Sunday, October 10, 2021

रामखिलावन त्रिपाठी पर टूट पड़ा दुख का पहाड़

 आत्मकथा

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश  त्रिपाठी

भाग-5

 जब से मंगल प्रसाद तिवारी को यह पता चला था कि उनकी बहन उम्मीद से है तभी से वे उस दिन का इंतजार कर रहे थे कि कब वह दिन आयेगा जब कोई उनसे कहे-तिवारी जी आप तो मामा बन गये।

दिन यों ही गुजरने लगे। आखिर वह शुभ घड़ी आ ही गयी जब मुखिया शिवदर्शन त्रिपाठी के घर एक बालक का जन्म हुआ। अब मुखिया के घर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो खुशियों का पारावार न रहा। बधाइयां बजने लगीं, बतासे बटने लगे। मुखिया खुशी से फूले न समाये और बच्चे को लेकर तरह-तरह के सपने देखने लगे। उत्तरप्रदेश के गांवों में बच्चों के नाम ईश्वर या देवताओं के नाम के साथ जोड़ कर रखने की परंपरा थी इसलिए बच्चे का नाम रामखिलावन त्रिपाठी रखा गया। शायद इसका अर्थ यही होता है कि ऐसा बच्चा जिसे खेलाने के लिए स्वयं राम ही आ जायें। अच्छी कई एकड़ की मालवा जमीन सोने जैसी बालियों वाली गेहूं की फसल वरदान में देती थी वह शिवदर्शन जी के पास थी। गांव के मुखिया थे खूब मान-सम्मान था। ईश्वर की कृपा से किसी चीज की कमी नहीं थी। वे बड़े अच्छे स्वभाव के थे और गांव के हर व्यक्ति की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उनके घर बेटा आया तो बेटे के मामा मंगल प्रसाद त्रिपाठी भी फूले नहीं समाये। स्वामी कृष्णानंद तो संन्यासी हो गये थे लेकिन उन तक भी खुशी की यह खबर पहुंची तो उनके हर्ष का भी ठिकाना ना रहा।

धीरे-धीरे बालक रामखिलावन बढ़ने लगे। जब वे पांच साल के हुए तो मामा मंगल प्रसाद उन्हें अपने छोटे भाई स्वामी कृष्णानंद जी से मिलाने ले गये। उसके बाद बालक रामखिलावन अपने छोटे मामा स्वामी कृष्णानंद से मिलने अक्सर उनकी कुटी पहुंच जाते थे। सब लोग बहुत खुश थे लेकिन कहते हैं ना कि खुशी और गम में कोई ज्यादा फासला नही होता। कोई नहीं जानता कि अभी जो ठहाका है वह कब कराह और क्रंदन में बदल जाये। इस सच्ची कहानी में भी सुख बहुत जल्द ही दुख में बदल गया। नन्हा बच्चा रामखिलावन अभी पिता का भरपूर प्यार पा भी न सका था कि शिवदर्शन जी को एक ऐसी बीमारी लग गयी जिसे सिर्फ और सिर्फ आपरेशन से ही ठीक किया जा सकता था। उस वक्त लोग आपरेशन से बेहद डरते थे और वह भी नाक जैसी संवेदनशील जगह का। उन्हें नाक के पॉलिप (मांस बढ़ जाने की बीमारी) बढ़ जाने की बीमारी हो गयी थी जिससे सांस लेने में बेहद तकलीफ होती थी । अब तो शायद इसे रे से जला कर या दूसरी पद्धति से ठीक कर लिया जाता है लेकिन उस वक्त पॉलिप को काटना पड़ता था। अब जीजा की बीमारी को लेकर चिंतित मंगल प्रसाद त्रिपाठी भी परेशान रहने लगे। उन्होंने जीजा जी से पूछा कि क्या किया जाये, कैसे इस बीमारी से निजात पायी जा सकती है। जीजा जी ने सुझाया कि अगर आपरेशन ही इस बीमारी का इलाज है तो फिर बांदा ले चलो मेरा आपरेशन करा दो। जीजा जी की आज्ञा पाते ही मंगल प्रसाद उनको बांदा ले गये। वहां एक सर्जन को दिखाया गया तो उसने आपरेशन कराने की सलाह दी। कोई चारा न देख कर आपरेशन के लिए हामी भर दी गयी। डॉक्टर ने आपरेशन कर पॉलिप तो निकाल दी लेकिन एक अनर्थ हो गया। उसने पॉलिप के साथ ही एक शिरा भी काट दी जिससे होनेवाले रक्तक्षय से शिवदर्शन जी की स्थिति खराब होने लगी। जब उनके बचने की कोई उम्मीद नहीं रह गयी तो उन्होंने अपने साले मंगल प्रसाद तिवारी से कहा कि वे उन्हें वापस घर (बिलबई) ले चलें। उन्होंने उनसे साफ कह दिया-गांव में प्रवेश करते वक्त मुझे गांव के बीच से नहीं किनारे से ले चलना जिससे दुश्मन यह न देख लें कि मैं खत्म हो रहा हूं।

