Wednesday, July 21, 2021

रावण ने क्यों किया था कौशल्या का अपहरण?




लंकापति रावण त्रिकूट नामक पर्वत पर स्थित लंका नगरी में रहता था। उसने तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया था। जब ब्रह्मा जी ने उससे वरदान मांगने के लिए कहा तो रावण ने कहा- वानर और मनुष्य के अलावा किसी अन्य के हाथों मेरी मृत्यु न हो। इसलिए उसने मनुष्यों और वानरों को छोड़ कर किसी अन्य के हाथों न मरने का वरदान ब्रह्मा जी से मांग लिया था। आनंद रामायण में उल्लेख आता है कि रावण को ब्रह्माजी ने बता दिया था कि दशरथ और कौशल्या का पुत्र ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। रावण ने अपनी मृत्यु को टालने के लिए दशरथ और कौशल्या के विवाह के दिन ही उसने कौशल्या का अपहरण कर लिया। ब्रह्माजी ने दशरथ की पत्नी कौशल्या से कहा था कि उनके गर्भ से साक्षात् भगवान विष्णु जी का जन्म होगा।

  त्रेतायुग में कोशल देश में कोशल नाम का एक राजा थे। उसकी पुत्री का नाम कौशल्या था जो विवाह योग्य हो गयी थी। राजा कोशल ने अपनी पुत्री का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ से करने का निर्णय लिया। राजा दशरथ को विवाह का प्रस्ताव सुनाने के लिए उन्होंने अपने दूत को राजा दशरथ के पास भेजा। जब वह दशरथ के पास पहुंचा वह जलक्रीड़ा कर रहे थे।

लगभग उसी समय लंकापति रावण ब्रह्मलोक में ब्रह्माजी के सामने आदरपूर्वक पूछ रहा था कि मेरी मृत्यु किसके हाथों से होगी। रावण की बात सुन कर ब्रह्माजी ने कहा-दशरथ की पत्नी कौशल्या से साक्षात् भगवान विष्णु जी का जन्म होगा। वही तुम्हारा विनाश करेंगे।

ब्रह्माजी की बात सुन कर रावण अपनी सेना के साथ अयोध्या की ओर निकल पड़ा वहां पहुंच कर उसने युद्ध किया और राजा दशरथ को पराजित कर दिया। लड़ाई सरयू के निकट हो रही थी और राजा दशरथ नौका में थे। रावण ने नौका को तहस-नहस कर दिया, तब राजा दशरथ और उनके मंत्री सुमंत नदी में बहते हुए समुद्र में जा पहुंचे।

उधर रावण अयोध्या से चल कर कोशल नगरी में जा पहुंचा। वहां भयानक युद्ध करके उसने राजा कोशल को भी जीत लिया। इसके बाद कौशल्या का अपहरण करके खुश होते हुए आकाशमार्ग से लंका की ओर चल पड़ा। रास्ते में समुद्र में रहने वाली विशाल ह्वेल (तिमि) मछली को देखकर रावण ने सोचा कि सभी देवता मेरे शत्रु हैं, कहीं रूप बदल कर वे ही कौशल्या को लंका से न ले जाएं।इसलिए कौशल्या को इस मछली को ही क्यों न सौंप दूं। ऐसा सोच कर उसने कौशल्या को एक संदूक में बंद करके मछली को सौंप दिया, और वह लंका चला गया। मछली संदूक लेकर समुद्र में घूमने लगी। अचानक एक और मछली के आने से वह उसके साथ लड़ने लगी ॉ लगी और संदूक को समुद्र में छोड़ दिया।उसी समय राजा दशरथ भी अपने मंत्री सुमंत के साथ बहते हुए समुद्र में पहुंचे। वहां उनकी दृष्टि संदूक पर पडी़। कौशल्या ने अपनी आपबीती सुनाई। राजा भी कौशल्या को देखकर आश्चर्यचकित हो गए।

आपस में बातचीत करने के बाद वह तीनों पुनः संदूक में बैठ गए। वह इसलिए क्यों कि ज्यादा समय तक समुद्र के अंदर रहना ठीक नहीं था। मछली जब आई तो उसने संदूक को मुंह में रख लिया।तब रावण ने कहा- ब्रह्माजी से कहा कि मैंने दशरथ को जल में और कौशल्या को संदूक में छिपा दिया है। तब ब्रह्माजी आकाशवाणी से बोले कि उन दोनों का विवाह हो चुका है। रावण बहुत क्रोधित हुआ। तब ब्रह्माजी ने कहा कि होनी होकर ही रहती है।मगर रावण ने सीता के हरण से पहले भगवान श्रीराम की माता कौशल्या का हरण किया था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार कौशल्या का नाम सबसे पहले एक ऐसी रानी के तौर पर आता हैं जिसे पुत्र की इच्छा थी। जिसकी पूर्ति के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया गया था। 

महाराज कोशल और अमृतप्रभा की पुत्री कौशल्या, कोशल प्रदेश की राजकुमारी थी। जिनके स्वयंवर के लिए विभिन्न प्रदेशों के राजकुमारों को बुलाया गया मगर इस बीच एक और घटना घटित हुई दशरथ और कोशल दोनों दुश्मन थे। मगर इस दुश्मनी को खत्म करने के लिए राजा दशरथ ने कोशल के साथ शंति की पहल की, मगर कोशल ने इस पहल को मना कर युद्ध के लिए दशरथ को आमंत्रित किया। जिसमें कोशल की पराजय हुई। दशरथ से हार के बाद विवश होकर कोशल को उनके साथ मित्रता करनी पड़ी। दोनों की दोस्ती जैसे बढ़ने लगी कोशल ने अपनी पुत्री कौशल्या का विवाह दशरथ के साथ किया। विवाह के बाद दशरथ ने कौशल्या को महारानी की पदवी प्रदान की। आनंद ऐसा भी उल्लेख मिसता है कि रावण कौशल्या  का अपहरण कर उनको को एक डब्बे में बंद कर एक निर्जन द्वीप पर छोड़ आया था। नारद ने रावण की इस चाल और उस स्थान के बारे में दशरथ को बताया जहां कौशल्या को रखा गया था। इतना सुनते ही रावण से युद्ध करने के लिए दशरथ अपनी सेना लेकर उस निर्जन द्वीप पहुंचे।

रावण की राक्षसी सेना के सामने दशरथ की सेना का विनाश हो गया। मगर दशरथ एक लकड़ी के तख्ते के सहारे समुद्र में तैरते रहे और उस वक्से तक पहुंच गए जिसमें कौशल्या को बंधक बनाकर रखा गया था। वहां जाकर दशरथ ने कौशल्या को बंधनमुक्त किया और सकुशल अपने महल में लें आएं। इस तरह रावण ने श्रीराम के जन्म से पहले ही अपनी मौत को टालने का प्रयास किया था। जिसमें वो विफल रहा। अब कहते हैं ना कि जाकी जस भवितव्या तैसी मिलै सहाय। आप ना आवै ताहिं पहं ताहि वहां लै जाय। रावण को राम के हाथों मरना था सो उसने अपनी मौत का रास्ता भी खुद ही चुन लिया। साधु का छल वेष धारण कर पंचवटी से सीता का अपहरण कर उन्हें श्रीलंका ले आया। राम उस वक्त स्वर्ण मृग के संधान में वन में गये थे। उन्होंने जब छल से स्वर्ण मृग का रुप धारण करनेवाले मारीच का वध किया तो वह हा लक्ष्मण, हा लक्ष्मण चिल्लाया। इस पर सीता ने भैया राम की मदद के लिए हठ कर के लक्ष्मण को भेज दिया। पंचवटी की कुटिया में सीता को अकेला पाकर रावण उनका हरण कर श्रीलंका ले गया और अशोक वाटिका में रख दिया। राम, लक्ष्मण जब वापस लौटे तो सीता को वहां नहीं पाया वे चारों ओर व्याकुल होकर उनको खोजने लगे। उसके बाद राम की सुग्रीव से भेंट, हनुमान जी का श्रीलंका जाकर सीता का पता लगाना, लंका दहन, राम-रावण युद्ध और श्रीराम के हाथों रावण का अंत। रामायण की यह कहानी तो सभी जानते हैं। इस तरह रावण ने सीता से पहले कौशल्या का भी अपहरण किया था। यह अपहरण उस समय हुआ था जब कौशल्या का विवाह राजा दशरथ से होनेवाला था।

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Thursday, July 15, 2021

क्या बदला लेने के लिए मंथरा ने दिलाया था राम को वनवास?


यदि राम को वनवास दिये जाने के कारण के मूल में जायें तो हम पायेंगे कि इसके लिए ना कैकेयी दोषी थी ना राजा दशरथ। इसके लिए अगर कोई दोषी था तो वह थी मंथरा जिसने सारा प्रपंच रच कर कैकेयी से वह करवा लिया जो शायद वह कभी नहीं करती क्योंकि राम उन्हें भी प्राणों से प्यारे थे। पर क्या मंथरा ने विष्णु से अपने पूर्व जन्म का बदला लेने के लिए उनके रामावतार में कुछ ऐसा किया जिसने श्रीराम के जीवन की दिशा ही बदल दी। यों तो यह सर्वविदित है कि राम ने दुष्टों का संहार करने और देवताओं, विप्रों की रक्षा के लिए मानव अवतार लिया था। उन्हें वनवास मिले और वे दुष्टों का नाश करें इसके लिए देवताओं ने सरस्वती की सहायता ली जिन्होंने मंथरा की मति फेर दी और उसने कैकेयी को कुछ ऐसा पाठ पढ़ाया कि वह उसकी बातों में आ गयी और उसने राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांग लिया। लेकिन इसके अलावा भी कुछ कारण हैं जिनका उल्लेख हम यहां कर रहे हैं। जिनमें से एक यह है कि क्या राम से कोई बदला लेने के लिए मंथरा ने यह दुष्ट चाल चली थी जिसका परिणाम राम के वनवास के रूप में सामने आया।

 जब भी रामायण की बात होती है, तो श्रीराम, उनके माता- पिता और भाइयों के साथ एक और नाम आता है, जो उनके परिवार का हिस्सा तो नहीं है, लेकिन श्रीराम के सम्पूर्ण जीवन में उसका बहुत महत्व है। अगर रामायण में यह पात्र ना होता तो मानवरूप में, रामजी की लीला भी शायद पूरी ना हो पाती| हमारा आशय कैकेयी की दासी मंथरा से है। वह थी तो दासी लेकिन राम की लीला में उसकी सबसे बड़ी भूमिका है।  मंथरा राजा दशरथ की सबसे प्रिय और और सुंदर रानी कैकेयी की दासी थी। वह  कैकेयी के मायके से ही उसके साथ अयोध्या आयी थी, ऐसा उल्लेख मिलता है कि मंथरा ने बचपन से ही कैकयी को बेटी की तरह पाला था, यही कारण है कि वह कैकेयी से बहुत स्नेह करती थी। दासी होने के बावजूद मंथरा ही कैकेयी को सबसे ज्यादा प्रिय थी। वह सदा मंथरा की राय लेकर ही कोई काम करती थी। वाल्मीकि रामायण में उल्लेख आता है कि मंथरा गंधर्व कन्या थी। उसे इन्द्रदेव ने पहले से ही कैकेयी के पास भेज दिया था।  यह इस उद्देश्य से किया गया था कि मंथरा मानव अवतार में श्रीराम, को वनवास दिए जाने में सहायक बने। यह भी कहा जाता है कि मंथरा के कारण ही, कैकई की माँ का अपने पति से विद्रोह हुआ था, और इसीलिए कैकई के पिता ने, उन्हें मायके भेज दिया था|

श्रीराम और उनके भाइयों के विवाह के पश्चात जब राजा दशरथ राम को राजा बनाने के लिए उनके राज्याभिषेक की घोषणा करते हैं तो मंथरा इससे बहुत दुकी हो जाती है और कैकई को रामजी के विरुद्ध भड़काती है, क्योंकि श्रीराम के राजा बनने की बात सोच कर, उसके मन में आया कि, यदि राम राजा बने तो कौशल्या राजमाता कहलाएंगी, और उसके बाद महारानी कौशल्या रानियों में श्रेष्ठ हो जाएंगी, और उनकी दासियां मुझसे श्रेष्ठ हो जायेंगी, फिर कोई भी मेरा सम्मान नहीं करेगा, यही सोच कर  मंथरा ने कैकेयी को भड़काना शुरू किया और कहा- ‘रानी आप यह मत भूलिए राम अगर अयोध्या के राजसिंहासन के अधिकारी बने तो भरत का भविष्य अंधकारमय हो जायेगा।' ये सुन कर रानी कैकेयी को भी यही लगने लगा, फिर उन्होंने, मंथरा से सलाह ली कि, उन्हें क्या करना चाहिए? तब मंथरा ने उन्हें, महाराज दशरथ से अपने दो वचनों की बात याद दिलाते हुए, उन वचनों में श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए राजसिंहासन मांगने की सलाह दी। उसके बाद कैकेयी ने बिलकुल वैसा ही किया, और रघुकुल की परम्परा के हिसाब से महाराज दशरथ को अपने वचनों का पालन कर राम को वनवास और भरत को राजसिंहासन देना पड़ा।

इसके बाद श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान सभी राक्षसों का विनाश कर लंका पर विजय प्राप्त कर मानव अवतार की अपनी भूमिका पूरी की।

