के. पोद्दार ने निकाला था जिसके संपादक भैया रुक्म थे। उन दिनों मुंबई के फिल्म जगत और युवाओं में स्क्रीन की धूम थी। उसमें ऐसी-ऐसी धमाकेदार स्टोरी छपती थीं कि उन्हें पढ़ने के लिए युवा वर्ग सबसे अधिक लालायित रहता था। स्क्रीन की लोकप्रियता का आलम यह था कि मुंबई से निकलनेवाला लोकप्रिय फिल्म साप्ताहिक टिक नहीं पाया और बंद हो गया। भैया रुक्म जी ने मुंबई में अपने दो सहायक रख रखे थे। एक थे मशहूर स्तंभकार दीनानाथ शास्त्री और दूसरे एक और जिनका नाम याद नहीं। अभिनेता धर्मेंद्र भैया को बहुत मान देते रहे हैं। इसका कारण यह रहा कि जब आर्य समाजी पिता के पुत्र धर्मेंद्र पंजाब से मुंबई फिल्मों में अभिनय करने आये तो शुरू-शुरू में सभी ने उन्हें हतोत्साहित किया। एकमात्र भैया ऐसे पत्रकार थे जो अपनी स्क्रीन में लगातार धर्मेंद्र के बारे में लिखा करते थे कि-इस अभिनेता में गजब की अभिनय क्षमता है अगर कोई अच्छा निर्देशक मिल जाये तो यह बहुत आगे जा सकता है। बाद में यह बात सच साबित हो गयी। धर्मेंद्र ने अपने अभिनय का लोहा मनवा लिया। वह इसी से भैया को बहुत मानते रहे। यहां तक कि जब धर्मेंद्र को एक सचिव की आवश्यकता पड़ी तो उन्होंने भैया से ही कहा-रुक्म जी मुझे एक अच्छा सेक्रेटरी दिला दीजिए। इस पर भैया ने अपने सहायक दीनानाथ शास्त्री का नाम सुझाया जिसे धर्मेंद्र ने तुरत मान लिया। बाद में दीनानाथ शास्त्री फिल्म निर्माता बन गये। उन्होंने एक सफल फिल्म बनायी थी ‘धरती कहे पुकार के’। उसी स्क्रीन का भार मुझे सौंपा गया। मैं दिन में सन्मार्ग में सीखता और शाम स्क्रीन कार्यालय चला जाता और वहां तीन-चार घंटे काम देखता। सन्मार्ग में तो मैं केवल अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद और समाचार आदि की हेडिंग भर देना सीखता था स्क्रीन में समाचार, संपादकीय लिखना, पूरे पेज का मेकअप करवाना सब कुछ देखना पड़ता था। मैं खुश था कि चलो कुछ नया काम सीख रहे हैं। जब मेरे संपादकत्व में स्कीन का पहला अंक छप कर आया तो प्रबंध संपादक के रूप में अपना नाम छपा देख कर बहुत खुशी हुई थी। मेरा रोज का क्रम था अपने कांकुड़गाछी वाले फ्लैट से पहले सन्मार्ग और फिर स्कीन कार्यालय जाना और फिर घर वापस आना। * कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा फिर मेरे जीवन में एक नया मोड़ आया। हुआ कुछ यों कि नगर के महात्मा गांधी रोड पर स्थित सचदेव पुस्तकालय के मालिक सचदेव जी ने भैया रुक्म को अपने पास बुलाया। भैया की पुस्तकें प्रकाशित होती रहती थीं इसलिए हिंदी के प्राय: सभी प्रकाशक उनसे परिचित थे। सचदेव जी ने भैया से कहा- रुक्म जी लखनऊ से ज्ञानभारती बाल पाकेट बुक ने बच्चों के लिए छोटे साइज में कहानियों की पुस्तकें निकाली हैं जिनका मूल्य एक रुपया रखा गया है। वह बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। हम सोचते हैं कि क्यों ना हम लोग भारत की दूसरी बाल पाकेट बुक अपने यहां से प्रकाशित करें। हर माह चार पुस्तकों का सेट प्रकाशित करना पड़ेगा। भैया ने हामी भर ली कि हो जायेगा। नाम रखा गया राजू बाल पाकेट बुक्स। 
मेरी कुछ बाल पाकेट्स बुक के कवर


सचदेव जी से बात करके भैया घर आये तो मुझसे बोले एक बड़ा काम आया है तुम्हें मेरी मदद करनी होगी। मैंने कहा क्या है। इसके बाद उन्होंने ज्ञानभारती बाल पाकेट बुक्स की चार किताबें मेरे पास रखते हुए कहा कि यह भारत की पहली बाल पाकेट बुक है। इसी तरह की बाल पाकेट बुक्स कलकत्ता के मेरे परिचित निकालना चाहते हैं। हर महीने चार पुस्तकें लिखनी पड़ेंगी। मैं दो लिख लूंगा, दो तुम लिख देना। मैंने आज तक कुछ भी नहीं लिखा था लेकिन चुनौती स्वीकारते हुए हामी भर ली। मेरा भरोसा थीं राजा रानी राक्षसों की वह कहानियां जो हमारे प्यारे झल्ला बापू ने हमें जाड़े में अलाव के सामने सुनायीं। उनका मूल नाम हममें से बहुत कम ही लोग जानते थे वे हम सबके प्यारे झल्ला बापू थे। झल्ला का एक अर्थ होता है लंबी डींग हांकनेवाला लेकिन वे बहुत सहज थे और लंबी कहानियां सुनाते थे। वे थोड़ा तोतलाते थे और उनकी हर कहानी कुछ इस तरह से शुरू होती थी-होटे कट्टे एक राजा थे (होते करते एक राजा था)। दूसरी सुबह से शुरू हुआ एक लेखक के रूप में मेरा नया अध्याय। माह में दो उपन्यास हर हाल में लिखना। इसके लिए मैं रात जागता क्योंकि हमारे सामने एक चुनौती थी। पहले कुछ उपन्यासों को भैया ने संपादित किया और फिर मेरी गलतियों को बताते हुए कहा कि –यह गलती दोबारा नहीं होनी चाहिए। 



                                मेरी कुछ बाल पाकेट्स बुक के कवर


 हालांकि यह कहानी परी कथाओं, राजा, रानियों पर आधारित होती थीं लेकिन हमारी कोशिश होती कि ये शिक्षाप्रद भी हों। इनकी सबसे पहली शर्त होती थी इनका मनोरंजक होना। पहले ही सेट से ही राजू बाल पाकेट बुक्स की धूम मच गयी क्योंकि यह देश की दूसरी पाकेट बुक थी। यह देश भर में छा गयीं। ए.एच.ह्वीलर के स्टालों के जरिए देखते ही देखते इनकी बिक्री बढ़ती गयी। सचदेव खुश थे। हमारा क्रम बन गया। महीने में दो बाल उपन्यास मैं लिखता और दो भैया रुक्म जी। सचदेव पुस्तकालय में सुशील दास नामक एक दिव्यांग चित्रकार बैठते थे जो इन बाल पाकेट बुक्स के सुंदर कवर डिजाइन करते थे। वे बहुत धीरे बोलते थे लेकिन थे बड़े भले। सचदेव पुस्तकालय के दो मालिक थे। बड़े भाई का तकिया कलाम था ‘आप समझे नहीं’ वे लोगों से फोन पर बात कहते हुए भी दोहराते रहते- ‘आप समझे नहीं’। एक बार मैं उनकी दूकान में ही था कि तभी किसी का फोन आया इधर सचदेव जी का तकिया कलाम शुरू हो गया –आप समझे नहीं, आप समझे नहीं। शायद फोन के दूसरे छोर का आदमी उनके तकिया कलाम से चिढ़ गया और उन्हें जोर से डांट दिया। बड़े सचदेव ने फोन रखते हुए मुझे देखा। उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। मैंने पूछा-क्या हुआ भाई साहब आप परेशान क्यों हैं। वे बोले-फोन पर उस व्यक्ति ने मुझे बड़ी जोर से डांटते हुए कहा-क्या समझे नहीं, समझे नहीं की रट लगाये हो मुझे निरा बेवकूफ समझा है क्या। मैंने हंसते हुए कहा-भाई साहब अगले ने सही कहा आप ही बताइए अगर यही बात आपसे कोई बार-बार कहे तो क्या आपको बुरा नहीं लगेगा। हम दोनों भाइयों ने सैकड़ों बाल पाकेट बुक लिख डाली थीं। (क्रमश:)

Friday, June 17, 2022

कैलाश पर्वत के अनसुलझे रहस्यों से वैज्ञानिक भी दंग

 


राजेश त्रिपाठी

पौराणिक कथाओं के आधार पर कैलाश पर्वत को भगवान शिव का धाम माना जाता है। यह सनातन धर्मियों के लिए बहुत ही पवित्र स्थान है। यह दूर से देखने में जितना रम्य और दिव्य है पास पहुंचने पर उतना ही दुर्गम और रहस्यमय।नासा संस्थान के साथ ही दुनिया के अन्य वैज्ञानिक भी इसके अनसुलझे रहस्यों को सुलझा नहीं पाये। वे इससे जुड़े चमत्कारों को लेकर दंग हैं। ऐसा माना जाता है कि कई बार कैलाश पर्वत पर सतरंगी प्रकाश किरणें आकाश पर चमकती देखी गयी हैं। नासा के वैज्ञानिकों का मानना है कि हो सकता है कि ऐसा यहां के चुम्बकीय बल के कारण होता हो। यहां का चुम्बकीय बल आसमान से मिल कर कई बार इस तरह की चीजों का निर्माण कर सकता है।

आसमान में सतरंगी प्रकाश और ॐ की गूंज, भगवान शिव के धाम कैलाश के इन अनसुलझे रहस्यों से नासा भी हैरान है।