      खैर शिवदर्शन जी को बचना नहीं था और अतिरिक्त रक्तक्षय से उनका निधन हो गया। बालक रामखिलावन के सिर पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा। अभी वह पिता की बांह पकड़ चलना भी न सीख पाया था कि उन बांहों का सहारा उससे हमेशा के लिए छिन गया। वह उस अबोध उम्र में था जब उसे पिता की मृत्यु का अहसास भी नहीं हो पाया था। पिता जब आखिरी सांसें ले रहे थे लोगों ने उसे भी लाकर उनकी खाट के पास  खड़ा कर दिया था। सभी  रो-बिलख रहे थे तो बालक रामखिलावन की भी आंखों में आंसू आ गये। आंखों में आंसू आये और उधऱ उसकी जिंदगी में खौफ और दहशत का साया उतर आया। पिता के जाने के बाद उसके सबसे करीबी परिजन उसकी जान के दुश्मन बन गये। उनकी  योजना थी कि अगर यह बच्चा नहीं रहे तो शिवदर्शन की जमीन के वारिस भी वही हो जायेंगे। रामखिलावन के मामा मंगल प्रसाद को उनकी इस मंशा की भनक लग गयी। वे कुछ दिन तक छोटे रामखिलावन को पीठ में बांध कर उसके खेतों आदि का काम देखने लगे और  जब खतरा बढ़ता देखा तो अपना सुख-चैन, अपने गांव की जमीन सब त्याग कर शहर बांदा चले गये। तब तक मंगल प्रसाद ने शादी नहीं की थी। अब बांदा आये तो पहले किसी काम  की तलाश में जुट गये ताकि बच्चे का पालन-पोषण और उसका रख-रखाव सही ढंग से किया जा सके। पहले उन्हें नहर विभाग में काम मिला जहां अंग्रेज ओवरसियर से उनकी खूब पटती थी। रामखिलावन थोड़े बड़े हुए तो उनको स्कूल में दाखिल कराया गया लेकिन बच्चे को सभालना और नौकरी करना एक साथ संभव नहीं हो पा रहा था इसलिए लोगों की सलाह पर मंगल प्रसाद शादी के लिए राजी हो गये। उनकी शादी मध्यप्रदेश की गौरिहार की गोरीबाई से हुई जिनका नाम बाद में मीरा त्रिपाठी हो गया। शादी हुई तो उनकी पत्नी ने रामखिलावन के पालन-पोषण का सारा जिम्मा अपने  सिर पर ले लिया। उनके प्यार-दुलार ने बालक रामखिलावन को पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। जब किशोर वय में आये तो शहर की रामलीला में लक्ष्मण की भूमिका करने लगे। उत्तर प्रदेश में उन दिनों रामलीला का बहुत चलन था। जन-जन के हृदय में बसी रामायण की गाथा का सजीव मंचन सबका मन मोह लेता था। रामखिलावन का लक्ष्मण के रूप में अभिनय भी लोगों को बहुत भाता था। उन दिनों वे बड़े-बड़े घुंघराले बाल ऱखते थे। रामलीला का श्रीगणेश मुकुट पूजन से और समापन भरत मिलाप से होता था। रामलीला के कुछ प्रसंग स्थायी रामलीला मंच के अलावा तालाब आदि में भी होते थे। इस तरह रामखिलावन की जिंदगी का सफर आगे बढ़ता रहा। उनका लगाव साहित्य से भी था और 13 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने कविताएं व कहानियां लिखना शुरू कर दिया था। कुछ और बड़े हुए तो कहानियां और कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं। एक लेखक के रूप में उनकी पहचान बन गयी। कवि सम्मेलनों में उन्हें बुलाया जोने लगा। बड़े-बड़े कवियों के साथ वे मंच साझा  करने लगे। उन दिनों  स्वाधीनता  आंदोलन चल  रहा  था  जिसमें बढ़ चढ़ कर 


उन दिनों ऐसे दिखते थे रामखिलावन त्रिपाठी

हिस्सा लिया। कविताओं के जरिये भी विदेशी शासन पर हमला करते रहे। कई बार लाठियां खायीं, यातनाएं सहीं। तब वे व्यथित” उपनाम से कविताएं लिखा करते थे। उन दिनों बांदा के कलेक्टर बालकृष्ण राव थे जो खुद भी अच्छे कवि थे और हिंदी में गीत लिखते थे। वे अपने बंगले पर कवि सम्मेलन करवाते थे जिसमें कवि व्यथित यानी रामखिलावन भी प्रमुखता से हिस्सा लेते थे। राव साहब उनकी कविताओं से बहुत प्रभावित थे और उन्होने व्यथित को रुक्म” बना दिया। रुक्म यानी स्वर्ण और इसका एक अर्थ रुक्मिणी का भाई भी होता है। उस दिन कलेक्टर ने उन्हें फूलमाला पहना कर, हाथी में बैठा कर पूरे शहर में घुमा कर सम्मान भी किया था।

उसके बाद से ही वे रुक्म नाम से ख्यात हो गये। इस नाम की प्रसिद्धि में उनका वास्तविक नाम (रामखिलावन) कहीं छिप गया। बांदा में जिये उनके कालखंड में कई घटनाएं-दुर्घटनाएं, कभी खुशी कभी गम जैसी स्थितियां भी हैं। एक बार तो वे बांदा की केन नदी में डूबते बचे थे जहां उन्हें उनके मामा मंगल प्रसाद ने ही बचाया। (क्रमश:)

 

Sunday, October 3, 2021

संस्कृत पढ़ कर लौटे मंगल प्रसाद के भाई बन गये संन्यासी

            कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

(भाग-4)

जिस दिन से मंगल प्रसाद तिवारी को यह पता चला कि उनकी बहन रानी उम्मीद से है उसी दिन से वे उसकी आनेवाली संतान के बारे में तरहृ-तरह के सपने बुनने लगे। उन्हें उस दिन का इंतजार था जब उनके जीजा के घर आनेवाला कोई नया मेहमान उन्हें मामा कह कर पुकारे। उसके आने के बाद उनकी जिम्मेदारियां और भी बढ़ जायेंगी।

यह कहानी अब जिस गांव बिलबई में पहुंच गयी है वह बांदा-बबेरू रोड के किनारे स्थित है। सड़क के पास से ही एक छोटी नदी बहती है। इस गांव के ऊंचे हिस्से पर घा मुखिया शिवदर्शन त्रिपाठी का घर जहां मंगल प्रसाद तीवारी भी अपने जीजा जी के साथ रहते थे।

