Thursday, June 24, 2021

गोकर्ण ने कैसे दिलायी भाई धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्ति


 प्राचीन काल की कथा है। तुंगभद्रा नदी के किनारे अनुपम नामक एक नगर में आत्मदेव  नामक  का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम था धुन्धुली । आत्मदेव को सबसे बड़ा दुख यह था कि उनके कोई संतान नहीं थी।इससे वे सदा चिंतित रहते थे। एक दिन दु:खी होकर वे वन में चले गये । वहां उन्हें एक योगनिष्ठ संन्यासी के दर्शन हुए । आत्मदेव ने संन्यासी के सामने अपना दुख व्यक्त किया कि हे महात्मन मैं बहुत दुखी हूं, मेरे कोई संतान नहीं है।  संन्यासी ने ध्यान लगा कर देखा और फिर बताया कि भाग्य की प्रबलता तथा विधाता के लिखे लेख के चलते सात जन्मों तक आपको  संतान की प्राप्ति का कोई योग नहीं है। सन्तान न होने का संकेत करते हुए संन्यासी ने आत्मदेव से कहा कि वे सन्तान मोह छोड़ दें लेकिन आत्मदेव ने संन्यासी से आग्रह किया कि वे कोई ऐसा उपाय बतायें जिससे उन्हें संतान की प्राप्ति हो सके।  उसके आग्रह को देखते हुए संन्यासी ने उसे एक फल प्रदान किया और कहा कि इसे अपनी पत्नी को वह खिला दे और उसे नियम पूर्वक रहने को कहे तो निश्चित रूप से सन्तान की प्राप्ति होगी । आत्मदेव ने घर लौटकर वह फल पत्नी धुन्धुली को दिया और संन्यासी की बात बताते हुए उससे कहा की वह श्रद्धापूर्वक फल खा ले तो अवश्य संतान की प्राप्ति होगी। धुन्धुली ने पति से फल ले तो लिया लेकिन दुविधा में पड़ गयी कि इसे खाये या ना खाये।उसके मन में अनेक कुतर्क उपजने लगे और अंतत: उस फल को नहीं खाया और  अपनी बहिन की सलाह से चुपचाप उस फल को गाय को खिला दिया । धुन्धुली की बहिन उस समय गर्भवती थी। उसने धुन्धुली के साथ योजना बनायी उसके अनुसार जब उसके पुत्र हुआ तो उसने अपने पुत्र को धुन्धुली को दे दिया । आत्मदेव दोनों बहनों की इस योजना से पूरी तरह अनजान थे इसलिए उन्होंने उस पुत्र को अपना ही पुत्र  मान लिया । धुन्धुली ने पुत्र का नाम धुन्धुकारी रखा।

  संन्यासी दिया फल खाने के कारण गौ से भी एक सुन्दर मनुष्याकार बच्चा  हुआ । इससे आत्मदेव अति प्रसन्न हुए और उसने उस गौ से उत्पन्न पुत्र का नाम गोकर्ण रखा। समय व्यतीत होने के साथ-साथ दोनों पुत्र बडे हुए। धुन्धुकारी अति दुष्ट निकला तथा गोकर्ण अत्यन्त ज्ञानी। आत्मदेव धुन्धुकारी के उत्पातों से अत्यन्त दु:खी रहने लगा और एक दिन ज्ञानी गोकर्ण के उपदेश से घर छोड़ कर वन में चला गया । वहां भगवद् - आराधना से उसने भगवान् को प्राप्त किया । 

इधर धुन्धुकारी के उत्पात जारी रहे। वह नगर के बच्चों को नाव में बैठाता और नदी के बीच में ले जाकर सभी को तीव्र गति से बहती नदी की धारा में डुबो कर मार देता था। जब वे बचाने के लिए गिड़गिड़ाते तो धुंधकारी खूब खुश होता। नगर के लोग उससे परेशान थे पर करते तो क्या करते। धुंधकारी इतना क्रूर और दुष्ट था कि सभी उसके पास जाने में डरते थे।

 कौन-सा ऐसा दुर्गुण था जो धुंधकारी में नहीं था। गोकर्ण बड़ा होकर विद्वान पंडित और ज्ञानी निकला जबकि धुंधकारी दुष्ट, नशेड़ी और क्रोधी, चोर, व्याभिचारी, अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाला, माता पिता को सताने वाला । उसने माता पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी।

हद तो तब हो गयी जब धुंधकारी ने एक दिन अपने पिता को मार मार कर घर से बहार निकाल दिया। पिता रोने लगा और उसने दुखी होकर कहा कि अच्छा होता अगर मेरी पत्नी बांझ ही रहती। जब पिता यह सोच रहा होता है तभी वहां गोकर्ण आ जाता है। वह पिताजी को वैराग्य का उपदेश देता है और कहता है कि आप सभी छोड़ कर प्रभु की शरण में वन चले जाएं और भागवत भजन करें। भगवत भजन ही सबसे बड़ा धर्म है। गो से उत्पन्न पुत्र गोकर्ण की बात मान कर आत्मदेव वन चले जाते हैं। बाद में उसकी पत्नी धुन्धली को धुंधकारी सताने लगता है तो वह कुएं में कूद कर आत्महत्या कर लेती है।

  तब धुंधकारी पांच वेश्याओं के साथ रहने लगता है। वेश्याएं उसे अपनी इच्छानुसार चलाती थीं। धुंधकारी उन वेश्याओं के लिए ही धन जुटाने लगा। वह उनके लिए डाका डालता और चोरी करता था। बाद में वे वेश्याएं सोचने लगती हैं कि यदि एक दिन यह पकड़ा गया तो राजा इसके साथ हमें भी दंड देगा। यह सोच कर वह वेश्याएं सोते हुए धुंधकारी को रस्सियों से उसका गला दबाने का प्रयास करती हैं। जब वह गला दबाने से भी नहीं मरता है तो वे सभी मिल कर उसे दहकते अंगारों में डाल देती हैं। वहां वह तड़फ-तड़फ कर मर जाता है। बाद में उसे गड्डा खोद कर गाड़ दिया जाता है।

मरने के बाद धुंधकारी भयंकर दुख देने, झेलने और अपने कुकर्मों के कारण एक प्रेत बन जाता है। प्रेत बनने के बाद भूख और प्यास से वह व्याकुल हो जाता है। रह रह कर वह चिल्लाता भी रहता है क्योंकि उसे अंगारों से जलाया गया था इसीलिए उसकी अनुभूति उसे अभी भी सताती रहती है। उसे लगता है कि अभी भी उसका शरीर जल रहा है।

एक दिन उसका भाई गोकर्ण उसके गांव में कथा करने आता है। गोकर्ण सबसे नजर बचाते हुए अपने पुरखों के मकान में सोने चले जाते हैं। अपने ही घर में अपने भाई को सोया हुआ देख कर धुंधकारी खुश हो जाता है और आवाज लगाता है।

गोकर्ण यह आवाज सुनकर पूछता है कि तुम कौन हो?

धुंधकारी कहता है, मैं तुम्हारा भाई हूं, मेरे कुकर्मो की गिनती नहीं की जा सकती, इसी से में प्रेत-योनि में पड़ा ये दुर्दशा भोग रहा हूं, भाई। तुम दया करके मुझे इस योनि से मुक्ति दिलाओ।

गोकर्ण ने कहा कि मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है मैंने तुम्हारे लिए विधिपूर्वक गयाजी में श्राद्ध किया फिर भी तुम प्रेतयोनि से मुक्त कैसे नहीं हुए, मैं कुछ और उपाय करता हूं। कई उपाय करने के बाद भी जब कुछ नहीं हुआ तो अंत में वह सूर्यदेव से पूछते हैं तो सूर्यदेव ने बताया कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने से ही धुंधकारी की मुक्ति हो सकती है। इसलिए तुम सप्ताह पारायण करो।

 तब गोकर्ण व्यास गद्दी पर बैठ कर कथा कहने लगे देश, गांव से बहुत लोग कथा सुनने आने लगे इतनी भीड़ हो गई कि सब आश्चर्य करने लगे तब वह प्रेत भी वहां आ पहुंचा वह इधर-उधर स्थान ढूंढने लगा इतने में उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गांठ के बांस पर पड़ी वह वायु रूप से उसमें जाकर बैठ गया।

जब शाम को कथा को विश्राम दिया गया, तो एक बड़ी विचित्र बात हुई। सबके देखते-देखते उस बांस की एक गांठ तड़-तड़ करती फट गई इसी प्रकार सात दिनो में सातों गांठे फट गईं और बारह स्कंद सुनने से पवित्र होकर धुंधकारी एक दिव्य रूप धारण करके सामने खड़ा हो गया। उसने भाई को प्रणाम किया तभी बैकुण्ठवासी पार्षदों के सहित एक विमान उतरा। सबके देखते ही धुंधकारी विमान पर चढ़ गए।

उन पार्षदों को देख कर उनसे गोकर्ण ने कहा- भगवान के प्रिय पार्षदों यहां हमारे अनेकों शुद्ध हृदय श्रोतागण है उन सबके लिए एक साथ बहुत से विमान क्यों नहीं लाए? यहां सभी ने समान रूप से कथा सुनी है फिर फल में इस प्रकार का भेद क्यों?

भगवान के पार्षदों ने कहा- इस फल भेद का कारण इनमें श्रवण का भेद है श्रवण सबने समानरूप से ही किया किन्तु इसके जैसा मनन नहीं किया। इस प्रेत ने सात दिन तक सुने हुए विषय का स्थिरचित्त से खूब मनन भी किया। यह कह कर वे सब पार्षद बैकुंठ को चले गए।

श्रावण माह में गोकर्ण ने फिर से उसी प्रकार सप्ताह क्रम से कथा कही वहां भक्तों से भरे हुए विमानों के साथ भगवान प्रकट हो गए उस गांव में कुत्ते और चण्डाल पर्यंन्त जितने भी जीव थे सभी दिव्य देह धारण करके विमान पर चढ़ गए भगवान उन सभी को योगिदुर्लभ गोलोक धाम में ले गए।

इस कथा का यह निष्कर्ष है कि-अपने माता-पिता को कष्ट देने वाला, शराब पीने वाला, वेश्यागामी पुरुष प्रेतयोनि प्राप्त कर अनंतकाल तक भटकते रहते हैं। अब न गोकर्ण की तरह कथा सुनाने वाले हैं और न सुनने वाले। धुंधकारी को उसके पापों की सजा तो मिली ही साथ ही उसने प्रेतयोनि में रहकर भी सजा भुगती। बाद में जब उसे पछतावा हुआ तो भागवत कथा सुनकर मन निर्मल हो गया। निर्मल मन होने से उसके सारे संताप जाते रहे।

 यहां अपना एक अनुभव जोड़ना चाहता हूं। हमारे गांव में हमारे एक परिचित थे जो कभी-कभी भागवत सप्ताह करवाते थे। भागवत के व्यास बनते हमारे रामस्वरूप बाबा जी जो काशी से संस्कृत पढ़ कर आये थे और क्षेत्र के सुपरिचित कथा वाचक थे। अब सीधे-सादे ग्रामीणों को भागवत क्या समझ में आती वे आते प्रणाम करते और थोड़ी देर बैठ कर चले जाते थे। थोड़ी संस्कृत जानता था इसलिए मैं रोज भागवत सुनने पहुंचता था और पंडित जी श्लोक के साथ उसका अर्थ बताते थे। वहां जिस तख्त पर व्यास आसन बनाया गया था उसके एक कोने में सात गांठों वाला कच्चा बांस बंधा देख कर मैंने पंडित जी से पूछा तो उन्होंने यही धुंधकारी के मुक्त की कथा सुनायी थी और कहा था कि यह सात गांठ वाला बांस उसी का प्रतीक है। 

  अगर इस कथा पर विचार करें और इसके प्रतीकों को मानव जीवन से जोड़ कर देखें तो तुङ्गभद्रा नदी हमारे भीतर प्रवाहित शुद्ध चैतन्य रूपी नदी इसके तट पर बसा हुआ अनुपम नगर मानों हमारा मनुष्य है । आत्मदेव मनुष्य की जीवात्मा है। अर्थात् मनुष्य स्वयं आत्मदेव है ।

 धुन्धुली हमारी अशुद्ध मन - बुद्धि की परिचायक है। धुन्धुली शब्द से धुंधली अर्थात अस्पष्ट का भान होता है । बुद्धि धुंधली है तो वह अच्चे-बुरे का फर्क नहीं कर सकेगी जैसा धुंधली के सात हुआ।

 आत्मदेव की सन्तान प्राप्ति की इच्छा मनुष्य की गुण- प्राप्ति की इच्छा का प्रतीक है ।


आत्मदेव का वन में जाना मानों मनुष्य का अन्तर्मुखी होना है।वन में मिलने वाला योगनिष्ठ संन्यासी जैसी अपनी अन्तरात्मा है। अन्तर्मुखी होने पर ही अन्तरात्मा से मिलन होता है, जहां से हमें हमारी आवश्यकता के अनुसार यथोचित निर्देश मिलता है ।

 संन्यासी द्वारा दिया हुआ फल अन्तरात्मा द्वारा दिए गए यथार्थ दिशा - निर्देश की ओर संकेत करता है, जिसको धुन्धुली रूपी हमारी अशुद्ध मन - बुद्धि स्वीकार नहीं कर पाती हैं ।

