Thursday, September 29, 2022

जब मैं महान फिल्मकार,अभिनेता सर रिचर्ड एटेनबरो से मिला

आत्मकथा-43 ा
आनंद बाजार प्रकाशन के हिंदी साप्ताहिक के लिए अप्लीकेशन देकर मैं वहां से उत्तर के इंतजार में था। इधर सन्मार्ग में एक बात हुई मुझे एक नया दायित्व दे दिया गया। मुझसे सन्मार्ग के मालिक रामअवतार गुप्त ने एक दिन अपने केबिन में बुलाया और कहा-देखो आप यहा मुंबई से आनेवाले फिल्मी कलाकारों के इंटरव्यू व बड़े-बड़े फिल्मी इवेंट कवर कर लिया करो। तुम्हारे भैया रुक्म जी को फुरसत नहीं। यहां से ऐसे लोग चले जाते हैं कि बाद में पाठकों के फोन आने लगते हैं कि यह कैसे हुआ। मैंने उनका आदेश शिरोधार्य किया और दूसरे दिन से फिल्म संबंधी हर कार्यक्रम सन्मार्ग के लिए अटेंड करने लगा। इनमें नयी फिल्मों के रिलीज में मुंबई के कलाकारों के साथ होनेवाली प्रेस कांफ्रेस हो या फिर दूसरा कोई कार्यक्रम मैं वहां कवरेज के लिए जाता था। जितेंद्र, चंद्रशेखर,आदित्य पंचोली, संजीव कुमार,तापस पाल, ऐसे तमाम कलाकारों से मिलना उनके बारे में जानना, उनकी फिल्मों के बारे में जानना यह क्रम चलता रहा लेकिन मेरे इस कार्य का सबसे बड़ा दिन वह था जब मैं महान अभिनेता, निर्देशक, निर्माता सर रिचर्ड एटेन बरो 
सर रिचर्ड एटेन बरो

से मिला।लाजवाब अभिनेता, बेमिसाल इनसान थे वे। उन्होंने ‘गांधी’ जैसी कालजयी फिल्म बनायी। कुछ भारतीय फिल्मकारों ने उस वक्त शंका जतायी थी कि एक विदेशी निर्माता गांधी के चरित्र से कितना न्याय कर पायेगा लेकिन जब फिल्म बनी तो लोगों के मुंह बंद हो गये क्योंकि उन्हें उन पर उंगली उठाने जैसा कुछ दोष मिला ही नहीं।1977 में एटेनबरो महान भारतीय फिल्मकार सत्यजित राय की फिल्म ’शतरंज के खिलाड़ी’ में काम करने भारत आये थे। महान कथाशिल्पी मुंशी प्रेमचंद की इसी नाम की कहानी पर आधारित इस फिल्म में उन्होंने लेफ्टीनेंट जनरल आउट्राम की भूमिका निभायी थी। फिल्म की शूटिंग पूरी होने के बाद फिल्म के निर्माता सुरेश जिंदल ने कोलकाता के ग्रांड होटल में फिल्म के बारे में जानकारी देने के लिए संवाददाता सम्मेलन बुलाया था। इस सम्मेलन में जाने का मुझे भी मौका मिला। वहीं रिचर्ड एटेनबरो से मुलाकात हुई। यह गरमी की उमस भरी दोपहर थी। एटेनबरो मलमल के सफेद कुरते और पाजामे थे। सुर्ख रंगत वाला गोरा-चिट्टा चेहरा और उस पर छोटी से मुसकराती आंखें, चेहरे पर हलकी दाढ़ी कुल मिला कर उनका व्यक्तित्व भीड़ में उन्हें अलग करता था। वैसे भी भारतीयों की भीड़ में एक ब्रिटिश अभिनेता को पहचान पाना आसान था। वे सबसे बातें कर रहे थे और फिल्म में अभिनय के बारे में, पहली बार भारतीय फिल्म में काम करने के बारे में अपने अनुभव साझा कर रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि सत्यजित राय से अपनी पहली मुलाकात और इस फिल्म में भूमिका मिलने के बारे में बताइए। उन्होंने कहा कि सत्यजित राय उनको आउट्राम की भूमिका के लिए सेलेक्ट करने के लिए लंदन गये थे। वहां रहते वक्त उन्होंने एटेनबरो से फोन पर बात की और बातचीत के दौरान यह साफ कर दिया कि सत्यजित राय की फिल्म में काम करना है तो पूरी स्क्रिप्ट पढ़ कर अपने चरित्र और कहानी की आत्मा के बारे में जानना जरूरी है। ऐसा उन्हें (एटनेबरो) भी करना होगा। इस पर एटेनबरो का जवाब था कि सत्यजित राय जैसे महान निर्देशक के साथ काम करने का मौका मिले तो वे पूरी टेलीफोन डाइरेक्टरी तक पढ़ने को तैयार हैं। यहां यह बताते चलें कि उस वक्त तक सत्यजित राय पूरी दुनिया में एक सशक्त और सफल फिल्म निर्देशक के रूप मे प्रतिष्ठित हो चुके थे। जब एटेनबरो सत्यजित राय की फिल्म में काम करने आये थे तब तक वह भी अभिनेता के रूप में अपार ख्याति पा चुके थे। लेकिन उनसे मिल कर, उनके व्यवहार से कभी नहीं लगा कि हम इतने बड़े कलाकार से मिल रहे हैं। अपने यहां तो किसी कलाकार की एक फिल्म भी हिट हो गयी तो उसका दिमाग सातवें आसमान पर होता है, वह सामान्य आदमी को कुछ नहीं मानता और ना ही उससे सामान्य ढंग से मिलने-जुलने में विश्वास रखता है। अगर ऐसे कलाकार की फिल्म 100 करोड़ के क्लब में पहुंच जाये तो फिर पूछना ही क्या। वैसे भी ये कलाकार खुद को भगवान जैसा मानते हैं । एटेनबरो में ऐसा कुछ भी नहीं था। जब तक वे हमसे मिले, सहजता से बात की, हमेशा चेहरे पर स्मित हास्य तैरता रहा, न कोई तनाव ना ही माथे पर कोई शिकन। वह मुलाकात बहुत याद आती है क्योंकि ऐसे व्यक्तित्व धरती पर बार-बार नही आते। एटेनबरो महान अभिनेता पर बहुत ही सरल, हंसमुख और लाजवाब इनसान थे। किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसका स्वभाव एक बार की मुलाकात में भी परखा जा सकता है अगर वह व्यक्ति एटेनबरो जैसा निश्छल, निर्मल और निराला हो। यह बात उन पर कतई लागू नहीं होती जो होते कुछ और हैं और कोशिश कुछ और दिखाने की करते हैं। ग्रांड कोलकाता की वह दोपहर हर उस व्यक्ति के लिए यादगार बन गयी जो उनसे मिल या उन्हें सुन सका। उनकी महानता, सरलता के किस्से उन लोगों ने भी बखान किये जिन्होंने ’शतरंज के खिलाड़ी’ में उनके साथ काम किया। कोलकाता के इंद्रपुरी स्टूडियो व शहर के अन्य स्थानों पर इसकी शूटिंग हुई थी। स्टूडियो के सभी कर्मचारी ’साहेब’ के साथ काम करने को लेकर आशंकित थे। एक तो साहब उस पर भाषा का व्यवधान और उस पर इतने बड़े कलाकार, पता नहीं कौन-सी बात उन्हें बुरी लग जाये। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। गरमी के उन दिनों में हालांकि उनको एयरकंडीशंड मेकअप रूम दिया गया था पर वे घंटों सेट के सज जाने या लाइटमैन के लाइट्स और कैमरामैन के कैमरा एंगल वगैरह सहेज, सजा लेने तक धैर्य से प्रतीक्षा करते रहते। ना उस गरमी की परेशानी से शिकायत और ना ही माथे पर कोई शिकन। यहां अपने यहां के कलाकारों की स्थिति बयान करते चलते हैं। इसे विषयांतर ना समझें इस घटना से आपको यह पता चल जायेगा कि कलाकार-कलाकार में फर्क क्या होता है। कहानी यों है- दक्षिण के एक फिल्म निर्माता ने हिंदी में फिल्म बनानी चाही। उन्होंने उसमें उस वक्त के हिंदी के बहुत बड़े कलाकार को लेना चाहा। कलाकार ने काम करने की शर्तें रख दीं, मसलन स्टूडियो एयरकंडीशंड होना चाहिए, गाड़ी एयरकंडीशंड होनी चाहिए और ना जाने क्या-क्या। निर्माता इस पर भी राजी हो गये। उस अभिनेता के आश्चर्य का ठिकाना ना रहा जब वह मद्रास एयरपोर्ट पर उतरा तो एक नहीं कई इम्पाला एयरकंडीशंड गाड़ियां उसके स्वागत के लिए खड़ी थीं। वह स्टूडियो पहुंचा तो वह भी एयरकंडीशंड मिला। खैर काम शुरू हुआ। वह अभिनेता अपनी आदत के मुताबिक मद्रास में भी स्टूडियो में देर से आने लगा। स्टूडियो के दरबान ने दो-चार दिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया, सोचा साहब नये-नये हैं शायद दो-एक दिन में अपनी आदत सुधार लेंगे, समय से आने लगेंगे लेकिन वैसा नहीं हुआ। इस पर दरबान ने निर्माता ने उन साहबान की लेटलतीफी की शिकायत कर दी। निर्माता ने दरबान को ताकीद कर दी कि अगर अब वे लेट आते हैं तो उनसे कहना वहीं से सीधे एयरपोर्ट जायें और मुंबई लौट जायें। मुझे ऐसे अभिनेता के साथ काम नहीं करना। दरबान ने अगले दिन अभिनेता से वैसा ही कह दिया। इस पर अभिनेता झेंप गये, उन्हें लगा कि यह मुंबई नहीं मद्रास है और उनका पाला किसी कड़े और वक्त के पाबंद निर्माता से पड़ा है। उस अभिनेता की आदत सुधर गयी, स्टूडियो वे समय से आने लगे, फिल्म बनी और जबरदस्त हिट हुई। माना कि विषयांतर हुआ लेकिन यह कहानी इनसान-इनसान के व्यवहार और प्रकृति में अंतर बताने के लिए जरूरी थी। वापस एटेनबरो के प्रसंग पर लौटते हैं। वे स्टूडियो में बड़े धैर्य से शूटिंग शुरू होने की प्रतीक्षा करते। कैमरामैन से पूछते कि क्या वे शॉट लेने के तैयार हैं। बंगला फिल्मों से थोड़ा-सा भी संबंध रखने वाले लोग जानते हैं कि लोग यहां पर सत्यजित राय को प्यार से ’मानिक दा’ कह कर बुलाते थे। स्टूडियो में लोगों से उनके लिए यह संबोधन सुन कर एटेनबरो भी उन्हें इसी नाम से बुलाने लगे थे। कहते हैं जब फिल्म की शूटिंग खत्म हुई और वे लंदन वापस जाने लगे तो उन्होंने उन तकनीशियनों को उपहार तक दिये जो ’शतरंज के खिलाड़ी’ से किसी भी तरह से जुडे थे। उनसे मिल कर यह जाना कि कितना अच्छा हो अगर कोई इनसान अपने काम में महान होने के साथ ही व्यवहार में भी महान हो। इस तरह के आयोजनों के कवरेज करते-करते मेरे अनुभव में कुछ और जुड़ाव हुआ। अपने भैया रुक्म जी से सुना था कि संजीव कुमार और रविंद्र जैन को मुंबई जाने के लिए उन्होंने ही प्रेरित किया था। संजीव कुमार कोलकाता में नाटकों में काम करते थे और 
संजीव कुमार

