Wednesday, November 30, 2022

एस पी सिंह और एम जे अकबर की जोड़ी ने किया कमाल

 आत्मकथा-47





  आनंद बाजार प्रकाशन के साप्ताहिक रविवार के आने से हिंदी पत्रिकारिता में नये तेवर आये। को छोड़ दें तो बाकी ठकुरसुहाती में लिप्त थीं। साप्ताहिक हिंदी पत्रिका रविवार ने सच को सच की तरह कहने की हिम्मत दिखाई और कुछ अंकों के बाद ही पाठकों में लोकप्रिय हो गयी। लोगों को उसके हर अंक की बेसब्री से प्रतीक्षा रहती।  धीरे-धीरे संपादकीय विभाग के हम सारे लोगों के बीच अपरिचय के आवरण हट गये। सबका परिचय सामने आया। सुदीप जी का पूरा नाम था गुलशन कुमार सुदीप उनका उपनाम या कहें पेन नेम था और वे उसी नाम से जाने-पहचाने जाते रहे। वे अच्छे कथाकार थे और कई फिल्मों की स्क्रिप्ट भी लिख चुके थे। वे प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका सारिका से आये थे। उन्होंने विख्यात साहित्यकार कमलेश्वर के साथ काम किया था।

प्रारंभ में काफी अरसे तक रविवार के संपादक के रूप में एम. जे. अकबर का नाम छपता था। हालांकि पत्रिका का सारा काम हमारे एस.पी. यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह देखते थे। उन्हें हम लोग कुछ दिनों में ही एसपी दा पुकारने लगे थे। अकबर साहब का पूरा नाम मोबाशेर जावेद अकबर था। अकबर साहब और एस.पी. दोनों मुंबई में टाइम्स ग्रुप से आये थे। अकबर अंग्रेजी और एस.पी सिंह धर्मयुग और माधुरी में काम कर चुके थे। अकबर और एस पी दोनों कोलकाता के उपनगरों से आये थे। एस.पी. गारुलिया से और अकबर गरुलिया के पास से बहनेवाली हुगली नदी जो कि गंगा की ही एक धारा है। उसकी एक धारा अब के बांग्लादेश की ओर मुड़ गयी है जिसका नाम पद्मा पड़ा है। गारुलिया के पास से बहती हुगली नदी के उस पर एक उपनगर चंदननगर है। एम. जे. अकबर  और उनका परिवार रहता था। एसी पी और अकबर साहब के परिवारों में भी आपस में अच्छी जान-पहचान थी। हमारे एसपी दा के पिता जगन्नाथ सिंह गारुलिया क्षेत्र के नामी-गिरामी लोगों में थे।

एस पी दा के बारे में हमने सुन रखा था कि वे बहुत खुले दिमाग के और अपनी बात को पुख्ता ढंग से और साहस के साथ रखने के लिए प्रसिद्ध थे। उनके बारे में यह प्रसिद्ध था कि उन्होंने धर्मयुग में काम करते वक्त वहां साथियों में अच्छी धाक जमा ली थी। धर्मयुग तत्कालीन संपादक डाक्टर धर्मवीर भारती जब तक कार्यालय में रहते प्राय: सन्नाटा छाया रहता। कहते हैं एक बार किसी बात पर एस पी सिंह जी ने किसी बात पर उन्मुक्त ठहाका लगाया। वे यह देख कर हैरान थे कि संपादकीय विभाग से सभी साथियों ने हंसने में उनका साथ नहीं दिया इसके अलावा उन लोगों के चेहरे पर एक अनोखे भय की छाप उभर आयी।

 ए, पी सिंह ने पूछा-अरे भाई मैंने तो हंसने की बात की तुम लोगों के चेहरे पर मुर्दनी क्यों छा गयी।

 लोगों ने धीरे से कहा इस तरह ठहाका लगाने से चैम्बर (धर्मवीर भारती) नाराज हो जायेंगे।

इसके बाद एस पी ने फिर एक जोरदार ठहाका लगाया और कहा-मै विष्णुकांत शास्त्री जी का छात्र रहा हुं जिनका कहना था कि –जो करो उन्मुक्त मन से करो। हंसना गुनाह कब से होने लगा।

हमारे एक साथी राजकिशोर हावड़ा से आते थे। समाजवादी विचारधारा के थे और अच्छे लेखक थे।

 मणि मधुकर राजस्थानी थे। वे अच्छे कवि और ज्योतिष के भी ज्ञाता थे। उनकी नाटकों आदि में भी रुचि थी।

प्रारंभ में इसी टीम को लेकर शुरुआत हुई थी। ध्येय यही था कि ऐसी साहसिक पत्रिका की शुरुआत की जाये जो हिम्मत के साथ सच को कहने का माद्दा रखती हो। हम उससे जुड़े थे इसलिए नहीं कहते रविवार के पाठक रहे व्यक्ति भी स्वीकार करेंगे कि रविवार सदा अपनी इस भूमिका में खरा उतरा। कुछ अरसा बाद ही स्थिति यह हो गयी थी कि राज्यों की विधानसभाओं में रविवार किसी घोटाले या घटना के बारे में विधानसभाओं में प्रमाण के तौर पर रविवार के अंक दिखाये जाने लगे थे जिसमें उन घोटालों की ऱबर छपी होती थी।

यहां यह बता दें कि साल पूरा होते-होते रविवार से नेता खौफ खाने लगे थे। वे रविवार के पत्रकारों से बातें करते वक्त बहुत सावधानी बरतते थे कि कहीं वे अपनी बातों से अपनी सरकार को ही मुसीबत में ना डाल दें। इसके उलट जो विपक्षी नेता होते थे वे रविवार को सरकारी घोटाले की सारी जानकारी दे देते थे वह भी डाक्युमेंट के साथ।

हमारे कार्यालय में एक कानूनी विभाग था जिसके प्रमुख थे विजित बसु। वे कानून के अच्छे जानकार थे। जब कभी ऐसी रिपोर्ट दूसरे राज्यों के प्रतिनिथि भेजते जिनमें मामला होने का संदेह होता उसे विजित दा को पढ़ा लिया जाता था। वे उससे संबंधित जो भी डाक्युमेंट आवश्यक होते वे मंगा लिये जाते थे। उसके बाद अगर कोई मामला होता तो विजित दा आकर एस पी से बोलते-एस पी मामला कर दिया है, हम लोग लडेगे मजा आयेगा। अच्छा हुआ हमारे रिपोर्टर ने सारे संबंधित डक्युनेंट भेज दिये थे।

 कभी यह नहीं देखा ,कि पत्रिका की किसी रिपोर्ट पर मामला हुआ हो और लोगों के हाथ-पैर फूल गये होंष रविवार हर मामला जीतता था। एक साल गुजरते गुजरते वह देश की व्यवस्था विरोधी पत्रिका के रूप में ख्यात हो गया था। व्यवस्था जहां-जहां जनास्थाओं से विमुख हुई वहां-वहां रविवार उस पर सवाल उठाने से नहीं हिचकिचाया। (क्रमश:)

 



 

Thursday, October 27, 2022

प्रतीक्षा की घड़ियां बीतीं, मेरे हाथों में आया अप्वाइंटमेंट लेटर

 आत्मकथा-45


इंटरव्यू तो अच्छा हुआ था मैं बेसब्री से आनंद बाजार प्रकाशन के अप्वाइंटमेंट लेटर की प्रतीक्षा कर रहा था। जब इंटरव्यू के दौरान सुरेंद्र प्रताप सिंह जी ने सन्मार्ग में धारावाहिक छपने वाली मेरी शृंखला संजय का जीवन बाल्यकाल से अब तक के प्रति आग्रह दिखाया था और उसके बारे में विस्तार से जानना था इसी से मैं इंटरव्यू के बारे में सकारात्मक रुख रख रहा था। उस दिन इंटरव्यू के अंतिम वाक्य इंटरव्यू लेने वालों से आये थे। वह थे-जाइए चिट्ठी जायेगी।