ऐसा भी कहा जाताहै कि जब महाराज दशरथ ने श्रीराम को अयोध्या का राजा बनाने का निश्चय किया, और अवध में तैयारियां शुरू हो गयीं तो देवता घबरा गये क्योंकि लह चाहते थे कि श्रीराम वन में जायें ताकि रावण सहित अन्य राक्षसों का संहार हो सके। श्रीराम के मानव अवतार लेने का कारण भी यही था, लेकिन जब राज्यभिषेक की तैयारी शुरू हुई, तब राम को वन भेजने के उद्देश्य से देवताओं ने देवी सरस्वती के माध्यम से कैकेयी की दासी मंथरा की मति फेर दी और उसने कैकेयी को भड़का दिया। मंथरा कैकेयी की सबसे प्रमुख दासी, मुख्य सलाहकार थी। अयोध्या के राज परिवार व कैकेयी के जीवन में मंथरा का सीधा हस्तक्षेप होता था।

राजा दशरथ की तीन रानियाँ थी जिसमे रानी कैकेयी दूसरे नंबर पर आती थीं। सबसे बड़ी रानी कौशल्या थीं व सबसे छोटी सुमित्रा किंतु राजा दशरथ को रानी कैकेयी सबसे प्रिय थी। रानी कैकेयी तीनों रानियों में सबसे सुंदर तो थी ही साथ में युद्ध कला में भी निपुण थी। एक बार जब राजा दशरथ देवासुर संग्राम में बुरी तरह घायल हो गए थे तब रानी कैकेयी ने ही उनकी जीवन रक्षा की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें 2 वर मिले थे।

राज दरबार में रानी कैकेयी का सबसे ज्यादा प्रभाव होने के कारण उनकी दासी का भी अन्य सभी दसियों में सबसे ज्यादा प्रभाव था। रानी कौशल्या व सुमित्रा की मुख्य दासियों व अयोध्या के अन्य सभी लोगों में मंथरा का सबसे ज्यादा प्रभाव था। 

जब कैकेयी का पुत्र भरत अपने सौतेले भाई शत्रुघ्न के साथ अपने ननिहाल कैकय गया हुआ था तो अचानक से राजा दशरथ ने अपने राजगुरु से मंत्रणा कर राम के राज्याभिषेक की तैयारी शुरू कर दी। जब अयोध्या में यह समाचार फैला व मंथरा को इसका पता चला तो वह बुरी तरह बैचैन हो गयी।

कैकेयी राजा दशरथ की प्रमुख रानी होने के कारण मंथरा भी राज्य की प्रमुख दासी थी लेकिन राम के राजा बनते ही कैकेयी का प्रभाव कम हो जाता व कौशल्या की दासियों का का प्रभाव बढ़ जाता। इसके फलस्वरूप मंथरा का प्रभाव भी घट जाता जो उसे मंजूर नही था। वह मन ही मन षडयंत्र रचने लगी। उसे कैकेयी की हर बात पता थी इसलिये उसे महाराज दशरथ के कैकेयी को दिए वह दो वचन याद आ गए व इसी को उसने अपना आधार बनाया।

जब मंथरा कैकेयी के पास पहुंची तो उसे प्रसन्न देख कर परेशान हो गयी। उसने अपनी कुटिल चाल से कैकेयी के मन में ईर्ष्या भर दी और भविष्य में क्या क्या हो सकता है इसका वर्णन किया। कैकेयी अन्य रानियों पर अपना प्रभाव जमाती थी लेकिन उसे राम से भी अपने पुत्र भरत जितना ही प्रेम था व उसने कभी भरत के छोटे होने के कारण उसके राज्याभिषेक के बारे में सोचा भी नहीं था किंतु मंथरा ने कैकेयी के कान भरने जारी रखे। 

मंथरा ने उसे भविष्य में उसका प्रभाव कम हो जाने की आशंका जतायी। इसके साथ ही उसे इस समस्या से निकलने का उपाय भी सुझाया। मंथरा ने कैकेयी से कहा कि यदि वह राजा दशरथ से मिले दो वर आज मांग ले तो यह समस्या समाप्त हो सकती है। वह दो वर थे राम को 14 वर्ष का वनवास व भरत को अयोध्या का राजा बनाना।

रानी कैकेयी को मंथरा का यह सुझाव पसंद आया व उन्होंने ऐसा ही किया। मंथरा के कहे अनुसार रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से दोनों वचन मांगे। इसके चलते श्रीराम को अयोध्या का राजा बनाने का निर्णय वापस ले लिया गया व उन्हें 14 वर्षों का वनवास मिला। राम के साथ उनकी पत्नी सीता व भाई लक्ष्मण भी वन में गए।

दूसरी ओर भरत को अयोध्या का राजा नियुक्त कर दिया गया व उनके आने की प्रतीक्षा होने लगी। राजा दशरथ अपने प्रिय पुत्र राम के वन में जाने से अत्यंत दुखी थे व इसी दुःख में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। दशरथ की मृत्यु के तुरंत बाद कैकय से भरत को बुलावा भेजा गया।

जब भरत व शत्रुघ्न अयोध्या वापस आयें तब उन्हें अपने पिता की मृत्यु, भगवान राम के वनवास व स्वयं के राज्याभिषेक के बारें में पता चला। इस षड़यंत्र के पीछे कैकेयी व मंथरा का हाथ होने पर दोनों अत्यंत क्रोधित हो गए। भरत ने अपनी माँ कैकेयी का परित्याग कर दिया व अयोध्या का राज सिंहासन ठुकरा दिया। शत्रुघ्न भरी सभा में मंथरा को बालों के बल घसीट कर लेकर आयें व उसको प्राणदंड देने की बात करने लगे।

शत्रुघ्न को स्त्री हत्या करता देखकर भरत ने उन्हें रोका व समझाया कि धर्म के अनुसार स्त्री हत्या करना पाप है। साथ ही उन्हें अपने भाई राम के क्रोध का भी डर था कि कही उनके द्वारा स्त्री हत्या किये जाने से भगवान श्रीराम स्वयं उनका त्याग ना कर दे। इसलिये मंथरा को 14 वर्ष तक एक कालकोठरी में बंद कर दिया गया।

रानी कैकेयी द्वारा मंथरा का त्याग करने व भरत के द्वारा उन्हें इतना कठोर दंड देने के बाद मंथरा पश्चाताप की अग्नि में जलने लगी। उसे अब अपने किये पर ग्लानि अनुभव हुई व वह 14 वर्षों तक एक अँधेरी काल कोठरी में अपने दिन व्यतीत करती रही। उसे डर था कि 14 वर्षों के बाद जब भगवान श्रीराम आयेंगे तो उन्हें इससे भी अधिक कठोर दंड मिलेगा।

जब भगवान श्रीराम 14 वर्ष के वनवास के पश्चात वापस अयोध्या लौटे तो वे स्वयं मंथरा से मिलने कालकोठरी गए। श्रीराम को अपने सामने देखकर मंथरा उनके चरणों में गिर पड़ी व उनसे अपने कर्मों के लिए क्षमा मांगने लगी। भगवान श्रीराम ने द्रवित होकर उसी समय उन्हें क्षमा कर दिया व कालकोठरी से मुक्ति दिला दी।

ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि अपने पिछले जन्म में एक हिरण थी जो कैकेय देश में रहती थी। एक दिन कैकेय देश के राजकुमार शिकार पर निकले थे तब उन्होंने एक नर हिरण का शिकार किया। उसकी पत्नी मादा हिरण ने जब यह देखा तब वह अपनी माँ के पास गयी व विलाप करने लगी। उसकी माँ राजकुमार के पास गयी व उसने उससे कहा कि जो कार्य तुमने किया है वह अच्छा नहीं है। किसी मादा स्त्री के सुहाग को उजाड़ना तुम्हे शोभा नहीं देता। इसलिये मैं तुम्हें श्राप देती हूं कि एक दिन मैं तुम्हारे दामाद की मृत्यु व बेटी के दुःख का कारण बनूँगी। अगले जन्म में उसी हिरण ने मंथरा के रूप में जन्म लिया व राजा दशरथ की मृत्यु का कारण बनी थी।

 लोमस ऋषि ने उल्लेख किया है कि मंथरा कभी भक्त प्रहलाद के पुत्र विरोचन की पुत्री थी। जब एक बार विरोचन और देवताओं के बीच युद्ध हुआ तो विरोचन ने देवताओं पर विजय प्राप्त की थी किंतु कुछ ही समय पश्चात देवताओं ने एक षड्यंत्र रचा तथा ब्राह्मण स्वरूप धर कर विरोचन से भिक्षा में उसकी आयु ही मांग ली इस प्रकार विरोचन की मृत्यु के पश्चात सभी दैत्य यहाँ-वहाँ भाग रहे थे और उनका कोई मुखिया भी नहीं था।ऐसे में मंथरा ने दैत्यों का नेतृत्व किया और देवताओं पर फिर से विजय प्राप्त की तथा देवता भी दैत्यों के डर से इधर-उधर भागने लगे तथा भगवान विष्णु के पास पहुंचे तब भगवान विष्णु ने देवराज इंद्र को मंथरा पर आक्रमण की आज्ञा दी तो देवराज इंद्र के बज्र के प्रहार से मंथरा पृथ्वी पर जाकर गिरी और उसकी मृत्यु हो गयी। इंद्र के वज्र के प्रहार से भक्त पहलाद के पुत्र विरोचन की पुत्री मंथरा की मृत्यु तो हो गयी, किंतु मंथरा ने भगवान विष्णु से बदला लेने की ठान ली क्योंकि वह सोचती रही कि उसका जो हाल है कि उसके अपनों ने भी उसे त्याग दिया इसके लिए उत्तरदायी केवल भगवान विष्णु ही हैं।

और वह भगवान विष्णु से बदला लेने के बारे में सोचती रही बदले की भावना से उसने रामायण काल में मंथरा के रूप में जन्म लिया था और भगवान राम के जीवन को तहस-नहस कर दिया लोमश ऋषि के अनुसार जो कुबड़ी मंथरा थी वह श्री कृष्ण के काल में कुब्जा के नाम से ही जानी जाती थी।

कहीं उल्लेख मिलता है कि गंधर्वी ने मंथरा के रूप में कैकेय देश में जन्म लिया इनके पिता का नाम वृहदृथ था जो केकय देश के सम्राट अश्वपति के भाई थे,

किंतु रामायण काल में भी अपने कुबड़े रूप के कारण मंथरा अविवाहित ही रही। 

 जब पृथ्वी पर अनाचार, अधर्म, अनीति का बोलबाला था तथा चारों तरफ राक्षसों के घोर अत्याचार के कारण ऋषि-मुनियों तथा आम लोगों का जीना मुश्किल हो गया था उस समय सभी देवी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उन्होंने इस स्थिति के बारे में ब्रह्मा जी को बताया तब ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम सभी देवी देवता जाकर पृथ्वी पर वानर भालू आदि का रूप धारण करो और भगवान विष्णु श्री राम रूप में जन्म लेंगे इसलिए जाकर राक्षसों के विनाश में आप सभी उनकी सहायता करो। ऐसा सुनकर देवताओं ने गंधर्वी से प्रार्थना की कि तुम धरती लोक पर जाकर मंथरा के रूप में जन्म लो और भगवान श्री राम को 14 वर्ष वनवास दिलवाने में अपनी भूमिका निभाओ। जिससे राक्षसों का विनाश हो सके इस प्रकार मंथरा एक गंधर्व कन्या थी तथा जिस की मुख्य भूमिका श्री राम को वनवास देना तथा राक्षसों का संहार करवाना। 

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Tuesday, July 13, 2021

क्या रावण ने शिव-पार्वती से छीनी थी लंका?