भैया के पास अपने नाटकों का समाचार छपवाने आते थे। एक बार भैया ने कहा-अच्छा अभिनय कर लेते हो यहां क्यों समय बरबाद कर रहे हो मुंबई जाओ। तुम्हें अपने हुनर को निखारने का मैदान वहां मिलेगा। भैया की यह बात संजीव कुमार के दिल में लग गयी। वे वहां गये संघर्ष किया और फिल्म अभिनेता के रूप में वह स्थान हासिल किया जो बहुत कम लोग ही हासिल कर पाते हैं। भैया के प्रति संजीव की श्रद्धा बरकरार रही। मैं इस बात का गवाह हूं। किसी फिल्मी पार्टी के लिए कोलकाता आये थे। तब तक वे प्रतिष्ठित अभिनेता बन गये थे। वे सभी पत्रकारों से औपचारिक रूप से मिलने के बाद जब भैया के पास आये तो बाकायदा उनके चरण स्पर्श किये। यह मैं सुनी सुनायी बात नहीं कह रहा। मैं उन क्षणों का साक्षी रहा हूं। उन्होंने संगीतकार रवींद्र जैन को भी मुंबई जाने को प्रेरित किया था। रवींद्र जैन ने भैया रुक्म जी के लिखे नाटक 'अलका' के मंचन के दौरान संगीत दिया था। उसके बाद भैया ने उनसे भी कहा-यहां समय मत बरबाद करो मुंबई जाओ वहां तुम्हें अपनी प्रतिभा को दिखाने का अच्छा मौका मिलेगा। इस पर रवींद्र जैन का जवाब होता-रुक्म जी वहां नेत्रों वाले मारे-मारे फिरते हैं, मुझे कौन पूछेगा। भैया बोलते-तुम्हारी प्रतिभा की मांग और मान होगा। भैया की बात सुन वे भी मुंबई चले गये। और वक्त गवाह है कि उन्होंने वहां फिल्मों में संगीत निर्देशक के रूप में जो मुकाम हासिल किया वह हासिल करने में नेत्रों वालों के पसीने छूट जाते हैं। रवींद्र जैन में एक खूबी थी वे लोगों को आवाज से पहचान लेते थे। एक बार की बात है कि मैं अपने भैया रुक्म जी और मित्र राज मिठौलिया के साथ उस कार्यक्रम में गया था जहां रवींद्र जैन की उपस्थति होनेवाली थी। यह कार्यक्रम कोलकाता के रिट्ज होटल में था। कार्यक्रम जिस हाल मेंथा हम लोग वहां पहुंचे ही थे कि तभी रवींद्र जैन वहां आये।भैया ने कहा-अभी देखना रवींद्र मुझे आवाज से पहचान लेगा। इतना 
रवींद्र जैन