 और एक दिन सचमुच चिट्ठी यानी अप्वाइंटमेंट लेटर आ गया। मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा। मैंने सबसे पहले अपने पूज्य बड़े भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म जी के हाथों में अप्रवायंटमेंट लेटर रख कर उन्हें प्रणाम किया और बोला-मेरे इस उत्कर्ष का श्रेय आपको जाता है। आप लिखना ना सिखाते तो मैं कुछ कर ही नहीं पाता। आपने ही विश्वास दिलाया कि व्यक्ति अगर दृढ़् निश्चय कर ले तो वह मनचाही मंजिल एक ना एक दिन पा ही लेता है। भैयाा ने कहा-इस मुकाम तक पहुंचने की राह में जिसने जितनी भी मदद की हो उसको धन्यवाद देना ना भूलना। कल ही रामअवतार गुप्त जी से सन्मार्ग में मिल कर उन्हें प्रणाम करना और उनको धन्यवाद देना।सन्मार्ग के अन्य सदस्यों को भी धन्यवाद देना। उन्होंने तुम्हें ऐसा परिवेश दिया कि तुम वहां टिक कर सहजता से बहुत कुछ सीख पाये। हां तुम्हारी ज्वाइनिंग डेट करीब है। स्क्रीन साप्ताहिक के लिए महावीर प्रसाद से कल ही कह देना कि अब तुम उन्हें समय नहीं दे पाओगे वे कोई अन्य व्यक्ति खोज लें।

मैंने सिर हिला कर भैया की बात पर हामी भर ली।

दूसरे दिन सन्मार्ग कार्यालय पहुंचते ही मैंने पता किया कि संपादक रामअवतार गुप्त जी आ गये या नहीं। चपरासी ने बताया-बाबू जी आ गये हैं। अकेले हैं, अभी मिल लीजिए फिर मिलने वालों का तांता लग जायेगा आपको मौका नहीं मिलेगा।

 चपरासी की बात सुन कर मैंे सीधे रामअवतर गुप्त जी के चेंबर में पहुंच कर दरवाजा खटका कर पूछा-सर आ सकता हूं।

 गुप्त जी मेरी आवाज पहचानते थे। अंदर से आवाज आयी-आ जाइए राजेश जी।

 मैंने अंदर जाकर हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया।

गुप्त जी ने कहा-बैठिए राजेश जी।

रामअवतार गुप्त जी
मैं बैठ गया और हाथ जोड़ते हुए कहा-सर आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे अपने यहां सीखने का अवसर दिया। आप बड़ों के आशीर्वाद से मुझे आनंद बाजार प्रकाशन जैसे बड़े संस्थान में नौकरी मिल गयी है। वहां से हिंदी साप्ताहिक पत्रिका रविवार में काम मिल गया है। मैंने सबसे पहले आपसे ही आशीर्वाद लेना चाहा क्योंकि आप मेरे लिए सिर्फ मालिक ही नहीं मेरे लिए अपने बड़े के समान है। आपका आशीर्वाद मेरे कार्यक्षेत्र के लिए सहायक साबित होंगे।

 मैंने देखा मेरे शब्दों को सुन कर गुप्त जी के चेहरे पर एक चमक और मुसकान उभर आयी। उन्होंने कहा-मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि आपको एक बड़े संस्थान में काम करने का अवसर मिला।

 इतना कह कर उन्होंने चपरासी को बुलाने के लिए घंटी बजायी।

चपरासी आया तो गुप्त जी बोले –जरा गुणानंद मिश्र जी को भेजो।

गुणानंद मिश्र जी सन्मार्ग में लिखनेवालों को पारितोषिक दिया करते थे तब पारिश्रिमक का चलन नहीं था।

 गुणानंद जी आये और गुप्त जी को प्रणाम कर बोले-जी सर।

 गुप्त जी ने कहा कि पहले तो एक अच्छी खबर सुन लीजिए, हमारे राजेश जी को आनंद बाजार संस्थान में काम मिल गया है।

 इतना सुनते ही गुणानंद जी ने बधाई दी। मैंने प्रणाम कर कहा-बधाई शिरोधार्य पर आप बड़ों के आशीर्वाद भी चाहिए।

 उन्होंने कहा- बहुत बहुत आशीर्वाद।

 अब गुप्त जी मिश्र जी से बोले- राजेश जी ने संजय का जीवन बाल्यकाल से अब तक शृंखला लिखने में काफी मेहनत की है। इन्हें पारितोषिक नहीं पारिश्रमिक दिया जाये हर किश्त के बारह रुपये। अभी बना दीजिए ये लेकर जायेंगे। कल से ये सन्मार्ग नहीं आयेंगे।

 गुणानंद जी सर बोल कर चले गये।

 उनके जाने के बाद गुप्त जी बोले-राजेश जी आप पहले व्यक्ति हैं जो सन्मार्ग छोडते वक्त मेरा और सन्मार्ग  संस्थान का आभार जता रहे हैं वरना यहां से जो भी निकल कर जाता है मेरी निंदा ही करता है।

  मैंने कहा-सर मैं इतना कृतघ्न नहीं कि उस संस्थान वहां के कर्ता-धर्ता की निंदा करूं जिसने मुझे अपने यहां सीखने का मौका दिया।

इसके बाद मैं गुप्त जी के केबिन से बाहर निकल आया।

संपादकीय विभाग में आकर सभी वरिष्ठों को अपनी नयी नौकरी के बारे में सूचित किया। सभी ने प्रसन्नता जतायी और मेरे उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीर्वाद दिया।

 इसके बाद मैं सन्मार्ग के तत्कालीन समाचार संपादक तारकेश्वर पाठक जी के केबिन में गया और उनके चरण स्पर्श कर बोला-आशीर्वाद दीजिए, मुझे आनंद बाजार प्रकाशन की जल्द प्रकाशित होनेवाली हिंदी साप्ताहिक पत्रिका रविवार में काम मिल गया है। उन्होंने मुझे हृदय से लगा लिया और बोले –मुझे ऐसी खुशी हो रही है जैसे मेरा अपना भाई एक अच्छे संस्थान में नौकरी करने जा रहा है।

मैंने देखा खुशी से पाठक जी के नेत्र सजल हो गये थे।

*

सन्मार्ग से निकल कर मैंने स्क्रीन हिंदी साप्ताहिक के कार्यालय की राह पकड़ी जो पास ही था। वहां पहुंचा तो पाया कि मालिक महावीर प्रसाद पोद्दार प्रेस में ही मिल गये। उन्हें नम्स्कार कर आनंद बाजार में नौकरी पाने की खबर दी। यह खबर सुनते ही महावीर बाबू के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गयी।

वे बोले- अब स्क्रीन का क्या होगा।

इसे आत्मश्लाघा ना समझें मेरे स्र्क्रीन को संभालने के कुछ दिन बाद ही वहठीकठाक चलने लगी थी।

 मैंने कहा-लोगों की कमी नहीं है कोई ना कोई तो मिल ही जायेगा। अभी तो आप मेरे काम के लिए शुभकामनाएं दें।

महावीर बाबू ने बुझे मन से ही सही शुभकामना दी मैं घर लौट आया। जब से मुझे नयी नौकरी मिलने की खबर आयी थी पूरा परिवार खुश था। (क्रमश:)

 

 

Wednesday, October 26, 2022

ऋषि सुनक के ब्रिटिश पीएम बनने का भारत पर असर

 

ऋषि सुनक

भारतीय मूल के ऋषि सुनक ब्रिट्रिश के प्रधानमंत्री बन गये हैं। किंग चार्ल्स (तृतीय) द्वारा ऋषि सुनक को ब्रिटिश का नया प्रधानमंत्री घोषित किए जाने के बाद ऋषि सुनक 10 डाउनिंग स्ट्रीट पर पहुंच गये हैं। 10 डाउनिंग स्ट्रीट ब्रिटिश प्रधानमंत्री की आधिकारिक निवास है। वे ब्रिटेन के 57 वें प्रधानमंत्री हैं। ऋषि सुनक सोमवार 24 अक्टूबर को ही कंजरवेटिव पार्टी के नेता चुन लिये गये थे। इस तरह वह ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनने वाले भारतीय मूल के पहले सांसद बन गए हैं। सुनक को 190 से अधिक सांसदों का समर्थन मिला। वहीं उनकी विरोधी पेनी मोर्डंट 100 सांसदों का जरूरी समर्थन हासिल करने में भी नाकाम रहीं और प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर हो गयीं। समय का फेर देखिए जिन अंग्रेजों ने हमारे देश पर वर्षों तक राज किया आज उनका प्रधानमंत्री एक भारतीय मूल का व्यक्ति बना है।