 अशुद्ध मन - बुद्धि की बहिर्मुखी चेतना या वृत्ति को ही धुन्धुली की बहन जानना चाहिए। ऐसी बहिर्मुखी चेतना से ही धुन्धुकारी का जन्म होता है । 

 हमारी अन्तर्मुखी चेतना या वृत्ति ही गौ है । हमारे अन्तरात्मा अर्थात् संन्यासी द्वारा निर्दिष्ट दिशा निर्देश (फल) को बहिर्मुखी व्यापार वाली अशुद्ध मन - बुद्धि (धुन्धुली) तो ग्रहण या स्वीकार नहीं करती परन्तु उसी दिशा - निर्देश को अन्तर्मुखी चेतना(गौ) सहज रूप में ग्रहण भी करती है और उस पर ध्यान भी देती है । यही  गोकर्ण की उत्पत्ति है । गोकर्ण में दो शब्द हैं - गो और कर्ण । गौ का अर्थ है अन्तर्मुखी चेतना और कर्ण का अर्थ है - कान देना या ध्यान देना अथवा सुनना । अन्तरात्मा के दिशा - निर्देश को सुनकर अथवा उस पर ध्यान देकर तदनुसार ज्ञानयुक्त व्यवहार(सत्कर्म) करने के कारण ही गोकर्ण इस कथा में ज्ञानी कहा गया है । ऐसी ज्ञानयुक्त चेतना अर्थात् गोकर्ण से ही निर्देशित होकर मनुष्य सच्चे मार्ग की ओर अग्रसर होकर अपने जीवन के अभीष्ठ लक्ष्य को प्राप्त करता है । इसी तथ्य को कहानी में आत्मदेव का गोकर्ण से उपदेश प्राप्त करके वन में जाना तथा वहां भगवत् आराधना द्वारा भगवान् को प्राप्त करना कहा गया है ।

 प्रेत योनि को प्राप्त धुन्धुकारी भागवत कथा श्रवण के लिए सात गांठों वाले एक बांस में प्रवेश कर गया । बांस की सात गांठें हमारी पांचों इन्द्रियों, छठे मन तथा सातवीं बुद्धि पर लगी हुई अज्ञान की, अशुद्धि की गांठे हैं। भागवत के श्रवण - मनन से पूर्व धुन्धुकारी पांचों इन्द्रियों, छठे मन तथा सातवीं बुद्धि नामक सातों स्तरों पर अशुद्धि तथा अज्ञान से युक्त था। यही उसका सात गांठों वाले बांस में बैठना है। भागवत के श्रवण - मनन के पश्चात् इन सातों स्तरों पर वह अशुद्धि, अज्ञान से मुक्त हो गया - यही बांस की सातों गांठों का फटना है ।


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Saturday, June 19, 2021

‘गणपति बप्पा मोरिया’ के जयकारे में मोरया कौन?

 


महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश में गणेश चतुर्थी को गणेशोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। पूरा महाराष्ट्र और विशेषकर मुंबई महानगर इस दौरान सजधज जाता है और सभी दिशाओं से 'गणपति बप्पा मोरया', 'मंगलमूर्ति मोरया' के जयकारे से गूंज जाता है। क्या कभी आपमें से किसी ने यह सोचा है कि गणपति मोरया में मोरया कौन है। इस कहानी पर आयेंगे पहले गणेशोत्सव के प्रारंभ और इसकी परंपरा पर आते हैं। सर्व प्रथम पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया। सुना जाता है कि पुणे में कस्बा गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति की स्थापना शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई ने की थी। लेकिन इसे जनोत्सव बनाने और लोकप्रिय करने का श्रेय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को जाता है। गणोत्सव को उन्होंने जो स्वरूप दिया उससे गणेश उत्सव राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया। उनके प्रयास से परिवार तक सीमित इस उत्सव को सार्वजनिक महोत्सव का रूप मिला। यह केवल धार्मिक आयोजन तक ही सीमित नहीं रहा, अपितु तिलक ने इसे स्वतंत्रता संग्राम में मदद, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया। उन्होंने उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में गणेशोत्सव का जो सार्वजनिक आयोजन किया था उसने धीरे-धीरे विशाल स्वरूप ले लिया।महाराष्ट्र और मुंबई गणेशोत्सव के दौरान 'गणपति बप्पा मोरया' के जयकारे से गूंज उठता है। इसके बाद जब मूर्तियों का विसर्जन होता है तो उस दौरान शोभयात्रा में जो नारा गूंजता है वह है 'गणपति बप्पा मोरया पुड्च्यावर्षी लौकरिया' ( अर्थात गणपति मोरया अगले वर्ष जल्द आना)। अब जानते हैं कि गणपति बप्पा मोरया के जयकारे में जानिये ‘मोरया’ क्यों जोड़ा जाता है और कौन थे मोरया।

पुणे के पास के चिंचवाड़ा गांव से निकलकर यह जयकारा आज पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गया है। क्या आप जानते हैं की गणपति बप्पा के नाम के साथ मोरया शव्द क्यों लगाया जाता है। इस जयकारे की शुरुआत कैसे और कव हुई।

गणेश महोत्सव के अवसर पर गणपति बप्पा मोरया का  जयकारा क्यों लगाते हैं। यह बात सबको पता नहीं है। गणपति बप्पा के नाम के साथ मोरया शव्द कब और कैसे जुड़ा।मोरया का मतलब भगवान गणपती के नाम के साथ मोरया शब्द कैसे जुड़ा, इसके पीछे एक कहानी है। ये कहानी है भगवान गणपती के अनन्य भक्त मोरया गोसावी की। जिनकी भक्ति  के कारण सदा-सदा के लिए उनका नाम गणपती के साथ जुड़ गया।

 मोरया गोसावी भगवान गणपती के परम भक्त और सच्चे  उपासक थे। संत मोरया का जन्म महाराष्ट्र में पुणे के करीब चिंचवाड़ा नामक गांव में हुआ था। संत मोरया गोसावी रोज सच्चे मन से गणपती बप्पा की पूजा करते थे।अंत में उन्होंने गणेश मंदिर के पास ही समाधि ली थी। भगवान गणपती के सच्चे उपासक होने के कारण मोरया गोसावी का नाम सदा के लिए गणपती बप्पा के नाम के साथ जुड़ गया।कहते हैं की भक्त और भगवान के अटूट संबंध दर्शाने के लिए और उन्हें सम्मान देने के लिए भक्त मोरया का नाम भगवान के नाम से जोड़ दिया गया। कारण जो भी रहा हो लेकिन भक्त मोरया का नाम भगवान के नाम से जुड़ कर सदा के लिए अमर हो गया। भगवान और उनके एक परम भक्त की यह कहानी है,जिसकी भक्ति और आस्था ने उन्हें अमर बना दिया। जिस कारण उनका नाम गणपती के साथ हमेशा-हमेशा के लिए जुड़ गया।

भक्त मोरया और उनसे जुड़े भगवान गणपती की कहानी बहुत ही पुरानी है। जहां भक्‍त की परम भक्ति और अपार आस्था के फलस्वरूप भगवान के साथ हमेशा के लिय जुड़ गया उनके भक्त का नाम। 15 वीं शतावदी में भगवान गणपती के एक परम भक्त हुए जिमका नाम मोरया गोसावी था। उनका जन्म महाराष्ट्र के पुणे शहर से करीब 20 किमी दूर चिंचवाड़ नामक गांव में हुआ था।बचपन से ही वे भगवान गणपती  के परम भक्त थे। हर साल वे गणेश चतुर्थी के उत्सव पर पैदल ही चलकर मोरगांव भगवान गणपती के पूजा के लिए जाते थे। जैसे जैसे उनकी उम्र बढ़ने लगी उनकी भक्ति और विश्वास बढ़ता गया।

जब वे बूढ़े हो गये और बढ़ती उम्र के कारण मोरगांव अपने इष्ट के दर्शन के लिए नहीं जा पाते थे। वे लाचार और निराश रहने लगे। लेकिन भगवान की भक्ति नहीं छोड़ी।वे अपने जीते जी भगवान गणपती के दर्शन करना चाहते थे। कहते हैं की भगवान तो भक्त वात्सल्य होते हैं और वे अपने भक्तों की इच्छा को जरूर पूरा करते हैं।

 गणपती ने अपने भक्त मोरया गोसावी की आस्था और भक्ति से खुश होकर उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए। उन्होंने ने मोरया गोसावी से कहा की जब तुम सुबह नदी में स्नान कर रहे होगे उसी बक्त मैं तुम्हें किसी न किसी रूप में दर्शन दूंगा। अगले दिन जब मोरया गोसावी पास की नदी में स्नान कर रहे थे। तब जैसे ही वे स्नान के लिए कुंड में डुबकी लगाई और बाहर निकने तो उनके हाथ में भगवान गणेश की प्रतिमा थी।

भक्त मोरया गोसावी को रात के सपने की बात समझते देर नहीं लगी। उन्होंने अपने इष्ट देव के दर्शन पाकर अपने आप को धन्य समझा और उस मूर्ति को पास के मंदिर में रख कर दिन रात पूजा करने लगे।जैसे-जैसे मृत्यु का समय निकट आने लगा उनकी भक्ति प्रकाढ़ होती गयी। लोगों को विश्वास हो गया की वर्तमान में मोरया गोसावी से बड़ा गणपती बप्पा का कोई अन्य भक्त नहीं है।

धीरे-धीरे उनका नाम और प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी। दूर -दूर से लोग मोरया गोसावी से आशीर्वाद लेने और दर्शन के लिए आने लगे। जब लोग उनसे आशीर्वाद लेते तब वे लोगों को आशीर्वाद वचन में मंगल मूर्ति कहते।इस प्रकार जो भी लोग मोरया गोसावी के दर्शन के लिए आते वे गणपती के साथ भक्त मोरया का नाम जोड़ कर जयकारा लगाते। इस प्रकार भक्त मोरया गोसावी का नाम गणपती के नाम से जुड़ गया।

इस प्रकार यह जयकारा पुणे के पास के एक गाँव से निकलकर महाराष्ट्र सहित पूरे भारत में फैल कर प्रसिद्ध हो गया। लोगों की मान्यता है की गणपती बप्पा के नाम के साथ उनके परम भक्त मोरया का नाम लेने से वे जल्दी प्रसन्न होते हैं।

जब मोरया गोसावी की मृत्यु हुई तब उसी मंदिर के पास मोरया गोसावी की समाधि बनाई गई। जब लोग मोरया गोसावी मंदिर में भगवान गणपती के पूजा के लिए लिए जाते हैं तब उनके परम भक्त मोरया गोसावी की समाधि को नमन करना नहीं भूलते। जिस मंदिर में मोरया गोसावी गणपती की मूर्ति को स्थापित कर पूजा करते थे वह आज गोसावी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ हजोरों लोग प्रतिदिन गणपती बप्पा की पूजा करने के लिए आते हैं।

गोसावी मंदिर में साल में दो बार विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। गोसावी मंदिर में भगवान गणपती की अद्भुत मूर्ति विराजमान है। मोरया गोसावी मंदिर में साल में दो बार विशेष उत्सव का आयोजन की जाता है। पहला उत्सव यहाँ भादों के महीने में मनाया जाता है। जिसमें देखने देश भर से लोग पुणे के पास चिंचवाड़ गाँव आते हैं।दूसरा उत्सव माघ के महीने में आयोजित किया जाता है। इस उत्सव दौरान मोरया गोसावी मंदिर से पालकी निकाली जाती है। लोग पालकी के साथ गणपति बप्पा मोरिया के जयकारा के साथ मोरगाँव के गणपती मंदिर तक जाते हैं।

 मोरया गोसावी को गणपतियों का प्रमुख आध्यात्मिक संत माना जाता है और उन्हें गणेश का "सबसे प्रसिद्ध भक्त" बताया गया है।मोरया गोसावी का जीवनकाल 13 वीं से 17 वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है। मोरया गणेश को पूरी तरह समर्पित थे। जब उन्होंने गणेश के मंदिर मोरगाँव का दौरा करना शुरू किया तो कहते हैं कि लोकप्रिय गणेश मंदिर में कुछ लोग उनकी गणेश सेवा में बाधा डालने लगे। इस पर गणेश ने मोरया से कहा कि वह पूजा करने के लिए मोरया के लिए चिंचवाड़ में दिखाई देंगे, इसलिए मोरया मोरगांव से चिंचवाड चले गए, जहां उन्होंने स्वयं मोरया गणेश मंदिर बनवाया। कहते हैं कि मोरया ने अपने बनाये गणेश मंदिर के पास ही जीवित समाधि ले ली थी। मोरया के चिंतामणि नामक एक पुत्र था, जिसे गणेश के जीवित अवतार के रूप में माना जाता है और देव के रूप में संबोधित 

किया जाता है। मोरया गोसावी ने भक्ति कविताओं की भी रचना की।

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Thursday, June 17, 2021

क्या आज भी महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्यारत हैं परशुराम ?