कह कर वे मुझसे और राज मिठौलिया से जोर-जोर से बातें करने लगे। अचानक रवींद्र जैन ने लोगों से कहा- आप जरा शांत हो जायें, मुझे अपने रुक्म जी की आवाज सुनायी दे रही है। मेरी प्रार्थना है वे जहां हों मेरे पास आयें। भैया ने जाकर उन्हें गले से लगा लिया और बोले-रवींद्र तुम मुझे अब तक नहीं भूले। रवींद्र जैन ने कहा-रुक्म जी जिंदगी भर आपको नहीं भूलंगा। आपने हौसला बढ़ाया तभी ना मैंने यह मुकाम पाया। इस तरह की घटनाओं ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। पहली बात तो यह कि इस बदलती दुनिया में आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने साथ किये उपकार को भूलते नहीं। उनके प्रति आजीवन कृतज्ञ रहते हैं जिन्होंने कभी उनकी मदद की, हौसला बढ़ाया। * प्रतीक्षा की घड़ियां समाप्त हुईं। आनंद बाजार प्रकाशन समूह के हिंदी साप्ताहिक में कार्य के लिए किये गये आवेदन का जवाब आ गया। मेरे पास इंटरव्यू के लिए लेटर आया था। मैं इंटरव्यू के लिए तैयारियां करने लगा। मेरी जो-जो रिपोर्ट छपी थीं उनकी छाया कापी करवायीं। कुछ बाल उपन्यास भी इकट्ठा किये और इंटरव्यू के दिन की प्रतीक्षा करने लगा। (क्रमश:)

Thursday, September 15, 2022

जब मुझे मिला संत स्वरूप, गीता मर्मज्ञ पांडेय जी का आशीर्वाद

 आत्मकथा-42



राजेश त्रिपाठी

संजय का जीवन बाल्यकाल से अब तक शृंखला सन्मार्ग में नियमित छप रही थी। लोगों को यह पसंद आ रही थी. परिचितों की कौन कहे अपरिचितों से भी प्रशंसा आ रही थी। दरअसल मेरी कोशिश यह थी कि इसे राजनीतिक रिपोर्ताज की तरह नही एक सत्य घटनाओं पर आधारित औपन्यासिक रचना थी। इसकी कुछ किस्तें पढ़ने के बाद मेरे परिचित विख्यात कथाकार ध्रुव जायसवाल ने भी इसकी प्रशंसा की थी और इसे पुस्तककार प्रकाशित करने की सलाह दी थी लेकिन वह हो नहीं पाया।

  जब मै सन्मार्ग में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था और हिंदी फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन के प्रबंध संपादक का भी कार्यभार संभाल रहा उन्हीं दिनों एक खबर सुनने में आयी। उड़ती सी खबर आयी कि बंगाल के सर्वाधिक लोकप्रिय बंगला दैनिक आनंदबाजार पत्रिका प्रकाशित करनेवाला संस्थान आनंद बाजार प्रकाशन एक हिंदी साप्ताहिक निकालने जा रहा है। खबर उड़ी तो पर विश्वास नहीं हो रहा था। मैंने इसका जिक्र अपने भैया रुक्म जी से किया।

भैया ने कहा-कोई बात नहीं,मैं कल ही जाकर पता करता हूं कि यह सच है या किसी ने अफवाह उड़ा दी है। वहां के सिनेमा एडीटर मेरे परिचित हैं।

दूसरे दिन भैया कोलकाता के 6 प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट स्थित आनंदबाजार पत्रिका के कार्यालय पहुंचे। उन्होंने रिसेप्शन में पूछा कि हिंदी विभाग में जाना है। लोगों ने उन्हें ऊपरी तल्ले में जाने और मणि मधुकर से मिलने को कहा।

 ऊपरी मंजिल में पहुंच कर भैया जी मणि मधुकर जी से मिले। बातचीत के दौरान पता चला कि वे प्रसिद्ध कवि हैं। उनसे जब भैया ने पूछा कि क्या यहा से कोई हिंदी प्रकाशन शुरू होनेवाला है।

 मणि मधुकर जी ने उत्तर दिया –जी हां, यहां से हिंदी साप्ताहिक रविवार निकालने की तैयारी चल रही है।

 इसके बाद भैया ने कहा-मेरा भाई भी पत्रकार है, जरा उसका भी ध्यान रखिएगा।

मणि मधुकर जी ने कहा-अवश्य अवश्य।

इसके बाद भैया ने पूछा-आपके अलावा और कोई इस काम के लिए आया है या फिलहाल वन मैन शो है।

मणि मधुकर जी हंसते हुए बोले-नहीं नहीं सुरेंद्र प्रताप सिंह जी भी हैं।

इस नाम से भैया परिचित थे। उन्होंने कहा-वे तो मेरे परिचित हैं। कहां बैठते हैं वे।

मणि मधुकर ने वह चैंबर दिखा दिया जिसमें सुरेंद्र प्रताप सिंह बैठते थे।

भैया ने सुरेंद्र प्रताप सिंह जी का चैंबर खोलते हुए पूछा-मैं अंदर आ सकता हूं।

उन्हें देखते ही सुरेंद्र प्रताप सिंह अपनी कुर्सी से उठ कर बोले-अरे रुक्म जी आइए आइए।

भैया अंदर गये तो सुरेंद्र जी ने उन्हें सामने की कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

भैया जब बैठ गये तो सुरेंद्र जी ने उनसे कहा-अरे मैं तो सन्मार्ग में आपके बाल विनोद का सदस्य था। कहिए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं।

भैया ने कहा-सुना है यहां से कोई हिंदी प्रकाशन शुरू हो रहा ह।

सुरेंद्र जी ने कहा-जी हां हिंदी साप्ताहिक रविवार निकालने की तैयारी चल रही है। क्या बात है कहिए।

भैया बोले- मेरा भाई सन्मार्ग में प्रशिक्षण ले चुका है वह एक हिंदी फिल्म साप्ताहिक स्क्रीन में प्रबंध संपादक है। मैं चाहता हूं  कि वह आप लोगों से जुड़े। आप लोगों के साथ जुड़ेगे तो उसके भविष्य के लिए भी अच्छा रहेगा और सही ढंग से सीख पायेगा। मैं मणि मधुकर जी से मिला था उन्होंने कहा कि वे ध्यान अवश्य रखेंगे।

इस पर सुरेंद्र जी ने कहा- मणि जी  ने जो कहा उसे रहने दीजिए। भाई से एक अप्लीकेशन अवश्य भिजवा दीजिए।

भैया ने घर लौट कर मुझे सारी जानकारी दी और कहा-कल ही अप्लीकेशन भेज दो।

मैंने दूसरे दिन ही अप्लीकेशन भेज दी। उसमें मैंने यह भी लिखा कि मैं कौन-कौन सी भाषाएं जानता हूं। इनमें उर्दू का भी नाम था।

अप्लीकेशन भेज कर मैं आनंद बाजार प्रकाशन से जवाब आ का इंतजार करने लगा।

*

सन्मार्ग में मेरा प्रशिक्षण जारी रहा। स्क्रीन भी मैं संभालता रहा। सन्मार्ग में भैया रुक्म जी सिनेमा संपादक भी थे। उनके सिनेमा पेज में बुझक्कड कालम में पाठको के प्रश्नों के उत्तर देते थे। एक दिन भैया कुछ व्यस्त थे तो उन्होंने मुझसे कहा कि मैं लाल बुझक्कड के प्रश्न लिख दूं।

दूसरे दिन मैने लालबुझक्कड़ कालम के प्रश्नो के उत्तर लिखे। उनमें से कुछ प्रश्न ऐसे थे कि उनके उत्तर में मैंने गीता के कुछ श्लोक कोट कर दिये।

दूसरे दिन जब मै सन्मार्ग में भैया रुक्म जी की बगल वाली कुर्सी में बैठा काम कर रहा था तभी सूर्यनाथ पांडेय जी आये और भैया रुक्म ज से बोले-वाह रुक्म जी आपने लालबुझक्कड़ के प्रश्नों के उत्तर में भी गीता के श्लोक दे दिये वह भी इतने अच्छे ढंग से कि एकदम बेतुके नहीं लग रहे.