पेनी मोर्डंट ने स्वयं ट्वीट कर के यह घोषणा दी कि वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर हो रही हैं। इसके साथ ही उन्होंने अपने इस ट्वीट में यह भी जोड़ा कि वे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के रूप में सुनक को समर्थन दे रही हैं।
ब्रिटेन के नए पीएम ऋषि सुनक ने देश को संबोधित करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। उनके इस भाषण में अर्थव्यवस्था में सुधार से लेकर जनता का विश्वास प्राप्त करने की बात शामिल थी। उन्होंने अपने संबोधन में और भी कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने कहा कि वे अगली पीढ़ी के लिए ऋण नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने अपने पहले संबोधन में यह भी कहा कि इस समय देश रूस यूक्रेन युद्ध और महामारी के कारण गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। कुछ गलतियां हुईं थीं जिनको ठीक करने के लिए उन्हें चुना गया है और इन गलतियों को ठीक करने का काम तुरंत शुरू होगा। आज हम जिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं उनसे निपटने का आप लोगों से वादा करता हूं। भारत के विकास कार्यों और प्रगति से वे काफी प्रभावित हैं और चाहते हैं कि ब्रिटेन भी इसी तरह विकास के पथ पर चले। उनके प्रधानमंत्री बनने से भारत और ब्रिटेन के आपसी संबंधों साथ ही व्यापारिक संबंधों में सुधार की उम्मीद है।
42 वर्षीय सुनक इससे पहले ब्रिट्रिश वित्त मंत्री रह चुके हैं। उन्होंने अपने संबोधन में यह बात भी कही कि उनकी सरकार ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण करेगी, जो ब्रेक्सिट के अवसरों का अधिकतम लाभ उठाये। ब्रेक्सिट ब्रिटेन और एक्जिट दो शब्दों से मिल कर बना है। यह ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर होने का परिचायक है। उन्होंने कहा कि इस समर्थन का मैं पूरी इमानदारी के साथ निर्वहन करते हुए आपके लिए कार्य करूंगा। भरोसा जीता जाता है और मैं आपका भरोसा जीतूंगा।
उन्होंने बेहतर स्कूल, सुरक्षित सड़कें, सीमाओं पर नियंत्रण, पर्यावरण की रक्षा, सशस्त्र बलों का समर्थन करने और अमीर-गरीब के बीच के खाई को कम करने की प्रतिज्ञा ली। उन्होंने कहा कि वे अपने देश को सिर्फ शब्दों से ही नहीं बल्कि कार्य के जरिए भी एकजुट रखूंगा। मैं अविश्वसनीय उपलब्धियों के लिए बोरिस जॉनसन का हमेशा आभारी रहूंगा।
यह उम्मीद की जा रही है कि सुनक के शपथ लेने के बाद भारत-ब्रिटेन के रिश्तों में मजबूती आने की आशा है। ऋषि सुनक शुरू से ही भारत के साथ मजबूत संबंध रखने के पक्षधर रहे हैं। भारत और ब्रिटेन में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर बातचीत चल रही है।
फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर भारत-ब्रिटेन में बात बन सकती है। प्रवासियों के वीजा पर भी दोनों देशो में हाल में ही प्रगति देखने को मिली है।
भारत के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि ऋषि सुनक भारत और ब्रिटेन के बीच अच्छे संबंधों के पक्षधर हैं। वे चाहते हैं कि ब्रिटेन भी भारत से सीखे।
सुनक जब ब्रिटेन के वित्त मंत्री थे तब उन्होंने कहा था कि ब्रिटेन का अवसरों पर एकछत्र राज नहीं है। भारत में भी विशाल अवसर हैं और हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि ब्रिटिश लोगों को भी भारत जाने की सुगमता हो, ताकि वे विश्व स्तरीय संस्थानों में पढ़ सकें और वहां के शानदार स्टार्टअप में काम कर सके।
सुनक निवेश बैंकर के रूप में काम करने के बाद राजनीति में आए हैं।
सुनक ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले संबोधन में कहा कि आज हम जिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, मैं उनसे उसी तरह सहानुभूतिपूर्ण तरीके से निपटने का प्रयास करूंगा। सुनक ब्रिटेन के पहले गैर श्वेत प्रधानमंत्री है जो यह जताता है कि आधुनिक ब्रिटेन विविधता का पक्षधर है। सुनक पांच सितंबर को कंजरवेटिव पार्टी की नेता लिज ट्रस से प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हार गए थे। हालांकि ट्रस ने 45 दिनों के बाद पद से इस्तीफा दे दिया।
कौन हैं ऋषि सुनक
भारतीय मूल के माता-पिता की संतान हैं सुनक। सुनक के माता-पिता सेवानिवृत्त डॉक्टर यशवीर और फार्मासिस्ट उषा सुनक हैं।1960 के दशक में केन्या से ब्रिटेन आए थे। सुनक का विवाह इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति की बेटी अक्षता मूर्ति से हुई है। सुनक दंपति की दो बेटियां हैं। सुनक का जन्म साउथेम्प्टन में हुआ था। सुनक के दादा-दादी भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान पैदा हुए थे, लेकिन उनका जन्मस्थान अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित गुजरांवाला में पड़ता है।
साल भर में ब्रिटेन के तीसरे प्रधानमंत्री हैं सुनक। पार्टीगेट प्रकरण के बाद बोरिस जॉनसन की 10 डाउनिंग स्ट्रीट(ब्रिटिश प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास) से विदाई और लिज ट्रस के मिनी-बजट की नाकामी के बाद सिर्फ सात सप्ताह के अंतराल पर तीसरे प्रधानमंत्री के रूप में, नए नेता को वैश्विक उथल-पुथल के दौर में अर्थव्यवस्था को बचाने और गहराई से विभाजित कंजरवेटिव पार्टी को एकजुट करने के कठिन कार्य का सामना करना है।
सुनक को ऐसे समय में सत्ता की कमान संभालने का मौका मिला है जब ब्रिटेन धीमी गति से विकास की तिहरी मार-उच्च मुद्रास्फीति, यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी और बजट की नाकामी के मुद्दे से जूझ रहा है।इसके चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की वित्तीय विश्वसनीयता को कमजोर हुई है। देश के पास अब कर दरों को बढ़ाने और खर्च में कटौती करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचा।में कटौती करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा, जो अलोकप्रिय होगा और इसके अप्रत्याशित राजनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं।
स्टैनफोर्ड और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के स्नातक सुनक 2015 में यॉर्कशायर के रिचमंड से सांसद चुने गए थे। वह वित्त मंत्रालय में कनिष्ठ पदों पर रहे और फिर वित्त मंत्री बने और जुलाई में पार्टी नेतृत्व के लिए ‘‘रेडी फॉर ऋषि’’ अभियान शुरू किया। सुनक ने ब्रिटेन के पहले गैर-श्वेत प्रधानमंत्री बनने के लिए दौड़ के बारे में एक सवाल पर कहा था-मैंने जो सबसे बड़ा त्याग किया है, वह यह है कि मैं पिछले कुछ वर्षों से एक बहुत खराब पति और पिता रहा हूं।
धर्मनिष्ठ हिंदू सुनक ने हाउस ऑफ कॉमन्स का सदस्य चुने जाने पर भगवद्गीता पर हाथ रख कर शपथ ली थी। अपने व्यस्त कार्यक्रमों के दौरान भी वह इस्कॉन मंदिर में दर्शन करने रहे। वह पहले ब्रिटिश चांसलर थे जिन्होंने इस पद पर रहते हुए अपने आधिकारिक निवास 11 डाउनिंग स्ट्रीट के द्वार पर दिवाली के अवसर पर दीया जलाया।
12 मई, 1980 को ब्रिटेन के साउथेम्प्टन में जन्में सुनक एमबीए हैं। वे धर्म से हिंदू और जाति से ब्राह्मण हैं। ऋषि सुनक के भाई संजय एक मनोवैज्ञानिक हैं, साथ ही उनकी बहन राखी विदेश, राष्ट्रमंडल और विकास कार्यालय में शांति निर्माण और संयुक्त राष्ट्र के लिए काम करती हैं।
ऋषि सुनक की प्रारंभिक शिक्षा विनचेस्टर कॉलेज में हुई। इसके बाद उन्होंने आगे की शिक्षा लिंकन कॉलेज ऑक्सफोर्ड से की। जहां उन्होंने राजनीति और अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने कंजर्वेटिव कैम्पेन मुख्यालय में इंटर्नशिप भी की। 2006 में उन्होंने स्टैनफोर्ड विश्वविधालय से एमबीए की डिग्री हासिल की।
ऋषि सुनक ने अपनी पहली नौकरी कैलिफोर्निया में स्थित एक अमेरिका निवेश बैंक में की जिसका नाम था गोल्डमैन सैक्स। इसमें उन्होंने बतौर विश्लेषक के रूप में काम किया। साल 2004 में उन्होंने हेज फंड मैनेजमेंट फर्म द चिल्ड्रन इन्वेस्टमेंट फंड मैनेजमेंट में भी काम किया। उसके बाद साल 2009 में नौकरी छोड़ दी। अक्टूबर 2010 में लगभग 536 मिलियन डॉलर के शुरूआती निवेश से फर्म शुरू की। जिसका नाम रखा थेलेम पार्टनर्स।
फिर 2013 में उन्हें और उनकी पत्नी को उनके ससुर ने निवेश फर्म कैटामारन वेंचर्स यूके लिमिटेड का निदेशक बनाया। जिसके बाद उन्होंने 30 अप्रैल 2015 को इस पद से इस्तीफा दे दिया।
ऋषि सुनक की उनकी पत्नी से पहली मुलाकात स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में हुई। जहां वो और उनकी पत्नी एमबीए की पढ़ाई कर रहे थे। उनकी पत्नी भारतीय अरबपति एनआर नारायण मूर्ति की बेटी हैं। साथ ही वो कटमरैन वेंचर्स के निदेशक के रूप में भी काम करती हैं। ऋषि सुनक और उनकी पत्नी नॉर्थ यॉर्कशायर के नॉर्थहेलर्टन के पास रहते हैं। जिनके साथ उनकी दो बेटियां भी रहती हैं।

