Tuesday, December 11, 2018

गीत

चलो अब उन गांवों की ओर


चलो अब उन गांवों की ओर, 
पसरी जहां प्रकृति की सुषमा
जिसका ओर न छोर .....चलो
सड़क बनी अब डगर पुरानी, जो विकास की अमिट निशानी।
देखो कमल भरी पुष्करनी, पुरइन पात न ठहरे पानी ।।
जैसे कल्मष मध्य भी रह कर रहते निर्मल जो हैं ज्ञानी।
ग्राम देवि का थान ये देखो देवि भवानी है कल्याणी ।।
इनका नाम सभी रटते हैं रात दिवस और भोर। चलो...
देखो हलधर धरती चीर कर बोता अपनी तकदीर।
जाड़ा, गरमी झंझावातों की सहता सदा जो पीर।
इनके हिस्से आयी बदहाली और आंखों में नीर।
जाने कहां विकास है ठहरा गांवों की स्थिति गंभीर।।
कब तक धीरज धरें भला है रही टूट आशा की डोर।। चलो अब..
घर घर में तुलसी चौरा, संझाबाती करे सुहागन।
हे माता कृपा करें. खुशियों भरा रहे मेरा आंगन।।
पल-पल युग सा बीते सेना में हैं जिनके साजन।
पता नहीं क्या हो जाये डरता रहता उनका मन।।
भाग्य से कोई जीत न पाया चले ना कोई जोर।। चलो अब उन
राम रहीम साथ रहते थे, सबमें था जहां भाईचारा।
सुख-दुख के सब थे साथी गांवों का माहौल था प्यारा।।
आतंक गांव तक पहुंचा, नहीं गूंजती बिरहा की बोली।।
जितनी जाति उतने गुट हैं, बात-बात में चलती गोली।।
कभी जहां थीं कजरी की तानें वहां बंदूकों का है अब शोर। चलो अब
शहरों का जावन कृत्रिम है, जहर घुली हैं जहां हवाएं।
मतलब के संबंध यहां हैं, पल पल चिंता हर दिन बाधाएं।।
ना माटी की महक है सोंधी ना बिरहा का शोर।। चलो अब उन
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Friday, December 7, 2018

घृणा,वैमनस्य,विद्वेष के बवंडर से देश को कौन बचायेगा?


जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं?

राजेश त्रिपाठी
* कुछ लोगों के लिए अचानक इतना पराया क्यों हो गया देश !
* हो गया या कुछ निहित स्वार्थी ऐसी तस्वीर पेश कर रहे हैं !
* जो देश में आग लगा उस पर घी डाल रहे हैं क्या देशप्रेमी हैं?
* देश के प्रति  प्यार दिखाने का उनका यह कैसा अंदाज है?
* अब जरूरत है जाति,धर्म,संप्रदाय से परे देश का भला सोचने की!
* भारत के प्रति विश्व का नजरिया बदला है, और हम क्या कर रहे हैं?
* देश में जो कुछ चल रहा है उससे इसके दुश्मनों का भला होगा।
* विश्व में भारत की छवि खराब होगी, पता नहीं इसमें किसका लाभ है।
* कुछ निहित स्वार्थी लोग उन देशी-विदेशी ताकतों के हाथों खेल रहे हैं
 जो अपने हित के लिए भारत को अस्थिर देखना चाहती हैं।
* कोई भी दल हो, कोई भी पक्ष हो सबसे ऊपर देश है।
* देश ही अस्थिर हो गया तो कहां रहेगा पक्ष और क्या करेगा विपक्ष।

