Tuesday, January 17, 2023

 






लोग ‘रविवार’ को आखिरी पृष्ठ से क्यों पढ़ते थे?

 


आत्मकथा-52  


दिन बीतते रहे रविवार हिंदी साप्ताहिक लोकप्रियता के शिखर चढ़ता रहा। हम उससे जुड़े रहे थे इसलिए ऐसा कह रहे हैं यह बात नहीं है। आप खुद पता कर देख सकते हैं कि उस वक्त रविवार की टक्कर की कोई पत्रिका नहीं थी। रविवार ने कभी सच को सच की तरह कहने में कोई झिझक नहीं दिखाई। ऐसे में अक्सर किसी ना किसी प्रदेश से उस पर मुकदमा होता ही रहता था। आनंद बाजार प्रकाशन में इससे निपटने के लिए एक लीगल डिपार्टमेंट था ऐसे मुकदमे वही संभालता था जिसके प्रमुख थे विजित बसु जो हमारी पत्रिका रविवार के प्रिंटर भी थे।

 कुछ दिन और बीते,आनंद बाजार प्रकाशन से एक बच्चों की बंगला पत्रिका आनंद मेला निकलती थी। उसे हिंदी में मेला के नाम से निकालने की योजना बनी तो उसके संपादक के रूप में योगेंद्र कुमार लल्ला जी को बुलाया गया। उनके साथ कथाकार सिद्धेश भी जुड़े और हरिनारायण सिंह भी। कुछ दिन बाद ही मेला निकलने लगी और बाल पाठकों में लोकप्रिय हुई।

 यही समय था जब सिद्धेश जी ने हिंदी भाषा के प्रख्यात कथाकारों की कहानियां बांग्ला में अनुदित करा कर आनंद बाजार प्रकाशन की बांग्ला की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका देश में प्रकाशित करवाना प्रारंभ किया। इस क्रम में मेरा भी नंबर आया और मेरे हिस्से आयी प्रसिद्ध राजस्थानी कथाकार रामेश्वर दयाल श्रीमाली की कहानी यशोदा। मैंने उसका बांग्ला अनुवाद किया और वह देश पत्रिका में प्रकाशित हुई। मेरे लिए सबसे हर्ष की बात यह थी कि बांग्ला पत्रिका देश के स्वनाम धन्य संपादक सागरमय घोष ने पीठ ठोंक कर प्रशंसा की और कहा-तुम हिंदी भाषी हो पर तुम्हारे लिखे पर मुझे कलम नहीं चलानी पड़ी।

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आगे बढ़ने से पहले यह बताता चलूं कि हमारे रविवार में श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी उपन्यास, शरद जोशी का व्यंग्य स्तंभ नावक के तीर

नियमित छपता था। उसी वक्त हम लोगों की पत्रिका के लिए कोल इंडिया की ओर से कई पृष्ठों का विज्ञापन मिला। उसका विज्ञापन मैटेरियल लाने का भार सुरेंद्र प्रताप सिंह ने मुझ पर और हरिनारायण सिंह पर सौंपा।  हम दोनों गये और वहां के प्रमुख कृष्ण चंद्र चौधरी जी से बात की। उन्होंने सब कुछ समझा कर हमें विज्ञापन की सामग्री सौंपी फिर हम लोगों से बोले-अरे भाई अपने संपादक जी से बोलिए हमें भी कुछ लिखने का अवसर दें।

हम लोगों ने कहा-आप अपना लिखा लेकर आइए हमारे संपादक जी से मिलिए वे अवश्य आपका लिखा छापेंगे।

कुछ दिन बाद ही कृष्णचंद्र चौधरी हमारे रविवार के प्रफुल्ल चंद्र सरकार स्ट्रीट कोलकाता स्थित कार्यालय में आये।

वे सुरेंद्र प्रताप सिंह जी से थोड़ी देर बात करने के बाद चले गये। जीत् समय वे अपना एक मैटर देते गये। उनके जाने के बाद सुंरेंद्र जी चौधरी जी का लिखा मैटर पढ़ने लगे। वे थोड़ी पढ़ते फिर तेजी से ठहाका लगाते पढ़ते फिर ठहाका।

थोड़ी देर बाद उनकी हंसी थमी तो वे बोले –भाई इस आदमी के तो जैसे तीसरी आंख है। क्या है और क्या देख लिया।

यह उन दिनों की बात है जब कांग्रेस का चुनाव चिह्न गाय और बछ़ड़ा था। चौधरी साहब ने लिखा था कि कुछ कांग्रेस गाय और बछड़ा को देख कर खुसफुस कर रहे थे-अरे गाय तो यह रही बछड़ा कहां है। किसी कांग्रेसी नेता ने उस वक्त के चर्चित युवा नेता की ओर इशारा कर दिया।

एसपी (हमारे संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह) ने कहा हम छापेंगे लेकिन इस स्तंभ का नाम क्या रखें पहले से ही हम शरद जोशी जी का नावक के तीर छाप रहे हैं।

 मैंने कहा –भैया आपने ही तो कहा-अगले के तो जैसे तीसरी आंख है। तीसरी आंख ही रख लीजिए।

स्तंभ का नाम तीसरी आंख रख दिया गया। यह रविवार के आखिरी पृष्ठ पर प्रकाशित होता था। कुछ महीने में ही यह स्तंभ बहुत लोकप्रिय हो गया।

हम लोगों को इसका पता तब चला जब रविवार में हमने एक फार्म प्रकाशित कियारविवार और आप। इसका उद्देश्य यह जानना था कि पाठकों को रविवार में क्या पसंद आता है और उसके बारे में उनकी क्या राय है।

आप यकीन नहीं करेंगे कि उस वक्त शत प्रतिशत पाठकों की यही राय थी कि हम रविवार को आखिरी पृष्ठ यानी तीसरी आंख स्तंभ से पढ़ना शुरू करते हैं।

कृष्णचंद्र चौधरी सरकारी नौकरी मे थे और अपने व्यंग्य बाण तीसरी आंख से वे सरकार पर भी चलाते थे। इस पर आपत्ति आयी तो फिर उन्होंने अपना लेखकीय नाम बदल कर किट्टू कर लिया और इसी नाम से तीसरी आंख स्तंभ लिखते रहे।

एक बार हमारे संपादक सुरेंद्र जी ने कृष्णचंद्र चौधरी को जो अब किट्टू हो गये थे अपने कार्यालय बुलाया। कुछ समय में ही बिहार में चुनाव होने वाले थे। सुरेंद्र जी ने किट्टू जी से कहा-आपको एक बड़ा काम सौंप रहा हूं बिहार में चुनाव होनेवाले हैं आपको बिहार का कवरेज करना है।

किट्टू जी एसपी से अनुनय करते से बोले-अरे सुरेंद्र जी क्यों हमें कांटों में घसीटना चाह रहे हैं। बस थोड़ा-मोड़ा लिख लेते हैं, रिपोर्टिंग हमारे बल की नहीं।

 सुरेंद्र जी ने कहा- आपसे रिपोर्टिंग कौन करा रहा है, हम तो चाहते हैं कि आप बिहार घूम आयें और वहां जो देखें वह लिख दें। हम उसे बिहारी की  डायरी में छाप देंगे।

 इस पर किट्टू मान गये और उन्होंने बिहार घूमा खूब घूमा और उनकी आंखों से देखे गये बिहार को रविवार ने अपने पाठकों को दिखाया। लोगों ने वह बिहार डायरी बार-बार पढ़ी। एसपी भी किट्टू की कलम के कायल हो गये। एक व्यंग्यकार ने एक प्रदेश की बदहाली का वह कच्चा चिट्ठा खोला कि खुद बिहारवासी दंग रह गये। सभी चौक गये बिहार की सच्ची तस्वीर देख कर। कृष्ण चंद्र चौधरी थे तो दक्षिण के लेकिन फर्राटे से भोजपुरी बोलते थे।