रावण की लंका की भव्यता देखते बनती थी। कहा यह जाता है कि लंका रावण ने कुबेर से छीनी थी लेकिन यहां का भव्य महल पार्वती जी ने बनवाया था जिसे रावण के पिता ऋषि विश्रश्रवा ने छल से दान में ले लिया था। कहते हैं इससे कुपित पार्वती ने उनको श्राप दिया था कि जिस सोने की लंका को आपने दान में लिया है वह एक दिन जल कर भस्म हो जायेगी। कहते हैं कि उनके श्राप के चलते ही हनुमान जी ने लंका को जलाया था। हनुमान जी तो मात्र माध्यम बने मुख्य कारण था माता पार्वती का श्राप।

पार्वती जी ने कैसे भव्य महल बनवाया इसकी कथा कुछ इस प्रकार है। एक बार शंकर पर्वती जी ने विष्णु और लक्ष्मी को कैलाश पर्वत पर आमंत्रित किया। दोनों आये तो लेकिन लक्ष्मी को कैलाश की ठंड सहन नहीं हुई वे कांपने लगीं। इस पर वे पार्वती से बोलीं आप तो राजकुमारी हैं आपका निवास तो वैसा ही होना चाहिए। इसके साथ ही लक्ष्मी जी ने शिव पार्वती को बैकुंठ आने को आमंत्रित किया। बैकुंठ का वैभव और ऐश्वर्य देख पार्वती चकित रह गयीं। कैलाश लौटकर उन्होंने बैकुंठ की तरह का महल बनवाने का शिव जी से आग्रह किया। सिव जी ने पहले तो बहुत समझाया लेकिन जब पार्वती नहीं मानीं तो उन्होने देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा से एक अद्भुत और भव्य महल बनाने के लिए कहा। अपने इस स्वर्ण महल को देखने के लिए माता पार्वती ने देवी देवताओं के साथ ही विष्णु और लक्ष्मी को आमंत्रित किया।वास्तुप्रतिष्ठा की पूजा के लिए रावण के पिता ऋषि विश्वश्रवा को बुलाया गया। पूजा संपन्न कराने के बाद विश्वश्रवा ने दान में उस महल को ही मांग लिया। बाध्य होकर  वह महल उसे देना पड़ा लेकिन इससे पार्वती बहुत क्रुद्ध हो गयीं और उन्होने श्राप दे  दिया कि जाओ तुम्हारा यह महल एक दिन भस्म हो जायेगा। कहते हैं कि पार्वती के इस श्राप को पूरा करने का माध्यम हनुमान बने।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या सचमुच लंका सोने की थी। अगर तार्किक रूप से देखा जाए तो इसका शाब्दिक अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए। रामायण एक काव्य है और काव्य में उपमा, अलंकर तथा वस्तुओं को अतिरंज्त ढंग से प्रस्तुत किया जाना स्वाभाविक बात है। अक्सर आपने देखा होगा कि किसी की संपन्नता का बखान करने के लिए कह दिया जाता है उनकी तो चांदी कट रही है इसका अर्थ नहीं कि अगला चांदी के ढेर पर बैठा है। इसी तरह कह दिया जाता है कि उनका क्या वे तो सोने-चांदी से खेल रहे हैं। इसके शाब्दिक अर्थ में ना जाकर यह जानना चाहिए कि जिसकी चर्चा की जा रही है वह बहुत संपन्न है। इसी तरह जब रावण की लंका की बात आती है तो, वहां इतनी संपन्नता थी कि कहा जाने लगा कि लंका तो सोने की थी। शब्द के तीन रूप होते हैं-अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। लंका को सोने का बताना भी व्यंजना में कही गयी बात है। लंका संपन्न थी पर सोने की नहीं थी। रावण के दस सिर नहीं थे वह प्रकांड पंडित था अकेले दल व्यक्तियों की बुद्धि रखता था इसलिए उसके लिए भी व्यंजना में दस सिर की उक्ति प्रचलित हो गयी। उसके बीस भुजाओं वाली बात भी यह प्रकट करती है कि वह महाबलशाली था।

रावण के दस  और बीस भुजा वाली बात में भी ऐसा ही है. वह इतना बुद्धिमान था कि उसमें दस व्यक्तियों के बराबर बुद्धि थी।. शक्तिशाली इतना था कि उसमें बीस हाथों के बराबर बल था।

एक कथा में ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि पार्वती के कहने पर भगवान विश्वकर्मा और कुबेर ने मिल कर सोने की लंका का निर्माण किया। एक बार जब रावण उधर से गुजर रहा था तब वह सोने का महल देख कर मोहित हो गया। महल पाने के लिए उसने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और भगवान शिव के पास पहुंचा। उसने शंकर भगवान से भिक्षा में सोने की लंका मांगी। भगवान शंकर पहले ही समझ गये थे कि यह ब्राह्मण के रूप में रावण है। लेकिन वह उसे खाली हाथ नहीं लौटाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सोने की लंका रावण को दान कर दी। जब माता पार्वती को यह बात पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुईं और उन्होंने कहा कि सोने की लंका एक दिन जल कर भस्म हो जाएगी। इस श्राप के कारण हनुमान जी ने लंका में आग लगाकर उसे राख कर दिया।

इस तरह से जिस सोने की लंका को रावण ने लालच में आकर छलपूर्वक भगवान शिव से मांगा था, माता पार्वती के श्राप के कारण एक दिन वह सोने की लंका जलकर भस्म हो गयी।

राम-रावण के युद्ध और लंका के जलने की घटना पर जिन्हें विश्वास नहीं वे श्रीलंका जाकर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण देख सकते हैं। वहां अशोक वाटिका के प्रमाण मिले हैं। लंका जलायी गयी थी जमीन खोदने पर उसकी राख मिलती है। श्रीलंका सरकार ने रामाय़ण से जुड़ें स्थलों को सहेज, संभाल कर रखा है। कहते तो यहां तक हैं कि पहाड़ की एक गुफा में रावण का शव सुरक्षित रखा हुआ है।

श्रीलंका सरकार ने 'रामायण' में आए लंका प्रकरण से जुड़े तमाम स्थलों पर शोध करा कर उसकी ऐतिहासिकता सिद्ध कर उक्त स्थानों को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित कर लिया है। अब आप श्रीलंका जाकर रावण की लंका को देख सकते हैं। 

ऋषि विश्वश्रवा ने ऋषि भारद्वाज की पुत्री से विवाह किया था जिनसे कुबेर का जन्म हुआ। विश्वश्रवा की दूसरी पत्नी कैकसी से रावण, कुंभकरण, विभीषण और सूर्पणखा पैदा हुई थी। लक्ष्मण ने सूर्पणखा की नाक काट दी थी।

 ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि कुबेर को उसके स्थान से बेदखल कर रावण ने लंका में जम जाने के बाद अपनी बहन शूर्पणखा का विवाह कालका के पुत्र दानवराज विद्युविह्वा के साथ कर दिया। उसने स्वयं दिति के पुत्र मय की कन्या मन्दोदरी से विवाह किया। इतना ही नहीं रावण ने कुबेर से उनका चमत्कारी पुष्पक विमान भी छीन लिया था।  रावण पर विजय़ प्राप्ति के बाद राम, लक्ष्मण, सीता व अन्य लोग उसी पुष्पक विमान से अयोध्या वापस आये थे। उसके बाद राम ने पुष्पक विमान कुबेर को वापस कर दिया था। 

रावण के भाई कुंभकर्ण का विवाह बलि की पुत्री वज्रज्वला से और गन्धर्वराज महात्मा शैलूष की कन्या सरमा से विभीषण का विवाह हुआ। कुछ समय पश्चात् मन्दोदरी ने मेघनाद को जन्म दिया, जो इन्द्र को परास्त कर संसार में इन्द्रजीत के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

मंदोदरी से रावण के अक्षयकुमार, मेघनाद, महोदर, प्रहस्त, विरुपाक्ष भीकम वीर।। ऐसा माना जाता है कि राम-रावण के युद्ध एक मात्र विभिषण को छोड़ कर उसके पूरे कुल का नाश हो गया था।

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Wednesday, July 7, 2021

रथयात्रा से पूर्व क्यों बीमार पड़ते हैं भगवान जगन्नाथ?



अगर हम आपसे यह कहेंगे कि भगवान भी बीमार पड़ते हैं, तो शायद यह बात आपको अविश्वसनीय लगे लेकिन यह सच है कि भगवान भी बीमार पड़ते हैं वह भी पूरे पंद्रह दिन के लिए। हां पुरी के जगन्नाथ मंदिर में विद्यमान प्रभु जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा के विग्रह 15 दिनों तक अस्वस्थ रहते हैं और उनका आर्युवेदिक औषधियों काढ़े आदि से नियमित उपचार किया जाता है। उनकी सेवा ठीक बच्चों की तरह की जाती है। उनकी अस्वस्थता की इस अवधि को अंडसर की अवधि के नाम से जाना जाता है। अंडसर से यहां अर्थ संभवत: पीड़ा या कष्ट से हैं। इस दौरान पुरी के मंदिर के द्वार दर्शन के लिए बंद रहते हैं और जहां विग्रह विद्यमान हैं वहां पटचित्र लगा दिया जाता है. इस अवधि में भक्त प्रभु के दर्शन नहीं कर पाते। भगवान 15 दिन के एकांतवास में चले जाते हैं। हर वर्ष  रथयात्रा से पहले ज्‍येष्‍ठ मास की पूर्णिमा (जिसे स्नान पूर्णिमा कहते हैं और जिस दिन जगन्नाथ, बलराम, सुभद्रा के विग्रहों को गर्भ ग्रह से बाहर निकाल कर खूब स्नान कराया जाता है) से लेकर अमावस्‍या तक प्रभु  जगन्‍नाथ बीमार पड़ते हैं। इसके चलते भक्‍तों के लिए मंदिर के कपाट एक पखवाड़े तक बंद कर दिए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ बीमार क्यों पड़ते हैं इस कथा पर आने से पहले उस कथा पर आते हैं जब चैतन्य महाप्रभु भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पुरी आये और उन्हें भगवान की मूर्तियों की जगह मात्र पटचित्र दिखा। वे घंटों एक खंबे का सहारा लेकर कड़े रहे पर प्रभु के दर्शन नहीं हुए. आप जब पुरी के जगन्नाथ मंदिर में जायेंगे तो संभव है वहां का कोई सेवक आपको खंबा और उसमें अंकित चैतन्य के हाथ का चिह्न भी दिखाये। वापस मूल कथा पर आते हैं। जब चैतन्य को नीलाचल या नीलाद्रि (जगन्नाध जहां विराजमान हैं उस क्षेत्र को इस नाम से भी जाना जाता है) में जगन्नाथ के दर्शन नहीं हुए तो उन्होंने निराश होकर पुरी के समुद्र में जल समाधि लेनी चाही। कहते हैं जब वे कंठ तक जल में डूब गये तभी आकाशवाणी हुई- निराश मत हो, अभी मैं दूसरे स्थान पर हूं जहां तुम मेरे दर्शन कर सकते हो। यह स्थान अल्लारनाथ के नाम से जाना जाता है जो पुरी से लगभग 60 किलोमीटर दूर है। वहां प्रभु जगन्नाथ का पूर्णांग विग्रह नारायण के रूप में है। चैतन्य दौड़े-दौड़े अल्लारनाथ गये और वहां प्रभु को देख भाव विभोर होकर उनके विग्रह के सामने लेट गये।  उनकी इस मुद्रा की छाप आज भी अल्लारनाथ में भगवान जगन्नाथ के विग्रह के समक्ष देखी जा सकती है। अब भगवान जगन्नाथ के हर वर्ष बीमार होने की की कथा पर आते हैं।

ओड़ीसा प्रान्त में जगन्नाथ पुरी में एक भक्त रहते थे , जिनका नाम था माधव दास| वे अकेले रहते थे, संसार से उनका लेना-देना नहीं था| अकेले बैठे बैठे भजन किया करते थे, नित्य प्रति श्री जगन्नाथ प्रभु का दर्शन करते थे और उन्हीं को अपना सखा मानते थे, प्रभु के साथ खेलते थे।प्रभु इनके साथ अनेक लीलाएं किया करते थे। प्रभु इनको चोरी करना भी सिखाते थे| भक्त माधव दास जी अपनी मस्ती में मग्न रहते थे।

एक बार माधव दास जी को अतिसार का रोग हो गया। वह इतने दुर्बल हो गए कि उठ-बैठ नहीं सकते थे, पर जब तक इनसे बना ये अपना कार्य स्वयं करते थे और सेवा किसी से लेते भी नही थे।

कोई अगर कहे कि महाराज जी हम कर दें आपकी सेवा तो वे कहते नहीं मेरे तो एक जगन्नाथ ही हैं वही मेरी रक्षा करेंगे।ऐसी दशा में जब उनका रोग बढ़ गया वो उठने-बैठने में भी असमर्थ हो गये तब श्री जगन्नाथजी स्वयं सेवक बन कर इनके घर पहुंचे और माधवदासजी को कहा की हम आपकी सेवा कर दें|क्यूंकि उनका इतना रोग बढ़ गया था की उन्हें पता भी नहीं चलता था की कब मल मूत्र त्याग देते थे। वस्त्र गंदे हो जाते थे। उन वस्त्रों को जगन्नाथ भगवान अपने हाथों से साफ करते थे, उनके पूरे शरीर को साफ करते थे, उनको स्वच्छ करते थे।

कोई अपना भी इतनी सेवा नहीं कर सके, जितनी जगन्नाथ भगवान ने भक्त माधव दास जी की सेवा की। जब माधवदासजी को होश आया,तब उन्होंने तुरंत पहचान लिया कि यह तो मेरे प्रभु ही हैं।एक दिन श्री माधवदासजी ने पूछ लिया प्रभु से – “प्रभु आप तो त्रिभुवन के मालिक हो, स्वामी हो, आप मेरी सेवा कर रहे हो।| आप चाहते तो मेरा ये रोग भी तो दूर कर सकते थे, रोग दूर कर देते तो ये सब करना नही पड़ता।'