    इसे लेख को शुरू करने से पूर्व यह साफ कर दूं कि मैं इस देश का एक सामान्य नागरिक हूं। मैं जब भी सोचता हूं जाति, धर्म, संप्रदाय से उठ कर अपने देश की सुख-शांति, उसकी रक्षा की बात सोचता हूं। मेरी यह अटूट धारणा है कि अगर देश सुरक्षित है तो मेरा हर भारतवासी सुरक्षित है। देश में शांति है तो हर घर, हर कोने में शांति होगी। देश समृद्ध होगा तो उसका लाभ हर देशवासी को मिलेगा। देश की सर्वांगीण प्रगति ही मेरा काम्य है। अपनी सामन्य बुद्धि से मेरी यह धारणा है कि हर देशवासी को अपने से पहले देश के भले की बात सोचनी चाहिए क्योंकि  देश का भला होगा तो देशवासी उससे कैसे वंचित रह सकता है। एक वक्त था जब लोगों का सोच जाति, धर्म, संप्रदाय के सीमित दायरे में कैद था। अब वक्त बदला है, लोग देश के विकास के प्रति जागरूक हुए हैं और उनके सोच ने भी सम्यक दृष्टि पा ली है जिसमें पहले देश बाद में कुछ और है। मैं किसी दल, किसी व्यक्ति विशेष का पूजक नहीं पर मैं उन लोगों में से भी नहीं जो सच्चाई से मुंह चुराते हैं। सच्चाई यह है कि 2014 में भारत में सत्ता परिवर्तन के बाद से भारत के प्रति विश्व का नजरिया बदला है। विश्व के बड़े-बड़े उद्योगपति, आईटी के दिग्गज भारत आये और यहां निवेश के प्रति आकृष्ट हुए। जाहिर है अगर वे अपने व्यवसाय का विस्तार भारत में करेंगे तो यहां के युवाओं को काम मिलेगा। याद नहीं आता इससे पहले भारत के प्रति विदेश के उद्यमियों ने इतनी उत्सकुता दिखायी हो। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद विदेश में भारत की जो साख बढ़ी है उसकी चर्चा पूरे विश्व में हो रही है। मोदी से एक व्यक्ति के रूप में किसी को जो भी शिकायत हो लेकिन आज वे देश के प्रधानमंत्री हैं, विश्व ने उन्हें इस रूप में सम्मान दिया है इसलिए हर व्यक्ति और दल को चाहे-अनचाहे उनके पद को सम्मान देना चाहिए और देश के हित में उठे उनके हर उचित कदम का समर्थन करना चाहिए। अगर वे देश की भलाई में उठे कदमों के समर्थन का विरोध करते हैं तो इसका मतलब होगा कि उनके लिए देश की प्रगति से बड़ा व्यक्तिगत स्वार्थ है। आज जनता प्रबुद्ध है वह जानती है कि देश की भलाई के लिए कौन अपरिहार्य है और उसने यह 2014 में दिखा दिया है। इस तथ्य को उन लोगों को भी जो मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से दुखी हैं, दिल भारी करके मान लेना चाहिए। सौभाग्य से हमारा देश गणतंत्र है और यहां देश की जनता के हाथ में अपनी पसंद की सरकार चुनने का हक है। उसने 2014 में अपनी सरकार चुन ली है, संसद ना चलने देना, जनता की चुनी सरकार के हर कदम पर अडंगा लगाना उस जनता का अपमान है जिसकी ये सरकार है। जहां भी देश विरोधी फैसला हो रहा है उसका विरोध भी संसद में बहस से हो सकता है पर केवल विरोध के लिए विरोध करना ना स्वच्छ विरोध की पहचान है और ना ही  स्वस्थ गणतंत्र की।
     