भैया ने कहा-आशीर्वाद देना है तो मेरे इस भाई को दीजिए इसने ही यह लिखा है।

मैंने उनहें प्रणाम किया और उन्होंने सिर पर हाथ रख कर बहुत आशीर्वाद दिया।

सूर्यनाथ पांडेय जी संत स्वरूप थे। वे गीता मर्मज्ञ थे और अंग्रेजी व हिंदी में धराप्रवाह गीता पर प्रवचन करते थे। वे मिरजई और धोती पहनते थे। वे सन्मार्ग के वरिष्ठ सदस्यों में थे। सभी उनका बड़ा सम्मान करते थे। पांडेय जी एक और बात के लिए बहुत विख्यात थे। वह यह कि वे भोजन बनाने और पीने के लिए भी गंगाजल का ही प्रयोग करते थे। उनके लिए जल लाने के लिए एक व्यक्ति नियुक्त था।

बाद में पांडेय जी वाराणसी चले गये और वहीं उनका स्वर्गवास हो गया।

मैंने आनंद बाजार में अप्लीकेशन भेज दी थी और बड़ी व्यग्रता से वहां से जवाब का इंतजार कर रहा था। (क्रमश:)

Saturday, September 3, 2022

 





आपातकाल के काले साये और जेपी की हुंकार

 आत्मकथा- 41



आप जिस कालखंड में होते हैं उसके ऊंच-नीच से किसी ना किसी तरह आप प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकते। 25 जून, 1975 की आधी रात को देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। इसकी की जड़ में था राजनारायण बनाम उत्तर प्रदेश नाम के मुकदमे में आया फैसला।

एक ऐतिहासिक फैसले ने एक साल से आंदोलनरत विपक्ष को वह ऑक्सीजनदे दी थी जिसकी उसे तलाश थी।

. इसी फैसले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को देश में आपातकाल लगाने पर मजबूर कर दिया था. जिस मुकदमे में यह फैसला आया था उसे राजनारायण बनाम उत्तर प्रदेशनाम से जाना जाता है।

इस मुकदमे में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनावों में धांधली का दोषी पाया था. 12 जून 1975 को सख्त जज माने जाने वाले जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने अपने निर्णय में उनके रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध करार दे दिया। अदालत ने साथ ही अगले छह साल तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। ऐसी स्थिति में इंदिरा गांधी के पास राज्यसभा में जाने का रास्ता भी नहीं बचा। अब उनके पास प्रधानमंत्री पद छोड़ने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. कई जानकार मानते हैं कि 25 जून, 1975 की आधी रात से आपातकाल लागू होने की जड़ में यही फैसला था।

यही वह समय भी था जब गुजरात और बिहार में छात्रों के आंदोलन के बाद देश का विपक्ष कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो चुका था। लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण यानी जेपी पूरे विपक्ष की अगुआई कर रहे थे। वे मांग कर रहे थे कि बिहार की कांग्रेस सरकार इस्तीफा दे दे। वे केंद्र सरकार पर भी हमलावर थे. ऐसे में कोर्ट के इस फैसले ने विपक्ष को और आक्रामक कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन यानी 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की रैली थी. जेपी ने इंदिरा गांधी को स्वार्थी और महात्मा गांधी के आदर्शों से भटका हुआ बताते हुए उनसे इस्तीफे की मांग की. उस रैली में जेपी द्वारा कही गयी रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता का अंश अपने आप में नारा बन गया है. यह नारा था- सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति तो दे दी, लेकिन कहा कि वे अंतिम फैसला आने तक सांसद के रूप में मतदान नहीं कर सकतीं.कोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी की स्थिति नाजुक हो गई थी।

आलोचकों के अनुसार इंदिरा गांधी किसी भी तरह सत्ता में बने रहना चाहती थीं और उन्हें अपनी पार्टी में किसी पर भरोसा नहीं था. ऐसे हालात में उन्होंने आपातकाल लागू करने का फैसला ​किया।

इसके लिए उन्होंने जयप्रकाश नारायण के बयान का बहाना लिया. 26 जून, 1975 की सुबह राष्ट्र के नाम अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा, ‘आपातकाल जरूरी हो गया था। एक जनासेना को विद्रोह के लिए भड़का रहा है। इसलिए देश की एकता और अखंडता के लिए यह फैसला जरूरी हो गया था।

उन दिनों क्या-क्या नहीं हुआ। राष्ट्र में व्यापक अराजकता, सरकारी प्रतिबंधों का ऐसा दौर चला कि जनता त्राहि-त्राहि करने लगी। जबरिया नसबंदी का खौफ कुछ इस तरह का था कि कोलकाता में मोहल्ले-मोहल्ले घूम कर फल बेचने वाले बिहार के कई लोग नसबंदी के डर से जो कोलकाता छोड़ कर भागे तो फिर कभी नहीं लौटे।

  अखबारों पर सेंसर लगा दिया गया। कोई खबर अधिकृत सूचना अधिकारी के जांचे बगैर नहीं छप सकती थी। रोज लोग खबरें लेकर जाते अधिकारी हर उस खबर पर क्रास लगा देते जो उन्हें व्यवस्था विरोधी लगतीं। इसके विरोध में कई अखबारों ने अपने संपादकीय स्तंभ खाली छोड़ने लगे।

 

आपातकाल में सेंसर के विरोध में खाली छोड़ा गया इंडियान एक्सप्रेस का संपादकीय स्तंभ

मेरे भैया रामखावन त्रिपाठी रुक्म भी सन्मार्ग में व्यंग्य स्तंभ लिखते थे जिसमें सरकारी नीतियों की आलोचना भी होती थी। उनके संपादकीय विभाग के साथी अक्सर कहते –रुक्म जी आपने आज जो लिखा है वह तो पास नहीं होगा। भैया उत्तर देते-वे लोग समझ पायेंगे तब ना काटेंगे।

 उनके सभी सहयोगी चौंक जाते जब वे पाते कि सूचना अधिकारी के कार्याय से भैया का लेख ओक होकर आ गया।

आपातकाल को सही और राष्ट्र के लिए हितकर बताने के लिए सरकार की तरफ से कई तरह के अभियान चलाये गये। बसों और दूसरे वाहनों में में लिखा जाने लगा नेशन आन दी मूवइसका अर्थ तो यही हुआ कि-राष्ट्र चल पड़ा। तो क्या इसके पहले राष्ट्र ठहरा हुआ था।

 आपातकाल, अनाचार के विरोध में आवाज उठाने वाले लोकनायक जयप्रकाश समेत कई वरिष्ठ विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया।

*

खैर काफी अरसे बाद देश को आपातकाल से मुक्ति मिली। मैं सन्मार्ग में प्रशिक्षण और फिल्मी साप्ताहिक स्क्रीन में प्रबंध संपादक के रूप में काम कर रहा था। आपातकाल हटा तो मैंने एक शृंखला लिखनी शुरू की संजय का जीवन, बाल्यकाल से अब तकजो सन्मार्ग में प्रतिदिन धारावाहिक रूप में प्रकाशित होने लगी। इसे आत्मश्लाघा ना समझें यही प्रार्थना है। यह धारावाहिक कुछ दिनों में ही लोकप्रिय हो गया। इसके साथ ही एक संकट भी आया कुछ लोग सन्मार्ग कार्यालय से राजेश त्रिपाठी का अता-पता पूछने लगे। 