उधर पीलीकोठी संस्कृत विद्यालय में मंगल प्रसाद तिवारी के छोटे भाई ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी. उन्हें लौटना तो जुगरेहली ही था लेकिन उन्हें बड़े भैया मंगल प्रसाद से पता चल गया था कि ले जुगरेहली छोड़ चुके हैं और बिलबई में जीजा जी के साथ रहने लगे हैं.। अब उनके पास बिलबई लौटने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। वे वेद, पुराण, व्याकरण आदि में निपुण हो चुके थे और संन्यासी जीवन बिताने का निर्णय कर चुके थे।

 बिलबई लौट कर उन्होंने बड़े भैया से संन्यासी होने का अपना निर्णय बता दिया.। बड़े भाई मंगल प्रसाद ने उन्हें अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया लेकिन वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। उन्होंने बिलबई के पास ही नदी के किनारे अपनी कुटी बनायी और अपना नाम रख लिया स्वामी कृष्णानंद जी।

यहां यह बताना प्रासंगि्क होगा कि कृष्णानंद जी इस ब्लागर (राजेश त्रिपाठी) के सगे चाचा थे। मेरे चाचा स्वामी कृष्णानंद जी की पीतल की एक छोटी बालटी भी थी जिसमें नीचे उनका नाम खुदा था-स्वामी कृष्णानंद जी, कुटी बिलबई। वह जाने कहां खो गयी पता नहीं चला।.स्वामी कृष्णानंद जी संस्कृत के निष्णांत विद्वान थे। उन्होंने सांसारिक बंधनों में फंसने के बजाय स्वामी बनना पसंद किया और बांदा-बबेरू रोड में बिलबई ग्राम के पास एक कुटी बनायी, वहां एक मंदिर और कुएं का निर्माण कराया। मैंने (ब्लागर राजेश त्रिपाठी) अपने चाचा को देखा नहीं उनके जीवन की कहानियां पिता जी मंगल प्रसाद जिवारी से ही सुनी। पिता जी ने बताया कि जब चाचा ने मंदिर और कुंआ बनाया तो ईंटें पथवाईं और उन्हें पकाने के लिए भट्ठा लगवाने के लिए सड़क किनारे के पेड़ काट कर उस लकड़ी का इस्तेमाल कर लिया। जब सरकारी मोहकमे को पता चला कि स्वामी जी ने सरकारी पेड़ कटवा लिये तो केस दर्ज हो गया। स्वामी कृष्णानंद जी को कोर्ट में तलब किया गया।

                  बिलबई में कृष्णानंद जी द्वारा बनवाया मंदिर और कुआँ



         जहां  यह विद्यालय है वहीं कभी कृष्णानंद जी की कुटी थी

जज ने उनसे पहला सवाल किया-स्वामी जी। आपने यह क्या किया, सरकारी पेड़ काट कर भट्ठे में लगा डाले।

स्वामी कृष्णामंद जी -क्या करे हुजूर, कुआं बनवाना था, वहां बांदा-बबेरू मार्ग के यात्री पल भर रुक कर गर्मी के दिनों में पानी पीते हैं, कुटी में थोड़ा सुस्ता लेते हैं और फिर अपने गंतव्य को बढ़ जाते हैं। प्रभु का  छोटा- सा मंदिर भी बना लिया है।

जज- वह सब तो ठीक है लेकिन सरकारी संपत्ति का बिना इजाजत इस्तेमाल कर आपने गलत काम किया है आपको जुर्माना तो देना ही पड़ेगा।

स्वामी कृष्णानंद-हुजूर मैं तो ठहरा भिखारी। जुर्माना भरने के लिए तो मुझे लोगों के सामने झोली फैलाने पड़ेगी। मैं शुरुआत आपसे ही कर रहा हूं। जितना जुर्माना बनता हो आप ही भर दें हुजूर। मैं कहां से लाऊं।

स्वामी कृष्णानंद जी का जवाब सुन जज मुसकराये और बोले जाइए स्वामी जी, आपसे कौन पार पायेगा। अब से ऐसा मत कीजिएगा।

स्वामी- नहीं हुजूर, अब ऐसी गलती नहीं होगी।

2016 में मैं (राजेश त्रिपाठी) 35 साल बाद जब गांव गया तो स्वामी कृष्णानंद जी की कुटी देखने भी जाने का सुअवसर मिला। मैं तो पहले भी गांव में था तो बांदा आते-जाते कुटी में जरूर उतरता था। पिछली बार जाकर देखा की कुटी तो नहीं रही लेकिन कुछ सुजान लोगों ने उस जगह पर विद्यालय बनवा दिया है जहां बच्चे पढ़ते हैं। किसी ने मंदिर और कुएं में रंग-रोगन भी करवा दिया था। यह देख कर अच्छा लगा कि चाचा जी की स्मृति को कई दशक बाद भी गांव वालों ने संभाल कर रखा है। उनके प्रति जितनी कृतज्ञता व्यक्त करें कम होगी।

कहते हैं हम उन्हीं स्वामी कृष्णानंद जी के अवतार हैं। हम नहीं जानते कि यह कहां तक सच है लेकिन एक बात तो है कि अगर हममें कूट-कूट कर धार्मिक प्रवृत्ति भरी है तो यह हमारे पूर्वजों की ही प्रेरणा और देन हो सकती है। संयोग कुछ ऐसा बना की हमारे विद्यारंभ का प्रारंभ भी संस्कृत गुरुकुल से ही हुआ।

 हमारी तरफ ऐसी मान्यता है कि परिवार का कोई दिवंगत सदस्य अपने परिवार की महिला से स्वप्न में कुछ खाना मांगे तो माना जाता है कि वह उस परिवार में आना चाहता है। मेरे चाचा जी भी मां के स्वप्न में आये थे और उनसे कुछ खाना मांगा। मां ने उन्हें भोजन करवाया और उनकी नींद टूट गयी। उन्होंनें देखा  कि कहीं कोई नहीं है। लेकिन उसके कुछ  काल बाद वह उम्मीद से हुईं और फिर मेरा जन्म हुआ। इससे पहले मां अपनी दो संतानें खो चुकी थीं। यहां चाचा जी के संदर्भ में यह जिक्र दिया। मंगल प्रसाद तिवारी के विवाह और इस अकिंचन के जन्म की कथा अगली किस्तों में आयेगी। (क्रमश:)

