Monday, September 20, 2021

भाग्य पर किसी का जोर नहीं चलता

                                कुछ भूल गया कुछ याद रहा

                    राजेश त्रिपाठी

                     (भाग-2)

पंडित मुखराम शर्मा के छोटे परिवार में तब एक और खुशी जुड़ गयी जब मंगल प्रसाद तिवारी के छोटे भाई का जन्म हुआ। आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट करता चलूं, लोगों को सदोह हो सकता है कि शर्मा तिवारी या त्रिपाठी कैसे हो गये। शर्मा ब्राह्मणों की आम उपाधि है। कोई भी ब्राह्मण अपने को शर्मा लिख सकता है साथ ही वह अपनी कुल उपाधि दुबे, शुक्ल, तिवारी, त्रिपाठी लिख सकता है। तिवारी, त्रिपाठी का अंतर भी समझते चलें। गांव में तिवारी कहानेवाले शिक्षित हो जाते हैं, शहर आते हैं तो वे स्वयं को त्रिपाठी लिखने लगते हैं। इस तरह की उपाधि लेखन में अक्षर-भेद भले ही हों पर यह ब्राह्मणों की आम उपाधि से पूरी तरह ओतप्रोत हैं। आपने संकल्प आदि में अवश्य सुना होगा अमुक शर्माअहम

   आत्मकथा के मूल कथ्य में वापस लौटते हैं। पंडित मुखराम शर्मा जी का परिवार सुख-शांति से चल रहा था। वक्त का पहिया तेजी से चलता जा रहा था। मंगलप्रसाद, उनकी बहन रानी   और छोटा भाई बचपन से किशोरावस्था और फिर युवावस्था में पहुंच गये। पड्त मुखराम शर्मा ने अपने जीते-जी अपनी बेटी के हाथ पीले करने का सपना देखा था। उसके लिए उन्होंने योग्य जीवनसाथी की तलाश भी शुरू कर दी। उनकी तलाश जनपद बांदा के करीब के गांव बिलबई में पूरी हुई। वहां के मुखिया शिवदर्शन त्रिपाठी को उन्होंने बेटी रानी के लिए उपयुक्त समझा। बिना किसी देरी किये उन्होंने रिश्ता भी पक्का कर दिया।

  उधर मुखराम शर्मा जी के छोटे बेटे ने संस्कृत पढ़ने की इच्छा जतायी। आसपास कहीं संस्कृत विद्यालय नहीं था। पता किया गया कि श्रेष्ठ संस्कृत विद्यालय कहां है तो पता चला कि चित्रकूट में परिक्रमा पथ पर प्रसिद्ध पीलीकोठी संस्कृत विद्यालय है। छोटे बेटे की इच्छा पूरी करने के लिए अनिच्छा से ही सही उनको चित्रकूट के पीलीकोठी संस्कृत विद्यालय में प्रवेश दिलवा दिया। अनिच्छा से इसलिए कि वे उतनी दूर अपने बेटे को अकेले नहीं भेजना चाहते थे।

    इधर मुखराम जी के बड़े बेटे मंगल प्रसाद उनके साथ कृषि कार्य संभालने में मदद करते रहे। मुखराम शर्मा जी को एक ही चिंता थी कि बेटी का रिश्ता तो कर दिया अब उसके विवाह की भी तो तैयारी करनी होगी। जितना कुछ हो सका वे जुटा भी चुके और सोच रहे थे कि जितना जल्द हो कोई शुभ मुहूर्त देख कर बेटी का विवाह कर देंगे।

कहते हैं ना कि व्यक्ति के सोचे कुछ नहीं होता वही होता है जो भाग्य में लिखा होता है। मुखराम शर्मा जी अचानक बीमार हुए और वह बीमारी ही उनके जीवन का अंत बनी। मंगल प्रसाद तिवारी पर तो जैसे दुख का पहाड़ टूट पड़ा। सच कहते हैं कि भाग्य पर किसी का जोर नहीं चलता। जिन्हें स्वयं को ही एक अभिभावक की आवश्यकता थी उसे ही भाग्य ने अभिभावक हीन कर दिया। अब वह अपने से छोटे भाई और बहन के अभिभावक बन गये थे।छोटा भाई भी पिता के निधन का समाचार सुन चित्रकूट से भागा चला आया। पिता का श्राद्ध कार्य आदि संपन्न होने के बाद जब छोटा भाई चित्रकूट लौटने लगा तो मंगल प्रसाद ने उसे रोका।

 उन्होंने छोटे भाई से कहा-अब तो पिता जी भी नहीं रहे। परिवार का सारा भार मुझ पर आ गया अगर सही समझो तो रुक जाओ।

भाई ने कहा- भैया रुक जाता पर मेरी शिक्षा का क्या होगा। मुझे पढ़ लेने दीजिए ना।

 मंगल प्रसाद उसके बाद कुछ भी नहीं बोल सके। छोटे भाई को वे दुखी नहीं करना चाहते थे। वे चाहते थे कि उनको पढ़ने का सुअवसर नहीं मिला कम से कम भाई तो पढ़ ले।

 छोटा भाई चित्रकूट लौट गया। मंगल प्रसाद बिलबई गये और जिस परिवार में बहन का रिश्ता पक्का हुआ था उन्हें भी अपने पिता जी की मृत्यु की खबर सुनायी। इसके साथ ही यह भी अनुरोध किया कि जो संबंध पिता जी पक्का कर गये हैं वह यथावत रहेगा और एक वर्ष बाद विवाह संपन्न होगा। वर पक्ष ने भी इसके लिए हामी भर ली।

वक्त बीतते देर नहीं लगती। धीरे-धीरे साल बीता और मंगल प्रसाद ने अपनी बहन रानी का विवाह बिलबई गांव के मुखिया शिवदर्शन त्रिपाठी से कर दिया। विवाह में भाग लेने मंगल प्रसाद के छोटे भाई भी आये थे जो वापस चित्रकूट लौट गये।

इधर मंगल प्रसाद के जीजा शिवदर्शन त्रिपाठी ने जब यह देखा कि वह गांव में अकेले रह गये हैं तो उनसे अपने साथ कहने को कहा। यह समझाया कि कुछ दिन हमारे साथ रह कर फिर लौट आना। मंगल प्रसाद जीजा जी को बहुत मानते थे। वे उनकी बात नहीं टाल सके। जुगरेहली के घर में ताला जड़ कर वे भी जीजा जी के साथ बिलबई चले गये। (क्रमश:)