अधिकांश सनातनी धर्मावलंबियों के लिए कैलाश श्रद्धा का प्रतीक है, वहीं अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को कैलाश पर्वत एक रहस्यमयी जगह लगती है। कई रूसी वैज्ञानिकों ने भी कैलाश पर अपनी रिपोर्ट पेश कर वैज्ञानिक महत्ता से जुड़े रहस्यों को उजागर किया है।  यहां कई साधू और संत अपने अपने आराध्यों से संपर्क करते हैं।प्रकाश और ध्वनि के समागम से निकलती हैं ॐ की आवाज कैलाश की बर्फ पिघलने पर गूंजती है डमरू की डम-डम। कैलाश पर्वत को आज भी सनातनी भारतीय  शिव का निवास स्थान मानते हैं। शास्त्रों में भी यही लिखा है कि कैलाश पर भगवान शिव का वास है। यह अलग बात है कि अधिकांश सनातनी धर्मावलंबियों के लिए कैलाश श्रद्धा का प्रतीक है, वहीं अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को अद्भुत अलौकिक कैलाश पर्वत एक रहस्यमयी जगह लगती है। सिर्फ नासा ही क्यों कई रूसी वैज्ञानिकों ने भी कैलाश पर्वत पर अपनी रिपोर्ट पेश कर उसकी वैज्ञानिक महत्ता से जुड़े रहस्यों को उजागर किया है।

कैलाश की ऊंचाई 6,638 मीटर है।

इन सभी रिपोर्टों में माना गया है कि कैलाश पर्वत वास्तव में कई अलौकिक शक्तियों का केंद्र है। विज्ञान यह दावा तो नहीं करता है कि यहां भगवान शिव देखे गए किन्तु यह सभी मानते हैं कि यहां पर कई पवित्र शक्तियां जरूर काम कर रही हैं। संभवतः यही वजह है कि कैलाश पर्वत से जुड़े किस्से पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को आकर्षित करते आ रहे हैं।

आइए जानें वैज्ञानिकों ने कैलाश के बारे में क्या कहा है।

रूस के वैज्ञानिकों का मानना है कि कैलाश पर्वत आकाश और धरती के साथ इस तरह से केंद्र में है जहां पर चारों दिशाएं मिल रही हैं। कुछ रूसी वैज्ञानिकों का दावा है कि यह स्थान एक्सिस मुंडी है और इसी स्थान पर व्यक्ति अलौकिक शक्तियों से आसानी से संपर्क कर सकता है। धरती पर यह स्थान सबसे अधिक शक्तिशाली स्थान है। इसे धरती का केंद्र भी माना जाता है।

यह पर्वत अजेय है। आज तक कोई इसके शिखर को नहीं छू सका।

वैसे यह भी कहा जाता है कि 11 वीं सदी में तिब्बत के योगी मिलारेपी के शिखर पर पहुंचने का दावा किया जाता है। यह अलग बात है कि इस योगी के पास इस बात के कोई सबूत नहीं थे। यह भी माना जाता है कि वह खुद भी सबूत पेश नहीं करना चाहते थे। इसलिए यह भी एक रहस्य है कि इन्होंने कैलाश के शिखर पर कदम रखा या फिर वह कुछ बताना नहीं चाहते थे।

कैलाश पर्वत पर दो झीलें हैं और यह दोनों ही रहस्य बनी हुई हैं। आज तक इनका भी रहस्य कोई जान नहीं पाया। एक झील साफ़ और पवित्र जल की है। इसका पानी मीठा है और इसमें जलीय जीव-जंतु भी हैं। इसका आकार सूर्य के समान बताया गया है। इसका नाम मानसरोवर है। वहीं, दूसरी झील अपवित्र और गंदे जल की है तो इसका आकार चन्द्रमा के समान है। इसका नाम राक्षस ताल है। इसके पानी में कोई जीव-जंतु नहीं हैं। ऐसा कैसे हुआ है यह भी कोई नहीं जानता है। लंकाधिपति रावण शिव का एक बहुत बड़ा भक्त, बतौर राजा एक महान प्रशासक और बेहद प्रतिभाशाली इंसान था। वह शिव की आराधना करने कैलाश पर गया था। शिव के पास जाने से पहले रावण नहाना चाहता था, इसलिए उसने राक्षस ताल में डुबकी मार ली। नहाकर जब शिव से मिलने चला तो रास्ते में उसकी नजर पार्वती पर पड़ी। शिव के पास पहुंच कर रावण नें उनकी स्तुति की।

शिवजी के रावण की इस भक्ति से शिव बहुत प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर उन्होंने रावण से कहा कि अच्छा बताओ तुम्हें क्या चाहिए? इस पर उस मूर्ख ने कहा, मुझे आपकी पत्नी चाहिए। मान्यताओं के अनुसार उसकी बुद्धि इसलिए भ्रष्ट हो गई, क्योंकि उसने राक्षसताल में डुबकी लगायी थी। उस ताल में नहाने से उसके दिमाग में ऐसे गलत विचार आए। ऐसा माना जाता है कि कैलाश पर पवित्र आत्माओं का वास है।

यहां से जुड़े आध्यात्मिक दस्तावेजों और शास्त्रों के अनुसार रहस्य की बात करें तो कैलाश पर्वत पर कोई भी व्यक्ति सशरीर उच्चतम शिखर पर नहीं पहुंच सकता है। ऐसा बताया गया है कि यहां पर देवताओं का आज भी निवास है। पवित्र संतों की आत्माओं को ही यहां निवास करने का अधिकार  है। यही वजह है कि कैलाश पर आज तक कोई चढ़ भी नहीं सका है। कैलाश पर्वत की चार दिशाओं से चार नदियां निकलती हैं: ब्रह्मपुत्र, सतलज, सिंधु और करनाली। कैलाश की चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुंह हैं जिसमें से नदियों का उद्गम होता है. पूर्व में अश्वमुख है, पश्चिम में हाथी का, उत्तर में सिंह का, दक्षिण में मोर का मुंह है।


स्कंद पुराण और शिवपुराण में भी कैलाश का उल्लेख मिलता है। कैलाश चीन के क्षेत्र में  पडता है। इसके आगे तिब्बत के पास एक ऐसा दुर्गम क्षेत्र है जिसे सिद्धाश्रम या अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक विद्यालय ज्ञानगंज के नाम से जाना जाता है। वहां की गुफाओं में महान साधक हजारों वर्षों से साधना कर रहे हैं। इनमें कई ऐसे हैं जिनकी सच्ची आयु का ही पता लगाना आसान नहीं। कहा तो यहां तक जाता है कि वहां देवी-देवता तक सूक्ष्म रूप से निवास करते हैं।

रूसी वैज्ञानिक मानते हैं कि कैलाश पर्वत मानव निर्मित पिरामिड है क्योंकि इसका आकार पिरामिड जैसा है। कुछ लोगों ने तो इस पर 'ऊं' की आकृति होने का दावा तक किया है।सुना यह भी जाता है कि यहां दिशासूचक यंत्र यानी कंपास भी काम नहीं करता।

ध्यान साधकों का आदर्श

कैलाश पर्वत दुनिया के 4 मुख्य धर्मों का केंद्र माना गया है। हिंदू धर्म के अलावा प्राचीन मिस्र में भी कई ऐसे पर्वतों को पूजा जाता है, जो न सिर्फ रहस्यमयी शक्तियों से ओत-प्रोत हैं, बल्कि अध्यात्म की खोज में रहने वाले लोगों को भी आकर्षित करते है।

कैलाश पर्वत का सबसे बड़ा रहस्य खुद विज्ञान ने साबित किया है कि यहां पर प्रकाश और ध्वनि के बीच इस तरह का समागम होता है कि यहां से ॐ की आवाजें सुनाई देती हैं। जाहिर है अपने इन्हीं अनसुलझे रहस्यों या खूबियों के कारण कैलाश पर्वत आज भी इतना धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व बनाए रखे हुए है।

कैलाश पर्वत चढ़ना इसलिए भी असंभव बताया जाता है कि वहां  पर व्यक्ति दिशाहीन हो जाता है। दिशा भटक जाने के चलते वह घंटों एक ही जगह भटकता रह जाता है।

मरने के बाद या जिसने कभी भी कोई पाप न किया हो, केवल वही कैलाश पर विजय प्राप्त  कर सकता है।  पर्वत पर थोड़ा सा ऊपर चढ़ते ही व्यक्ति दिशाहीन हो जाता है। बिना दिशा के चढ़ाई करना मतलब मौत को दावत देना है, इसलिए कोई भी इंसान आज तक कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाया है। कहा यह भी जाता है कि कुछ लोगों के साथ ऐसा हुआ कि पर्वत पर कुछ दूर चढ़ने के बाद ही उनके नाखून बढ़ने लगे, चेहरे पर झुर्रियां पड़ गयीं, बाल सफेद हो गये और अचानक उनकी उम्र बहुत बढ़ गयी। इसके बाद वे घबड़ा कर नीचे लौट गये। डाक्टर और वैज्ञानिकों का कहना है कि वहां का वातावरण ऐसा है कि दिमाग में सूजन आ जाती है जिससे व्यक्ति को मतिभ्रम हो जाता है और वह कुछ का कुछ देखने-सुनने लगता है।