इस पर सेवक बने जगन्नाथ जी- देखो माधव! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता, इसी कारण तुम्हारी सेवा मैंने स्वयं की। जो भाग्य में लिखा होता है उसे तो भोगना ही पड़ता है। अगर उसको नहीं काटोगे तो इस जन्म में नहीं पर उसको भोगने के लिए फिर तुम्हें अगला जन्म लेना पड़ेगा। और मैं नहीं चाहता की मेरे भक्त को ज़रा से प्रारब्ध के कारण अगला जन्म फिर लेना पड़े, इसीलिए मैंने तुम्हारी सेवा की लेकिन अगर फिर भी तुम कह रहे हो तो भक्त की बात भी नहीं टाल सकता। भक्तों के सहायक बन उनको प्रारब्ध के दुखों से, कष्टों से सहज ही पार कर देते हैं प्रभु।अब तुम्हारे प्रारब्द्ध में ये १५ दिन का रोग और बचा है, इसलिए १५ दिन का रोग तू मुझे दे दे। १५ दिन का वो रोग जगन्नाथ प्रभु ने माधवदासजी से ले लिया।यही कारण है कि आज भी जगन्नाथ भगवान 15 दिन के लिए बीमार होते हैं। स्नान यात्रा करने के बाद हर साल १५ दिन के लिए जगन्नाथ भगवान आज भी बीमार पड़ते है।१५ दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है। कभी भी जगनाथ भगवान की रसोई बंद नहीं होती। मुख्य मंदिर बंद रहता है किंतु मंदिर परिसर में अन्य मंदिरों में दर्शन जारी रहते हैं। बीमारी के दौरान भगवान को ५६ भोग नही खिलाया जाता, बीमार हैं तो परहेज़ तो रखना पड़ेगा।१५ दिन जगन्नाथ भगवान को काढ़े का भोग लगता है। इस दौरान भगवान को आयुर्वेदिक काढ़े का भोग लगाया जाता है। जगन्नाथ धाम मंदिर में तो भगवान की बीमारी की जांच करने के लिए हर दिन वैद्य भी आते हैं।काढ़े के अलावा फलों का रस भी दिया जाता है। वहीं रोज शीतल लेप भी लगाया जाता है। बीमारी के दौरान उन्हें फलों का रस, छेना का भोग लगाया जाता है और रात में सोने से पहले मीठा दूध अर्पित किया जाता है। जिस दिन वे पूरी तरह से ठीक होते है उस दिन जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा निकाली जाती है जिसे देखने के लिए सभी जगह से लाखों श्रद्धालु  आते हैं।  भगवान का बीमार होना यह सब एक परंपराका हिस्सा है, जिसे प्राचीन काल से निभाया जा रहा है। ज्येष्ठ पूर्णिमा की सुबह 5 बजे से भगवान को हल्का ज्वर आने के बाद वे बीमार हो गए। भगवान जगन्नाथ, भाई बलराम और बहन सुभद्रा के मुकुट उतार दिए गए और अब वह 17 दिनों के लिए शयन करेंगे। इसके बाद 18 वें दिन यानि 12 जुलाई को स्वास्थ्य ठीक होने के बाद नगर भ्रमण पर निकलेंगे। बीमारी के दौरान  भगवान को दलिया, खिचड़ी व मूंग की दाल सहित हल्के खाद्य पदार्थों का भोग लगाया जाएगा। ठीक होने तक प्रभु एकांतवास में रहेंगे। कोरोना काल में 2021 की रथयात्रा किस तरह की होगी कहा नहीं जा सकता यह निश्चित है कि इसमें भीड़ के जुटने पर प्रतिबंध संभव है। 

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Monday, July 5, 2021

जहां आज भी शिव प्रतिदिन करते हैं संगीत साधना



अगर हम आपसे यह कहें कि एक ऐसा पर्वत है जहां आज भी प्रतिदिन शिव संगीत साधना करते हैं तो संभवत: आप विश्वास नहीं करेंगे। आप विश्वास करें या ना करें पर स्थानीय लोगों और उस पर्वत पर स्थित शिव मंदिर के पुजारी का तो यही दावा है। हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल के बांदा जिला की। बांदा जिले में केन (जिसका एक नाम कर्णवती भी है और जो यमुना की उपनदी है) नदी के किनारे वामदेवेश्वर नाम का एक पर्वत है। इस पर्वत पर एक प्राचीन शिवमंदिर है जिसे सतयुग काल का बताया जाता है। इसी में स्थापित शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि मध्यरात्रि के बाद आज भी वहां एक काला नाग आता है। कुछ देर तक शिवलिंग पर लिपटा रहता है और फिर जाने कहां गायब हो जाता है। इस यूट्यूबर ने 2016 की अपनी वामदेवेश्वर यात्रा के दौरान इस शिव मंदिर के दर्शन किये। वहां पुजारी ने गुफा की दीवार पर एक छेद दिखाया जो शायद पीछे कहीं पहाड़ पर खुलता होगा। उन्होंने बताया कि उसी छेद से नाग आता है। पुजारी ने बताया कि उन्होंने स्वयं भी कई बार नाग को देखा है। अब पहाड़ की उन चमत्कारी चट्टानों की कहानी पर आते हैं। इन चट्टानों से सात प्रकार के  स्वर निकलते हैं। किसी में मृदंग की ध्वनि, किसी में घड़ियाल की, किसी में पीतल की कलशी पीटने पर निकलनेवाली आवाज तो किसी से कोई और ध्वनि। कुल मिला कर सात तरह की ध्वनि निकलती है ठीक संगीत के सात सुरों की तरह। लोगों की धारणा है कि यह शिव की संगीत साधना की स्थली है जहां वे रोज आकर संगीत साधना करते हैं, तांडव नृत्य करते हैं। दिल्ली के एक टीवी चैनल की टीम ने चट्टानों से मधुर ध्वनि निकलने और मध्यरात्रि में शिवलिंग से नाग के लिपटने की घटना की परीक्षा ली थी। टीम ने पहले तो चट्टानों से निकलने वाले सात सुरों की परीक्षा की जो एकदम सही निकली।


उसके बाद उन्होंने गो प्रो कैमरा मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग के सामने लगा दिया और मध्यरात्रि बीतने की प्रतीक्षा गर्भ गृह से बाहर बैठ कर करने लगे। उन्होंने अपने मोबाइल में गो प्रो कैमरा को इस तरह कनफिगर कर लिया था कि जिससे गर्भ गृह में कैमरा जो भी दृश्य कैप्चर करे वह तत्क्षण उन्हें मोबाइल में दिखाई दे। ठीक मध्यरात्रि के बाद उनके मोबाइल ने ऐसा दृश्य कैप्चर किया जिससे उनके होश उड़ गये। वे दौड़े-दौड़े गर्भगृह के अंदर गये उन्होंने देखा कि गो प्रो कैमरा उलटा पड़ा है। वे गो प्रो कैमरा बाहर लाकर उसमें कैप्चर हुआ दृश्य देखने लगे। उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा जब उन लोगों ने देखा कि कैमरा दिखा रहा है कि कहीं से काला नाग आया, वह थोड़ी देर शिवलिंग से लिपटा रहा और फिर कहीं गायब हो गया। 

अब पत्थर की चट्टानों से होने वाली सात तरह की ध्वनि पर आते हैं जिसके बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि यह ध्वनि चट्टानों में स्थित धातु के तत्व के कारण हो सकती है। मान लिया तो फिर हर चट्टान की ध्वनि में विविधता क्यों है। 

अब वामदेवेश्वर पर्वत और बांदा शहर के पुराने नाम और वहां स्थापित शिवलिंग के बारे में कुछ जान लेते हैं। कहते हैं कि यह पर्वत और यहां का वामदेवेश्वर (स्थानीय लोग इसे बांबेश्वर भी कह कर पुकारते हैं) मंदिर रामचंद्र भगवान के काल का है। इस पर्वत पर कभी वामदेव ऋषि तपस्या करते थे जिन्हें सप्तऋषियों में एक माना जाता है। वे गौतम ऋषि के पुत्र थे। वे राम के कुलगुरुओं में से एक थे। कहते हैं कि पर्वत की गुफा में वामदेवेश्वर  शिवलिंग की स्थापना स्वयं वामदेव ऋषि ने ही की थी। यही नहीं बांदा शहर का नाम भी उन्हीं के नाम पर वामदा था जो अपभ्रंश होते-होते बांदा हो गया। इसका उल्लेख बांदा के गजेटियर के चैप्टर एक में है जिसका गवाह है इस वीडियो के साथ दिया गया गजेटियर के पहले चैप्टर में वामदेव ऋषि के नाम पर बांदा का नाम होने का स्पष्ट उल्लेख करता चित्र। चित्र के लाल रंग से घिरे हिस्से को गौर से देखिए।

कहते हैं राम वनवास काल में जब चित्रकूट में निवास कर रहे थे उस समय वे अपने गुरु से मिलने वामदा (तब बांदा इसी नाम से जाना जाता था) आये थे। यह भी कहा जाता है कि उस समय जिन-जिन चट्टानों में प्रभु राम के चरण पड़े इनसे संगीतमय ध्वनियां आने लगीं। पहाड़ की चट्टानों से निकलने वाली धुन का कुछ भी रहस्य हो लेकिन यह सच है इस यूट्यूबर ने स्वयं वहां पर इसका अनुभव किया है।

 पहाड़ से भी धुन निकल सकती है यह बात किसी को  भी हैरान कर देगी पर यह अद्भुत करिश्मा बांदा जिले के वामदेवेश्वर पर्वत पर कोई भी देख सकता है। जो भी इस धुन को सुनता है आश्चर्य चकित हो जाता है। वहीं वैज्ञानिकों के अपने तर्क हैं। 

यह भी मान्यता है कि केवल राम ही नहीं उनके साथ माता जानकी, भाई लक्ष्मण भी चित्रकूट से यहां वामदेव के दर्शन करने यहां आये थे। भगवान राम ने यहां आकर शिव की आराधना की थी।  ऐसी मान्यता है कि यहां शिव पूजा का सबसे अच्छा फल मिलता है। यहां महामृत्युंजय का जाप भी बहुत ही पलदायी होता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि संगीत निकालनेवाली चट्टानें करोड़ों साल पुरानी हैं। 

वामदेवेश्वर पहाड़ के पत्थरों से निकलने वाले संगीत को लोग आस्था की दृष्टि से देखते हैं, लेकिन वैज्ञानिक इसे चमत्कार नहीं मानते। 

वैज्ञानिक मानते हैं कि यहां की चट्टानों में डोलोमाइट अर्थाच चूने और आयरन की मात्रा ज्यादा है। जब चूने और आयरन की मात्रा ज्यादा हो जाती है, तब पत्थरों से आवाज निकलने लगती हैं। 

 वैज्ञानिक कारण हो या कोई दूसरा चमत्कार, लेकिन यह पर्वत लंबे समय से लोगों के लिए कौतूहल का केंद्र बना हुआ है। लोग दूर-दूर से इस पर्वत की धुन सुनने के लिए आते हैं। 

यह भी कहा जाता है कि बांदा को महर्षि वामदेव ने बसाया था। कभी यहां वामदेव ऋषि के शिष्यों के रहने के आवास हुआ करते थे। 

 धीरे-धीरे यहां बस्ती बन गई और वामदेव के नाम पर इसका नाम वामदा पड़ गया। जो बाद में बिगड़ कर बांदा हो गया। यह जिला बुंदेलखंड के मुख्य जिलों में से एक है।

वैदिक काल के ऋषि वामदेव गौतम ऋषि के पुत्र थे इसीलिए उन्हें गौतम भी कहा जाता था। वामदेव जब मां के गर्भ में थे तभी से उन्हें अपने पूर्वजन्म आदि का ज्ञान हो गया था। उन्होंने सोचा, मां का पेट फाड़ कर बाहर निकलना चाहिए। वामदेव की मां को इसका आभास हो गया। अत: उन्होंने अपने जीवन को संकट में पड़ा जानकर देवी अदिति से रक्षा की कामना की। तब वामदेव ने इंद्र को अपने समस्त ज्ञान का परिचय देकर योग से श्येन अर्थात बाज पक्षी का रूप धारण किया तथा अपनी माता के उदर से बिना कष्ट दिए बाहर निकल आए। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि वे मां के मुख से निकले थे।

 वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया तथा वे जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं। भरत मुनि द्वारा रचित भरत नाट्य शास्त्र सामवेद से ही प्रेरित है। हजारों वर्ष पूर्व लिखे गए सामवेद में संगीत और वाद्य यंत्रों की संपूर्ण जानकारी मिलती है।

 वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा थे।

 एक बार इंद्र ने युद्ध के लिए वामदेव को ललकारा था तब इंद्रदेव परास्त हो गए। वामदेव ने देवताओं से कहा कि मुझे दस दुधारु गाय देनी होगी और मेरे शत्रुओं को परास्त करना होगा तभी मैं इंद्र को मुक्त करूंगा। इंद्र और सभी देवता इस शर्त से क्रुद्ध हो गये थे। बाद में वामदेव ने इंद्र की स्तुति करके उन्हें शांत कर दिया था।

वामदेव ने राजा के कर्तव्य आदि पर भी सम्यक विचार प्रस्तुत किये। उन्होंने कहा कि जिस राज्य में अन्यन्त बलवान राजा दुर्बल प्रजा पर अधर्म या अत्याचार करने लगता है, वहाँ उसके अनुचर भी उसी बर्ताव को अपनी जीविका का साधन बना लेते हैं। वे उस पाप प्रवर्तक राजा का ही अनुसरण करते हैं; अतः उदण्ड मनुष्यों से भरा हुआ वह राष्ट्र शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। अच्छी अवस्था में रहने पर मनुष्य के जिस बर्ताव का दूसरे लोग भी आश्रय लेते हैं, उस संकट में पड़ जाने पर उसी मनुष्य के उसी बर्ताव को उसके स्वजन भी नहीं सहन करते हैं। दुःसाहसी प्रकृति वाला जो राजा जहाँ कुछ उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव करता है, वहाँ शास्त्रोक्त मर्यादा का उल्लंघन करने वाला वह राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जो क्षत्रिय राज्य में रहने वाले विजित या अविजित मनुष्यों को अपने परम्परागत आचार-विचार का पालन नहीं करने देता वह क्षत्रिय-धर्म से गिर जाता है। यदि कोई राजा पहले का उपकारी हो और किसी कारणवश वर्तमानकाल में द्वेष करने लगा हो तो उस समय जो राजा उसे युद्ध में बंदी बनाकर द्वेषवश उसका सम्मान नहीं करता, वह भी क्षत्रिय धर्म से गिर जाता है। राजा यदि समर्थ हो तो उत्तम सुख का अनुभव करे और कराये तथा आपत्तिमें पड़ जाय तो उसके निवारण का प्रयत्न करे।ऐसा करने से वह सब प्राणियों का प्रिय होता है और राजलक्ष्मी से भ्रष्ट नहीं होता। राजा को चाहिये यदि किसी का अप्रिय किया हो तो फिर उसका प्रिय भी करे। इस प्रकार यदि अप्रिय पुरुष भी प्रिय करने लगता है तो थोड़े ही समय में वह प्रिय हो जाता है। मिथ्या भाषण करना छोड़ दे, बिना याचना या प्रार्थना किये ही दूसरों का प्रिय करे। किसी कामना से, क्रोध से तथा द्वेष से भी धर्म का त्याग न करे। विद्वान् राजा छल-कपट छोड़कर ही बर्ताव करे। सत्य को कभी न छोड़े। इस तरह उन्होंने राजधर्म की सम्यक और विस्तृत व्याख्य़ा की।

 वामदेव की कथा आपने सुनी अब देखिए वह वीडियो जो हमने 2016 की वामदेवेश्वर पर्वत की यात्रा के दौरान बनाया था। इसमें आप वामदेवेश्वर पर्वत की चट्टानों से निकलती तरह-तरह की ध्वनियां सुन सकते हैं।

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Thursday, July 1, 2021

रावण स्वयं सीता को राम से मिलाने क्यों ले गया?