 


 जिनको अमरत्व का वरदान प्राप्त है उनमें परशुराम जी का नाम भी सम्मिलित बताया जाता है। ऐसा माना जाता है कि वे आज भी सूक्ष्म शरीर में महेंद्रगिरि पर्वत पर आज भी तपस्या में लीन हैं। जब बहुत से अत्याचारी राजा तामसी प्रवृत्ति के हो गये तब विष्णु ने अपने अंश से परशुराम रूप में अवतार लिया और अत्याचारी राजाओं का नाश किया। जब राम ने जनकपुर के धनु, यज्ञ् में परशुराम के गुरु शिव जी का धनुष तोड़ दिया और यह संवाद परशुराम को मिला तो वे जनकपरु पहुंचे और गुरु के धनुष को खंडित देख कर बहुत क्रोध किया। राम के लघु भ्राता लक्ष्मण से उनका बड़ा तर्क वितर्क हुआ और अपनी शक्ति का बखान करने के लिए उन्होंने यह उल्लेख किया था कि उन्होंने अत्याचारियों से पृथ्वी को मुक्त किया। पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसका उल्लेख इन शब्दों में किया है-वीर विहीन मही मैं कीन्हीं। विपुल बार महिदेवन दीन्हीं।

परशुराम ने जब देखा कि कुछ राजाओं के अत्याचार बढ़ गया है तब उन्होंने हैहय वंशी राजाओं से कटिन संग्राम किया और विजय पायी। इनमें से ही एक सहस्त्रबाहु अर्जुन, थे जिनके बारे में यह प्रसिद्ध है कि उन्होंने महाप्रतापी रावण तक को कैद कर लिया था। उनसे भी परशुराम ने युद्ध किया और विजय पायी। जब शिव धनुष टूटने पर वे जनकपुर पहुंचे और उनकी लक्ष्मण जी से बहस होने लगी तो उन्हें डरवाने के लिए उन्होंने सहत्रबाहु अर्जुन पर विजय पाने की अपनी बात सुनायी। गोस्वामी तुलसीदास  ने अपने रामचरित मानस में इसका जिक्र इस तरह से किया है-सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥

भगवान परशुराम माता रेणुका और ऋषि जमदग्नि की चौथी संतान थे। शिव के अनन्य भक्त थे। शिव जी से उनको वरदान स्वरूप परशु (फरसा) मिला था। इसी कारण इनका नाम परशुराम पड़ा। धनुष यज्ञ के दौरान जब गुरु शिव का धनुष टूट जाने पर वे क्रोध करते हैं तो राम विनयी मुद्रा में जो कहते हैं उसका उल्लेख तुलसीदास ने रामचरित मानस में इस तरह किया है-राम मात्र लघु नाम हमारा परसु सहित बड़ नाम तोहारा।। देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें।।

माना जाता है कि भगवान परशुराम आज भी धरती पर हैं। इन्हें सात अमर देवताओं में एक माना जाता है।  भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार थे। भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ था। खास बात यह है कि इसी तिथि में भगवान के अन्य अवतार नर नारायण और हयग्रीव का अवतार भी इसी तिथि को हुआ था।

 

पिता की आज्ञा का मान रखने के लिए परशुराम को अपनी ही माता का वध करना पड़ा था। पिता से ही वरदान मांग कर उन्होंने अपनी माता को पुन: जीवित करा लिया। त्रेता युग में भगवान राम ने ही परशुराम को द्वापर युग तक सुदर्शन चक्र संभालने की जिम्मेदारी थी। इसीलिए गुरु संदीपनी के यहां आकर परशुराम ने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र सौंपा था।  परशुराम ने ही द्वापर युग के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारियों में गिने जानेवाले भीष्म और कर्ण को धनुर्विद्या सिखाई। कामधेनु का चमत्कार देखकर सहस्त्रबाहु उस पर मुग्ध हो गया। उसने जमदग्नि से कहा कि वे अपनी गाय उसे दे दें। किंतु जमदग्नि ने कामधेनु गौ देने से साफ मना कर दिया। उनके मना करने पर सहस्त्रबाहु ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले चलें।सहस्त्रबाहु कामधेनु को अपने साथ ले गया। उस समय आश्रम में परशुराम नहीं थे। परशुराम जब आश्रम में आए, तो उनके पिता जमदग्नि ने उन्हें बताया कि किस प्रकार सहस्त्रबाहु अपने सैनिकों के साथ आश्रम में आया  और किस प्रकार वह कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले गया। घटना सुन कर परशुराम क्रुद्ध हो उठे। वे कंधे पर अपना परशु रख कर सहस्त्रबाहु की नगरी महिष्मती की ओर चल पड़े। सहस्त्रबाहु अभी महिष्मती के मार्ग में ही था कि परशुराम उसके पास जा पहुंचे, सहस्त्रबाहु ने जब यह देखा कि परशुराम तीव्र गति से चले आ रहे हैं, तो उसने उनका सामना करने के लिए अपनी सेनाएं खड़ी कर दीं। एक ओर हज़ारों सैनिक थे, दूसरी ओर अकेले परशुराम थे, घनघोर युद्ध होने लगा।

परशुराम ने अकेले ही सहस्त्रबाहु के समस्त सैनिकों को मार डाला। जब सहस्त्रबाहु की संपूर्ण सेना नष्ट हो गई, तो वह स्वंय रण के मैदान में उतरा, वह अपने हज़ार हाथों से हज़ार बाण एक ही साथ परशुराम पर छोड़ने लगा। परशुराम उसके समस्त बाणों को दो हाथों से ही नष्ट करने लगे। जब बाणों का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा, तो सहस्त्रबाहु एक बड़ा वृक्ष उखाड़कर उसे हाथ में लेकर परशुराम की ओर झपटा। परशुराम ने अपने बाणों से वृक्ष को खंड-खंड कर ही दिया, सहस्त्रबाहु के मस्तक को भी काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया। वह रणभूमि में सदा के लिए सो गया।परशुराम सहस्त्रबाहु को मारने के पश्चात कामधेनु को लेकर अपने पिता के पास लौट आये। महर्षि जमदग्नि कामधेनु को पाकर अतीव हर्षित हुए। उन्होंने परशुराम को ह्रदय से लगाया और उन्होंने बहुत-बहुत आशीर्वाद दिया। परशुराम अपने पिता के अनन्य भक्त थे। वे उन्हें परमात्मा मानकर उनका सम्मान किया करते थे। जमदग्नि बहुत बड़े योगी थे। उन्होंने योग द्वारा सिद्धियां प्राप्त की थीं।

 कहा जाता है वही महाबली अमर परशुराम महेंद्रगिरि पर्वत पर आज भी विद्यमान हैं। हर साल यहां बड़ी तादाद में श्रद्धालु आते हैं।  

- महेंद्रगिरि पर्वत उड़ीसा के गजपति जिले के परालखमुंडी में स्थित है।
- यह पर्वत धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह रामायण, महाभारत और पुराणों से जुड़ी हुई है।
- ऐसा माना जाता है कि महेंद्रगिरि पर्वत भगवान परशुराम की तप की जगह थी। और अंतत: वह उसी पर्वत पर तपस्या के लिए चले गए थे। - दरअसल, पौराणिक कथाओं में अश्वत्थामा, हनुमान की तरह परशुराम को भी चिरजीवी बताया गया है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस में भी यह उल्लेख है कि जब धनुष य़ज्ञ के समय राम ने शिव का धनुष तोड़ दिया गया तो परशुराम उन पर भी बहुत  क्रोधित हुए लेकिन बाद में वे बोले-राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥ देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥ जब संदेह मिट गया उसके बाद-कहि जय जय जय रघुकुल केतू। भृगुपति गये वनहिं तप हेतू। संदेह मिटने पर प्रभु राम से क्षमा मांग कर उन्हें प्रणाम कर परशुराम जी तपस्या करने वन को चले जाते हैं। मान्यता है कि तभी से वे महेंद्र गिरि पर्वत पर सूक्ष्म रूप से तपस्या में लीन हैं।

- महेंद्रगिरि पर्वत पर महाभारत काल के कई मंदिर मौजूद हैं, ऐसा कहा जाता है कि ये मंदिर पांडवों ने बनवाए थे।- यहां भीम, कुंती, युधिष्टिर के अलावा दारु ब्रह्म का मंदिर देखने मिलेंगे।  
 महाशिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

 

 

Sunday, June 13, 2021

किसके श्राप के चलते राम ने किया था सीता का त्याग



वनवास से लौटने के बाद श्रीराम अपने छोटे भाई भरत के बार-बार आग्रह करने पर अयोध्या का राजपाट संभाल लिया। श्रीराम के सिंहासनारूढ़ होने से अयोध्या की जनता की प्रसन्नता का ठिकाना ना रहा। लोग चारों ओर मंगल गीत गाने और दीपक से नगर को जगमगाने में लगे थे। लोग आपस में मिठाइयां बांट रहे थे। सारी प्रजा प्रभु श्री राम के राज्य में सारी जनता ख़ुश थी। उनके राज्य में न तो कोई अपराध होता था न ही किसी को किसी चीज़ का अभाव था।

ऐसे ही सबका समय सुख से बीत रहा था। श्रीराम भी अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करते थे और समय-समय पर उनका हाल चाल लेते रहते थे| उन्होंने अपने द्वारपालों से कह रखा था कि ध्यान रखना मेरे द्वार से कोई भी याचक  खाली हाथ न लौटे। इसके साथ ही राज्य की जनता से कह रखा था की जब भी किसी को कोई जरूरत हो वह बिना किसी संकोच के उनसे मिलने आ सकता था।

श्रीराम स्वयं भी कई बार भेष बदल कर अपने राज्य में आम जनता के बीच जाकर उनके दुखों और कष्टों के बारे में जानकारी लेते रहते थे। इसी क्रम में एक दिन जब श्रीराम भेष बदल कर अपने राज्य की जनता के बीच गए तो उन्हें चौराहे पर लोगों की भीड़ दिखी। उत्सुकता वश श्रीराम भी वहाँ जा पहुंचे ताकि पता चल सके की भीड़ के जमा होने के पीछे क्या कारण था| वहाँ पहुँचे। 

उन्होंने देखा की एक धोबी अपनी पत्नी से झगडा कर रहा था।प्रभु श्रीराम भी झगड़े का कारण जानने के लिए वहीं रुक गये। धोबी ने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया था। जबकि धोबी की पत्नी का कोई अपराध नहीं था। लोगों ने जब बीच बचाव करते हुए उसे समझाने की कोशिश की तो उसने यह कह कर सबका मुंह बंद कर दिया की मैं कोई श्रीराम थोड़े ही हूं जिन्होंने रावण के पास वर्षों रही अपनी पत्नी सीता को अपना लिया।मुझे अपना सम्मान ज्यादा प्यारा है मैं पर पुरुष के पास रह कर आई हुई स्त्री को कभी अपना नहीं सकता। यह सुन कर श्रीराम मन ही मन विचलित हो उठे और वहां से सीधा अपने राजमहल में वापस आ गए। रावण के मरने के बाद भी उन्हें रोज रात को सपने में रावण का सर दिखता था जो की श्रीराम पर अट्टहास कर रहा होता था की तुमने मेरे द्वारा हरण की हुई स्त्री को अपना लिया। हालांकि राम को इस बात का पता था की रावण ने सीता का नहीं बल्कि माया सीता का हरण किया था और सीता बिलकुल पवित्र थीं। परन्तु लोक लाज के भय से उन्होंने देवी सीता का त्याग कर दिया था।

आइए अब उस प्रसंग पर चलते हैं जिसमें विस्तार से यह वर्णन है कि पूर्व जन्म में यह धोबी क्या था और उसने सीता से किस बात का बदला लेने के लिए श्रीराम पर लांक्षन लगाया। उस धोबी की ओर से लगाये गये लांक्षन के बाद ही श्रीराम ने गर्भवती पत्नी सीता का त्याग किया था। सीता ने वन में वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में आश्रय लिया और वहीं कुछ काल बाद अपने दो पुत्रों लव कुश को जन्म दिया।

धोबी के पूर्व जन्म की कथा जानने के लिए आइए मिथिला नगरी में प्राचीन काल में हुई एक घटना से जुड़ते हैं। मिथिला नाम की नगरी में महाराज जनक राज्य करते थे। उनका एक नाम सीरध्वज भी था। एक बार उनके राज्य में बरसात के बिना अकाल पड़ गया। राज्य के सारे किसान व्याकुल होकर महाराजा जनक के पास गए। उन्होंने राजा ने अपना कष्ट कह सुनाया। महाराज इस संकट के समाधान के लिए अपने गुरु शतानंद के पास गये। गुरु जी ने राजा को समझाया कि अगर राजा सोने के हल से जमीन जोतेंगे तो वर्षा होगी और अकाल का संकट टल जायेगा।

 गुरु की आज्ञा पाकर जनक जी ने रानी सहित खेत को स्वर्ण के हल से जोता और हल चलाते ही वहां पर वर्षा होने लगी। अचानक एक जगह हल का फाल अटक गया और आगे नहीं चल रहा था। राजा रानी ने उस जगह की मिट्टी उठा कर देखा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। उन्होंने देखा एक घड़े के अंदर एक सुंदर कन्या है। राजा-रानी उसे घर ले आये और प्यार से उसका नाम  सीता रखा। सीता का एक अर्थ हल चलाने से जमीन पर जो रेखा बनती है वह भी होता है। सीता भूमि से उपजीं इसलिए उनका एक नाम भूमिजा भी है। जनक की पुत्री होने के नाते वे जानकी कहलायीं. विदेह पुत्री होने के चलते वैदेही कहलायीं।

परम सुंदरी सीता एक दिन सखियों के साथ उद्यान में खेल रही थीं। वहाँ उन्हें एक तोता पक्षी का जोड़ा दिखाई दिया,जो बहुत सुंदर था। वे दोनों पक्षी एक पर्वत की चोटी पर बैठ कर इस प्रकार बोल रहे थे —-‘पृथ्वी पर श्रीराम नाम से विख्यात एक बड़े सुंदर राजा होंगे। उनकी महारानी, सीता के नाम से विख्यात होंगी। श्रीराम, सीता के साथ ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करेंगे। धन्य हैं वे जानकी देवी और धन्य हैं वे श्री राम।'

तोते को ऐसी बातें करते देख सीता ने यह सोचा कि ये दोनों मेरे ही जीवन की कथा कह रहे हैं, इन्हें पकड़ कर सभी बातें पूछूँ।ऐसा विचार कर उन्होंने अपनी सखियों से कहा-‘यह पक्षियों का जोड़ा सुंदर है तुम लोग चुपके से जाकर इसे पकड़ लाओ।’

सखियाँ उस पर्वत पर गयीं और दोनों सुंदर पक्षियों को पकड़ लायीं।सीता उन पक्षियों से बोलीं—‘तुम दोनों बड़े सुंदर हो; देखो, डरना नहीं। बताओ, तुम कौन हो और कहाँ से आये हो? राम कौन हैं? और सीता कौन हैं? तुम्हें उनकी जानकारी कैसे हुई? सारी बातों को जल्दी जल्दी बताओ। भय न करो।'

सीता के इस प्रकार पूछने पर दोनों पक्षी सब बातें बताने लगे —–‘देवि ! 