एक अंग्रेज जिसका नाम लॉरेंस डिसूजा था। उसने एक बार मन में ठाना कि मैं इस अजेय कैलाश पर्वत पर चढ़ कर के ही रहूंगा। इसके बाद उसने कैलाश पर्वत पर जाने के लिए अपनी चढ़ाई शुरू कर दी। लेकिन वह भी आधे रास्ते से ही लौट आया। लेकिन जब उसने अपनी यात्रा के अनुभवों को लोगों से साझा किया तो लोग उसकी बातों को सुनकर आश्चर्यचकित रह गए। उसने बताया कि जब मैंने चढ़ाई आरंभ की तो शुरू में सब कुछ सामान्य था।लेकिन जैसे -जैसे मैं आगे बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे ही कुछ ऐसी अचंभित कर देने वाली घटनाएं मेरे साथ होने लगीं थीं। जिसे देखकर मैं बहुत आश्चर्यचकित था। उस अंग्रेज व्यक्ति ने बताया कि जब मैं इस यात्रा पर निकला था तो उस समय मेरी उम्र केवल 30 वर्ष की थी। इसीलिए मेरे सर के बाल पूरी तरह काले थे। लेकिन जैसे-जैसे मैं कैलाश पर्वत की चढ़ाई में आगे बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे मेरे बाल सफेद होते जा रहे थे।

भगवान शिव के घर कैलाश पर्वत पर आज तक कोई नहीं चढ़ पाया, क्या है इसके पीछे का रहस्य

हिंदू शास्त्रों में भगवान शिव को कैलाश पर्वत  का स्‍वामी माना जाता है। मान्‍यता है कि महादेव अपने पूरे परिवार के साथ कैलाश में रहते हैं। दरअसल पौराणिक कथाओं में ऐसी कई घटनाओं के बारे में बताया गया है जिनमें कई बार असुरों और नकारात्मक शक्तियों ने कैलाश पर्वत पर चढ़ाई करके इसे भगवान शिव से छीनने का प्रयास किया, लेकिन उनकी इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकी। आज भी यह बात उतनी ही सच है जितनी पौराणिक काल में थी। भले ही दुनिया भर के पर्वतारोही माउंट एवरेस्‍ट  को फतह कर चुके हैं लेकिन कोई आज तक कैलाश पर्वत पर चढ़ाई नहीं कर पाया है।आखिर ऐसा क्‍यों है, क्या है इसके पीछे का रहस्य आइए आपको बताते हैं कैलाश पर्वत के रहस्य के बारे में।

सनातन धर्म में कैलाश पर्वत का बहुत महत्व है, क्योंकि यह भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। लेकिन इसमें सोचने वाली बात ये है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को अभी तक 7000 से ज्यादा लोग फतह कर चुके हैं, जिसकी ऊंचाई 8848 मीटर है, लेकिन कैलाश पर्वत पर आज तक कोई नहीं चढ़ पाया है  जबकि इसकी ऊंचाई एवरेस्ट से लगभग 2000 मीटर कम यानी 6638 मीटर ही है। कैलाश पर्वत के बारे में अक्‍सर ऐसी बातें सुनने में आती हैं कई पर्वतारोहियों ने इस पर चढ़ने की कोशिश की, लेकिन इस पर्वत पर रहना असंभव था क्योंकि वहां शरीर के बाल और नाखून तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसके अलावा कैलाश पर्वत बहुत ही ज्यादा रेडियोएक्टिव भी है।

कैलाश पर्वत पर व्यक्ति दिशाहीन हो जाता है कैलाश पर्वत पर कभी किसी के नहीं चढ़ पाने के पीछे कई कहानियां भी प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कैलाश पर्वत पर भगवान शिव अपने परिवार के साथ रहते हैं और इसीलिए कोई जीवित इंसान वहां ऊपर नहीं पहुंच सकता।.

माउंट कैलाश को शिव पिरामिड भी कहा जाता है सन 1999 में रूस के वैज्ञानिकों की टीम एक महीने तक कैलाश पर्वत के नीचे रही और इसके आकार के बारे में शोध करती रही। वैज्ञानिकों ने कहा कि इस पहाड़ की तिकोने आकार की चोटी प्राकृतिक नहीं, बल्कि एक पिरामिड है जो बर्फ से ढकी रहती है। यही कारण है कि माउंट कैलाश को शिव पिरामिड के नाम से भी जाना जाता है। जो भी इस पहाड़ को चढ़ने निकला, या तो मारा गया या बिना चढ़े वापस लौट आया।

चीन सरकार के कहने पर कुछ पर्वतारोहियों का दल कैलाश पर चढ़ने का प्रयास कर चुका है। लेकिन उन्हें भी सफलता नहीं मिली और पूरी दुनिया के विरोध का सामना अलग से करना पड़ा। हार कर चीनी सरकार को इस पर चढ़ाई करने से रोक लगानी पड़ी। कहते हैं जो भी इस पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करता है, वो आगे नहीं चढ़ पाता, उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है। यहां की हवा में कुछ अलग बात है।

चन की पूरी टीम के सिर में भयंकर दर्द होने लगा था

चीन ही नहीं रूस भी कैलाश के आगे अपने घुटने टेक चुका है। सन 2007 में रूसी पर्वतारोही सर्गे सिस्टिकोव ने अपनी टीम के साथ माउंट कैलास पर चढ़ने की कोशिश की थी। सर्गे ने अपना खुद का अनुभव बताते हुए कहा था कि कुछ दूर चढ़ने पर उनकी और पूरी टीम के सिर में भयंकर दर्द होने लगा। फिर उनके पैरों ने जवाब दे दिया। उनके जबड़े की मांसपेशियां खिंचने लगीं और जीभ जम गई। मुंह से आवाज़ निकलना बंद हो गई। चढ़ते हुए महसूस हुआ कि वह इस पर्वत पर चढ़ने लायक नहीं हैं। उन्होंने फौरन मुड़कर उतरना शुरू कर दिया। तब जाकर उन्हें आराम मिला।

कैलाश पर्वत की कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें भगवान शिव की आकृति साफ तौर पर देखी जा सकती है।भगवान शिव के अद्भुत दर्शन के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु मानसरोवर की पवित्र यात्रा पर जाते हैं। भगवान शिव में आस्था रखने वाले वैसे तो मुख्य रूप से हिंदू धर्म के लोग ही होते हैं। इसके साथ सिख भी भगवान शिव और अन्य देवी-देवताओं में काफी विश्वास रखते हैं। लेकिन ये खबर जानकर आपको हैरानी होगी कि भगवान शिव पर अब नासा वाले भी भरोसा करने लगे हैं।

कहा जाता है कि मानसरोवर के कैलाश पर्वत पर भगवान शिव विराजमान होते हैं। जहां जाने वाले प्रत्येक श्रद्धालुओं को भगवान शिव की असीम कृपा और शक्ति प्राप्त होती है।

 कैलाश पर्वत से कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आईं हैं, जिसे देखने के बाद खुद नासा भी हैरान है।

बता दें कि हाल ही में कैलाश पर्वत की कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें भगवान शिव की आकृति साफ तौर पर देखी जा सकता है। इन तस्वीरों को देखने में ऐसा लग रहा है जैसे साक्षात भगवान शिव इस पूरी दुनिया को दर्शन दे रहे हों। बर्फ की मोटी चादर में लिपटा हुए कैलाश पर्वत पर साफ तौर पर भगवान शिव को देखा जा सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रही कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की आकृतियों को गूगल और नासा भी स्वीकार कर रहा है।

कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है।

इस पावन स्थल को भारतीय दर्शन के हृदय की उपमा दी जाती है, जिसमें भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है। कैलाश पर्वत की तलछटी में कल्पवृक्ष लगा हुआ है। बौद्ध धर्मावलंबियों अनुसार, इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं।

तिब्बतियों की मान्यता है कि वहां के एक संत कवि ने वर्षों गुफा में रहकर तपस्या की थी। तिब्बती बोनपाओं के अनुसार, कैलाश में जो नौमंजिला स्वस्तिक देखते हैं व डेमचौक और दोरजे फांगमो का निवास है। इसे बौद्ध भगवान बुद्ध तथा मणिपद्मा का निवास मानते हैं। कैलाश पर स्थित बुद्ध भगवान का अलौकिक रूप 'डेमचौक' बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए पूजनीय है। वह बुद्ध के इस रूप को 'धर्मपाल' की संज्ञा भी देते हैं। बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इस स्थान पर आकर उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हुई। आदिनाथ ऋषभदेव का यह निर्वाण स्थल 'अष्टपद' है। कहते हैं ऋषभदेव ने आठ पग में कैलाश की यात्रा की थी। हिन्दू धर्म के अनुयायियों की मान्यता है कि कैलाश पर्वत मेरू पर्वत है जो ब्राह्मांड की धूरी है और यह भगवान शंकर का प्रमुख निवास स्थान है। यहां देवी सती के शरीर का दायां हाथ गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। यहां शक्तिपीठ है। कुछ लोगों का मानना यह भी है कि गुरु नानक ने भी यहां कुछ दिन रुककर ध्यान किया था। इसलिए सिखों के लिए भी यह पवित्र स्थान है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप के चारों ओर पहले समुद्र था। इसके रशिया से टकराने से हिमालय का निर्माण हुआ। यह घटना अनुमानत: 10 करोड़ वर्ष पूर्व घटी थी।

कैलाश पर्वत और उसके आसपास के वातावरण पर अध्ययन कर चुके रशिया के वैज्ञानिकों ने जब तिब्बत के मंदिरों में धर्मगुरुओं से मुलाकात की तो उन्होंने बताया कि कैलाश पर्वत के चारों ओर एक अलौकिक शक्ति का प्रवाह है जिसमें तपस्वी आज भी आध्यात्मिक गुरुओं के साथ टेलीपैथिक संपर्क करते हैं।

 कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। चूंकि तिब्बत चीन के अधीन है, अतः कैलाश चीन में आता है। मानसरोवर झील से घिरा होना कैलाश पर्वत की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है।

