Thursday, June 28, 2018

रुक्म जी की व्यंग्य कविताएं भाग-5

भाग-5

तब क्यों होता फर्क

कितने जन भोजन बिना तड़प-तड़प मर जांय।
सरकारी  गोदाम  में  अन्न पड़ा सड़ जाय ।।
सब जन प्रभु की देन हैं, तब क्यों होता फर्क।
कुछ  तो सिंहासन चढ़े, कुछ का बेड़ा गर्क ।।

कलियुग में  सब  जनों  पर नहीं करें विश्वास।
मधुर मधुर बतियाय कुछ सज्जन को ले फांस।।
सदा  खुशी  रहता  वही  जिसमें  हो  संतोष ।
जिसे अधिक की लालसा, देय भाग्य को दोष।।

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श्रद्धांजलि

याद किया जाता वीरों को जिस दिन वे शहीद होते हैं।
मालाएं  पहना  कर  नेता, घड़ियाली आंसू रोते हैं ।।
लंबे  चौड़े  भाषण होते, जम कर होती खूब प्रशंसा ।
अखबारों में नाम छपेगा, असल यही होती है मंशा ।।

शेष तीन सौ चौसठ दिन तक, मूर्ति गंदगी से भर जाती।
पक्षी बैठ बीट करते हैं, नहीं किसी को सुधि तब आती ।।
ऐसा  करने से अच्छा है, करें  मूर्ति  की  सदा सफाई ।
यही श्रेष्ठ श्रद्धांजलि होगी, नेताओं को यदि यह भाई।।

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माया वाला रोग

अपना सब कुछ भूल कर, चलें गैर की चाल।
आज विदेशी लगें वे, अद्भुत उनकी चाल ।।
धनकुबेर तो बन गये, किंतु और की चाह ।
इसीलिए वे आजकल, चलें गलत सब राह।।

जो बन जाता है कभी धन दौलत का दास।
मानवता उससे डरे, कभी न आती पास ।।
नहीं संग कुछ जात है, जानत हैं सब लोग।
किंतु  न पीछा छोड़ता, माया वाला रोग ।।

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साहस हारे कवि से

कविता लिखना बहुत कठिन है, कवि बनना आसान नहीं है।
पंत, निराला, बच्चन  जैसे,  कवियों की अब शान नहीं है।।
बात  नहीं जंचती हमको यह, दिल छोटा क्यों करते प्यारे ।
ऐसा  लिखो  जमाना  चौंके, श्रोता  अर्थ  लगा कर हारे ।।

रबड़  छंद  के  चलते  अब  तो , सारे  टूट  गये  हैं  बंधन।
जहां आग का तुक लिखना हो, साहस कर लिख मारो चंदन।।
पांडे,  बच्चन  ने  लिख  डाली, हल्दीघाटी  मधुशाला
साहस  कर  के तुम  लिख  मारो, चूनाघाटी खटमलशाला।।

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चाह नहीं है

चाह नहीं संपादक बन कर, जो  मन  आये छपवाऊं।
चाह नहीं  आफीसर बन  कर, मनचाही रिश्वत पाऊं।।
चाह  नहीं  घुसखोरी करके, महल  दोमहले बनवाऊं।।
चाह नहीं लीडर बन कर के, जनता को नित भरमाऊं।।

चाह नहीं तस्कर बन कर के, धन कुबेर मैं कहलाऊं।
चाह नहीं दल बदल करॉं फिर, ऊंचा पद पा इतराऊं।।
चाह यही है हे वनमाली, भ्रष्ट जनों से मुझे बचाना।
ऐसों के दर्शन पाकर के , नहीं नर्क हमको है जाना।।

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नारी तुम हो केवल श्रद्धा

नारी तुम अतशिय उदार हो, है महान व्यक्तित्व तुम्हारा।
तुमने  अर्पण ही सीखा है, स्वीकारो  तुम नमन हमारा ।।
एक  और व्यक्तित्व तुम्हारा,आज विश्व भर में है छाया।
विज्ञापन  की तुम हो शोभा, अजब तुम्हारी देखी माया।।