Thursday, September 16, 2021

 कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

बीमारी लील गयी आधा गांव
सोचता हूं कहां से शुरू करूं यह दास्तां। इस लंबे सिलसिले की शुरुआत का सिरा खोज नहीं पा रहा। मैंने ऊपर लिख भी दिया है कि कुछ याद रहा, कुल भूल गया। चलिए आपको सौ साल पीछे ले चलते हैं।कहानी का पहला सिरा गांव जुगरेहली से जुड़ता है। बांदा जिले के बबेरू प्रखंड का यह छोटा-सा गांव है इसका नाम जुगरेहली कैसे पड़ा किसी को पता नहीं। मैं अपने मन में यही विचार लिये हुए हूं कि शायद यह गांव बहुत पुराना होगा यानी युगों से होगा। युगों से जो है वही जुगरेहली। बबेरू प्रखंड से लगभग आठ किलोमीटर और जनपद बांदा से बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गांव में बहुतायत कुर्मी समाज की है यादव भी हैं। पहले कुर्मी अपने को कूर्म क्षत्री लिखते थे। अब उनमें से कुछ लोग पटेल लिखने लगे हैं। जिले में कुर्मियों के बारह गांव हैं। हम बचपन से सुनते आये हैं कि इन बारह गांवों के कुर्मी हमारे गांव को श्रेष्ठ मानते रहे और वहां अपनी बेटी ब्याहने  में गर्व महसूस करते थे।

Tuesday, September 14, 2021

मंदिर जहां चोरी करने से होती है मनोकामना पूरी


अगर आपसे कहा जाये कि अपने देश में एक ऐसा भी मंदिर है जहां मनोकमना पूरी करने के लिए भक्तों को वहां चोरी करनी पड़ती है तो आपको विश्वास नहीं होगा। आप उलटे प्रश्न कर सकते हैं कि चोरी वह भी पूजा की पवित्र जगह मंदिर में यह कैसी बात हुई, आप माने या ना मानें अपने देश में ऐसा एक मंदिर है जहां भक्तों को अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए चोरी करनी पड़ती है। इन्हीं में से एक अनोखा मंदिर है सिद्धपीठ चूड़ामणि देवी मंदिर। यह मंदिर उत्तराखंड के रुड़की से 19 किलोमीटर दूर भगवानपुर के चुडिय़ाला गांव में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 1805 में लंढौरा रियासत के राजा ने करवाया था। एक बार राजा शिकार करने जंगल में आए हुए थे कि घूमते-घूमते उन्हें माता की पिंडी के दर्शन हुए। राजा के कोई पुत्र नहीं था। इसलिए राजा ने उसी समय माता से पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी। राजा की इच्छा पूरी होने पर उन्होंने यहां मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर को 51वीं  शक्तिपीठ माना जाता है। कहते हैं यहां माता पार्वती की चूड़ामणि गिरी थी। यह कथा माता सती के पिता दक्ष के यज्ञ से जुड़ी है। जब दक्ष ने अपने यहां यज्ञ का आयोजन किया तो सारे देवताओं को आमंत्रित करने के साथ ही अपने सारे मित्रों, संबंधियों को भी बुलाया। लेकिन उन्होंने अपनी पुत्री सती और जामाता शंकर को आमंत्रित नहीं किया। सती को जब इसका पता चला कि उनके पिता यज्ञ कर रहे हैं तो उन्होंने शंकर जी से कहा कि वे भी पिता के यज्ञ में जाना चाहती हैं। इस पर शंकर जी समझाया कि सती तुम्हारे पिता ने मुझे आमंत्रित नहीं किया क्ओंकि वे मुजसे क्रुद्ध हैं लेकिन उन्होंने तुम्हें भी आमंत्रित नहीं किया। बिना आमंत्रण के ऐसे आयोजनों में जाना सर्वदा अपमान या अनर्थ का कारण बनता है। लाख समझाने पर भी जब सती नहीं मानी तो शंकर जी ने उन्हें अनुमति दे दी लेकिन अपने गणों को भी उनके साथ कर दिया। सती जब पिता के घर पहुंचीं तो वहां कोई भी उनसे अच्छी तरह से नहीं मिली सिर्फ माता को छोड़ कर। बहनें मिलीं भी तो व्यंग्य से मुसकराती हुईं जैसे मन ही मन कह रही हों लो आ गयी बिना बुलायी मेहमान। सती ने यज्ञ मंडप में जाकर देखा हर देवता के लिए आसन और उनका भाग दिया गया था पर सती के पति शंकर को उनका भाग नहीं दिया गया था। सती ने अपने पति का इस तरह अपमान करने का कारण पिता दक्ष से पूचा तो उन्होंने उन्हें भी अपमानजनक शब्द कहे। इससे क्रोधित होकर सती ने यज्ञ कुंड में ही कूद कर आत्मदाह कर लिया। उनके साथ गये शिव गणों ने वापस आकर सारी घटना शिव जी को बतायी। इस पर शिवजी बहुत क्रुद्ध हुए और वहां गये जहां दक्ष ने यज्ञ किया था। उन्होंने यज्ञ कुंड से सती का अधजला शव उठाया और गणों को यज्ञ विध्वंस करने और सबको यथोचित दंड देने का आदेश देकर कंधे पर सती का शव लाद कर चारों ओर क्रोध से नाचने लगे। उनके क्रोध से ब्रह्मांड कांप उठा।जब विष्णु ने यह देखा तो उन्होंने सोचा अगर इन्हें रोका ना गया तो ब्रह्मांड संकट में प़ड़ जायेगा। उन्होंने अपना चक्र चला दिया जिससे सती के एक-एक अंग कट कर गिरने लगे। ये अंग जहां-जहां गिरे वे स्थान शक्तिपीठ कहलाते हैं। जिस मंदिर का हम यहां जिक्र कर रहे हैं वहां सती की चूड़ामणि गिरी थी इसीलिए इसका नाम चूड़ामणि पड़ा। लोग इसे 51 वां शक्तिपीठ भी कहते हैं।

