Monday, August 15, 2022

जब शम्मी कपूर की बातों ने चौंका दिया

 

 त्मकथा-40


यह हमारे लिए बड़ी प्रसन्नता की बात थी कि हमारे साथ एक्टर बनने या एक्टिंग की सीखने की ख्वाहिश ले मुंबई गये युवक की आंखों से चकाचौंध वाली फिल्मी दुनिया का मोह हट गया था। उसे समझ आ गया था कि यहां के लुभावने अंधेरे के पीछे गहरा अंधेरा है। अगर कोई इस अंधेरे में खो गया तो फिर उसने अपनी जिंदगी तबाह कर ली। इसके बाद उस युवक ने तय किया कि आये हैं तो मुंबई घूम लेते हैं फिर वापस अपने-अपने धाम।

 मुंबई दर्शन के क्रम में हम सबसे पहले गेट वे आफ इंडिया पहुंचे। यह रब सागर के अपोलो में बना एत द्वार है। इसके पास शिवाजी महाराज का स्टैच्यू और प्रसिद्ध होटल ताजमहल है। वहां से एलिफेंटा केव्स के लिए मोटर वोट्स थोड़ी-थोड़ी देर में सवारियां लेकर जा रहे थे। एलिफेंटा द्वीप महाराष्ट्र के मुंबई शहर में स्थित गेटवे ऑफ इंडिया से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। एलिफेंटा को घारापुरी के नाम से भी जाना जाता है जो कोंकणी मौर्य की द्वीपीय राजधानी थी। एलिफेंटा नाम पुर्तगालियों द्वारा यहां पर बने पत्थर के हाथी के कारण दिया गया था। यहां अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। पहाड़ियों को काटकर बनाई गई ये मूर्तियां दक्षिण भारतीय मूर्तिकला से प्रेरित हैं। यहां आने के बाद एक अलग ही दुनिया में आने जैसा अहसास होता है।मेरे भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म फिल्मी साप्ताहिक स्क्रीन के संपादक होने के नाते मुंबई आते-जाते रहते थे। वे एलिफैंटा कैव्स देख आये थे और वहां उकेरी गयी मूर्तिकला की बड़ी तारीफ कर रहे थे। वे बार-बार कह रहे थे चलो मोटरबोट पकड़ लेते हैं और देख आते हैं। बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा। हमारे साथ गया युवक तुरत तैयार हो गया और बोला-टलते हैं चाचा जी।

गेट वे आफ इंडिया

मैं अड़ गया और बोला कि- पानी में मेरी अल्प है, डूब कर मरने की आशंका हैय़ एक बार मैं यमुना में डूबते बचा था। दोनों ने बार-बार समझाया पर मैं अड़ा रहा। मेरे इस निर्णय से भैया को तो कुछ नहीं हुआ लेकिन हमारे साथ गये युवक का चेहरा उतर गया। भैया ने भी हठ नहीं किया सवाल भाई की जिंदगी का था।

हमने हाजी अली पीर की दरगाह में भी गये जो वर्ली के पास एक समुद्री टापू पर स्थित है पर कभी डूबती नहीं है। वह समुद्र के अंदर है वहां तक जाने के लिए एक सड़क बनी है। जब हम लोग सड़क से समुद्र के अंदर स्थित दरगाह जा रहे थे तो आसपास उठती समुद्र की लहरें सड़की दीवार से टकरा कर हमें भिगो रही थीं। मुझे बहुत डर लग रहा था। मैं भैया और अपने साथ गये मेरे दोस्त के बीच चलने लगा। जब हम लोग हाजी अली पीर की दरगाह में थे शाम के सात बज गये थे लेकिन उस वक्त भी वहां धूप खिली थी। हम लोग कोलकाता से गये थे जहां शाम सात बजे तक अंधेरा छा जाता है।

 दूसरे दिन हमारा गंतव्य था आर के स्टूडियो था जो मुंबई के चेंबूर इलाके में था। हमने वहां जाने के लिए टैक्सी पकड़ी। टैक्सी ने हमें आर के स्टूडियो से बहुत पहले ही उतार दिया। हमने पूछा-कितनी दूर है आर के स्टूडियो टैक्सी ड्राइवर ने उत्तर दिया-बस यही बाजू में है।

 मई का महीना था, सूरज की तीखी धूप थी। हम चल पड़े आर के स्टूडियो की ओर. देर तक चलते रहे।रास्ते में जिस किसी से पूछते वह बोलता-बस यही बाजू में है। गरनी से हालत बेहाल थी। हम समझ नहीं पा रहे थे कि मुंबई में जू की नाप इतनी लंबी होती है।

आखिरकार हम लोग आर के स्टूडियो पहुंच ही गये। वहां जाकर देखा गेट से घुसते ही दायीं ओर ट्रेन लाइन बनी है और उस पर ट्रेन के दो डिब्बे रखे हैं। सोचा यह शूटिंग के काम आते होंगे।

आगे बढ़े तो देखा एक सेट के बाहर षम्मी कपूर मन मारे बैठते हैं। नमस्ते कर के उनकी उदासी का कारण पूछा तो बोले- अरे आज यूसुफ साहब (दिलीप कुमार) के भाई साहब का इंतकाल हो गया है।

 उन्हें सहज होने में थोड़ा वक्त लगा फिर पूछा- किस फिल्म का सेट है इस स्टूडियो में।

उन्होंने सहजता से जवाब दिया-समझ लीजिए बंडलबाज।

सचमुच बाद में वह फिल्म बंडलबाज के नाम से ही रिलीज हुई जिसमें राजेश खन्ना, सुलक्षणा पंडित और देवकुमार की भूमिकाएं थीं।

 अब हमने शम्मी कपूर जी से आग्रह किया कि अगक राज कपूर जी से मिलवा देते तो हमारी आर के की यात्रा पूरी हो जाती।

 शम्मी मुसकरा कर बोले-राज साहब अभी वह सामने की काटेज में हीरोइन के साथ स्टोरी डिसकशन में हैं। अभी आप क्या मैं और कोई भी उनसे नहीं मिल सकता।

हमने लोगों में इस तरह की बातें सुन तो रखी थीं लेकिन शम्मी कपूर जी ने इसकी पुष्टि कर दी। यह जानकारी हमारे लिए चौंकाने वाली थी। यहीम यह बता देें कि आर के स्टूडियो अब बिक चुका है।

 *

अब हमारी मुंबई से लौटने की बारी थी। टिकट हमने पहले से बुक करा लिये थे जो कन्फर्म थे। हम लोग मुंबई मेल पकड़ने के लिए मुंबई वीटी स्टेशन पहुंचे। वहां पहुंचे तो पता चला कि जार्ज फर्नांडीज ने पूरे भारत में अचानक रेल हड़ताल की घोषणा कर दी है। इसका पता चलते ही सभी लोग स्टेशन की ओर दौड़ पड़े। सभी चाह रहे थे कि वे जल्द से जल्द अपने घरों को लौट चलें। हम तीनों भी एक ट्रेन में चढ़ गये। ट्केन अभी चली ही थी कि टिकट चेकर आया और जाने क्यों उसनें हमने तीनों को तत्काल उतर जाने को कहा। हमारे साथ गये युवक ने बहुत मिन्नत की लेकिन उस टिकट चेकर का दिल नहीं पिघला। उसने कहा-यहां उतर जाओ वरना ऐसी जंगल में उतारूंगा कि जहां पानी तक नहीं मिलेगा। हम लोग दादर स्टेशन में उतर गये।

 वहां हमने लोगों से पूछा कि अब हम क्या करें। कुछ लोगों ने सलाह दी कि आप यहां से भूसावल के लिए गाड़ी मिलेगी। वहां चले जाइए वहां कुछ डिब्बे कोलकाता जाने वाली गाड़ी में जुटते हैं। वहां वे डिब्बे खड़े मिलेंगे उन पर बैठ जाइएगा। हमने वैसा ही किया और बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा। कुछ दूर चलने पर ही वे डिब्बे मराठी आदिवासियों से भर गये। उनके साथ महिलाएं भी थीं। स्थिति यह धी कि एक व्यक्ति को पेशाब लगी तो वह उठ कर संडास की तरफ जाने लगा। उसका पैर शायद किसी औरत को छू गया वह झल्लायी और उसका पति उस आदमी पर टूट पड़ा। उसका सिर फोड़ डाला। वह वापस अपनी सीट  पर बैठ गया। हम लोग दबे-दबाये बैठे रहे। कुछ स्टेशन बाद वे आदिवासी उतर गये। जगह खाली हुई तब कभी हम लघुशंका कर पाये। जब गाड़ी ने हावड़ा को छुआ तब हमने चैन की सांस ली। (क्रमश:)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Monday, August 8, 2022