रावण भले ही राक्षस कुल में जन्मा हो पर वह प्रकांड पंडित था। वह संस्कृत का अच्छा ज्ञाता था। ज्योतिष शास्त्र का भी ज्ञाता था रावण। ज्योतिष पर आधारित उसका ग्रंथ 'रावण संहिता' बहुत ही प्रसिद्ध है। धार्मिक अनुष्ठानादि का भी उसे सम्यक ज्ञान था। यही कारण है कि रामसेतु के निर्माण के पश्चात राम ने जब रामेश्वर शिवलिंग की स्थापना करनी चाही तो इस अवसर पर आचार्य के रूप में रावण को आमंत्रित करना चाहा। रावण जिसने उनकी प्राणों से भी प्रिय भार्या सीता का अपहरण किया था और जो उनका शत्रु था। ऐसा मन में विचार कर राम ने जामवंत को रावण को आमंत्रित करने के लिए भेजा।

 रावण ने शिवलिंग स्थापना में राम का पुरोहित बनना स्वीकार कर लिया। रावण उस अनुष्ठान के आचार्य बने। रावण त्रिकालज्ञ था, वह यह जानता था की उसकी मृत्यु राम के हाथो लिखी गयी है। वह भगवान श्री राम से कुछ भी दक्षिणा में मांग सकता था परन्तु वह जानता था की उसकी मृत्यु भगवान श्री राम के हाथो लिखी गई है। ऐसे में आखिर रावण ने राम से क्या दक्षिणा मांगी होगी यह उत्सुकता सबके मन में जगती है।

 जामवन्त को रावण को निमंत्रण देने के लिए श्रीलंका भेजा गया। जामवन्त के शरीर का आकर विशाल था। कुम्भकर्ण के आकर की तुलना में वह थोड़े ही छोटे थे। इस बार राम ने जमवंत को भेजा। पहले हनुमान, फिर अंगद एवं अब जामवन्त। 

जब जामवन्त के लंका में आने की खबर लंका वासियो को मिली तो सभी इस  डर से सिहर गए। निश्चित रूप से देखने में जाम्पवन्त थोड़े अधिक भयावह थे. जामवन्त को सागर सेतु लंका मार्ग सुनसान मिला। कहीं कोई भी जामवन्त को दिख जाता तो वह केवल इशारे मात्र से राजपथ का रस्ता बता देता। उनके सामने खड़े होने या उन,े बोलने का साहस किसी में नहीं था।

इतना ही नहीं लंका के प्रहरी तक उन्हें बिना पूछे मार्ग दिखा रहे थे। उन्हें किसी से कुछ पूछने की जरूरत नहीं पड़ीछ। जामवन्त के लंका पहुंचने की खबर द्वारपाल ने रावण तक पहुंचा दी। रावण स्वयं चलकर जामवन्त के स्वागत के लिए राजमहल से बाहर आया तथा जामवन्त  का सेवा सत्कार करने लगा। रावण को देख जामवन्त मुस्कराये तथा रावण से बोले में तुम्हारे अभिनंदन का पात्र नहीं हूं। मैं तो अपने वनवासी राम के दूत के रूप में यहाँ आया हूं। रावण ने जामवन्त को महल के भीतर आमंत्रित किया। उन्हें आसन देकर रावण भी साथ ही बैठ गया।

  जामवन्त ने रावण से कहा कि- वनवासी राम ने आपको प्रणाम कहा है। वे सागर-सेतु निर्माण के पश्चात अब यथशीघ्र महेश्वर-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद स्वीकार करने की इच्ठा की है। मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।

 रावण यह जानता था की भगवान राम द्वारा यह अनुष्ठान स्वयं उसके पराजय के लिए किया जा रहा है, परन्तु उसने जामवन्त द्वारा सुनाया गया यह निमंत्रण प्रसन्नता से स्वीकार कर लिया। लेकिन रावण के मस्तिष्क में उस समय एक अनोखा प्रश्न आया। वह जामवन्त से बोला- आप जानते ही हैं कि कि आप त्रिभुवन विजयी अपने इस शत्रु की लंकापुरी में पधारे हैं। यदि हम आपको यहाँ बंदी बना लें और आपको  यहाँ  से लौटने न दें तो आप क्या करेंगे? 

जामवंत अट्टहास किया औरक बोले- मुझे बंदी बनाने की शक्ति किसी में नहीं है चाहे तुम्हारे लंका के सभी दानव मिल कर प्रयत्न कर के देख लें।किन्तु मुझे किसी भी प्रकार की कोई विद्वत्ता प्रकट करने की न तो अनुमति है और न ही आवश्यकता। ध्यान रहे, मैं यहां हूँ, मेरे पल-पल की जानकारी धनुर्धारी लक्ष्मण को मिल रही है। वे सब चीज ना सिर्फ देख रहे हैं अपितु सुन भी रहे हैं। यह उस यंत्र का चमत्कार है जो मैं अपने साथ लाया हूं। जब मैं वहाँ से चलने लगा था तभी से धनुर्वीर लक्ष्मण वीरासन में बैठे हुए हैं।

उन्होंने आचमन करके अपने त्रोण से पाशुपतास्त्र निकाल कर संधान कर लिया है और मुझसे कहा है कि जामवन्त, रावण से कह देना कि यदि आप में से किसी ने भी मेरा विरोध प्रकट करने की चेष्टा की तो यह पाशुपतास्त्र समस्त दानव कुल के संहार का संकल्प लेकर तुरन्त छूट जाएगा। इस कारण भलाई इसी में है कि आप मुझे अविलम्ब अपने उत्तर के साथ सकुशल और आदर सहित धनुर्धर लक्ष्मण के पास वापस पहुंचाने की व्यवस्था करें।

 यह बात सुन वहां उपस्थित सभी दानव भयभीत हो उठे। यहाँ तक की रावण भी इस बात को सुन काँप गया। पाशुपतास्त्र ! महेश्वर का यह अमोघ अस्त्र है जो सृष्टि में एक साथ दो धनुर्धर प्रयोग ही नहीं कर सकते। अब भले ही वह रावण मेघनाथ के तरकस में भी हो।

 जब लक्ष्मण ने उसे संधान स्थिति में ला ही दिया है, तब स्वयं भगवान शिव भी अब उसे उठा नहीं सकते। उसका तो कोई प्रतिकार है ही नहीं है। रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा – आप प्रस्थान कीजिए, यजमान उचित अधिकारी है। उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है। राम से कहिएगा कि मुझे उनकी पूजा में आचार्य बनना स्वीकार है।

इसके पश्चात जामवन्त रावण का संदेश लेकर वापस लौट गये। जामवन्त के वापस लौटने के पश्चात रावण अशोक वाटिका में सीता के पास पहुंचा और बोला की राम द्वारा विजय प्राप्ति के लिए अनुष्ठान किया जा रहा है और मैं उनका आचार्य हूं। यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व यजमान का ही होता है और यह बात तुम्हें पता ही है के अर्धांगिनी के बिना इस तरह के पवित्र अनुष्ठान जैसे पवित्र कार्य एक गृहस्थ के लिए अपूर्ण माना जाता है। इसलिए राम के इस कार्य को पूर्ण करने के लिए तुम मेरे विमान में बैठ जाओ पर ध्यान रहे की तुम उस वक्त भी मेरे अधीन ही रहोगी।

इसके बाद रावण माता सीता के साथ उस स्थान पर अर्थात रामेश्वरम पहुंचा जहाँ श्री राम ने अनुष्ठान का आयोजन किया था। भगवान राम ने रावण को प्रणाम करने के साथ ही उसका उचित आदर सत्कार किया। इसके पश्चात रावण द्वारा अनुष्ठान सम्पन कराया गया।

 यज्ञ के बाद राम द्वारा आचार्य रावण को दक्षिणा देने की बारी आयी। राम ने दक्षिणा की प्रतिज्ञा लेते हुए रावण से कहा की आचार्य आप अपनी दक्षिणा बतलाइए।

दक्षिणा के रूप रावण ने जो मांगा वह आश्चर्य चकित करने वाला था। प्रभु राम का शत्रु होने के बावजूद रावण ने राम जी से कहा घबराओ नहीं यजमान मैं कोई ऐसी वस्तु दक्षिणा में नहीं मांगूंगा जो आप देने में असमर्थ हों या जो आपको अपने प्राणों से भी प्रिय हो।मैं तो अपने यजमान से सिर्फ यही दक्षिणा में चाहता हूं की जब वह मृत्यु शैय्या पर होरें तो यह यजमान अर्थात राम उसके सम्मुख हों। भगवान श्री राम ने रावण को वचन दिया की वह समय आने पर अपना वचन अवश्य निभाएंगे। विदित है कि रावण जब अंतिम सांसें ले रहा था उस वक्त भगवान राम ने रावण को दर्शन तो दिया ही था अपने लघु भ्राता लक्ष्मण को रावण से कुछ शिक्षा लेने को  भी भेजा था। लक्ष्मण जाकर रावण कि सिरहाने खड़े हो गये लेकिन जब बहुत देर तक रावण कुछ नहीं बोला तो वे लौट आये। राम ने पूछा -क्या सीखा? लक्ष्मण का उत्तर था वह तो कुछ बोला ही नहीं। राम ने पूछा -तुम कहां खड़े थे? लक्ष्मण का उत्तर था-रावण के सिरहाने। इस पर राम ने कहा-लक्ष्मण गुरु से कुछ सीखना हो तो उसके चरणों के पास बैठना चाहिए। लक्ष्मण दोबारा रावण के पास गये और चरणों की ओर खड़े होकर बोले-महाराज मुझे कुछ शिक्षा दीजिए। रावण ने लक्ष्मण को राजनीति के कई गुर सिखाने के बाद एक सबसे बड़ी बात कही-लक्ष्मण हमेशा ध्यान रखना कोई गुप्त बात अपने सगे भाई तक को ना बताना। इसके बाद रावण ने बताया कि उसने अपनी मृत्यु का रहस्य केवल अपने भाई विभीषण को बताया था और वही उसकी मृत्यु का कारण बना।

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Monday, June 28, 2021

प्रभु राम को क्यों लेनी पड़ी चित्रकूट में रहने की अनुमति?