वाल्मीकि नाम से विख्यात एक बहुत बड़े महर्षि हैं। हम दोनों उन्हीं के आश्रम में रहते हैं। महर्षि ने रामायण नाम का एक ग्रन्थ बनाया है जो सदा मन को प्रिय जान पड़ता है। उन्होंने शिष्यों को उस रामायण का अध्ययन भी कराया है।  हम लोगों ने उसे पूरा सुना है।

राम और जानकी कौन हैं, इस बात को हम बताते हैं तथा इसकी भी सूचना देते हैं कि जानकी के विषय में क्या क्या बातें होने वाली हैं; तुम ध्यान देकर सुनो।

‘महर्षि ऋष्यश्रंग के द्वारा कराये हुए पुत्रेष्टि-यज्ञ के प्रभाव से भगवान विष्णु राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—ये चार शरीर धारण करके प्रकट होंगे। 

देवांगनाएँ भी उनकी उत्तम कथा का गान करेंगी।श्रीराम महर्षि विश्वामित्र के साथ भाई लक्ष्मण सहित हाथ में धनुष लिए मिथिला पधारेंगे। उस समय वहाँ वे शिव जी के धनुष को तोड़ेंगे और अत्यन्त मनोहर रूप वाली सीता को अपनी पत्नी के रूप में ग्रहण करेंगे। फिरउन्हीं के साथ श्रीराम अपने विशाल राज्य का पालन करेंगे। ये तथा और भी बहुत सी बातें वहाँ हमारे सुनने में आयी हैं। सुंदरी ! हमने तुम्हें सब कुछ बता दिया।अब हम जाना चाहते हैं, हमें छोड़ दो।

पक्षियों की ये अत्यंत मधुर बातें सुनकर सीता ने उन्हें मन में धारण किया और पुनः उन दोनों से पूछा —-‘राम कहाँ होंगे? वे किसके पुत्र हैं और कैसे वे आकर जानकी को ग्रहण करेंगे? मनुष्यावतार में उनका श्री विग्रह कैसा होगा?

उनके प्रश्न सुनकर तोती मन ही मन जान गयी कि ये ही सीता हैं। उन्हें पहचान कर वह सामने आ उनके चरणों पर गिर पड़ी और बोली —- श्री रामचन्द्र का मुख कमल की कली के समान सुंदर होगा। नेत्र बड़े बड़े तथा खिले हुए, नासिका ऊँची, पतली और मनोहारिणी होगी। भुजाएँ घुटनों तक, गला शंख के समान होगा। वक्षःस्थल उत्तम व चौड़ा होगा। उसमें श्रीवत्स का चिन्ह होगा। 

श्री राम ऐसा ही मनोहर रूप धारण करने वाले हैं। मैं उनका क्या वर्णन कर सकती हूँ। जिसके सौ मुख हैं, वह भी उनके गुणों का बखान नहीं कर सकता। फिर हमारे जैसे पक्षी की क्या बिसात है ।वे जानकी देवी धन्य हैं जो शीघ्र रघुनाथ जी के साथ हजारों वर्षों तक प्रसन्नतापूर्वक विहार करेंगी। परंतु सुंदरी ! तुम कौन हो?

पक्षियों की बातें सुनकर सीता अपने जन्म की चर्चा करती हुई बोलीं—-‘जिसे तुम लोग जानकी कह रहे हो, वह जनक की पुत्री मैं ही हूं। श्री राम जब यहाँ आकर मुझे स्वीकार करेंगे, तभी मैं तुम दोनों को छोड़ूँगी। तुम इच्छानुसार खेलते हुए मेरे घर में सुख से रहो।

यह सुनकर तोती ने जानकी से कहा —-‘साध्वी ! हम वन के पक्षी हैं। हमें तुम्हारे घर में सुख नहीं मिलेगा। मैं गर्भिणी हूँ, अपने स्थान पर जाकर बच्चे पैदा करूँगी। उसके बाद फिर यहाँ आ जाऊँगी।'

उसके ऐसा कहने पर भी सीता ने उसे नहीं छोड़ा। तब उसके पति ने कहा —-‘सीता ! मेरी भार्या को छोड़ दो। यह गर्भिणी है। जब यह बच्चों को जन्म दे लेगी, तब इसे लेकर फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। तोते के ऐसा कहने पर जानकी ने कहा — महामते ! तुम आराम से जा सकते हो, मगर मैं इसे अपने पास बड़े सुख से रखूँगी ।

जब सीता ने उस तोती को छोड़ने से मना कर दिया, तब वह पक्षी अत्यंत दुखी हो गया। उसने करुणायुक्त वाणी में कहा —-‘योगी लोग जो बात कहते हैं वह सत्य ही है—-किसी से कुछ न कहे, मौन होकर रहे, नहीं तो उन्मत्त प्राणी अपने वचनरूपी दोष के कारण ही बन्धन में पड़ता है। यदि हम इस पर्वत के ऊपर बैठकर वार्तालाप न करते होते तो हमारे लिए यह बन्धन कैसे प्राप्त होता। इसलिए मौन ही रहना चाहिए ।’ इतना कहकर पक्षी पुनः बोला—– ‘सुन्दरी ! मैं अपनी इस भार्या के विना जीवित नहीं रह सकता, इसलिए इसे छोड़ दो। सीता ! तुम बहुत अच्छी हो, मेरी प्रार्थना मान लो।’ इस तरह उसने बहुत समझाया, किन्तु सीता ने उसकी पत्नी को नहीं छोड़ा, तब उसकी भार्या ने क्रोध और दुख से व्याकुल होकर जानकी को श्राप दिया ——- ‘अरी ! जिस प्रकार तू मुझे इस समय अपने पति से अलग कर रही है, वैसे ही तुझे स्वयं भी गर्भिणी की अवस्था में श्रीराम से अलग होना पड़ेगा।’

यों कह कर पति वियोग के कारण उसके प्राण निकल गये। उसने श्री रामचंद्र जी का स्मरण तथा पुनः पुनः राम नाम का उच्चारण करते हुए प्राण त्याग किया था, इसलिए उसे ले जाने के लिए एक सुंदर विमान आया और वह पक्षिणी उस पर बैठकर भगवान के धाम को चली गई।

भार्या की मृत्यु हो जाने पर तोता पक्षी शोक से आतुर होकर बोला —— ‘मैं मनुष्यों से भरी श्रीराम की नगरी अयोध्या में जन्म लूँगा तथा मेरे ही वाक्य से इसे पति के वियोग का भारी दुख उठाना पड़ेगा।’

यह कह कर वह चला गया। क्रोध और सीता जी का अपमान करने के कारण उसका धोबी की योनि में जन्म हुआ।

उस धोबी के कथन से ही सीता जी निन्दित हुईं और उन्हें पति से अलगहोना पड़ा। धोबी के रूप में उत्पन्न हुए उस तोते का श्राप ही सीता का पति से विछोह कराने में कारण हुआ और वे वन में गयीं।

Tuesday, June 8, 2021

क्या आप जानते हैं शनिदेव पर तेल क्यों चढ़ाते हैं?


हम और आप अरसे से देखते आ रहे हैं कि सब शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित किया जाता है। नियम यह है कि किसी पात्र में तेल डाल कर उसमें अपना चेहरा देखने के बाद उसे शनिदेव को अर्पित कर दिया जाता है। कहते हैं कि इससे सभी प्रकार के शनि दोष कट जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों और कब शुरू हुआ। इसके पीछे क्या कहानी है। शायद आपमें से बहुत लोग नहीं जानते होंगे। आइए हम सुनाते हैं कि इसके पीछे क्या कहानी है।

 शनि देव को तेल अर्पित करने के बारे में दो कथाएं मिलती हैं। एक कथा के अनुसार, शनि देव को अपनी शक्ति और पराक्रम पर बहुत घमंड हो गया था। यह उस समय की बात है जब राम भक्त हनुमान जी के पराक्रम और बल की सर्वत्र चर्चा होती थी। जब शनि देव को इस बात का पता चला तो स्वयं को सबसे बलशाली सिद्ध करने के लिए  हनुमान जी से युद्ध करने के लिए निकल पड़े. वहां उन्होंने देखा कि हनुमानजी एकांत में बैठकर श्री राम जू की भक्ति में लीन हैं।

शनिदेव ने हनुमानजी को युद्ध के लिए ललकारा। हनुमान जी ने समझाते हुए कहा कि अभी वो अपने प्रभु श्री राम का ध्यान कर रहे हैं। हनुमान जी ने शनि देव को जाने के लिए कहा पर शनि देव उन्हें युद्ध के लिए ललकारते रहे और हनुमानजी के बहुत समझाने पर भी नहीं माने। शनि देव युद्ध की बात पर अड़े रहे तब हनुमानजी ने फिर से समझाते हुए कहा कि मेरा राम सेतु की परिक्रमा का समय हो रहा है आप कृपया यहां से चले जाइए। शनि देव के न मानने पर हनुमान जी ने शनि देव को अपनी  पूंछ में लपेट लिया और राम सेतु की परिक्रमा आरम्भ कर दी।

शनि देव का पूरा शरीर धरती और रास्ते  में आई चट्टानों से घिसता जा रहा था और उनका पूरा शरीर घायल हो गया। उनके शरीर से रक्त निकलने लगा और बहुत अधिक पीड़ा होने लगी। तब शनिदेव ने हनुमान जी से क्षमा मांगते हुए कहा कि मुझे अपनी उदंडता का परिणाम मिल गया है। कृपया मुझे मुक्त कर दीजिए। तब हनुमान जी ने कहा कि यदि मेरे भक्तों की राशि पर तुम्हारा कोई दुष्परिणाम नहीं होने का वचन दो तो मैं तुम्हे मुक्त कर सकता हूं।

शनि देव ने वचन देते हुए कहा कि आपके भक्तों पर मेरा कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा। तब हनुमानजी ने शनि देव को मुक्त किया और उनके घायल शरीर पर तेल लगाया जिससे शनिदेव को पीड़ा में आराम मिला। तब शनि देव ने कहा कि जो व्यक्ति मुझे तेल अर्पित करेंगे उनका जीवन समृद्ध होगा और मेरे कारण कोई कष्ट नहीं होगा और तबसे ही शनि देव को तेल अर्पित करने की परंपरा का प्रारम्भ हुआ। इस कथा में कई जगह ऐसा भी कहा गया है कि हनुमान जी ने शनि से युद्ध कर के उन्हें घायल कर दिया था। उसके बाद उनके घावों में तेल लगा कर उनकी पीड़ा शांत की थी। उसके बाद सूर्यपुत्र शनिदेव ने हनुमान जी को आश्वस्त किया था कि उनके भक्तों को वे नहीं सतायेंगे।

 इस बारे में दूसरी कथा कुछ इस प्रकार है। लंकापति रावण प्रकांड ज्योतिषी था। उसने एक बार सभी ग्रहों को अपनी राशि के अनुरूप राशि में बैठाया परन्तु शनि देव ने रावण की बात मानने से मना कर दिया इसलिए रावण ने उन्हें उल्टा लटका दिया।

इसके पश्चात हनुमानजी लंका पहुंचे तब रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगवा दी। हनुमानजी ने उड़ कर सारी लंका जला डाली। आग लगने के बाद सभी बंदी ग्रह भाग गए परन्तु उल्टा लटका होने के कारण शनिदेव नहीं भाग पाए। शनिदेव की देह में बहुत पीड़ा हो रही थी। तब हनुमान जी ने शनि देव को तेल लगाया जिससे शनि देव की पीड़ा कुछ कम हुई। इसके बाद शनि देव ने कहा कि आज से मुझे तेल अर्पित करने वाले सभी व्यक्तियों की पीड़ा को मैं हर लूंगा। तब से ही शनि देव को तेल अर्पित किया जाने लगा।

शनि देव को तेल चढ़ाते समय उस तेल में चेहरा देखने से शनि दोषों से मुक्ति प्राप्त होती है और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

यों तो देश में कई जगह शनिदेव के मंदिर हैं लेकिन महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शिंगणापुर गांव का शनि देवता का मंदिर सर्वाधिक  प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यहां की मूर्ति  स्वयंभू है अर्थात स्वयं प्रकट हुई है।