 इसकी परिक्रमा का महत्त्व बहुत कुछ कहा गया है। कैलाश पर्वत कुल 48 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। कैलास परिक्रमा मार्ग 15500 से 19500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। मानसरोवर से 45 किलोमीटर दूर तारचेन कैलास परिक्रमा का आधार शिविर है। कैलाश की परिक्रमा कैलाश की सबसे निचली चोटी तारचेन से शुरू होती है और सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोम्पा पर पूरी होती है।

 घोडे और याक पर चढ़कर ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके कठिन रास्ते से होते हुये यात्री डेरापुफ पहुंचते हैं। जहां ठीक सामने कैलास के दर्शन होते हैं। यहां से कैलाश पर्वत को देखने पर ऐसा लगता है, मानों भगवान शिव स्वयं बर्फ़ से बने शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। इस चोटी को हिमरत्नभी कहा जाता है।

 इतनी ठंडी जगह पर भी है गरम पानी के झरने ड्रोल्मापास  तथा मानसरोवर तट पर खुले आसमान के नीचे ही शिवशक्ति का पूजन भजन करते हैं। यहां कहीं कहीं बौद्धमठ भी दिखते हैं जिनमें बौद्ध भिक्षु साधनारत रहते हैं। दर्रा समाप्त होने पर तीर्थपुरी नामक स्थान है जहाँ गर्म पानी के झरने हैं। इन झरनों के आसपास चूनखड़ी के टीले हैं। कहा जाता है कि यहीं भस्मासुर ने तप किया और यहीं वह भस्म भी हुआ था।

 जहां देवी पार्वती ने किया था घोर तप इसके आगे डोलमाला और देवीखिंड ऊँचे स्थान हैं। ड्रोल्मा से नीचे बर्फ़ से सदा ढकी रहने वाली ल्हादू घाटी में स्थित एक किलोमीटर परिधि वाला पन्ने के रंग जैसी हरी आभा वाली झील, गौरीकुंड है। यह कुंड हमेशा बर्फ़ से ढंका रहता है, मगर तीर्थयात्री बर्फ़ हटाकर इस कुंड के पवित्र जल में स्नान करना नहीं भूलते। साढे सात किलोमीटर परिधि तथा 80 फ़ुट गहराई वाली इसी झील में माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की थी।

 इस पर्वत पर स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग है। हिन्दू धर्म के लोगो की ऐसी मान्यता है की इस पर्वत पर चढ़ाई करते समय पांडवों और द्रोपदी को मोक्ष प्राप्त हुआ था। कैलाश पर्वत के चार मुख है। इस पर्वत ने मानो धरती और आकाश को जोड़े रखने की अलौकिक शक्ति है। लोग ऐसा मानते है कि यहाँ पे मृत्यु पाने वाले लोग सीधा स्वर्ग जाते है।

  ऐसा कहा जाता है कि ग्यारहवीं सदी में एक बौद्ध भिक्षु योगी मिलारेपा ने अभी तक माउंट कैलाश पर चढ़ाई की है और वह इस पवित्र तथा रहस्यमयी पर्वत पर जा कर जिंदा लौटने वाले दुनिया के पहले इंसान है।  इसका जिक्र पौराणिक कथाओं में भी मिलता है। मगर वर्तमान समय में कोई कैलाश पर्वत पर क्यों नहीं चढ़ पाया, इसकी वास्तविक वजह अब तक कोई नहीं जान पाया है।

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Monday, June 6, 2022

इस तरह से 'सन्मार्ग' हिंदी दैनिक में शुरू हुआ मेरा प्रशिक्षण

 

आत्मकथा-35



भाग- 35

राजेश त्रिपाठी

मेरा बांग्ला सीखने का क्रम जारी था। कलकत्ता के किसी ना किसी इलाके में घूमने उसे जानने का क्रम भी लगातार जारी था। कुछ दिन पहले डराने वाला विराट शहर अब कुछ-कुछ रास आने लगा था। फर्क यही था हम ठहरे शांत-स्वच्छ और खुले-खुले वातावरण वाले गांव के प्राणी जहां जिधर जायें हरियाली, प्रकृति की अनुपम सुषमा हाथ पसारे आपका स्वागत करने को तैयार। वहां के रंग-बिरंगे पक्षी, उनकी विविधता भरी लुभावनी बोली। अमराइयों में कोयल का कुहकना वह आनंद यहां कहां। कंक्रीट के इस जंगल में शोर-शोर और शोर। गांव में सबके अपने घर होते हैं यहां देखा आधा शहर सड़क किनारे फुटपाथों पर बसा है। टाटपट्टी को छाकर अस्थायी घर बना कर जाने कितनी जिंदगानियां पलती हैं यहां। दूसरी ओर गगनचुंबी इमारते आकाश से बातें करती हुई। कहते हैं कि कलकत्ता काली माई का नगर है यहां जो भी आता है किसी तरह उसका बसर हो ही जाता है। अगर आप ब्रिटिश काल के कलकत्ता को देखें तो वह कुछ गांवों को मिला कर बना था आज तो यह मीलों फैला है और कई जिले इसमें समाये हैं। ज्यादातर औद्योगिक इकाइयां शहर के बाहर जिलों में हैं जिसमें हजारों मजदूर काम करते हैं।

*

मैंने भैया से एक दिन कहा कि-आप तो बाकायदा स्कूल में उर्दू पढ़े हैं, मुझे उर्दू सीखना है, सिखा दीजिए ना।

भैया बोले-अरे यार मेरे पास सिखाने का टाइम कहां है। मैं उर्दू शिक्षा की एक किताब ला देता हूं उससे सीख लेना।

 दूसरे दिन भैया जब आफिस से लौटे उनके हाथों में एक पुस्तक हिंदी उर्दू शिक्षाऔर उर्दू की एक फटी-पुरानी किताब थी। दोनों किताबें उन्होंने मुझे थमा दीं और कहा-अब कोशिश करो धीरे-धीरे सीख जाओगे।

 मुझमें एक जिद है कि मैं जब भी किसी चीज को जानना-सीखना चाहता हूं तो उसमें जिद की हद तक कोशिश करता हूं। अब उर्दू सीखने में मैं जीन-जान से जुट गया। खाने-नहाने के अलावा बाकी का समय मेरा उर्दू सीखने में बीता। एक महीने में मैं टोह-टोह कर उर्दू पढ़ने लगा। अब मेरा ध्यान उर्दू की उस किताब पर गया जो भैया लाये थे। मैंने उस किताब को टोह-टोह कर पढ़ना क्या शुरू किया उसके कथानक ने मुझे बांध लिया। वह एक पादरी की जिंदगी की भावनात्मक कहानी थी। एक दिन मैंने उसे भाभी निरुपमा को क्या सुनाया वे जब भी खाली होतीं बोलतीं-देवर जी ओ पादरी वाली कहानी सुनाओ ना। वह इतनी भावनाप्रधान कहानी थी कि कभी-कभी उसे सुनते हुए भाभी रोने लगतीं। उस समय मैं किताब पढ़ना बंद कर देता। यह क्रम लगातार लंबे समय तक चलता रहा जब तक की वह पुस्तक समाप्त नहीं हो गयी।

 भैया उर्दू की एक फिल्मी पत्रिका कहकशां (हिंदी में इसे आकाशगंगा कहते हैं) मगाते थे जिसमें काफी रोचक फिल्मी खबरें और गजलें होती थीं। बहुत दिन से मेरी ख्वाहिश थी काश मैं भी इसे पढ़ पाता। अब उर्दू सीख लिया तो मैं कहकशां भी पढ़ने लगा।

इसी तरह दिन चल रहे थे कि एक दिन भैया ने कहा-मैंने सन्मार्ग के मालिक, संपादक रामअवतार गुप्त जी से बात कर ली है वे अपने आफिस में तुमको काम सीखने का अवसर देने को तैयार हो गये हैं। कल मेरे साथ चलना मैं उनसे तुम्हारा परिचय करा दूंगा।

 दूसरे दिन मैं भैया के साथ सन्मार्ग कार्यालय में रामअवतार गुप्त जी से मिला। उन्हें प्रणाम किया। वे मुझे साथ लेकर संपादकीय विभाग में आये और संपादकीय विभाग के सभी लोगों को संबोधित करते हुए बोले –ये अपने रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म जी के छोटे भाई हैं। आज से यहां संपादकीय विभाग में कामकाज सीखेंगे। आप लोग इनकी मदद कीजिएगा।

 संपादकीय विभाग के सभी जनों ने हामी में सिर हिला दिया। गुप्ता जी वापस अपने चैंबर में चले गये। भैया ने संपादकीय विभाग के हर व्यक्ति से मेरा परिचय कराया। वह दिन तो परिचय में बीता। कुछ लोगों को मेरा नाम रामहित कुछ अटपटा-सा लगा। मैंने उनको बताया कि –हमारी तरफ भगवान के नाम पर बच्चों का नाम रखने का रिवाज है। बहुत दिन तक मैं अपने नाम का अर्थ नहीं जानता था। बाद में कालेज में हमारे संस्कृत के शिक्षक आचार्य प्रभाकर द्विवेदी ने बताया कि तुम्हारे का नाम का अर्थ कुछ इस तरह है-रामस्य हितू स रामहित: अर्थात जो राम से प्रेम करता है वह है रामहित।

 दूसरे दिन से मेरा पत्रकारिता का प्रशिक्षण प्रारंभ हो गया। जितना  याद आता है उस समय सन्मार्ग के संपादकीय विभाग में तारकेश्वर पाठक, रमाकांत उपाध्याय, राजीव नयन, उदयराज सिंह, मंगल पाठक, सूर्यनाथ पांडेय