चित्रकूट धाम भगवान राम की कर्मस्थली रही है। यहां प्रभु राम, सीता, लक्ष्मण ने चौदह वर्ष के वनवास के साढ़े ग्यारह वर्ष बिताये थे।  चित्रकूट विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी पर अवस्थित है। प्रभु राम ने जब वाल्मीकि ऋषि से पूछा कि वे बतायें कि वनवास काल में हम कहां रहें। तब वाल्मीकि जी ने कहा था- चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहं सब भांति तुम्हार सुपासू।।अर्थात हे प्रभु आप चित्रकूट गिरि पर निवास कीजिए, वहां आपको सब प्रकार की सुविधा मिलेगी। यहीं भाई भरत भगवान राम को मना कर अयोध्या वापस ले जाने आये थे। राम नहीं माने तो वे उनकी पादुकाएं लेकर अयोध्या लौट गये।

बहुत ही रमणीक स्थल है चित्रकूट। वहां मंदाकिनी नदी बहती है जिसे अत्रि मुनि की पत्नी अनुसूया तप बल से लायी थीं। संभवत: मंद गति से बहने के कारण इसका यह नाम पड़ा. इसका एक नाम पयस्वनी भी है. मान्यता है कि प्राचीन काल में दीपावाली की मध्य रात्रि में यहां पय अर्थात दूध की धारा बहा करती है।

चित्रकूट गिरि में कामतानाथ स्वामी निवास करते हैं इसलिए इसे कामदगिरि भी कहते हैं। कहते हैं कि कामदगिरि के दर्शन मात्र से दुखों का नाश होता है। रामचरित मानस में स्वयं पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास ने इस बारे में लिखा है -कामद भे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत विषादा।

रहीम और तुलसीदास में अच्छी मित्रता थी। जब तुलसीदास चित्रकूट में रह कर रामायण लिख रहे थे तो रहीम उनसे मिलने आते थे। कामदगिरि के परिक्रमा पथ पर अभी भी पांच सौ साल पहले लगाया गोस्वामी तुलसीदास का पीपल पेड़ विद्यमान है। हालांकि वह जर्जर हो गया है लेकिन अब तक उसकी दो-तीन शाखाएं हरी हैं। इसी के नीचे बैठ कर तुलसीदास रामायण लिखा करते थे। यहां स्थिति कुटी में उनके हस्तलिखित रामायण के पृष्ठ इस यूट्यूबर ने 2016 की अपनी चित्रकूट यात्रा में देखे थे। कुछ पृष्ठ तुलसीदास जी की जन्मस्थली राजापुर के तुलसी कुटीर में सुरक्षित हैं। 

 चित्रकूट पहले उत्तर प्रदेश के कर्वी जिले में आता था अब उस जिले का नाम बदल कर चित्रकूट धाम रख दिया गया है। चित्रकूट में वनवास काल में देवता प्रभु राम से मिलने आते थे। कुछ तो वहीं वनवासियों का जन्म लेकर बस गये थे ताकि प्रभु की सेवा कर सकें। कहते हैं देवांगन नामक स्थान पर वे प्रभु से मिलते थे। भगवान कामदगिरि की चोटी पर पर्णकुटी बना कर रखते थे। कहते हैं वहां सीता जी ने तुलसी के पौधे लगाये थे। अब जहां कोई लगभग बारह वर्ष रहेगा तो आसपास के पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन तो करेगा ही। यहां लगभग सौ साल पुराना एक ऐसा प्रसंग जोड़ रहा हूं जो मेरे पिता जी मंगल प्रसाद त्रिपाठी से जुड़ा है। अपनी एक चित्रकूट यात्रा के दौरान जब वे पहाड़ की चोटी की ओर जाने का प्रयास कर रहे थे तो लोगों ने रोका-अरे भाई ऊपर मत जाइए वहां जंगली जानवर हैं, बहुत खतरा है। पिता जी ने जवाब दिया- अब यहां आये हैं तो वह स्थान तो देखूंगा ही जहां प्रभु राम, सीता, लक्ष्मण पर्णकुटी बना कर रहे थे। 

चित्रकूट से लौट कर घर आये पिता जी ने लोगों से बताया कि चोटी पर तुलसी के पौधों का जंगल है और वह भाग जहां पर्णकुटी रही होगी समतल है। हमने क्या सभी ने यह उक्ति सुनी होगी-रामभरोसे जे रहें पर्वत पर हरियांय। तुलसी बिरवा बाग में सींचे से कुम्हलांय। 

रहीम ने भी चित्रकूट के बारे में लिखा है कि-चित्रकूट में रम रहे रहिमन अवध नरेस।जापर विपदा पड़त है सो आवत यहि देश। अर्थात रहीम जी कहते हैं कि  चित्रकूट में राम का निवास है। जिस पर भी विपत्ति आती है वही शांति पाने के लिए इस क्षेत्र की ओर खिंचा चला आता है।

कहते हैं कि एक बार रहीम और तुलसीदास कामद गिरि के परिक्रमा पथ पर साथ-साथ जा रहे थे कि तभी उन्होंने देखा कि एक रईस व्यक्ति हाथी पर सवार होकर आ रहा है। अपने स्वभाव के अनुसार हाथी सड़क से धूल उठा कर अपनी पीठ पर डाल रहा था। इससे उस रईस के कपड़े गंदे हो रहे थे इसलिए वह हाथी को पीट रहा था। इस पर तुलसी ने रहीम से पूछा-धूरि धरत निज शीश पर कहु रहीम केहि काज। इस पर रहीम ने कितना लाजवाब जवाब दिया वैसा जवाब उनके जैसा विद्वान ही दे सकता है। उन्होंने तुलसी की पंक्ति को इस तरह पूरा किया-जेहिं रज मुनि पत्नी तरी सो ढूंढ़त गजराज।। यानी जिस रज से अहिल्या तरी थीं यह गजराज वही रज ढूंढ़ रहा क्योंकि राम यहां भी बहुत दिनों तक रहे थे।

 चित्रकूट में मंदाकिनी के रामघाट पर ही हनुमान जी के सहयोग से  तुलसीदास को राम के दर्शन हुए थे। वहां तोते के रूप में हनुमान जी ने यह दोहा पढ़ कर उन्हें राम के दर्शन कराये थे-

चित्रकूट के घाट पे, भई सन्तन की भीर,

तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुवीर।

इस घटना की स्मृति स्वरूप आज भी तोतामुखी हनुमान की प्रतिमा चित्रकूट में स्थापित है। मंदाकिनी नदी में स्नान करने का बड़ा महत्व है यहां मौनी अमावस्या और दीपावली के दिन लाखों लोगों की भीड़ जुड़ती है जो मंदाकिनी में स्नान कर कामतानाथ के दर्शन करते हैं। 

कमादगिरि के परिक्रमा पथ पर विविध मंदिर हैं। यहीं प्राचीन पीलीकोठी संस्कृत विद्यालय है। इस पवित्र पर्वत का काफी धार्मिक महत्व है। श्रद्धालु कामदगिरि पर्वत की पांच किलोमीटर की परिक्रमा कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं। कुछ लोग परी परिक्रमा (पेट के बल लेट कर) भी करते हैं।जंगलों से घिरे इस पर्वत के तल पर अनेक मंदिर बने हुए हैं।  परिक्रमा पथ पर ही भरत मिलाप का स्थल है। जहां भरत, राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न आपस में एक-दूसरे से गले लगे थे। कहते हैं कि उस समय इन भाइयों का प्रेम देख पत्थर की शिला पिघल गयी थी और सभी भाईयों के पदचिह्न वहां अंकित हो गये थे। ये चिह्न आज भी परिक्रमा पथ पर देखे जा सकते हैं।

मन्दाकिनी नदी को सभी प्रकार के पापों को नष्ट करने वाला बताया गया है।

सुरसरी धार नाउ मंदाकिनी, जो सब पातक पोतक, डाकिनि।अत्रि आदि मुनिवर बहु बसहि, करहि जोग जप तप तन कसहीं।

जो मनुष्य इस मंदाकिनी गंगा के द्वारा विधिवत् पितृ और देवताओं का तर्पण करता है तथा श्राद्ध और पिण्ड दान करता है। उसे यज्ञों का-सा फल मिलता है। वह कायिक, वाचिक और मानसिक पापों से मुक्त हो जाता हैं। मन्दाकिनी नदी के किनारे सती अनुसूया अत्रि आश्रम, रामघाट, राघवप्रयाग श्री मत्तगयेन्द्र शिव मंदिर, प्रमोदवन, जानकी कुण्ड और स्फटिक शिला, तुलसीदास मंदिर और अनेक पावन तीर्थ हैं।  वाल्मिकि रामायण में चित्रकूट का विस्तृत वर्णन किया है-

नाना नागगणों पेतः किन्नरोरम सेवितः।

मयूर नादाभिरतों गजराजनि सेवितः।।

गम्यता भविता शैलस्चित्रकूटः स विश्रुतः,

पुण्यश्च रमणीयश्च बहु मूल फला युतः।

सरित्प्रस्त्रवण प्रस्थान्दरी कन्दर निर्झरान,

यावता चित्रकूटस्य नरः श्रृगाण्डय वेक्षते।।

अर्थात  सुविख्यात पर्वत नाना प्रकार के वृक्षों से हरा-भरा है। यहाँ पर बहुत से नाग, किन्नर सेवक जैसे सेवा करते हैं। मोरों के कलरव से वह अत्यंत रमणीय है। चित्रकूट पर्वत परम पवित्र है। रमणीय फल-फूलों से सम्पन्न है। मंदाकिनी नदी अनेकानेक जलस्रोत, पर्वत शिखर, गुफा, कंदरा, झरने से मन को आनन्द व कल्याणकारी पुण्य फल प्रदान करते हैं।

रामघाट

रामघाट मंदाकिनी नदी का एक महत्वपूर्ण घाट एवं स्थान है। मंदाकिनी नदी पर स्थित इस घाट पर वनवास काल में भगवान राम, लक्ष्मण और सीता  स्नान किया करते थे। इसलिए इसे रामघाट कहते हैं। यह घाट मंदाकिनी के ठीक मध्य में स्थित है। यहीं तुलसीदास को भगवान राम के दर्शन हुए थे।

पुनीत मंदाकिनी नदी में प्रतिदिन स्नान तपस्या से इन्द्रिय शमन और मन निग्रह से समस्त पाप दूर हो जाते हैं। भगवान श्रीराम ने जगत जननी जानकी को यहां स्नान करने की आज्ञा दी थी। दीपावली के अवसर पर दीपदान का दृश्य यहाँ देखते ही बनता है। यों तो यहां प्रतिदिन संध्या को मंदाकिनी की आरती होती है।

 मत्तगयेंद्र मंदिर

रामघाट में कई सीढ़ियां चढ़कर  ऊंचाई पर स्थित है मत्तगयेंद्र अर्थात शिवजी का प्राचीन  मंदिर । कहते हैं कि स्वयं ब्रह्मा जी ने इस शिवलिंग की स्थापना क्षेत्रपाल के रूप में की थी। यही कारण है कि जब राम यहां आये तो उन्होंने रामघाट में स्नान कर मत्तगयेंद्र स्वामी से उनके क्षेत्र में रहने की अनुमति मांगी थी। इतना ही नहीं जब सीता जी ने यह स्वप्न देखा कि भरत सेना लेकर चित्रकूट आ रहे हैं तो इस स्वप्न की शांति के लिए उन्होंने भी मत्तगयेंद्र मंदिर में शिव की पूजा की थी। इसकी स्थापना के बारे में यह श्लोक प्रचलित है-

प्रतिष्ठात्य शाम्भवं भूरि भावनः,

मत्त गयेन्द्र नामेदं क्षेत्रपालं समादद्ये।

भगवान शंकर का मत्त गयेन्द्र नामक शिवलिंग दर्शन और पूजन से शीघ्र ही बैकुण्ठ प्राप्ति का फल देने वाला है। हर क्षेत्र का एक क्षेत्रपाल होता है जो उस क्षेत्र का स्वामी होता है। यहां प्रश्न हो सकता है कि स्वयं विष्णु ने राम का अवतार लिया था जिन्हें साक्षात परमब्रह्म माना जाता है उन्हें भला कहीं रहने के लिए किसी देवता की अनुमति क्यों लेनी पड़ी। यहां स्पष्ट कर दें कि प्रभु राम अवतारी थे लेकिन उन्होंने मानव अवतार लिया था। जब विश्व में पाप बढ़ गया धरती देवताओं के पास रक्षा के लिए गयी तब सभी विष्णु के पास गये उनकी प्रार्थना की तो विष्णु ने उन्हें यह कह कर भरोसा दिया-जिन डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हंहि लागि धरिहौं नर बेसा।। अंशन सहित मनुज अवतारा। लेहंऊ दिनकर वंश उदारा।।

तो प्रभु मानव अवतार में सूर्यवंश में पैदा हुए। उन्होंने मनवोचित सभी धर्मों का पालन किया। इसीलिए उन्होंने मत्तगयेंद्र स्वामी से उनके क्षेत्र में रहने की अनुमति मांगी।

रामघाट के पास बालाजी का भव्य मंदिर बना हुआ है। इस आश्रम के आस-पास सात पावन शिलाएँ हैं। आश्रम के मंदिर में अनुसूया के पुत्र दत्तात्रेय तथा उनकी स्वयं की मूर्ति स्थापित है। मंदिर के नीचे अन्य पुत्रों चन्द्रमा तथा दुर्वासा की मूर्तियाँ विद्यमान हैं। यह वही स्थान है। जहाँ वनवास के समय चित्रकूट निवास में सीता जी को अनुसुइया ने पातिव्रत्य धर्म का उपदेश दिया था।  

चित्रकूट में महासती अनुसुइया एवं उनके पति अत्रि मुनि का अति प्राचीन आश्रम मंदाकिनी के किनारे स्फटिक शिला एवं कामतानाथ जी से 15 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यहाँ सती अनुसुइया और अत्रि से संबंधित ऐतिहासिक झाँकियाँ निर्मित हैं। इसी आश्रम से मंदाकिनी गंगा प्रकट हुई हैं। वे यहाँ स्वर्ग गंगा भी कहलाती हैं।

राघव प्रयाग 

राघव प्रयाग मंदाकिनी के पश्चिमी किनारे पर स्थित है।पर्वत के मध्य में गंगा नाम की जो नदी है उसे पयस्विनी कहते हैं। सावित्री, गंगा और मंदाकिनी इनका जहाँ पर संगम है उस स्थान को राघव प्रयाग कहते हैं। इस स्थान पर सनकादि मुनि आदि ने महान तप किया था। 