 बाद के दिनों में वे सन्मार्ग हिंदी दैनिक में भी स्तंभ लिखने लगे थे।  इसके कुछ अरसे बाद वे अपने बेटे के पास मुंबई चले गये और वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।

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उदयन शर्मा दिल्ली से कुतुबनामा स्तंभ लिखते थे जो एक तरह से दिल्ली डायरी थी। दिल्ली की राजनीतिक गतिविधियों पर आधारित थी यह। उदयन जी बड़े हिम्मत थी एक बार उन्होंने तय किया कि बीहड़ में जाकर फूलन देवी से भेंट करनी है। उन पर स्टोरी बनानी है। उन्होंने लेखक कल्याण चटर्जी को साथ लिया और बीहड़-बीहड़ फूलन देवी की तलाश करने लगे। अंतत: उन्हें सफलता मिली। उनसे भेंट के वक्त के दृश्य के बारे में वे लिखते हैं-नार्थ स्टार के जूते हम दोनों के पैरों में थे और वही फूलन देवी के पैरों में भी थे। फूलन की स्टोरी तो कर ली अब समस्या यह थी कि कवर पर फोटो किसकी दी जाये। अब उदयन जी और कल्याण बनर्जी के दिमाग में आया क्यों ना फूलन के गांव बहमई चला जाये। वहां जाकर उन लोगों ने फूलन की बहन को देखा जिसका चेहरा थोड़ा अपनी बहन की तरह था। बस फिर क्या था आर्टिस्ट की मदद से फूलन की बहन की पेंटिंग बनायी गयी और वही रविवार के कवर पर छपी। कहते हैं जब किसी ने फूलन को रविवार की कापी दिखायी तो उसने हंसते हुए कहा-यह मैं थोड़े ही हूं यह तो मेरी बहन की फोटो लगती है।

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दफ्तर से बाहर सुरेंद्र प्रताप जी का एक अनोखा रूप हमने उनके गृहनगर श्यामनगर के गारुलिया अंचल में देखा। गारुलिया में एसपी  अपने बड़े भाई नरेंद्र प्रताप सिंह, छोटे भाई सत्येंद्र प्रताप सिंह और परिवार के बाकी सदस्यों के साथ रहते थे। जब से उन्होंने आनंद बाजार प्रकाशन में काम करना प्रारंभ किया वे कोलकाता के पाम एवेन्यू स्थित एक फ्लैट में रहते थे। गाहे-बगाहे वे गारुलिया भी जाते रहते थे। गारुलिया में हमारे परिचित शिवशंकरलाल श्रीवास्तव का घर है। एक बार उन्होंने सपरिवार अपने यहां बुलाया। हम वहां पहुंचे तो भैया ने कहा-यहीं कहीं सुरेंद्र जी का घर है चलो देखें कहीं वे घर ना आये हों। संयोग से सुरेंद्र सिंह घर में मिल गये। साथ में उनके भैया नरेंद्र प्रताप भी थे। वे मेरे भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म से उनके जरिए परिचित थे और उन दिनों उनके द्वारा लिखे जाने वाले लस्टम-पस्टम व व्यंग्य कविताएं पढ़ते थे।

हम लोग अभी बातें कर ही रहे थे कि तभी एसपी बोले- चलिए आपको फुटबाल मैच दिखाते हैं।

हम उनके पीछे-पीछे हुगली नदी (जो गंगा है जिसकी एक शाखा बांग्लादेश की तरफ गयी है और पद्मा कहाती है) के किनारे एक मैदान में गये। बरसात के दिन थे चारों ओर गड्ढ़े थे जिन पर पानी भरा था। आनन-फानन शुरु हुआ फुटबाल का खेल। एसपी को हमने पहले बार इस तरह उत्साह से फुटबाल खेलते देखा था। कुछ देर में शाम होने को आयी और खेल खत्म हुआ। तब तक सभी कीचड़ से बुरी तरह नहा गये थे। एसपी का भी चेहरा पहचान में नहीं आ रहे थे। सभी हुगली नदी में नहाने चले गये और हम लौट पड़े कोलकाता की ट्रेन पक़ड़ने के लिए। (क्रमश:)

 

Friday, December 23, 2022

जब मुझे हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के दर्शन का सौभाग्य मिला

आत्मकथा-51

कोलकाता लौट कर दो दिन विश्राम करने के बाद मैं आफिस पहुंचा। रविवार हिंदी साप्ताहिक के मेरे सभी संपादकीय साथियों और हमारे संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह जी ने मेरे पिता की मृत्यु पर संवेदना व्यक्त की। सबने उनका श्राद्ध कर्म विधिवत पूर्ण होने का समाचार सुन संतुष्टि व्यक्त की। मैने कार्यालय में अपनी नियत भूमिका निभानी शुरू कर दी लेकिन सच कहूं पिता के जाने का दुख भुला नहीं पा रहा था। माना कि मेरे पिता वर्षों से नेत्रहीन थे वह भी एक झोलाछाप वैद्य के चलते पर मेरे यही एहसास काफी था कि मेरे पिता सशरीर मेरे साथ तो हैं।

जब गांव में था पिता जी को हमेशा मेरी चिंता रहती। कहीं बाहर जाता तो प्रभु को याद कर हाथ जोड़ लेते जैसे कह रहे हों-प्रभु बच्चा बाहर जा रहा है उसके साथ रहिएगा।

 सच कहूं उनके आशीर्वाद ही थे जो मेरे साथ कवच बन कर चलते थे और अगर कोई विपत्ति आती तो शायद मैं उनके बल पर ही उनसे पार पा लेता था। पिता चले गये लेकिन मुझे इस बात का एहसास था कि वे जहां भी जिस रूप में भी हैं मुझे आशीर्वाद दे रहे होंगे। यह सच है कि किसी परिजन के देहावसान के बाद वह भैतिक रूप में हमारे बीच भले ही ना रहें उनकी स्मृति हमेशा हृदय में रहती है और यह एहसास भी कि वे जहां भी हैं हमें आशीर्वाद ही दे रहे होंगे।

*

यह तो मैं पहले ही बता चुका हूं कि सुदीप जी के कहने पर सुरेंद्र जी फिल्मी लेख मुझसे लिखवाने लगे थे। उसी दौरान हमारे यहां एक फिल्मी स्तंभ सुनते हैं छपने लगा था जो प्रसिद्ध फिल्म पत्रकार देवयानी चौबाल अंग्रेजी में लिखती थीं जिसका हमारे एक संपादकीय साथी हिंदी में अनुवाद करते थे। आगे बढ़ने से पहले देवयानी चौबाल का थोड़ा परिचय दे देना जरूरी समझता हूं। स्वनाम धन्य देवयानी चौबाल फिल्मी दुनिया में बहुत   विख्यात (कुछ हद तक कुख्यात भी क्योंकि उनका लिखा कभी-कभी किसी किसी अभिनेता को इतना चुभ जाता था कि वे उनकी जान के प्यासे हो जाते थे) रही हैं। वे एक सिने पत्रिका स्टार एंड स्टाइल में एक स्तंभ लिखती थीं नीताज नैटर। यह स्तंभ बहुत ही लोकप्रिय था। कुछ लोग तो देवयानी चौबाल का लिखा यह स्तंभ पढ़ने के लिए ही पत्रिका खरीदते थे। उनके वैसे ही फिल्मी गासिफ सुरेंद्र जी रविवार में सुनते हैं स्तंभ में छापते थे। पता नहीं क्यों उसका अनुवाद वे मुझसे कराना चाहते थे। खैर वे संपादक थे उनका हर आदेश मानना हमारा कर्तव्य था। मैंने हां कर दी और उस अंक से देवयानी चौबाल के फिल्मी गासिप का मैं अनुवाद करने लगा।