ऋषि सुनक को सबसे ज्यादा फिट रहना, क्रिकेट और फुटबॉल खेलना बेहद पंसद है।
ऋषि सुनक को इंग्लैंड के सबसे अमीर लोगों में से एक हैं। ऋषि सुनक ने व्यापार और राजनीति में बहुत पैसा कमाया है। भारतीय रूपयो में इसकी बात करें तो ये करीबन 300 करोड़ के बराबर है।

ऋषि सुनक साल 2014 में पहली बार ब्रिटेन की संसद में कदम रखा। दरअसल जिस समय वो संसद में पहुंचे तब उस समय पूर्व सांसद विलियम हेग ने रिचमंड को चुनाव लड़ाने से इनकार कर दिया। जिसके बाद ऋषि सुनक ने रिचमंड की जगह ली और कंजर्वेटिव एमपी उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े।
साल 2015 में ऋषि सुनक ने चुनाव लड़ा और उसमे जीत हासिल की। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने 2015 से लेकर 2017 तक ब्रिटेन के पर्यावरण, खाद्य और ग्रामीण मामलों की चयन समिति में काम किया।
इसके बाद साल 2017 में ऋषि सुनक को भारी वोट मिले। जिसके बाद वे एक बार फिर सांसद के रूप में चुने गए।
24 जुलाई 2019 में उनके बेहतरीन काम को देख कर ब्रिटेन के पीएम बोरिस जॉनसन ने उन्हें ट्रेजरी के मुख्य सचिव के रूप में नियुक्त किया।
2019 में वे दोबारा एमपी के रूप में चुने गए और इस बार उन्हें भारी मत मिले। जिसके बाद वे तीसरी बार सांसद बने। अपनी प्रतिभा और कार्यशैली से वे आगे बढ़ते रहे। जिसके बाद 12 फरवरी 2020 को वो बोरिस जॉनसन के कैबिनेट में वित्त मंत्री के तौर पर नियुक्त हुए।
11 मार्च 2020 को उन्होंने अपना पहला बजट पेश किया था। अपने कार्यकाल के दौरान ऋषि सुनक ने कोरोना महामारी से परेशान लोगों की मदद को लेकर एक बड़ा ऐलान किया था।जिसमे उन्होंने करीबन 30 मिलियन खर्च करने का ऐलान किया। जिसके कारण कई लोगों की जान भी बचाई गई जिनके पास खाने के लिए कुछ नहीं था। इसके बाद 17 मार्च 2020 को उन्होंने व्यवसायों के लिए आपातकालीन सहायता में 330 बिलियन और कर्मचारियों के लिए वेतन की घोषणा की। इसमें उन्हें सब्सिडी प्राप्त कराई गई।
ऋषि सुनक को 24 जुलाई 2019 को प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन द्वारा चांसलर साजिद जाविद के साथ काम करते हुए ट्रेजरी के मुख्य सचिव के रूप में नियुक्त किया गया। उसी के अगले दिन वे प्रिवी काउंसिल के सदस्य बने। उन्हें 2019 के आम चुनाव में 47.2 प्रतिशत के बढ़े हुए बहुमत के साथ चुने गए। चुनाव अभियान के दौरान सुनक ने कंजर्वेटिव का प्रतिनिधित्व किया।
ऋषि सुनक को बोरिस जॉनसन का वफादार माना जाता है। वहीं उन्हें उभरते सितारे के रूप में भी देखा जाता है।
ऋषि सुनक की दो बेटियां हैं जिन दोनों की शादी हो चुकी हैं।
ऋषि सुनक 2001 से 2004 तक निवेश बैंक में काम किया करते थे। 

Sunday, October 9, 2022

इस तरह मैंनैे फेस किया आनंद बाजार प्रकाशन की हिंदी पत्रिका के लिए इंटरव्यू

  आत्मकथा-44


राजेश त्रिपाठी

जिस दिन से मुझे आनंद बाजार प्रकाशन के हिंदी साप्ताहिक के लिए मुझे इंटरव्यू  का लेटर मिला मैं बहुत उत्सुक था। यही सोच रहा था कि इतनी बड़ी और विख्यात प्रकाशन संस्था से जुड़ना भाग्य की बात होगी। अब तक मैंने जो सीखा उसे आजमाने का अवसर मिलेगा और नया कुछ सीखने का मौका मिलेगा।

 नियत दिन, सही समय पर मैं 6 प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट कोलकाता स्थित आनंद बाजार पत्रिका के कार्यालय पहुंच गया। वहां देखा विशाल भवन है। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही रिसेप्शन। रिसेप्शन में जाकर पूछा-हिंदी पत्रिका के लिए इंटरव्यू देना है किधर जाना होगा।

रिसेप्शन वाले व्यक्ति ने बता दिया-ऊपर तीन तल्ले पर जाइए।

तीन तल्ले पर पहुंच कर एक व्यक्ति से पूछा कि- हिंदी पत्रिका के लिए इंटरव्यू किधर हो रहा है।

उन्होंने एक बड़े हाल में जाने का इशारा किया।

हाल में प्रवेश करते ही मैंने देखा चार लोग कुर्सियों में गोलाकार बैठे हैं। गोले के बगल में एक कुर्सी खाली थी। मैं समझ गया कि यह कुर्सी मेरे लिए होगी यह भी कि यह चार लोग मुझ पर प्रश्नों के बाण छोड़ेंगे। झूठ नहीं बोलूंगा डर तो लग रहा था। कारण इससे पहले मैंने कभी कोई इंटव्यू नहीं फेस किया था।चार-चार महारथी जाने क्या पूछ बैठें। अपने मन को पक्का कर मैंने सोचा जो बनेगा उत्तर दूंगा, नौकरी मिल गयी तो अच्छा नहीं ये लोग कोई मुझे बांध थोड़े लेंगे। यहां हुआ तो हुआ नहीं इतनी बड़ी दुनिया पड़ी है कहीं और भाग्य आजमायेंगे। वैसे मन की बात बताऊं मैं चाह यहीं रहा था कि यहां हो जाये कारण तब बहुत कुछ सीखने का मौका मिलेगा यह भी गर्व से बता सकूंगा कि मैं आनंद बाजार प्रकाशन जैसे बड़े मीडिया संस्थान का एक हिस्सा हूं ।