मायानगरी के सच ने खोल दीं युवक की आंखें

आत्मकथा-39


भाग-39

राजेश त्रिपाठी

आत्मकथा के पिछले भाग में हमने मुंबई के फिल्म उद्योग की कड़वी सच्चाई दिखाई जहां अपना भाग्य चमकाने, हीरो बनने जाने वाले नवयुवकों को किस तरह झूठा दिलासा देकर भटकाया जाता है। आपने निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा की कहानी सुनी जिन्होंने एक थप्पड़ जड़ कर राज कपूर स्टार बना दिया। हमारे साथ कोलकाता के उपनगर से जो युवक  हीरो बनने, अभिनय की ट्रेनिंग लेने के लिए ट्रेनिंग इस्टीट्यूट में भर्ती होने की गरज से आया था उसका हौसला केदार शर्मा के मुंह से मुंबई फिल्म उद्योग की सच्चाई सुन काफी हद तक पस्त हो चुका था। हौसला खत्म नहीं हुआ था।

वह युवक मेरे भैया रुक्म जी से बोला-चाचा जी जिस एक्टिंग स्कूल का मेरे पास विज्ञापन है वहां राजेश खन्ना भी एक्टिंग सिखाते हैं। उनसे भी मिल कर पूछ लेते हैं।

भैया बोले-अरे भाई राजेश खन्ना अभी सुपर स्टार हैं। एक एक दिन में कई शिफ्ट शूटिंग करते हैं। उनके पास सांस लेने की फुरसत नहीं एक्टिंग पढ़ाने का समय वे कहां से निकाल पाते होंगे।

वह युवक बोला- फिर भी चाचा जी एक बार राजेश खन्ना जी से मिल कर जानकारी ले लेते हैं मुझे भी तसल्ली हो जायेगी।

 भैया ने कहा-ठीक है, होटल चल कर राजेश खन्ना के यहां फोन कर लेते हैं अगर वे मिलने का समय देते हैं तो मिल लेते हैं।

होटल अरोमा लौट कर राजेश खन्ना के घर आशीर्वाद में मैने ही फोन लगाया। उधर से किसी ने हलो कहा तो मैंने अपना परिचय देते हुए उनसे राजेश खन्ना जी से मिलने की इच्छा व्यक्त की। हम कोलकाता से हैं पत्रकार हैं यह सुन कर दूसरे सिरे से फोन उठाने वाले ने कहा-जल्दी आ जाइए, काका (राजेश खन्ना को उनके करीबी प्यार से इसी नाम से पुकारते थे) फिल्म रोटी की शूटिंग के लिए चांदीवली आउटडोर स्टूडियों के लिए निकलने वाले हैं।

 हम लोगों ने तुरत नीचे जाकर एक टैक्सी पकड़ी और कुछ समय बाद हम लोग बांद्रा के कार्टर रोड पर स्थित राजेश खन्ना के बंगले आर्शीवाद के सामने खड़े थे। बंगला बहुत ही आलीशान था लेकिन उसके सामने का दृश्य उतना ही बुरा। समुद्र का एक कोना उधर निकल गया था जिसमें सड़ती जलकुंभी की गंध नथुने फाड़ रही थी।यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि यह बात 70 के दशक के प्रारंभ की है। अब तो आशीर्वाद बंगला बिक चुका है उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

 हमने बंगले के दरवाजे के पास जाकर देखा कि वहां छह-सात रंगबाज टाइप के लड़के खड़े सिगरेट फूंक रहे थे। हम दरवाजे की ओर बढ़े तो वे हमारे सामने खड़े होकर तन गये और पूछा-कहां, हमने कहा –राजेश खन्ना से मिलना है। वे बोले-दिन भर बहुत लोग आते हैं तो क्या किसी को भी अंदर जाने की इजाजत दे दी जाये। आप हैं कौन?

हम परेशान हो रहे थे क्योंकि हमें बताया गया था कि राजेश खन्ना आउटडोर के लिए निकलने वाले हैं। वे लोग हमें भीतर जाने से रोकने के लिए कटिबद्ध थे और हमें हर हाल में भीतर जाना था।

 अब मैं थोड़ी ऊंची आवाज में बोला-भाई हम लोग कोलकाता से आये हैं। राजेश खन्ना के आफिस से बात हो गयी है। उनके बुलाने पर ही यहां आये हैं।

 मेरा इतना बोलना काम आ गया। आशीर्वाद का दरवाजा खुला और उससे एक छरहरे बदन का गोरा-चिट्टा युवक निकला। उसने निकलते ही कहा-कोलकाता से कौन आये हैं।

 मैंने जवाब दिया-हम लोग आये हैं पर यह लोग ना जाने क्यों हमें रोक रहे हैं।

वह युवक बोला-आप आइए।

अब वे युवक एक ओर हट गये और हम आशीर्वाद बंगले में प्रवेश कर गये। जो युवक हमें अंदर ले गया उसने अपना परिचय राजेश खन्ना के सचिव प्रशांत के रूप में दिया। वह भी बंगाल से था। उसे यह जान कर हर्ष हुआ कि हम भी उसके प्रांत बंगाल से हैं। उसने बताया कि वह है तो बंगाली पर उसे बांगला नहीं आती। बंगाल से जब मां की बांग्ला में लिखी चिट्ठी आती है तो उसे पढ़वाने के लिए वह निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत के पास जाता है।

 अभी हम लोगों की बात चल ही रही थी कि ऊपर से राजेश खन्ना के संबंधी के.के तलवार जी आये। वे अपनी गोद में राजेश खन्ना और डिंपल की नन्हीं-मुन्नी बेटी ट्वीकंल को लिये हुए थे। उन्होंने प्रशांत से पूछा- काका से मिलने कौन आये हैं।

प्रशांत ने हम लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा-ये लोग कोलकाता से आये हैं। पत्रकार हैं काका से मिलना चाहते हैं।

इस पर के.के.तलवार हमसे मुखातिब हुए और बोले-आप लोग चांदीवली आउटडोर स्टूडियो पहुंचिए थोड़ी देर में हम और काका भी वहीं पहुच रहे हैं। आज काका और मुमताज की फिल्म रोटी के एक गाने की शूटिंग है।

 हम लोग तलवार साहब और प्रशांत से नमस्ते कर बाहर निकल आये और हमने अंधेरी ईस्ट में स्थित चांदीवली आउटडोर स्टूडियो के लिए टैक्सी पकड़ ली। काफी देर के बाद हम चांदीवली स्टूडियो पहुंच गये। चारों ओर पहाड़ियों से घिरी यह जगह बहुत अच्छी लग रही थी। कहीं देखा छोटा-सा गांव बसाया गया है। गोबर से लिपे घर-आंगन, सामने तुलसी का चौरा। इसे जब फिल्म में देखेंगे तो यह गांव के घर की तरह ही लगेगा। बगल में गांव के स्कूल का सेट। इन सब से पार होते हुए हम आखिरकार उस जगह पहुंच ही गये जहां फिल्म रोटी की शूटिंग होनी थी। मई का महीना था बहुत गर्मी और तीखी धूप थी। इसके बीच वहां काफी गहमागहमी थी। कैमरामैन, यूनिट के स्टाफ सभी काम में व्यस्त थे। तभी हमें तलवार साहब दिख गये। उनसे नमस्ते किया तो उन्होंने कहा-शूटिंग में थोड़ी देर है आइए तब तक आपको कैंटीन में चाय पिलाते हैं।

  तलवार हमें वहां ले गये।हम लोग बैठ गये। चाय आ गयी और चाय की चुस्कियों के बीच राजेश खन्ना के रिश्तेदार तलवार साहब ने कहा-काका की एक फिल्म आपकी कसम आ रही है .यह सुपर-डुपर हिट होगी। बहुत अच्छे गाने हैं फिर वे टेबल पीट-पीट कर उस फिल्म के गीत गाने लगे। टाइटिल सांग-जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं, करवटें बदलते रहे, जय जय शिवशंकर।