 

 

 

 

Monday, September 27, 2021

 

मंगल प्रसाद तिवारी बन गये जीजा के बाडीगार्ड

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

(भाग-3)

मंगल प्रसाद तिवारी जीजा शिवदर्शन त्रिपाठी जी के साथ बिलबई चले गये। पीछे उनके गांव जुगरेहली का घर और खेत अनाथ छूट गये। यहां यह बताते चलें कि मंगल प्रसाद तिवारी न सिर्फ बेहद साहसी अपितु बंदूक, पिस्तौल, तमंचा,भाला सब कुछ चलाने में माहिर थे। ऐसे में वे अपने जीजा जी के बाडीगार्ड बन गये।छह फुट लंबे कदवाले मंगल प्रसाद जीजा जी का इतना आदर करते थे कि कभी उनसे आंख उठा कर बात नहीं करते थे। उनका इशारा पाते ही अकेले सात-सात लोगों के छक्के पलक झपकते छुड़ा देते थे। एक बार ऐसी ही किसी झड़प में एक दुश्मन ने मंगल प्रसाद पर पीछे से भाले से हमला कर दिया। जाड़े के दिन थे मंगल प्रसाद रुई से भरी मोटी जाकेट पहने थे (अपने बुंदेलखंड में इसे रुइहाई सदरी कहते हैं) जिसमें भाला फंस गया जिससे वे बच गये।

जीजा शिवदर्शन त्रिपाठी बिलबई के मुखिया थे और बड़े कास्तकार भी। उनके काली मिट्टी के खेतों में गेहूं की सुनहरी बालियां लहराती लोग देखते ही रह जाते थे पर दुश्मनों के दिल जलते थे। शिवदर्शन जी के दुुश्मनों में पराये नहीं बल्कि उनके अपने ही लोग थे। वे सीधे शिवदर्शन जी से लड़ नहीं सकते थे इसलिए भाड़े के टट्टुओं से उन पर हमला करवाने की कोशिश करते रहते थे लेकिन ऐसे हर हमले में मंगलप्रसाद जीजा की ढाल बन जाते। शिवदर्शन जी अपने दुश्मनों को जानते थे पर वे उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते थे क्योंकि वे थे तो अपने ही।

यहां मंगल प्रसाद तिवारी के साहस की दो घटनाओं पर आते हैं। बिलबई में रहते हुए ही एक बार वे चित्रकूट की यात्रा पर गये जहां भगवान राम. लक्ष्मण और सीता ने वनवास के लगभग साढ़े ग्यारह साल बिताये थे। प्रभु राम ने कामद गिरि पर्वत की चोटी पर पर्णकुटी बनायी थी और उसी में रहते थे। मंगल प्रसाद तिवारी जब परिक्रमा पथ पर कामद गिरि की परिक्रमा कर रहे थे तो अचानक उनके मन में आया कि क्यों ना चोटी पर चढ़ कर वह जगह देखी जाये जहां प्रभु राम रहते थे।

 यह सोच कर जब मंगल प्रसाद तिवारी कामद गिरि पर चढ़ने लगे तो परिक्रमा पथ पर चल रहे लोगों ने टोंका –अरे भाई ऊपर मत जाना वहां खूंखार जानवर हैं खा जायेंगे।

मंगल प्रसाद तिवारी ने कहा- यहां तक आये हैं तो वह जगह तो देख कर ही जाऊंगा जहां प्रभु रहे थे। अगर मेरी जान किसी खूंखार जानवर के हमले से जानी है तो  जाये। प्रभु के चरणों से पावन स्थान तो देख कर ही जाऊंगा।

 वे चोटी पर गये और उन्होंने वहां देखा कि जिस जगह पर्णकुटी बनायी गयी रही होगी वह जगह समतल थी। इतना ही नहीं वहां आसपास तुलसी के पौधों का जंगल था। कहते हैं कि वनवास में चित्रकूट वास के समय पर्वत पर तुलसी के ये पौधे सीता जी ने लगाये थे जो धीरे-धीरे फैलते गये। शायद इसे देख कर ही यह उक्ति बनी होगी-रामभरोसे जो रहें पर्वत पर हरियांय। तुलसी बिरवा बांग में सींचे से कुम्हलांय।।



             कालींजर किले का भीतरी दृश्य

चित्रकूट से वापस लौटते वक्त चित्रकूट से बांदा जानेवाले मार्ग पर पड़ता है कालींजर का किला। कहते हैं कि इसका पहले कालंजर नाम था यानी जो काल से भी जीतता रहा हो बाद में यह कालींजर हो गया। इस पर कई हमले हुए लेकिन इसका अस्तित्व बरकरार रहा।कालिंजर किला, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के बांदा जिला स्थित एक किला है। इसे भारत के सबसे विशाल और अपराजेय किलों में गिना जाता रहा है। इस किले में कई प्राचीन मन्दिर हैं। इनमें कई मंदिर तीसरी से पाँचवीं सदी गुप्तकाल के हैं।

कालींजर दुर्ग में स्थित नीलकंठ महादेव
   यहाँ के शिव मन्दिर के बारे में मान्यता है कि सागर-मन्थन से निकले कालकूट विष को पीने के बाद भगवान शिव ने यही तपस्या कर उसकी ज्वाला शांत की थी। यहां शिव जी की मूर्ति से लगातार पसीना निकलता रहता है। इसे पोंछ देने से वह फिर गरदन पर झलक आता है. कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला कतिकी मेला यहाँ का प्रसिद्ध सांस्कृतिक उत्सव है।

           यह है कालींजर किले के अंदर की पाताल गंगा का वीडियो
         वीडियो देखने के लिए  सबसे  पहले वीडियो के  बीच के बटन  पर फिरनीचे बायें वाले छोटे  बटन पर क्लिक कीजिए