 समझ नहीं पा रहा था कि आखिर सुरेंद्र जी ने देवयानी चौबाल का स्तंभ मुझसे ही क्यों अनुवाद करवाना चाहा। इसका जवाब दो महीने बाद मुझे तब मिला जब सुरेंद्र प्रताप सिंह जी ने मुझे अपने केबिन में बुलाया और एक फैक्स संदेश मेरे हाथों में थमाते हुए कहा-आप सवाल कर रहे थे ना कि मैं आपसे अनुवाद क्यों करा रहा हूं देवयानी चौबाल का मैटर। देखिए देवयानी का यह फैक्स आपके सवाल का जवाब है।

मैं शपथ पूर्वक कह रहा हूं मैं इस आत्मकथा में जो कुछ भी लिख रहा हूं वह सच है सच के सिवा कुछ भी नहीं। देवयानी चौबाल का वह फैक्स संदेश मेरे कार्य का प्रमाणपत्र ही था। उसमें लिखा था-सुरेंद्र जी जो भी मेरे स्तंभ का अनुवाद कर रहे हैं उन्हें मेरी ओर से बधाई दीजिएगा। उन्होंने मेरी स्टाइल को क्या खूब समझा है कि लिखा उन्होंने है और लगता है जैसे मैंने ही हिंदी में लिखा हो।

सुरेंद्र जी मेरी तरफ देख कर मुसकराये और बोले-अब मिल गया ना आपको अपने सवाल का जवाब मैं क्यों आपसे देवयानी के लिखे का अनुवाद करवा रहा हूं। इस फैक्स को रख लीजिए यह आपके लिए ऐसा प्रशंसापत्र है जो एक विख्यात फिल्म पत्रकार ने दिया है।

 मैंने सहर्ष उसे अपने पास रखा लेकिन कुछ दिन में ही उसके सारे अक्षर उड़ गये इसलिए मैं उसे साझा नहीं कर पा रहा। आपको मेरे कहे पर यकीन हो तो बहुत अच्छा ना हो तो मैं कुछ नहीं कर सकता।

रविवार अंक दर अंक हिंदी पत्रकारिता में नये आयाम जोड़ रहा था। न दैन्यम् न पलायनम् (ना दीनता ना पलायनवादी रुख) के मूलमंत्र को लेकर चल रहा था और अच्छे-अच्छों की खबर ले रहा था चाहे वे सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता हों या भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी। सच कहें तो उन दिनों भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों में रविवार का खौफ था। स्थिति यह थी कि राज्यों की विधानसभाओं में रविवार प्रमाण के रूप में उछाला जाने लगा था। इसी वजह से एक बार अनर्थ हो गया। सुरेंद्र प्रताप सिंह जी से मिलने अक्सर उनके कुछ पुलिस वाले मित्र आते थे। एक बार तीन-चार पुलिस वाले आये और उन्होंने एसपी( सभी सुरेंद्र जी को इसी नाम से पुकारते थे) के बारे में पूछा। हमारे एक मित्र ने सुरेंद्र जी के केबिन की ओर इशारा किया वे धड़धड़ाते हुए एसपी के कमरे में धड़धड़ाते हुए घुस गये. थोड़ी देर बाद उन लोगों के साथ एसपी निकले और संपादकीय सभी साथियों को संबोधित करते हुए बोले-अरे भाई कोई मुझसे मिलने आये तो पहले मुझे सूचित कर दिया कीजिए। यह मध्यप्रदेश से आये पुलिस अधिकारी हैं जो हमारी पत्रिका में छपी एक स्टोरी पर मामला होने पर मुझे गिरफ्तार करने आये हैं। गिरफ्तार हो चुका हीं मैं जमानत लेने जा रहा हूं।

इस तरह की परेशानियों का सामना अक्सर करना पड़ता था जिसके लिए एक कानूनी विभाग कार्यालय में था जिसे विजित दा संभालते थे। वे बहुत खुश होते थे जब भी कोई मामला होता था।

उदयन शर्मा
समय बीतता गया। दिल्ली में हमारे विशेष संवाददाता थे उदयन शर्मा। वे भारत के महान शिकार कथा लेखक श्रीराम शर्मा के पुत्र थे। श्रीराम शर्मा जो बाद में विशाल भारत के संपादक भी बने। उदयन जी एक साप्ताहिक स्तंभ कुतुबनामा लिखते थे। यह एक तरह से दिल्ली डायरी होती थी और यह रविवार के अंतिम पृष्ठ में छपती थी।

एक बार वे कोलकाता कार्यालय आये। वे पहली बार आये थे तो हमारे संपादक एस पी सिंह ने सारे संवादकीय  साथियों से उनका परिचय कराया।

 सबका परिचय कराते हुए जब एसपी उन्हें लेकर हमारे संपादकीय साथी रहे राजकिशोर के पास पहुंचे तो उदयन से बोले-तुम्हारी लिखी स्टोरी की चीरफाड़ यही करते हैं।

 मुझे अच्छी तरह याद है कि उदयन जी ने राजकिशोर को संबोधित करते हुए कहा था-राजकिशोर जी मैं हिंदी प्रदेश से हूं हिंदी अच्छी तरह से जानता हूं। आपको मेरी स्टोरी संपादित करने का पूरा अधिकार है इसे रिराइट तो मत करिए। मेरी अपनी एक स्टाइल है कहीं तो उसे अर्थात उदयन शर्मा को भी दिखने दीजिए। आप रिराइट करते हैं तो उसमें उदयन शर्मा नहीं आप ही आप नजर आते हैं।  स्पष्ट है कि उदयन की इस टिप्पणी पर राजकिशोर को झेंप जाना पड़ा।

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हजारीप्रसाद द्विवेदी


यह घटना उन दिनों की है जब मोरार जी देसाई की सरकार गिर गयी थी। सुरेंद्र जी रविवार की आमुख कथा की तैयारी कर रहे थे जिसका शीर्षक था मोरार जी के बाद कौन।इसमें मुख्य आमुख कथा के साथ विभन्न वर्ग के लोगों के विचार भी इसमें सम्मिलित करने थे। मेरे जिम्मे शिक्षिका का इंटरव्यू आया और मेरी खोज भारती मिश्रा जी पर जाकर खत्म हुई। उनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि वे हिंदी के मूर्धन्य विद्वान हजारीप्रसाद द्विवेदी की पुत्री हैं। मैंने उनका इंटरव्यू लिया। उन्होंने मोरार जी के बाद कौन पर अपने विचार व्यक्त किये। जब मैं वहां से लौट रहा था तो देखा घर में मेरी बायीं तरफ हिंदी के मूर्धन्य विद्वान हजारीप्रसाद द्विवेदी एक आसन पर विराजमान हैं। मैंने जाकर उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य था कि मुझे उन जैसे अतुलनीय विद्वान के आशीर्वाद मिले। उन्होंने मेरा परिचय जानना चाहा मैंने उनको अपना परिचय दिया। भारती मिश्रा जी के घर से निकलते वक्त पंडित जी के आशीर्वाद और उनके दर्शन की पुण्य स्मृति मेरे साथ थी। (क्रमश:)