साबुन,  शैंपू,  तेल,   तौलिया,  देखे   तरह-तरह  विज्ञापन।
शर्टिंग, सूटिंग, काजल, सुरमा, मरहम, क्रीम, दांत का मंजन।।
नारी  तुम  केवल  विज्ञापन  समझ रहे,  जो  करते धंधा ।
किंतु तुम्हें  हम  सदा मानते, नारी तुम हो केवल  श्रद्धा ।।

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शुद्धिकरण

राजनीति में शुद्धिकरण की, लोग सदा करते हैं चर्चा।
भीषण भाषण में नेतागण, शब्द बहुत करते हैं खर्चा।।
नहीं पालते बाहुबली हम, दागी नहीं एक भी रहता।
ताज्जुब खुद अपराधी होता, सो ऐसा ही दावा करता।।

कितने ऐसे  होते  मंत्री, जिनकी  छवि  हो भ्रष्टाचारी।
मालाओं से  लादे  जाते, खूनी,  अपहर्ता,  व्यभिचारी।।
केवल भाषण में सुनते हैं, शुद्धिकरण की अगणित बातें।
जिनके श्रीमुख से यह सुनते वही कर रहे छिप कर घातें।।

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नहीं तरक्की पाय

रुक्मजगत में आय कर, कर लीजै यह काम।
बिना परिश्रम धन जुटे, कष्ट ना पावे चाम ।।
ऐसी  बानी  बोलिए,  अपना   आपा   खोय।
जिसमें दहशत हो भरी, घूस ना  मागे  कोय।।

ज्यों-ज्यों कलियुग बढ़ रहा, नारि उघरती जाय।
त्याग, लाज, संकोच सब  अंग- अंग दर्शाय ।।
ठकुरसुहाती  नहीं कहें, खरी  बात  बक जांय।
बात  बिगाड़े  आपनी,  नहीं  तरक्की  पाय ।।

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फर्ज

इच्छा है या अनंत सागर, जिसका मिलता है छोर नहीं।
मैं तो रानी अब ऊब गया,पर तुम होती हो बोर नहीं।।
फरमाइश फर्ज न बीबी का, यह फर्ज महज महबूबा का।
तुम जब फरमाइश करती हो, करती हो काम अजूबा का।।
पहले  देखो  सोचो, समझो,  कितनी  भूलें कर डाली हैं।
यह घर या ट्रेन की बोगी है, कोई भी जगह न खाली है।।
दिन रात  मचे धक्कम धुक्का, गाली-गलौज मारा पीटी ।
कोई  तो  दांत  निपोर  रहा,  कोई  मारे  लंबी सीटी।।

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आज हमें चाणक्य चाहिए

जन प्रतिनिधि कहलाने वाले अगर सुरक्षा ले चलते हैं।
इसका  अर्थ  यही होता है, जनता से डरते रहते हैं ।।
छोटे  नेताओं  को देखा,  वे  भी चाह  रहे हैं पहरा ।
वह सब देख और सुन कर, हमको लगता सदमा गहरा।।
नेता वह जो  पूजा  जाये, सबकी हो आंखों का तारा ।
नहीं किसी का उसको डर हो,जन-जन का हो राजदुलारा।।
हमें आज चाणक्य  सरीखा, अगर कहीं नेता मिल जाये।
इसमें नहीं जरा भी शक है, अपना देश स्वर्ग बन जाये।।

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कैसे कहें जवान?