 चित्रकूट से वापस लौटते वक्त मंगल प्रसाद तिवारी ने कालींजर किले और वहां स्थित नीलकंठ भगवान के दर्शन करने की सोची। वे किले में गये वहां नीलकंठ के दर्शन किये। वहीं किसी ने बताया कि पातालगंगा में स्नान करने से बहुत पुण्य मिलता है। किले के परिसर में ही एक ओर पातालगंगा थी. वहां मंगल प्रसाद ने देखा वहां कुछ खंभे हैं। वहीं बैठे किसी व्यक्ति ने कहा-इस पातलगंगा के सात खंभे छू आने वाले को स्वर्ग मिलता है।

अब मंगल तिवारी थे बेहद साहसी उन्हें किसी बात का डर नहीं था। वे सातों खंबे चूकर जब लौट रहे थे तो वहां एक पुलिस अधिकारी आ गया और बोला-आप इस कुंड में क्यों उतरे उतरे ही नहीं दूर तक चले गये जहां गहरा अंधेरा है। उस अंधेरे में जाने की कोई हिम्मत नहीं कर सका, आप कैसे चले गये। आपने देखा नहीं बोर्ड लगा है कि इसमें उतरना नहाना मना है।

 मंगल प्रसाद गलती तो कर बैठे थे वे बोले-साहब बोर्ड देखा नहीं क्षमा चाहता हूं।

  खैर पुलिस से छूट गये। वहीं पर किसी ने बताया कि प्रलय के वक्त इसी पातालगंगा का पानी इतना बढ़ जायेगा कि उससे पूरा पृथ्वीलोक जल में समा जायेगा। (क्रमश:)

 


Monday, September 20, 2021

भाग्य पर किसी का जोर नहीं चलता

                                कुछ भूल गया कुछ याद रहा

                    राजेश त्रिपाठी

                     (भाग-2)

पंडित मुखराम शर्मा के छोटे परिवार में तब एक और खुशी जुड़ गयी जब मंगल प्रसाद तिवारी के छोटे भाई का जन्म हुआ। आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट करता चलूं, लोगों को सदोह हो सकता है कि शर्मा तिवारी या त्रिपाठी कैसे हो गये। शर्मा ब्राह्मणों की आम उपाधि है। कोई भी ब्राह्मण अपने को शर्मा लिख सकता है साथ ही वह अपनी कुल उपाधि दुबे, शुक्ल, तिवारी, त्रिपाठी लिख सकता है। तिवारी, त्रिपाठी का अंतर भी समझते चलें। गांव में तिवारी कहानेवाले शिक्षित हो जाते हैं, शहर आते हैं तो वे स्वयं को त्रिपाठी लिखने लगते हैं। इस तरह की उपाधि लेखन में अक्षर-भेद भले ही हों पर यह ब्राह्मणों की आम उपाधि से पूरी तरह ओतप्रोत हैं। आपने संकल्प आदि में अवश्य सुना होगा अमुक शर्माअहम

   आत्मकथा के मूल कथ्य में वापस लौटते हैं। पंडित मुखराम शर्मा जी का परिवार सुख-शांति से चल रहा था। वक्त का पहिया तेजी से चलता जा रहा था। मंगलप्रसाद, उनकी बहन रानी   और छोटा भाई बचपन से किशोरावस्था और फिर युवावस्था में पहुंच गये। पड्त मुखराम शर्मा ने अपने जीते-जी अपनी बेटी के हाथ पीले करने का सपना देखा था। उसके लिए उन्होंने योग्य जीवनसाथी की तलाश भी शुरू कर दी। उनकी तलाश जनपद बांदा के करीब के गांव बिलबई में पूरी हुई। वहां के मुखिया शिवदर्शन त्रिपाठी को उन्होंने बेटी रानी के लिए उपयुक्त समझा। बिना किसी देरी किये उन्होंने रिश्ता भी पक्का कर दिया।

  उधर मुखराम शर्मा जी के छोटे बेटे ने संस्कृत पढ़ने की इच्छा जतायी। आसपास कहीं संस्कृत विद्यालय नहीं था। पता किया गया कि श्रेष्ठ संस्कृत विद्यालय कहां है तो पता चला कि चित्रकूट में परिक्रमा पथ पर प्रसिद्ध पीलीकोठी संस्कृत विद्यालय है। छोटे बेटे की इच्छा पूरी करने के लिए अनिच्छा से ही सही उनको चित्रकूट के पीलीकोठी संस्कृत विद्यालय में प्रवेश दिलवा दिया। अनिच्छा से इसलिए कि वे उतनी दूर अपने बेटे को अकेले नहीं भेजना चाहते थे।

    इधर मुखराम जी के बड़े बेटे मंगल प्रसाद उनके साथ कृषि कार्य संभालने में मदद करते रहे। मुखराम शर्मा जी को एक ही चिंता थी कि बेटी का रिश्ता तो कर दिया अब उसके विवाह की भी तो तैयारी करनी होगी। जितना कुछ हो सका वे जुटा भी चुके और सोच रहे थे कि जितना जल्द हो कोई शुभ मुहूर्त देख कर बेटी का विवाह कर देंगे।

कहते हैं ना कि व्यक्ति के सोचे कुछ नहीं होता वही होता है जो भाग्य में लिखा होता है। मुखराम शर्मा जी अचानक बीमार हुए और वह बीमारी ही उनके जीवन का अंत बनी। मंगल प्रसाद तिवारी पर तो जैसे दुख का पहाड़ टूट पड़ा। सच कहते हैं कि भाग्य पर किसी का जोर नहीं चलता। जिन्हें स्वयं को ही एक अभिभावक की आवश्यकता थी उसे ही भाग्य ने अभिभावक हीन कर दिया। अब वह अपने से छोटे भाई और बहन के अभिभावक बन गये थे।छोटा भाई भी पिता के निधन का समाचार सुन चित्रकूट से भागा चला आया। पिता का श्राद्ध कार्य आदि संपन्न होने के बाद जब छोटा भाई चित्रकूट लौटने लगा तो मंगल प्रसाद ने उसे रोका।