अब घृणा फैलानेवाले बयानों और सांप्रदायिक या जातिगत विद्वेष की छिटपुट घटनाओं पर आते हैं जिन्हें कुछ ऐसे पेश किया जा रहा है कि जैसे पूरे देश में आपातकाल की स्थिति हो। सांप्रदायिक, जातीय हिंसा की कोई भी घटना देश के किसी भी कोने में हो दुखद है, इसकी भरपूर निंदा होनी चाहिए। इसमें कोई भी दल या संप्रदाय शामिल हो उससे कानूनी ढंग से निपटना चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे देश में हो यह हो रहा है कि कहीं आग लगती है तो हमारे कुछ स्वार्थी नेता वहां पहले पहुंच जाते हैं और उस आग में पानी डालने के बजाय घृणा और वैमनस्य का घी डाल देते हैं, उसे और भड़का देते हैं। ऐसा करने का मकसद है किसी संप्रदाय या जाति के हितैषी के रूप में अपनी छवि (छद्म) पेश करना और राजनीति में उसका लाभ लूटना। होना यह चाहिए कि जहां भी कोई ऐसी घटना हो, जितनी जल्दी हो पुलिस-प्रशासन पहुंचे और जो दोषी है वह चाहे जिस भी दल या किसी रसूख वाले संप्रदाय का हो, नेता का सगा हो उसे जल्द कानून के हवाले करे। जिस दिन पुलिस-प्रशासन तत्पर हो जायेगा ऐसी घटनाएं बंद हो जायेंगी। ऐसी घटना होते ही नेताओं के उस क्षेत्र में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। इसमें सत्ता पक्ष, विपक्ष दोनों नेताओं के लिए यह बात लागू की जानी चाहिए। क्योंकि वहां पुलिस प्रशासन की जरूरत होती है। सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की स्थिति में संबंधित क्षेत्र के दोनों संप्रदायों के गणमान्य और बुजुर्ग लोगों को मिल कर वहां तत्काल स्थिति संभालने का प्रयास करना चाहिए। नेताओं के राजनीतिक और स्वार्थी पर्यटन से शायद यह कदम ज्यादा कारगर होगा।
      अब इस पोस्ट के शीर्षक जिन्हें नाज है हिंद पर वे कहां है’? पर आता हूं। सचमुच आज मेरे दिल में यही सवाल आता है कि कहां चली गयी वह पीढ़ी जो देश के लिए जान लुटाने तक को सहर्ष तैयार थी। आज उसके सामने उसके देश के कुछ स्वार्थी तत्व वैमनस्य के बीज बो रहे हैं, भाईचारे के सुदृढ़ ताने-बाने को तोड़ रहे हैं और वह पीढ़ी खामोश है। मेरा आशय उन बुजुर्गों से है जो गंगा-जमनी संस्कृति के अलमबरदार रहे हैं । जो राम-रहीम को बांटने नहीं साथ लेकर चलने के पक्षधर हैं। भारत के इस आदर्श को पूरी दुनिया ने सराहा है। दुनिया के कई ऐसे देश हैं जहां वर्षों से जातिगत दंगे चल रहे हैं, हजारों लोगों की जानें गयी हैं। कम से कम हम तो अपने इस शांतिदूत भारत को उस तरह की आग में झोंकने का काम ना करें। बुजुर्ग पीढ़ी शायद खुद को इसलिए अप्रासंगिक मान रही है क्योंकि वह आज की जेट युग की पीढ़ी से तादाम्य नहीं  बैठा पा रही । ऐसे में मेरी उम्मीद उस युवा पीढ़ी पर टिक जाती है जो बहुत ही उदार है, जो जाति-पांति, धर्म-संप्रदाय के पचड़े से ऊपर उठ कर प्रगति और विकास की बात सोचती है। यह धर्म को लेकर भी एक उदार और नया सोच रखती है। इसके लिए धर्म ना कट्टरता का प्रतीक है और ना ही विकास के पथ में ही बाधक है।इनमें से ज्यादातर तो धार्मिक कार्यों या सिद्धांतों के प्रति उदासीन दिखते हैं। मेरी विनती इनसे भी है कि ये अपने देश को स्वार्थी तत्वों की चालों से बचायें, ये तत्व राजनीति से भी हो सकते हैं और दुश्मन देशों के एजेंट भी हो सकते हैं जो भारत को विकसित होते, महाशक्तियों की पंक्ति में खड़ा होते नहीं देखना चाहते। ये यहां यह प्रचार कर रहे हैं कि देश अशांत है, धार्मिक असहिष्णुता है और इसका फायदा देश-विदेश के देश के दुश्मन उठा रहे हैं।   मैं सागर में एक छोटी बूंद की तरह हूं लेकिन इस अल्पबुद्धि के दिमाग में भी यह बात साफ हो गयी है कि अगर हम अपने देश की खराब छवि पेश करते हैं तो यहां निवेश आना बंद हो जायेगा, भारत के प्रति विदेश में जो अच्छा माहौल बना है वह खत्म हो  भारत आज आगे बढ़ रहा है और इससे उसके दुश्मनों की छाती पर सांप लोट रहा है। वे उसे येन-केन प्रकारेण अशांत और अस्थिर देखना चाहते हैं ताकि उसका विकास रथ रुक जाये और वह आगे ना बढ़ सके। इसके लिए सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद में हम हजारों जाने खो चुके हैं, हजारों जवानों, सुरक्षाकर्मियों को शहीद कर चुके हैं। हमारे दुश्मन हमारे धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं, उन लोगों ने हमारे देश में अपने एजेंट छोड़ रखे हैं जिनका काम भारत को अशांत रखना है। वे धर्म, संप्रदाय के बीच