कहां गयी अपने तरुणों की, केहरि-सी वह चाल।
इस्पाती वक्षस्थल दिखता, ज्यों राणा की ढाल।।
पदघात  करते  धरती से, बह उठता था नीर ।
अब इतिहासों के पृष्ठों पर मिलते हैं वे वीर ।।
झुका नयन  ऐसे चलते हैं, जैसे चलता दूल्हा।
लज्जा से मुस्काती तरुणी,देख लचकता कूल्हा।।
तरुणायी में कटि झुक जाती, कैसे कहें जवान।
इनसे तो बहु वृद्ध महाशय, दिखते हैं बलवान।।

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बदल न जाये सेक्स

ब्लाउज  सी  बुशर्ट  पहनते,  लड़के  केश बढ़ाते।
रह-रह अलक झटकते चलते,कमर नयन मटकाय।।
कोई  ऐसा  वेश  बनाता,  पतले स्वर में गाता ।
लड़का है या लड़की भैया, भेद समझ ना आता।।
रूप बदलने  की  लगी होड़, बढ़ी आज बीमारी ।
भय है कहीं दिखाई ना दे, लड़कों के तन सारी।।
फैशन की इस प्रदर्शनी पर,अगर  लगी ना रोक।
भय है सेक्स बदल ना जाये,चलेगी यह बेटोक।।

















Sunday, June 3, 2018

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी भाग-29

हमसे छिन गया अभिभावक का साया

   राजेश त्रिपाठी

   पहले तो आप सबसे इस जीवनगाथा को एक साल से अधिक समय तक न लिख    पाने के लिए क्षमा मांग लूं। इसकी निरंतरता में आये व्यवधान के कई कारण थे। पहले तो शारीरिक अस्वस्थता व अन्य परेशानियां दूसरी बात ये कि जाने क्यों इस कथा को अंत की ओर ले जाते वक्त दिल भारी हो रहा है। हिम्मत नहीं कर पा रहा कि लिखूं कि जिसकी छत्रछाया में बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ पाया उसका साया सिर से उठ गया। फिर सोचा मेरे ना लिखने से सच तो झूठ नहीं हो जायेगा और फिर इस कथा को शुरू किया तो समाप्त तो करना ही होगा।
   जैसा पहले की किस्त में बता आये हैं कि भाभी निरुपमा त्रिपाठी के जाने के बाद भैया रुक्म जी ऐसे हो गये थे जैसे वे जी ना रहे हों जिंदगी को ढो रहे हों। उनके चेहरे पर हमेशा विषाद की छाया देख कर हमें बहुत डर लगने लगा था। हमारी भी समझ में आ गया था कि शायद हम उन्हें बचा नहीं पायेंगे लेकिन फिर भी यह आस लगाये हुए थे कि शायद कोई चमत्कार हो जाये। उनमें फिर जीने की ललक जग जाये। वे असह कष्ट भोग रहे होते पर जब तक बरदाश्त होता, हममें से किसी को परेशान नहीं करते थे।  कभी-कभी तो ऐसा भान करते जैसे वे ठीक हो रहे हैं।
     उनका कष्ट अक्सर रात को बढ़ जाता था। घर में आक्सीजन सिलिंडर और नेबलाइजर रख ही लिया गया था। रोज रात अढ़ाई-तीन बजे वे चिल्लाते और मैं दौड़ कर उनके नाक में आक्सीजन मास्क लगा कर उनकी पीठ और छाती सहलाने लगता ताकि उनको राहत मिले। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। मुहल्ले के ही डाक्टर उन्हें देख रहे थे, उन्होंने साफ कह दिया था कि ये अब ठीक होने वाले नहीं बस इसी तरह जितने दिन खींच सकेंगे खींच ले जायेंगे। ये किसी भी क्षण आप लोगों का साथ छोड़ सकते हैं।