जहां से जुड़ी मान्यता है कि यहां चोरी करने पर हर व्यक्ति की मनोकामना पूरी होती है। रुड़की के चुड़ियाला गांव स्थित प्राचीन सिद्धपीठ चूड़ामणि देवी मंदिर में पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले पति-पत्नी माथा टेकने आते हैं।
मान्यता है कि जिन्हें पुत्र की चाह होती है वह जोड़ा यदि मंदिर में आकर माता के चरणों से लोकड़ा  अर्थात लकड़ी का गुड्डा चोरी करके अपने साथ ले जाएं तो बेटा होता है। उसके बाद बेटे के साथ माता-पिता को यहां माथा टेकने आना होता है। कहा जाता है कि पुत्र होने पर भंडारा कराने के साथ ही दंपति को पहले मंदिर से ले जाए गए लोकड़े के साथ ही एक अन्य लोकड़ा भी अपने पुत्र के हाथों से चढ़ावाना पड़ता है। सती माता का चूड़ा रुडकी के इस घनघोर जंगल में गिर गया था, जिसके बाद यहां पर माता की पिंडी स्थापित किये जाने के साथ ही भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। यह प्राचीन सिद्ध पीठ मंदिर बाद में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया। यहां माता के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु दूरदराज से आते हैं।

माता के मंदिर में माता के चरणों में हमेशा एक लोकड़ा रहता है और इसी लोकड़ा को चुरा कर दंपति ले जाते हैं। इसे चोरी करने के बाद ही उन्हें पुत्र रत्न का वरदान माता देती हैं और जब पुत्र हो जाता है तो दंपति पुत्र के साथ वह लोकड़ा लेकर आते हैं और इसके साथ एक और नया लोकड़ा ले आते हैं। इसे माता के चरणों में वापस रख दिया जाता है। उसके बाद दंपति माता के आर्शीवाद से पाए पुत्र के हाथों भंडारा करवाते हैं।

लोकड़ा एक प्रकार का लकड़ी का खिलौना होता है जिसे पुत्र का प्रतीक माना जाता है। माता चूड़ामणि के चरणों में ये लोकड़ा रखा रहता है। जिस दंपति को पुत्र चाहिए होता है वह इसे चुरा कर ले जाते हैं और पुत्र होने के के बाद अषाढ़ माह में अपने पुत्र के साथ मां के मंदिर आते हैं और यहां फिर मां की पूजा अर्चना के बाद एक और लोकड़ा चढ़ाते हैं।

Friday, September 10, 2021

गणेश चतुर्थी को चंद्रदर्शन से क्यों लगता है कलंक?



आपने यह तो अवश्य सुना होगा कि गणेश चतुर्थी अर्थात भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चंद्र दर्शन से कलंक लगता है लेकिन शायद हर किसी को इससे जुड़ी घटना के बारे में पता नहीं होगा। यह तो सभी को पता है कि गणेश जी को मोदक अर्थात लड्डू और मिठाई बहुत पसंद है। अपनी इसी रुचि के चलते किसी के भी निमंत्रण को स्वीकार कर लेते हैं और पेट भर मिठाई खाते हैं।

एक बार की बात है धन के देवता कुबेर ने भगवान शिव और माता पार्वती को भोज पर बुलाया, लेकिन भगवान शिव ने कहा कि मैं कैलाश छोड़कर कहीं नहीं जाता हूं और पार्वती जी ने कहा कि मैं अपने स्वामी को छोड़ कर कहीं नहीं जा सकती। दोनों ने कहा कि आप हमारे स्थान पर गणेश को ले जाओ।

तब कुबेर गणेश जी को अपने साथ भोज पर ले गए। वहां उन्होंने पेट और मन भर कर मिठाई और मोदक खाये। वापस आते समय कुबेर ने उन्हें मिठाई का थाल देकर विदा किया। लौटने समय चन्द्रमा की चांदनी में गणेश जी अपने चूहे पर बैठ कर आ रहे थे, लेकिन ज्यादा खा लेने के कारण बड़ी ही मुश्किल से अपने आप को संभाल पा रहे ।उसी समय अचानक चूहे का पैर किसी पत्थर से लग कर डगमगाने लगा। इससे गणेश जी चूहे के ऊपर से गिर गए और पेट ज्यादा भरा होने के कारण अपने आप को संभाल नहीं सके और मिठाइयां भी यहां-वहां गिर गईं।

यह सब चन्द्र देव ऊपर से देख रहे थे। उन्होंने जैसे ही गणेश जी को गिरते देखा, तो अपनी हंसी रोक नहीं पाए और उनका मजाक उड़ाते हुए बोले कि जब खुद को संभाल नहीं सकते, तो इतना खाते क्यों हो।चन्द्रमा की बात सुन कर गणेश जी को गुस्सा आ गया। उन्होंने सोचा कि घमंड में चूर होकर चन्द्रमा मुझे उठाने के लिए किसी प्रकार की सहायता नहीं कर रहा है और ऊपर से मेरा मजाक उड़ा रहा है। इसलिए, गणेश जी ने चन्द्रमा को श्राप दिया कि जो भी गणेश चतुर्थी के दिन तुमको देखेगा उस पर कलंक लगेगा, वह लोगों के बीच चोर कहलाएगा।

श्राप की बात सुन कर चन्द्रमा घबरा गए और सोचने लगे कि फिर तो मुझे कोई भी नहीं देखेगा। उन्होंने शीघ्र ही गणेश जी से क्षमा मांगी। कुछ देर बाद जब गणेश जी का गुस्सा शांत हुआ, तब उन्होंने कहा कि मैं श्राप तो वापस नहीं ले सकता। लेकिन तुमको एक वरदान देता हूं कि अगर वही व्यक्ति अगली गणेश चतुर्थी को तुमको देखेगा, तो उसके ऊपर से चोर होने का श्राप उतर जाएगा। तब जाकर चन्द्रमा की जान में जान आई।

इसके अलावा एक और कहानी सुनने में आती है कि गणेश जी ने चन्द्रमा को उनका मजाक उड़ाने पर श्राप दिया था कि वह आज के बाद किसी को दिखाई नहीं देंगे। चन्द्रमा के मांफी मांगने पर उन्होंने कहा कि मैं श्राप वापस तो नहीं ले सकता, लेकिन एक वरदान देता हूं कि तुम माह में एक दिन किसी को भी दिखाई नहीं दोगे और माह में एक दिन पूर्ण रूप से आसमान पर दिखाई दोगे। बस तभी से चन्द्रमा पूर्णिमा के दिन पूरे दिखाई देते हैं और अमावस के दिन नजर नहीं आते।