राजकिशोर सिंह, मोतीलाल चौधरी, हरेंद्रनाथ झा आदि थे।

 दूसरे दिन से मुझे टेलीप्रिंटर में आनेवाले अंग्रेजी समाचार दिये जाने लगे जिनका मुझे हिंदी में अनुवाद करना था। मैंने अनुवाद किया और मोतीलाल चौधरी जी को जांचने के लिए दे दिया।

 मोतीलाल चौधरी थोड़ी देर तक मेरा अनुवाद किया मैटर पढ़ते रहे फिर मुझे पास बुला कर कहा-आपका अनुवाद एकदम सही है लेकिन जो भाषा आपने लिखी है वह अखबारी भाषा नहीं है। यह संस्कृतनिष्ठ हिंदी है। यह लोगों की समझ में नहीं आयेगी। यह सच है कि हमारा अखबार विद्वानों से लेकर मजदूर तबके, रिक्शेवाले तक जाता है वह समझे ऐसी भाषा होनी चाहिए। वैसे आपकी हिंदी बहुत शुद्ध और संस्कृत से समृद्ध है।

 मैंने अपना पक्ष रखा-  मेरी शिक्षा का प्रारंभ गुरुकुल में संस्कृत के माध्यम से हुआ इसलिए मेरी हिंदी संस्कृतनिष्ठ है।

  उन्होंने कहा-कोई बात नहीं आप कोशिश कीजिए, बोलचाल की भाषा में लिखिए कुछ दिन में आदत पड़ जायेगी।

  मोतीलाल चौधरी खाने-पीने के काफी शौकीन थे। शाम को जब वे निकलने लगे तो मुझसे बोले-चलिए घर चलते हैं।

 मैंने संपादकीय विभाग के सभी लोगों को प्रणाम किया और मोतीलाल चौधरी जी के साथ चल दिया। यहां यह बताता चलूं कि उनका घर हमारे इलाके के पास ही था। तब तो लोकेशन का ज्ञान नहीं था लेकिन अब बता सकता हूं कि हमारा घर नगर के कांकुड़गाछी इलाके में था। मोतीलाल चौधरी जी का फूलबागान से पहले पड़नेवाली लोकल रेल लाइन से संटी गली में था। रेललाइन क्रास कर षष्ठीतला और फिर फूलबागान पार कर हमारा इलाका कांकुड़गाछी।

  मैंने सोचा था कि चौधरी नीचे उतर कर बस पकड़ लेंगे लेकिन वे पैदल ही चल पड़े मैंने कहा-कोई बस पकड़ लेते हैं। उन्होंने कहा-आइए ना शहर देखते हुए चलते हैं।

  अब मैं करता तो क्या करता उनके साथ हो लिया। मैं ऊब ना जाऊं इसलिए वे मुझे बंगाल के बारे में बताने लगे। उन्होंने बताया कि-राजा बल्लाल सेन यज्ञादि कार्य के लिए उत्तर प्रदेश से कुछ कान्यकुब्ज ब्राह्मणों को लाये थे। बाद में वे यहीं बस गये।

 अभी यह चर्चा चल ही रही थी कि उनको सामने फुटपाथ पर पकौड़ियां तलती हुई दिखाई दीं। वहां उनके कदम अचानक ठिठक गये। उन्होंने पकौड़ीवाले को दो जनों के लिए पकौड़ी का आर्डर दिया। मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा- आप अपने लिए बनवा लीजिए, मैं बाहर की चीजें नहीं खाता। उनके बार-बार आग्रह करने पर भी मैंने माफी मांग ली। वे तो हंस कर रह गये लेकिन पकौड़ीवाले ने मुझे कुछ ऐसी नजर से देखा जैसे कहना चाह रहा हो-यह कैसा आदमी है जो पकौड़ी नहीं खाता।

 पकौड़ियां खत्म हुईं तो चौधरी जी के कदम आगे बढ़े। अभी आधा मील ही चल पाये थे कि चौधरी जी के कदम फिर रुक गये। फिर पकौड़ी की दूकान जो मिल गयी थी यहां भी उन्होंने पकौड़ी खायीं फिर आगे बढ़े। मैं मन ही मन मना रहा था कि अब पकौड़ी की दूकान ना मिले। खैर रेल लाइन के पास हम लोग आ गये।

 वे बायीं तरफ अपने घर की ओर जाने वाली गली में मुड़ने वाली गली की ओर बढ़ते हुए बोले-बस में आने से यह मजा मिलता।

 मैंने कोई उत्तर नहीं दिया, बस मुसकरा कर रह गया।

 वे बोले- आप सीधे चले जाइए, आगे फूलबागान मिलेगा वहां से बायें मुड़ जाइएगा कुछ दूर बाद आपका मुहल्ला आ जायेगा।

 मैंने कहा-इधर का रास्ता मैं जानता हूं।

 थोड़ी देर में मैं अपने घर पहुंच गया।

 मोतीलाल चौधरी जी के बारे में यह बताता चलूं कि आध्यात्मिक चर्चाओं में वे बहुत रुचि लेते थे। उनका आध्यात्मिक ज्ञान भी काफी था। सन्मार्ग कार्यालय में जब खबरों से थोड़ा अवकाश मिलता तो मैं और वह आध्यात्मिक चर्चाओं में जुट जाते थे। चौधरी जी मैथिल थे और बांग्ला भाषा भी जानते थे। वे बंगाल के बारे में,वहां के संतों, साधकों और कला, संस्कृति के बारे में जानकारी रखते थे।

  दूसरे दिन मैं सन्मार्ग कार्यालय पहुंचा तो लोगों ने बताया –जरा गुप्ता जी से उनके चैंबर में मिल लीजिए वे आपको खोज रहे थे।

 मैं दोड़ा-दौड़ा गुप्ता जी के चैंबर पहुंचा, उनको नमस्कार कर मैंने पूछा-सर आप मुझे खोज रहे थे,कुछ काम है क्या है?

गुप्ता जी ने मेरी ओर दो पेज बढ़ाते हुए बोले-इसे जरा हिंदी में ट्रांसलेट कर के मुझे दे देना।

 मैं संपादकीय डेस्क में वापस आया और डेस्क इंचार्ज से पूछा- भाई साहब, गुप्ता जी ने एक काम दिया है आपकी आज्ञा हो तो मैं गुप्ता जी का काम कर दूं।

डेस्क इंचार्ज ने कहा-हां, हां कर दीजिए इससे भी तो आपका अनुवाद का अभ्यास हो जायेगा।

मैंने अनुवाद कर दिया और गुप्ता जी के चैंबर में जाकर उनको दे दिया और उन्हें प्रणाम कर वापस लौटने को हुआ तो उन्होंने कहा –ठहरो।

 इसके बाद उन्होंने अपने ड्रावर से कुछ निकाल कर दिया, मैंने बिना देखे जेब में रख लिया।

 घर वापस आया तो मैंने जेब टटोली, देखा पांच सौ रुपये थे। मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने सोचा मैं तो वहां सीख रहा हूं और गुप्ता जी का काम भी उसी सीखने के क्रम का हिस्सा है उसके लिए मुझे पैसा नहीं लेना चाहिए। मैंने तय किया कि दूसरे दिन उनसे क्षमा मांगते हुए रुपया लौटा दूंगा।

 मैं दूसरे दिन सन्मार्ग कार्यालय पहुंचते ही गुप्ता जी के चैंबर पहुंचा और रुपया लौटाते हुए बोला-सर यह रुपया आपने क्यों दिया, अरे आफिस में मैं अनुवाद का ही काम तो सीख रहा हूं उसके बीच इसे भी कर दिया यह भी तो मेरे सीखने के क्रम में है इसके लिए रुपया क्यों लूं।

 गुप्ता जी बोले-बड़े कुछ दें तो उसे आशीर्वाद मान कर रख लेना चाहिए। उसे वापस करना बड़ों का अपमान होता है।

इसके बाद मेरे पास कहने को कुछ नहीं था। मैं उन्हें प्रणाम कर संपादकीय डेस्क में वापस लौट आया।

 संपादकीय डेस्क के सभी लोग उम्र में मुझसे बड़े थे और मुझे छोटे भाई सा स्नेह करते थे। कुछ शायद इसलिए भी कि मैं उनके सहकर्मी रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म का भाई हूं।

 सभी लोग भुने चने मंगवाते तो मुझे भी देते। मैं संकोच में नहीं लेता तो कहते –हम भी रुक्म जी की तरह तुम्हारे भाई ही हैं हमसे संकोच कैसा।

  इसके बाद मैं ना नहीं कर पाता था। वे जो कुछ मंगवाते मुझे देते, जो चीजें मुझे पसंद नहीं होती थीं मैंने लेने से मना कर देता था।

 मंगल पाठक जी कलकत्ता में ट्यूशन पढ़ाते थे। बीच-बीच में भैया से मिलने सन्मार्ग कार्यालय आते थे। एक बार उन्होंने पाठक जी से कहा- ट्यूशन पढ़ाने से क्या होगा कोई नौकरी क्यों नहीं कर लेते।

 मंगल  पाठक बोले-और कोई काम आता नहीं कहां क्या नौकरी करें।

 भैया बोले –कुछ जुगत  भिड़ाते हैं, बस मैं जैसा कहूं करते जाइएगा।

पाठक जी ने हामी भर ली।

भैया उस समय सूर्यनाथ पांडेय जी के पास गये । सूर्यनाथ पांडेय संत स्वभाव के थे और गीता पर अंग्रेजी और हिंदी में व्याख्या करते और प्रवचन देते थे। उनके बारे में एक और मुख्य और उल्लेखनीय बात यह थी कि वे केवल गंगाजल का ही प्रयोग करते थे पीने और खाना बनाने के लिए। भैया रुक्म जी को वह बहुत मानते थो।