*

  मैंने हाल में प्रवेश करते ही सभी जनों को हाथ जोड़ कर अभिवादन किया। हलकी दाढ़ी वाले सांवले रंग के एक व्यक्ति ने खाली पड़ी कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा-बैठिए।

पहला सवाल उस सांवले व्यक्ति ने ही दागा-रामहित तिवारी जी इसके पहले आपने कहां-कहां काम किया है। (यहां यह स्पष्ट कर दूं कि मेरे सारे शैक्षणिक प्रमाणपत्र मेरे मूल नाम रामहित तिवारी के नाम से हैं और राजेश त्रिपाठी मेरा पेन नेम है जो मैं अपने लेखन में प्रयोग करता था)

मैंने कहा- सर जी मैं सन्मार्ग हिंदी दैनिक में प्रशिक्षण रत हूं, इसके साथ ही एक हिंदी साप्ताहिक स्क्रीन के प्रबंध संपदक के रूप में काम कर रहा हूं। मैं बाल उपन्यास लेखक हूं। मेरे दर्जनों उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में मेरे आलेख, कहानियां आदि प्रकाशित हो चुकी हैं।

उस सांवले व्यक्ति ने अगला प्रश्न दागने के पहले कहा –मुझे सर जी कहने की आवश्यकता नहीं आप मुझे सुरेंद्र जी भी कह सकते हैं।

 सुरेंद्र जी कुछ पूछते इससे पहले सामने बैठे एक गोरे-चिट्टे व्यक्ति ने कहा-हां और आप मुझे मिस्टर अकबर कह सकते हैं। मैं हूं एम जे अकबर साप्ताहिक हिंदी पत्रिका रविवार का संपादक।

सुरेंद्र प्रताप सिंह


 प्रश्नकर्ताओं में एक पवित्र मोहन भी थे जो संस्थान के पर्सनल मैंनेजर थे। उन्होंने एक बार बस इतना पूछा-आप बांग्ला जानते हैं?

 मैंने कहा-बांग्ला पढ़ सकता हूं, लिखना सीख रहा हूं, बोल लेता हूं।

इसके बाद उन्होंने मुझसे बांग्ला में बात की और मैंने साहस कर के उत्तर बांग्ला में देने की कोशिश की। उन्होंने मुसकराते हुए कहा-ठीक आछे (ठीक है)।

 अब अकबर साहब की बारी थी-मान लीजिए आप चुन लिए जाते हैं तो हम आपसे क्या उम्मीद करें।

मैंने कहा-अकबर साहब मैं काम को पूजा मानता हूं। इसे अन्यथा ना लें आपको शायद ही कभी मुझसे काम के बारे में शिकायत का मौका मिलेगा। मेरा तो सौभाग्य होगा कि मैं आप और सुरेद्र जी जैसे वरिष्ठ पत्रकारों की सरपरस्ती (देख रेख) में काम कर कुछ सीख पाऊंगा।

लगता है मेरा सरपरस्ती शब्द बोलना गलत हुआ क्योंकि यह उर्दू शब्द बोलते ही अकबर साहब को याद आ गया कि मैंने अपने अप्लीकेशन में यह भी लिख रखा है कि मैं उर्दू भी जानता हूं।

एम. जे. अकबर

 अकबर साहब ने एक चपरासी को बुलाया और कहां-नीचे सिक्यूरिटी में जो खान साहब हैं उनके घर से जो उर्दू की चिट्ठियां आती हैं उनमें से एक ले आइए।

  इतना  सुनते ही मैं मन ही मन प्रभु को ध्याने लगा कि-हे प्रभु लाज रख लेना। अब तक मैंने कातिब की लिखी या छपी हुई उर्दू पढ़ी है किसी के हाथ की लिखी उर्दू पढ़ने का मौका नहीं मिला।

 फिर मैंने मन ही मन सोचा कि यह मेरे लिए एक चुनौती है और मुझे हर हाल में इसे जीतना है। कारण, अगर मैं चिट्ठी ना पढ़ पाया तो सीधा सा मतलब होगा कि मैंने अप्लीकेशन में गलत तथ्य दिया है कि मैं उर्दू जानता हूं।

 खैर चपरासी नीचे से सिक्युरिटी वाले खान के घर से आयी चिट्ठी लेकर आ गया। उसने वह चिट्ठी अकबर साहब को दे दी। अकबर साहब ने उसे पूरा पढ़ा और फिर मुझे थमाते हुए कहा-लीजिए इसको पढ़िये।

 मैंने मन ही मन मां सरस्वती और हनुमान जी का ध्यान किया और चिट्ठी पढ़ने लगा इसे आत्मश्लाघा ना माना जाये, लगता है सरस्वती ही जिह्वा में विराज गयीं। मैं बिना अटके सारी चिट्ठी पढ़ गया।

मैने जब उर्दू की चिट्ठी पढ़ ली तो अकबर साहब के मुंह से निकला-आप तो उर्दू जानते हैं।

मैंने कहा-साहब मैंने अपनी योग्यता के बारे में जो कुछ लिखा है उसमें एक भी बात बढ़ा-चढ़ा कर नहीं लिखी। आप चाहें तो हर मुद्दे पर मुझसे सवाल कर सकते हैं।

 इसके बाद मैं अपने प्रकाशित बाल उपन्यास, कहानियां और दूसरे आर्टिकल दिखाने लगा। संयोग देखिए सन्मार्ग में धारावाहिक प्रकाशित होने वाली शृंखला की अंतिम किस्त उसी प्रकाशित हुई थी। वह मैं अपने साथ ले गया था। मैने सुरेंद्र जी की ओर देखते हुए कहा-आप चाहें तो देख सकते हैं सन्मार्ग में प्रकाशित होने वाली मेरी शृंखला संजय का जीवन बाल्यकाल से अब तक की आखिरी किस्त प्रकाशित हुई है आप चाहें तो देख लें।

 इसके बाद सुरेंद्र जी ने जो जवाब दिया वह मेरे मन में आशा की किरण जैसा लगा।

सुरेंद्र जी ने कहा-नहीं अखबार निकालने की जरूरत नहीं, हम नियमित पेपर खरीद कर पढ़ते हैं।

उनके इस एक शब्द ने एक उम्मीद जगा दी कि चलो इनके लिए मैं अपरिचित नहीं और ये मेरा लिखा पढ़ते हैं।

 इसके बाद उन्होंने जो प्रश्न किया वह मेरे लिए परेशानी का कारण था। उन्होंने कहा इसके लिए इतने तथ्य कहां से जुटाते हैं

मैंने इतना भर काह-यह मेरा सीक्रेट है मुझे पूरा विश्वास है आप मुझे इसको उजागर करने को बाध्य नहीं करेंगे।

सुरेंद्र जी मुसकराये और अकबर साहब की ओर देखते हुए उन्होंने पूछा- इनसे और कुछ पूछना है। अकबर  साहब ने सिर हिला कर मना कर दिया।

 सुरेद्र जी ने मेरी ओर मुखातिब होते हुए कहा- आप जा सकते हैं. चिट्ठी जायेगी।

 मैं सभी को नमस्कार कर ह़ाल से बाहर निकल आया। हाल में जाते वक्त पैर भारी थे अब वे हलके लग रहे थे क्योंकि मन में एक आशाजनक शब्द गूंज रहा था-चिट्ठी जायेगी।