कहते हैं कि यही गणेश चतुर्थी का चांद भगवान श्री कृष्ण ने देख लिया था उन पर भी समयन्तक मणि चुराने का आरोप लगा था । इस बारे में यह कथा है कि गणेश चतुर्थी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने अनजाने में चंद्रमा को देख लिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि इन पर एक व्यक्ति की हत्या का आरोप लगा। भगवान श्री कृष्ण को इस आरोप से मुक्ति पाने के लिए काफी  मुश्किलों का सामना करना पड़ा था।नारद जी से जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने ऊपर लगे झूठे आरोपों का कारण पूछा तब नारद जी ने श्री कृष्ण भगवान से कहा कि यह आरोप भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन चांद को देखने के कारण लगा है। इस चतुर्थी के दिन चांद को देखने से कलंक लगने की वजह नारद जी ने यह बताई की, इस दिन गणेश जी ने चन्द्रमा को शाप दिया था। इस संदर्भ में ऐसी भी कथा है कि चन्द्रमा को अपने रूप का बहुत अभिमान था। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी के गजमुख एवं लबोदर रूप को देख कर चन्द्रमा ने हंस दिया। गणेश जी इससे नाराज हो गये और चन्द्रमा को शाप दिया कि आज से जो भी तुम्हें भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को देखेगा उसे झूठा कलंक लगेगा।गणेश जी के शाप से चन्द्रमा दुखी हो गये और घर में छुप कर बैठ गये। चन्द्रमा की दुःखद स्थिति को देख कर देवताओं ने चन्द्रमा को सलाह दी कि मोदक एवं पकवानों से गणेश जी की पूजा करो। गणेश जी के प्रसन्न होने से शाप से मुक्ति मिलेगी। तब चन्द्रमा ने गणेश जी की पूजाकी और उन्हें प्रसन्न किया। गणेश जी ने कहा कि शाप पूरी तरह समाप्त नहीं होगा ताकि अपनी गलती चन्द्रमा को याद रहे। दुनिया को भी यह ज्ञान मिले की किसी के रूप रंग को देखकर हंसी नहीं उड़ानी चाहिए। इसलिए अब से केवल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन जो भी चन्द्रमा को देखेगा उसे झूठा कलंक लगेगा।

 यदि अनिच्छा से चंद्र-दर्शन हो जाये तो व्यक्ति को भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए ‘ॐ गं गणपतये नम:’ मंत्र का जप करने और गुड़ मिश्रित जल से गणेशजी को स्नान कराने एवं दूर्वा व सिंदूर प्रदान करने से कलंक और विघ्न का निवारण होता है।

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Wednesday, September 8, 2021

क्या दशरथ ने दिया था कैकेयी के पिता को कोई विशेष वचन


 


हम सभी जानते हैं कि युद्धक्षेत्र में राजा दशरथ के प्राण बचाने के बदले में कैकेयी ने उनसे वरदान मांगे थे। उसने कहा था जब जरूरत होगी वह यह वरदान मांग लेगी। जब राम को युवराज बनाने की घोषणा दशरथ ने कर दी और जोर-शोर से तैयारियां प्रारंभ हो गयीं तो कैकेयी की प्रिय दासी मंथरा कैकेयी के कान भरती है कि युवराज तो उसके बेटे भरत कोहोना चाहिए। दरअसल देवताओं के अनुरोध पर सरस्वती मंथरा की मति फेर गयी थी जिससे उसने कैकेयी को ऐसी मंत्रणा दी जो अयोध्या के लिए दुसह दुख का कारण बनी। देवताओं ने यह कार्य सरस्वती ने इसलिए कराया क्योंकि वे राम को अय़ोध्या से बाहर लाना चाहते थे ताकि वे राक्षसों, दुष्टजनों का वध कर सकें जो ऋषि, मुनियों, देवताओं पर संकट ढा रहे थे।

 इससे अलग एक प्रसंग आता है जिसमें कहा जाता है कि राजा दशरथ ने कैकेयी से विवाह के समय उनके पिता को यह वचन दिया था कि उनकी बेटी का पुत्र ही होगा उनके राज्य का उत्तराधिकारी। कहते हैं कि एक बार अयोध्या के राजा दशरथ को कैकेय नरेश अश्वपति ने अपने महल में आमंत्रित किया। उनके स्वागत के लिए सभी महल के द्वार पर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उनकी ख्याति से सभी परिचित थे। सभी उनके दर्शन के लिए उत्सुक थे। उनके स्वागत के लिए रानी कैकेयी स्वयं लगी हुई थीं। जब राजा दशरथ की दृष्टि रानी कैकेयी पर पड़ी, तब वे उनसे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने उनसे विवाह करने की इच्छा प्रकट की। कैकेयी के पिता जानते थे कि राजा दशरथ विवाहित हैं इसलिए वे उनसे अपनी पुत्री का विवाह नहीं करेंगे। लेकिन जब दशरथ बार-बार आग्रह करने लगे तो कैकेयी के पिता राजा अश्वपति ने राजा दशरथ से कहा कि वे अपनी पुत्री कैकेयी का विवाह तभी राजा दशरथ से करेंगे अगर वे यह वचन दें कि रानी कैकेयी के पुत्र को ही वे अयोध्या के राज्य का उत्तराधिकारी बनायेंगे। राजा ने यह वचन दे दिया। कैकेयी से दशरथ का विवाह हो गया। दहेज में कैकेयी की प्रिय दासी मंथरा को भी भेजा गया।

राजा दशरथ की पहली पत्नी कौशल्या का कोई पुत्र नहीं था तो उन्होंने यह वचन ऐसे ही दे दिया। इसके बाद अयोध्या के राजा दशरथ से कैकेयी का विवाह हो गया। विवाह के बाद कैकेयी बी मां ना बन सकी।. इसके बाद राजा दशरथ का विवाह सुमिंत्रा से हुआ किन्तु वे भी माँ नहीं बन सकीं। राजा दशरथ के कोई पुत्र न होने कारण वे बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने अपने गुरु से परामर्श किया तो उन्होंने पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजित करने की सलाह दी। राजा ने वैसा ही किया। यज्ञ की समाप्ति में उन्होंने यज्ञ हेतु बनायी गयी चरु अर्थात खीर अपनी रानियों को खिला दी। जिससे सबसे पहले रानी कौशल्या के पुत्र राम का जन्म हुआनजो राजा दशरथ के बड़े पुत्र कहासाये। इसके बाद रानी कैकेयी के पुत्र भरत हुए और फिर रानी सुमिन्त्रा को दो पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्न हुए। इस तरह राजा दशरथ को चार पुत्रों की प्राप्ति हुई।