Sunday, December 18, 2022

बाबा के निधन के बाद हम अम्मा को कोलकाता ले आये

 आत्मकथा-50

जिस दिन पिता जी के श्राद्ध कर्म और ब्राह्मण व गांव भर के लोगों के भोजन का दिन था उस दिन हमारे घर-आंगन में सुबह से ही बड़ी गहमागहमी थी। गांव की महिलाएं पूड़ियां बेलने के लिए जुट गयी थीं। और भोजन बनाने वाले ब्राह्मण भी अपने काम में लग गये थे। मुझे प्रसन्नता इस बात की थी कि मान्यवर काशीप्रसाद काका के समझाने पर गांव वालों ने सारे भेदभाव भुला कर मेरे आमंत्रण को स्वीकार कर लिया था। एक और बड़ी खुशी यह भी थी कि बिलबई से भैया रामखिलावन त्रिपाठी के चचेरे भाई और उनके घर की बहुए आ गयी थीं और काम में हाथ बंटा रही थीं।

हमारा आंगन बहुत बड़ा था। उसी के एक किनारे मैं उस पूजा में बैठा था जो मेरे बाबा (पिता जी) की आत्मा की शांति के लिए की जा रही थी। दोपहर होते ही गांव के निमंत्रित लोग आने लगे। तब तक पूजा भी समाप्त हो गयी थी। लोगों को जीमने के लिए पंगत में बैठाना शुरू किया जा चुका था। पूजा करानेवाले ब्राह्मण पहले ही भोजन ग्रहण कर जा चुके थे। शाम आते-आते सभी कार्य संपन्न हो गया। बिलबई से आये रिश्तेदार उसी दिन लौटने वाले थे लेकिन उन्हें रोक लिया गया। सुबह होते ही वह वापस लौट गये। पूजा आदि हो जाने के बाद हमारे बेटे की बधाई पूजने का रास्ता साफ हो गया। एक दिन बाद यह शुभ कार्य भी कर लिया गया। ग्राम देवी व अन्य देवताओं के यहां मत्था टेकने के बाद हमने अपने पूर्वजों के उस घर की दहलीज भी पूजी जो कभी हमारे दादा मुखराम शर्मा जी का हुआ करता था। जब मेरे बाबा (पिता जी) अपने जीजा शिवदर्शन तिवारी की मदद के लिए बिलबई चले गये और फिर जीजा के निधन के बाद भांजे रामखिलावन की परवरिश के लिए पहले बिलबई और फिर बांदा चले गये और वर्षों गांव जुगरेहली नहीं लौटे तो गांव के लोगों ने कई एकड़ खेतों और पैतृक मकान पर कब्जा कर लिया था। बाद में जब बाबा जुगरेहली लौटे तो उन्हें रहने के लिए घर गंगाप्रसाद द्विवेदी जी ने दिया था।

देवी-देवताओं की पूजा के बाद घर के द्वार पर बधाई बजने लगी। गांव के लोगों ने आग्रह किया-बधाई के दिन बेटे की मां को भी नाचना पड़ता है। गांव में मेरी पत्नी वंदना को घूंघट डाले रहना पड़ता था। उसने सिर हिला कर मना कर दिया कि वह नहीं नाचेगी। खुशी में लोगों ने खूब बंदूकें दागीं। अब का नहीं जानता पहले हमारे बुंदेलखंड में खुशी के किसी भी आयोजन में बंदूकें दागी जाती थीं।

हमारे सभी कार्य पूरे हो चुके थे अब लौटने की बारी थी लेकिन उससे पहले और भी कुछ काम निपटाने थे जिनमें बचे हुए खेत बेचना और एकमात्र जो गाय थी उसे किसी को देना था। बबेरू जाकर कचहरी में मैंने गांव के ही एक व्यक्ति के नाम अपने खेत रजिस्टर करा दिये। एक गाय थी तो भाई बाबूलाल यादव जी को दे दी क्योंकि हमारी गायें पहले उनकी गायों के साथ चरती थीं। मां को गांव में छोड़ने का कोई मतलब नहीं था। हमें चौबीस घंटे उनकी फ्रिक लगी रहती। कोलकाता इतना नजदीक भी नहीं था कि दो-चार घंटे में हम उनकी मदद के लिए पहुंच सकें। उन्हें कोलकाता ले आना ही ठीक था। भैया रामखिलावन त्रिपाठी और भाभी निरुपमा त्रिपाठी का भी यही मत था। अम्मा भी राजी हो गयीं क्योंकि अकेले रहना उनके लिए भी ठीक नहीं था।

मेरी अम्मा मीरा त्रिपाठी मेरी पत्नी वंदना त्रिपाठी के साथ

भैया बांदा जाकर सबके ट्रेन टिकट ले आये। नियत दिन  घर की चाबी हमने काशीप्रसाद काका को सौंप दी और अम्मां को लेकर बस पकड़ने के लिए गांव से चल पड़े। हमारे साथ गांव के आधे लोग रोते-बिलखते सड़क की ओर बढ़ चले।

वे सभी कह रहे थे-आप हमारे प्राण लिये  जा रहे हैं। एक तिवारिन दाई (मेरी अम्मा को गांव वाले इसी नाम से पुकारते थे) ही हैं जो हर किसी के दुख-दर्द में मदद करने में सबसे आगे रहती हैं। इनको दवाओं का भी अच्छा ज्ञान है सरकारी अस्पताल से लौटे लोगों तक को ये अपनी दवाई से ठीक कर देती थीं। अब हमें हमारे बच्चों को कौन दवा देगा।

हमारे पास उनको ढाढस बंधाने के लिए शब्द नहीं थे। हम बस यही कहते –यहां हम इनको अकेले किसके भरोसे छोड़ें। इनको जब भी गांव की याद आयेगी हम इन्हें आपसे मिलाने ले आया करेंगे।

हमारे आश्वासन से भी उन्हें संतोष नहीं हुआ। वे रोते-बिलखते रहे। बांदा जाने वाली हमारी बस आ गयी थी। हमने सबको हाथ जोड़ कर बस पकड़ ली। मुझे पूरा यकीन है कि गांव वाले अपनी तिवारिन दाई के लिए बहुत रोये होंगे, कई दिन तक रोये होंगे। खासकर तब जब गांव में कोई बीमार पड़ा होगा और उसे तिवारिन दायी कि याद आयी होगी। हमारे पास कोई चारा नहीं था, अम्मा को यों लावारिस छोड़ना ना न्याय संगत होता और ना मानवता की दृष्टि से उचित। उन्हें गांव छोड़ कर हम भी कोलकाता में चैन से नहीं रह पाते।