सन्मार्ग में प्रकाशित 'संजय का जीवन बाल्यकाल से अब तक' की पहली किस्त

इसके बाद सन्मार्ग के मालिक रामअवतार गुप्त जी ने मेरे भैया रुक्म जी से कहा- भाई को बोलिए कि लिखे मगर नाम बदल कर। यहां बताते चले कि सन्मार्ग के संपादकीय विभाग के एक वरिष्ठ संपादक भी लेख लिख रहे थे पर कल्पित नाम से। भैया जी ने गुप्ता जी का संदेश मुझ तक पहुंचाया। मेरा जवाब था-मैं नाम नहीं बदलूंगा। उन्हें नहीं छापना तो ना छापें। भैया रुक्म जी मेरा जवाब गुप्ता जी को सुना दिया। वे बहुत खुश हुए और यह शृंखला धारावाहिक छपती रही। लोग इसे इसलिए पसंद कर रहे थे कि यह साधारण लेख की शैली में  नहीं बल्कि उपन्यास की शैली में रोचक ढंग से लिखी गया था। इसलिए इसे उन लोगों ने भी सराहा जिन्हें राजनीति में रुचि नहीं थी। (क्रमश:)

 

 

Monday, August 15, 2022

जब शम्मी कपूर की बातों ने चौंका दिया

 

 त्मकथा-40


यह हमारे लिए बड़ी प्रसन्नता की बात थी कि हमारे साथ एक्टर बनने या एक्टिंग की सीखने की ख्वाहिश ले मुंबई गये युवक की आंखों से चकाचौंध वाली फिल्मी दुनिया का मोह हट गया था। उसे समझ आ गया था कि यहां के लुभावने अंधेरे के पीछे गहरा अंधेरा है। अगर कोई इस अंधेरे में खो गया तो फिर उसने अपनी जिंदगी तबाह कर ली। इसके बाद उस युवक ने तय किया कि आये हैं तो मुंबई घूम लेते हैं फिर वापस अपने-अपने धाम।

 मुंबई दर्शन के क्रम में हम सबसे पहले गेट वे आफ इंडिया पहुंचे। यह रब सागर के अपोलो में बना एत द्वार है। इसके पास शिवाजी महाराज का स्टैच्यू और प्रसिद्ध होटल ताजमहल है। वहां से एलिफेंटा केव्स के लिए मोटर वोट्स थोड़ी-थोड़ी देर में सवारियां लेकर जा रहे थे। एलिफेंटा द्वीप महाराष्ट्र के मुंबई शहर में स्थित गेटवे ऑफ इंडिया से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। एलिफेंटा को घारापुरी के नाम से भी जाना जाता है जो कोंकणी मौर्य की द्वीपीय राजधानी थी। एलिफेंटा नाम पुर्तगालियों द्वारा यहां पर बने पत्थर के हाथी के कारण दिया गया था। यहां अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। पहाड़ियों को काटकर बनाई गई ये मूर्तियां दक्षिण भारतीय मूर्तिकला से प्रेरित हैं। यहां आने के बाद एक अलग ही दुनिया में आने जैसा अहसास होता है।मेरे भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म फिल्मी साप्ताहिक स्क्रीन के संपादक होने के नाते मुंबई आते-जाते रहते थे। वे एलिफैंटा कैव्स देख आये थे और वहां उकेरी गयी मूर्तिकला की बड़ी तारीफ कर रहे थे। वे बार-बार कह रहे थे चलो मोटरबोट पकड़ लेते हैं और देख आते हैं। बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा। हमारे साथ गया युवक तुरत तैयार हो गया और बोला-टलते हैं चाचा जी।

गेट वे आफ इंडिया

मैं अड़ गया और बोला कि- पानी में मेरी अल्प है, डूब कर मरने की आशंका हैय़ एक बार मैं यमुना में डूबते बचा था। दोनों ने बार-बार समझाया पर मैं अड़ा रहा। मेरे इस निर्णय से भैया को तो कुछ नहीं हुआ लेकिन हमारे साथ गये युवक का चेहरा उतर गया। भैया ने भी हठ नहीं किया सवाल भाई की जिंदगी का था।

हमने हाजी अली पीर की दरगाह में भी गये जो वर्ली के पास एक समुद्री टापू पर स्थित है पर कभी डूबती नहीं है। वह समुद्र के अंदर है वहां तक जाने के लिए एक सड़क बनी है। जब हम लोग सड़क से समुद्र के अंदर स्थित दरगाह जा रहे थे तो आसपास उठती समुद्र की लहरें सड़की दीवार से टकरा कर हमें भिगो रही थीं। मुझे बहुत डर लग रहा था। मैं भैया और अपने साथ गये मेरे दोस्त के बीच चलने लगा। जब हम लोग हाजी अली पीर की दरगाह में थे शाम के सात बज गये थे लेकिन उस वक्त भी वहां धूप खिली थी। हम लोग कोलकाता से गये थे जहां शाम सात बजे तक अंधेरा छा जाता है।

 दूसरे दिन हमारा गंतव्य था आर के स्टूडियो था जो मुंबई के चेंबूर इलाके में था। हमने वहां जाने के लिए टैक्सी पकड़ी। टैक्सी ने हमें आर के स्टूडियो से बहुत पहले ही उतार दिया। हमने पूछा-कितनी दूर है आर के स्टूडियो टैक्सी ड्राइवर ने उत्तर दिया-बस यही बाजू में है।

 मई का महीना था, सूरज की तीखी धूप थी। हम चल पड़े आर के स्टूडियो की ओर. देर तक चलते रहे।रास्ते में जिस किसी से पूछते वह बोलता-बस यही बाजू में है। गरनी से हालत बेहाल थी। हम समझ नहीं पा रहे थे कि मुंबई में जू की नाप इतनी लंबी होती है।

आखिरकार हम लोग आर के स्टूडियो पहुंच ही गये। वहां जाकर देखा गेट से घुसते ही दायीं ओर ट्रेन लाइन बनी है और उस पर ट्रेन के दो डिब्बे रखे हैं। सोचा यह शूटिंग के काम आते होंगे।

आगे बढ़े तो देखा एक सेट के बाहर षम्मी कपूर मन मारे बैठते हैं। नमस्ते कर के उनकी उदासी का कारण पूछा तो बोले- अरे आज यूसुफ साहब (दिलीप कुमार) के भाई साहब का इंतकाल हो गया है।

 उन्हें सहज होने में थोड़ा वक्त लगा फिर पूछा- किस फिल्म का सेट है इस स्टूडियो में।

उन्होंने सहजता से जवाब दिया-समझ लीजिए बंडलबाज।

सचमुच बाद में वह फिल्म बंडलबाज के नाम से ही रिलीज हुई जिसमें राजेश खन्ना, सुलक्षणा पंडित और देवकुमार की भूमिकाएं थीं।

 अब हमने शम्मी कपूर जी से आग्रह किया कि अगक राज कपूर जी से मिलवा देते तो हमारी आर के की यात्रा पूरी हो जाती।

 शम्मी मुसकरा कर बोले-राज साहब अभी वह सामने की काटेज में हीरोइन के साथ स्टोरी डिसकशन में हैं। अभी आप क्या मैं और कोई भी उनसे नहीं मिल सकता।

हमने लोगों में इस तरह की बातें सुन तो रखी थीं लेकिन शम्मी कपूर जी ने इसकी पुष्टि कर दी। यह जानकारी हमारे लिए चौंकाने वाली थी। यहीम यह बता देें कि आर के स्टूडियो अब बिक चुका है।