 भैया रुक्म जी पांडेय जी के पास गये और उनसे कहा-पंडित जी अपने एक ब्राह्मण हैं उनके पास कोई काम नहीं है आप कहें तो उनको प्रूफरीडर के रूप में रख लिया जाये।

पांडेय जी  बोले-रुक्म जी अगर आप समझते हैं कि काम के आदमी हैं तो रख लीजिए देख लीजिए प्रूफ वगरह देखना जानते हैं ना। आप उन्हें मेरे पास भेज दीजिए।

  भैया लौट कर आये और मंगल पाठक जी से बोले-आपसे पूछेंगे कि प्रूफ देखना जानते हैं तो आप हां बोल दीजिएगा।

 पाठक जी सकुचाते हुए बोले-लेकिन मैं तो नहीं जानता।

भैया बोले-हम सिखा लेंगे।

पाठक जी पांडेय जी के पास गये और सन्मार्ग में उनकी नौकरी हो गयी।

यही बात है कि वे भैया को और मुझको बहुत मानते थे। जब तक सन्मार्ग में रहे भैया को पूरा सम्मान देते रहे। बाद में वापस गांव लौट गये। वृद्धावस्था में जब छड़ी लेकर चलने लगे थे तो कलकत्ता आये और हावड़ा से अपने नाती को साथ लेकर भैया से मिलने आये थे।

यहां मैं बताता चलूं कि मैं बचपन से ही बहुत संकोची हूं। पहले तो मैं किसी निमंत्रण में नहीं जाता था और जाता भी था तो एक बार जो परोस दिया गया उसके बाद दोबारा नहीं मांगता था। घर जाकर मां से खाना मांगता था। मां पूछती -निमंत्रण में गया था वहां नहीं खाया। मैं कहता मुझे मांगने में संकोच होता है। इस संदर्भ में एक रोचक प्रसंग बताता चलूं। हमारे गांव के एक कुर्मी थे जिन्हें पता था कि मैं संकोची हूं निमंत्रण में कुछ मांगता नहीं। वह अक्सर पंगत में मेरे बगल में बैठते और कहते दादू (हमारे यहां बच्चों को इसी नाम से बुलाते हैं) जो भी परोसने आये मना मत करना, मैं हूं ना सब संभाल लूंगा। सचमुच वे बखूबी संभाल लेते। मेरे पत्तल में जो भी आता वह उनके पेट में जाता। इसी तरह मुझे किसी से कुछ भी मांगने में संकोच होता है यह आदत अब तक नहीं गयी।

  इसके चलते मैंने एक दिन अच्छी-खासी परेशानी झेली। जिस पैंट में पर्स था उसे भूल मैं दूसरा पैंट पहन गया। घर से काफी दूर पैदल निकल गया तो पता चला कि पैंट की जेब में तो पर्स ही नहीं है क्या करता पैदल ही आफिस चला गया। वापस लौटते वक्त भी मैं सन्मार्ग कार्यालय में भी संकोच से कियी से पैसे ना मांग सका और पैदल ही घर लौटा। घर में भैया से इसका जिक्र किया तो उन्होंने दूसरे दिन सबको सन्मार्ग में बता दिया।

 अगले दिन मंगल पाठक जी, राजीव नयन ने मुझे जम कर झाड़ा और पूछा-तुम हमें अपना बड़ा भाई नहीं मानते क्या। क्या हमसे पैसा नहीं मांग सकते थे।

  मैंने सिर झुका कर उनसे माफी मांग ली। (क्रमश:)

Thursday, May 26, 2022

गांव का लड़का कलकत्ता महानगर में भौंचक रह गया

आत्मकथा-भाग-34


कलकत्ता पहुंच कर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी छोटे तालाब की मछली को किसी समुद्र में फेंक दिया गया हो। मैं भीड़-भड़क्का, शोरगुल देख-सुन कर हैरान था। कहां हमारे गांव की शांति और कहां यहां का कोलाहल। बड़ा अजीब लग रहा था। हमारा 50-60 घरों का हमारा गांव और कहां सैकड़ों किलीमीटर तक फैला महानगर कलकत्ता। भैया ने बताया कि –इस महानगर के एक मोहल्ले में हमारे गांव जैसे चार-पांच गांव समा जायेंगे। मुझे याद आया कि मैं कलकत्ता तो पहुंच गया अम्मा-बाबा तक पहुंचने की खबर नहीं भेजी। मैंने भैया से अनुरोध किया की गांव के लिए चिट्ठी भेज दें कि मैं ठीक-ठाक पहुंच गया। भैया ने तुरत चिट्ठी लिखी और कहा कि वे चिट्ठी डाल देंगे। भैया ने इतने बड़े महानगर में बाहर निकलने पर संभल कर चलने और भाभी के साथ ही रहने की बात समझा दी। उन्होंने रास्ते में गाड़ियों से संभल कर रास्ता चलने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यहां चलनेवाली ट्राम तुम्हारे लिए एकदम नयी है। तुम देखोगे कि शहर में चारों ओर ट्राम लाइनें बिछी हैं जिस पर दिन भर और देर रात तक ट्रामें चलती हैं। इनमें कार या बस की तरह हार्न नहीं है घंटा बजता है। ट्राम के संदर्भ में उन्होंने एक घटना बतायी। उन्होंने कहा कि शुरु-शुरू में तुम्हारी भाभी निरुपमा त्रिपाठी घूंघट डाल कर चला करती थी। एक दिन भैया भाभी शहर में कहीं निकले थे। भाभी ट्राम लाइन के ऊपर से चल रही थीं तभी पीछे से ट्राम आ गयी। ड्राइवर काफी देर तक घंटा बजाता रहा लेकिन भाभी ने सोचा कि पास के किसी मंदिर का घंटा बज रहा होगा। भैया ने देखा भाभी ट्राम से कुछ फुट दूर ही रह गयीं थीं उन्होंने तत्काल उनका हाथ पकड़ कर ट्राम लाइन से दूर खींच लिया। थोड़ी और देर होती तो अनर्थ हो जाता। कलकत्ता में मेरे लिए सबसे परेशानी की बात यह थी कि यहां बहुसंख्यक लोग बांग्लाभाषी थे और हमें बांग्ला का ‘ब’तक नहीं आता था। कई-कई शब्द ऐसे जो मैंने जीवन में पहली बार सुने थे। ऐसा ही एक शब्द था ‘सुतरांग’। महीनों बाद किसी ने बताया कि इसका मतलब होता है इसलिए। और चाहे जो कुछ रहा हो भैया-भाभी का कालोनी में व्यवहार इतना अच्छा था कि सभी लोग मुझे भी काफी स्नेह देने लगे। मैं उनकी बात समझ नहीं सकूंगा इसलिए वे टूटी-फूटी हिंदी में सही मुझसे बातें करने लगे। मैंने जाना बांग्ला में लिंग भेद नहीं है। यहां मेये खाच्छे (लड़की खाती है) और छेले खाच्छे (लड़का खाता है)। यहां पानी पिया नहीं खाया जाता है। हिंदी में तरल पदार्थ पिये और ठोस पदार्थ खाये जाते हैं। यहां सिगरेट भी खायी जाती है। यह देख कर अटपटा तो लगा लेकिन भारत विविध रंगी, विविध आचार-विचार व्यवहार और भाषाओं का एक मनोहर गुलदस्ता है। इसकी खूबसूरती यही है कि विविध रंगों में भी यहां एकता है। कलकत्ता मेरे लिए अनजाना शहर, छोटे से गांव में रहनेवाला मैं पहली-पहली बार बड़ी-बड़ी इमारते देख कर हैरान था। यहां सबसे बड़ा बंधन भाषा का था। आप किसी से तभी अच्छी तरह से अपने भाव व्यक्त कर सकते हैं जब आप उसकी भाषा को अच्छी तरह जानते हों। मैंने ठान लिया कि पहले बांग्ला भाषा पढ़नी और बोलनी सीखनी चाहिए। अक्सर फिल्मों के जो पोस्टर लगाये जाते थे उनमें अंग्रेजी के अक्षरों के साथ बांग्ला के शब्द होते थे। इनके सहारे मैं अक्षर ज्ञान की कोशिश करने लगा। मेरी इस कोशिश को देख भैया ‘हिंदी बंगला शिक्षक’ पुस्तक ले आये जिससे काम थोड़ा आसान हो गया। एक तरफ बांग्ला सीखना और दूसरी तरफ कलकत्ता को पहचानने का क्रम जारी रहा। एक दिन भाभी और हमारे पड़ोसी चटर्जी बाबू हमें महान साधक रामकृष्ण परमहंस की साधना स्थली और मां दक्षिणेश्वर काली का दर्शन कराने ले गये। पिछली बार कालीघाट की यात्रा के दौरान बस में मेरे साथ गुंडों की झड़प को याद कर इस बार यात्रा के लिए एक टैक्सी कर ली गयी थी। 
दक्षिणेश्वर का काली मंदिर


