Monday, September 23, 2019

‘हाउडी मोदी’ ने एनआरजी स्टेडियम में रचा इतिहास


  • ह्यूस्टन के मेगा शो में मोदी की कूटनीति का रहा जलवा
  • दुनिया ने देखी भारत की धमक
  • मोदी ने नाम लिये बगैर पाकिस्तान को चेताया
  • ट्रंप ने लिया इस्लामिक आतंकवाद से लड़ने का संकल्प
  • भारत के साथ आतंकवाद से लड़ने का किया वादा
  • मोदी के अनुरोध पर ट्रंप ने लगाया स्टेडियम का चक्कर



राजेश त्रिपाठी
   22 दिसंबर के दिन ह्यूस्टन के एनआरजी स्टेडियम में हाउडी मोदी कार्यक्रम ने एक ऐसा इतिहास रच दिया जो शायद अब तक का ऐसा सबसे कामयाब और यादगार कार्यक्रम बन गया। यह कार्यक्रम तो अमेरिका में रहनेवाले भारतीयों ने अपने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत में आयोजित किया था लेकिन इसमें अमेरिका जैसे सुपरपावर के राष्ट्रपति उपस्थिति चार चांद लगा गयी। यह पहला ऐसा कार्यक्रम था जो भारतीयों द्वारा अपने प्रधानमंत्री के स्वागत में आयोजित था और जिसमें अमेरिका के राष्ट्रपति भी शामिल हुए। याद नहीं आता इससे पहले किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के स्वागत में इतना बड़ा कार्यक्रम अमेरिका में आयोजित हुआ हो और उसमें वहां के राष्ट्रपति ने भी भाग लिया हो।
      कार्यक्रम की शुरुआत रंगारंग कार्यक्रम से हुई जिसमें भारतीय कलाओं के विविध रंग मंच पर जीवंत हो उठे। उसके बाद नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आगमन हुआ। दोनों एक-दूसरे से जिस गर्मजोशी से मिले वह अतुलनीय है। इसके बाद मोदी जी ने अंग्रेजी में ट्रंप का शानदार परिचय दिया और उनसे अनुरोध किया कि वे वहां उपस्थित प्रवासी भारतीयों की विशाल संख्या को संबोधित करें।
      ट्रंप ने उनका अनुरोध स्वीकार करते हुए पहले तो स्थानीय समस्याओं से निपटने में अपने प्रशासन की भूमिका का उल्लेख किया। उसके बाद भारत-अमरीका के मजबूत और सौहार्दपूर्ण रिश्तों पर प्रकाश डाला। अमरीका किस तरह आगे बढ़ रहा है उसका उल्लेख भी उन्होंने किया। अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव होनेवाले हैं इसलिए ट्रंप ने अपने भाषण में इसका भी खयाल रखा। ह्यूस्टन जिस काउंटी में पड़ता है वहां से ट्रंप पिछली बार हार गये थे। इस क्षेत्र में भारतीयों की संख्या अधिक है।  इसलिए अगर यह कहा जाये कि ट्रंप के इस कार्यक्रम में आने का एक सबब इन भारतीयों को रिझाना भी रहा हो तो अनुचित नहीं होगा। वैसे इस कार्यक्रम में ट्रंप को बार-बार नरेंद्र मोदी की तारीफ करते और माई बेस्ट फ्रेंडकहते सुना गया। उन्होंने एक बार यह भी कहा कि अगर मोदी बुलायें तो मैं भारत आ सकता हूं। बाद में मोदी ने ट्रंप को सपरिवार भारत आने का न्यौता भी दे डाला। अपने वक्तव्य में ट्रंप ने भारत और अमरीका के बीच, रक्षा, व्यवसाय व अन्य क्षेत्र में बढ़ते संबंधों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच निरंतर संबंध और भी प्रगाढ़ होते जा रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने बिना नाम लिये पाक को यह कह कर कड़ा संदेश दे दिया कि –हम भारत के साथ मिल कर इस्लामिक आतंकवाद से लड़ेंगे। हम अपनी सीमाओं की रक्षा करेंगे।
      इसके बाद ट्रंप ने मोदी का परिचय देते हुए उनसे अनुरोध किया कि वे वहां उपस्थित भारतीय अमरीकियों की विशाल संख्या को संबोधित करें।
      मोदी के मंच पर माइक संभालते ही 50 हजार की भीड़ के बीच से मोदी मोदी के स्वर से पूरा स्टेडियम गूंज उठा। भाजपा सरकार की ओर से किये गये कार्यों का मोदी जी ने विवरण दिया। स्वच्छ भारत अभियान, जन धन योजना, किसान बीमा योजना, आयुष्मान भारत व अपनी सरकार की दूसरी कल्याणकारी योजनाओं का जिक्र करने के बाद जब उन्होंने कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का जिक्र किया तो पूरे स्टेडियम में देर तालियों के स्वर गूंजते रहे। मोदी जी ने कहा कि लोकसभा में हमारा बहुमत है पर राज्यसभा में नहीं है। इसके बावजूद दोनों सदनों ने 370 को हटाये जाने के पक्ष में मत दिया। इसके बाद उन्होंने लोगों से अनुरोध किया जिन सदस्यों ने इस महत्वपूर्ण कार्य को संपन्न कराने में हमारी मदद की आप लोग खड़े होकर उनका अभिवादन करें। भीड़ ने तुरत उनके अनुरोध का पाल किया। इसके बाद उन्होंने फिर अनुरोध किया कि आंतकवाद के खिलाफ ट्रंप जिस मनोबल से लड़ रहे हैं उनका भी अभिवादन खड़े होकर कीजिए। भीड़ ने फिर उनके अनुरोध का पालन किया और स्टेडियम में देर तक तालियां गूंजती रहीं। इसके बाद पाकिस्तान का नाम लिये बगैर मोदी