राघव प्रयाग में श्री राम ने सीता लक्ष्मण के साथ जंगली कंद मूल से विधिपूर्वक अपने पिता दशरथ जी का श्राद्ध किया था। कहते हैं इसीलिए यह राघव प्रयाग कहलाने लगा। राघव प्रयाग में जो भी स्नान करता है, उसके हृदय में श्री सीता राम की भक्ति उत्पन्न हो जाती है। 

हनुमान धारा के अनन्तर प्रमोद वन या राम तीर्थ नाम का तीनों लोकों में प्रशंसित तीर्थ है। उस तीर्थ के दर्शनादि कर्मों का फल यज्ञ के समान होता है।  रामघाट से दो किलोमीटर की दूरी पर पयस्विनी के किनारे प्रमोद वन है। यहाँ रामनारायण भगवान का मंदिर है।

जानकी कुण्ड

प्रमोद वन के कुछ दक्षिण भाग में रामघाट से दो किलोमीटर दूर जानकी कुण्ड स्थित है। कहते हैं वनवास के समय सीता जी इसी कुण्ड में नित्य स्नान किया करती थीं। इसी कारण इस कुण्ड को जानकी कुण्ड कहते हैं।

यहाँ पर श्री रामचन्द्र नित्य विहार करते हैं। उनके चरणों की रेणु यहाँ पर्वत के रूप में एकत्रित हो गई है। उसकी शिला स्फटिक समान स्वच्छ चिकनी है, जो संसार को पवित्र करती है। उस शिला में सुन्दर दाहिना चरण चिन्ह विद्यमान है। जानकी कुण्ड के नाम से प्रख्यात है। इस सीता कुण्ड में स्नान करके तथा भक्ति भाव से चरणों का पूजन करने से मनुष्य के पापों का नाश होता है व भक्ति भाव जगता है। कहा भी है-

सीता कुण्डे नरः स्नात्वा चरणं पूज्य भक्तितः,

भक्ति योगम् प्राप्नोति महापातक नाशनम्।

यह स्थान रम्य आश्रम के रूप में है। यहाँ महात्मागण, अनगिनत गुफाओं में तपश्चर्या में लीन रहते हैं।

स्फटिक शिला

स्फटिक शिला मंदाकिनी गंगा के किनारे स्थित है। हरे-भरे वृक्षों के कारण यह स्थान बहुत सुंदर लगता है। ऐसा कहा जाता है कि जब राम और सीता  चित्रकूट से अत्रि ऋषि के आश्रम को जाते थे तो रास्ते में मंदाकिनी के किनारे एक श्वेत धवल शिला पर बैठ विश्राम करते थे। इस मनोरम पवित्र स्थल पर श्री राम के पद चिन्ह एक शिला पर अंकित हैं। इसी स्थान पर इन्द्र के पुत्र जयंत ने  कौए का रूप धारण कर सीता जी के चरण में चोंच मारी थी। यहाँ सीता जी के चरण चिन्ह अंकित हैं जो सफेद पत्थर पर बने हैं जो अनेकों वर्ष के होंगे। यह शिला स्फटिक मणि के समान हैं, इसी कारण इसका नाम स्फटिक शिला पड़ा।

 गुप्त गोदावरी

तुंगारण्य नाम के पर्वत से निकली पापों को नष्ट करने वाली पुण्य नदी गोदावरी है जो गुप्त गोदावरी नाम से प्रसिद्ध है। इस स्थान पर महादेव जी भी विद्यमान हैं। जिनकी ऋषि-मुनि सेवा करते हैं।नगर से 18 किलोमीटर की दूरी पर गुप्त गोदावरी स्थित है। यहां दो गुफाएं हैं। एक गुफा चौड़ी और ऊंची है। प्रवेश द्वार संकरा होने के कारण इसमें आसानी से नहीं घुसा जा सकता। गुफा के अंत में एक छोटा तालाब है जिसे गोदावरी नदी कहा जाता है। दूसरी गुफा लंबी और संकरी है जिससे हमेशा पानी बहता रहता है। कहा जाता है कि इस गुफा के अंत में राम और लक्ष्मण ने दरबार लगाया था। यहाँ एक शिला पहाड़ की ऊपरी दीवार पर स्थित है जिसे मयंक या खटखटा राक्षस भी कहा जाता है। यहां चमगादड़ों का जमघट है जो इस शिला में उलटे लटके रहते हैं। इस शिला के बारे में कहा भी गया है-

शिलैका चोर रूपा च अंतरिक्षे प्रवर्तते,

गोदावर्ण नरः स्नात्वा कृत्वा संध्या यथा विधिः।

गोदावरी पुण्य सलिला है। पापमोचनी एवं आत्मिक आनन्द प्रदाता है।

 गुप्त गोदावरी का जल प्रवाह कुछ दूरी के बाद गायब हो जाता है।

चित्रकूट में मंदाकिनी के किनारे प्रत्येक अमावस्या एवं दीपावली को मेला लगता है। जहाँ लाखों श्रद्धालु चित्रकूट के विभिन्न मठों, मंदिरों के अतिरिक्त मन्दाकिनी के अलग-अलग पवित्र घाटों में स्नान एवं कामदगिरि की परिक्रमा के साथ ही दीपदान कर स्वयं को धन्य मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि चित्रकूट में आकर मन्दाकिनी में दीपदान करने वाला सुख, शांति, समृद्धि, वैभव और सद्गति को प्राप्त होता है। इसी मान्यता और मनोकामना की पूर्ति के लिए लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष चित्रकूट पहुँचते हैं।

 चित्रकूट- चित्र+कूट शब्दों के मेल से बना है। संस्कृत में चित्र का अर्थ है अशोक और कूट का अर्थ है शिखर या चोटी। इस संबंध में कहावत है कि चूंकि इस वनक्षेत्र में कभी अशोक के वृक्ष बहुतायत में मिलते थे, इसलिए इसका नाम चित्रकूट पड़ा। कुछ लोग चित्रकूट का अर्थ चित्त का हरण करनेवाला या मोहनेवाला भी बताते हैं।

 प्रभु श्रीराम की स्थली चित्रकूट की महत्ता का वर्णन पुराणों के प्रणेता संत  वेद व्यास, आदिकवि कालिदास,तुलसीदास, आदि ने अपनी कृतियों में किया है।  चित्रकूट के पाँच-छह मील  के क्षेत्र में  बहुत से धार्मिक महत्व के स्थान है| यह एक बहुत बड़ा कस्बा है| इसकी मुख्य बस्ती सीतापुर है| उसी को चित्रकूट कहते हैं| चित्रकूट जाने के लिए रेलवे स्टेशन या कर्वी पर उतरना पड़ता है| दोनों से चित्रकूट एक सामान दूरी पर है| कर्वी से यहाँ जाने में ज्यादा आसानी होती है | यहाँ से बस आटो आदि मिल जाते है|

हनुमान धारा

हनुमान धारा एक पहाड़ी चोटी पर स्थित है। यहां हनुमान जी की मूर्ति के कंधे पर एक झरना गिरता है और फिर सामने ही लुप्त हो जाता है। कहते हैं लंका दहन के बाद जब हनुमान जी के शरीर की जलन शांत नहीं हो रही थी राम ने ही उन्हें इस पहाड़ी पर रहने की सलाह दी थी। राम ने अपने बाण से वह झरना पैदा किया जो अनवरत हनुमान जी की मूर्ति के कंधे पर गिर रहा है।

सीता रसोई

पर्वत की चोटी पर एक छोटा सा मंदिर बना है जिसे सीता रसोई कहते हैं। कहते हैं कि प्रभु राम, लक्ष्मण और सीता जी के चित्रकूट प्रवास की अवधि में एक बार सीता जी ने अत्रि समेत तीन ऋषियों को अपने हाथों से खाना बना कर भोजन कराया था। यही कारण है कि यह स्थल सीता रसोई के नाम से प्रसिद्ध है। 

चित्रकूट मंदाकिनी नदी के किनारे पर बसा भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में एक है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 38.2 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला शांत और सुन्दर चित्रकूट प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन है। चित्रकूट जिले में ही राजापुर है जो पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली है।

राम घाट वह घाट है जहाँ प्रभु राम नित्य स्नान किया करते थे l इसी घाट पर गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रतिमा भी है l 

लक्ष्मण पहाड़ी

कामदगिरि के पास ही है लक्ष्मण पहाड़ी जहां कहते  हैं कि लक्ष्मण जी सदैव धनुष में बाण सादे भैया राम और भाभी सीता की रक्षा में तत्पर रहते थे। उन्हें नींद ना आये इसलिए उनकी पत्नी उर्मिला ने उनके हिस्से की नींद भी स्वयं भोगने का वरदान मांग लिया था। लक्ष्मण चौबीस घंटे जगते रहते थे और उनके बदले उर्मिला चौबीस घंटे सोती रहती थीं। कहते हैं उर्मिला की नींद लक्ष्मण के वन से अयोध्या वापसी पर ही खुली।

भरतकूप

 भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए भरत भारत की सभी पवित्र नदियों का जल लाये थे पर राम राज्याभिषेक करा कर अयोध्या वापस लौटने को तैयार नहीं हुए। इसके बाद अत्रि मुनि के परामर्श पर भरत ने वह पवित्र जल एक कूप में रख दिया था। इसी कूप को भरत कूप के नाम से जाना जाता है। भगवान राम को समर्पित यहां एक मंदिर भी है। 

वायु मार्ग

चित्रकूट का नजदीकी हवाई अड्डा प्रयागराज है। इसके अतिरिक्त नजदीकी एयरपोर्ट-भरहुत सतना (मध्य प्रदेश) भी है। चित्रकूट की देवांगना घाटी में भी हवाई पट्टी का निर्माण पूर्णता की ओर है। इसके बनने से तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को बहुत सुविधा होगी।

रेल मार्ग

चित्रकूट से 8 किलोमीटर की दूर कर्वी निकटतम रेलवे स्टेशन है। यहां से विविध शहरों के लिए ट्रेनें उपलब्ध हैं। 

चित्रकूट की यात्रा पर आने का सबसे  उपयुक्त  समय  फरवरी या मार्च होता है। यहां ठहरने के लिए कई धर्मशालाएं व उत्तर प्रदेश सरकार का राही गेस्ट हाउस भी है। अवसर मिले तो एक बार इस पुण्य क्षेत्र की यात्रा अवश्य करनी चाहिए क्योंकि यह तीर्थक्षेत्र ऐसा है जहां आकर प्रभु के होने की अनुभूति होती है।

 चित्रकूट की इस कहानी के बाद अब देखिए चित्रकूट पर वह वीडियो जो इस यूट्यूबर ने 2016 की अपनी चित्रकूट यात्रा में बनाया था। इसमें वहां का एक गाइड चित्रकूट के बारे में बता रहा है।

इस आलेख का वीडियो देखने के लिए कृपया यहां क्लिक कीजिए


Thursday, June 24, 2021

गोकर्ण ने कैसे दिलायी भाई धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्ति


 प्राचीन काल की कथा है। तुंगभद्रा नदी के किनारे अनुपम नामक एक नगर में आत्मदेव  नामक  का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम था धुन्धुली । आत्मदेव को सबसे बड़ा दुख यह था कि उनके कोई संतान नहीं थी।इससे वे सदा चिंतित रहते थे। एक दिन दु:खी होकर वे वन में चले गये । वहां उन्हें एक योगनिष्ठ संन्यासी के दर्शन हुए । आत्मदेव ने संन्यासी के सामने अपना दुख व्यक्त किया कि हे महात्मन मैं बहुत दुखी हूं, मेरे कोई संतान नहीं है।  संन्यासी ने ध्यान लगा कर देखा और फिर बताया कि भाग्य की प्रबलता तथा विधाता के लिखे लेख के चलते सात जन्मों तक आपको  संतान की प्राप्ति का कोई योग नहीं है। सन्तान न होने का संकेत करते हुए संन्यासी ने आत्मदेव से कहा कि वे सन्तान मोह छोड़ दें लेकिन आत्मदेव ने संन्यासी से आग्रह किया कि वे कोई ऐसा उपाय बतायें जिससे उन्हें संतान की प्राप्ति हो सके।  उसके आग्रह को देखते हुए संन्यासी ने उसे एक फल प्रदान किया और कहा कि इसे अपनी पत्नी को वह खिला दे और उसे नियम पूर्वक रहने को कहे तो निश्चित रूप से सन्तान की प्राप्ति होगी । आत्मदेव ने घर लौटकर वह फल पत्नी धुन्धुली को दिया और संन्यासी की बात बताते हुए उससे कहा की वह श्रद्धापूर्वक फल खा ले तो अवश्य संतान की प्राप्ति होगी। धुन्धुली ने पति से फल ले तो लिया लेकिन दुविधा में पड़ गयी कि इसे खाये या ना खाये।उसके मन में अनेक कुतर्क उपजने लगे और अंतत: उस फल को नहीं खाया और  अपनी बहिन की सलाह से चुपचाप उस फल को गाय को खिला दिया । धुन्धुली की बहिन उस समय गर्भवती थी। उसने धुन्धुली के साथ योजना बनायी उसके अनुसार जब उसके पुत्र हुआ तो उसने अपने पुत्र को धुन्धुली को दे दिया । आत्मदेव दोनों बहनों की इस योजना से पूरी तरह अनजान थे इसलिए उन्होंने उस पुत्र को अपना ही पुत्र  मान लिया । धुन्धुली ने पुत्र का नाम धुन्धुकारी रखा।