दक्षिणेश्वर काली मंदिर दक्षिणेश्वर इलाके में गंगा तट पर बना काली जी का विशाल मंदिर है। मंदिर परिसर में ही रामकृष्ण परमहंस का साधना कक्ष भी है। विशाल मंदिर परिसर में गंगा से आते ठंड़ी हवा के झोंके स्पष्ट महसूस किये जा सकते हैं। मां काली के दर्शन कर मन तृप्त हो गया। कहते हैं यहीं रामकृष्ण परमहंस को मां काली के साक्षात दर्शन हुए थे। रामकृष्ण सहज स्वभाव के सीधे-साधे थे लोग उनको पगला ठाकुर भी कहते थे। उनका बचपन का नाम गदाधर था। उस वक्त उनके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था। हमारे साथ गये चटर्जी जी बताया कि रामकृष्ण को नरेंद्र दत्त को विवेकानंद बनाने का श्रेय जाता है। वही स्वामी विवेकानंद जिन्होंने शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन के अपने उद्बोधन से विदेश की धरती पर भारत का धर्म ध्वज फहरा दिया था। यह उनका विश्व प्रसिद्ध उद्बोधन था। बंगाल के बारे में हमारी जानकारी एकदम नहीं थी। हमारी दूसरी कक्षा की हिंदी की पोथी में सुभाषचंद्र बोस पर एक लेख था जिसमें बंगाल के बारे में कुछ वर्णन था। बस उतना भर ज्ञान था। दक्षिणेश्वर काली मंदिर के परिसर में घूमते हुए चटर्जी बाबू ने वह विवरण सुनाया था जो मैंने यहां दिया है। रामकृष्ण परमहंस के बारे में यह प्रसिद्ध है की शादी के बाद उन्होंने गृहस्थ जीवन नहीं जिया और पत्नी शारदा को भी मां की तरह मानते रहे। मां शारदा को भी यह श्रेय जाता है कि पति के साथ वह भी तपस्वनी का सा जीवन बिताती रहीं। दक्षिणेश्वर मंदिर की इस यात्रा ने रामकृष्ण परमहंस और मां शारदा के बारे में सुन कर मेरा हृदय उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति से भर गया। दक्षिणेश्वर से लौटने के बाद मैंने बंगाल के संतों और साधकों के बारे में जानने की कोशिश की तो पाया कि यह प्रांत बड़े-बड़े साधकों, साध्वियों की धरती रही है। प्रभु कृष्ण के अनन्य भक्त चैतन्य महाप्रभु जिनका वास्तविक नाम गौरांग था वे भी बंगाल के ही थे। इस्कन या अंतरराष्ट्रीय कृष्ण संचेतना संघ के प्रतिष्ठाता भक्ति वेदांत श्रील प्रभुपाद, परम साधक योगानंद परमहृंस, श्यामाचरण लाहिड़ी जैसे महान साधक और संत बंगाल की धरती से ही बाहप गये और अत्यंत सिद्धि और लोकप्रियता हासिल की। कुछ दिन बाद ही मैं अटक-अटक कर बांग्ला बोलने की कोशिश करने लगा। परेशानी यह थी कि जिनसे मैं बांग्ला बोलता वे अपनी टूटी-फूटी हिंदी में जवाब देते। मैंने सबसे अनुरोध किया कि इस तरह तो मैं बांग्ला बोलना सीख नहीं पाऊंगा। आप बांग्ला में ही बोलें जब समझ नहीं आयेगा तो मैं अवश्य आपसे उसकी हिंदी पूछ लूंगा। (क्रमश:)।

Tuesday, May 17, 2022

जब कलकत्ता की बस में मैं गुंडों से घिर गया

 आत्मकथा-33

जब कलकत्ता की बस में मैं गुंडों से घिर गया

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

भाग-33

ट्रेन बांदा स्टेशन से जितना दूर जा रही थी मेरे दिल में तमाम तरह के विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। मैं अपने घर, अपनी जमीन से तकरीबन एक हजार किलोमीटर दूर जा रहा था। मन में यही सोच रहा था कि बाबा और अम्मा से दूर जा रहा हूं पता नहीं मेरे बाद वे किस तरह से रहेंगे। अपने खेत-खलिहान सब एक-एक कर दिमाग में आ-जा रहे थे। मैं एक नयी अनजानी दुनिया की ओर बढ़ रहा था और पीछे छूट रहे थे मेरे सहपाठी, मेरे मित्र और वह आंगन जहां मैं खेला, बड़ा हुआ। ट्रेन का सफर भी मैं पहली बार ही कर रहा था वह भी इतना लंबा। बचपन में जब मुझे तेज बुखार के दौरान अचानक बेहोशी आ जाती तो मां दुर्गा माता को याद कर हाथ जोड़ कर कहतीं-मोहि पुकारत देर हुई जगदंब विलंब कहां करती हो। अम्मा बताया करतीं कि मां की प्रार्थना शेष होते ही मुझे होश आ जाता और मैं मां कह चिल्ला पड़ता। उस समय अम्मा ने मन्नत मानी थी कि अगर अब मुझे बुखार के वक्त बेहोशी नहीं आयेगी तो वे मुझे मां विंध्यवासिनी के दर्शन कराने मिर्जापुर ले जायेंगी। विंध्यवासिनी देवी की कृपा से तेज बुखार के वक्त आने वाला बेहोशी का दौरा ठीक हो गया। उसके बाद बाबा और अम्मा मुझे विंध्यावासिनी देवी के दर्शन कराने ले गये। वह मेरी पहली लंबी यात्रा थी. तब मैं बैलगाड़ी को छोड़ कर ट्रेन के बारे में नहीं जानता था। अम्मा ही बताती थीं कि जब ट्रेन रुक जाती तो मैं चिल्लाने लगता –हांक,हांक। हमारी तरफ बैलगाड़ी में जुटे बैलों को हांकना पड़ता है।

  अब फिर ट्रन का सफर। जिन सहदेव भैया के साथ  कलकत्ता जा रहा था वे मुझे गुमसुम देख कर बोले-अम्मा, बाबा की याद आ रही है क्या, क्यों चुपचाप बैठे हो।

  मैंने कहा-नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।

  इस पर सहदेव भैया की श्रीमती मोहिनी बोलीं-परेशान मत होना तुम्हारे भैया-भाभी बहुत अच्छे हैं, तुम्हें जान-सा पायेंगे।

 तब तक मानिकपुर स्टेशन आ गया था। सहदेव भैया ने स्टेशन से अंकुरित चने खरीदे। एक दोना मुझे थमा कर एक बच्चियों को दिया एक मोहिनी भाभी को थमा दिया।

मैं बेमन-सा चने चुभलाने लगा।

 मुझे परेशान देख सहदेव भैया ने कलकत्ता के बारे में बताना शुरू किया-जानते हो कलकत्ता बहुत बड़ा शहर है। सैकड़ों किलोमीटर तक फैला है। तुम्हारे गांव जैसे सैकड़ों गांव उसमें समा जायेंगे। शहर में हजारों बसें चलती हैं। दो डिब्बे की एक छोटी ट्रेन भी बिजली से चलती है जिसे वहां ट्राम कहते हैं। बहुत भीड़ है दिन भर शोर-शोर और शोर। वहां बड़े-बड़े कारखाने जूट मिल हैं जिनमें ज्यादातर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के श्रमिक काम करते हैं। कलकत्ता में हुगली नदी यानी गंगा की ही एक धारा पर हावड़ा स्टेशन के पास विश्व प्रसिद्ध हावड़ा पुल है।

 मैं सहदेव भैया की बातें ध्यान से सुन रहा था।हम लोग स्टेशन दर स्टेशन आगे बढ़ते जा रहे थे।

  मैंने सहदेव भैया से पूछा- भैया हम कब तक कलकत्ता पहुंच जायेंगे।

 भैया बोले –अगर रास्ते में ट्रेन लेट ना हुई तो सुबह सुबह पहुंच जायेंगे।

  दिन भर स्टेशन पर स्टेशन गुजरते रहे। रात आयी तो हम सभी अपने-अपने स्लीपर सो गये। मैं लेट तो गया पर ट्रेन की खटर-पटर में नींद तो आना दूर मुझे झपकी तक नहीं आयी और मैं यों ही लेटा रहा।

  सुबह हमारी गाड़ी हावडा स्टेशन पहुंची। मैंने पहली बार इतना बड़ा स्टेशन देखा था। कई ट्रेन लाइने और उन पर खड़ीं तमाम ट्रेनें। कुछ ट्रेनें स्टेशन से छूट रही थीं और कुछ स्टेशन में घुस रही थीं। चारों ओर शोर-शोर और शोर। भीड़ इतनी कि आदमी-आदमी से टकरा जाये। हमारे पास हलका-फुलका सामान था। स्टेशन से बाहर आकर मैं पहली बार एक अजूबे हवाड़ा पुल देखा जिसके नीचे से गंगा की एक धारा हुगली बह रही थी।

  सहदेव भैया ने एक पीली कार पकड़ी उसमें हम लोग बैठ गये। सहदेव भैया ने बताया कि कलकत्ता में इसे टैक्सी कहते हैं।

 करीब आधा घंटे में हम सभी सहदेव भैया के घर पहुंच गये। वे एक ऊंची ब्लिडिंग के छत पर बने घर में रहते थे।थोड़ी देर हम लोग उनके घर में रुके फिर सहदेव भैया पत्नी और बच्चियों को घर पर छोड़ मुझे लेकर भैया-भाभी से मिलाने चल पड़े। झिर-झिर कर बारिश हो रही थी। बारिश की फुहारों में भीगते हुए पैदल ही चल पड़े। सहदेव भैया अरसे से कलकत्ता में रह रहे थे। उनका प्लाईवुड का बिजनेस था। वे कलकत्ता की  हर गली और मोहल्ले से परिचित थे। रास्ते में फर्राटे से दौड़ती कारें, बसें और दूसरे वाहन दिखाई दिये। पहली बार मैं दोतल्ला बस देख कर चौंक गया।

 सहदेव भैया से पूछा-भैया यहां दो तल्ला बसें भी चलती हैं।

भैया बोले-हां, यहां ऐसी बसें भी चलती हैं।

 कलक्त्ता में गगनचुंबी इमारतों, बड़ी-बड़ी दूकानों के बीच से गुजरते हुए लगभग आधे घंटे बाद हम लोग उस कालोनी में पहुंच गये जहां भैया-भाभी एक फ्लैट में रहते थे। हम जब पहुंचे तब भाभी घर में अकेली थीं। भैया सन्मार्ग अखबार में रात ड्यूटी पर थे।