घर आया तो पाया भैया मेरी ही राह देख रहे थे। उन्हें सारा हाल बताया तो उन्होंने बताया कि -तुम जिन सुरेंद्र जी से मिले हो अगर मैं उनसे ना मिला होता तो शायद तुम्हें .यह अवसर ही नहीं मिल पाता। मैं तो मणि मधुकर से मिला था वे बोले थे कि हम बुला लेंगे। यह तुम्हारा सौभाग्य था कि उस दिन मैं सुरेंद्र प्रताप सिंह मिल लिया नहीं तो ना तुम अप्लीकेशन दे पाते ना तुम्हें इंटरव्यू का लेटर ही मिलता। अब मुझे पूरा विश्वास है कि चिट्ठी अवश्य आयेगी। (क्रमश;)

Thursday, September 29, 2022

जब मैं महान फिल्मकार,अभिनेता सर रिचर्ड एटेनबरो से मिला

आत्मकथा-43 ा
आनंद बाजार प्रकाशन के हिंदी साप्ताहिक के लिए अप्लीकेशन देकर मैं वहां से उत्तर के इंतजार में था। इधर सन्मार्ग में एक बात हुई मुझे एक नया दायित्व दे दिया गया। मुझसे सन्मार्ग के मालिक रामअवतार गुप्त ने एक दिन अपने केबिन में बुलाया और कहा-देखो आप यहा मुंबई से आनेवाले फिल्मी कलाकारों के इंटरव्यू व बड़े-बड़े फिल्मी इवेंट कवर कर लिया करो। तुम्हारे भैया रुक्म जी को फुरसत नहीं। यहां से ऐसे लोग चले जाते हैं कि बाद में पाठकों के फोन आने लगते हैं कि यह कैसे हुआ। मैंने उनका आदेश शिरोधार्य किया और दूसरे दिन से फिल्म संबंधी हर कार्यक्रम सन्मार्ग के लिए अटेंड करने लगा। इनमें नयी फिल्मों के रिलीज में मुंबई के कलाकारों के साथ होनेवाली प्रेस कांफ्रेस हो या फिर दूसरा कोई कार्यक्रम मैं वहां कवरेज के लिए जाता था। जितेंद्र, चंद्रशेखर,आदित्य पंचोली, संजीव कुमार,तापस पाल, ऐसे तमाम कलाकारों से मिलना उनके बारे में जानना, उनकी फिल्मों के बारे में जानना यह क्रम चलता रहा लेकिन मेरे इस कार्य का सबसे बड़ा दिन वह था जब मैं महान अभिनेता, निर्देशक, निर्माता सर रिचर्ड एटेन बरो 
सर रिचर्ड एटेन बरो

से मिला।लाजवाब अभिनेता, बेमिसाल इनसान थे वे। उन्होंने ‘गांधी’ जैसी कालजयी फिल्म बनायी। कुछ भारतीय फिल्मकारों ने उस वक्त शंका जतायी थी कि एक विदेशी निर्माता गांधी के चरित्र से कितना न्याय कर पायेगा लेकिन जब फिल्म बनी तो लोगों के मुंह बंद हो गये क्योंकि उन्हें उन पर उंगली उठाने जैसा कुछ दोष मिला ही नहीं।1977 में एटेनबरो महान भारतीय फिल्मकार सत्यजित राय की फिल्म ’शतरंज के खिलाड़ी’ में काम करने भारत आये थे। महान कथाशिल्पी मुंशी प्रेमचंद की इसी नाम की कहानी पर आधारित इस फिल्म में उन्होंने लेफ्टीनेंट जनरल आउट्राम की भूमिका निभायी थी। फिल्म की शूटिंग पूरी होने के बाद फिल्म के निर्माता सुरेश जिंदल ने कोलकाता के ग्रांड होटल में फिल्म के बारे में जानकारी देने के लिए संवाददाता सम्मेलन बुलाया था। इस सम्मेलन में जाने का मुझे भी मौका मिला। वहीं रिचर्ड एटेनबरो से मुलाकात हुई। यह गरमी की उमस भरी दोपहर थी। एटेनबरो मलमल के सफेद कुरते और पाजामे थे। सुर्ख रंगत वाला गोरा-चिट्टा चेहरा और उस पर छोटी से मुसकराती आंखें, चेहरे पर हलकी दाढ़ी कुल मिला कर उनका व्यक्तित्व भीड़ में उन्हें अलग करता था। वैसे भी भारतीयों की भीड़ में एक ब्रिटिश अभिनेता को पहचान पाना आसान था। वे सबसे बातें कर रहे थे और फिल्म में अभिनय के बारे में, पहली बार भारतीय फिल्म में काम करने के बारे में अपने अनुभव साझा कर रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि सत्यजित राय से अपनी पहली मुलाकात और इस फिल्म में भूमिका मिलने के बारे में बताइए। उन्होंने कहा कि सत्यजित राय उनको आउट्राम की भूमिका के लिए सेलेक्ट करने के लिए लंदन गये थे। वहां रहते वक्त उन्होंने एटेनबरो से फोन पर बात की और बातचीत के दौरान यह साफ कर दिया कि सत्यजित राय की फिल्म में काम करना है तो पूरी स्क्रिप्ट पढ़ कर अपने चरित्र और कहानी की आत्मा के बारे में जानना जरूरी है। ऐसा उन्हें (एटनेबरो) भी करना होगा। इस पर एटेनबरो का जवाब था कि सत्यजित राय जैसे महान निर्देशक के साथ काम करने का मौका मिले तो वे पूरी टेलीफोन डाइरेक्टरी तक पढ़ने को तैयार हैं। यहां यह बताते चलें कि उस वक्त तक सत्यजित राय पूरी दुनिया में एक सशक्त और सफल फिल्म निर्देशक के रूप मे प्रतिष्ठित हो चुके थे। जब एटेनबरो सत्यजित राय की फिल्म में काम करने आये थे तब तक वह भी अभिनेता के रूप में अपार ख्याति पा चुके थे। लेकिन उनसे मिल कर, उनके व्यवहार से कभी नहीं लगा कि हम इतने बड़े कलाकार से मिल रहे हैं। अपने यहां तो किसी कलाकार की एक फिल्म भी हिट हो गयी तो उसका दिमाग सातवें आसमान पर होता है, वह सामान्य आदमी को कुछ नहीं मानता और ना ही उससे सामान्य ढंग से मिलने-जुलने में विश्वास रखता है। अगर ऐसे कलाकार की फिल्म 100 करोड़ के क्लब में पहुंच जाये तो फिर पूछना ही क्या। वैसे भी ये कलाकार खुद को भगवान जैसा मानते हैं । एटेनबरो में ऐसा कुछ भी नहीं था। जब तक वे हमसे मिले, सहजता से बात की, हमेशा चेहरे पर स्मित हास्य तैरता रहा, न कोई तनाव ना ही माथे पर कोई शिकन। वह मुलाकात बहुत याद आती है क्योंकि ऐसे व्यक्तित्व धरती पर बार-बार नही आते। एटेनबरो महान अभिनेता पर बहुत ही सरल, हंसमुख और लाजवाब इनसान थे। किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसका स्वभाव एक बार की मुलाकात में भी परखा जा सकता है अगर वह व्यक्ति एटेनबरो जैसा निश्छल, निर्मल और निराला हो। यह बात उन पर कतई लागू नहीं होती जो होते कुछ और हैं और कोशिश कुछ और दिखाने की करते हैं। ग्रांड कोलकाता की वह दोपहर हर उस व्यक्ति के लिए यादगार बन गयी जो उनसे मिल या उन्हें सुन सका। उनकी महानता, सरलता के किस्से उन लोगों ने भी बखान किये जिन्होंने ’शतरंज के खिलाड़ी’ में उनके साथ काम किया। कोलकाता के इंद्रपुरी स्टूडियो व शहर के अन्य स्थानों पर इसकी शूटिंग हुई थी। स्टूडियो के सभी कर्मचारी ’साहेब’ के साथ काम करने को लेकर आशंकित थे। एक तो साहब उस पर भाषा का व्यवधान और उस पर इतने बड़े कलाकार, पता नहीं कौन-सी बात उन्हें बुरी लग जाये। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। गरमी के उन दिनों में हालांकि उनको एयरकंडीशंड मेकअप रूम दिया गया था पर वे घंटों सेट के सज जाने या लाइटमैन के लाइट्स और कैमरामैन के कैमरा एंगल वगैरह सहेज, सजा लेने तक धैर्य से प्रतीक्षा करते रहते। ना उस गरमी की परेशानी से शिकायत और ना ही माथे पर कोई शिकन। यहां अपने यहां के कलाकारों की स्थिति बयान करते चलते हैं। इसे विषयांतर ना समझें इस घटना से आपको यह पता चल जायेगा कि कलाकार-कलाकार में फर्क क्या होता है। कहानी यों है- दक्षिण के एक फिल्म निर्माता ने हिंदी में फिल्म बनानी चाही। उन्होंने उसमें उस वक्त के हिंदी के बहुत बड़े कलाकार को लेना चाहा। कलाकार ने काम करने की शर्तें रख दीं, मसलन स्टूडियो एयरकंडीशंड होना चाहिए, गाड़ी एयरकंडीशंड होनी चाहिए और ना जाने क्या-क्या। निर्माता इस पर भी राजी हो गये। उस अभिनेता के आश्चर्य का ठिकाना ना रहा जब वह मद्रास एयरपोर्ट पर उतरा तो एक नहीं कई इम्पाला एयरकंडीशंड गाड़ियां उसके स्वागत के लिए खड़ी थीं। वह स्टूडियो पहुंचा तो वह भी एयरकंडीशंड मिला। खैर काम शुरू हुआ। वह अभिनेता अपनी आदत के मुताबिक मद्रास में भी स्टूडियो में देर से आने लगा। स्टूडियो के दरबान ने दो-चार दिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया, सोचा साहब नये-नये हैं शायद दो-एक दिन में अपनी आदत सुधार लेंगे, समय से आने लगेंगे लेकिन वैसा नहीं हुआ। इस पर दरबान ने निर्माता ने उन साहबान की लेटलतीफी की शिकायत कर दी। निर्माता ने दरबान को ताकीद कर दी कि अगर अब वे लेट आते हैं तो उनसे कहना वहीं से सीधे एयरपोर्ट जायें और मुंबई लौट जायें। मुझे ऐसे अभिनेता के साथ काम नहीं करना। दरबान ने अगले दिन अभिनेता से वैसा ही कह दिया। इस पर अभिनेता झेंप गये, उन्हें लगा कि यह मुंबई नहीं मद्रास है और उनका पाला किसी कड़े और वक्त के पाबंद निर्माता से पड़ा है। उस अभिनेता की आदत सुधर गयी, स्टूडियो वे समय से आने लगे, फिल्म बनी और जबरदस्त हिट हुई। माना कि विषयांतर हुआ लेकिन यह कहानी इनसान-इनसान के व्यवहार और प्रकृति में अंतर बताने के लिए जरूरी थी। वापस एटेनबरो के प्रसंग पर लौटते हैं। वे स्टूडियो में बड़े धैर्य से शूटिंग शुरू होने की प्रतीक्षा करते। कैमरामैन से पूछते कि क्या वे शॉट लेने के तैयार हैं। बंगला फिल्मों से थोड़ा-सा भी संबंध रखने वाले लोग जानते हैं कि लोग यहां पर सत्यजित राय को प्यार से ’मानिक दा’ कह कर बुलाते थे। स्टूडियो में लोगों से उनके लिए यह संबोधन सुन कर एटेनबरो भी उन्हें इसी नाम से बुलाने लगे थे। कहते हैं जब फिल्म की शूटिंग खत्म हुई और वे लंदन वापस जाने लगे तो उन्होंने उन तकनीशियनों को उपहार तक दिये जो ’शतरंज के खिलाड़ी’ से किसी भी तरह से जुडे थे। उनसे मिल कर यह जाना कि कितना अच्छा हो अगर कोई इनसान अपने काम में महान होने के साथ ही व्यवहार में भी महान हो। इस तरह के आयोजनों के कवरेज करते-करते मेरे अनुभव में कुछ और जुड़ाव हुआ। अपने भैया रुक्म जी से सुना था कि संजीव कुमार और रविंद्र जैन को मुंबई जाने के लिए उन्होंने ही प्रेरित किया था। संजीव कुमार कोलकाता में नाटकों में काम करते थे और 
संजीव कुमार