बांदा पहुंच कर हमने कोलकाता के हावड़ा जाने वाली ट्रेन पकड़ ली। मैंने गौर किया कि ट्रेन के छूटते ही मां ने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया। मेरी समझ में यही आया कि उन्होंने उस ग्राम देवता को प्रणाम किया जो इतने वर्षों तक उनका सहारा रहा। जिसका उन्होंने अन्न जल खाया पिया। जहां अपनी एक संतान गर्भ में खोने के बाद संतान के रूप में मैं मिला। अम्मा को गांव से लाते समय मैं सोच रहा था कि जैसे मैं अपनी उस बहुमूल्य निधि को ला रहा हूं जो अब तक मुझसे दूर थी और जिसकी चिंता हमें बराबर सगी रहती थी। सोचा हमारे साथ जैसे रहेंगी हमारे नजरों के सामने तो रहेंगी। मां को साथ लाते वक्त गांव से जुड़ी एक-एक यादें मस्तिष्क में एक-एक कर उभरने लगीं। वह हमारी गोरुहाई (गायें बांधने की जगह) उसमें रजनी और दूसरी गायें जो उनका नाम पुकारने से ही रंभाने कर जवाब देती थीं। उनकी गरदन सहलाओ तो आंख बंद कर आनंद का संकेत देती थीं। बचपन में मां बहुत जिद करती थीं पर मैं गाय का दूध नहीं  पीता था। वे जब दही मथने बैठती तो कटोरा लेकर उनके पास जा बैठता था। वे कहतीं-दूध नहीं पियोगे आ गये मक्खन, मट्ठे की तलाश में। मां झिड़कती जरूर थीं पर बाद में आधा कटोरे मट्ठे में ताजे मक्खन का लोंदा डालने से नहीं भूलती थीं। मैं चाव से उसे पाता था। भगवान  की कृपा से घर में दूध, घी सब होता था। जब घर में नहीं होता तो मां खरीद कर मुझे खिलाती थीं। मेरे लिए फिक्र इतनी कि थोड़ी-सी खरोंच भी लग जाये तो परेशान हो जाती थीं। बाबा का प्यार ज्यादा दिनों तक मुझे नहीं मिल सका क्योंकि जब मैं छोटा ही था उनकी आंखें खराब हो गयी थीं। जब उन्हें दिखता था तो वे मुझे खेतों तक ले जाते और वहां मेरे नन्हें कदम छुला कर कहते- ये हमारे खेत हैं।  बाबा (मेरे पिता जी) की आंखें जब ठीक थीं गांव में उनकी तरह का साहसी व्यक्ति दूसरा नहीं था। वे बंदूक, तमंचा (वन शाटर),भाला आदि तमाम तरह के हथियार चलाना जानते थे। स्पष्टवादी इतने कि हर झूठा और छल प्रपंच वाला व्यक्ति उनके सामने कुछ बोलने से पहले सौ बार सोचता था।  उनकी आंखें खराब होने के बाद अम्मा ने ही मुझे पाला। यह पहले ही बता आये हैं कि मेरे ममेरे भाई रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म जी को मेरे बाबा और अम्मा का प्यार पहले मिला जब वे सभी हमारे जिले बांदा में रहते थे। मेरा जन्म बाद में हुआ जब मेरे बाबा और अम्मा बांदा छोड़ कर बबेरू प्रखंड के अपने पैतृक गांव जुगरेहली आ गये। जुगरेहली नाम का अर्थ यों तो समझ नहीं आया पर हमने यही अर्थ लगा लिया कि जो जुगों (युगों) से रही वह जुगरेहली। वैसे यहां बता दें की कुर्मी जाति के लोग हमारे गांव को श्रेष्ठ मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि कुर्मियों के जो बारह गांव हैं वहां के लोग अपनी बेटियों का ब्याह जुगरेहली में करना अच्छा समझते हैं।

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दूसरे दिन सुबह –सुबह ट्रेन हावड़ा पहुंत गयी। अम्मा की यह पहली इतनी लंबी ट्रेन यात्रा थी। ईश्वर की कृपा से उन्हें किसी तरह की तकलीफ नहीं हुई। हम कोलकाता के कांकुड़गाछी इलाके के अपने फ्लैट पहुंचे तो अम्मा के रहने का उचित प्रबंध कर दिया गया। मां को कुछ दिन तो अटपटा लगा फिर वे वहां के माहौल से सहज हो गयीं और बांग्ला भाषा ना जानते हुए भी पास-पड़ोस के लोगों से बुंदेली मिश्रित खड़ी बोली में बात करने लगीं। कुछ दिन तक उन्हें गांव की बहुत याद आयी लेकिन फिर यह सोच कर कि अब अपने बच्चों के बीच रहने के अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं वे कोलकाता के हमारे फ्लैट में रहने लगीं। हिस्टीरिया के दौरों ने उन्हें यहां भी नहीं छोड़ा था। वैसे वे अब जल्दी नहीं देर से आते थे लेकिन जिस दिन आते उन्हें बेसुध और बेचैन कर जाते। काफी दवा करायी गयी लेकिन इसमें कोई फर्क नहीं आया।

बताया ना कि बांग्ला भाषा ना जानते हुए भी वे आस-पड़ोस के लोगों को अपनी बात समझाने में सफल रहती थीं। उन्हें वे अपनी औषधियों के बारे में भी बताती थीं। इसके बारे में मुझे तब पता चला जब आसपास के लोगों ने मुझसे बताया कि-आपकी मां तो बहुत गुणी हैं कितनी तरह की औषधियां जानती हैं।

 तब मैं उन्हें बताता कि जिस व्यक्ति को बैलगाड़ी में सरकारी अस्पताल ले जाया गया और डाक्टरों ने कहा कि इसके पैर सेप्टिक हो गया है इसे काटना पड़ेगा नहीं तो यह पूरे शरीर में फैल जायेगा। आस-पास के कई गांवों में अम्मा की ख्याति थी यही सुन कर उसके लोग बैलगाड़ी में लाद कर अम्मा के पास लाये। अम्मा ने उसे देख कर कहा-पैर काटने की जरूरत नहीं, दवा और मलहम दिये दे रहे हैं एक महीने बाद तुम चल कर आओगे। उस व्यक्ति ने पूछा- कितना पैसा देना होगा।

अम्मा ने कहा –बस दवा का। मैं लोगों से इलाज का पैसा नहीं लेती।

वह आदमी दवा और मलहम बनवा कर ले गया। एक महीने बाद वह बैलगाड़ी में दो बोरे आंवले लाद कर लाया और बैलगाड़ी से उतर कर पैदल चलते हुए अम्मा के पास आया और उनके चरण छूकर बोला-आपने मेरा पैर कटने से बचा लिया। अब मेरी भी एक विनती आपको माननी होगी। आप पैसा नहीं लेतीं यह मैंने सुना है पर मैं अपने पेड़ के आंवले लाया हूं यह तो आपको लेने ही होंगे। अम्मा फिर मना नही कर सकीं और उस व्यक्ति के दो बोरे आंवले स्वीकार कर लिये। (क्रमश:)

 

 

Saturday, December 10, 2022

प्राकृतिक संकट के चलते मैं पिता की अंत्येष्टि में नहीं पहुंच पाया

 आत्मकथा-49


सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक कोलकाता पर एक भयानक विपत्ति आ गयी। प्रबल वृष्टि प्रारंभ हुई तो फिर रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे बादल फट गये हों और अपना सारा पानी कोलकाता पर ही उड़ेल कर जायेंगे। लगातार एक सप्ताह की वृष्टि से कोलकाता की सारी सड़के घुटने तक पानी में डूब गयीं।

हमारा फ्लैट निचले तल्ले पर था। वहां भी अंदर घुटनों तक पानी भर गया। पत्नी वंदना त्रिपाठी अपनी दोनों संतानों बेटी अनामिका त्रिपाठी और नन्हें चंद्रमौलि को लिए बैठी थी। सामान जो नष्ट हुआ सो हुआ हमें बच्चों की चिंता थी। हमारी चिंता का अंत तब हुआ जब दो तल्ले पर रहनेवाली एक महिला आयी और मेरी पत्नी वंदना त्रिपाठी को डांटते हुए बोली-अपना छोड़ो क्या तुम्हें बच्चों का डर नहीं। चलो सब ऊपर चलो यहां ताला लगा दो।

  हमारे पास उसका कहा मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। ऊपर एक फ्लैट खाली था वहीं हम बच्चों के साथ जाकर रहने लगे। पानी था कि रुकने का नाम नहीं ले रहा था। जलजमाव और निरंतर हो रही वर्षा डराने लगी थी। कार्यालय जाने का तो सवाल ही नहीं था यातायात के सारे साधन ठप हो गये थे। ट्रेन की पटरियों में जल जम जाने के कारण कई रुटों पर ट्रेन परिचालन भी ठप गया।