 चाय

फिल्म 'रोटी' का वही गीत दृश्य

खत्म हो गयी हम लोग उस लोकेशन पर वापस आ गये जहां शूटिंग होनी थी। वहां देखा सामने एक हरा-भरा मैदान था पेड़ों से घिरा हुआ। उस मैदान के सामने की ओर ढलान थी जो कंकड़ों से भरी थी। हमने देखा कुछ लोग एक रिकार्ड प्लेयर में फिल्म का गाना गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर गोरा रंग दो दिन में ढल जायेगा बजा रहे हैं। इसी गाने की शूटिंग होनी थी। बगल में एक छोटा-सा पोखरा था। हम बता चुके हैं कि मई का महीना था, तीखी धूम थी बहुत गर्मी थी। यहां बारिश में भीगते हुए राजेश खन्ना और मुमताज पर दृश्य फिल्माया जाना था। थोड़ी देर में डाइरेक्टर चिल्लाया फाग मारो हमने देखा एक आदमी जो उस तरह का छोटा सा हैंड हेल्ड स्टोव लिए था जिसे पकड़ कर स्वर्णकार गहनों की झलाई करते हैं। उसने उसमें कोई केमिकल डाला और चारों ओर धुआं ही धुआं फैल गया। ऐसा लग रहा था कि हम किसी पहाडी धुंध के बीच हैं। दरअसल यह चांदीवली स्टूडियों के उस कोने को कश्मीर का हिस्सा बनाने की कोशिश हो रही थी। दूसरी ओर से आवाज आयी बारिश। देखा दूर पोखरे में पंपिंग सेट लगा था और उसका पाइप पकड़े  एक व्यक्ति पास के पेड़ पर चढ़ा था उसने नीचे खड़े राजेश खन्ना पर पानी डाला तो वे चिल्लाये-अरे यार जला डाला। वे एक ओर हट गये और अपना सिर पोछने लगे। हुआ यह था कि तीखी धूप में पोखरे का पानी काफी गरम हो चुका था। किसी ने सलाह दी कि पांपिंग सेट चला कर इस छोटे पोखरे का कुछ पानी निकाल दो। लगभग आधे घंटे बाद जब बारिश की गयी तो वह पानी बरदाश्त करने लायक हो गया था। हमें बताया गया कि दृश्य कुछ इस प्रकार है कि राजेश खन्ना गाते हुए आते हैं और कान में हाथ टिकाये कूल्हे ऊपर किये मुमताज की नब्ज चेक करने की कोशिश सी करते हैं और फिर उसके कूल्हे पर लात मारते हैं और मुमताज कंकड भरी जमीन पर दूर तक लुढ़कती जाती है। सीन ठीक ही था लेकिन डांस डाइरेक्टर ने ओके नहीं किया। ऐसी ही क्रिया कई बार दोहरायी गयी और सीन ओके नहीं हुआ तो मुमताज फनफनाती हुई डांस डाइरेक्टर के पास आयीं और गुस्से से तमतमाते गुए बोलीं-तेरी ऐसी की तैसी, इन कंकड़ों से मेरा कचूमर निकला जा रहा है और तुम्हारा डांस ओके नहीं हो रहा।

  इतना सुनते ही के के तलवार ने अपने एक असिस्टेंट से कहा-अरे यार जाओ काका को समझाओ मैडम से बदला किसी और की फिल्म में ले लेगा मुझे ही डुबायेगा क्या। मेरी फिल्म पूरी है  सिर्फ यही गाने का पैच वर्क बाकी है। मुमताज मैडम इन दिनों इतना बिजी हैं कि यह सीन आज ओके नहीं हुआ तो उनकी डेट पाना मुश्किल हो जायेगा मेरी फिल्म अटक जायेगी।

 असिस्टेंट ने जाकर काका के कान में कुछ कहा और उधर डांस डाइरेक्टर ने मुमताज मैडम से केवल एक मौका और देने का आग्रह किया और वह मान गयीं। सीन ओके हो गया।

 हमने तलवार साहब से पूछा गलती क्या हो रही थी। वे बोले-हर सीन की ळूटिंग के वक्त कलाकार के शूटिंग एरिया में एंटर करने और सीन खत्म होने पर एक्जिट करने की दिशा तय होती है। काका गलत दिशा से एक्जिट कर रहा था।

 हमने पूछा-आपने अपने असिस्टेंट से कहा कि काका को कहो किसी और फिल्म में मैडम से बदला ले लेगा। यह क्या घटना है।

वे बोले किसी फिल्म की शूटिंग में मुमताज मैडम ने काका को ऐसा तमाचा जड़ा था जिसके निशान कई दिनों तक बने रहे। उसी का बदला।

 शूटिंग से निकल कर राजेश खन्ना हम लोगों की ओर आये और पूछा-हां बताइए आपको क्या जानना है।

 हमने एक्टिंग स्कूल का विज्ञापन दिखाते हुए पूछा-इस्टीट्यूट यह दावा करता है कि आप वहां अभिनय का प्रशिक्षण देते हैं।

 हमारा प्रश्न सुनकर राजेश खन्ना मुसकराये और बोले-चार-चार शिफ्ट शूटिंग कर रहा हूं दम लेने की फुरसत नहीं। मेरे पास टाइम कहां कि मैं किसी इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षण दूं। मैं तो इस इंस्टीट्यूट का नाम पहली बार आपसे सुन रहा हूं।

 हम बात कर ही रहे थे कि तभी पांच-छह युवतियां आयीं और वहां खड़ी राजेश खन्ना की कार को चूमने लगीं।

 रहा नहीं गया तो राजेश खन्ना से पूछा-आपको यह अच्छा लगता है।

 राजेश खन्ना बोले-बिल्कुल नहीं लेकिन मैं इन्हें मना भी नहीं कर सकता, मेरे प्रशंसक कम हो जायेंगे। इन्हें यह करना अच्छा लगता है, इन्हें आनंद मिलता है करने दीजिए ना। मेरा क्या जाता है।

हमने राजेश खन्ना के सामने ही अपने साथ आये युवक से कहा कि –भाई सुन लिया राजेश खन्ना कह रहे हैं कि उन्होंने उस इंस्टीट्यूट का नाम ही नहीं सुना जो दावा करता है कि ये वहां एक्टिंग सिखाते हैं।

 हम लोग होटल अरोमा वापस लौट आये।

दूसरे दिन हम लोग फिर स्टूडियो गये। याद नहीं आ रहा वह शायद रूपतारा  था या श्री साउंड। वहां एक सेट पर मोहन सहगल की फिल्म वो मैं नहीं की शूटिंग चल रही थी। वहां अभिनेता राकेश पांडेय से भेंट हुई। उनसे काफी देर तक बातें होती रहीं। तभी वहां एक अधेड व्यक्ति ने प्रवेश किया। वह कुर्ता पहने थे और बंगल में झोला लटकाये थे। मैंने पूछा-यह कौन। राकेश पांडेय कुछ बोलें इससे पहले वहां बैठी एक युवती ने कहा-मुशी जी हैं। मैं समझ नहीं पाया और राकेश पांडेय का मुंह ताकने लगा वे बोले-यह डायलाग डाइरेक्टर हैं संवाद संकेतक। कोई कलाकार सही ढंग से संवाद नहीं बोल पाता तो यह सही उच्चारण करवाते हैं।

 तभी देखा सामने एक पलंग में युवती लेटी है। सामने से एक सहायक अभिनेता आता है उसके आते ही कैमरामैन लाइटमैन सभी सतर्क हो जाते हैं। कैमरा रोल करता है वह युवती किसी का नाम लेती है इस पर वह सहायक अभिनेता चिल्लाता है-यह किस मनहूस का नाम ले लिया टुमने। सीन कट होता है तो मुंशी जी यानी संवाद संकेतक उस आर्टिस्ट को समझाते हैं-भाई टुमने नहीं तुमने। वह बार-बार टुमने ही कहता रहता है।