  संन्यासी दिया फल खाने के कारण गौ से भी एक सुन्दर मनुष्याकार बच्चा  हुआ । इससे आत्मदेव अति प्रसन्न हुए और उसने उस गौ से उत्पन्न पुत्र का नाम गोकर्ण रखा। समय व्यतीत होने के साथ-साथ दोनों पुत्र बडे हुए। धुन्धुकारी अति दुष्ट निकला तथा गोकर्ण अत्यन्त ज्ञानी। आत्मदेव धुन्धुकारी के उत्पातों से अत्यन्त दु:खी रहने लगा और एक दिन ज्ञानी गोकर्ण के उपदेश से घर छोड़ कर वन में चला गया । वहां भगवद् - आराधना से उसने भगवान् को प्राप्त किया । 

इधर धुन्धुकारी के उत्पात जारी रहे। वह नगर के बच्चों को नाव में बैठाता और नदी के बीच में ले जाकर सभी को तीव्र गति से बहती नदी की धारा में डुबो कर मार देता था। जब वे बचाने के लिए गिड़गिड़ाते तो धुंधकारी खूब खुश होता। नगर के लोग उससे परेशान थे पर करते तो क्या करते। धुंधकारी इतना क्रूर और दुष्ट था कि सभी उसके पास जाने में डरते थे।

 कौन-सा ऐसा दुर्गुण था जो धुंधकारी में नहीं था। गोकर्ण बड़ा होकर विद्वान पंडित और ज्ञानी निकला जबकि धुंधकारी दुष्ट, नशेड़ी और क्रोधी, चोर, व्याभिचारी, अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाला, माता पिता को सताने वाला । उसने माता पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी।

हद तो तब हो गयी जब धुंधकारी ने एक दिन अपने पिता को मार मार कर घर से बहार निकाल दिया। पिता रोने लगा और उसने दुखी होकर कहा कि अच्छा होता अगर मेरी पत्नी बांझ ही रहती। जब पिता यह सोच रहा होता है तभी वहां गोकर्ण आ जाता है। वह पिताजी को वैराग्य का उपदेश देता है और कहता है कि आप सभी छोड़ कर प्रभु की शरण में वन चले जाएं और भागवत भजन करें। भगवत भजन ही सबसे बड़ा धर्म है। गो से उत्पन्न पुत्र गोकर्ण की बात मान कर आत्मदेव वन चले जाते हैं। बाद में उसकी पत्नी धुन्धली को धुंधकारी सताने लगता है तो वह कुएं में कूद कर आत्महत्या कर लेती है।

  तब धुंधकारी पांच वेश्याओं के साथ रहने लगता है। वेश्याएं उसे अपनी इच्छानुसार चलाती थीं। धुंधकारी उन वेश्याओं के लिए ही धन जुटाने लगा। वह उनके लिए डाका डालता और चोरी करता था। बाद में वे वेश्याएं सोचने लगती हैं कि यदि एक दिन यह पकड़ा गया तो राजा इसके साथ हमें भी दंड देगा। यह सोच कर वह वेश्याएं सोते हुए धुंधकारी को रस्सियों से उसका गला दबाने का प्रयास करती हैं। जब वह गला दबाने से भी नहीं मरता है तो वे सभी मिल कर उसे दहकते अंगारों में डाल देती हैं। वहां वह तड़फ-तड़फ कर मर जाता है। बाद में उसे गड्डा खोद कर गाड़ दिया जाता है।

मरने के बाद धुंधकारी भयंकर दुख देने, झेलने और अपने कुकर्मों के कारण एक प्रेत बन जाता है। प्रेत बनने के बाद भूख और प्यास से वह व्याकुल हो जाता है। रह रह कर वह चिल्लाता भी रहता है क्योंकि उसे अंगारों से जलाया गया था इसीलिए उसकी अनुभूति उसे अभी भी सताती रहती है। उसे लगता है कि अभी भी उसका शरीर जल रहा है।

एक दिन उसका भाई गोकर्ण उसके गांव में कथा करने आता है। गोकर्ण सबसे नजर बचाते हुए अपने पुरखों के मकान में सोने चले जाते हैं। अपने ही घर में अपने भाई को सोया हुआ देख कर धुंधकारी खुश हो जाता है और आवाज लगाता है।

गोकर्ण यह आवाज सुनकर पूछता है कि तुम कौन हो?

धुंधकारी कहता है, मैं तुम्हारा भाई हूं, मेरे कुकर्मो की गिनती नहीं की जा सकती, इसी से में प्रेत-योनि में पड़ा ये दुर्दशा भोग रहा हूं, भाई। तुम दया करके मुझे इस योनि से मुक्ति दिलाओ।

गोकर्ण ने कहा कि मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है मैंने तुम्हारे लिए विधिपूर्वक गयाजी में श्राद्ध किया फिर भी तुम प्रेतयोनि से मुक्त कैसे नहीं हुए, मैं कुछ और उपाय करता हूं। कई उपाय करने के बाद भी जब कुछ नहीं हुआ तो अंत में वह सूर्यदेव से पूछते हैं तो सूर्यदेव ने बताया कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने से ही धुंधकारी की मुक्ति हो सकती है। इसलिए तुम सप्ताह पारायण करो।

 तब गोकर्ण व्यास गद्दी पर बैठ कर कथा कहने लगे देश, गांव से बहुत लोग कथा सुनने आने लगे इतनी भीड़ हो गई कि सब आश्चर्य करने लगे तब वह प्रेत भी वहां आ पहुंचा वह इधर-उधर स्थान ढूंढने लगा इतने में उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गांठ के बांस पर पड़ी वह वायु रूप से उसमें जाकर बैठ गया।

जब शाम को कथा को विश्राम दिया गया, तो एक बड़ी विचित्र बात हुई। सबके देखते-देखते उस बांस की एक गांठ तड़-तड़ करती फट गई इसी प्रकार सात दिनो में सातों गांठे फट गईं और बारह स्कंद सुनने से पवित्र होकर धुंधकारी एक दिव्य रूप धारण करके सामने खड़ा हो गया। उसने भाई को प्रणाम किया तभी बैकुण्ठवासी पार्षदों के सहित एक विमान उतरा। सबके देखते ही धुंधकारी विमान पर चढ़ गए।

उन पार्षदों को देख कर उनसे गोकर्ण ने कहा- भगवान के प्रिय पार्षदों यहां हमारे अनेकों शुद्ध हृदय श्रोतागण है उन सबके लिए एक साथ बहुत से विमान क्यों नहीं लाए? यहां सभी ने समान रूप से कथा सुनी है फिर फल में इस प्रकार का भेद क्यों?

भगवान के पार्षदों ने कहा- इस फल भेद का कारण इनमें श्रवण का भेद है श्रवण सबने समानरूप से ही किया किन्तु इसके जैसा मनन नहीं किया। इस प्रेत ने सात दिन तक सुने हुए विषय का स्थिरचित्त से खूब मनन भी किया। यह कह कर वे सब पार्षद बैकुंठ को चले गए।

श्रावण माह में गोकर्ण ने फिर से उसी प्रकार सप्ताह क्रम से कथा कही वहां भक्तों से भरे हुए विमानों के साथ भगवान प्रकट हो गए उस गांव में कुत्ते और चण्डाल पर्यंन्त जितने भी जीव थे सभी दिव्य देह धारण करके विमान पर चढ़ गए भगवान उन सभी को योगिदुर्लभ गोलोक धाम में ले गए।

इस कथा का यह निष्कर्ष है कि-अपने माता-पिता को कष्ट देने वाला, शराब पीने वाला, वेश्यागामी पुरुष प्रेतयोनि प्राप्त कर अनंतकाल तक भटकते रहते हैं। अब न गोकर्ण की तरह कथा सुनाने वाले हैं और न सुनने वाले। धुंधकारी को उसके पापों की सजा तो मिली ही साथ ही उसने प्रेतयोनि में रहकर भी सजा भुगती। बाद में जब उसे पछतावा हुआ तो भागवत कथा सुनकर मन निर्मल हो गया। निर्मल मन होने से उसके सारे संताप जाते रहे।

 यहां अपना एक अनुभव जोड़ना चाहता हूं। हमारे गांव में हमारे एक परिचित थे जो कभी-कभी भागवत सप्ताह करवाते थे। भागवत के व्यास बनते हमारे रामस्वरूप बाबा जी जो काशी से संस्कृत पढ़ कर आये थे और क्षेत्र के सुपरिचित कथा वाचक थे। अब सीधे-सादे ग्रामीणों को भागवत क्या समझ में आती वे आते प्रणाम करते और थोड़ी देर बैठ कर चले जाते थे। थोड़ी संस्कृत जानता था इसलिए मैं रोज भागवत सुनने पहुंचता था और पंडित जी श्लोक के साथ उसका अर्थ बताते थे। वहां जिस तख्त पर व्यास आसन बनाया गया था उसके एक कोने में सात गांठों वाला कच्चा बांस बंधा देख कर मैंने पंडित जी से पूछा तो उन्होंने यही धुंधकारी के मुक्त की कथा सुनायी थी और कहा था कि यह सात गांठ वाला बांस उसी का प्रतीक है। 

  अगर इस कथा पर विचार करें और इसके प्रतीकों को मानव जीवन से जोड़ कर देखें तो तुङ्गभद्रा नदी हमारे भीतर प्रवाहित शुद्ध चैतन्य रूपी नदी इसके तट पर बसा हुआ अनुपम नगर मानों हमारा मनुष्य है । आत्मदेव मनुष्य की जीवात्मा है। अर्थात् मनुष्य स्वयं आत्मदेव है ।

 धुन्धुली हमारी अशुद्ध मन - बुद्धि की परिचायक है। धुन्धुली शब्द से धुंधली अर्थात अस्पष्ट का भान होता है । बुद्धि धुंधली है तो वह अच्चे-बुरे का फर्क नहीं कर सकेगी जैसा धुंधली के सात हुआ।

 आत्मदेव की सन्तान प्राप्ति की इच्छा मनुष्य की गुण- प्राप्ति की इच्छा का प्रतीक है ।


आत्मदेव का वन में जाना मानों मनुष्य का अन्तर्मुखी होना है।वन में मिलने वाला योगनिष्ठ संन्यासी जैसी अपनी अन्तरात्मा है। अन्तर्मुखी होने पर ही अन्तरात्मा से मिलन होता है, जहां से हमें हमारी आवश्यकता के अनुसार यथोचित निर्देश मिलता है ।

 संन्यासी द्वारा दिया हुआ फल अन्तरात्मा द्वारा दिए गए यथार्थ दिशा - निर्देश की ओर संकेत करता है, जिसको धुन्धुली रूपी हमारी अशुद्ध मन - बुद्धि स्वीकार नहीं कर पाती हैं ।

 अशुद्ध मन - बुद्धि की बहिर्मुखी चेतना या वृत्ति को ही धुन्धुली की बहन जानना चाहिए। ऐसी बहिर्मुखी चेतना से ही धुन्धुकारी का जन्म होता है । 

 हमारी अन्तर्मुखी चेतना या वृत्ति ही गौ है । हमारे अन्तरात्मा अर्थात् संन्यासी द्वारा निर्दिष्ट दिशा निर्देश (फल) को बहिर्मुखी व्यापार वाली अशुद्ध मन - बुद्धि (धुन्धुली) तो ग्रहण या स्वीकार नहीं करती परन्तु उसी दिशा - निर्देश को अन्तर्मुखी चेतना(गौ) सहज रूप में ग्रहण भी करती है और उस पर ध्यान भी देती है । यही  गोकर्ण की उत्पत्ति है । गोकर्ण में दो शब्द हैं - गो और कर्ण । गौ का अर्थ है अन्तर्मुखी चेतना और कर्ण का अर्थ है - कान देना या ध्यान देना अथवा सुनना । अन्तरात्मा के दिशा - निर्देश को सुनकर अथवा उस पर ध्यान देकर तदनुसार ज्ञानयुक्त व्यवहार(सत्कर्म) करने के कारण ही गोकर्ण इस कथा में ज्ञानी कहा गया है । ऐसी ज्ञानयुक्त चेतना अर्थात् गोकर्ण से ही निर्देशित होकर मनुष्य सच्चे मार्ग की ओर अग्रसर होकर अपने जीवन के अभीष्ठ लक्ष्य को प्राप्त करता है । इसी तथ्य को कहानी में आत्मदेव का गोकर्ण से उपदेश प्राप्त करके वन में जाना तथा वहां भगवत् आराधना द्वारा भगवान् को प्राप्त करना कहा गया है ।

 प्रेत योनि को प्राप्त धुन्धुकारी भागवत कथा श्रवण के लिए सात गांठों वाले एक बांस में प्रवेश कर गया । बांस की सात गांठें हमारी पांचों इन्द्रियों, छठे मन तथा सातवीं बुद्धि पर लगी हुई अज्ञान की, अशुद्धि की गांठे हैं। भागवत के श्रवण - मनन से पूर्व धुन्धुकारी पांचों इन्द्रियों, छठे मन तथा सातवीं बुद्धि नामक सातों स्तरों पर अशुद्धि तथा अज्ञान से युक्त था। यही उसका सात गांठों वाले बांस में बैठना है। भागवत के श्रवण - मनन के पश्चात् इन सातों स्तरों पर वह अशुद्धि, अज्ञान से मुक्त हो गया - यही बांस की सातों गांठों का फटना है ।

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