हम सब प्रभु से विनती कर रहे थे कि वे इस विपत्ति को दूर करें। सात दिन बाद बरसात थमी पर नगर में भरा पानी उतरने का नाम नहीं ले रहा था। नगर की बरसात का सारा पानी हुगली नदी (गंगा की एक शाखा) में जाता है। गंगा भी उफन रही थी इसलिए पानी धीरे-धीरे जा रहा था।

पानी थोड़ा कम हुआ तो डाकिया किसी तरह से तार लेकर आया। तार का नाम सुनते ही मेरा दिल कांप गया। गांव से आया था वहां से किसी अच्छी खबर की उम्मीद नहीं थी पिता जी बीमार हैं शायद उनकी तबीयत और गंभीर हो गयी होगी। मेरी आशंका सच साबित हुई। तार में पिता जी के निधन का समाचार था। मैंने सबको वह खबर सुनायी और हम सब बिलख-बिलख कर रोने लगे। हमारा रोना सुन वह महिला आ गयी और ,सब कुछ जान कर ढांढ़स बंधाने लगी। कोई कितना भी ढांढंस बंधाये पर जब कोई अपना संसार को छोड़ कर जाता है तो दिल में हूक सी उठती है। लगता है हमारी कोई अनमोल मिधि हमसे छीन ली गयी। लोग अक्सर कहते हैं कि किसी के जाने से दुनिया खत्म नहीं होती मेरा सवाल है कि इससे जानेवाले की अहमियत तो कम नहीं होती। किसी पुत्र के लिए पिता का क्या महत्व होता है जानते हैं आप? अचानक किसी के सिर से उस हाथ का हमेशा के लिए हट जाना जो था तो दिलासा था मेरे पिता का साया सिर पर है मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा। हर तूफान हर संकट से मेरे पिता मुझे बचा लेंगे। जब वह भरोसा खत्म हो गया लगा कि सबक रहते मैं अकेला हो गया हूं।

मेरे बाबा (पिता जी)

 भैया ने ढांढस बंधाते हुए कहा-मैं देख कर आया हूं मामा बहुत कष्ट भोग रहे थे। मामी भी उनको लेकर बहुत परेशान थीं उन्हें खुद हिस्टीरिया के दौरे पड़ने की बीमारी थी। कहने में बुरा लगता है पर अच्छा हुआ कि मामा को कष्ट से मुक्ति मिल गयी। अब हम लोगों को गांव चलना होगा। मामी वहां अकेली हैं उन्होंने गांव वालों की मदद से अंत्येष्टि की होगी अब मामा के अवशेषों का संगम में विसर्जन और श्राद्ध कार्य भी करना होगा।

भैया मुझसे बोले-ऐसा करो कल मेरे साथ पैदल ही चलते हैं मैं सन्मार्ग चला जाऊंगा तुम आनंद बाजार के आफिस में जाकर छुट्टी के लिए अप्लीकेशन दे देना मैं भी अपने यहां दे दूंगा।

 हम लोग घुटनों तक पानी में चलते हुए अपने अपने आफिस पहुंचे। भैया का आफिस नजदीक था महाजाति सदन के पास और मेरा धर्मतला के पास हिंदुस्तान बिल्डिंग के सामने।

मैं जब आफिस पहुंचा तो हमारे संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह का पहला प्रश्न था- कैसे आये राजेश जी।

मैंने उत्तर दिया-पैदल।

एसपी बोले-रजिस्टर में सिगनेचर कीजिए और जाइए। जब स्थिति संभल जाये तभी आइएगा।

मैंने कहा-भैया एक दुखद खबर है।

एस पी बोले-कैसी दुखद खबर राजेश जी?

भैया मेरे पिता जी का निधन हो गया है। मुझे देर से खबर मिंली। अंत्येष्टि तो मां ने की गांव वालों की मदद से अब मुझे संगम में उनका अस्थि विसर्जन और श्राद्ध कर्म की विधि संपन्न करना है। मुझे एक माह की छट्टी चाहिए।

एसपी ने पहले तो मेरे पिता के निधन पर संवेदना व्यक्त की फिर कहा-आप अभी अप्लीकेशन लिख कर मुझे दे दो आप जितना जल्द हो गांव चले जाओ, छुट्टी मैं पास करवा लूंगा।

पिता जी का निधन सुन रविवार पत्रिका के मेरे अन्य साथियों ने भी दुख जताया और ढांढंस बंधाया कि आप धैर्य धारण कीजिए और परिवार को भी धैर्य बंधाइए। जो हुआ उसमें किसी का वश नहीं यह सोच कर अपने आपको संभालिए।

घर लौट कर हमने गांव जाने की तैयारी शुरू कर दी। किसी तरह ट्रैवेल एजेंट से टिकट बुक कराया। हमारे फ्लैट के जितने जान-पहचान वाले पड़ोसी सब हमारे दुख में शामिल हुए। हमें दुखी देख उनकी भी आंखें नम हो गयी थीं।यह दुनिया का दस्तूर है कि जो आपके साथ हंसा है उसे भले ही आप भूल जायें लेकिन आपके दुख में आंसू बहाने वाले आपको आजीवन याद रहते हैं।

*

हमने नियत समय पर ट्रेन पकड़ी और पूरा परिवार दूसरे दिन बांदा जिले के बबेरू प्रखंड के गांव जुगरेहली पहुंच गया। घर पहुंचते ही मां सबसे लिपट कर रोने लगीं। उनके दुख की कोई सीमा ना थी वे अब नितांत अकेली हो गयी थीं। पिता नेत्रहीन भले सही मां को इतना तो भरोसा था कि सिर पर कोई है। हम सबने मां को धीरज बंधाया, बहुत समझाय़ा और कहा –अब तुम अकेले नहीं रहोगी तुम्हें हम साथ ले जायेंगे। तुम यहां अकेली रहोगी तो हमारे प्राण यहीं अटके रहेंगे।

 मां को हमने समझाया कि हमें तार देर से मिला उधर कोलकाता में लगातार पानी बरसने से सारी सेवाएं ठप थीं इसीलिए तार भी देर से मिला।


मां ने समझाया कि किस तरह से गांव वालों ने उनको अंत्येष्टि में मदद की। उन्होंने कहा कि अब हम लोगों को उनकी अस्थियां इलाहाबाद में विसर्जित कर पिंडदान करना है और फिर यहां आकर श्राद्ध करना है।

मेरी अम्मा (मां)

 मैंने थैले में रखे पिता जी के अवशेष लिए और शिवबालक नाई और गांव के एक दूसरे व्यक्ति को साथ लिया और बस से इलाहाबाद पहुंचे। वहां हम एक ऐसे व्यक्ति के यहां रुके जो श्राद्ध आदि कर्म कराते थे। उनके घर रात बिता कर सुबह हम सब नाव से यमुना से होते हुए संगम की ओर चल पड़े। यमुना का गहरे रंग का पानी देख कर मुझे खेर गांव याद आ गया जहां हम लोग रामलीला करने गये थे।  वहां एक शाम मैं यमुना में मरते बचा था। जब मैंने पीछे मुड़ कर देखा जो पाया कि जो मल्लाह नाव खे रहा था उसके पास एक ही डांड था। डांड यानी वह काठ का औजार जिससे मल्लाह पानी काटा करते हैं। उसे पतवार भी कह सकते हैं। जब मल्लाह से इस बारे में पूछा तो उसने बताया-अरे साहब कुछ नहीं होगा,मैं महीनों से एक डांड से ही चला रहा हूं।

 मल्लाह ने समझा तो दिया लेकिन मेरा डर दूर नहीं हुआ, मैं प्रभु से मना रहा था कि  हे प्रभु गांव तक सुरक्षित लौटा दीजिएगा अभी बहुत सी जिम्मेदारियां निभानी है मुझे।