इस गांव की सबसे बड़ी और विचित्र बात यह है यहां किसी घर या दूकान या दूसरे प्रतिष्ठानों में ताले नहीं लगते। घर में दरवाजे तक नहीं हैं। वहां के लोगों का मानना है कि उनके सामान की रक्षा स्वयं शनि भगवान करते हैं शनिदेव के डर से कोई चोर चोरी करने भी नहीं आता कहते हैं और चोरी करने के बाद कोई इंसान गांव से बाहर नहीं जा पाता।

शनि भगवान की स्वयंभू मूर्ति काले रंग की है। 5 फुट 9 इंच ऊँची व 1 फुट 6 इंच चौड़ी यह मूर्ति संगमरमर के एक चबूतरे पर खुले में धूप में ही स्थापित है। मूर्ति के ऊपर कोई छत्र भी नहीं है। यहां रोज हजारों की संख्या में रोज दर्शनार्थी आते हैं और शनि देवता की मूर्ति पर तेल चढ़ाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां आकर दर्शन करने और तेल चढ़ाने से सभी प्रकार के शनि दोष, शनि की दशा से होनेवाले कष्ट से मुक्ति मिलती है। शनिवार और अमावस्या को यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती है।

इस मूर्ति के प्रकट होने के बारे में एक घटना बतायी जाती है कि एक बार गांव में बड़ी बाढ़ आयी थी सब कुछ डूबने लगा किंतु किसी दैवीय शक्ति से गांव बच गया। कहते हैं दूसरे दिन गांव के एक आदमी ने पेड़ की डाल पर एक अजीब-सा पत्थर फंसा देखा। उसने सोचा अच्छा पत्थर है इसे ले जाकर इससे कुछ बनायेंगे   यह सोच उसने जैसे ही उस पर एक नुकीली चीज से चोट किया उस पत्थर से खून निकलने लगा। वह डर गया और भागा-भागा गांव आया और गांव वालों से सारी बात बतायी। गांव वाले भी यह देख दंग रह गये कि पत्थर खून निकल रहा है। सभी गांव लौट आये। उसी रात को गांव वाले एक व्यक्ति के सपने में शनिदेव आये और उससे कहा- मैं शनिदेव हूं, गांव के बाहर जो विचित्र पत्थर पड़ा है उसे लाकर गांव में स्थापित करो और मेरी पूजा करो। उसके बाद गांववालों ने उस मूर्ति की एक चबूतरे पर स्थापना कर दी और तभी से शिगणापुर में पूजे जा रहे हैं शनिदेव।शनि मंदिर हमेशा पवित्र मन और स्वच्छ शरीर से ही जाना चाहिए। शनिदेव के पूजन के बाद प्रसाद स्वरुप इलाइची दाना, नारियल और तेल समर्पित करना उत्तम माना गया है। शनिदेव को बेलपत्र और चंदन अति प्रिय है। इसलिए ये दो चीजें शनिदेव को समर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं। शनि मंदिर में शनि के वैदिक मंत्र या तांत्रिक मंत्र का जाप करना अत्यधिक लाभदायक माना जाता है। यदि स्वयं से मंत्र का जाप करना संभव ना हो तो कम से कम आरती में भी सम्मिलित होना चाहिए। शनिदेव की पूजा के बाद उन्हें प्रसाद समर्पित करके खुद ग्रहण करें और अन्य लोगों के बीच भी बंटाना चाहिए। मंदिर से कोई भी प्रतिमा लाकर घर में ना लाएं अथवा लगाएं। दान आदि कार्य भी मंदिर परिसर में ही संपन्न करना चाहिए।


 

Sunday, June 6, 2021

जब शिवजी ने लड़ा श्रीराम से युद्ध

 


शिवजी भगवान राम के अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपनी अर्धांगिनी सती का त्याग तक इसलिए कर दिया था कि सती ने भगवान राम की परीक्षा लेनी चाही थी।        शिवजी भगवान राम के अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपनी अर्धांगिनी सती का त्याग तक इसलिए कर दिया था कि सती ने भगवान राम की परीक्षा लेनी चाही थी। शिवजी सर्वदा राम नाम जपते रहते थे। वनवास के दौरान जब रावण ने पंचवटी से सीता का हरण कर लिया और राम-लक्ष्मण उन्हें खोजते दुखी होकर वन-वन भटक रहे थे उस वक्त सती को संदेह हुआ। वे सोचने लगीं अगर यह ब्रह्म रूप हैं तो फिर साधारण मनुष्यों की तरह स्त्री के लिए विलाप क्यों कर रहे हैं। अपना यह संदेह उन्होंने शिव जी पर प्रकट किया तो शिवजी ने उनसे कहा कि अगर उन्हें संदेह तो वे स्वयं जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं। इस पर सती ने सीता का रूप धारण कर राम की परीक्षा लेनी चाही राम उन्हें पहचान गये और उनको माता कह कर प्रणाम किया। इस पर सती परेशान हो गयीं और परीक्षा की बात शिव जी से छिपा ली। शिव जी ने ध्यान लगा कर सब जान लिया कि सती ने सीता का रूप धारण कर उनके राम से छल किया उन्हीं सीता का जिन्हें शिवजी मां समान मानते हैं। वही शिव जी राम से युद्ध करें यह बात चौंकानेवाली है। लेकिन ऐसा हुआ था।
·          बात उन दिनों की है जब श्रीराम का अश्वमेघ यज्ञ अभियान चल रहा था। श्रीराम के छोटे भाई शत्रुघ्न के नेतृत्व में बड़ी सेना सारे प्रदेश पर विजय करने जा रही थी। यज्ञ का अश्व प्रदेश-प्रदेश घूम रहा था। इस दौरान कई राजाओं द्वारा यज्ञ का घोड़ा पकड़ा गया लेकिन अयोध्या की सेना के आगे उन राजाओं को झुकना पड़ा। शत्रुघ्न के अलावा सेना में हनुमान, सुग्रीव और भरत पुत्र पुष्कल सहित कई महारथी उपस्थित थे जिन्हें जीतना देवताओं के लिए भी संभव नहीं था। कई जगह भ्रमण करने के बाद यज्ञ का घोड़ा देवपुर पहुंचा जहां राजा वीरमणि का राज्य था।
राजा वीरमणि अति धर्मनिष्ठ तथा श्रीराम एवं महादेव के अनन्य भक्त थे। उनके दो पुत्र रुक्मांगद और शुभंगद वीरों में श्रेष्ठ थे। राजा वीरमणि के भाई वीरसिंह भी एक महारथी थे। राजा वीरमणि ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था और महादेव ने उन्हें उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान भी दिया था। वीरमणि के सिर पर भगवान महादेव का वरद हस्त होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं करता था।
जब अश्व उनके राज्य में पहुंचा तो राजा वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया और अयोध्या के सैनिकों से कहा कि यज्ञ का घोड़ा उनके पास है इसलिए वे जाकर शत्रुघ्न से कह दें कि विधिवत युद्ध कर के ही वे अपने अश्व छुड़ा सकते हैं। जब रुक्मांगद ने ये सूचना अपने पिता को दी तो वो बड़े चिंतित हुए और अपने पुत्र से कहा की अनजाने में तुमने श्रीराम के यज्ञ का घोड़ा पकड़ लिया है। श्रीराम हमारे मित्र हैं और उनसे शत्रुता करने का कोई औचित्य नहीं है इसलिए तुम यज्ञ का घोड़ा वापस लौटा आओ। इस पर रुक्मांगद ने कहा कि- हे पिताश्री, मैंने तो उन्हें युद्ध की चुनौती भी दे दी है अतः अब उन्हें बिना युद्ध के अश्व लौटना हमारा और उनका दोनों का अपमान होगा। अब तो जो हो गया है उसे बदला नहीं जा सकता इसलिए आप मुझे युद्ध की आज्ञा दें।
 पुत्र की बात सुन कर वीरमणि ने उसे सेना सुसज्जित करने की आज्ञा दे दी। राजा वीरमणि अपने भाई वीरसिंह और अपने दोनों पुत्र रुक्मांगद और शुभांगद के साथ विशाल सेना ले कर युद्ध क्षेत्र में आ गए।
  इधर जब शत्रुघ्न को सूचना मिली कि उनके यज्ञ का घोड़ा बंदी बना लिया गया है तो वो बहुत क्रोधित हुए एवं अपनी पूरी सेना के साथ युद्ध के लिए युद्ध क्षेत्र में आ गए। उन्होंने पूछा की उनकी सेना से कौन अश्व को छुड़ाएगा तो भरत पुत्र पुष्कल ने कहा कि तातश्री, आप चिंता न करें। आपके आशीर्वाद और श्रीराम के प्रताप से मैं आज ही इन सभी योद्धाओं को मार कर अश्व को मुक्त करता हूं। वे दोनों इस प्रकार बात कर रहे थे कि पवनसुत हनुमान ने कहा कि राजा वीरमणि के राज्य पर आक्रमण करना स्वयं परमपिता ब्रह्मा के लिए भी कठिन है क्योंकि यह नगरी महाकाल शिव द्वारा रक्षित है। उचित यही होगा कि पहले हमें बातचीत द्वारा राजा वीरमणि को समझाना चाहिए और अगर हम न समझा पाए तो हमें श्रीराम को सूचित करना चाहिए। राजा वीरमणि श्रीराम का बहुत आदर करते हैं इसलिए वे उनकी बात नहीं टाल पाएंगे। हनुमान की बात सुन कर शत्रुघ्न बोले, हमारे रहते अगर श्रीराम को युद्ध भूमि में आना पड़े तो यह हमारे लिए अत्यंत लज्जा की बात है, अब जो भी हो हमें युद्ध तो करना ही पड़ेगा। यह कह कर वे सेना सहित युद्धभूमि में पहुच गए।
  भयानक युद्ध छिड़ गया। भरत पुत्र पुष्कल सीधा जाकर राजा वीरमणि से भिड गया। दोनों अतुलनीय वीर थे। वे दोनों तरह-तरह के शस्त्रों का प्रयोग करते हुए युद्ध करने लगे। हनुमान राजा वीरमणि के भाई महापराक्रमी वीरसिंह से युद्ध करने लगे। रुक्मांगद और शुभांगद ने शत्रुघ्न पर धावा बोल दिया। पुष्कल और वीरमणि में बड़ा घमासान युद्ध हुआ। अंत में पुष्कल ने वीरमणि पर आठ नाराच बाणों से वार किया। इस वार को राजा वीरमणि सह नहीं पाए और मुर्छित होकर अपने रथ पर गिर पड़े। वीरसिंह ने हनुमान पर कई अस्त्रों का प्रयोग किया पर उन्हें कोई हानि न पहुंचा सके। हनुमान ने एक विकट पेड़ से वीरसिंह पर वार किया इससे वीरसिंह रक्त वमन करते हुए मूर्छित हो गए।
उधर शत्रुघ्न और राजा वीरमणि के पुत्रों में असाधारण युद्ध चल रहा था। अंत में कोई चारा न देख कर शत्रुघ्न ने दोनों भाइयों को नागपाश में बांध लिया। अपनी विजय देख कर शत्रुघ्न की सेना के सभी वीर सिंहनाद करने लगे। उधर राजा वीरमणि की मूर्छा दूर हुई तो उन्होंने देखा कि उनकी सेना हार के कगार पर है। यह देख कर उन्होंने भगवा शंकर का स्मरण किया।
महादेव ने अपने भक्त को मुसीबत में जान कर वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित सारे गणों को युद्ध क्षेत्र में भेज दिया। महाकाल के सारे अनुचर उनकी जयजयकार करते हुए अयोध्या की सेना पर टूट पड़े। शत्रुघ्न, हनुमान और सारे लोगों को लगा कि जैसे प्रलय आ गया हो। जब उन्होंने भयानक मुख वाले रुद्रावतार वीरभद्र, नंदी, भृंगी सहित महादेव की सेना देखी तो सारे सैनिक भय से कांप उठे. शत्रुघ्न ने हनुमान से कहा कि जिस वीरभद्र ने बात ही बात में दक्ष प्रजापति का मस्तक काट डाला था और जो तेज और क्षमता में स्वयं महाकाल के समान है उसे युद्ध में कैसे हराया जा सकता है?
 यह सुनकर पुष्कल ने कहा की हे तातश्री, आप दुखी मत हों. अब तो जो भी हो, हमें युद्ध तो करना ही होगा। यह
कहते हुए पुष्कल वीरभद्र से, हनुमान नंदी से और शत्रुघ्न भृंगी से जा भिड़े। पुष्कल ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग वीरभद्र पर कर दिया लेकिन वीरभद्र ने खेल-खेल में उसे काट दिया।
उन्होंने पुष्कल से कहा की हे बालक, अभी तुम्हारी आयु मृत्यु को प्राप्त होने की नहीं हुई है इसलिए युद्ध क्षेत्र से हट जाओ। उसी समय पुष्कल ने वीरभद्र पर शक्ति से प्रहार किया जो सीधे उनके मर्मस्थान पर जाकर लगा। इसके बाद वीरभद्र ने क्रोध से थर्राते हुए एक त्रिशूल से पुष्कल का मस्तक काट लिया और भयानक सिंहनाद किया। उधर भृंगी आदि गणों ने शत्रुघ्न पर भयानक आक्रमण कर दिया।
 अंत में भृंगी ने महादेव के दिए पाश में शत्रुघ्न को बांध दिया। हनुमान अपनी पूरी शक्ति से नंदी से युद्ध कर रहे थे। उन दोनों ने ऐसा युद्ध किया जैसा पहले किसी ने नहीं किया था। दोनों श्रीराम के भक्त थे और महादेव के तेज से उत्पन्न हुए थे। काफी देर लड़ने के बाद कोई और उपाय न देख कर नंदी ने शिवास्त्र का प्रयोग कर हनुमान को पराजित कर दिया। अयोध्या के सेना की हार देख कर राजा वीरमणि की सेना में जबरदस्त उत्साह आ गया और वे बाक़ी बचे सैनिकों पर टूट पड़े। यह देख कर हनुमान ने शत्रुघ्न से कहा कि मैंने आपसे पहले ही कहा था कि ये नगरी महाकाल द्वारा रक्षित है लेकिन आपने मेरी बात नहीं मानी। अब इस संकट से बचाव का एक ही उपाय है कि हम सब श्रीराम को याद करें। ऐसा सुनते ही सारे सैनिक शत्रुघ्न, पुष्कल एवं हनुमान सहित श्रीराम को याद करने लगे।
अपने भक्तों की पुकार सुन कर श्रीराम तत्काल ही लक्ष्मण और भरत के साथ वहां आ गए। अपने प्रभु को आया देख सभी हर्षित हो गए एवं सबको ये विश्वास हो गया कि अब हमारी विजय निश्चित है। श्रीराम के आने पर जैसे पूरी सेना में प्राण का संचार हो गया।. श्रीराम ने सबसे पहले शत्रुघ्न को मुक्त कराया और उधर लक्ष्मण ने हनुमान को मुक्त करा दिया। जब श्रीराम, लक्ष्मण और भरत ने देखा कि पुष्कल मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। भरत तो शोक में मूर्छित हो गए। श्रीराम ने क्रोध में आकर वीरभद्र से कहा कि तुमने जिस प्रकार पुष्कल का वध किया है उसी प्रकार अब अपने जीवन का भी अंत समझो। ऐसा कहते हुए श्रीराम ने सारी सेना के साथ शिवगणों पर धावा बोल दिया। जल्द ही उन्हें यह पता चल गया कि शिवगणों पर साधारण अस्त्र बेकार हैं इसलिए उन्होंने महर्षि विश्वामित्र द्वारा प्रदान किये दिव्यास्त्रों से वीरभद्र और नंदी सहित सारी सेना को विदीर्ण कर दिया। श्रीराम के प्रताप से पार न पाते हुए सारे गणों ने एक स्वर में महादेव का स्मरण करना शुरू कर दिया. जब महादेव ने देखा कि उनकी सेना बड़े कष्ट में है तो वे स्वयं युद्ध क्षेत्र में प्रकट हुए।
इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए परमपिता ब्रह्मा सहित सारे देवता आकाश में स्थित हो गए। जब महाकाल ने युद्ध क्षेत्र में प्रवेश किया तो उनके तेज से श्रीराम की सारी सेना मूर्छित हो गई। जब श्रीराम ने देखा कि स्वयं महादेव रणक्षेत्र में आए हैं तो उन्होंने शस्त्र का त्याग कर भगवान रूद्र को दंडवत प्रणाम किया एवं उनकी स्तुति की। उन्होंने महाकाल की स्तुति करते हुए कहा कि हे सारे ब्रह्मांड के स्वामी ! आपके ही प्रताप से मैंने महापराक्रमी रावण का वध किया, आप स्वयं ज्योतिर्लिंग में रामेश्वरम में पधारे। हमारा जो भी बल है वो भी आपके आशीर्वाद के फलस्वरूप हीं है। यह जो अश्वमेघ यज्ञ मैंने किया है वह भी आपकी ही इच्छा से ही हो रहा है इसलिए हम पर कृपा करें और इस युद्ध का अंत करें।
यह सुन कर भगवान रूद्र बोले की हे राम, आप स्वयं विष्णु के रूप है मेरी आपसे युद्ध करने की कोई इच्छा नहीं है फिर भी चूंकि मैंने अपने भक्त वीरमणि को उसकी रक्षा का वरदान दिया है इसलिए मैं इस युद्ध से पीछे नहीं हट सकता अतः संकोच छोड़ कर आप युद्ध करें।
श्रीराम ने इसे महाकाल की आज्ञा मान कर युद्ध करना शुरू किया। दोनों में महान युद्ध छिड़ गया जिसे देवता आकाश देख रहे थे। श्रीराम ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग महाकाल पर कर दिया पर उन्हें संतुष्ट नहीं कर सके। अंत में उन्होंने पाशुपतास्त्र का संधान किया और भगवान शिव से बोले की हे प्रभु, आपने ही मुझे ये वरदान दिया है कि आपके द्वारा प्रदत्त इस अस्त्र से त्रिलोक में कोई पराजित हुए बिना नहीं रह सकता, इसलिए हे महादेव आपकी ही आज्ञा और इच्छा से मैं इसका प्रयोग आप पर ही करता हूं। यह कहते हुए श्रीराम ने वो महान दिव्यास्त्र भगवान शिव पर चला दिया। वह अस्त्र सीधा महादेव के हृदयस्थल में समा गया और भगवान रूद्र इससे संतुष्ट हो गए।
उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम से कहा कि आपने युद्ध में मुझे संतुष्ट किया है इसलिए जो इच्छा हो वर मांग लें। इस पर श्रीराम ने कहा कि हे भगवान ! यहां इस युद्ध क्षेत्र में भ्राता भरत के पुत्र पुष्कल के साथ असंख्य योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए है, उन्हें कृपया जीवन दान दीजिए। महादेव ने मुस्कुराते हुए तथास्तु कहा और पुष्कल समेत दोनों ओर के सारे योद्धाओं को जीवित कर दिया। इसके बाद उनकी आज्ञा से राजा वीरमणि ने यज्ञ का घोड़ा श्रीराम को लौटा दिया और अपना राज्य रुक्मांगद को सौंप कर वे भी शत्रुघ्न के साथ आगे चल दिए।