रानी कैकेयी राजा दशरथ की सबसे प्रिय पत्नी थीं। राजा दशरथ कैकेयी के सौन्दर्य और साहस के कायल थे। कैकेयी सौन्दर्य की धनी होने के साथ ही युद्ध कौशल में भी निपुण थी। वह राजा दशरथ के साथ युद्ध में भी उनका साथ देने जाती थी। एक बार देवराज इंद्र सम्बरासुर नामक राक्षस से युद्ध कर रहे थे किन्तु वह राक्षस बहुत ही बलशाली था। उसका सामना कोई भी देवता नहीं कर पा रहे था. ऐसे में वे राजा दशरथ के पास सहायता के लिए गए. तब राजा ने उन्हें सम्बरासुर से युद्ध करने के लिए आश्वाशन दिया और वे युद्ध के लिए जाने लगे, तभी रानी कैकेयी भी उनके साथ जाने के लिए इच्छा जतायि। राजा दशरथ रानी कैकेयी को अपने साथ युद्ध में ले गये। युद्ध प्रारंभ हुआ.। युद्ध के दौरान एक बाण राजा दशरथ के सारथी को लग गया, जिससे राजा दशरथ थोड़े से डगमगा गये। तब इनके रथ की कमान रानी कैकेयी ने सम्भाली। वे राजा दशरथ की सारथी बन गयीं। इसी के चलते उनके रथ का एक पहिया गढ्ढे में फंस गया। सम्बरासुर नामक राक्षस लगातार राजा दशरथ पर वार कर रहा था, जिससे राजा दशरथ बहुत अधिक घायल हो गए। यह देख रानी कैकेयी ने रथ से उतर कर जल्दी से रथ के पहिये को गढ्ढे से बाहर निकाला और खुद ही युद्ध करने लगी। वह राक्षस भी उनके पराक्रम को देख कर भयभीत हो गया और वहाँ से भाग गया. इस तरह रानी कैकेयी ने राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की। राजा दशरथ भी रानी कैकेयी से बहुत प्रभावित हुए उन्होंने रानी कैकेयी को अपने दो मनचाहे वरदान मांगने को कहा। रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से कहा – “आपके प्राणों की रक्षा करना तो मेरा कर्तव्य है.किन्तु राजा ने उन्हें फिर भी वरदान मांगने को कहा। रानी ने कहा कि –“अभी मुझे कुछ नहीं चाहिए इन दो वरदानों की आवश्यकता भविष्य में जब कभी पड़ेगी तब मैं मांग लूँगी।तब राजा दशरथ ने उन्हें भविष्य में दो वरदान देने का वादा कर दिया।.

रानी कैकेयी के पिता अश्वपति का स्वाथ्य खराब होने के कारण उन्होंने भरत से मिलने की इच्छा जताई. रानी कैकेयी के भाई युद्धाजीत ने राजा दशरथ से भरत को कैकेय आने के लिए कहा. तब भरत और शत्रुघ्न दोनों ने कैकेय के लिए प्रस्थान किया। राजा दशरथ ने उसी समय राम को अयोध्या का उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लिया।इससे सभी बहुत प्रसन्न हुए। रानी कैकेयी भी इस बात से बहुत खुश हुईं, किन्तु रानी कैकेयी की दासी मंथरा को यह पसंद नहीं आया. उसने रानी कैकेयी को इस बात पर खुश देख कर ईर्ष्या जताई. उसने रानी कैकेयी को भड़काना शुरू कर दिया।

मंथरा ने रानी कैकेयी से कहा कि –“राजा दशरथ अपने वचन से मुकर रहे है उन्होंने तुम्हारे पिता को यह वचन दिया था कि तुम्हारा पुत्र उनका उत्तराधिकारी बनेगा, फिर वे कौशल्या के पुत्र को राजा कैसे बना सकते हैं।. यह सुनकर रानी कैकेयी मंथरा पर बहुत क्रोधित हुई. मंथरा रानी कैकेयी से कहने लगी कि –“ कैकेयी आप बहुत भोली हैं, आप राजा दशरथ का छल नहीं समझ पा रही हैं”. इस तरह मंथरा रानी कैकेयी को भड़काती रही। उसने रानी कैकेयी से राम को वनवास भेजने के लिए कहा. फिर धीरे- धीरे रानी कैकेयी मंथरा की बातों में आने लगी. फिर उन्होंने इस विषय पर मंथरा से सलाह ली कि अब उन्हें क्या करना चाहिए. तब मंथरा ने उन्हें राजा दशरथ द्वारा दिए गए 2 वचनों के बारे में कहा. रानी कैकेयी को सब समझ आ गया कि उन्हें क्या करना है.

रानी कैकेयी ने अन्न जल सब का त्याग कर दिया और कोप भवन में चली गई. राजा दशरथ राम के राज्याभिषेक के लिए बहुत खुश थे सारा महल खुशियाँ मना रहा था. यह ख़ुशी राजा अपनी प्रिय पत्नी कैकेयी से बाँटना चाहते थे और वे इसके लिए कैकेयी के कक्ष में जाते है. वहाँ जाकर कैकेयी की अवस्था देखकर वे उनसे उनकी व्यथा के बारे में पूछते है. कैकेयी उनकी बात का कोई जवाब नहीं देती. तब राजा उन्हें बताते है कि आज उन्होंने राम का राज्याभिषेक करने का फैसला लिया है. फिर भी कैकेयी कुछ नहीं कहती है. राजा द्वारा फिर से पूछे जाने पर कैकेयी उनसे कहती है कि -आप अपने दिए हुए वचनों से कैसे मुकर सकते है? आपने मेरे पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने का वादा मेरे पिता से किया था फिर आप राम को राजा कैसे बना सकते है

यह सुनकर राजा चौंक जाते है, और कैकेयी को बहुत समझाते है किन्तु कैकेयी फिर भी नहीं मानती। राजा दशरथ भी अपने फैसले पर अडिग रहते है तब रानी उनके द्वारा दिए गए दो वरदान मांगने को कहती है. राजा दशरथ वरदान देने का वादा कर चुके होते हैं तो वे इससे पीछे भी नहीं हठ सकते थे. रानी कैकेयी उनसे कहती है कि – “मेरा पहला वर है मेरे पुत्र भरत का राज्याभिषेक, और मेरा दूसरा वर है राम को 14 वर्ष का वनवास”. यह सुनकर मानों राजा के पैरों तले जमीन ही खिसक गई हो. वे इससे बहुत अधिक दुखी होते है।  अंतत: कैकेयी के हठ के चलते दशरथ के प्राण जाते हैं और राम, लक्ष्मण, सीता को वनवास जाना पड़ता है।