भैया के पास अपने नाटकों का समाचार छपवाने आते थे। एक बार भैया ने कहा-अच्छा अभिनय कर लेते हो यहां क्यों समय बरबाद कर रहे हो मुंबई जाओ। तुम्हें अपने हुनर को निखारने का मैदान वहां मिलेगा। भैया की यह बात संजीव कुमार के दिल में लग गयी। वे वहां गये संघर्ष किया और फिल्म अभिनेता के रूप में वह स्थान हासिल किया जो बहुत कम लोग ही हासिल कर पाते हैं। भैया के प्रति संजीव की श्रद्धा बरकरार रही। मैं इस बात का गवाह हूं। किसी फिल्मी पार्टी के लिए कोलकाता आये थे। तब तक वे प्रतिष्ठित अभिनेता बन गये थे। वे सभी पत्रकारों से औपचारिक रूप से मिलने के बाद जब भैया के पास आये तो बाकायदा उनके चरण स्पर्श किये। यह मैं सुनी सुनायी बात नहीं कह रहा। मैं उन क्षणों का साक्षी रहा हूं। उन्होंने संगीतकार रवींद्र जैन को भी मुंबई जाने को प्रेरित किया था। रवींद्र जैन ने भैया रुक्म जी के लिखे नाटक 'अलका' के मंचन के दौरान संगीत दिया था। उसके बाद भैया ने उनसे भी कहा-यहां समय मत बरबाद करो मुंबई जाओ वहां तुम्हें अपनी प्रतिभा को दिखाने का अच्छा मौका मिलेगा। इस पर रवींद्र जैन का जवाब होता-रुक्म जी वहां नेत्रों वाले मारे-मारे फिरते हैं, मुझे कौन पूछेगा। भैया बोलते-तुम्हारी प्रतिभा की मांग और मान होगा। भैया की बात सुन वे भी मुंबई चले गये। और वक्त गवाह है कि उन्होंने वहां फिल्मों में संगीत निर्देशक के रूप में जो मुकाम हासिल किया वह हासिल करने में नेत्रों वालों के पसीने छूट जाते हैं। रवींद्र जैन में एक खूबी थी वे लोगों को आवाज से पहचान लेते थे। एक बार की बात है कि मैं अपने भैया रुक्म जी और मित्र राज मिठौलिया के साथ उस कार्यक्रम में गया था जहां रवींद्र जैन की उपस्थति होनेवाली थी। यह कार्यक्रम कोलकाता के रिट्ज होटल में था। कार्यक्रम जिस हाल मेंथा हम लोग वहां पहुंचे ही थे कि तभी रवींद्र जैन वहां आये।भैया ने कहा-अभी देखना रवींद्र मुझे आवाज से पहचान लेगा। इतना 
रवींद्र जैन

कह कर वे मुझसे और राज मिठौलिया से जोर-जोर से बातें करने लगे। अचानक रवींद्र जैन ने लोगों से कहा- आप जरा शांत हो जायें, मुझे अपने रुक्म जी की आवाज सुनायी दे रही है। मेरी प्रार्थना है वे जहां हों मेरे पास आयें। भैया ने जाकर उन्हें गले से लगा लिया और बोले-रवींद्र तुम मुझे अब तक नहीं भूले। रवींद्र जैन ने कहा-रुक्म जी जिंदगी भर आपको नहीं भूलंगा। आपने हौसला बढ़ाया तभी ना मैंने यह मुकाम पाया। इस तरह की घटनाओं ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। पहली बात तो यह कि इस बदलती दुनिया में आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने साथ किये उपकार को भूलते नहीं। उनके प्रति आजीवन कृतज्ञ रहते हैं जिन्होंने कभी उनकी मदद की, हौसला बढ़ाया। * प्रतीक्षा की घड़ियां समाप्त हुईं। आनंद बाजार प्रकाशन समूह के हिंदी साप्ताहिक में कार्य के लिए किये गये आवेदन का जवाब आ गया। मेरे पास इंटरव्यू के लिए लेटर आया था। मैं इंटरव्यू के लिए तैयारियां करने लगा। मेरी जो-जो रिपोर्ट छपी थीं उनकी छाया कापी करवायीं। कुछ बाल उपन्यास भी इकट्ठा किये और इंटरव्यू के दिन की प्रतीक्षा करने लगा। (क्रमश:)