Saturday, June 5, 2021

'ओम जय जगदीश हरे' के मूल लेखक को आप नहीं जानते

पंडित श्रद्धाराम शर्मा

हम और आप बरसों से किसी पूजा आदि की समाप्ति पर भगवान विष्णु की आरती 'ओम जय जगदीश हरे गाते रहे हैं' लेकिन इसका मूल रचयिता कौन है यह नहीं जानते। प्राय: इस आरती के साथ कभी किसी तो कभी किसी का नाम सुना या गाया होगा जिसमें अक्सर अंतिम पंक्ति में आता है-कहत शिवानंद स्वामी लेकिन यह आरती शिवानंद स्वामी की लिखी नहीं अपितु पंडित श्रद्धाराम शर्मा की लिखी हुई है। उन्होंने 1870 में इस आरती की रचना की थी। इसे उन्होंने स्वयं संगीतबद्ध किया था और गाया भी करते थे। पंडित जी सनातन धर्म के प्रचारक, संगीतज्ञ, ज्योतिष के ज्ञाता और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका पूरा नाम पंडित श्रद्धाराम शर्मा था। पंजाब के फिल्लौर जन्म होने के कारण लोग उन्हें पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी के नाम से भी पुकारते थे। पंडित जी का जन्म 30 सितम्बर, 1837 को फुल्लौर ग्राम, जिला जालंधर, पंजाब में और मृत्यु 24 जून, 1881 लाहौर, पाकिस्तान में हुई। 

उनके पिता का नाम जयदयालु और पत्नी का नाम महताब कौर था। पिता जयदयालु अच्छे ज्योतिषी और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। पारिवारिक परिवेश धार्मिक होने के चलते पंडित श्रद्धाराम शर्मा को बचपन से ही धार्मिक संस्कार विरासत में मिले थे। पिता ने बचपन में ही अपने बेटे का भविष्य पढ़ लिया था। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि-यह बालक अपने छोटे जीवन में भी ऐसे चमत्कारी कार्य करेगा जिससे लोगों पर प्रभाव पड़ेगा और इसकी लोकप्रियता बढ़ेगी। बचपन से ही श्रद्धाराम शर्मा की ज्योतिष और साहित्य में गहरी रुचि थी। उन्होंने 1844 में मात्र सात वर्ष की उम्र में ही गुरुमुखी लिपि सीख ली थी। दस साल की उम्र में संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी ज्योतिष आदि की पढ़ाई शुरू की और कुछ ही वर्षों में वे इन सभी विषयों में प्रवीण हो गए। उनका विवाह एक सिक्ख महिला महताब कौर से हुआ। उनका कर्म क्षेत्र भारत ही रहा। ज्योतिष के ज्ञाता होने के साथ ही वे अच्छे साहित्यकार भी थे। उनकी मुख्य रचनाएँ हैं- 'ओम जय जगदीश' (आरती), 'सत्य धर्म मुक्तावली', 'शातोपदेश', 'सीखन दे राज दी विथिया', 'पंजाबी बातचीत', 'भाग्यवती', 'सत्यामृत प्रवाह' आदि।  

संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी का उनको ज्ञान था। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में वे हिन्दी और पंजाबी के प्रतिनिधि गद्यकार थे। पंडित जी एक प्रसिद्ध ज्योतिषी थे लेकिन इस क्षेत्र में उन्हें प्रसिद्धि नहीं मिली। उन्हें सर्वाधिक ख्याति उनकी अमर आरती "ओम जय जगदीश हरे" से मिली जो हजारों वर्ष बाद भी लोकप्रिय है।पूरे देश में यह आरती श्रद्धा पूर्वक गाई जाती है। अपनी विलक्षण प्रतिभा और ओजस्वी भाषण के बल पर उन्होंने पंजाब में नवीन सामाजिक चेतना एवं धार्मिक उत्साह जगाया था, जिससे आगे चल कर आर्य समाज के लिये सुविधा हुई क्योंकि उनके लिए पंडित जी ने धरातल तैयार कर रखा था। 

पंडित जी ने धार्मिक कथाओं और आख्यानों का उद्धरण देते हुए अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर दिया जिससे अंग्रेजी सरकार की नींद उड़ गई। वे ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का संदेश देते थे और लोगों में क्रांतिकारी विचार पैदा करते थे। १८६५ में ब्रिटिश सरकार ने उनको फुल्लौरी से निष्कासित कर दिया और आसपास के गाँवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई थी। उनकी लिखी किताबें स्कूलों में पढ़ाई जाती रहीं। पं॰ श्रद्धाराम खुद ज्योतिष के अच्छे ज्ञाता थे और अमृतसर से लेकर लाहौर तक उनके चाहने वाले थे इसलिए इस निष्कासन का उन पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि उनकी लोकप्रियता और बढ गई। लोग उनकी बातें सुनने को और उनसे मिलने को उत्सुक रहने लगे। इसी दौरान उन्होंने हिन्दी में ज्योतिष पर कई किताबें भी लिखीं। एक इसाई पादरी फादर न्यूटन जो श्रद्धाराम के क्रांतिकारी विचारों से बेहद प्रभावित थे, पादरी साहब के हस्तक्षेप चलते अंग्रेज सरकार को थोड़े ही दिनों में उनके निष्कासन का आदेश वापस लेना पड़ा। पं॰ श्रद्धाराम ने पादरी के कहने पर बाइबिल के कुछ अंशों का गुरुमुखी में अनुवाद भी किया था। 

पं॰ श्रद्धाराम की विद्वता, भारतीय धार्मिक विषयों पर उनकी वैज्ञानिक दृष्टि के लोग कायल हो गए थे। जगह-जगह पर उनको धार्मिक विषयों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता था और तब हजारों की संख्या में लोग उनको सुनने आते थे। वे लोगों के बीच जब भी जाते अपनी लिखी ओम जय जगदीश की आरती गाकर सुनाते। उनकी आरती सुनकर तो मानो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। आरती के बोल लोगों की जुबान पर ऐसे चढ़े कि आज कई पीढियाँ गुजर जाने के बाद भी उनके शब्दों का जादू कायम है। १८७७ में भाग्यवती नामक एक उपन्यास प्रकाशित हुआ जिसे हिन्दी का पहला उपन्यास माना जाता है।

पंडित जी की कुछ प्रमुख रचनाएं ये हैं-(क) संस्कृत - (१) नित्यप्रार्थना । (२) भृगुसंहिता (सौ कुंडलियों में फलादेश वर्णन)। (३) हरितालिका व्रत (शिवपुराण की एक कथा)। (४) "कृष्णस्तुति" विषयक कुछ श्लोक। हिंदी - (१) तत्वदीपक (प्रश्नोत्तर में श्रुति, स्मृति के अनुसार धर्म कर्म का वर्णन)। (२)  भाग्यवती (स्त्रियों की हीनावस्था पर उपन्यास)। (४) सत्योपदेश (सौ दोहों में अनेकविध शिक्षाएँ) (५) बीजमंत्र ("सत्यामृतप्रवाह' नामक रचना की भूमिका)। (६) सत्यामृतप्रवाह (फुल्लौरी जी के सिद्धांतों और आचार विचार का दर्पण ग्रंथ)। (७) पाकसाधनी (रसोई शिक्षा विषयक)। (८) कौतुक संग्रह (मंत्रतंत्र, जादूटोने संबंधी)। (९) दृष्टांतावली (सुने हुए दृष्टांतों का संग्रह, जिन्हें श्रद्धाराम अपने भाषणों और शास्त्रार्थों में प्रयुक्त करते थे)। (१०) रामलकामधेनु ( यह ज्योतिष ग्रंथ संस्कृत से हिंदी में अनूदित हुआ था)। (११) आत्मचिकित्सा (पहले संस्कृत में लिखा गया था। बाद में इसका हिंदी अनुवाद कर दिया गया। अंतत: इसे फुल्लौरी जी की अंतिम रचना "सत्यामृत प्रवाह' के प्रारंभ में जोड़ दिया गया था)। (१२) महाराजा कपूरथला के लिए विरचित एक नीतिग्रंथ । इसके अलावा उर्दू में भी उनकी कुछ रचनाएं हैं। इनमें से कुछ अप्राप्य हैं।