 मैंने राकेश पांडेय से पूछा-अब क्या होगा।वे बोले –बाद में डब कर लिया जायेगा।

स्टूडियो में अभिनेता चंद्रशेखर (वही चंद्रशेखर जिन्होंने रामानंद सागर के प्रसिद्ध सीरियल में भूमिका की थी) मिल गये जो मेरे भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म के घनिष्ठ मित्र रहे हैं। भैया के साथ मैं पहले उनसे मिल चुका था इसलिए पहचानते थे। वे मेकअप कर रहे थे। वे जिस तरह के ब्रश से दीवाल रंगी जाती है उसी तरह के ब्रश से अपने गालों का मेकअप कर रहे थे।

                                      अभिनेता चंद्रशेखर

उन्होंने कहा-देखना अभी मेरा चेहरा चमकने लगेगा। हीरोइनें इसी तरह अपने चेहरे को कश्मीरी सेब की तरह सुंदर बना लेती हैं। रीत के इसे उतारने में बहुत कष्ट होता है।

   किसी से सुना कि पास के एक कमरे में फिल्म वो मैं नहीं की हीरोइन रेखा मेकअप कर रही हैं। मैं अपनी पुस्तक फिल्मी सितारे उन्हें भेंट करना चाहता था। यह अच्छा अवसर था। मैंने देखा मेकअप रूम का दरवाजा आधा खुला है। एक लड़का कोल्ड ड्रिंक लेकर अंदर घुसा। मैं भी धीरे से उसके पीछे हो लिया। रेखा मेकअप के बाद कपड़े पहन रही थीं। पास ही उनकी हेयर ड्रेसर थी  वह बोली-क्या लेना। मैंने कहा-लेना नहीं देना।

 तब तक रेखा आगे आयीं। मुझसे हाथ मिलाया और बोलीं-बताइए क्या बात है।

मैंने अपनी पुस्तक फिल्मी सितारे उन्हें देते हुए  कहा-इसमें आप भी हैं। रेखा से मुलाकात के बाद मैं बाहर आया।

बाहर आया तो भैया बोले जिस फिल्म की शूटिंग चल रही है उसके निर्देशक मोहन सहगल मुझे पहचानते हैं चलो उनसे भी मिल लेते हैं।

  हम लोग बाहर आये तो देखा खाना खा कर मोहन सहगल चावल भरे हाथ धोने जा रहे हैं। भैया को देख उन्होंने हाथ उठा कर ठहरने को कहा। हाथ धोकर आये तो भैया से बोले- बोलिए त्रिपाठी जी।

भैया ने साथ आये युवक की अभिनय की अभिलाषा की बात बतायी और एक्टिंग इंस्टीट्यूट का जिक्र किया।

मोहन सहगल बोले-अगर ये सचमुच अभिनय के क्षेत्र में आना चाहते हैं तो मैं इधर-उधर खुले ढेरों इंस्टीट्यूटों में जाने को मना करूंगा। ये पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट में जाना चाहें तो मैं पत्र लिख दूंगा इनका एडमीशन हो जायेगा। यही सही तरीका है। नवीन निश्चल जब मेरे पास फिल्मों में मौका देने का आग्रह लेकर आया तो मैंने पहले उसे फिल्म इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षण लेने को कहा। प्रशिक्षण पूरा कर के लौटने के बाद मैंने ही उसे चांस दिया। मेरी जिस फिल्म का सेट यहां लगा है वो मैं नहीं उसका हीरो वही है।

 मोहन सहगल जी को नमस्कार कर हम लोग वापस होटल अरोमा लौट आये। ये सारे प्रसंग इस आत्मकथा में जोड़ने का तात्पर्य यही है कि यह मेरे सामने हुआ और इसका तात्पर्य यह भी है कि फिल्मों में जाने  के दीवानों को वहां की असलियत बतायी जाये ताकि वे ठगे जाने और जिंदगी भर पछाताने से बच जायें।

 हमने देखा हमारे साथ गये उस युवक की आंखें खुल गयी हैं। वह मेरे भैया से बोला-चाचा जी देख ली यह दुनिया। आपने सही कहा था कि आर्क लैंप के चकाचौंध के पीछे बहुत ही गहरा डराने वाला अंधेरा है। ऐसा करते हैं दो-एक दिन मुंबई घूम लेते हैं फिर कोलकाता लौट चलते हैं। अच्छा हुआ आपने मेरा सच से साक्षात्कार करा दिया। (क्रमश:)

 


Friday, July 22, 2022

हमारे घर आयी एक नन्हीं परी

 


आत्मकथा-38

राजेश त्रिपाठी

दिन, माह तेजी से गुजरते रहे। वंदना अब अपनी गृहस्थी में पूरी तरह से एडजस्ट हो गयी थी। हिंदी और हमारी अवधी भी सीखने, समझने को उसने चुनौती के रूप में लिया। दो-एक बार एक शब्द का अर्थ जान लेने के बाद तीसरी बार उसे बताना नहीं पड़ता था। हिंदी की वर्णमाला का उसे सम्यक ज्ञान था क्योंकि बांग्ला माध्यम से पढ़ने के बावजूद उसका एक विषय हिंदी भी था। उसके आने से एक फायदा मुझे यह हुआ कि मैं जहां भी बांग्ला में अटकता उससे मुझे मदद मिल जाती। एक ही कमी रह जाती कि मेरा बांग्ला का उच्चारण वैसा ही होता जैसा किसी हिंदी भाषी का बांग्ला बोलते हुए होता है।

 सन्मार्ग में प्रशिक्षण, स्क्रीन के प्रबंध संपादक के रूप में काम और बाल उपन्यासों के लेखन का सिलसिला जारी था। इस बीच राजू बाल पाकेट बुक्स के मालिक छोटे सचदेव ने मुझसे कहा कि-राजेश जी, हम चाहते हैं कि एक ऐसी पुस्तक निकालें जिसमें 100 से ज्यादा नये-पुराने फिल्म कलाकारों का सचित्र परिचय हो। इस किताब का नाम होगा फिल्मी सितारे और यह आपको लिखना है। यह मेरे लिए चुनौती थी और चुनौतियां उठाना मुझे हमेशा ही अच्छा लगा। समय तो लगा लेकिन फिल्मी सितारे प्रकाशित हुई और बहुत लोकप्रिय भी हुई। फिल्मी कलाकारों के प्रति लोगों खासकर युवा वर्ग की बहुत दिलचस्पी रहती है। वे अपने प्रिय कलाकार की जिंदगी के बारे में लालायित रहते हैं। फिल्मी सितारे ने उनकी यह इच्छा पूरी कर दी। छोटे सचदेव भी खुश थे। चार पाकेट बुक्स के सेट का सिलसिला तो निरंतर जारी ही था। इनमें दो भैया रुक्म जी लिखते और दो मैं लिखता था। भैया ने सामाजिक उपन्यास भी राजू बाल पाकेट बुक्स के लिए लिखना शुरू कर दिया था। इनमें अनचाही प्यास, मेरे दुश्मन मेरे मीत,बर्फ की आग,अंगूरी आदि बहुत ही लोकप्रिय हुए। प्रकाशक की जिद पर उन्होंने एक जासूसी उपन्यास नीली रोशनी भी लिखा लेकिन उसमें उन्होंने अपना मूल नाम रुक्म ना देकर छद्म नाम इंस्पेक्टर राज दिया।

*

एक दिन की बात है वंदना भाभी निरुपमा के साथ पड़ोस की ही दुकान पर गयी थी। वह ठीकठाक थी लेकिन थोड़ी देर में ही वह चक्कर खाकर गिर गयी और बेहोश हो गयी। भाभी को काटो तो खून नहीं। वह मदद के लिए चिल्लायीं-कोई मेरी बहू  को बचाओ।  उनकी आवाज सुनते ही आसपास से कई औरतें और लोग आ गये। दूकानदार भी पहचान का था उसने भी मदद की। वंदना को पास के एक घर में ले जाया गया और मुंह पर पानी वगैरह छिड़क कर उसे सामान्य स्थिति में लाया गया।भाभी निरुपमा लगातार रोये जा रही थीं। मदद करने वाली महिलाओं ने कहा-बहन जी रोइए मत,आपकी बहू अब ठीक है।