खाइयां पैदा करने में जुटे हैं ताकि भारत को भीतर ही भीतर तोड़ा जा सके। लेकिन उन्हें पता नहीं कि यह रहीम का देश है, यह रसखान की भूमि है जिन्होंने भक्तिरस के गीत गाये। यह पीर और औलियाओं की धरती है जिन्होंने मोहब्बत का पैगाम दिया। यहां नफरत के लिए कोई जगह नहीं है। यहां राम-रहीम साथ-साथ भाई की तरह रहते आये हैं। यहां अपना एक व्यक्तिगत अनुभव आपसे साझा करने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा। तब मैं बहुत छोटा था, शायद पहली कक्षा में पढ़ता था। हमारे पास के गांव में प्राइमरी विद्यालय था जहां मैं पढ़ता था। अचानक हमारे शिक्षक की मृत्यु हो गयी और विद्यालय तब तक के लिए बंद हो गया जब तक किसी दूसरे शिक्षक की नियुक्ति ना हो। मेरे सामने सवाल आ गया कि पूरे साल क्या करें। मेरे माता-पिता ने एक जुगत लगायी कि क्यों ना बेटे को एक मील दूर एक दूसरे गांव आलमपुर में मौलवी साहब के पास भेज दिया जाये। वहां यह अपने मुसलिम भाइयों के साथ वर्णमाला सीखता रहेगा। मौलवी साहब हिंदी भी जानते थे। तय कार्यक्रम के अनुसार हम आलमपुर में मौलवी साहब के सुपुर्द कर दिये गये। वहां हमारे दोस्त और सहपाठी सारे मुसलिम भाई थे । हम अपने पहले के स्कूल में प्रार्थना करते थे हे प्रभु आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिए। प्रार्थना यहां भी होती लेकिन उसके शब्द और भाषा बदल गयी। हम मौलवी साहब के यहां जो शब्द पढ़ाई के शुरुआत में कहते थे वह थे- पहला कलमा तैयब का ला इलाहाइल्लाह। वक्त काफी बीत गया इसलिए माफ करें यह पूरा याद नहीं लेकिन इसे भी मैं पूरी अकीदत के साथ पढ़ता था। उन मुसलिम भाइयों के साथ हम मोहर्रम में गम मनाते और ईद में साथ बैठ कर सिवैयां खाते थे, कभी वे हमें पराये नहीं लगे, वैसा  ही प्रेम वैसी ही आत्मीयता। सुख ही नहीं एक-दूसरे के गम में भी हम शामिल होते थे। कौमें कभी आपस में लड़ना नहीं चाहतीं कुछ स्वार्थी लोग इन्हें लड़ा कर और फिर इनके जख्मों में मरहम लगा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। दुख की बात यह है कि हमारे समाज को भी इनकी चाल समझ नहीं आती। इनसे बच कर रहना और अपने हर धर्म के भाई को गले लगाना ही श्रेयष्कर है। आग लगाने से बेहतर है प्रेम को बढ़ावा देना क्योंकि आग लगेगी तो वह राम का घर भी जलायेगी, रहीम का भी वह धर्म जाति नहीं पहचानती, उसका धर्म तो जलाना है। वह यह नहीं सोचेगी कि घर गरीब है, अमीर का या नेता या किसी मजलूम या मुफलिस का। सभी के हित में है कि अगर कहीं घृणा या विद्वेष की आग लगती है तो उसे बुझाया जाये, उस पर पानी डाला जाये।
      देश आज प्रगति के पथ पर है, विदेश के लोगों का भी इसके प्रति नजरिया बदला है लेकिन हमारे देश में कुछ लोग यह तस्वीर पेश कर रहे हैं जैसे यह देश रहने लायक नहीं रहा, हर दिशा में आफत ही आफत है। क्या आपको भी ऐसा लग रहा है अगर नहीं तो ऐसी ताकतों, ऐसे तत्वों को अपनी सामर्थ्य पर परास्त और निरस्त कीजिए जिन्हें देश की प्रगति पच नहीं रही। देश है तो हम सब हैं, मत भूलिए कई पड़ोसी शक्तियों जिनमें
एक बड़ी शक्ति भी है, उसे भारत में शांति या उसका आगे बढ़ना बरदाश्त नहीं। हमारा फर्ज है कि हम देश के बढ़ते कदमों को और गति दें तथा देश में और देश से बाहर राष्ट्रविरोधी तत्वों शक्तियों को हर तरह से परास्त करें। भाजपा और दूसरे दलों के कुछ मुंहफट नेताओं और सदस्यों से भी विनती है कि वे देशहित के बयान दें, अपनी जिह्वा पर नियंत्रण रखें, बोलना ही है तो प्रेम की बोली बोलें, जहर ना घोलें वरना वे भी देश की प्रगति में बाधक माने जाएंगे। देश विभाजन का दर्द हर वर्ग, संप्रदाय, जाति ने भोगा है, झेला है, कई परिवार दो हिस्सों में बंट कर रह गये हैं और एक-दूसरे को मिलने से तरस रहे हैं। कुछ नेताओं की महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें यह पीढ़ियों का दर्द दिया है। जो यहां रह गये चाहे जिस धर्म, संप्रदाय के हों हमारे भाई हैं उनसे वैसा ही व्यवहार होना चाहिए। यह बात सब पर लागू होती है  किसी एक या खास धर्म, संप्रदाय पर नहीं। यह देश सबका है इसे सभी को बचाना और आगे बढ़ाना है। देश और देशवासियों के प्रति प्यार प्रदर्शित करना है तो उनके प्रगति  के वाहक बनिए। कोई उनके हित के आड़ें आये तो ढाल पर कर तन जाइए। ऐसे ही भारत की हम कामना करते हैं और चाहते हैं कि हर देशवासी की भावना ऐसी ही हो। आमीन।