ॐ जय जगदीश हरे,

स्वामी जय जगदीश हरे ।

भक्त जनों के संकट,

दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे ॥

॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

जो ध्यावे फल पावे,

दुःख बिनसे मन का,

स्वामी दुःख बिनसे मन का ।

सुख सम्पति घर आवे,

सुख सम्पति घर आवे,

कष्ट मिटे तन का ॥

॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

मात पिता तुम मेरे,

शरण गहूं किसकी,

स्वामी शरण गहूं मैं किसकी ।

तुम बिन और न दूजा,

तुम बिन और न दूजा,

आस करूं मैं जिसकी ॥

॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम पूरण परमात्मा,

तुम अन्तर्यामी,

स्वामी तुम अन्तर्यामी ।

पारब्रह्म परमेश्वर,

पारब्रह्म परमेश्वर,

तुम सब के स्वामी ॥

॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम करुणा के सागर,

तुम पालनकर्ता,

स्वामी तुम पालनकर्ता ।

मैं मूरख फलकामी,

मैं सेवक तुम स्वामी,

कृपा करो भर्ता॥

॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

तुम हो एक अगोचर,

सबके प्राणपति,

स्वामी सबके प्राणपति ।

किस विधि मिलूं दयामय,

किस विधि मिलूं दयामय,

तुमको मैं कुमति ॥

॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता,

ठाकुर तुम मेरे,

स्वामी रक्षक तुम मेरे ।

अपने हाथ उठाओ,

अपने शरण लगाओ,

द्वार पड़ा तेरे ॥

॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥

विषय-विकार मिटाओ,

पाप हरो देवा,

स्वमी पाप(कष्ट) हरो देवा ।

श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,

श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,

सन्तन की सेवा ॥

ॐ जय जगदीश हरे,

स्वामी जय जगदीश हरे ।

भक्त जनों के संकट,

दास जनों के संकट,

क्षण में दूर करे ॥

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Wednesday, June 2, 2021

महर्षि अगस्त्य जो पी गये समुद्र,झुका दिया विंध्याचल पर्वत



भारत भूमि में ऐसे-ऐसे पहुंचे हुए प्रतापी ऋषि और महात्मा हुए हैं जिनकी ख्याति जग विख्यात है। वैदिक काल के ऋषियों के अतिरिक्त इस युग में भी कई सिद्ध महापुरुष और महात्मा हुए हैं जिनके प्रभाव को देश-विदेश के लोगों ने जाना और माना है। यहां हम प्राचीन काल के एक ऐसे प्रतापी ऋषि की गाथा सुनाने जा रहे हैं जिन्होंने समुद्र को पी लिया था और सूर्य का मार्ग रोकनेवाले विंध्याचल पर्वत को झुका दिया था। हमारा आशय महर्षि अगस्त्य से है। इस कथा को प्रारंभ करने के पूर्व हम यह बता देना चाहेंगे कि हो सकता है कि कुछ बातें अतिशयोक्ति में कही गयी हों लेकिन तपस्चर्या के बल पर उस काल के ऋषि मुनियों ने असाध्य साधन किया था। किसी असंभव से लगने वाले प्रसंग पर दुराग्रह रखने या प्रकट करने के पहले यह ध्यान रखना चाहिए कि क्या कभी मनुष्य ने यह सोचा था कि वह चंद्रमा पर कदम रख पाया था नहीं ना पर उसने ऐसा संभव कर के दिखा दिया।  आप कह सकते हैं कि ऐसा अंतरिक्ष विज्ञान की उपलब्धि के चलते हुआ है। तो हम कह सकते हैं कि उस वक्त भी विज्ञान काफी आगे था। प्रमाण हैं पुष्पक विमान जैसे विमान और युद्ध में प्रयुक्त ब्रह्मास्त्र जिन्हें ततकालीन परमाणु अस्त्र माना जा रहा है। ऋषि अगस्त्य के बारे में कहा जाता है कि वे वैज्ञानिक भी थे और विद्युत के आविष्कार का श्रेय उन्हें ही जाता है। आइए अब जानते हैं उनकी उत्पत्ति और उनके चमत्कारों की कहानी। 

महर्षि अगस्त्य वैदिक ॠषि थे। ये वशिष्ठ मुनि के बड़े भाई थे। अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा विदर्भ देश की राजकुमारी थीं। अगस्त्य को सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। देवताओं के अनुरोध पर उन्होंने काशी छोड़कर दक्षिण की यात्रा की और बाद में वहीं बस गये थे। ब्रह्मतेज के मूर्तिमान स्वरूप महामुनि अगस्त्य जी का पावन चरित्र अत्यन्त उदात्त तथा दिव्य है। वेदों में उनका वर्णन आया है। ऋग्वेद का कथन है कि मित्र तथा वरुण नामक वेदताओं का अमोघ तेज एक दिव्य यज्ञिय कलश में पुंजीभूत हुआ और उसी कलश के मध्य भाग से दिव्य तेज:सम्पन्न महर्षि अगस्त्य का प्रादुर्भाव हुआ-

"सत्रे ह जाताविषिता नमोभि: कुंभे रेत: सिषिचतु: समानम्। ततो ह मान उदियाय मध्यात् ततो ज्ञातमृषिमाहुर्वसिष्ठम्॥"

इस ऋचा के भाष्य में आचार्य सायण ने लिखा है-"ततो वासतीवरात् कुंभात् मध्यात् अगस्त्यो 

शमीप्रमाण उदियाप प्रादुर्बभूव। तत एव कुंभाद्वसिष्ठमप्यृषिं जातमाहु:॥"

इस प्रकार कुंभ से अगस्त्य तथा महर्षि वसिष्ठ का प्रादुर्भाव हुआ।एक यज्ञ सत्र में उर्वशी भी सम्मिलित हुई थी। मित्र वरुण ने उसकी ओर देखा तो उनका अमोघ तेज  स्खलित हुआ और यज्ञ के पवित्र कलश  में एकत्र हो गया। उर्वशी ने उपहासात्मक मुस्कराहट बिखेर दी। मित्र वरुण बहुत लज्जित हुए। कुंभ का स्थान, जल तथा कुंभ, सब ही अत्यंत पवित्र थे। यज्ञ के अंतराल में ही कुंभ में स्खलित अमोघ तेज के चलते कुंभ से अगस्त्य, स्थल में वसिष्ठ तथा मत्स्य का जन्म हुआ। उर्वशी इन तीनों की मानस जननी मानी गयी।

पुराणों में यह कथा है कि महर्षि अगस्त्य की पत्नी महान् पतिव्रता तथा श्रीविद्या की आचार्य थीं जो 'लोपामुद्रा' के नाम से प्रसिद्ध हुईं।  अगस्त्य ऋषि की कथा में इल्वल और वातापि दैत्यों का भी उल्लेख आता है। उनकी कथा ऋषि लोमश ने युधिष्ठर को इस प्रकार से सुनायी थी। लोमशजी ने कहा हे पांडु नन्दन ! पूर्वकाल की बात है। मणिमती नगरी में इल्वल नामक दैत्य रहता था उसका छोटा भाई था वातापि। एक दिन दिति पुत्र इल्वल ने एक तपस्वी ब्राह्मण से कहा कि हे भगवन! आप मुझे ऐसा पुत्र होने का वरदान दें, जो इन्द्र के समान पराक्रमी हो। उस ब्राह्मण देवता ने इल्वल का आग्रह स्वीकार नहीं किया। इससे वह असुर उन ब्राह्मण देवता पर बहुत क्रोधित हो गया। उसके बाद से वह इल्वल दैत्य क्रोध में भर कर ब्राह्मणों की हत्या करने लगा।

 वह मायावी अपने भाई वातापि को माया से बकरा बना देता था। वातापि भी इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ था! अत: वह क्षण भर में मेंढ़ा और बकरा बन जाता था। फिर इल्वल उस भेड़ या बकरे को पका कर उसका माँस राँधता और किसी ब्राह्मण को खिला देता था। इसके बाद वह ब्राह्मण को  मारने की इच्छा करता था। इल्वल में यह शक्ति थी कि वह जिस किसी भी यमलोक में गये हुए प्राणी  को उसका नाम लेकर बुलाता, वह पुन: शरीर धारण करके जीवित दिखायी देने लगता था। हमेशा वातापि दैत्य को बकरा बनाकर इल्वल उसके माँस को पकाता और किसी न किसी ब्राह्मण को वह  माँस खिलाकर, पुन: अपने भाई को पुकारा करता। राजन! इल्वल की आवाज़ सुनकर वह अत्यन्त मायावी महादैत्य वातापि उस ब्राह्मण की पसली को फाड़कर हँसता हुआ निकल आता। इस प्रकार दुष्ट हृदय इल्वल दैत्य बार-बार ब्राह्मणों को भोजन करा कर, अपने भाई द्वारा उनकी हत्या करा देता था।

   जब वृत्तासुर के अत्याचार और आतंक से सभी देवता व अन्य प्राणी त्रस्त हो गये तो इंद्र ने दधीचि ऋषि से अस्थियां मांगीं ताकि राक्षस वृत्तासुर का वध किया जा सके। दधीचि ने सहर्ष अस्थियों का दान  कर दिया इसके बाद इंद्र ने बिना बिलम्ब किये अपने शक्तिशाली देवताओं सहित पृथ्वी और आकाश घेर कर खड़े हुए वृत्तासुर पर धावा बोल दिया, और देवता तथा दानवों में भयंकर युद्ध छिड़ गया, उस समय समस्त कालकेय आदि राक्षस गण वृत्तासुर की ओर से लड़े, देवता और ऋषियों के तेज से सम्पन्न इंद्र का बल बढ़ा हुआ देख वृत्तासुर ने बहुत भयानक हुँकार भरी, उसकी हुँकार से समस्त दिशाएं पृथ्वी और तीनों लोक कांप उठे, यहां तक कि इंद्र भी भयभीत हो गया, और उसने अपना बज्र छोड़ दिया, उस बज्र की चोट से वृत्तासुर प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, और वृत्तासुर की मृत्यु से दुखी कालकेय आदि राक्षस गण बचे हुए समस्त दैत्यों के साथ समुद्र में जा छुपे और वहां इकठ्ठा होकर तीनों लोकों के विनाश की योजना बनाने लगे। उन्होंने एक भयंकर उपाय सोचा कि समस्त लोकों की रक्षा तप से ही होती है अतः सबसे पहले तप का ही नाश करना चाहिए, इसलिए पृथ्वी पर जितने भी धर्मात्मा तपस्वी और पुण्य आत्मा है यदि उनका नाश कर दिया जाये तो समस्त लोक अपने आप ही नष्ट हो जाएंगे, ऐसा सोच कर वे रोज रात्रि के समय समुद्र से बाहर आते, और आस पास के आश्रम और तीर्थस्थानों में रहने वाले ऋषि मुनियों आदि को खा जाते और सुबह होते ही समुद्र में छिप जाते, उनका अत्याचार इतना बढ़ गया, कि पृथ्वी पर ऋषि मुनियों की हड्डियां नजर आने लगीं।

  इस प्रकार का नर संहार देखकर देवता अत्यंत दुखी हुये, और विष्णु जी के पास जाकर सारा हाल सुना कर बोले कि " भगवन बड़ी विपत्ति आन पड़ी है, पता नही कौन रात्रि के समय धर्मात्मा पुरुषों और ऋषि मुनियों का वध करता है, यदि ऐसे ही धर्मात्माओं और ऋषि मुनियों का वध होता रहा तो पृथ्वी समेत सभी लोको का नाश निश्चित है, प्रभु हमारा मार्ग दर्शन करें, और इस विपत्ति से बाहर निकाले।

     प्रार्थना सुनकर विष्णु जी बोले- हे देवगण मैं इस भयंकर उत्पात से भलीभाँति परिचित हूँ।

कालकेय नामक दैत्यों का एक भयंकर दल है, जो दिन भर तो समुद्र में छिपे रहते हैं, और रात्रि के समय संसार के विनाश हेतु वे बाहर निकल कर धर्मात्माओं और ऋषि मुनियों का वध करते हैं, है देवगण समुद्र में रहने के कारण तुम उनका वध नही कर सकते हो, इसलिए पहले समुद्र को सुखाने का उपाय सोचना चाहिए और समुद्र को सुखाने का सामर्थ्य महर्षि अगस्त्य के अलावा किसी में नहीं है।इसलिए आप सब पहले मुनि अगस्त्य को इस कार्य के लिए तैयार करो।  भगवान विष्णु की बात मान कर सभी देवता मुनि अगस्त्य के आश्रम में गये और उनसे विस्तार से अपने दुख का वर्णन कर सहायता करने की प्रार्थना की।