 भाभी दूसरे दिन ही वंदना को एक महिला डाक्टर के पास ले गयीं। महिला डाक्टर ने वंदना की जांच-परख कर भाभी से कहा-चिंता की नहीं खुशी की बात है। आपकी बहू उम्मीद से है। कुछ माह बाद यह आपके घर एक नन्हीं खुशी लाने जा रही है।

 भाभी ने डाक्टर से पूछा-हमें क्या करना होगा बहन जी।

डाक्टर-कुछ नहीं उसे पौष्टिक खाना दीजिए, उसे रक्ताल्पता की शिकायत है मैं आइरन टानिक लिख देती हूं नियम से देती रहिएगा और चिंता की कोई बात नहीं सब ठीक है।

 वंदना उम्मीद से है वह हमारे परिवार में कुछ माह बाद नन्हीं खुशी जोड़ने वाली है यह हम सबके लिए बहुत ही हर्ष की बात थी। भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म और भाभी निरुपमा निस्संतान थे।  मैं कोलकाता आया तो उन्हें बहुत खुशी हुई थी। मैं तो आया था भैया-भाभी को देख कर कुछ दिन कोलकाता में बिता कर वापस लौट जाने के लिए लेकिन जब भी लौटने की बात करता उनका चेहरा उतर जाता। आखिरकार मैं कोलकाता में ही रह गया।

जब वंदना की डिलीवरी के तीन माह रह गये तो हमने उसके मायके बजबज भेजने का निश्चय किया। यहां कोलकाता में हमारे परिवार में  महिला के नाम पर सिर्फ भाभी थीं। वह भी उम्रदराज थीं और वह अकेले वंदना की देखभाल नहीं कर सकती थीं। वंदना के मायके में मां, चाची और दूसरी महिलाएं थीं जिनके बीच उसकी अच्छे ढंग से देखभाल हो सकती थी। सबने मिल कर यही निर्णय लिया की वंदना की डिलीवरी अपने मायके में हो यही अच्छा है।

दूसरे दिन मैं और भाभी वंदना को उसके मायके छोड़ आये। उसके माता-पिता भी इस खबर को सुन कर बहुत खुश हुए कि वह मां बनने वाली है।

दिन बीतते देर नहीं लगती। तीन माह यों ही गुजर गये। एक दिन बजबज से खुशखबरी आयी कि हमारे परिवार में एक सदस्य की वृद्धि हो गयी। वंदना ने एक पुत्री को जन्म दिया है। भाभी की खुशी का ठिकाना ना रहा। भैया भी खुश थे कि नन्हीं खुशी उनके घर आयी। भाभी ने जिद कर ली कि बिटिया को और वंदना को देखने जायेंगी।

 एक हफ्ते बाद हम लोग कालिकापुर गये। नन्हीं बिटिया को देख भाभी और हम सब बहुत खुश हुए। वह बहुत छोटी है यह सोच कर हमने सोचा कि वह एक माह की हो जाय तब उसे कोलकाता ले जाना ठीक होगा। यही तय हुआ।


                मेरी पत्नी वंदना त्रिपाठी

एक माह बीत जाने के बाद हम लोग वंदना और नन्हीं बेटी को कोलकाता ले आये। हमारी कालोनी में रहनेवाली पास-पड़ोस की महिलाएं बिटिया को आशीष देने आयीं। हम सबने प्यार से बिटिया का नाम अनामिका रखा। वह कुछ बड़ी हुई तो भैया रामखिलावन त्रिपाठी की यह ड्यूटी हो गयी थी कि वह रोज उसे गोद में लेकर घुमाने जाया करते थे। हमारे घर बिटिया का जन्म हुआ है यह सुन कर भैया के गहरे मित्र और मेरे भी परिचित प्रसिद्ध चित्रकार होरीलाल साहू जी एक छोटी सी गाड़ी ले आये जिसमें भैया उसे बैठा लेते और उसी से उसे पार्क घमाने ले जाते थे।

*

भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म सन्मार्ग के सिनेमा पेज का संपादन भी करते थे जिसमें एक कालम पाठकों के प्रश्नों के उत्तर का भी था जिसका नाम था लाल बुझक्कड़। उसमें नगर कोलकाता और उपनगरों से लोग प्रश्न करते थे। उनमें से कुछ उनके परिचित भी हो गये थे। एक ऐसे ही युवक को फिल्मों में जाने का शौक था और उसने कहीं विज्ञार्पन देखा था कि मुंबई में कोई प्राइवेट इस्टीट्यूट है जो ना सिर्फ  अभिनय का प्रशिक्षण देता है अपितु अपने यहां से प्रशिक्षित छात्रों को फिल्मों में चांस भी दिलाता है। उसके यहां अभिनय का प्रशिक्षण देने वालों में राजेश खन्ना, हेमा मालिनी व अन्य बड़े कलाकारों के नाम थे। ऐसा शायद इसलिए किया गया था ताकि विज्ञापन पढ़नेवालों को यह विश्वास हो जाये कि जिस इंस्टीट्यूट से इतने बड़े-बड़े नाम जुड़े हैं वह जाली तो हो नहीं सकता। वह युवक उपनगर में रहता था और अक्सर भैया से मिलने कोलकाता आता था।  एक बार वह इंस्टीट्यूट का विज्ञापन लेकर आ गया और भैया से जिद करने लगा कि-चाचा जी मुझे इस इंस्टीट्यूट में भर्ती होना है, आप मेरी मदद कीजिए।

 भैया ने लाख समझाया कि मुंबई की फिल्मी दुनिया को मैंने काफी करीब से देखा है। जब मैं स्क्रीन हिंदी साप्ताहिक का संपादक था तो मेरा एक पैर मुंबई में ही रहता था। वहां कई ऐसे ठग हैं जो आपसे फिल्म देने के नाम पर पैसा ऐंठते रहेंगे और अगली फिल्म में काम देने का झांसा देते रहेंगे। जब आपसे पैसा मिलना बंद हो जायेगा तो आपको पहचानना बंद कर देंगे।

 लाख समझाने के बाद उस युवक ने आखिरी दांव चला-चाचा जी मुंबई चलते हैं। वहीं असलियत का पता चलेगा। पता चल जाने पर मैं भी उम्मीद छोड़ दूंगा आपसे फिर कुछ नहीं कहूंगा। मैं, आप और राजेश जी मुंबई चलते हैं।

*

एक सप्ताह बाद वह युवक तीन लोगों के टिकट लेकर अपने चाचा रुक्म जी से मिलने कोलकाता आया। यह मेरी और उस युवक की मुंबई की पहली यात्रा थी। भैया तो अक्रसर मुंबई में जाते रहते थे। धर्मेंद्र, भारतभूषण, चंद्रशेखर,राज कपूर व अन्य अभिनेताओं से उनका परिचय था। गीतकार हसरत जयपुरी, संवाद लेखक ब्रजेंद्र गौड़ भी उनके घनिष्ठ मित्रों में थे। उनके द्वारा संपादित स्क्रीन साप्ताहिक मुंबई के फिल्म उद्योग में काफी लोकप्रिय थी इसलिए सभी उनसे परिचित थे।

हम लोग मुंबई पहुंच कर हम दादर स्टेशन में उतरे। अभी हम लोग प्लेटफार्म में ही खड़े थे तभी सामने देखा कि एक पुलिसवाले ने एक टैक्सी ड्राइवर को टैक्सी के अंदर से खींच कर पटक दिया और डंडे से पीटने लगा। वह बार-बार चिल्ला कर ड्राइवर से कह रहा था-पैसेंजर जहां जाना चाहता है वहां तुम्हें जाना होना, मना नहीं कर सकते।

 पुलिस की ऐसी सतर्कता देख मन खुश हो गया। भैया जिस होटल अरोमा में अक्सर ठहरते थे वह पास ही था तो हम उधर ही चल पड़े। उस होटल का मैनेजर गोवानीज था जिसका भैया से अच्छा-खासा परिचय था। उसके रहते उन्हें कभी कोई समस्या नहीं होती थी और इस बार भी हमें होटल में जगह मिल गयी।