     


एक गजल

कोई अपना बिछड़ गया होगा
राजेश त्रिपाठी
देखो कुटिया का दम अब घुटता है।
सामने इक महल आ तना होगा।।
उसकी आंखों में अब सिर्फ आंसू हैं।
सपना सुंदर-सा छिन गया होगा।।
वह तस्वीरे गम मायूसी है ।
वक्त ने हर कदम छला होगा।।
उसको मुसलसल है इक तलाश।
कोई अपना बिछड़ गया होगा।।
जिस्म घायल है, दिल पशेमां है।
सानिहा* कोई गुजर गया होगा ।।
थक के बैठा है दरख्तों के तले ।
जानिबे मंजिल है, ठहर गया होगा।।
हर तरफ जुल्म औ दौरे मायूसी है।
कारवां इंसाफ का ठहर गया होगा।।
उसका चेहरा किताब है दिल का।
हर तरफ दर्द ही दर्द लिखा होगा।।
ख्वाबों के सब्जबाग जाने कहां गये।
अब तो हसीं सपना बिखर गया होगा।।
वह गरीब है बारहा* करता फांकाकसी।
तरक्की का कारवां कहीं ठहर गया होगा।।
रो रही है जार-जार कोई दुख्तर ।
जख्म कोई अजनबी दे गया होगा।।
कलम कुंद है लब खामोश से हैं।
सच कहनेवालों पे संगीनों का पहरा होगा।
उसकी चीख का भी ना हो सका असर।
लगता है निजामे वक्त भी बहरा होगा।।
आपको इनसानियत का है वास्ता।
सुधारो मुल्क वरना दर्द ये और भी गहरा होगा।।
.........................................................
सानिहा* =दुर्घटना, हादसा, मुसीबत
बारहा*= अकसर, बारबार, बहुधा
दुख्तर* =बेटी, पुत्री
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Tuesday, December 4, 2018