     यहां बड़े कष्ट के साथ यह लिखने को बाध्य हो रहा हूं कि भैया रुक्म ने जिन लोगों की मदद की, उन्हें लिखने का हौसला दिया वे उन्हें देखने तक नहीं आये।  जो कभी उनके गुण गाते नहीं अघाते थे उनके पास शायद इतना भी समय नहीं था कि वे उस शख्स को देखने आ सकें जिनका कभी ना कभी उनकी जिंदगी में योगदान रहा था। शायद उन्हें यह भय सताता रहा हो कि कहीं उनसे कोई आर्थिक मदद ना मांगने लगे। यहां यह भी बताता चलूं प्रभु की कृपा से हम इतने सक्षम थे कि भैया का उपचार अपने बलबूते करा सकें, हमने किसी के सामने हाथ नहीं पसारे। हां कोई उनकी खोज-खबर लेने आता तो यह एहसास दे जाता कि हमारा परिवार बड़ा है। खैर जो लोग फोन के माध्यम से ही सही उनकी खबर लेते रहे हम उनके दिल से आभारी हैं। किसी के देखने आने से किसी की बीमारी कम नहीं हो जाती उसे सुकून मिलता है कि उसकी चिंता करने वाले कई लोग हैं। यह भी कि जिनके कुछ बनने में उसका किंचित मात्र भी योगदान रहा हो वे उन्हें भूले नहीं। खैर आप किसी के मानस या उसके  सोच को बदल नहीं सकते। कुछ लोग होते हैं जो मतलब निकलते ही किनारा कर लेते हैं और कुछ ऐसे जो किसी का रंचमात्र उपकार भी आजीवन नहीं भूलते। हमें इसका कोई गिला नहीं कि भैया के बारे में कौन चिंतित था कौन नहीं हम चिंतित थे तो उनके दिन ब दिन गिरते स्वास्थ्य से। डाक्टर ने तो कह ही दिया था कि वे कभी भी हमारा साथ छोड़ सकते हैं।

     वह 2 नवंबर 2014 का दिन था। मैं दोपहर जब सन्मार्ग कार्यालय के लिए निकलने वाला था उस वक्त भैया रुक्म की तबीयत काफी ठीक थी। उन्होंने खुद रेजर से दाढ़ी बनायी और मुझे सन्मार्ग के उनके नियमित स्तंभ चकल्लस के लिए लिखी कविता थमा दी। मैंने घर से निकलने के पहले पूछ लिया-भैया ठीक हैं ना?’ वे बोले-हां मैं ठीक हूं। मेरे जीवन में भैया के यही शब्द ही आखिरी बन जायेंगे यह मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। जिसने जन्म लिया है उसका अंत निर्धारित है फिर भी हम अपनों के बारे में यह सोच ही नहीं पाते।
  मैं सन्मार्ग के अपने कार्यालय में काम कर रहा था कि अचानक शाम साढ़े चार बजे बड़े बेटे अनुराग त्रिपाठी का फोन आया-पापा, जो भी कर रहे हों छोड़ कर तुरत घर आइए। उसका स्वर भारी था और तुरत घर आइए शब्द सुन कर मेरे दिल की धड़कन बढ़ गयी। सच कहूं मेरी आंखें भर आयीं मैंने अपने संपादक हरिराम पांडेय जी से कहा –भाई साहब मुझे तुरत घर जाना होगा, बेटे का फोन था लगता है भैया की तबीयत ज्यादा खराब हो गयी। उन्होंने मुझे छुट्टी दे दी।
रुक्म जी, कथा-पटकथा संवाद लेखक पंडित मुखराम शर्मा और निर्माता-निर्देशक बी.आर. चोपड़ा