  हमने गांव से चलने से पहले कोई चिट्ठी वगैरह नहीं भेजा था। भाभी सहदेव भैया को पहचानती थीं क्योंकि वे अक्सर उनके यहां आया-जाया करते थे। उनके साथ एक अजनबी युवक को देख उनके चेहरे पर तमाम तरह के प्रश्न उभरने लगे।

  सहदेव भैया ने उनके चेहरे को पढ़ लिया और बोले-पहचानों भाभी यह कौन है।

 भाभी ने मुझे कभी देखा नहीं था। उनके पास मेरा जो फोटो भी था वह बहुत छोटी उम्र का था।

 थोड़ी देर तक मुझे पहचानने की कोशिश करने के बाद वे सहदेव भैया से बोलीं –लाला (हमारी तरफ देवर के लिए यही संबोधन किया जाता है) नहीं पहचान पायी आप ही बता दो।

 सहदेव भैया मुसकराते हुए बोले –हार गयी ना। अरे यह तुम्हारा देवर है रामहित तिवारी जुगरेहली वाला।

 भाभी ने यह सुना तो उनके चेहरे पर एक मुसकान दौड़ गयी।

  मैंने भाभी को चरण स्पर्श किया। उन्होंने पास रखी एक गद्देदार कुर्सी पर बैठने को कहा।

 मैं ज्यों ही कुर्सी पर बैठा कई बार चट-चट की आवाज हुई। मेरी समझ में नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ।

 भाभी बोलीं-देवर जी आते ही मेरी स्प्रिंग वाली कुर्सी तोड़ दी।

 वे मुसकुरा रही थीं। क्रोधित नहीं थीं।

 सहदेव भैया ने कहा अरे यह तो गांव में पहलवानी करता था। कुश्ती लड़ता था और खूब व्यायाम करता था इसीलिए शरीर से मजबूत है।

  भाभी बोलीं –कोई बात नहीं कुर्सी भी पुरानी हो चुकी थी।

भाभी ने चाय बनायी और बिस्किट के साथ मुझे और सहदेव भैया को भी दिया।

 चाय पीकर सहदेव भैया जाने को हुए तो भाभी ने कहा-थोड़ा रुक जाओ तुम्हारे भैया आते ही होंगे।

  सहदेव भैया रुक गये। थोड़ी देर में ही भैया आ गये। मैंने आगे बढ़ कर उनके चरण स्पर्श किये तो उन्होंने कहा-अरे तुम अचानक, अरे चिट्ठी तो भेज देते।

  उत्तर सहदेव भैया ने दिया-अरे यह आना थोड़े चाहता था, अम्मा-बाबा भी तैयार नहीं थे। मैं यह कर लाया हूं कि भैया-भाभी से मिला कर लौटा लाऊंगा।

 भैया ने  कहा-अच्छा किया, जब इसे कुत्ते ने काटा था तो मैं इसे देखने गांव गया था। मैं बोल आया कि थोड़े बड़े हो जाओ फिर मैं तुम्हें कलकत्ता ले जाऊंगा।

 भैया से थोड़ी देर बात कर के सहदेव भैया वापस लौट गये। भैया-भाभी मेरे पहुंचने से बहुत खुश थे। थोड़ी देर में मुझे नाश्ते में मक्खन लगी पावरोटी  दी गयी। पैकेट में बंद रोटी भी मिलती है यह मैं पहली बार देख रहा था।

  जिस कालोनी में भैया-भाबी रहते थे उसमें नौ बिल्डिंगें हैं। हर ब्लिडिंग चार तल्ले की है।

भाभी पास-पड़ोस के लोगों से मेरा परिचय कराने लगीं। भैया-भाभी एकाकी रहते थे उनके घर कोई रिश्तेदार आया है यह सुन कर आस-पास के लोग, महिलाएं देखने आने लगीं। वह दिन लोगों से मिलते-मिलाते बीता।

 शाम को भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म रात ड्यूटी में सन्मार्ग अखबार चले गये।

 *

कलकत्ता में रहते हुए मुझे एक सप्ताह ही बीता था। भैया-भाभी के फ्लैट का नंबर दो था। एक नंबर फ्लैट में एक बंगाली सज्जन चटर्जी बाबू रहते थे। वे एक दिन भाभी से बोले-भाभी तुम्हारा ठाकुरपो (पता चला देवर को बांग्ला भाषा में ठाकुरपो कहते हैं) को काली जी का दर्शन नहीं करायेगा।

 भाभी बोलीं-आप साथ चलिए तो दिखा लाते हैं।

 चटर्जी बाबू बोले-कल चलो।

 दूसरे दिन सुबह ही हम लोग बस में सवार होकर काली जी के मंदिर की ओर चल पड़े। कलकत्ता में यह मेरी पहली बस यात्रा थी। बस में भारी भीड़ थी। चटर्जी बाबू और भाभी आगे की तरफ चढ़ गये। मै पिछले दरवाजे से चढ़ गया। यही गलती हो गयी। कलकत्ता में पहली बस यात्रा वह भी  मैं अपनों से अलग हो गया। वे लोग बस के अगले हिस्से में थे और  भीड़ भरी बस में पिछली ओर रह गया। वहां कुछ शोहदे या कहें गुंड्डे टाइप के आठ-दस लड़के इस तरह खड़े थे कि उनसे पार जाना मुश्किल था। मैं इस बात के लिए घबड़ा रहा था कि पता नहीं भाभी लोग कब उतर जायें  और मैं बस में फंसा रह जाऊं। अनजान शहर, अनजान डगर उनसे ना मिल पाया तो मेरा क्या होगा। उस पर बांग्ला भाषा जो मेरी समझ में नहीं आती।

  कुछ देर बाद भाभी की आवाज सुनाई दी-उतरो, उतरो हमारा स्टापिज आ गया।

 भाभी की आवाज सुन मैंने उन बदमाश लड़कों से कहा जाने दीजिए। वे हंसने लगे और बदमाशी कर के और रास्ता रोक कर खड़े हो गये। वे टस से मस नहीं हो रहे थे और मेरी घबराहट बढ़ती जा रही थी। मुझे यह पता चल गया था कि भाभी और चटर्जी बाबू उतर गये हैं। मैंने अचानक अपने दोनो हाथों को जोरदार झटके के साथ फैलाया और उसके धक्के से वे सभी भरभरा कर इधर उधर हो गये। बस थोड़ी धीमी हुई थी रास्ता पाते ही मैं बस से कूद गया। वे लड़के खिड़की से चिल्लाये-देखे नेबो। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। मैं बस की उलटी दिशा में दौड़ पड़ा कि भाभी और चट्रर्जी बाबू पीछे ही बस से उतरे हैं। वे भी मेरे लिए दौड़े आ रहे होंगे।

 वही हुआ जो मैंने सोचा था। मैं दौड़ता चला जा रहा था उधर भाभी और चटर्जी बाबू मेरी ओर दौड़े आ रहे थे।

 जब पास आये तो चटर्जी बाबू बोले-तुम कहां रह गया था।

 मैंने कहा-कुछ गुंडों ने मुझे घेर लिया था। वे बस से उतरने ही नहीं दे रहे थे।

चट्रर्जी बाबू बोले-फिर कैसे उतरा।

मैंने उन लोगों को धक्का मारा तो सभी बस में ही गिर गये और मुझे निकलने की जगह मिल गयी।

 भाभी बोलीं-हम लोग तो बहुत डर गये थे कि तुम इस शहर से एकदम अनजान हो पता नहीं कहां चले जाओगे।

  मैंने चटर्जी बाबू से पूछा- दादा, मेंने जब उन लोगों को गिरा दिया तो उनमें से एक चिल्लाया- देखे नेबो। इसका मतलब क्या है।

 चटर्जी बाबू बोले-तुमको देख लेने का धमकी दिया वो लोग।

मैंने मुसकरा कर कहा-दादा आपके यहां बदला उधार रखा जाता है। हम बुंदलखंडी इसे उधार नहीं रखते। दुश्मन सामने हो तो तत्काल उससे निपट लेते हैं पता नहीं कल मिले ना मिले इसलिए तुरत उचित जवाब दे देना ही उचित है। इस तरह कलकत्ता का मेरा बस यात्रा का पहला अनुभव ही बहुत कड़वा रहा।(क्रमश:)

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अपनों से अपनी बात

अपनी आत्मकथा की तैंतीसवीं किश्त आपसे साझा करते हुए मैं कुछ कहना चाहता हूं। मैं बहुत ही सामान्य व्यक्ति हूं, मैं नहीं मानता कि मैंने कोई ऐसा तीर मारा है कि अपनी कहानी औरों को सुनाऊं। इस उम्मीद से कि लोग इससे प्रेरणा लें। इसे लिखने का सिर्फ और सिर्फ यही उद्देश्य है कि एक व्यक्ति को जीवन में कितना संघर्ष करना पड़ता है वह भी आज के स्वार्थी युग में जहां आपकी बांह थाम आगे बढ़ने में मदद करनेवाले कम आपकी प्रगति की रफ्तार में टांग अड़ाने वाले ज्यादा हैं। मैंने जब इसकी पहली किश्त डाली तो जनसत्ता में मेरे सहकर्मी रहे भाई मांधाता सिंह ने यह कह कर मेरा हौसला बढ़ाया-इसे जारी रखिए आखिरकार आज की पीढ़ी यह तो जाने हम लोगों ने कितना संघर्ष किया  है। सच कहता हूं उनके इस प्रोत्साहन ने ही दशकों बाद यादों के गलियारे में  लौटने का हौसला मुझे दिया। जो कुछ याद रहा उसे ही आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। आप इसे पसंद कर रहे हैं यह मेरे लिए आशीष की तरह है। इसके लिए आपका अंतरतम से आभार।