iगीत


पूरी दुनिया गाती अब तक जिसकी शौर्य कहानी
राजेश त्रिपाठी
नहीं  झुके हैं नहीं  झुकेंगे  हम  वीर बलिदानी
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी।।

वीर शहीदों के बलिदानों से हमने पायी थी आजादी।
दिल बोझिल है, आंखें नम, देश की  लख बरबादी।।
केसर  क्यारी सिसक रही धधक रहा  कश्मीर  है।
भू-स्वर्ग  दोजख  बन बैठा सही ना जाती पीर है।।

बच्चों के  हाथों में  पत्थर, लख होती  हैरानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी।

भेज रहा आतंक की  खेपें, ऐसा  है शैतान।
पाक तो जैसे खो चुका है धर्म और ईमान।।
देश-विरुद्ध देश के  बच्चों  को जो  बहकाये।
कश्मीर चाहे आजादी हरदम बांग लगाये।।

कश्मीरियों के लिए बहाता आंख से नकली पानी।
हम हिंदुस्तानी, हम  हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तनी ।।

भूल रहा शैतान इसने हमसे युद्ध में मुंह की खाई है।
अपना हर जवान भगत सिंह, हर बाला लक्ष्मीबाई है।।
घर-घर  में अब्दुल हमीद  हैं,  जर्रे-जर्रे में  बतरा  हैं।
मातृभूमि हित लुटा  सकते खून का कतरा कतरा हैं।।

भारत के हित कुरबान कर चुके अपनी जो जवानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी।।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपना भारत एक है।
हिंदू, मुसलिम, सिख,ईसाई इसके सारे बंदे नेक है।।
सबके मन में भारत है दिल में इनके तिरंगा है।
सब धर्मों को देता आदर मेरा भारत सतरंगा है।।

कुचल डालिए इसे छेड़ने की हर इक कारस्तानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी।।

जहां हुए तुलसी, कबीर, जायसी औ रहीम रसखान।
गंगा-जमनी तहजीब जहां , मेरी जान ये हिंदुस्तान।।
बच्चा-बच्चा  वीर  है इसका घर-घर में आजाद हैं।
इसीलिए ये देश हमारा, देखो शाद और आबाद है।।

पूरी दुनिया गाती अब तक जिसकी शौर्य कहानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी।।

आओ इस पुनीत दिवस पर हम  कसम ये खायें।
हिमालय से तन जायेंगे गर देश पर आयें बाधाएं।।
अपना पल-पल ऋणी है इसका ये अपना आधार है।
यह है तो हम है  इससे हम सबको बेहद प्यार है।।
जो भी हमसे टकरायेगा उसको पड़ेगी मुंह की खानी।
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी ।।






व्यंग्य कविताएं


भाग-4
तब क्यों होता फर्क

कितने जन भोजन बिना तड़प-तड़प मर जांय।
सरकारी  गोदाम  में  अन्न पड़ा सड़ जाय ।।
सब जन प्रभु की देन हैं, तब क्यों होता फर्क।
कुछ  तो सिंहासन चढ़े, कुछ का बेड़ा गर्क ।।

कलियुग में  सब  जनों  पर नहीं करें विश्वास।
मधुर मधुर बतियाय कुछ सज्जन को ले फांस।।
सदा  खुशी  रहता  वही  जिसमें  हो  संतोष ।
जिसे अधिक की लालसा, देय भाग्य को दोष।।