 उन्होंने छोटे भाई से कहा-अब तो पिता जी भी नहीं रहे। परिवार का सारा भार मुझ पर आ गया अगर सही समझो तो रुक जाओ।

भाई ने कहा- भैया रुक जाता पर मेरी शिक्षा का क्या होगा। मुझे पढ़ लेने दीजिए ना।

 मंगल प्रसाद उसके बाद कुछ भी नहीं बोल सके। छोटे भाई को वे दुखी नहीं करना चाहते थे। वे चाहते थे कि उनको पढ़ने का सुअवसर नहीं मिला कम से कम भाई तो पढ़ ले।

 छोटा भाई चित्रकूट लौट गया। मंगल प्रसाद बिलबई गये और जिस परिवार में बहन का रिश्ता पक्का हुआ था उन्हें भी अपने पिता जी की मृत्यु की खबर सुनायी। इसके साथ ही यह भी अनुरोध किया कि जो संबंध पिता जी पक्का कर गये हैं वह यथावत रहेगा और एक वर्ष बाद विवाह संपन्न होगा। वर पक्ष ने भी इसके लिए हामी भर ली।

वक्त बीतते देर नहीं लगती। धीरे-धीरे साल बीता और मंगल प्रसाद ने अपनी बहन रानी का विवाह बिलबई गांव के मुखिया शिवदर्शन त्रिपाठी से कर दिया। विवाह में भाग लेने मंगल प्रसाद के छोटे भाई भी आये थे जो वापस चित्रकूट लौट गये।

इधर मंगल प्रसाद के जीजा शिवदर्शन त्रिपाठी ने जब यह देखा कि वह गांव में अकेले रह गये हैं तो उनसे अपने साथ कहने को कहा। यह समझाया कि कुछ दिन हमारे साथ रह कर फिर लौट आना। मंगल प्रसाद जीजा जी को बहुत मानते थे। वे उनकी बात नहीं टाल सके। जुगरेहली के घर में ताला जड़ कर वे भी जीजा जी के साथ बिलबई चले गये। (क्रमश:)

Thursday, September 16, 2021

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा


राजेश त्रिपाठी

बीमारी लील गयी आधा गांव
सोचता हूं कहां से शुरू करूं यह दास्तां। इस लंबे सिलसिले की शुरुआत का सिरा खोज नहीं पा रहा। मैंने ऊपर लिख भी दिया है कि कुछ याद रहा, कुल भूल गया। चलिए आपको सौ साल पीछे ले चलते हैं।कहानी का पहला सिरा गांव जुगरेहली से जुड़ता है। बांदा जिले के बबेरू प्रखंड का यह छोटा-सा गांव है इसका नाम जुगरेहली कैसे पड़ा किसी को पता नहीं। मैं अपने मन में यही विचार लिये हुए हूं कि शायद यह गांव बहुत पुराना होगा यानी युगों से होगा। युगों से जो है वही जुगरेहली। बबेरू प्रखंड से लगभग आठ किलोमीटर और जनपद बांदा से बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गांव में बहुतायत कुर्मी समाज की है यादव भी हैं। पहले कुर्मी अपने को कूर्म क्षत्री लिखते थे। अब उनमें से कुछ लोग पटेल लिखने लगे हैं। जिले में कुर्मियों के बारह गांव हैं। हम बचपन से सुनते आये हैं कि इन बारह गांवों के कुर्मी हमारे गांव को श्रेष्ठ मानते रहे और वहां अपनी बेटी ब्याहने  में गर्व महसूस करते थे।