ने उस पर कूटनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक कर दी। उन्होंने कहा कि अमेरिका में 9/11 को न्यूयार्क और 26/11 को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के आतंकवादी कहां से आये थे, कौन इन्हें पालता है यह सारी दुनिया जानती है। अब आतंकियों और उन्हें पालनेवालों से निर्णायक लड़ाई का वक्त आ गया है। हाउडी मोदी कार्यक्रम का शीर्षक था। हाउडी शब्द अमरीका के पश्चिमी राज्यों में प्रयोग किया जाता है जो हाउयूडू (आप कैसे हैं) का संक्षिप्त रूप है। मोदी ने इसका अर्थ कई भारतीय भाषाओं में बता डाला जिसके दौरान खूब तालियां पिटीं। उन्होंने अपनी कविता की दो पंक्तियां भी सुनायीं जो इस तरह हैं-यह जो मुश्किलों का अंबार है। वही तो मेरे हौसलों की मीनार है।
      कार्यक्रम के पश्चात ट्रंप और मोदी गले मिले फिर मोदी ने उनका हाथ पकड़ कर आग्रह किया कि स्टेडियम का चक्कर लगाते हैं.। ट्रंप ने उनका आग्रह मान लिया और मोदी ने उनका हाथ ऊंचा किया और उनके साथ स्टेडियम का चक्कर लगाया इस बीच ट्रंप की सुरक्षा में लगे सीक्रेट सर्विस के जवानों और मोदी के साथ चलनेवाले सुरक्षा कर्मियों की हालत देखते बन रही थी। वे अपने-अपने नेताओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित थे उधर स्टेडियम में उपस्थित लोग इन दोनों की गहरी दोस्ती देख कर खुश हो रहे थे। इसके पहले अमरीका जैसे सुपर पावर देश के किसी नेता की ऐसी अतरंगता हमने तो नहीं देखी। अगर यह आपसी हितों के लिए भी है तो भी दोनो देशों के बीच बढ़ते संबंध प्रशंसनीय हैं।
कार्यक्रम से पहले मोदी मिले भारतीयों से
हाउडी मोदी कार्यक्रम शुरू होने से पहले मोदी अमेरिका में रह रहे भारतीयों के अलग-अलग समुदायों से मिले। इनमें सिख. दाउदी बोहरा, कश्मीरी पंडित आदि थे। सबसे भावुक पल तब आया जब वे कश्मीरी पंडितों के समूह से मिल रहे थे। वे लोग आर्टिकल 370 हटाये जाने से बेहद खुश थे। उनमें एक तो इतना भावुक हो गया कि उसकी आंखें भर आयीं और उसने खुशी से मोदी के हाथ चूम लिये।
 ऐतिहासिक कार्यक्रम
 एनआरजी स्टेडियम का यह कार्यक्रम कई मायने में ऐतिहासिक रहा। इसमें रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों को सेनेटर और ह्यूस्टन के मेयर के अलावा अन्य प्रमुख अधिकारी उपस्थित थे। मेयर ने मोदी को की आफ ह्यूस्टन देकर सम्मानित किया।
  यह तय है कि भारत की विपक्षी पार्टियां जिन्हें नरेंद्र मोदी के अच्छे काम तक से एलर्जी है वे इस कार्यक्रम की भी आलोचना करेंगे। हमारा उनसे यही अनुरोध है कि कृपया वह यह बताने का कष्ट करें कि क्या कभी अमेरिका जैसे सुपरपावर में किसी भारतीय प्रधानमंत्री या नेता को इतना सम्मान, इतना आदर मिला है जब वहां का राष्ट्रपति भी उस कार्यक्रम में आने को राजी हो गया हो जो किसी विदेशी प्रधानमंत्री के लिए आयोजित किया गया हो। विदेश में पहले भी कई बार मोदी जी को अच्छा सम्मान और अपार जनसमूह का प्यार मिला है। उस वक्त हमने दिमाग से पैदल कुछ लोगों को यहां तक कहते सुना था कि मोदी ने उन्हें खरीद लिया। तब ना चाहते हुए भी हमने उत्तर दिया था-अगर हमारा प्रधानमंत्री 50-60 हजार विदेशियों को खरीदने की कूवत रखता है तो इस पर भी हमे गर्व है।  विपक्षी नेता भी तो खरीद सकते हैं। वे विदेश जाते हैं तो एक पक्षी भी पास नहीं आता।
  अब इसमें खर्च हुई धनराशि पर भी तरहृ-तरह के कयास लगाये जायेंगे जबकि यह कार्यक्रम पूरी तरह से प्रवासी भारतीयों का था जो उन्होंने स्वयं हर्षोल्लास से आयोजित किया था। दरअसल हमारे देश में अभी किसी ना किसी कोने से तरह-तरह की साजिशें रची जा रही हैं। मोदी की कामयाबी, बढ़ती लोकप्रियता बहुतों के दिल में नश्तर-सी चुभ रही है। कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के बाद तो और हायतौबा मची है। पहले तो ताना मारते रहे कि दम है तो 370 हटा कर दिखाओ। अब हटा दिया तो परेशान हैं कि अब कश्मीर में गोली क्यों नहीं चलती, आतंकी हमला क्यों नहीं होता। वहां शांति है तो अब सबको अचानक वहां के पर्यटन की प्यास लगी है इससे पहले कश्मीर जाने की ललक नहीं थी। अचानक उभरे इस कश्मीर प्रेम के पीछे क्या है कोई भी आसानी से समझ सकता है।
      जो भी हो मोदी जी ने ह्यूस्टन में लोकप्रियता के जो झंडे गाड़ दिये हैं उसकी साक्षी सारी दुनिया बनी है। भारत की धमक दुनिया ने महसूस की। जाहिर है कुछ को अच्छा लगा होगा कुछ की नींद हराम हो गयी होगी।
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Monday, July 22, 2019