 भैया ने होटल में सामान आदि रख कर कागज की चिट पर एक नंबर लिख कर मुझे दिया और कहा-जरा निर्देशक केदार शर्मा जी को फोन करो तो। उनसे कल का समय ले लेते हैं अगर आसपास किसी स्टूडियो में होंगे तो पहले उनसे मिल कर बात कर लेते हैं वे मेरे परिचित हैं मुझे सही सलाह देंगे। ठगों से मिलने से मिलने से अच्छा है हम उनसे मिलें जो हमें सही राय देंगे।

  मैंने फोन मिलाया तो दूसरी ओर से किसी महिला का स्वर सुनाई दिया। मैंने रिसीवर में हाथ लगा कर भैया से कहा-भैया कोई महिला बोल रही है। भैया हंसते हुए बोले –वे केदार शर्मा जी हैं उनकी आवाज बहुत पतली स्त्रियों जैसी है। मैंने केदार शर्मा जी से बात की भैया का परिचय दिया और मिलने का समय मांगा तो वे बोले-अच्छा रुक्म जी आये हैं। मैं कल आपको रूपतारा स्टूडियो में मिलूंगा। आ जाइए।

 मैंने भैया को सारी बातें बता दीं। दूसरे दिन नियत समय पर हम केदार शर्मा जी से मिलने पहुंच गये। हम जब स्टूडियों में प्रवेश कर रहे थे तो देखा की हास्य कलाकार अभिनेता महमूद जर्सी और निक्कर पहने हुए अपनी कार से निकले।

 हम लोग केदार शर्मा जी के कार्यालय में गये। उन्होंने भैया से नमस्ते किया और हम सबको भी पास रखी कुर्सियों पर बैठने का इशारा किया। इसके बाद भैया ने शर्मा जी को सारा हाल बताया कि हम लोग वहां क्यों आये हैं।

  सब कुछ सुन कर शर्मा जी हमारे साथ के उस युवक की ओर मुखातिब हुए और बोले-बुरा ना मानना, कुम्हारे पिता का कमाया फालतू रुपया है क्या जो तुम यहां बरबाद कर सको।अगर हां तो शौक से आ जाओ। तुम मेरे परिचित रुक्म जी के साथ आये हो तो मैं तुम्हें धोखे में नहीं रखूंगा। तुम्हें भले कड़वी लगे लेकिन मैं यहां की हकीकत बयान करूंगा। देखो इस फिल्म उद्योग में कोई ना नहीं कहता। आप जिस किसी के पास काम मांगने जायेंगे वह यही कहता है-आह आपने देर कर दी हमने तो अपनी इस फिल्म की सारी कास्ट तय कर ली, अगली फिल्म में आपको जरूर चांस देंगे। स्टूडियो के चक्कर काटते हुए आपके जूते घिस जायेंगे पर वह अगली फिल्म कभी नहीं आयेगी। आप हीरो बनने आये थे और बाप के रोल वाली उम्र हो जायेगी तब तक आपको चांस नहीं मिलेगा। यहां कुछ ऐसे ठग भी हैं जो दिलासा देकर आपका सारा पैसा भी हड़प लेंगे।


                फिल्म निर्देशक केदार शर्मा

 हमारे साथ गया वह युवक बड़े गौर से शर्मा जी की बातें सुन रहा था। उसके चेहरे की मुसकान जाने कहां गायब हो गयी थी।

 बात खत्म करने के बाद शर्मा जी हम लोगों को साथ लेकर बाहर आये। स्टूडियो की कैंटीन ,सामने ही थी। वहां एक हीरो जैसा सुंदर युवक प्लेटें धो रहा था। शर्मा जी ने हमारे साथ गये युवक से मुखातिब होते हुए कहा –देख रहे हो इस सुंदर युवक को जो प्लेटें धो रहा है। यह उत्तर प्रदेश के जमींदार घर का लड़का है। यह घर से पैसा लेकर हीरो बनने मुंबई भाग आया। इसे भी लोग अगली फिल्म में चांस का प्रलोभन देकर लटकाये रहे और इसका सारा पैसा खत्म हो गया। अब यह ऐसे ही जिंदगी गुजार रहा है। पैसा गंवा चुका है शर्म के मारे घर जा नहीं सकता। यहां केदार शर्मा का परिचय भी देते चलें। यह वही केदार शर्मा हैं जिनके एक थप्पड़ ने राज कपूर का कैरियर बना दिया। बात फिल्म ज्वारभाटा के शूटिंग के दौरान की है। 'केदार शर्मा उस फिल्म के असिस्टेंट डायरेक्टर थे और राज कपूर उनके सबसे जूनियर असिस्टेंट। वे क्लैपर ब्वाय का काम कर रहे थे। जो फिल्म की तकनीक से परिचित हैं वे जानते होंगे कि हर सीन के शूट करने के पहले क्लैपर ब्वाय कैमरे के सामने आकर फिल्म का नाम, शाट का नाम कर के काठ के बने क्लैप बोर्ड को ठोंकता है। यह भी बताते चलें कि फिल्म के एडीटर को एडिटिंग के समय़ इससे मदद मिलती है। वह समझ पाते हैं कि यह कौन सा शाट है।  हुआ यह कि जब वे शूट पर क्लैप कर के शूट शुरू करने के लिए बोलते थे तब-तब राज कपूर कैमरे के सामने आकर बाल ठीक करने लग जाया करते थे। दो-तीन बार देखने के बाद केदार शर्मा ने उन्हें एक थप्पड़ जड़ दिया। फिर उन्हीं केदार शर्मा ने अपनी फिल्म 'नीलकमल' में राजकपूर को मधुबाला के साथ लिया। उस थप्पड़ ने राजकपूर की किस्मत ही बदल दी।'  (क्रमश:)

 

Thursday, July 7, 2022

इस तरह हुआ बंगाल के एक गांव में मेरा विवाह

 आत्मकथा-37


भाग-37

राजेश त्रिपाठी

सन्मार्ग में प्रशिक्षण, बाल उपन्यास लेखन और स्क्रीन का संपादन सारे कार्य साथ-साथ चल रहे थे। स्क्रीन के मालिक महावीर प्रसाद पोद्दार के छोटे भाई पवन से मेरी खूब पटती थी। उनका खुला दिमाग और विनोदी भाव मुझे बहुत भाता था। उनके मझले भाई ओम बाबू हंसमुख लेकिन थोड़ा गंभीर स्वभाव के। एक फिल्म प्रचारक थे जो विशालकाय और रौबीले स्वभाव के थे उनसे सभी सहमे-सहमे रहते थे। पवन उनको पसंद नहीं करते थे क्योंकि उनके बड़े भाई उनसे डरते थे। उनके इस भय का वे फिल्म प्रचारक महोदय फायदा उठाते थे। यह बात पवन को पसंद नहीं थी। एक बार संयोग कुछ ऐसा हुआ कि महावीर बाबू मुंबई गये हुए थे। उसी वक्त उस फिल्म प्रचारक की एक फिल्म लगी। अब नाम तो याद नहीं आ रहा लेकिन विषय बड़ा अजीब था। यह स्लीपवाक अर्थात नींद में चलनेवाली एक महिला की कहानी थी। अब महावीर बाबू कोलकाता में थे नहीं तो पवन बाबू को मौका मिल गया। उन्होंने मुझसे कहा-फिल्म जैसी है वैसा ही रिव्यू लिखिएगा बेवजह की प्रशंसा करने की जरूरत नहीं है। आप जैसा महसूस करें वैसा ही रिव्यू कीजिएगा। मैं हाल में फिल्म देखने गया। पवन बाबू ने जैसा देखें वैसा लिखने को कहा था। मैंने देखा कि फिल्म की अभिनेत्री को नींद में चलने की बीमारी है। वह इस मुसीबत से बचने के लिए एक बहुत ही अजीब और खतरनाक तरीका अपनाती है। नींद ना आये इसके लिए वह रोज अपनी एक अंगुली काट लेती है जिसके उसके दर्द से उसे नींद ना आये लेकिन नींद आखिर आ ही जाती है। इस क्रम में जब वह दसों उंगलियां काट लेती है तो मेरी सीट के ठीक पीछे वाले रो में बैठे जोड़े में पत्नी ने पति से पूछा-दसों उंगलियां तो काट लीं अब क्या यह गरदन काटेगी। मेरे दिमाग में यह बात घर कर गयी कि मेरा रिव्यू उस महिला दर्शक की इस टिप्पणी पर ही केंद्रित होगा। मैंने पवन बाबू के कहे अनुसार वैसा ही रिव्यू लिखा जैसा ऐसी फिल्मों का होना चाहिए। इसे संयोग कहें या कुछ और वह फिल्म दो हफ्तों में ही सिनेमाघरों से उतर गयी। पवन बाबू बहुत खुश हुए पर इस पर वे फिल्म प्रचारक बहुत खफा हुए। तब तक महावीर बाबू मुंबई से लौट आये थे। वो फिल्म प्रचारक महावीर बाबू के पास आये। आते ही उन्होंने तपाक से कहा-यह राजेश त्रिपाठी कौन है, इसे नौकरी से हटा दो, इसने मेरी फिल्म का रिव्यू कुछ इस तरह से किया कि वह फिल्म दो हफ्ते में ही उतर गयी।