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Friday, September 3, 2021

ज्ञानगंज का रहस्यलोक जिससे दुनिया अनजान है




हम आपको साधना की एक ऐसी भूमि के बारे में बताने जा रहे हैं जो अपने आप में एक रहस्यलोक से कम नहीं है। कुछ साधकों, उनके शिष्यों को छोड़ दें तो बाकी दुनिया इससे अनजान है। इसका नाम ज्ञानगंज है जिसे लोग सिद्धाश्रम के रूप में भी जानते हैं। इसे कुछ लोग अद्धात्म का अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय भी कहते हैं। बड़े-बड़े महान साधकों ने यहां तप से अपने शरीर को तपाया और दैवी शक्ति पा ली। वे स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूपों में अपने को ढाल सकते थे। एक वक्त दो जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते थे। 

अर्थात एक जगह रहते हुए अपने शिष्यों को दूसरी जगह भी साक्षात नजर आ सकते थे। भारत के महान संतों की महिमा, उनके आध्यात्मिक चमत्कारों और परमार्थ के कार्यों की बराबरी जगत को में कोई नहीं कर सकता। कितने साधकों, संतों के नाम से विद्यालय, अस्पताल आदि संचालित हो रहे हैं। इन्हें भले ही उनके शिष्यों ने बनवाया हो पर परमार्थ के लिए प्रेरणा तो उन्हें गुरुकृपा से ही प्राप्त हुई।

जिस ज्ञानगंज की हम चर्चा कर रहे हैं वह तिब्बत में कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के पास स्थित है। यह बहुत दुर्गम स्थल है, यहां तक पहुंचना आसान नहीं। गूगल मैप में खोजने तक में यह परिणाम आता है कि ऐसा कोई जगह नहीं मिल सका (साक्षी है वीडियो के साथ दिया गया गूगल मैप सर्च रिजल्ट का फोटो) । इस स्थान के बारे में धार्मिक मान्यता यह भी है कि यहां जो मठ या आश्रम है उसका निर्माण ब्रह्मा जी के आदेश से स्वयं विश्वकर्मा जी किया था। यहां शरीर पूर्ण  कर चुके महान साधकों की उपस्थिति का अनुभव आज भी होता है। ऐसा माना जाता है कि हिमालय पर्वत में सिद्धाश्रम नामक एक आश्रम है जहाँ सिद्ध योगी और साधु रहते हैं। तिब्बत में लोग इसे ही शम्भल की रहस्यमय भूमि के रूप में पूजते हैं। इस जगह को शांग्रीला, संभाला और सिद्धाश्रम भी कहते हैं। हिमालय में जैन, बौद्ध और हिन्दू संतों के कई प्राचीन मठ और गुफाएं हैं। मान्यता है कि गुफाओं में आज भी कई ऐसे तपस्वी हैं, जो हजारों वर्षों से तपस्या कर रहे हैं।

मान्यता है कि इस अलौकिक आश्रम का उल्लेख चारों वेदों के अलावा अनेकों प्राचीन ग्रन्थों जैसे वाल्मीकि रामायण में मिलता है। इसके एक ओर कैलाश मानसरोवर है, दूसरी ओर ब्रह्म सरोवर है और तीसरी ओर विष्णु तीर्थ है। यह भी मान्यता है कि राम, कृष्ण, बुद्ध, शंकराचार्य माँ आनन्दमयीऔर निखिल गुरु देव आदि दैवी विभूतियाँ सिद्धाश्रम में सशरीर विद्यमान हैं। यह भी माना जाता है कि इस ब्रह्मांड में अपने दिव्य कार्यों का निर्वहन करते हुए आध्यात्मिक रूप से सशक्त योगी सिद्धाश्रम के संपर्क में रहते हैं और वे नियमित रूप से यहां आते हैं।

सिद्धाश्रम को आध्यात्मिक चेतना, दिव्यता के केंद्र और महान ऋषियों की वैराग्य भूमि का आधार माना जाता है। सिद्धाश्रम को एक बहुत ही दुर्लभ दिव्य स्थान माना जाता है। लेकिन साधना प्रक्रिया के माध्यम से कठिन साधना और साधना पथ पर चलकर इस दुर्लभ और पवित्र स्थान में प्रवेश करने के लिए दिव्य शक्ति प्राप्त करना संभव होगा।

सिद्धाश्रम प्रबुद्ध लोगों या सिद्धों के लिए समाज है। जो व्यक्ति साधना में उच्च स्तर तक पहुँचता है, वह गुरु के आशीर्वाद से रहस्यमयी सिद्धाश्रम पहुँच सकता है, जो इस स्थान का नियमित स्वामी है।विशुद्धानंद परमहंस जो बाद में विशुद्धानंद सरस्वती के रूप में ख्यात हुए ने सबसे पहले सार्वजनिक रूप से इस स्थान की बात की थी। उन्हें बचपन में कुछ समय के लिए वहाँ ले जाया गया और उन्होंने लंबे समय तक ज्ञानगंज आश्रम में अपनी साधना की।

प्राचीनकाल में कई बड़े ऋषियों ने ज्ञानगंज में तपस्चर्या की और आध्यात्मिक उत्कर्ष की प्राप्ति की। यह भी मान्यता है कि हिमालय के सिद्धाश्रमों में रहने वाले संन्यासियों की उम्र रुक जाती है। ऐसा ही ज्ञानगंज के बारे में भी कहा जाता है। महान संत देवरहा बाबा भी ज्ञानगंज की यात्रा कर चुके थे। उनके बारे में प्रसिद्ध था कि वे जब चाहें स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर में चले जाते थे। सिद्धि की प्राप्ति के लिए अन्य कई महान साधकों ने ज्ञानगंज की यात्रा की है।

यह एक पौराणिक घाटी है। यह कितनी पुरानी है, कितनी बड़ी है--कोई नहीं जानता।यह घाटी अद्भुत छटाओं से भरी पड़ी है। यहाँ अनेक योगाश्रमों, सिद्धाश्रमों और तांत्रिक मठों में हज़ारों की संख्या में निवास करने वाले साधकों, योगियों और तांत्रिकों के निवास हैं। दिव्य अवस्था प्राप्त कुछ योगी ऐसे हैं जो आकाशचारी भी हैं। कुछ विलक्षण साधक ऐसे भी हैं जो महाभारत काल के हैं और वहां रह कर साधना कर रहे हैं। जो संग्रीला घाटी से परिचित हैं, उनका कहना है कि प्रसिद्ध योगी श्यामाचरण लाहिड़ी के महागुरु अवतारी बाबा हैं जिन्होंने भगवान कृष्ण और आदिगुरु शंकराचार्य को भी दीक्षा दी थी। 