   मैं आफिस से निकला, दुख और आशंका से मेरे पैर जैसे मन भर भारी हो गये थे। मुझसे चला नहीं जा रहा था। पूरा शरीर कांप रहा था, दिल धड़क रहा था। किसी तरह ऑटो पकड़ कर घर आया। देखा मेरे बड़े भैया रुक्म का निस्पंद, निर्जीव शरीर मेरे सामने था। मैं उस व्यक्तित्व को अपने सामने इस रूप में देख कर बिलख पड़ा जिसने एक तरह से हाथ पकड़ कर मुझे लिखना सिखाया। मैं जो भी थोड़ा कुछ लिख पाता हूं वह उन्हीं का श्रेय है। वह बड़े भैया जो जब तक मैं घर ना पहुंच जाऊं खाना नहीं खाते थे। मुझे अगर कार्यालय से लौटने में अस्वाभाविक देरी होने लगे तो बेचैन हो जाते थे। वापस पहुंचता तो उलाहने के स्वर में कहते –‘यार देरी होने लगे तो फोन तो कर दिया करो, जब तक पहुंचते नहीं जान सांसत में रहती है। मेरी इतनी चिंता करने वाले भैया चले गये, मेरे गुरु चले गये, मेरे अभिभावक चले गये, मैं अकेला पड़ गया। अब किससे कविता की मात्राएं ठीक कराऊंगा।
 हमारे घर में एक अजीब-सा सूनापन और उदासी छा गयी थी। कालोनी के सारे लोग जुट आये, भैया को सभी मानते और श्रद्धा करते थे। सबकी आंखों में आंसू थे, उनके त्रिपाठी जी, चले गये। मेरे बच्चे भैया को ताऊजी की जगह अउआजी कहते थे और भैया पूरी कालोनी के बच्चों के अउआजी हो गये थे। जिसने भी उनके निधन की खबर सुनी वही दुखी हो गये। उनके बांदा में बालसखा रहे कन्हैयालाल गुप्त निरंकार को जब मैंने फोन पर यह दुखद समाचार दिया तो वे बहुत दुखी हुए। वे बचपन की उन यादों खो गये जब बांदा में वे और रुक्म जी साथ-साथ खेला और पढ़ा करते थे।
   फिल्म अभिनेता अंजन श्रीवास्तव को भी जब यह खबर दी तो उन्होंने भी बहुत दुख जताया और यह कहना भी नहीं भूले कि उनकी प्रेरणा से ही वे मुंबई गये और फिल्मी दुनिया में अपना एक खास मुकाम बनाया।
  उनके निधन का समाचार पाकर प्रसिद्ध पत्रकार,संपादक, लेखक गीतेश शर्मा भी बहुत दुखी हुए। वे हमेशा भैया को गुरु जी कह कर ही संबोधित करते रहे। वे भैया के श्राद्ध के दिन आये और उन्हें याद कर रोने लगे।
  उनके लिए एक और जिस इनसान को फूट-फूट कर रोते देखा वे प्रसिद्ध चित्रकार और इंडियन आर्ट कालेज के पूर्व प्रिंसिपल होरीलाल साहू जी थे। वे भाभी के निधन के वक्त भी आये थे, दिल के मरीज हैं फिर भी उस वक्त भी बिलख-बिलख कर रोये थे। भैया रुक्म जी से उनका परिचय बहुत पुराना था। जब वे बंबई में थे और प्रसिद्ध चित्रकार रामकुमार शर्मा के सहायक के रूप में फिल्मों के कला निर्देशन में सहयोग किया करते थे उस वक्त वहां रुक्म जी से उनकी भेंट हुई थी। उसके बाद होरीलाल जी कलकत्ता आकर बस गये। उसके बाद रुक्म जी से उनका निरंतर मिलना-जुलना होता रहा और मित्रता प्रगाढ़ता में बदल गयी और फिर दोनों के परिवारों में भी प्रगाढ़ता हो गयी जो अरसे तक बरकरार रही। रुक्म जी ने सन्मार्ग के पूजा-दीपावली विशेषांक का संपादन कई वर्षों तक किया। एक साल उस पूरे अंक का चित्रांकन होरीलाल जी ने किया था। उस वर्ष उनके चित्रांकन की काफी प्रशंसा हुई।
भैया रुक्म जी चले गये, हम सबके जीवन में एक कभी ना पूरा होनेवाला शून्य छोड़ कर। उनके निधन के बाद हमारे घर का वह कोना उदास और सूना हो गया जहां बैठ कर उन्होंने अनेक उपन्यास, दर्जनों कहानियां, गीत और हजारों व्यंग्य कविताएं, नाटक व अन्य रचनाओं का सृजन किया।  (शेष अगले अंक में)