दूसरे दिन मैं स्क्रीन के कार्यालय गया तो महावीर बाबू ने पूरा हाल बताया। मैंने कहा- आप चाहें तो उनको खुश करने के लिए मुझे निकाल सकते हैं. कोई परेशानी नहीं।

उन्होंने कहा-नहीं नहीं हम उनकी सलाह को मानने को बाध्य नहीं हैं। उन्होंने कह दिया, हमने सुन लिया।

*

मैंने जिस दिन कोलकाता में कदम रखा था उसी दिन से मेरी निरुपमा भाभी को मेरे विवाह की चिंता सताने लगी थी। वे जब भी मुझे थोड़ा खाली पातीं अपना विवाह-राग शुरू कर देतीं।

 मैं उन्हें समझाता-भाभी मुझे अभी ढंग की नौकरी भी नहीं मिली, मैं सन्मार्ग में सीखता हूं,स्क्रीन से भी इतना पैसा नहीं मिलता, बाल उपन्यास लिख कर भी तो लम-सम ही मिलता है। मैं इतना नहीं कमाता कि इत्मीनान से कह सकूं कि हां मैं अपना घर बसाने के काबिल हो गया हूं। आप जल्दबाजी मत कीजिए जब वक्त आयेगा मैं हां कर दूंगा और वचन देता हूं कि उसी लड़की को अपना जीवनसाथी बनाऊंगा जिसे आप पसंद करेंगी।

 इस पर भाभी का जवाब होता-तुम रुपये-पैसे की चिंता क्यों करते है। हमारे तो कोई संतान नहीं हमारा जो कुछ है सब तुम्हारा ही तो है। तुम्हारे भैया इतना तो कमाते हैं कि हम तीन जनों के परिवार में मेरी कोई छोटी बहन आ जायेगी तो वह भूखी तो नहीं ही रहेगी।

   भाभी के इतना कहते ही मैं निरुत्तर हो जाता। दिन, माह बीतते गये। मैं तो भाभी की बातें भूल गया लेकिन भाभी नहीं भूलीं। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि उन्हें जितना जल्द हो अपने  देवर का घर बसाना है। मुझे पता भी नहीं चला वे बजबज के एक गांव से आनेवाली अपनी परिचित महिला के साथ जाकर मेरी होने वाली पत्नी को देख आयीं।

  भाभी जब से बजबज के गांव से उस लड़की को देख कर आयीं जिसे वे मेरी जीवनसंगिनी बनाना चाहती थीं उसके बाद से ही वे पंचमुख से उसकी प्रशंसा करने लगीं। मुझसे कहतीं मैंने जो लड़की देखी है सुंदर है, गांव की है आधुनिकता से दूर है, आज की छमक छल्लो जैसी नहीं। मैं अपने देवर के लिए ऐसी ही लड़की लाऊंगी जो उसके अनुकूल हो।

 वह मुझसे बोलीं-मैं चाहती हूं तुम भी देख लो। तुम्हारी पसंद नापसंद मेरे लिए बहुत महत्व रखती है।

मैंने कहा-भाभी आपने पंसद कर लिया समझो मैंने पसंद कर लिया। आपने देख लिया समझो मैंने देख लिया। मैं आपके निर्णय के खिलाफ थोड़े जाऊंगा।

भाभी को बजबज के कालिकापुर गांव से लौटे अभी दो हफ्ते ही हुए थे कि वहां से एक महिला हमारा घर खोजते हुए आयीं। मैं उन्हें पहचान नहीं पाया लेकिन भाभी ने पहचान लिया और बोलीं-अरे ज्य़ोत्सना दीदी आइए, बैठिए कैसे आना हुआ।

 ज्योत्सना बोलीं-हमारी वंदना किस घर में जा रही है यही देखने चली आयी।

भाभी ने मिष्ठान आदि मंगा कर उनकी आवभगत की और बोलीं-बहुत अच्छा किया जो आ गयीं।

 उस वक्त मैं बच्चों के उपन्यास लिखने में व्यस्त था।भाभी ने उनसे मेरा परिचय कराया-यह है हमारा देवर राजेश त्रिपाठी लेखक है उपन्यास लिखता है। यहां मैं यह बताता चलूं कि मेरी भाभी ने मेरा रामहित नाम बदल कर राजेश त्रिपाठी कर दिया था। मैंने भी बिना नाकुर किये इस नाम को स्वीकार कर लिया और मेरे बाल उपन्यास भी रामहित तिवारी की जगह राजेश त्रिपाठी के नाम से छपने लगे। कुछ दिन में मेरा पेन नेम राजेश त्रिपाठी ही मेरा वास्तविक नाम बन गया जबकि मेरे प्रमाणपत्र रामहित तिवारी के नाम ही थे।

 ज्योत्सना जी हमें देख कर वापस कालिकापुर चली गयीं। जाहिर है उन्होंने हमारे बारे मेरे होने वाले श्वसुर जी को बताया होगा। दो हफ्ते बाद वे भी आ गये। संयोग से जब वे आये तब भी मैं बाल उपन्यास ही लिख रहा था। इसमें ताज्जुब की कोई बात नहीं। मुझे और मेरे भैया रुक्म जी को हर महीने चार बाल उपन्यासों का सेट पूरा करना पड़ता था।

 होनेवाले श्वसुर महाशय आये तो उनका भी मुंह मीठा कराया गया। संयोग से उस समय भैया भी घर में थे भैया, भाभी से बातें करने के बाद मेरे श्वसुर प्रमोद जी यह कहते हुए वापस लौट गये –आप लोग सब हमारे यहां आइए ना लड़का भी लड़की को देख ले तो अच्छा रहेगा। भैया-भाभी ने कालिकापुर जाने की हामी भर ली।

 दूसरे दिन से ही भाभी पीछे पड़ गयीं- चलो चलो लड़की देखने चलना है।

 भैया बोले-चलेंगे, चलेंगे रुक जाओ।

 भाभी बोलतीं-क्यों रुक जाऊं, लड़की के पिता जी बुला गये हैं हमें जाना चाहिए नहीं उनका निरादर होगा।

 खैर एक हफ्ते बाद हम कोलकाता से लगभग तीस किलोमीटर दूर बजबज के करीब कालिकापुर नामक गांव में थे। गांव तो था लेकिन वहां बिजली वगैरह और अच्छी सड़क थी। वहां हम देख रहे थे कि प्राय: हर घर के सामने तालाब था।

 हमने प्रमोद जी के घर का दरवाजा खटखटाया ही था कि भीतर से कुत्ते के भूंकने की आवाज आयी।मेरी तो आत्मा ही कांप गयी। बचपन में कुत्ते के काटने पर पेट में चौदह इंजेक्शन जो झेल चुका था।

 हमारे होनेवाले श्वसुर जी ने ही दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही एक कुत्ते ने उछल कर अपने दोनों पैर मेरी छाती पर रख दिये। इस पर मेरे होनेवाले श्वसुर चिल्लाये-हरिपद छोड़ो।

 उनके इतना कहते ही उस कुत्ते ने मेरी छाती से पैर हटा लिए और एक ओर हट कर खड़ा हो गया। तब कहीं जाकर मेरी जान में जान आयी।

 हम तीनों को जलपान कराया गया। फिर कन्या को बुलाया गया। श्वसुर जी बोले-यह है हमारी एकमात्र कन्या वंदना।

 