रुक्म जी की कविता


आज अचानक पुरानी फाइलों को पलटते हुए भैया की एक फाइल हाथ लग गयी। उसमें उनकी कुछ मुक्तछंद की कविताएं मिल गयीं जो मैंने पहले नहीं देखीं थीं। वे कुछ भी लिखते मुझे पढ़ाते जरूर थे। जाने क्यों उन्होंने इन कविताओं को चुपचाप फाइल में कैद कर दिया। इनमें एक कविता ऐसी है जिसमें वे अपनी जड़ों की तलाश करते महसूस होते हैं। सोचा, इसे सुधी पाठकों के सामने लाया जाये और उन्हें रुक्म त्रिपाठी के इस नये रूप से परिचित कराया जाये। प्रस्तुत हैं कविता-

मेरा नारा

रुक्म त्रिपाठी

अस्सी साल बाद
आया याद
अपना गांव
जिसके पूर्व में
पद्म-पुष्पों से सुरभित तालाब
पश्चिम में
कलकल  निनाद करती सरिता
ऊंचे टीले पर बसा
ब्राह्मणों का थोक
जहां जन्मा मुखिया का
प्रथम पुत्र
यानी मैं
किंतु दुर्भाग्य
शैशवावस्था में हो गया
मातृ-पितृविहीन
कुल-पुरोहित का कथन
विचित्र है विधि का विधान
मां-बाप पर भारी पड़ती है
मूल नक्षत्र में जन्मी संतान।
मां से अधिक चाहता मामा
तभी उसके रिश्ते में
जुड़ी होती हैं
दो मांएं
मा मा
जिसने इस अनाथ को
जतन से पाला
अस्सी साल बाद
अचानक याद आया
अपना गांव
जहां गड़ा अपना नारा*
जिसने मां के गर्भ मे
मुझे था पाला
सोचा उसे खोद लाऊं
स्मृति स्वरूप
कांच की मंजूषा में
जतन से सजाऊं।
गांव के टीले के नीचे
दलितों की बस्ती
जहां सुअर अगोरता मिला
उनका पालनहार
बूढ़ा दलित
जिसने बताया
बहुत पहले से
गांव के जन्मे
बच्चों का नारा
हंसिया से काटती थी
मेरी मां
अब वह नहीं है
आपका नारा भी
मां ने ही काटा होगा
उसे कहां गाड़ गयी
पता नहीं
सुन कर उस
देविस्वरूपा
दलित सेविका के प्रति
उठा मस्तक श्रद्धा से
 नत हो गया
और उच्च वर्णीय गर्व से भरा
मेरा ब्राह्मणत्व तिरोहित हो गया।
नारा*= गर्भनाल अंग्रेजी में जिसे प्लेसेंटा कहते हैं
भैया रुक्म त्रिपाठी (बायें) के साथ ब्लागर राजेश त्रिपाठी



Saturday, July 20, 2019

दिमाग से नहीं दिल लिखते थे नीरज


उनका एक-एक बोल सीधे दिल में उतर जाता था
राजेश त्रिपाठी
   नीरज जी जैसे गीतकार और जन-जन के कवि धरा पर बार-बार नहीं आते। नीरज यह नाम गीतों की दुनिया में ऐसे अमर हो गया कि उनका मूल नाम गोपाल प्रसाद गौण हो गया। उनके मूल नाम को भले ही गिने-चुने लोग जानते हों लेकिन सरस गीतों, भाव-भरी और सशक्त कविताओं के रचयिता नीरज से शायद ही कोई हिंदी साहित्य प्रेमी अपरिचित हो। गीतकार तो बहुत हैं लेकिन उनमें कुछ ही हैं जो पढ़ने-सुनने वालों से सीधे जुड़ पाते हैं। नीरज जब गीत गाते या अपनी कविताएं पढ़ते तो सुनने वालों से उनका सीधा तादाम्य होता था। मंत्रमुग्ध हो जाता था श्रोता उनके भाव,उनके सशक्त शब्द सुन कर क्योंकि नीरज दिमाग से नहीं दिल से लिखते थे। उनका एक-एक शब्द सुनने वालों के दिल में उतर जाता था।
     नीरज का जीवन खुली किताब था, कुछ भी ढंका-छिपा नहीं रहा इसलिए उनसे जुड़ी हर अच्छी-बुरी चीजें बाहर आती रहीं। इस प्रसंग में विस्तार से न जाते हुए खुद उन्हीं के शब्दों में इस बारे में कहें जो स्वीकारोक्ति ही लगते हैं-
इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में।
लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में ।।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर।
ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में।।
     नीरज समानता, समरसता के हामी थे। वे चाहते थे कि विकास का उजाला जन-जन तक पहुंचे। धरा का कोई भी कोना अंधेरा न रह जाये। इन सार्थक भावों को समेटे उनका गीत प्रस्तुत है-
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहां रोज आए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेगे तभी यह अंधेरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए
नीरज का कवि हृदय में जमाने में व्याप्त विषमता, जाति, वर्ग को लेकर दिनों-दिन बढ़ते अंतर, विद्वेष से भीतर तक मर्माहत था। मानव-मानव में भेद को कवि बरदाश्त नहीं कर पा रहा था इसीलिए उसका दिल बड़ी अकुलाहट, बड़ी बेचैनी से कह उठता है-
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए। 
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए। 
आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहां जाके नहाया जाए। 
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अंधेरे को उजाले में बुलाया जाए। 
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए। 