Tuesday, September 14, 2021

मंदिर जहां चोरी करने से होती है मनोकामना पूरी


अगर आपसे कहा जाये कि अपने देश में एक ऐसा भी मंदिर है जहां मनोकमना पूरी करने के लिए भक्तों को वहां चोरी करनी पड़ती है तो आपको विश्वास नहीं होगा। आप उलटे प्रश्न कर सकते हैं कि चोरी वह भी पूजा की पवित्र जगह मंदिर में यह कैसी बात हुई, आप माने या ना मानें अपने देश में ऐसा एक मंदिर है जहां भक्तों को अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए चोरी करनी पड़ती है। इन्हीं में से एक अनोखा मंदिर है सिद्धपीठ चूड़ामणि देवी मंदिर। यह मंदिर उत्तराखंड के रुड़की से 19 किलोमीटर दूर भगवानपुर के चुडिय़ाला गांव में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 1805 में लंढौरा रियासत के राजा ने करवाया था। एक बार राजा शिकार करने जंगल में आए हुए थे कि घूमते-घूमते उन्हें माता की पिंडी के दर्शन हुए। राजा के कोई पुत्र नहीं था। इसलिए राजा ने उसी समय माता से पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी। राजा की इच्छा पूरी होने पर उन्होंने यहां मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर को 51वीं  शक्तिपीठ माना जाता है। कहते हैं यहां माता पार्वती की चूड़ामणि गिरी थी। यह कथा माता सती के पिता दक्ष के यज्ञ से जुड़ी है। जब दक्ष ने अपने यहां यज्ञ का आयोजन किया तो सारे देवताओं को आमंत्रित करने के साथ ही अपने सारे मित्रों, संबंधियों को भी बुलाया। लेकिन उन्होंने अपनी पुत्री सती और जामाता शंकर को आमंत्रित नहीं किया। सती को जब इसका पता चला कि उनके पिता यज्ञ कर रहे हैं तो उन्होंने शंकर जी से कहा कि वे भी पिता के यज्ञ में जाना चाहती हैं। इस पर शंकर जी समझाया कि सती तुम्हारे पिता ने मुझे आमंत्रित नहीं किया क्ओंकि वे मुजसे क्रुद्ध हैं लेकिन उन्होंने तुम्हें भी आमंत्रित नहीं किया। बिना आमंत्रण के ऐसे आयोजनों में जाना सर्वदा अपमान या अनर्थ का कारण बनता है। लाख समझाने पर भी जब सती नहीं मानी तो शंकर जी ने उन्हें अनुमति दे दी लेकिन अपने गणों को भी उनके साथ कर दिया। सती जब पिता के घर पहुंचीं तो वहां कोई भी उनसे अच्छी तरह से नहीं मिली सिर्फ माता को छोड़ कर। बहनें मिलीं भी तो व्यंग्य से मुसकराती हुईं जैसे मन ही मन कह रही हों लो आ गयी बिना बुलायी मेहमान। सती ने यज्ञ मंडप में जाकर देखा हर देवता के लिए आसन और उनका भाग दिया गया था पर सती के पति शंकर को उनका भाग नहीं दिया गया था। सती ने अपने पति का इस तरह अपमान करने का कारण पिता दक्ष से पूचा तो उन्होंने उन्हें भी अपमानजनक शब्द कहे। इससे क्रोधित होकर सती ने यज्ञ कुंड में ही कूद कर आत्मदाह कर लिया। उनके साथ गये शिव गणों ने वापस आकर सारी घटना शिव जी को बतायी। इस पर शिवजी बहुत क्रुद्ध हुए और वहां गये जहां दक्ष ने यज्ञ किया था। उन्होंने यज्ञ कुंड से सती का अधजला शव उठाया और गणों को यज्ञ विध्वंस करने और सबको यथोचित दंड देने का आदेश देकर कंधे पर सती का शव लाद कर चारों ओर क्रोध से नाचने लगे। उनके क्रोध से ब्रह्मांड कांप उठा।जब विष्णु ने यह देखा तो उन्होंने सोचा अगर इन्हें रोका ना गया तो ब्रह्मांड संकट में प़ड़ जायेगा। उन्होंने अपना चक्र चला दिया जिससे सती के एक-एक अंग कट कर गिरने लगे। ये अंग जहां-जहां गिरे वे स्थान शक्तिपीठ कहलाते हैं। जिस मंदिर का हम यहां जिक्र कर रहे हैं वहां सती की चूड़ामणि गिरी थी इसीलिए इसका नाम चूड़ामणि पड़ा। लोग इसे 51 वां शक्तिपीठ भी कहते हैं।

जहां से जुड़ी मान्यता है कि यहां चोरी करने पर हर व्यक्ति की मनोकामना पूरी होती है। रुड़की के चुड़ियाला गांव स्थित प्राचीन सिद्धपीठ चूड़ामणि देवी मंदिर में पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले पति-पत्नी माथा टेकने आते हैं।
मान्यता है कि जिन्हें पुत्र की चाह होती है वह जोड़ा यदि मंदिर में आकर माता के चरणों से लोकड़ा  अर्थात लकड़ी का गुड्डा चोरी करके अपने साथ ले जाएं तो बेटा होता है। उसके बाद बेटे के साथ माता-पिता को यहां माथा टेकने आना होता है। कहा जाता है कि पुत्र होने पर भंडारा कराने के साथ ही दंपति को पहले मंदिर से ले जाए गए लोकड़े के साथ ही एक अन्य लोकड़ा भी अपने पुत्र के हाथों से चढ़ावाना पड़ता है। सती माता का चूड़ा रुडकी के इस घनघोर जंगल में गिर गया था, जिसके बाद यहां पर माता की पिंडी स्थापित किये जाने के साथ ही भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। यह प्राचीन सिद्ध पीठ मंदिर बाद में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया। यहां माता के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु दूरदराज से आते हैं।

माता के मंदिर में माता के चरणों में हमेशा एक लोकड़ा रहता है और इसी लोकड़ा को चुरा कर दंपति ले जाते हैं। इसे चोरी करने के बाद ही उन्हें पुत्र रत्न का वरदान माता देती हैं और जब पुत्र हो जाता है तो दंपति पुत्र के साथ वह लोकड़ा लेकर आते हैं और इसके साथ एक और नया लोकड़ा ले आते हैं। इसे माता के चरणों में वापस रख दिया जाता है। उसके बाद दंपति माता के आर्शीवाद से पाए पुत्र के हाथों भंडारा करवाते हैं।

लोकड़ा एक प्रकार का लकड़ी का खिलौना होता है जिसे पुत्र का प्रतीक माना जाता है। माता चूड़ामणि के चरणों में ये लोकड़ा रखा रहता है। जिस दंपति को पुत्र चाहिए होता है वह इसे चुरा कर ले जाते हैं और पुत्र होने के के बाद अषाढ़ माह में अपने पुत्र के साथ मां के मंदिर आते हैं और यहां फिर मां की पूजा अर्चना के बाद एक और लोकड़ा चढ़ाते हैं।

Friday, September 10, 2021

गणेश चतुर्थी को चंद्रदर्शन से क्यों लगता है कलंक?