काशी के महा महोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज के गुरु स्वामी विशुद्धानंद परमहंस देव सांग्रीला घाटी स्थित ज्ञानगंज मठ से जुड़े हुए थे। वे बाद में स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती के नाम से ख्यात हुए। उन्हें गंध बाबा के नाम से भी जाना जाता था क्योंकि वे अपनी हथेलियां रगड़ते और सुंदर गंध पैदा कर देते थे। इतना ही नहीं वे सूर्य विज्ञानी भी थे। सूर्य की रश्मियों के माध्यम से वे फूलों का रंग बदल दिया करते थे। उनका नाम पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले में हुआ था और उनका मूल नाम भोलानाथ चट्टोपाध्याय था।

ज्ञानगंज में तीन तीन मुख्य केंद्र बताये जाते हैं-ज्ञानगंज मठ, सिद्ध विज्ञान आश्रम और योग सिद्धाश्रम। ज्ञानगंज मठ के आचार्य सदा योग के अनकूल संस्कार संपन्न शिष्यों की खोज में रहते हैं। मिल जाने पर उन्हें मठ में ले जाते हैं और शिक्षा-दीक्षा के बाद विद्या के प्रसार व प्रचार के लिए संसार में पुनः भेज देते हैं। स्वामी विशुद्धानंद परमहंस देव ऐसे ही एक शिष्य थे। उन्हें सूर्यविज्ञान में पारंगत किया गया था। स्वामी नीमानंद परमहंस देव उन्हें ज्ञानगंज मठ लेकर गए थे। 

श्यामानंद परमहंस, भृगुराम परमहंस और दिव्यानंद परमहंस भी ज्ञानगंज मठ के कालजयी आचार्यों में से एक हैं। ज्ञानगंज में शिक्षा-दीक्षा ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए करनी पड़ती है।  पॉल ब्रन्टन ने अपनी पुस्तक "गुप्त भारत की खोज", में इन प्रसंगों की चर्चा की है। इनकी भेंट हुआ था गंध बाबा से भी हुई थी।

गंध बाबा के नाम से प्रसिद्ध, स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती जी  गुलाम भारत में ही हुए थे। पॉल ब्रन्टन ने अपनी पुस्तक "गुप्त भारत की खोज", में इनकी चर्चा की है । इनकी भेंट  गंध बाबा से हुई थी ।

जेम्स हिल्टन के उपन्यास “द लॉस्ट होराइजन”  को पश्चिम में ज्ञानगंज की कहानी पहुंचाने का श्रेय जाता है। 

उपग्रह तकनीक और आधुनिक मानचित्रण तकनीक से जहाँ पूरी दुनिया के किसी भी हिस्से को आसानी से देखा जा सकता है वहीं दुनिया के बहुत कम क्षेत्र ऐसे हैं जो पूरी तरह से छिपे हुए या अनदेखे हैं। इनमें ज्ञानगंज भी एक है। इसका जवाब ज्ञानगंज की प्रकृति में है।ये शहर एक भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक आयाम में एक साथ मौजूद है और इसे केवल प्रार्थना, ध्यान और अंततः ज्ञान के माध्यम से पहुँचा जा सकता है।

1942 में एक ब्रिटिश सेना अधिकारी एल.पी. फरल को स्थानीय संस्कृति और बौद्ध धर्म में उनकी मजबूत रुचि के कारण हिमालय के एक पर्वतीय क्षेत्र के राजा के साथ पिकनिक मनाने के लिए आमंत्रित किया गया था,जहां वह जीवन के बदलते अनुभव से गुजरने वाले थे।पहाड़ियों में रात गुजारने का इरादा करते हुए पिकनिक पार्टी में जब अंधेरा हो गया और जैसे ही ब्रिटिश सेना अधिकारी एल.पी. फरल सो गए तभी फैरेल को एक अलौकिक व्यक्ति द्वारा जगाया गया जिसने उसे पहाड़ पर आगे आने के लिए कहा।आतंकित होकर सेना का अधिकारी अपने डेरे में ही रहा। रात भर फिर से वह आभास उसे दिखाई दिया। 

सुबह में फरल ने उस स्थान पर अपना रास्ता बनाने का फैसला किया जहां अज्ञात आगंतुक ने संकेत दिया था।जब वे वहाँ पहुँचे तो उनकी मुलाकात एक बूढ़े ऋषि से हुई।ऋषि फारेल का नाम जानते थे और एक अजीब रोशनी से चमकते थे।जब ऋषि ने सेना के अधिकारी को छुआ तो फरल ने स्वयं को एक अद्भुत विद्युत तरंग से भरा हुआ महसूस किया। 

संत व्यक्ति ने फरेल को उस स्थान को खाली करने के लिए कहा जहाँ पर दिन में बाद में टेंट लगाया गया था और कहा कि उसी स्थान पर एक युवक पहुँचेगा।इस युवक की एक विशेष नियति थी और टेंट को स्थानांतरित नहीं किया गया तो संकट में पड़ जाओगे। फरल ने भी जैसा कहा गया था वैसा ही किया और पार्टी ने अपने टेंट को स्थानांतरित कर दिया।बाद में उस दिन एक युवक मौके पर पहुंचा, जहां पहले टेंट लगा था। देखते ही देखते सेना अधिकारी ने अपने आसपास की जमीन को बदल लिया। तभी एक प्रकाश ने पास के एक पेड़ को जला दिया और युवक ने अद्भुत चमत्कार किया।उसके आसपास फरल उन लोगों और इमारतों को देख सकता था जहां पहले घास और चट्टानों के अलावा कुछ नहीं था।अनुभव के अंत तक लड़के ने घोषणा की कि वह अपने सांसारिक संबंधों को त्यागने और ज्ञानगंज में प्रवेश करने के लिए तैयार है।फरल की पार्टी के किसी भी व्यक्ति ने उन दृश्यों को नहीं देखा जो उसने और युवक ने स्पष्ट रूप से देखा था। सेना के अधिकारी ने समझा कि उन्होंने केवल शंभला की एक झलक देखी थी, लेकिन यह उनके जीवन के अनुभव को बदलने के लिए पर्याप्त था। 

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Sunday, August 29, 2021

जन्माष्टमी कब है?