श्रद्धांजलि
याद किया जाता वीरों को जिस दिन वे शहीद होते हैं।
मालाएं  पहना  कर  नेता, घड़ियाली आंसू रोते हैं ।।
लंबे  चौड़े  भाषण होते, जम कर होती खूब प्रशंसा ।
अखबारों में नाम छपेगा, असल यही होती है मंशा ।।

शेष तीन सौ चौसठ दिन तक, मूर्ति गंदगी से भर जाती।
पक्षी बैठ बीट करते हैं, नहीं किसी को सुधि तब आती ।।
ऐसा  करने से अच्छा है, करें  मूर्ति  की  सदा सफाई ।
यही श्रेष्ठ श्रद्धांजलि होगी, नेताओं को यदि यह भाई।।
  
माया वाला रोग
अपना सब कुछ भूल कर, चलें गैर की चाल।
आज विदेशी लगें वे, अद्भुत उनकी चाल ।।
धनकुबेर तो बन गये, किंतु और की चाह ।
इसीलिए वे आजकल, चलें गलत सब राह।।

जो बन जाता है कभी धन दौलत का दास।
मानवता उससे डरे, कभी न आती पास ।।
नहीं संग कुछ जात है, जानत हैं सब लोग।
किंतु  न पीछा छोड़ता, माया वाला रोग ।।

साहस हारे कवि से
कविता लिखना बहुत कठिन है, कवि बनना आसान नहीं है।
पंत, निराला, बच्चन  जैसे,  कवियों की अब शान नहीं है।।
बात  नहीं जंचती हमको यह, दिल छोटा क्यों करते प्यारे ।
ऐसा  लिखो  जमाना  चौंके, श्रोता  अर्थ  लगा कर हारे ।।

रबड़  छंद  के  चलते  अब  तो , सारे  टूट  गये  हैं  बंधन।
जहां आग का तुक लिखना हो, साहस कर लिख मारो चंदन।।
पांडे,  बच्चन  ने  लिख  डाली, हल्दीघाटी  औ मधुशाला
साहस  कर  के तुम  लिख  मारो, चूनाघाटी खटमलशाला।।

चाह नहीं है
चाह नहीं संपादक बन कर, जो  मन  आये छपवाऊं।
चाह नहीं  आफीसर बन  कर, मनचाही रिश्वत पाऊं।।
चाह  नहीं  घुसखोरी करके, महल  दोमहले बनवाऊं।।
चाह नहीं लीडर बन कर के, जनता को नित भरमाऊं।।

चाह नहीं तस्कर बन कर के, धन कुबेर मैं कहलाऊं।
चाह नहीं दल बदल करॉं फिर, ऊंचा पद पा इतराऊं।।
चाह यही है हे वनमाली, भ्रष्ट जनों से मुझे बचाना।
ऐसों के दर्शन पाकर के , नहीं नर्क हमको है जाना।।

नारी तुम हो केवल श्रद्धा
नारी तुम अतशिय उदार हो, है महान व्यक्तित्व तुम्हारा।
तुमने  अर्पण ही सीखा है, स्वीकारो  तुम नमन हमारा ।।
एक  और व्यक्तित्व तुम्हारा,आज विश्व भर में है छाया।
विज्ञापन  की तुम हो शोभा, अजब तुम्हारी देखी माया।।

साबुन,  शैंपू,  तेल,   तौलिया,  देखे   तरह-तरह  विज्ञापन।
शर्टिंग, सूटिंग, काजल, सुरमा, मरहम, क्रीम, दांत का मंजन।।
नारी  तुम  केवल  विज्ञापन  समझ रहे,  जो  करते धंधा ।
किंतु तुम्हें  हम  सदा मानते, नारी तुम हो केवल  श्रद्धा ।।

शुद्धिकरण
राजनीति में शुद्धिकरण की, लोग सदा करते हैं चर्चा।
भीषण भाषण में नेतागण, शब्द बहुत करते हैं खर्चा।।
नहीं पालते बाहुबली हम, दागी नहीं एक भी रहता।
ताज्जुब खुद अपराधी होता, सो ऐसा ही दावा करता।।