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आंसू तेरी पलकों से उठाया जाए।
  नीरज के बारे में जितना कुछ कहा-लिखा जाये वे जग के हर उपमान से बड़े थे क्योंकि वे यथार्थ के धरातल पे खड़े थे। उनके शब्द उनकी मुकम्मल पहचान होते थे और कवि सम्मेलनों में उनका होना सुकून का सबब बनता था। श्रोता उन्हें सुन धन्य होता था क्योंकि उनकी कविता उसके दिल, उसके एहसास पर गहरा असर छोड़ती थी। एक लेख में उनके महान व्यक्तित्व को समेटना आसान नहीं, यह तो सूरज को दीपक दिखाने के समान है।
     अब उनके फिल्मी गीतकार के रूप में मशहूर होने के प्रसंग में आते हैं। मेरे बड़े भाई साहब स्वर्गीय रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म कोलकाता के हिंदी पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े लोगों में जाना-पहचाना नाम था। उन्होंने प्रसिद्ध हिंदी दैनिक सन्मार्ग में रहते हुए कुछ पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। इनमें कुछ फिल्मी पत्र-पत्रिकाएं भी थीं जिनके लिए उनको अक्सर बंबई (अब मुंबई) जाना पड़ता था। इस क्रम में अशोक कुमार, राज कपूर, धर्मेंद्र ( जो उनको गुरु जी कहते थे और जिन्हें भैया ने उनका पहला सचिव दीनानाथ शास्त्री दिया था), दिलीप कुमार, भारत भूषण (बैजू बावरा फेम), हसरत जयपुरी, देव आनंद, मनोज कुमार व अन्य से उनका परिचय था। उन्होंने नीरज जी से जुड़ा एक संस्मरण मुझे सुनाया जो मैं यहां प्रस्तुत करता हूं- भैया किसी एक निर्माता (नाम जानते हुए भी देना नहीं चाहता) के कार्यालय में गये। उन्होंने देखा कि नीरज जी बाहर सोफे पर बैठे हैं।
 भैया ने उनको नमस्कार किया और पूछा-नीरज जी आप यहां?’
  नीरज जी बोले-हां, निर्माता से मिलने आया हूं। भीतर विजिटिंग कार्ड भेजा है, कोई जवाब नहीं आया।
        निर्माता भैया के परिचित थे। उन्होंने भीतर जाकर उनसे कहा-अरे भाई आपने जिनको बाहर बैठा रखा है वे हिंदी के महान गीतकार हैं। उन्हें तुरत अंदर बुलाइए।
        निर्माता को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने तुरंत नीरज जी को अंदर बुलाया। बाद में फिल्म पहचान के टाइटिल सांग पैसे की पहचान यहां इनसान की कीमत कोई नहीं बच के निकल जा इस बस्ती में करता मुहब्बत कोई नहीं में नीरज जी ने अपने उस उपेक्षा की शिकायत की जो बहुत से मशहूरो-मारूफ लोगों को उनके हाथों झेलने पड़ती है जिनका साहित्य से कोई नाता नहीं और जो सस्ते, सतही, फूहड़ गाने ही पसंद करते और फिल्मों में भरते हैं।