खैर संगम आया और पिता की अस्थियां विसर्जित कर मैंने क्षमा मांगी आखिरी क्षणों में उनके पास ना रह पाने के लिए उन्हें अंतिम प्रणाम किय़ा. वहीं गंगा तट पर पंडित जी ने मुझसे पिंडदान कि विधि संपन्न करवायी और हम वापस लौट पड़े।हमारे साथ वे पंडित जी भी थे जिनके घर हम ठहरे थे और जिन्होंने पिंडदान कराया था। इलाहाबाद का सारा कार्य संपन्न हो चुका था हमने पंडित जी को दक्षिणा दी और बांदा जानेवाली  बस पकड़ ली। शाम होते-होते हम गांव पहुंच गये।

दूसरे दिन ही वह तिथि तय कर ली गयी जिस दिन श्राद्ध कर्म व स्वजन भोजन होना था। गांव के सभी लोगों को निमंत्रण दे दिया गया। बिलबई में रहनेवाले भैया रामखिलावन त्रिपाठी के चचेरे भाइयों को भी निमंत्रण भेज दिया गया। लेकिन दूसरे ही दिन से गांव में अलग-अलग गुट बन गये। सभी यह कहने लगे कि-वे लोग जायेंगे तो हम नहीं जायेंगे। आपने सात कनौजिया नौ चूल्हे वाली कहावत तो सुनी होगी बस वैसी ही स्थिति। मैं परेशान हो गया। मैं किसी गुट में नहीं आता था। गांव से वर्षों से दूर था पता  ही नहीं चल सका कि गांव गुटों में बंट गया है।

मैं हर गुट के नेता के पास गया। हाथ जोड़ कर विनती की कि मैं सबका हूं सब मेरे हैं मैं किसी गुट का नहीं। मेरी मां गांव के हर एक व्यक्ति के दुख-सुख की सहभागी रही है। आप सब मेरे बाबा (पिता) को श्रद्धा करते रहे हैं। उन्हीं तिवारी बाबा के श्राद्ध का प्रसाद पाने में आप आनाकानी कर रहे हैं।

  उस दिन मुझे गांव में प्रवेश कर चुकी जातीय प्रतिद्विता और द्वेष का

अनुभव हुआ। मेरे पास काशीप्रसाद काका (हमारे भैया अमरनाथ द्विवेदी जी के पिता जी) के पास जाने और विनती करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। मैंने जाकर उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और सारी समस्या सुनायी।

 उन्होंने कहा –तुम चिंता मत करो, कल मैं अपने यहां हर गुट के नेताओं, उनके मुख्य लोगों को शाम के वक्त बुलाता हूं तुम अवश्य आना देखता हूं कौन है जो नहीं मानता।

दूसरे दिन काशीप्रसाद काका के दरबार में सभा हुई। सारे गुट के नेता उनसे जुड़े प्रभावशाली लोग वहां एकत्र हो चुके थे। काशीप्रसाद काका ने कहा-तिवारी तुम्हें इन लोगों से क्या कहना है।

मैंने-हाथ जोड़ कर सभी से निवेदन किया-मेरे बाबा (पिता) आप सबके प्रिय रहे हैं। हर एक के सुख दुख के साथी रहे हैं। अब मैं उनके श्राद्ध के लिए आपको न्योता दे रहा हूं। मैं गांव से दूर रहा मुझे पता नहीं एक छोटा सा गांव कब इतने गुटों में बंट गया। मेरे लिए अपनी जिद छोड़ दीजिए। मेरा यहां यह आखिरी काम है फिर शायद कभी-कदा मेहमानों की तरह ही आना हो पायेगा। आज अगर आप मेरी विनती नहीं मानेंगे तो उस गांव से जहां मैंने जन्म लिया, आप सबकी गोद में खेला भारी मन लेकर जाऊंगा।

इसके बाद काशीप्रसाद काका की ओर मुड़ते हुए बोला-काका बस मुझे इतना ही कहना था।

काका ने उन जातीय नेताओं की ओर देख कर कहा- मेरा भी कहना है कि तिवारी बाबा के काम में आप सब खुशी-खुशी जाओ अपनी यह प्रतिज्ञा बाद में निभाते रहना।

थोड़ी देर तक सभा में खामोशी रही फिर सबने एक साथ हाथ उठा कर कहा-हम सब राजी  हैं।

 मैं हाथ जोड़ कर काका काशीप्रसाद को प्रणाम कर घर लौट आया। हम श्राद्ध कार्यक्रम, ब्राह्मण भोजन, ग्राम्यजनों के भोजन के इंतजाम की तैयारी में जुट गये। (क्रमश:)

 

Monday, December 5, 2022

जब मुंबई के प्रसिद्ध फिल्म पत्रकार ने की मेरी प्रशंसा

आत्मकथा-48 

 ह तो पहले ही बता आये हैं कि रविवार को पाठकों की नब्ज पकड़ने में देरी नहीं लगी। दूसरी पत्रिकाओं के मुकाबले इसे पाठकों ने सर्वाधिक पसंद किया। इसका एकमात्र कारण य़ह था कि इसने जहां आवश्यक समझी सत्ता के शीर्ष तक सवाल उठाने में झिझक नहीं दिखायी। इसी क्रम में देश की एक बड़ी नेता की उपाधि गलत छप गयी। रविवार की एक-एक लाइन लोग ध्यान से पढ़ते थे। विधानसभाओं में तो इसे किसी घोटाले आदि के प्रमाण के रूप में उछाला जाता था।