चित्र में राजेश त्रिपाठी (1 नंबर), वंदना  ( 2 नंबर), वंदना की मां पारुल (3नंबर ), भाभी निरुपमा (4 नंबर) , वंदना के पिता जी प्रमोद (5 नंबर),

होनेवाली पत्नी का नाम सुना तो बड़ा भक्तिपूर्ण और सात्विक लगा। रीटा, किट्टी, बिट्टू जैसे निरर्थक नामों के जमाने में वंदना नाम जैसे कानों में मिसरी घोल गया। मैं गांव का रहनेवाला सीधा-साधा सात्विक और धार्मिक परिवेश के मध्य पला-बढ़ा था। भाभी ने सचमुच मेरे लिए ऐसी जीवनसंगिनी चुनी जो सचमुच मेरे जीवन को संवार देगी, जीवन के सुख-दुख में मेरा संबल बनेगी, मेरी सहारा बनेगी।

 भाभी तो पसंद कर ही गयी थीं भैया ने भी हामी भर दी और अपनों की हां में मेरी भी हां थी। उसी दिन शादी की भी तिथि तय हो गयी।

 जब नियत दिन आया तो मैं और वंदना परिणय सूत्र में बंध गये। विवाह सीधे-सादे ढंग से हुआ जो मेरी पसंद थी। शहर में अपना कौन था जिसे बुलाते या भीड़ बढ़ाते। समारोह में हमारे कुछ नितांत परिचित ही शामिल हुए। दुर्भाग्य देखिए कि उस विवाह समारोह के जो फोटो भैया के परिचित फोटोग्राफर गुरुचरण शाह ने खींचे थे वह मिल ही नहीं सके क्योंकि पूरी रील ही खराब निकल गयी। उसमें से एक भी फोटो रिट्रीव नहीं की जा सकी। यह हम सबके लिए बहुत ही दुखद खबर थी क्योंकि जीवन के महत्वपूर्ण पल की कोई फोटो भी हमारे पास नहीं थी।

 वंदना घर आयी तो नववधू का स्वागत भाभी निरुपमा ने परंपरागत ढंग से किया जिसमें उनकी मदद भाभी की सहेली गीता देवी ने की। गीता देवी भी वंदना को बहुत स्नेह करने लगी थीं।

 वंदना आयी तो हमारा घर भर गया। भैया, भाभी और मेरे अलावा हमारे परिवार का एक और नया सदस्य आ गया जिसने हमारे परिवार को पूरा कर दिया। वंदना की शिक्षा दीक्षा बांग्ला माध्यम से हुई थी हालांकि उसका एक विषय हिंदी भी था। वह हिंदी पढ़-लिख लेती थी लेकिन उन्हें भाभी के कुछ शब्द समझने में थोड़ी परेशानी होती क्योंकि वे कभी-कभी ठेठ हिंदी में बोलतीं।

 मैंने सोचा कि इस परेशानी से उसे निजात दिलानी चाहिए। भाभी बोलतीं –बहू, कटोरी ले आओ। वह परेशान हो जाती तो मैं कहता –बाटी ले जाओ। इसके बाद वह मन में बसा लेती कि हमारे यहां की बाटी इनके यहां कटोरी हो गयी है। वैसे इसे उसने चुनौती के रूप में लिया और हर शब्द को याद कर के रखने लगी। दुबारा उसे उसके बारे में बताना नहीं पड़ता था।

  भाभी बहुत खुश थीं क्योंकि उनका अकेलापन जो दूर हो गया था। जब वंदना नहीं आयी थी तो पूरे दिन भाभी को अकेला रहना पड़ता था।

हमारे घर में इसके पहले मेरे और भैया के घर में ना रहने से सन्नाटा रहता था। अब वंदना आ गयी तो भाभी को बोलने-चालने के लिए एक साथी मिल गया।

 बीच-बीच में हम वंदना के साथ अपनी ससुराल कालिकापुर जाते रहे ताकि उसे यह ना लगे कि वह अपनों से दूर हो गयी। हमें भी खुली हवा में सांस लेने और हरे-भरे परिवेश का आनंद लेने का मौका मिल जाता। मेरी ससुराल में दर्जनों नारियल के पेड़, केले के बागीचे,कई तालाब औक  धान के कई खेत थे। वहां गांव और कस्बे दोनों का आनंद मिलता। गांव में बिजली भी थी। मां यानी मेरी सास तो ममतामयी और बहुत ही अच्छी थीं। वे अक्सर कहतीं आते रहा करो। जब हम कोलकाता लौटने को होते तो ढेर सारे नारियल और केले आदि बांध देतीं। सफेदा यानी चीकू मुझे बहुत पसंद हैं। संयोग की बात देखिए मेरी ससुराल में चीकू का एक बड़ा पेड़ था। मेरी श्रीमती वंदना ने अपने पिता जी को यह बता दिया था कि चीकू मुझे बहुत पसंद है इसलिए जब उसमें फल आते तो मुझे जी भर खाने की छूट मिल जाती।

  *

कुछ दिन बाद हमें अपने पैतृक गांव जुगरेहली लौटना पड़ा। शादी हो गयी इस बात की खबर अम्मा, बाबा को पत्र से दे दी गयी थी। उसमें यह भी लिख दिया गया था कि कुलदेवता, ग्राम देवी के पूजा के लिए हम गांव आ रहे हैं। हम लोग जब गांव पहुंचे तो अपनी बहू को देख कर अम्मा-बाबू बहुत खुश हुए। दूसरे दिन ही अम्मा पूजा की तैयारी कर ली। पहले कुलदेवता की पूजा के लिए गांव के पूर्वी छोर में स्थित एक घर ले जाया गया जिसके द्वार पर पीपल का पेड़ लगा है।

वहां पहुंच कर मैंने अम्मा से पूछा-यहां क्यों ले आयी,यह तो रामपाल भैया का घर है यहां हमारे कुलदेवता क्या कर रहे हैं।

 इसके बाद अम्मा ने बताया कि यही तुम्हारे दादा मुखराम शर्मा जी का पैतृक घर है। जब तुम्हारे बाबा(पिता जी) अपने जीजा शिवदर्शन जी की देखरेख के लिए जुगरेहली का यह पैतृक मकान और सारे खेत छोड़ कर बिलबई चले गये थे। जीजा जी गुजरे तो फिर भांजे रामखिलावन की देखभाल और संपत्ति लोभी चाचाओं से बचाने के उन्हें बांदा ले जाने और वहीं बस जाने के बाद लोगों ने जुगरेहली के पैतृक घर और खेतों पर कब्जा कर लिया। जब वर्षों बाद गांव वापस लौटे तो रहने का ठिकाना ना था। किसी तरह से दोबारा घर बसाना पड़ा। अपने उस वास्तविक पैतृक मकान में पूजा कर हम ग्राम देवी कमासिन दाई, मढ़ी देवी के दर्शन-पूजन के लिए भी गये।

 हमारे घर में कई गायें थीं। मां ने वंदना का परिचय उनसे भी करा दिया था। वह उनको नाम से पहचानने लगी थी। उनको चारा-पानी देती पर गायों को दुहने में उसे डर लगता था कि कहीं लात ना मार दें। मां ने उसका साहस बढ़ाया पर वह यह काम नहीं कर पायी। घर का बाकी काम,खाना बनाना वह कर लेती थी। इतना ही नहीं कुछ दिन बाद वह मां के साथ खेतों में जाने और वहां का काम देखने लगी। अम्मा खुश की शहर की बहू  गांव में किस तरह रम गयी है। आसपास की औरतों का भी घर में तांता लगा रहता। वह कहतीं- देखो तिवारिन दाई (मेरी अम्मा को गांव वाले इसी नाम से पुकारते थे) का घर कितना गुलजार लग रहा है रामहित भैया और बहू के आने से।

  कुछ दिन गांव में गुजार कर हम जब कोलकाता वापस लौटने को हुए तो अम्मा रोने लगीं। उन्हें देख कर मैंने कहा-जाना तो होगा, तुम परेशान मत होओ हम आते-जाते रहेंगे।

 मां-बाबा को समझा-बुझा कर हम कोलकाता की ओर लौट पड़े। वापस लौटना हमें भी खल रहा था लेकिन मजबूरी थी। (क्रमश:)