     फिल्मी गीतों को जो ऊंचाई शकील बदायूंनी, कैफी आजमी, शैलेंद्र, गुलजार,इंदीवर जैसे गीतकारों ने दी वह अब जावेद अख्तर के अलावा किसी और में नहीं दिखती। फिल्मी गीतों के गिरते स्तर के बारे में एक बार प्रसिद्ध गीतकार इंदीवर ( अब स्वर्गीय) से चर्चा हुई। यहां यह बताना अप्रासंगिक न होगा कि श्यामलाल बाबू राय यानी इंदीवर मेरे बांदा जिले के पड़ोसी जिले झांसी के थे।  फिल्म सरस्वतीचंद्र के गीत चंदन सा बदन, चंचल चितवन  लिखनेवाले इंदीवर जब झोपड़ी में चारपाई जैसा सस्ता, फूहड़, निम्न कोटि का गीत लिखते हैं तो मेरे जैसे व्यक्ति को जो चंदन सा बदन लिखनेवाले इंदीवर का भक्त था, गहरी चोट पहुंचती है। इंदीवर जी एक फिल्म (जो बनी नहीं, मुहूर्त तक ही सिमट कर  रह गयी) के गीत लिखने कोलकाता आये थे। मुहूर्त कवरेज के लिए मैं भी गया था। उनसे भेंट हुई तो मैंने  शिकायती लहजे में कहा-क्या इंदीवर जी चंदन सा बदन लिखनेवाला लेखक इतनी नीचे उतर गया झोपड़ी में चारपाई यह साहित्य का कौन-सा उत्कर्ष है।
        उन्होंने जो उत्तर दिया वह दिल का दुख और गहरा कर गया। उन्होंने कहा-भैया ऐसा पेट की खातिर करना पड़ा। अब कोई भी चंदन सा बदन नहीं  लिखाना चाहता। ऐसे सस्ते, फूहड़ गानों का दौर है, न लिखें तो भूखों मरें।
        उनका जवाब सुन कर मैं स्तब्ध रह गया। मेरे सवाल का जवाब मुझे मिल गया था। इस प्रसंग को लिखने का एक ही मतलब था कि फिल्मी दुनिया में अब साहित्यकारों की कोई इज्जत नहीं। वैसे दृष्टांत है कि अतीत में भी कई बड़े-बड़े साहित्याकारों का जिन्होंने फिल्मों की ओर रुख किया था जल्द ही मोहभंग  हो गया।
     यह जरूर है कि नीरज जी जब फिल्मी दुनिया में गये तो छा गये। उनका एक-एक गीत हिट हुआ। सुना है कि फिल्मों में उन्हें लाने का श्रेय देव आनंद को जाता है। उनकी फिल्म प्रेम पुजारी में उन्होंने शानदार गीत लिखा रंगीला रे तेरे रंग में क्यूं रंगा है मेरा मन जिसे सचिन देव बर्मन ने संगीत से सजाया और लता मंगेशकर ने गाया था बहुत हिट हुआ। वैसे फिल्म नयी उमर की नयी फसल के गीत कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे को जितनी तारीफ मिली शायद ही किसी गीत को मिली हो। इस गीत का एक-एक बंद जिंदगी का आईना है जिसमें उभरते अक्स किसी के भी हो सकते हैं। इसकी स्थितियां बहुत ही जानी-पहचानी लगती हैं और यह गीत सीधे दिल में उतरता है।
          नीरज के लिखे हर फिल्मी गीत में उनकी अपनी अलग पहचान थी। चाहे वह कन्यादान फिल्म का लिखे जो खत तुझे हो या शोखिय़ों में घोला जाये फूलों का शवाब (फिल्म प्रेमपुजारी) या कहता है जोकर सारा जमाना (मेरा नाम जोकर) या इसी फिल्म का ये भाई जरा देख के चलो गीत दोनों ही प्रासंगिक, कथानक से ओतप्रोत जुड़े और जीवन के ऊंच-नीच की कहानी कहते सार्थक गीत हैं।
     नीरज जी का व्यक्तित्व अथाह सागर है जिसमें अवगाहन करना हम जैसे अकिंचन के लिए आसान नहीं। उनके बारे में जो जाना-सुना उसके आधार पर उनके व्यक्तित्व का एक खाका खींचने की कोशिश की। जानता हूं बहुत कुछ छूट गया होगा क्योंकि नीरज जी के जीवन को शब्दों में समेटना आसान नहीं।