 *

अब हमारी मुंबई से लौटने की बारी थी। टिकट हमने पहले से बुक करा लिये थे जो कन्फर्म थे। हम लोग मुंबई मेल पकड़ने के लिए मुंबई वीटी स्टेशन पहुंचे। वहां पहुंचे तो पता चला कि जार्ज फर्नांडीज ने पूरे भारत में अचानक रेल हड़ताल की घोषणा कर दी है। इसका पता चलते ही सभी लोग स्टेशन की ओर दौड़ पड़े। सभी चाह रहे थे कि वे जल्द से जल्द अपने घरों को लौट चलें। हम तीनों भी एक ट्रेन में चढ़ गये। ट्केन अभी चली ही थी कि टिकट चेकर आया और जाने क्यों उसनें हमने तीनों को तत्काल उतर जाने को कहा। हमारे साथ गये युवक ने बहुत मिन्नत की लेकिन उस टिकट चेकर का दिल नहीं पिघला। उसने कहा-यहां उतर जाओ वरना ऐसी जंगल में उतारूंगा कि जहां पानी तक नहीं मिलेगा। हम लोग दादर स्टेशन में उतर गये।

 वहां हमने लोगों से पूछा कि अब हम क्या करें। कुछ लोगों ने सलाह दी कि आप यहां से भूसावल के लिए गाड़ी मिलेगी। वहां चले जाइए वहां कुछ डिब्बे कोलकाता जाने वाली गाड़ी में जुटते हैं। वहां वे डिब्बे खड़े मिलेंगे उन पर बैठ जाइएगा। हमने वैसा ही किया और बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा। कुछ दूर चलने पर ही वे डिब्बे मराठी आदिवासियों से भर गये। उनके साथ महिलाएं भी थीं। स्थिति यह धी कि एक व्यक्ति को पेशाब लगी तो वह उठ कर संडास की तरफ जाने लगा। उसका पैर शायद किसी औरत को छू गया वह झल्लायी और उसका पति उस आदमी पर टूट पड़ा। उसका सिर फोड़ डाला। वह वापस अपनी सीट  पर बैठ गया। हम लोग दबे-दबाये बैठे रहे। कुछ स्टेशन बाद वे आदिवासी उतर गये। जगह खाली हुई तब कभी हम लघुशंका कर पाये। जब गाड़ी ने हावड़ा को छुआ तब हमने चैन की सांस ली। (क्रमश:)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Monday, August 8, 2022

मायानगरी के सच ने खोल दीं युवक की आंखें

आत्मकथा-39


भाग-39

राजेश त्रिपाठी

आत्मकथा के पिछले भाग में हमने मुंबई के फिल्म उद्योग की कड़वी सच्चाई दिखाई जहां अपना भाग्य चमकाने, हीरो बनने जाने वाले नवयुवकों को किस तरह झूठा दिलासा देकर भटकाया जाता है। आपने निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा की कहानी सुनी जिन्होंने एक थप्पड़ जड़ कर राज कपूर स्टार बना दिया। हमारे साथ कोलकाता के उपनगर से जो युवक  हीरो बनने, अभिनय की ट्रेनिंग लेने के लिए ट्रेनिंग इस्टीट्यूट में भर्ती होने की गरज से आया था उसका हौसला केदार शर्मा के मुंह से मुंबई फिल्म उद्योग की सच्चाई सुन काफी हद तक पस्त हो चुका था। हौसला खत्म नहीं हुआ था।

वह युवक मेरे भैया रुक्म जी से बोला-चाचा जी जिस एक्टिंग स्कूल का मेरे पास विज्ञापन है वहां राजेश खन्ना भी एक्टिंग सिखाते हैं। उनसे भी मिल कर पूछ लेते हैं।

भैया बोले-अरे भाई राजेश खन्ना अभी सुपर स्टार हैं। एक एक दिन में कई शिफ्ट शूटिंग करते हैं। उनके पास सांस लेने की फुरसत नहीं एक्टिंग पढ़ाने का समय वे कहां से निकाल पाते होंगे।

वह युवक बोला- फिर भी चाचा जी एक बार राजेश खन्ना जी से मिल कर जानकारी ले लेते हैं मुझे भी तसल्ली हो जायेगी।

 भैया ने कहा-ठीक है, होटल चल कर राजेश खन्ना के यहां फोन कर लेते हैं अगर वे मिलने का समय देते हैं तो मिल लेते हैं।

होटल अरोमा लौट कर राजेश खन्ना के घर आशीर्वाद में मैने ही फोन लगाया। उधर से किसी ने हलो कहा तो मैंने अपना परिचय देते हुए उनसे राजेश खन्ना जी से मिलने की इच्छा व्यक्त की। हम कोलकाता से हैं पत्रकार हैं यह सुन कर दूसरे सिरे से फोन उठाने वाले ने कहा-जल्दी आ जाइए, काका (राजेश खन्ना को उनके करीबी प्यार से इसी नाम से पुकारते थे) फिल्म रोटी की शूटिंग के लिए चांदीवली आउटडोर स्टूडियों के लिए निकलने वाले हैं।

 हम लोगों ने तुरत नीचे जाकर एक टैक्सी पकड़ी और कुछ समय बाद हम लोग बांद्रा के कार्टर रोड पर स्थित राजेश खन्ना के बंगले आर्शीवाद के सामने खड़े थे। बंगला बहुत ही आलीशान था लेकिन उसके सामने का दृश्य उतना ही बुरा। समुद्र का एक कोना उधर निकल गया था जिसमें सड़ती जलकुंभी की गंध नथुने फाड़ रही थी।यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि यह बात 70 के दशक के प्रारंभ की है। अब तो आशीर्वाद बंगला बिक चुका है उसका कोई अस्तित्व नहीं है।

 हमने बंगले के दरवाजे के पास जाकर देखा कि वहां छह-सात रंगबाज टाइप के लड़के खड़े सिगरेट फूंक रहे थे। हम दरवाजे की ओर बढ़े तो वे हमारे सामने खड़े होकर तन गये और पूछा-कहां, हमने कहा –राजेश खन्ना से मिलना है। वे बोले-दिन भर बहुत लोग आते हैं तो क्या किसी को भी अंदर जाने की इजाजत दे दी जाये। आप हैं कौन?

हम परेशान हो रहे थे क्योंकि हमें बताया गया था कि राजेश खन्ना आउटडोर के लिए निकलने वाले हैं। वे लोग हमें भीतर जाने से रोकने के लिए कटिबद्ध थे और हमें हर हाल में भीतर जाना था।

 अब मैं थोड़ी ऊंची आवाज में बोला-भाई हम लोग कोलकाता से आये हैं। राजेश खन्ना के आफिस से बात हो गयी है। उनके बुलाने पर ही यहां आये हैं।

 मेरा इतना बोलना काम आ गया। आशीर्वाद का दरवाजा खुला और उससे एक छरहरे बदन का गोरा-चिट्टा युवक निकला। उसने निकलते ही कहा-कोलकाता से कौन आये हैं।

 मैंने जवाब दिया-हम लोग आये हैं पर यह लोग ना जाने क्यों हमें रोक रहे हैं।

वह युवक बोला-आप आइए।

अब वे युवक एक ओर हट गये और हम आशीर्वाद बंगले में प्रवेश कर गये। जो युवक हमें अंदर ले गया उसने अपना परिचय राजेश खन्ना के सचिव प्रशांत के रूप में दिया। वह भी बंगाल से था। उसे यह जान कर हर्ष हुआ कि हम भी उसके प्रांत बंगाल से हैं। उसने बताया कि वह है तो बंगाली पर उसे बांगला नहीं आती। बंगाल से जब मां की बांग्ला में लिखी चिट्ठी आती है तो उसे पढ़वाने के लिए वह निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत के पास जाता है।