Thursday, September 15, 2022

जब मुझे मिला संत स्वरूप, गीता मर्मज्ञ पांडेय जी का आशीर्वाद

 आत्मकथा-42



राजेश त्रिपाठी

संजय का जीवन बाल्यकाल से अब तक शृंखला सन्मार्ग में नियमित छप रही थी। लोगों को यह पसंद आ रही थी. परिचितों की कौन कहे अपरिचितों से भी प्रशंसा आ रही थी। दरअसल मेरी कोशिश यह थी कि इसे राजनीतिक रिपोर्ताज की तरह नही एक सत्य घटनाओं पर आधारित औपन्यासिक रचना थी। इसकी कुछ किस्तें पढ़ने के बाद मेरे परिचित विख्यात कथाकार ध्रुव जायसवाल ने भी इसकी प्रशंसा की थी और इसे पुस्तककार प्रकाशित करने की सलाह दी थी लेकिन वह हो नहीं पाया।

  जब मै सन्मार्ग में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था और हिंदी फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन के प्रबंध संपादक का भी कार्यभार संभाल रहा उन्हीं दिनों एक खबर सुनने में आयी। उड़ती सी खबर आयी कि बंगाल के सर्वाधिक लोकप्रिय बंगला दैनिक आनंदबाजार पत्रिका प्रकाशित करनेवाला संस्थान आनंद बाजार प्रकाशन एक हिंदी साप्ताहिक निकालने जा रहा है। खबर उड़ी तो पर विश्वास नहीं हो रहा था। मैंने इसका जिक्र अपने भैया रुक्म जी से किया।

भैया ने कहा-कोई बात नहीं,मैं कल ही जाकर पता करता हूं कि यह सच है या किसी ने अफवाह उड़ा दी है। वहां के सिनेमा एडीटर मेरे परिचित हैं।

दूसरे दिन भैया कोलकाता के 6 प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट स्थित आनंदबाजार पत्रिका के कार्यालय पहुंचे। उन्होंने रिसेप्शन में पूछा कि हिंदी विभाग में जाना है। लोगों ने उन्हें ऊपरी तल्ले में जाने और मणि मधुकर से मिलने को कहा।

 ऊपरी मंजिल में पहुंच कर भैया जी मणि मधुकर जी से मिले। बातचीत के दौरान पता चला कि वे प्रसिद्ध कवि हैं। उनसे जब भैया ने पूछा कि क्या यहा से कोई हिंदी प्रकाशन शुरू होनेवाला है।

 मणि मधुकर जी ने उत्तर दिया –जी हां, यहां से हिंदी साप्ताहिक रविवार निकालने की तैयारी चल रही है।

 इसके बाद भैया ने कहा-मेरा भाई भी पत्रकार है, जरा उसका भी ध्यान रखिएगा।

मणि मधुकर जी ने कहा-अवश्य अवश्य।

इसके बाद भैया ने पूछा-आपके अलावा और कोई इस काम के लिए आया है या फिलहाल वन मैन शो है।

मणि मधुकर जी हंसते हुए बोले-नहीं नहीं सुरेंद्र प्रताप सिंह जी भी हैं।

इस नाम से भैया परिचित थे। उन्होंने कहा-वे तो मेरे परिचित हैं। कहां बैठते हैं वे।

मणि मधुकर ने वह चैंबर दिखा दिया जिसमें सुरेंद्र प्रताप सिंह बैठते थे।

भैया ने सुरेंद्र प्रताप सिंह जी का चैंबर खोलते हुए पूछा-मैं अंदर आ सकता हूं।

उन्हें देखते ही सुरेंद्र प्रताप सिंह अपनी कुर्सी से उठ कर बोले-अरे रुक्म जी आइए आइए।

भैया अंदर गये तो सुरेंद्र जी ने उन्हें सामने की कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

भैया जब बैठ गये तो सुरेंद्र जी ने उनसे कहा-अरे मैं तो सन्मार्ग में आपके बाल विनोद का सदस्य था। कहिए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं।

भैया ने कहा-सुना है यहां से कोई हिंदी प्रकाशन शुरू हो रहा ह।

सुरेंद्र जी ने कहा-जी हां हिंदी साप्ताहिक रविवार निकालने की तैयारी चल रही है। क्या बात है कहिए।

भैया बोले- मेरा भाई सन्मार्ग में प्रशिक्षण ले चुका है वह एक हिंदी फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन में प्रबंध संपादक है। मैं चाहता हूं  कि वह आप लोगों से जुड़े। आप लोगों के साथ जुड़ेगे तो उसके भविष्य के लिए भी अच्छा रहेगा और सही ढंग से सीख पायेगा। मैं मणि मधुकर जी से मिला था उन्होंने कहा कि वे ध्यान अवश्य रखेंगे।

इस पर सुरेंद्र जी ने कहा- मणि जी  ने जो कहा उसे रहने दीजिए। भाई से एक अप्लीकेशन अवश्य भिजवा दीजिए।

भैया ने घर लौट कर मुझे सारी जानकारी दी और कहा-कल ही अप्लीकेशन भेज दो।

मैंने दूसरे दिन ही अप्लीकेशन भेज दी। उसमें मैंने यह भी लिखा कि मैं कौन-कौन सी भाषाएं जानता हूं। इनमें उर्दू का भी नाम था।

अप्लीकेशन भेज कर मैं आनंद बाजार प्रकाशन से जवाब आ का इंतजार करने लगा।

*

सन्मार्ग में मेरा प्रशिक्षण जारी रहा। स्क्रीन भी मैं संभालता रहा। सन्मार्ग में भैया रुक्म जी सिनेमा संपादक भी थे। उनके सिनेमा पेज में बुझक्कड कालम में पाठको के प्रश्नों के उत्तर देते थे। एक दिन भैया कुछ व्यस्त थे तो उन्होंने मुझसे कहा कि मैं लाल बुझक्कड के प्रश्न लिख दूं।

दूसरे दिन मैने लालबुझक्कड़ कालम के प्रश्नो के उत्तर लिखे। उनमें से कुछ प्रश्न ऐसे थे कि उनके उत्तर में मैंने गीता के कुछ श्लोक कोट कर दिये।

दूसरे दिन जब मै सन्मार्ग में भैया रुक्म जी की बगल वाली कुर्सी में बैठा काम कर रहा था तभी सूर्यनाथ पांडेय जी आये और भैया रुक्म ज से बोले-वाह रुक्म जी आपने लालबुझक्कड़ के प्रश्नों के उत्तर में भी गीता के श्लोक दे दिये वह भी इतने अच्छे ढंग से कि एकदम बेतुके नहीं लग रहे.

भैया ने कहा-आशीर्वाद देना है तो मेरे इस भाई को दीजिए इसने ही यह लिखा है।

मैंने उनहें प्रणाम किया और उन्होंने सिर पर हाथ रख कर बहुत आशीर्वाद दिया।

सूर्यनाथ पांडेय जी संत स्वरूप थे। वे गीता मर्मज्ञ थे और अंग्रेजी व हिंदी में धराप्रवाह गीता पर प्रवचन करते थे। वे मिरजई और धोती पहनते थे। वे सन्मार्ग के वरिष्ठ सदस्यों में थे। सभी उनका बड़ा सम्मान करते थे। पांडेय जी एक और बात के लिए बहुत विख्यात थे। वह यह कि वे भोजन बनाने और पीने के लिए भी गंगाजल का ही प्रयोग करते थे। उनके लिए जल लाने के लिए एक व्यक्ति नियुक्त था।

बाद में पांडेय जी वाराणसी चले गये और वहीं उनका स्वर्गवास हो गया।

मैंने आनंद बाजार में अप्लीकेशन भेज दी थी और बड़ी व्यग्रता से वहां से जवाब का इंतजार कर रहा था। (क्रमश:)