Tuesday, June 18, 2019

पश्चिम बंगाल के महामहिम को संगीतमय सत्यनाराण व्रत कथा का समर्पण


राममंदिर का सभागार महामहिम के गीतों का सुर-संसार ।
ओमप्रकाश मिश्र जी के स्वर में मंत्रमुग्ध रहा पूरा सभागार ।।
केशरीनाथ त्रिपाठी जी के संवेदना भरे गीत अंतरतम तक जाते।
कर्ण रंध्र से दिल को छूते जग का कितना कुछ कह जाते ।।
इन गीतों के सरस रसों का हमने भी मन से रसपान किया।
जग में मानव का धर्म है क्या ऐसी चीजों का भी ज्ञान लिया।।
इस पुनीत अवसर पर अकिंचन को एक अवसर मिल। पुनीत ।
महामहिम के करकमलों में किया समर्पित सत्यानाराण गीत।।
संगीतमय सत्यनारायण कथा देवाशीष से गयी गीत में ढाली।।
उन्हीं क्षणों के साक्षी चित्र अनुभूति ये अतुलनीय सुख देने वाली।।
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यहां के चित्रों में कोलकता के.राममंदिर के सभागार में मैं (राजेश त्रिपाठी) महामहिम राज्यपाल मान्यवर श्री केशरीनाथ त्रिपाठी जी, परमादरणीय भाई प्रेमशंकर जी त्रिपाठी और मेरे प्रिय भाई और सन्मार्ग में मेरे साथी भाई ओमप्रकाश जी के साथ । यह संगीतमय संपूर्ण सत्यनारायण कथा (जिसे गाया है उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के प्रख्यात गायक पंडित चंद्रभूषण पाठक ने ) यूट्यूब में उपलब्ध है। इसे संगीतमय रूप देने में झांसी के कन्हैया कैसेट के मालिक भाई दीपक सेठ का बड़ा सहयोग रहा जिन्होंने इस काम  को व्यक्तिगत रुचि लेकर किया । नीचे के लिंक को क्लिक कर आप इसे सुन सकते हैं