श्रद्धांजलि
 
ब्लागर राजेश त्रिपाठी बड़े भैया रुक्म जी के साथ 


हर कदम अब साथ आपके आशीष हैं
जग के बंधन तोड़ करअलविदा आप यों कह गये।

अब दुख  के  तूफानों  में,  हम  अकेले रह गये।।

सर पे साया आपका था, आशीष का शुभ हाथ था ।

आपके रहते हमें कुछ न होगा, ये अटल विश्वास था।।

वटवृक्ष थे आप जिसके सहारे, हम तृण सदृश पलते रहे।

राह सच्ची दिखाई आपने, हम बांह थामे सदा चलते रहे।।

जो भी सीखा आपसे, जो भी जाना  वह  भी  आप  से।

आपके बाद अब, लड़ना है अकेले जग के हर संताप से।।

आपने हमको  सिखाया,  आदमी   गर  कर ले  हौसला।

उसको हिला सकता नहीं, तब दुनिया का कोई जलजला।।

आपका  हर  शब्द ही  हम सबके  लिए जीवन-मंत्र था।

आपसे बेधड़क हर बात करने को, परिवार भी स्वतंत्र था।

आपसे सर्वदा हमको मिलता रहा,  जो  असीम प्यार है।

अब तो बस  जिंदगी जीने का, इक  वही  आधार  है।।

आपकी  हर  सांस  में,  बस  इक  यही  परिवार  था।

नेक अभिभावक के जैसा,  हर  एक  से  व्यवहार  था।।

आपके  जाने  से न  जानें,   कितनी   आंखें  नम  हुईं।

हमसे पूछे आके आपके जाने का क्या  है  गम  कोई।।

इक शाम सहसा जिंदगी में,  गहरा  अंधेरा  छा  गया।

जिंदगी में आपकी यादों का, बस केवल  सहारा रह गया।।

आपको  अश्रुपूरित  नयन  से हम सादर नवाते शीश हैं।

जिंदगी के हर कदम पर, साथ केवल आपके आशीष हैं।।




 

Friday, June 1, 2018

रुक्म जी की व्यंग्य कविताएं भाग-4


भाग-4
मानव – कृत्य

सृष्टि-विनाशक ताप अब बढ़ता जाता नित्य।
नहीं प्रकृति की देन यह, मानव का है कृत्य।।
मानव  का  है  कृत्य  प्रदूषण  जो फैलाता।
पिघल रहे  हिमखंड,  प्रलय वह स्वयं बुलाता।
कहें रुक्म कविराय जलधि की वक्र देखते दृष्टि।
जलप्लावन से जलमग्न करके नष्ट करेगा सृष्टि।।
भ्रूण हत्या

कन्या भ्रूण विनष्ट कर,बनते हैं जो शूर।
दुनिया में उनसे बड़े , और नहीं हैं क्रूर।।
और  नहीं  हैं क्रूर, वक्त ऐसा आयेगा।
वधू बिना ही पुत्र, कुंआरा रह जायेगा ।।
कहें रुक्म कविराय,बचेगी जो भी धन्या।
वह मुंहमांगा ही दहेज, मांगेगी कन्या ।।

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सीख

बॉस  नहीं  हूं  चपरासी, मेरी  बात अगर तुम मानो।
सच कहता हूं, मजा करोगे, सदा नौकरी पक्की जानो।।

क्या कहते हो, पढ़े लिखे हो,इससे क्या होता है भैया ।
डिगरी शहद लगा कर चाटो, यहां न उसका बाबा, मैया।।

जनरल नालिज में माहिर हो, हृष्ट पुष्ट हो, फुर्तीले हो।
साहब यह सब सुन लेंगे तो, कह देंगे ,बुद्धू, ढीले हो।।

देखो, यहां  वही  जम पाता, जो मेरे कहने पर चलता।
जिसने मेरी बात न मानी, चला गया वह आंखें मलता।।
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क्या मिला?