 अभी हम लोगों की बात चल ही रही थी कि ऊपर से राजेश खन्ना के संबंधी के.के तलवार जी आये। वे अपनी गोद में राजेश खन्ना और डिंपल की नन्हीं-मुन्नी बेटी ट्वीकंल को लिये हुए थे। उन्होंने प्रशांत से पूछा- काका से मिलने कौन आये हैं।

प्रशांत ने हम लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा-ये लोग कोलकाता से आये हैं। पत्रकार हैं काका से मिलना चाहते हैं।

इस पर के.के.तलवार हमसे मुखातिब हुए और बोले-आप लोग चांदीवली आउटडोर स्टूडियो पहुंचिए थोड़ी देर में हम और काका भी वहीं पहुच रहे हैं। आज काका और मुमताज की फिल्म रोटी के एक गाने की शूटिंग है।

 हम लोग तलवार साहब और प्रशांत से नमस्ते कर बाहर निकल आये और हमने अंधेरी ईस्ट में स्थित चांदीवली आउटडोर स्टूडियो के लिए टैक्सी पकड़ ली। काफी देर के बाद हम चांदीवली स्टूडियो पहुंच गये। चारों ओर पहाड़ियों से घिरी यह जगह बहुत अच्छी लग रही थी। कहीं देखा छोटा-सा गांव बसाया गया है। गोबर से लिपे घर-आंगन, सामने तुलसी का चौरा। इसे जब फिल्म में देखेंगे तो यह गांव के घर की तरह ही लगेगा। बगल में गांव के स्कूल का सेट। इन सब से पार होते हुए हम आखिरकार उस जगह पहुंच ही गये जहां फिल्म रोटी की शूटिंग होनी थी। मई का महीना था बहुत गर्मी और तीखी धूप थी। इसके बीच वहां काफी गहमागहमी थी। कैमरामैन, यूनिट के स्टाफ सभी काम में व्यस्त थे। तभी हमें तलवार साहब दिख गये। उनसे नमस्ते किया तो उन्होंने कहा-शूटिंग में थोड़ी देर है आइए तब तक आपको कैंटीन में चाय पिलाते हैं।

  तलवार हमें वहां ले गये।हम लोग बैठ गये। चाय आ गयी और चाय की चुस्कियों के बीच राजेश खन्ना के रिश्तेदार तलवार साहब ने कहा-काका की एक फिल्म आपकी कसम आ रही है .यह सुपर-डुपर हिट होगी। बहुत अच्छे गाने हैं फिर वे टेबल पीट-पीट कर उस फिल्म के गीत गाने लगे। टाइटिल सांग-जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं, करवटें बदलते रहे, जय जय शिवशंकर।

 चाय

फिल्म 'रोटी' का वही गीत दृश्य

खत्म हो गयी हम लोग उस लोकेशन पर वापस आ गये जहां शूटिंग होनी थी। वहां देखा सामने एक हरा-भरा मैदान था पेड़ों से घिरा हुआ। उस मैदान के सामने की ओर ढलान थी जो कंकड़ों से भरी थी। हमने देखा कुछ लोग एक रिकार्ड प्लेयर में फिल्म का गाना गोरे रंग पे ना इतना गुमान कर गोरा रंग दो दिन में ढल जायेगा बजा रहे हैं। इसी गाने की शूटिंग होनी थी। बगल में एक छोटा-सा पोखरा था। हम बता चुके हैं कि मई का महीना था, तीखी धूम थी बहुत गर्मी थी। यहां बारिश में भीगते हुए राजेश खन्ना और मुमताज पर दृश्य फिल्माया जाना था। थोड़ी देर में डाइरेक्टर चिल्लाया फाग मारो हमने देखा एक आदमी जो उस तरह का छोटा सा हैंड हेल्ड स्टोव लिए था जिसे पकड़ कर स्वर्णकार गहनों की झलाई करते हैं। उसने उसमें कोई केमिकल डाला और चारों ओर धुआं ही धुआं फैल गया। ऐसा लग रहा था कि हम किसी पहाडी धुंध के बीच हैं। दरअसल यह चांदीवली स्टूडियों के उस कोने को कश्मीर का हिस्सा बनाने की कोशिश हो रही थी। दूसरी ओर से आवाज आयी बारिश। देखा दूर पोखरे में पंपिंग सेट लगा था और उसका पाइप पकड़े  एक व्यक्ति पास के पेड़ पर चढ़ा था उसने नीचे खड़े राजेश खन्ना पर पानी डाला तो वे चिल्लाये-अरे यार जला डाला। वे एक ओर हट गये और अपना सिर पोछने लगे। हुआ यह था कि तीखी धूप में पोखरे का पानी काफी गरम हो चुका था। किसी ने सलाह दी कि पांपिंग सेट चला कर इस छोटे पोखरे का कुछ पानी निकाल दो। लगभग आधे घंटे बाद जब बारिश की गयी तो वह पानी बरदाश्त करने लायक हो गया था। हमें बताया गया कि दृश्य कुछ इस प्रकार है कि राजेश खन्ना गाते हुए आते हैं और कान में हाथ टिकाये कूल्हे ऊपर किये मुमताज की नब्ज चेक करने की कोशिश सी करते हैं और फिर उसके कूल्हे पर लात मारते हैं और मुमताज कंकड भरी जमीन पर दूर तक लुढ़कती जाती है। सीन ठीक ही था लेकिन डांस डाइरेक्टर ने ओके नहीं किया। ऐसी ही क्रिया कई बार दोहरायी गयी और सीन ओके नहीं हुआ तो मुमताज फनफनाती हुई डांस डाइरेक्टर के पास आयीं और गुस्से से तमतमाते गुए बोलीं-तेरी ऐसी की तैसी, इन कंकड़ों से मेरा कचूमर निकला जा रहा है और तुम्हारा डांस ओके नहीं हो रहा।

  इतना सुनते ही के के तलवार ने अपने एक असिस्टेंट से कहा-अरे यार जाओ काका को समझाओ मैडम से बदला किसी और की फिल्म में ले लेगा मुझे ही डुबायेगा क्या। मेरी फिल्म पूरी है  सिर्फ यही गाने का पैच वर्क बाकी है। मुमताज मैडम इन दिनों इतना बिजी हैं कि यह सीन आज ओके नहीं हुआ तो उनकी डेट पाना मुश्किल हो जायेगा मेरी फिल्म अटक जायेगी।

 असिस्टेंट ने जाकर काका के कान में कुछ कहा और उधर डांस डाइरेक्टर ने मुमताज मैडम से केवल एक मौका और देने का आग्रह किया और वह मान गयीं। सीन ओके हो गया।

 हमने तलवार साहब से पूछा गलती क्या हो रही थी। वे बोले-हर सीन की ळूटिंग के वक्त कलाकार के शूटिंग एरिया में एंटर करने और सीन खत्म होने पर एक्जिट करने की दिशा तय होती है। काका गलत दिशा से एक्जिट कर रहा था।

 हमने पूछा-आपने अपने असिस्टेंट से कहा कि काका को कहो किसी और फिल्म में मैडम से बदला ले लेगा। यह क्या घटना है।

वे बोले किसी फिल्म की शूटिंग में मुमताज मैडम ने काका को ऐसा तमाचा जड़ा था जिसके निशान कई दिनों तक बने रहे। उसी का बदला।

 शूटिंग से निकल कर राजेश खन्ना हम लोगों की ओर आये और पूछा-हां बताइए आपको क्या जानना है।