आपने यह तो अवश्य सुना होगा कि गणेश चतुर्थी अर्थात भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चंद्र दर्शन से कलंक लगता है लेकिन शायद हर किसी को इससे जुड़ी घटना के बारे में पता नहीं होगा। यह तो सभी को पता है कि गणेश जी को मोदक अर्थात लड्डू और मिठाई बहुत पसंद है। अपनी इसी रुचि के चलते किसी के भी निमंत्रण को स्वीकार कर लेते हैं और पेट भर मिठाई खाते हैं।

एक बार की बात है धन के देवता कुबेर ने भगवान शिव और माता पार्वती को भोज पर बुलाया, लेकिन भगवान शिव ने कहा कि मैं कैलाश छोड़कर कहीं नहीं जाता हूं और पार्वती जी ने कहा कि मैं अपने स्वामी को छोड़ कर कहीं नहीं जा सकती। दोनों ने कहा कि आप हमारे स्थान पर गणेश को ले जाओ।

तब कुबेर गणेश जी को अपने साथ भोज पर ले गए। वहां उन्होंने पेट और मन भर कर मिठाई और मोदक खाये। वापस आते समय कुबेर ने उन्हें मिठाई का थाल देकर विदा किया। लौटने समय चन्द्रमा की चांदनी में गणेश जी अपने चूहे पर बैठ कर आ रहे थे, लेकिन ज्यादा खा लेने के कारण बड़ी ही मुश्किल से अपने आप को संभाल पा रहे ।उसी समय अचानक चूहे का पैर किसी पत्थर से लग कर डगमगाने लगा। इससे गणेश जी चूहे के ऊपर से गिर गए और पेट ज्यादा भरा होने के कारण अपने आप को संभाल नहीं सके और मिठाइयां भी यहां-वहां गिर गईं।

यह सब चन्द्र देव ऊपर से देख रहे थे। उन्होंने जैसे ही गणेश जी को गिरते देखा, तो अपनी हंसी रोक नहीं पाए और उनका मजाक उड़ाते हुए बोले कि जब खुद को संभाल नहीं सकते, तो इतना खाते क्यों हो।चन्द्रमा की बात सुन कर गणेश जी को गुस्सा आ गया। उन्होंने सोचा कि घमंड में चूर होकर चन्द्रमा मुझे उठाने के लिए किसी प्रकार की सहायता नहीं कर रहा है और ऊपर से मेरा मजाक उड़ा रहा है। इसलिए, गणेश जी ने चन्द्रमा को श्राप दिया कि जो भी गणेश चतुर्थी के दिन तुमको देखेगा उस पर कलंक लगेगा, वह लोगों के बीच चोर कहलाएगा।

श्राप की बात सुन कर चन्द्रमा घबरा गए और सोचने लगे कि फिर तो मुझे कोई भी नहीं देखेगा। उन्होंने शीघ्र ही गणेश जी से क्षमा मांगी। कुछ देर बाद जब गणेश जी का गुस्सा शांत हुआ, तब उन्होंने कहा कि मैं श्राप तो वापस नहीं ले सकता। लेकिन तुमको एक वरदान देता हूं कि अगर वही व्यक्ति अगली गणेश चतुर्थी को तुमको देखेगा, तो उसके ऊपर से चोर होने का श्राप उतर जाएगा। तब जाकर चन्द्रमा की जान में जान आई।

इसके अलावा एक और कहानी सुनने में आती है कि गणेश जी ने चन्द्रमा को उनका मजाक उड़ाने पर श्राप दिया था कि वह आज के बाद किसी को दिखाई नहीं देंगे। चन्द्रमा के मांफी मांगने पर उन्होंने कहा कि मैं श्राप वापस तो नहीं ले सकता, लेकिन एक वरदान देता हूं कि तुम माह में एक दिन किसी को भी दिखाई नहीं दोगे और माह में एक दिन पूर्ण रूप से आसमान पर दिखाई दोगे। बस तभी से चन्द्रमा पूर्णिमा के दिन पूरे दिखाई देते हैं और अमावस के दिन नजर नहीं आते।

कहते हैं कि यही गणेश चतुर्थी का चांद भगवान श्री कृष्ण ने देख लिया था उन पर भी समयन्तक मणि चुराने का आरोप लगा था । इस बारे में यह कथा है कि गणेश चतुर्थी के दिन भगवान श्री कृष्ण ने अनजाने में चंद्रमा को देख लिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि इन पर एक व्यक्ति की हत्या का आरोप लगा। भगवान श्री कृष्ण को इस आरोप से मुक्ति पाने के लिए काफी  मुश्किलों का सामना करना पड़ा था।नारद जी से जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने ऊपर लगे झूठे आरोपों का कारण पूछा तब नारद जी ने श्री कृष्ण भगवान से कहा कि यह आरोप भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन चांद को देखने के कारण लगा है। इस चतुर्थी के दिन चांद को देखने से कलंक लगने की वजह नारद जी ने यह बताई की, इस दिन गणेश जी ने चन्द्रमा को शाप दिया था। इस संदर्भ में ऐसी भी कथा है कि चन्द्रमा को अपने रूप का बहुत अभिमान था। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी के गजमुख एवं लबोदर रूप को देख कर चन्द्रमा ने हंस दिया। गणेश जी इससे नाराज हो गये और चन्द्रमा को शाप दिया कि आज से जो भी तुम्हें भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को देखेगा उसे झूठा कलंक लगेगा।गणेश जी के शाप से चन्द्रमा दुखी हो गये और घर में छुप कर बैठ गये। चन्द्रमा की दुःखद स्थिति को देख कर देवताओं ने चन्द्रमा को सलाह दी कि मोदक एवं पकवानों से गणेश जी की पूजा करो। गणेश जी के प्रसन्न होने से शाप से मुक्ति मिलेगी। तब चन्द्रमा ने गणेश जी की पूजाकी और उन्हें प्रसन्न किया। गणेश जी ने कहा कि शाप पूरी तरह समाप्त नहीं होगा ताकि अपनी गलती चन्द्रमा को याद रहे। दुनिया को भी यह ज्ञान मिले की किसी के रूप रंग को देखकर हंसी नहीं उड़ानी चाहिए। इसलिए अब से केवल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन जो भी चन्द्रमा को देखेगा उसे झूठा कलंक लगेगा।

 यदि अनिच्छा से चंद्र-दर्शन हो जाये तो व्यक्ति को भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए ‘ॐ गं गणपतये नम:’ मंत्र का जप करने और गुड़ मिश्रित जल से गणेशजी को स्नान कराने एवं दूर्वा व सिंदूर प्रदान करने से कलंक और विघ्न का निवारण होता है।

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