अब नहीं हमको गिला, उनसे रहा,
आदतों से वे बहुत मजबूर हैं।
दिल लगाना दिल्लगी उनके लिए,
हुस्न के गैरत से चकनाचूर हैं।।

जो किये वादे सभी बेकार थे,
यही आदत लीडरों को पड़ गयी।
लग रहा अनजान में या भूल से,
नजर दोनों की कहीं पर लड़ गयी।।

एक से नखरे करें, वादे गजब,
क्या मिला दोनों से हमको सोचिए।
फायदा उनको हुआ, हमको नहीं,
क्या कमी हममें है, किब्लां खोजिए।।

इश्क से अब तक हुआ किसका भला,
लीडरों से क्या मिला सुख-चैन है।
वक्त दोनों कर रहे बरबाद हैं, कुछ सोचिए,
बड़ी मुश्किल से कटे दिन-रैन हैं।।
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गुरु-शिष्य

याद आ रहा हमें जमाना,जब हम छात्र हुआ करते थे,
अपने घर वालों से ज्यादा, अध्यापक जी से डरते थे।।

बेंत हथेली पर पड़ता था, रोते थे पर बुरा न माने।
नहीं ठीक उत्तर दे पाये,गलती हुई यही हम जानें।।

अगर साइकिल से जाते हों,पास दिखें गुरुदेव हमारे।
तुरत उतर पग छू लेते थे,हम भी लगते उनको प्यारे।।

किंतु आज  के  छात्र कहां हैं, जो अध्यापक को गुरु जाने।
ऐसा गजब जमाना आया, शिष्य स्वयं गुरु का गुरु माने।।
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चाह यही है

चाह नहीं मैं बनूं मिनिस्टर घर भरना कहलाऊं,
चाह नहीं झूठे वादे कर, सोने से तोला जाऊं।।

चाह नहीं फिल्मी एक्टर बन, रह रह कूल्हे मटकाऊं,
चाह नहीं धर्मेंद्र बन कर, हेमाओं को फुसलाऊं।।

चाह नहीं चमचा बन कर, व्यर्थ किसी के गुण गाऊं,
चाह नहीं गुंडा बन कर के,चमचम छूरा चमकाऊं।।

चाह  नहीं  माला बन कर  के,  जूड़े में गूंथा जाऊं,
चाह नहीं छप्पन प्रकार के, नित्य-नित्य भोजन पाऊं।।

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समस्या

कितनी सरकारें आयी हैं, किंतु समस्या जस की तस है,
लौटा ले कश्मीर हमारा, लगता नहीं किसी का वश है।।

 बातें  ही  होती  रहती हैं, बातों  से क्या होना जाना।
       लगता कोई नहीं चाहता, जटिल समस्या को सुलझाना।।


कांटा से ही कांटा निकले,जहर जहर से मारा जाता।
 जो विवाद जैसे उलझा हो, वैसे ही सुलझाया जाता।।

                
शांति-वार्ता सिर्फ ढोंग है, नहीं समस्या को सुलझाते।
 पांच साल पूरा होते ही , जिम्मेदारी से हट जाते ।।

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नेता : तब के अब के

पहले जैसे नेताओं के, शायद कभी न दर्शन होंगे।
आजादी पाने की खातिर, कारागार कष्ट जो भोगे।।

महा क्रूर गोरों ने जिनको, काला पानी में था ठूंसा।
भरे गये कोठरियों में वे, जैसे ठूंसा जाता भूसा।।

बीमारी से मरे अनेकों, जिनको दवा नहीं मिल पायी।
उनकी दशा देख कर गोरे, हंसते थे ज्यों  क्रूर कसाई।।