 उनकी विनती सुनकर अगस्त्य मुनि ने कहा कि- मैं इस संसार के कष्ट दूर करने के लिए तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा, तत्पश्चात वे सभी तपसिद्ध ऋषियों और देवताओं को साथ लेकर समुद्र के तट पर गए, और वहाँ उपस्थित ऋषियों और देवताओ से कहने लगे की " मैं समस्त संसार के हित के लिए इस समुद्र का पान करता हूँ।' और ऐसा कहकर मुनि अगस्त्य से समुद्र का सारा जल पी लिया,तब सभी देवता अपने दिव्य अस्त्रों के साथ कालकेय दैत्यों पर टूट पड़े, और भयंकर युद्ध छिड़ गया। लेकिन पवित्र आत्मा मुनियों के तप के कारण सभी दैत्य पहले ही शक्तिहीन हो गए थे, इसलिए सभी दैत्य देवताओं के हाथों मारे गए, इस प्रकार दैत्यों के अंत के साथ युद्ध समाप्त हुआ।

तब देवताओं ने अगस्त्य मुनि की अनेको प्रकार से स्तुति की और प्रार्थना की कि अब आप समुद्र के पिये हुए जल को पुनः छोड़ दीजियें, लेकिन मुनि अगस्त्य ने कहा कि " मैंने वह सारा जल तो पचा लिया, यह सुनकर देवताओं को बड़ा आश्चर्य हुआ, और उदास मन से ब्रह्मा जी के पास आये, और हाथ जोड़कर समुद्र भरने की प्रार्थना की, तब ब्रह्मा जी बोले कि " देवतागण अब तुम सब अपनी इच्छानुसार अपने अपने स्थान पर जाओ, आज से कुछ समय बाद राजा भगीरथ अपने पुरखों के उद्धार का प्रयत्न करेंगे, तब यह समुद्र फिर जल से भर जाएगा, ब्रह्मा जी के कहे अनुसार सभी देवता अपने स्थान पर चले गए और उस समय की प्रतीक्षा करने लगे ।

  विदर्भ-नरेश सन्तान-प्राप्ति के लिए कठिन तपस्या करने में लीन थे। छ: महीनों बाद रानी ने एक कन्या को जन्म दिया। राजा की खुशी का ठिकना न रहा। उन्होंने ब्राह्मणों से कहा कि उनकी तपस्या सफल हुई है और उन्हें एक कन्या-रत्न की प्राप्ति हुई है।

उस अनुपम सुन्दरी बालिका का सौन्दर्य देखकर ब्राह्मण गण मुग्ध रह गये। यह बालिका लोपामुद्रा के नाम से प्रसिद्ध हुई। लोपामुद्रा बड़ी होकर अद्वितीय सुन्दरी और परम चरित्रवती के रूप में विकसित हुई। अगस्त्य मुनि राजा के पास पहुँचे। और उन्होंने कहा कि मैं आपकी पुत्री से विवाह करना चाहता हूँ। राजा ये बात सुनकर चिन्ता में डूब गए। उसी समय लोपामुद्रा राजा के पास आयी। उसने कहा- पिता जी, आप दुविधा में क्यों पड़ गये? मैं ॠषिवर से विवाह करने के लिए प्रस्तुत हूँ। और फिर लोपामुद्रा और अगस्त्य मुनि का विवाह सम्पन्न हो गया। विवाह के पश्चात् अगस्त्य मुनि ने लोपामुद्रा से कहा कि तुम्हारे ये राजकीय वस्त्र ॠषि-पत्नी को शोभा नहीं देते। इनका परित्याग कर दो। जो आज्ञा, स्वामी! अब से मैं छाल, चर्म और वल्कल ही धारण करूँगी। कुछ समय बाद लोपामुद्रा ने कहा स्वामी मेरी एक इच्छा है। कहो, क्या इच्छा है तुम्हारी? हम ठहरे गृहस्थ! हमारे लिए धन से सम्पन्न होना कोई अपराध न होगा। प्रभु, मै उसी तरह रहना चाहती हूँ, जैसे अपने पिता के घर रहती थी। महर्षि अगस्त ने  कहा कि वे  धन-प्राप्ति के लिए प्रस्थान करते हैं और उन्होंने लोपामुद्रा से प्रतीक्षा करने को कहा। 

अगस्त्य धन-संग्रह के लिए चल पड़े। वे राजा श्रुतर्वा के पास पहुँचे। माना जाता था कि वे अत्यन्त समृद्ध हैं। जब वे श्रुतर्वा के दरबार  में  पहुँचे तो महाराज श्रुतर्वा ने पूछा कि वे क्या सेवा कर सकते थे ? अगस्त्य जी ने कहा कि वह उन्हें अपनी सामर्थ्य के अनुसार धन प्रदान करें। राजा ने बताया कि उसके पास देने को अतिरिक्त धन नहीं है। फिर भी जो था उसमें से अगस्त जी अपनी  इच्छानुसार ले सकते थे। अगस्त्य जी नीतिवान थे। उन्होंने विचार किया कि अगर वे  राजा से कुछ लेते तो  दूसरों को उससे वंचित होना पड़ेगा। उन्होंने श्रुतर्वा से कहा कि इस स्थिति में वे उससे कुछ नहीं ले सकते थे। 

उन्होंने श्रुतर्वा से राजा बृहदस्थ के पास चलने को कहा। लेकिन राजा बृहदस्थ के पास भी देने लायक़ अतिरिक्त धन नहीं था। शायद, राजा त्रसदस्यु कुछ सहायता कर सकें। अतः वे सब उनके पास चल पड़े। लेकिन जब वे लोग राजा त्रसदस्यु के यहाँ पहुँचे तो राजा त्रसदस्यु भी उनको धन देने में असमर्थ रहे। तीनों राजा एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। अन्त में उन्होंने समवेत स्वर में कहा कि यहाँ इल्वल नामक एक असुर रहता है, जिसके पास अथाह धन है। आइये, हम उसके पास चलें। 

अगस्त्य तीनों राजाओं के साथ इल्वल के साम्राज्य में पहुँचे, वह उनके स्वागत के लिए तैयार बैठा था। आइये, आप सबका स्वागत है। मैंने आपके लिए विशेष भोजन तैयार करवाया है। तीनों राजाओं को आशंका हुई। हमें अगस्त्य मुनि को सावधान कर देना चाहिए। जब उन्होंने ॠषि को बताया तो ॠषि ने कहा चिन्ता मत करो। मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा। अगस्त्य ने ललभोजन शुरू किया।  जब ॠषि अगस्त्य ने अन्तिम कौर ग्रहण किया तो इल्वल ने वातापि को आवाज़ दी। वातापि बाहर आओ। महर्षि अगस्त्य ने कहा- अब वह कैसे बाहर आ सकता है? मैं तो उसे खाकर पचा भी गया, । 

इल्वल ने अपनी हार स्वीकार कर ली। आपका किस उद्देश्य से आना हुआ? मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? हमें पता है कि तुम बड़े धनवान हो। इन राजाओं को और मुझे धन चाहिए। औरों को वंचित किए बिना जो भी दे सकते हो, हमें दे दो। इल्वल पल भर को चुप रहा। फिर उसने कहा कि मैं हर एक राजा को दस-दस हज़ार गायें और उतनी ही मुहरें दूँगा और अगस्त्य ॠषि को बीस हज़ार गायें और उतनी ही मुहरें दूँगा। इसके अलावा मैं उनकी सेवा में अपना सोने का रथ और घोड़े भी अर्पित कर दूँगा। आप ये सारी वस्तुएँ स्वीकार करें। इल्वल के घोड़े धरती पर वायु-वेग से दौड़ते थे। वे लोग पल-भर में ही ॠषि अगस्त्य के आश्रम पहुँच गये। ॠषि अगस्त्य लोपामुद्रा के पास गये और कहा कि लोपामुद्रा, जो तुम चाहती थीं, वह मैं ले आया। अब हम तुम्हारी इच्छानुसार जीवन बिताएँगे। कई वर्षों बाद लोपामुद्रा ने एक पुत्र को जन्म दिया और महृषि अगस्त ने अपने पूर्वजों को दिया हुआ वचन पूरा किया।

महर्षि अगस्त्य के भारतवर्ष में अनेक आश्रम हैं। इनमें से कुछ मुख्य आश्रम उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु में हैं। एक उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग नामक जिले के अगस्त मुनि नामक शहर में है। यहाँ  महर्षि ने तप किया था तथा आतापी-वातापी नामक दो असुरों का वध किया था। मुनि के आश्रम के स्थान पर वर्तमान में एक मन्दिर है। आसपास के अनेक गाँवों में मुनि जी की इष्टदेव के रूप में मान्यता है। इसके अतिरिक्त देश में अन्यत्र भी उनके आश्रम हैं। विंध्याचल पर्वत जो कि महर्षि का शिष्य था, का घमण्ड बहुत बढ़ गया था तथा उसने अपनी ऊँचाई बहुत बढ़ा दी जिसके कारण सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर पहुँचनी बन्द हो गई तथा प्राणियों में हाहाकार मच गया। सभी देवताओं ने महर्षि से अपने शिष्य को समझाने की प्रार्थना की। महर्षि ने विंध्याचल पर्वत से कहा कि उन्हें तप करने हेतु दक्षिण में जाना है, अतः उन्हें मार्ग दे। विंध्याचल महर्षि के चरणों में झुक गया, महर्षि ने उसे कहा कि वह उनके वापस आने तक झुका ही रहे तथा पर्वत को लाँघकर दक्षिण को चले गये। उसके पश्चात वहीं आश्रम बनाकर तप किया तथा वहीं रहने लगे।महर्षि अगस्त्य ने अपनी तपस्या से अनेक ऋचाओं के स्वरूपों का दर्शन किया था, इसलिये ये मन्त्र द्रष्टा ऋषि कहलाते हैं।

भगवान राम वन गमन के समय अगस्त्य ऋषि के आश्रम में भी गये थे। भगवान राम ने उन्हें दर्शन देकर उनका जीवन सफल किया था। मुनि सुतीक्ष्ण इन्हीं अगस्त्य ऋषि के शिष्य थे। 

अगस्त संहिता आदि अनेक ग्रन्थों का इन्होंने प्रणयन किया, जो तान्त्रिक साधकों के लिये महान् उपादेय है।    पुराणों में यह कथा आयी है कि महर्षि अगस्त्य की पत्नी महान पतिव्रता तथा श्री विद्या की आचार्य थीं, जो 'लोपामुद्रा' के नाम से विख्यात हैं। आगम-ग्रन्थों में इन दम्पत्ति की देवी साधना का विस्तार से वर्णन आया है। इस प्रकार के अनेक असम्भव कार्य महर्षि अगस्त्य ने अपनी मन्त्र शक्ति से सहज ही कर दिखाया और लोगों का कल्याण किया। भगवान श्रीराम वनगमन के समय इनके आश्रम पर पधारे थे। भगवान ने उनका ऋषि-जीवन कृतार्थ किया। भक्ति की प्रेम मूर्ति महामुनि सुतीक्ष्ण इन्हीं अगस्त्य जी के शिष्य थे। अगस्त्य संहिता आदि अनेक ग्रन्थों का इन्होंने प्रणयन किया, जो तान्त्रिक साधकों के लिये महान उपादेय है। सबसे महत्त्व की बात यह है कि महर्षि अगस्त्य ने अपनी तपस्या से अनेक ऋचाओं के स्वरूपों का दर्शन किया था, इसलिये ये 'मन्त्र द्रष्टा ऋषि' कहलाते हैं। ऋग्वेद के अनेक मन्त्र इनके द्वारा दृष्ट हैं। अब जब विद्युत के आविष्कार करने की बात उठती है तो ज्यादातर लोग सोचते हैं कि इसे महान विदेशी विश्वविख्यात वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रैंकलीन ने खोंजा, कुछ लोग सोचते हैं कि अंग्रेजी वैज्ञानिक विलियम गिलबर्ट या फिर थॉमस ब्राउनी या माइकल फैराडे ने किसकी खोंज की है लेकिन यह पूरा सच नहीं है। सच्चाई यह है कि जब सारा विश्व विद्युत यानी इलेक्ट्रिसिटी से अनजान था तब हजारों साल पहले हमारे भारत के महान ऋषि मुनियों में से एक महर्षि अगस्त्य   ने विद्युत का आविष्कार किया था, जिसके बारे में ऋषि  अगस्त्य ने अपने ‘अगस्त्य संहिता’ नामक ग्रंथ में भी लिखा है।

महर्षि अगस्त्य ने मिट्टी के बर्तन में तांबे की पट्टी (कॉपर सल्फेट), लकड़ी की गीली बुरादें, पारा (मरक्यूरी) तथा दस्ता लोष्ट (जिंक), के द्वारा बिजली का उत्पादन किया था जिसे आज के देसी विदेशी आधुनिक वैज्ञानिकों ने परीक्षण करके एकदम सही पाया।  प्राचीन ग्रथों के अनुसार महर्षि अगस्त्य सप्त ऋषियों में गिने जाते थे, इन्ही ऋषियों ने आसमान में उड़ने वाले गुब्बारें, पैराशूट, वायुयान, अंतरिक्ष यान भी बनाए थे। 

महर्षि अगस्त्य राजा दशरथ के राजगुरु थे। इनकी गणना सप्तर्षियों में की जाती है। महर्षि अगस्त्य को  मं‍त्रदृष्टा ऋषि कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने तपस्या काल में उन मंत्रों की शक्ति को देखा था।

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