Tuesday, January 15, 2019

संगीतमय सत्यनाराण व्रत कथा राधेश्याम तर्ज

अपनों से विनम्र निवेदन

गुरुजनों, बंधुजनों, प्रियजनों, विद्वदजनों आज मकर संक्राति पर्व के पावन अवसर पर आपको एक शुभ संदेश देने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा। सत्यदेव की कृपा, जगन्नियंता की महती अनुकंपा से आज मेरी एक अभिलाषा पूर्ण हुई। यह प्रभु की ही कृपा थी कि उन्होंने एक भगीरथ कार्य का संपादन मुझ दास से कराने की कृपा की वह है सत्यनारायण व्रत कथा के संपूर्ण पांच अध्यायों का राधेश्याम तर्ज में पद्यानुवाद। इस कार्य में मुझे अपने भैया और गुरु दिवंगत रामखिलावन त्रिपाठी 'रुक्म' का प्रोत्साहन और सहयोग मिला जिसके बिना शायद ही यह कार्य संपन्न हो पाता। मैं हृदय से आभारी हूं कन्हैया कैसेट झांसी के मालिक भाई श्री दीपक सेठ जी का जिन्होंने इस कथा को गीत-संगीत के रूप में प्रस्तुत करने का
श्रेयष्कर कार्य किया। आज यह कथा जिस संगीतमय मधुर रूप में आपके सामने है उसका सारा श्रेय दीपक भाई को जाता है। उन्होंने अपने स्टूडियो में न सिर्फ इसके लिए विशेष सेट बनाये अपितु व्यक्तिगत रुचि लेकर इसे तैयार किया। मैं इसके लिए आजीवन उनका आभारी रहूंगा। मेरा सपना था कि इसे प्रख्यात संगीतमय कथा वाचक, भजनों के सरस गायक, बुंदेली गौरव पंडित चंद्रभूषण पाठक जी अपना सशक्त स्वर प्रदान करें। पंडित जी ने मेरा आग्रह स्वीकार किया और तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद मेरे लिए समय निकाला और अपने ओजपूर्ण स्वर से इस रचना को अमर कर दिया। उनके चरणों में श्रद्धा सहित प्रणाम। मुझ पर इस कृपा के लिए मैं जीवन भर उनका आभारी रहूंगा। धन्यवाद चंद्रभूषण पाठक जी। यहां मैं सन्मार्ग के संपादक रहे भाई श्री हरिराम जी पांडेय को याद करना कैसे भूल सकता हूं जिन्होंने यह काम करने का सुझाव दिया । पांडेय जी आपको भी धन्यवाद। कथा पांच भागों में है, यहां सभी लिंक दे रहा हूं। कृपया भक्ति भाव से सुनिए और मुझे आशीष दीजिए।
प्रेम और श्रद्धा से बोलिए सत्यनारायण भगवान की जय

Thursday, January 3, 2019

iगीत



हाथ खाली हैं बिटिया सयानी हो गयी
राजेश त्रिपाठी

मुश्किलें हैं और जाने कितने अजाब हैं।
जिंदगी की बस इतनी कहानी हो गयी।।
अधूरे रह गये जाने कितने ख्वाब  हैं।
मुश्किलों के हवाले जिंदगानी हो गयी।
दर्द कौन पढ़ सकता है उस शख्स का।
हाथ खाली है, बिटिया सयानी हो गयी।।
सियासत की चालों का है ऐसा असर।
हर गली कुरुक्षेत्र की कहानी हो गयी।।
नफरतों  के  गर्त में है अब जिंदगी ।
अमन तो अब बीती  कहानी हो गयी।
तरक्की का ढोल तो सब पीट रहे हैं ।
पर बद से बदतर जिंदगानी हो गयी।।
बढ़ रहे हैं अब दिलों के बीच फासले।
एकजहती तो अब  बेमानी हो गयी।।
दिल में नफरत, हाथ में खंजर जहां।
अमन की बात इक कहानी हो गयी।।