 हमने एक्टिंग स्कूल का विज्ञापन दिखाते हुए पूछा-इस्टीट्यूट यह दावा करता है कि आप वहां अभिनय का प्रशिक्षण देते हैं।

 हमारा प्रश्न सुनकर राजेश खन्ना मुसकराये और बोले-चार-चार शिफ्ट शूटिंग कर रहा हूं दम लेने की फुरसत नहीं। मेरे पास टाइम कहां कि मैं किसी इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षण दूं। मैं तो इस इंस्टीट्यूट का नाम पहली बार आपसे सुन रहा हूं।

 हम बात कर ही रहे थे कि तभी पांच-छह युवतियां आयीं और वहां खड़ी राजेश खन्ना की कार को चूमने लगीं।

 रहा नहीं गया तो राजेश खन्ना से पूछा-आपको यह अच्छा लगता है।

 राजेश खन्ना बोले-बिल्कुल नहीं लेकिन मैं इन्हें मना भी नहीं कर सकता, मेरे प्रशंसक कम हो जायेंगे। इन्हें यह करना अच्छा लगता है, इन्हें आनंद मिलता है करने दीजिए ना। मेरा क्या जाता है।

हमने राजेश खन्ना के सामने ही अपने साथ आये युवक से कहा कि –भाई सुन लिया राजेश खन्ना कह रहे हैं कि उन्होंने उस इंस्टीट्यूट का नाम ही नहीं सुना जो दावा करता है कि ये वहां एक्टिंग सिखाते हैं।

 हम लोग होटल अरोमा वापस लौट आये।

दूसरे दिन हम लोग फिर स्टूडियो गये। याद नहीं आ रहा वह शायद रूपतारा  था या श्री साउंड। वहां एक सेट पर मोहन सहगल की फिल्म वो मैं नहीं की शूटिंग चल रही थी। वहां अभिनेता राकेश पांडेय से भेंट हुई। उनसे काफी देर तक बातें होती रहीं। तभी वहां एक अधेड व्यक्ति ने प्रवेश किया। वह कुर्ता पहने थे और बंगल में झोला लटकाये थे। मैंने पूछा-यह कौन। राकेश पांडेय कुछ बोलें इससे पहले वहां बैठी एक युवती ने कहा-मुशी जी हैं। मैं समझ नहीं पाया और राकेश पांडेय का मुंह ताकने लगा वे बोले-यह डायलाग डाइरेक्टर हैं संवाद संकेतक। कोई कलाकार सही ढंग से संवाद नहीं बोल पाता तो यह सही उच्चारण करवाते हैं।

 तभी देखा सामने एक पलंग में युवती लेटी है। सामने से एक सहायक अभिनेता आता है उसके आते ही कैमरामैन लाइटमैन सभी सतर्क हो जाते हैं। कैमरा रोल करता है वह युवती किसी का नाम लेती है इस पर वह सहायक अभिनेता चिल्लाता है-यह किस मनहूस का नाम ले लिया टुमने। सीन कट होता है तो मुंशी जी यानी संवाद संकेतक उस आर्टिस्ट को समझाते हैं-भाई टुमने नहीं तुमने। वह बार-बार टुमने ही कहता रहता है।

 मैंने राकेश पांडेय से पूछा-अब क्या होगा।वे बोले –बाद में डब कर लिया जायेगा।

स्टूडियो में अभिनेता चंद्रशेखर (वही चंद्रशेखर जिन्होंने रामानंद सागर के प्रसिद्ध सीरियल में भूमिका की थी) मिल गये जो मेरे भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म के घनिष्ठ मित्र रहे हैं। भैया के साथ मैं पहले उनसे मिल चुका था इसलिए पहचानते थे। वे मेकअप कर रहे थे। वे जिस तरह के ब्रश से दीवाल रंगी जाती है उसी तरह के ब्रश से अपने गालों का मेकअप कर रहे थे।

                                      अभिनेता चंद्रशेखर

उन्होंने कहा-देखना अभी मेरा चेहरा चमकने लगेगा। हीरोइनें इसी तरह अपने चेहरे को कश्मीरी सेब की तरह सुंदर बना लेती हैं। रीत के इसे उतारने में बहुत कष्ट होता है।

   किसी से सुना कि पास के एक कमरे में फिल्म वो मैं नहीं की हीरोइन रेखा मेकअप कर रही हैं। मैं अपनी पुस्तक फिल्मी सितारे उन्हें भेंट करना चाहता था। यह अच्छा अवसर था। मैंने देखा मेकअप रूम का दरवाजा आधा खुला है। एक लड़का कोल्ड ड्रिंक लेकर अंदर घुसा। मैं भी धीरे से उसके पीछे हो लिया। रेखा मेकअप के बाद कपड़े पहन रही थीं। पास ही उनकी हेयर ड्रेसर थी  वह बोली-क्या लेना। मैंने कहा-लेना नहीं देना।

 तब तक रेखा आगे आयीं। मुझसे हाथ मिलाया और बोलीं-बताइए क्या बात है।

मैंने अपनी पुस्तक फिल्मी सितारे उन्हें देते हुए  कहा-इसमें आप भी हैं। रेखा से मुलाकात के बाद मैं बाहर आया।

बाहर आया तो भैया बोले जिस फिल्म की शूटिंग चल रही है उसके निर्देशक मोहन सहगल मुझे पहचानते हैं चलो उनसे भी मिल लेते हैं।

  हम लोग बाहर आये तो देखा खाना खा कर मोहन सहगल चावल भरे हाथ धोने जा रहे हैं। भैया को देख उन्होंने हाथ उठा कर ठहरने को कहा। हाथ धोकर आये तो भैया से बोले- बोलिए त्रिपाठी जी।

भैया ने साथ आये युवक की अभिनय की अभिलाषा की बात बतायी और एक्टिंग इंस्टीट्यूट का जिक्र किया।

मोहन सहगल बोले-अगर ये सचमुच अभिनय के क्षेत्र में आना चाहते हैं तो मैं इधर-उधर खुले ढेरों इंस्टीट्यूटों में जाने को मना करूंगा। ये पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट में जाना चाहें तो मैं पत्र लिख दूंगा इनका एडमीशन हो जायेगा। यही सही तरीका है। नवीन निश्चल जब मेरे पास फिल्मों में मौका देने का आग्रह लेकर आया तो मैंने पहले उसे फिल्म इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षण लेने को कहा। प्रशिक्षण पूरा कर के लौटने के बाद मैंने ही उसे चांस दिया। मेरी जिस फिल्म का सेट यहां लगा है वो मैं नहीं उसका हीरो वही है।

 मोहन सहगल जी को नमस्कार कर हम लोग वापस होटल अरोमा लौट आये। ये सारे प्रसंग इस आत्मकथा में जोड़ने का तात्पर्य यही है कि यह मेरे सामने हुआ और इसका तात्पर्य यह भी है कि फिल्मों में जाने  के दीवानों को वहां की असलियत बतायी जाये ताकि वे ठगे जाने और जिंदगी भर पछाताने से बच जायें।

 हमने देखा हमारे साथ गये उस युवक की आंखें खुल गयी हैं। वह मेरे भैया से बोला-चाचा जी देख ली यह दुनिया। आपने सही कहा था कि आर्क लैंप के चकाचौंध के पीछे बहुत ही गहरा डराने वाला अंधेरा है। ऐसा करते हैं दो-एक दिन मुंबई घूम लेते हैं फिर कोलकाता लौट चलते हैं। अच्छा हुआ आपने मेरा सच से साक्षात्कार करा दिया। (क्रमश:)