पर अब के नेता यह भूले, उन्हें दिखाई देता पैसा।
जितना चाहो खूब बटोरो,  मौका नहीं मिलेगा ऐसा।।

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जनता अनाड़ी

जितनी बातें होती रहतीं, उतना काम नहीं है होता।
सरकारी दफ्तर का बाबू, फाइल से मुंह ढंक कर सोता।।

काम किये बिन पैसा मिलता, तो शरीर को कौन खटाये।
नींद तुरत खुल जाया करती, रिश्वत मैया जो सहलाये।।

विकसित राष्ट्र बनेगा भारत, इसे ठिठोली वे सब माने।
जैसा चलता, वही चलेगा, वही सत्य है वे सब जानें।।

मंत्री सांसद और विधायक, इन सबको है कुर्सी प्यारी।
तभी शगूफा छोड़ा करते, जिनको जनता लगे अनाड़ी।।
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सट्टेबाजी

थोड़ा उठते थोड़ा गिरते, चलती रहती सट्टेबाजी।
किंतु अचानक लुढ़का देते,ऐसे भी होते हैं पाजी।।

ऐसा होते देखा सबने, कितने थे इतने घबड़ाये।
साठ गुना पाने की खातिर,प्रभु का पूजा पाठ कराये।।

लाखपती से खाकपती हो, कितने रोते हैं पछताते।
फिर से आज गगन को छू ले, ऐसी हैं वे आश लगाते।।

पर भगवान यही कहते हैं, भक्त नहीं लालच में आओ।
जितना भाग लिखा है तेरे, उतने से संतोष मनाओ।।
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समझ रहे हैं हमें अनारी


किस किस पर विश्वास करें अब, किसको समझें परम हितैषी।
संसद  में  भी  घुसे हुए  हैं, घूसखोर, ठग  सांसद  वेशी।।

जहां समर्थन पाने खातिर मोटी रकम वसूली जाती।
ऐसे नीच अधर्मी नेता, कमबख्तों को शर्म न आती।।

एकमात्र संसद बचती थी, जो थी परम पवित्र कहाती।
दुष्टजनों ने किया कलंकित, जिनकी शान से फूले छाती।।

पूरे  कुएं  में  भंग घुली है, हवा  चली है भ्रष्टाचारी।
चोर उचक्के हैं कुछ नेता, समझ रहे जो हमें अनारी।।
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शहर गांव में घुसा


शहर गांव में घुस आया है, फैशन की बलिहारी।
टेरीकाटन  पहन  रही है,  घुरहू की महतारी ।।

मिस्सी नहीं लिपस्टिक आयी, स्नो की है डिबिया।
पहन मैक्सी मटक  रही,  बुधुआ की है बिटिया ।।

ट्रांजिस्टर  लटकाये  कामता,  भैंस चराने जाता।
आल्हा नहीं रफी के स्वर में, फिल्मी गाने गाता।।

पैंट, शर्ट घुसपैठी बन कर, धोती को दुतकारें।
नहीं बैलगाड़ी अब आती, चलतीं बाइक, कारें।।
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अति भक्ति

अधिक भक्ति जो भी दिखलाता, उससे बड़ा चोर न होता।
जो उसके चक्कर में पड़ता, अपना धन दौलत है खोता।।

बड़ा  चतुर  जो  माना है, जम  कर  चूना  उसे लगाता।
जी हां, हां जी बटरिंग करके, जो चाहे सब कुछ पा जाता।।

ज्यादा भक्ति चोर के लक्षण , सही कहावत है कहलाये।
झूठ नहीं यह बिल्कुल सच है,हम इसको हैं खुद अजमाये।।

चोर चोर से खुश रहता है, उसको वह अपना ही जाने।
लेकिन जो सज्जन होता है, उसे सदा दुर्जन ही माने।।
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