कितने ऐसे  होते  मंत्री, जिनकी  छवि  हो भ्रष्टाचारी।
मालाओं से  लादे  जाते, खूनी,  अपहर्ता,  व्यभिचारी।।
केवल भाषण में सुनते हैं, शुद्धिकरण की अगणित बातें।
जिनके श्रीमुख से यह सुनते वही कर रहे छिप कर घातें।।

नहीं तरक्की पाय
रुक्मजगत में आय कर, कर लीजै यह काम।
बिना परिश्रम धन जुटे, कष्ट ना पावे चाम ।।
ऐसी  बानी  बोलिए,  अपना   आपा   खोय।
जिसमें दहशत हो भरी, घूस ना  मागे  कोय।।

ज्यों-ज्यों कलियुग बढ़ रहा, नारि उघरती जाय।
त्याग, लाज, संकोच सब  अंग- अंग दर्शाय ।।
ठकुरसुहाती  नहीं कहें, खरी  बात  बक जांय।
बात  बिगाड़े  आपनी,  नहीं  तरक्की  पाय ।।

फर्ज

इच्छा है या अनंत सागर, जिसका मिलता है छोर नहीं।
मैं तो रानी अब ऊब गया,पर तुम होती हो बोर नहीं।।
फरमाइश फर्ज न बीबी का, यह फर्ज महज महबूबा का।
तुम जब फरमाइश करती हो, करती हो काम अजूबा का।।
पहले  देखो  सोचो, समझो,  कितनी  भूलें कर डाली हैं।
यह घर या ट्रेन की बोगी है, कोई भी जगह न खाली है।।
दिन रात  मचे धक्कम धुक्का, गाली-गलौज मारा पीटी ।
कोई  तो  दांत  निपोर  रहा,  कोई  मारे  लंबी सीटी।।

आज हमें चाणक्य चाहिए

जन प्रतिनिधि कहलाने वाले अगर सुरक्षा ले चलते हैं।
इसका  अर्थ  यही होता है, जनता से डरते रहते हैं ।।
छोटे  नेताओं  को देखा,  वे  भी चाह  रहे हैं पहरा ।
वह सब देख और सुन कर, हमको लगता सदमा गहरा।।
नेता वह जो  पूजा  जाये, सबकी हो आंखों का तारा ।
नहीं किसी का उसको डर हो,जन-जन का हो राजदुलारा।।
हमें आज चाणक्य  सरीखा, अगर कहीं नेता मिल जाये।
इसमें नहीं जरा भी शक है, अपना देश स्वर्ग बन जाये।।

कैसे कहें जवान?

कहां गयी अपने तरुणों की, केहरि-सी वह चाल।
इस्पाती वक्षस्थल दिखता, ज्यों राणा की ढाल।।
पदघात  करते  धरती से, बह उठता था नीर ।
अब इतिहासों के पृष्ठों पर मिलते हैं वे वीर ।।
झुका नयन  ऐसे चलते हैं, जैसे चलता दूल्हा।
लज्जा से मुस्काती तरुणी,देख लचकता कूल्हा।।
तरुणायी में कटि झुक जाती, कैसे कहें जवान।
इनसे तो बहु वृद्ध महाशय, दिखते हैं बलवान।।

बदल न जाये सेक्स

ब्लाउज  सी  बुशर्ट  पहनते,  लड़के  केश बढ़ाते।
रह-रह अलक झटकते चलते,कमर नयन मटकाय।।
कोई  ऐसा  वेश  बनाता,  पतले स्वर में गाता ।
लड़का है या लड़की भैया, भेद समझ ना आता।।
रूप बदलने  की  लगी होड़, बढ़ी आज बीमारी ।
भय है कहीं दिखाई ना दे, लड़कों के तन सारी।।
फैशन की इस प्रदर्शनी पर,अगर  लगी ना रोक।
भय है सेक्स बदल ना जाये,चलेगी यह बेटोक।।