 जन्माष्टमी का त्योहार 30 अगस्त को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि 29 अगस्त को रात 11 बजकर 25 मिनट पर शुरू होगी और 31 अगस्त की रात 1 बजकर 59 मिनट पर समाप्त होगी। रोहिणी नक्षत्र 30 अगस्त को सुबह 6 बजकर 39 मिनट पर प्रारंभ होगा, जो कि 31 अगस्त को सुबह 09 बजकर 44 मिनट पर समाप्त होगा। पूजा का समय 30 अगस्त की रात 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। पूजा के शुभ समय की कुल अवधि 45 मिनट की है। 
जन्माष्टमी के दिन न करें ये 6 काम-
1. भगवान ने प्रत्येक इंसान को समान बनाया है इसलिए किसी का भी अमीर-गरीब के रूप में अनादर या अपमान न करें। लोगों से विनम्रता और सहृदयता के साथ व्यवहार करें। आज के दिन दूसरों के साथ भेदभाव करने से जन्माष्टमी का पुण्य नहीं मिलता।
2. शास्त्रों के अनुसार, एकादशी और जन्माष्टमी के दिन चावल या जौ से बना भोजन नहीं खाना चाहिए। चावल को भगवान शिव का रूप भी माना गया है।
3.पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जन्माष्टमी का व्रत करने वाले को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म होने तक यानी रात 12 बजे तक ही व्रत का पालन करना चाहिए। इससे पहले अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए। बीच में व्रत तोड़ने वालों को व्रत का फल नहीं मिलता।
4.व्रत करने वाले को हृदय  और मन से पवित्र होना चाहिए। उनके मन में गंदे विचार नहीं आने चाहिए।
5 भगवान श्रीकृष्ण को गौ अति प्रिय हैं। इस दिन गायों की पूजा और सेवा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
6.मान्यता है कि जिस घर में भगवान की पूजा की जाती हो या कोई व्रत रखता हो उस घर के सदस्यों को जन्माष्टमी के दिन लहसुन और प्याज जैसी तामसिक भोजन नहीं करना चाहिए  इस दिन पूरी तरह से सात्विक आहार की ग्रहण करना चाहिए।
सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे,
तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नम: ॥

श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारे 

हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

हे नाथ नारायण...॥

पितु मात स्वामी, सखा हमारे,

हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

हे नाथ नारायण...॥

॥ श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी...॥

बंदी गृह के, तुम अवतारी

कही जन्मे, कही पले मुरारी

किसी के जाये, किसी के कहाये

है अद्भुद, हर बात तिहारी ॥

है अद्भुद, हर बात तिहारी ॥

गोकुल में चमके, मथुरा के तारे

हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,

हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

पितु मात स्वामी, सखा हमारे,

हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥


अधर पे बंशी, ह्रदय में राधे

बट गए दोनों में, आधे आधे

हे राधा नागर, हे भक्त वत्सल

सदैव भक्तों के, काम साधे ॥

सदैव भक्तों के, काम साधे ॥

वही गए वही, गए वही गए

जहाँ गए पुकारे

हे नाथ नारायण वासुदेवा॥

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,

हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

पितु मात स्वामी सखा हमारे,

हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

गीता में उपदेश सुनाया

धर्म युद्ध को धर्म बताया

कर्म तू कर मत रख फल की इच्छा

यह सन्देश तुम्ही से पाया

अमर है गीता के बोल सारे

हे नाथ नारायण वासुदेवा॥

श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी,

हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

पितु मात स्वामी सखा हमारे,

हे नाथ नारायण वासुदेवा ॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बंधू सखा त्वमेव

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देव देवा

॥ श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी...॥

राधे कृष्णा राधे कृष्णा

राधे राधे कृष्णा कृष्णा॥

राधे कृष्णा राधे कृष्णा

राधे राधे कृष्णा कृष्णा॥

हरी बोल, हरी बोल,

हरी बोल, हरी बोल॥

राधे कृष्णा राधे कृष्णा

राधे राधे कृष्णा कृष्णा

राधे कृष्णा राधे कृष्णा

राधे राधे कृष्णा कृष्णा॥



 



Wednesday, August 25, 2021

भीष्म को क्यों सहना पड़ा 58 दिन सरशैया का कष्ट


यह कथा सर्वविदित है कि महाभारत का युद्ध पांडवों और कौरवों के बीच हुआ था। इस युद्ध में अनेक योद्धा मारे गए थे। इस युद्ध में कौरवों के पक्ष से  सेनापति भीष्म पितामह थे। जब वे युद्ध में अर्जुन के बाणों से घायल हो गये  तो स्वयं अर्जुन ने ही बाणों की शैया बना दी जिस पर भीष्म लेट गये और 58 दिन तक उसी पर लेटे रहे। कहा जाता है कि जब वे घायल हुए सूर्य दक्षिणायन में थे वे सूर्य के उत्तरायण होने तक जीवित रहना चाहते थे। सूर्य का उत्तरायण में होना शुभ माना जाता है। जब भीष्म सरशैया में थे सभी पांडव और कौरव उनसे मिलने गये। कृष्ण भी वहां पहुंचे थे। भीष्म ने उनसे पूछा -केशव मुजे अपने 100 जन्मों की सारी बातें याद हैं मुझे नहीं याद आता कि मैंने कभी कोई पाप किया हो। 

इस पर कृष्ण ने कहा कि-यह पाप आपने 101 वें जन्म में किया था। तब आप एक राजकुमार हुआ करते थे। एक बार आप अपने घोड़े के साथ वन में विचरण करने गये थे। वहां घोड़े को एक वृक्ष के नीचे खड़ा  कर आप विश्राम करने लगे। जब आप उठे तो आपने देखा कि घोड़े की गरदन पर एक आठ पैर वाला जीव बैठा है। आपने उस जीव को धनुष की मदद से नीचे फेंक दिया। वह जहां गिरा वहां कंटीली झाड़ियां थीं। वह पीठ के बल गिरा और उसके शरीर में कांटे चुभ गये। वह पंद्रह दिन इसी तरह तड़पता रहा। जब उसका अंतिम समय आया तो उसने प्रभु से प्रार्थना की-जिस व्यक्ति ने मेरा ऐसा हाल किया उसे भी ऐसी ही कष्टदायक मृत्यु मिले।

कृष्ण ने कहा कि आपके पुण्य कार्यों ने कैरकाटा नामक उस जीव का श्राप तो कट गया लेकिन जब भरी सभा में द्रौपदी की लाज लुटते चुपचाप मौन हो देखते रहे तो उस जीव का श्राप फिर आप पर चढ़ गया. उसके ही चलते आपको 58 दिन तक सरशैया में पड़े रहने का कष्ट सहना पड़ा।

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