जिस घटना का हम जिक्र कर रहे हैं उसमें देश की एक बड़ी नेता की उपाधि गलत छप गयी थी। रविवार के किसी सजग पाठक ने पंक्ति और शब्द गिन कर संपादक को पत्र लिखा कि आप चाहे जितने व्यवस्था विरोधी संपादक हों पर आपको शालीनता नहीं त्यागनी चाहिए। पाठक ने यह भी पूछा था कि यह सायास है या अनायास। मतलब असावधानी से ऐसा हो गया या इरादन ऐसा कर दिया गया। इस घटना के बाद हमारे संपादक एस पी सिंह ने संपादकीय विभाग के सभी साथियों को बुलाया और उस पाठक का पत्र दिखाते हुए कहा-आज आप लोगों के चलते मेरा सिर नीचा हो गया। मैंने बार-बार कहा है कि आप लोग आपस में एक-दूसरे से अपना मैटर चेक करा लीजिए। आपकी गलती आपका साथी देखेगा तो वह ठीक करा देगा। आपको उसके सामने लज्जित होने की बात नहीं क्योंकि वह आपको सही कर रहा है।
देखिए आपमें से किसी एक की गलती के लिए मुझे शर्मिंदा होना पड़ रहा है। मैं रविवार पत्रिका में ही पूरे पेज का जवाब लिख रहा हूं यह स्पष्ट करते हुए कि हम कितने भी व्यवस्था विरोधी पत्र हों पर हम कभी अपनी शालीनता नहीं छोड़ेगे।
साल बीतते-बीतते हमारी टीम में कुछ और लोग जुड़ गये। शिशिर गुप्त और विजय कुमार मिश्र रविवार की टीम में जुड़ गये। शिशिर गुप्त को पत्रकारिता विरासत में मिली थी। उनके पिता साहित्यकार मोहनलाल गुप्त भैयाजी बनारसी के नाम से ख्यात व्यंग्य कवि और पत्रकार थे।
 विजय कुमार मिश्र बिहार से आये थे। उनके पिता जी कोलकाता में किसी सर्विस में थे।
उदयन शर्मा दिल्ली में विशेष प्रतिनिधि के रूप में थे। वे एक स्तंभ कुतुबनामा भी लिखा करते थे जो एक तरह से साप्ताहिक दिल्ली डायरी हुआ करती थी।
यहां एक बात बताता चलूं कि मुझे और दो-एक जन को छोड़ कर बाकी लोग अक्सर एस पी सिंह के केबिन में जाकर बातें करते रहते थे। कुछ दिन बाद मुझे लगा कि कहीं एस पी यह ना सोच बैठें कि मैं अहंकारी हूं और उनसे मिलने की जरूरत नहीं समझता। अपनी इस उलझन को सुलझाने के लिए एक दिन मैंने उनके केबिन में प्रवेश किया और नमस्कार किया।
 एस पी बोले-बैठिए राजेश जी कैसे आना हुआ, कुछ कहना है।
मैंने कहा –जी हां।
एस पी बोले-बोलिए निस्संकोच बोलिए।
मैंने कहा- भाई साहब कई लोग आपके केबिन में बैठ कर बातें करते रहते हैं। मेरे मन में आपके लिए बहुत सम्मान है पर मेरी अपनी धारणा है कि हम कार्यालय में काम करने आते हैं ना कि आपके बहुमूल्य समय में आपके पास बैठ कर गप हांकने। मैं काम के लिए आता हूं और आफिस आवर्स का एक-एक मिनट हमारा काम के लिए समर्पित होना चाहिए। आप कुछ अन्यथा ना सोच बैठें इसलिए अपने मन की बात कहने आया।
एस पी बोले-अरे राजेश जी, मैं खुद उन लोगों से परेशान होता हूं लेकिन मना नहीं कर पाता कि यह कहीं मेरे विरुद्ध ही प्रचार ना करने लगें कि संपादक घमंडी है सहयोगियों से बात ही नहीं करता। आपको तो मैं हरदम काम करता पाता हूं आपसे मुझे क्या शिकायत हो सकती है। आप अपने मन से यह सब निकाल दीजिए आराम से काम कीजिए।
 मेरा मन हलका हो गया कि चलो संपादक का मन मेरे प्रति साफ है।
 समय बीता और रविवार में फिल्मों आदि पर भी लेख जाने लगे। अक्सर जब खाली समय होता और एस पी कार्यालय में नहीं होते तो मुझमें और सुदीप जी में खूब बातें होतीं। इनमें फिल्मों के बारे में मेरी जानकारी की भी बात होती।मेरी बातें सुदीप जी गौर से सुना करते थे।
  एक दिन क्या हुआ कि मैं नीचे प्रेस में किसी स्टोरी का फाइनल प्रूफ पहुंचाने गया। लौट कर आया तो अपनी सीट पर बैठ पाऊं इससे पहले एस पी ने मुझे बुला लिया-राजेश जी इधर आइए।
मै उनके पास गया और उनकी अनुमति मिलने के बाद उनके सामने की कुर्सी में बैठ गया।
एस पी बोले-कल मुझे वी शांताराम पर एक लेख चाहिए।
मैंने कहा-भैया मुंबई वाले तो  लिख रहे हैं उन्हीं से लिखवा लीजिए ना।
वे बोले-नहीं आप ही लिखेंगे।
मैं समझ गया कि जब तक मैं नीचे प्रेस से लौटा सुदीप जी ने एस पी को मेरे फिल्मी ज्ञान का परिचय दे दिया है। मैंने सुदीप जी की ओर देखा तो वे मुसकराये, मुझे मेरा जवाब मिल गया।
उसके बाद से तो अक्सर फिल्मों पर मेरा कोई ना कोई लेख जाता रहा।
कुछ अरसा बाद अभिनेत्री नरगिस की लंबी बीमारी के बाद मृत्यु की खबर आयी। एस पी ने फिर कहा-इस पर भी आपको लिखना है।
मैंने एक बार फिर कहा-भैया इसे तो मुंबई वालों से करा लीजिए वे पूरे घटनाक्रम से जुड़े रहे होंगे।
एस पी ने कहा-नहीं यह आपको ही लिखना है और यही लगे कि किसी मुंबई वाला पत्रकार जैसा लिखता आपने उससे बेहतर लिखा है।
अब मेरे सामने यह चुनौती थी। चुनौतियां मुझे डराती नहीं मुझमें नया हौसला जगाती हैं। मैंने सोच लिया कि जब एस पी ने मुझे पर भरोसा किया है तो उस पर मुझे खरा उतरना है।
 मैंने नरगिस की नृत्यु पर आलेख तैयार किया। एस पी को पढ़ने को दिया तो उसे पढ़ने के बाद वे मुसकराते हुए केबिन से बाहर आये और राजकिशोर को वह आलेख देते हुए बोले-राजेश जी ने बहुत अच्छा लिखा है अब आप इसका एक अच्छा-सा शीर्षक लगा दीजिए। राजकिशोर जी ने पढ़ा और कहा-वाकई राजेश जी ने अच्छा लिखा है।
राजकिशोर जी ने शीर्षक भी अच्छा लगाया-जिंदगी की बड़ी कशिश थी पर मौत का एक दिन मुअय्यन था। मुअय्यन अर्थात निश्चित।
लेख रविवार में प्रकाशित हो गया। उसके दो-चार दिन बाद अनिल सारी  नामक एक फिल्म  पत्रकार मुंबई से कोलकाता एस पी से मिलने आये। तब तक रविवार कार्यालय  उसी ब्लिडिंग में बाहरी दीवाल से सटी जगह में आ गया था जहां सबसे अंत में एस पी का केबिन था और बाहर एक लंबे रो में हम सब बैठते थे।
 अनिल सारी और एस पी केबिन से बाहर आकर बातें कर रहे थे  कि तभी अनिल सारी ने पूछा-यार एस पी यह राजेश त्रिपाठी कौन है जिसने नरगिस की मृत्यु पर लिखा है। ऐसा लगता कि जैसे वह उसकी आती-जाती सांसें गिन रहा था। क्या खूब लिखा है।
एस पी ने कहा-मुंबई में एक नया लड़का आया है तुम नहीं जानते।
अनिल सारी ने कहा- क्या बात करते हो मैं मुंबई के एक-एक फिल्म पत्रकार को जानता हूं। वहां इस नाम का कोई नहीं है।
 जब एस पी ने देखा कि अनिल परेशान हो रहे हैं तो उन्हें लेकर मेरे पास आये मैंने खड़े होकर दोनों को नमस्कार किया।
एस पी बोले-यह हैं हमारे राजेश त्रिपाठी, इन्होंने लिखी है वह रिपोर्ट।
अनिल सारी ने मुझे हृदय से लगा लिया और कहा-वाकई यह है सच्ची पत्रकारिता। अगर एस पी नहीं बताते तो मैं भ्रमित रहता और जाकर मुंबई में राजेश त्रिपाठी को खोजता। वाह भाई वाह।
उतने बड़े पत्रकार की यह वाह वाही मेरा सबसे बड़ा पुरस्कार था।
इस किस्त को समाप्त करते करते एक अच्छी खबर भी सुनाता चलूं। हमारे घर पहली संतान के रूप में कन्या आयी थी सबको इंतजार एक बेटे का था प्रभु ने वह इच्छा भी पूरी कर दी एक संतान देकर जिसका नाम हमने चंद्रमौलि रखा। चंद्रमौलि अर्थात जिनके शिर पर चंद्रमा हैं यानी भगवान शिव।
 उन्हीं दिनों गांव जुगरेहली से पिता जी के अस्वस्थ होने की खबर आयी। मैं तो नहीं जा पाया लेकिन भैया  गांव गये और पिता जी के कानों में कह आये कि आपके नाती हुआ है। पच्चानबे वर्ष की वय में पहुंचे पिता जी कुछ बोल तो नहीं पाये हां हाथ हिला कर संकेत दिया कि अच्छा है। (क्रमश:)