Monday, January 24, 2022

जब कालेज में भैया अमरनाथ जी को सांप ने काट लिया

 आत्मकथा

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

भाग-24

बबेरू में मेरी शिक्षा सुचारु रूप से चल रही थी। मैं अपने प्यारे शिक्षक रामविलास तिवारी जी के अचानक इस्तीफा देकर वापस जाने का दुख अब तक नहीं भूल पाया था। हमारे नवीं कक्षा में आते-आते हमारे विद्यालय की नयी ब्लिडिंग बबेरू की चौगलिया या बबेरू चौराहा के पास हमारे कालेज की नयी बिल्डिंग बन चुकी थी। अब यह कालेज काफी विकसित हो गया है लेकिन जब हम लोग थे तब तक तीन ब्लिडिंगे ही बनी थीं। एक सबसे बड़ी जिसमें ग्यारह और बारह की कक्षाएं चलती थीं  और उसी में प्रिंसिपल का कार्यालय और शिक्षकों का विश्राम करने का कमरा, लाइब्रेरी और कार्यालय था। एक छोटी बिल्डिंग में प्रयोगशाला थी जहां हम लोग रसायन विज्ञान और जुलोजी के प्रयोग आदि किया करते थे। कालेज के हर कक्ष में ध्वनि विस्तारक यंत्र लगा था जिसका नियंत्रण प्रिंसिपल के कक्षा से होता था। प्रिंसिपल बराबर हर क्लास की ध्वनि निरंतर सुन सकते थे। जिस कक्षा में ज्यादा शोर होता उसका नंबर उनके कक्ष के डिस्प्ले पैनल में उसका नंबर उठ जाता था। प्रिंसिपल तुरत उसका स्विच आन कर जान लेते कि शोर क्यों चल रहा है।  हम लोग भी उसी तरह शरारती थे जैसे हर कालेज के लड़के होते हैं। हमने भी अपने अध्यापकों के नये नये नाम रख रखे थे। जैसे दुर्गादयाल तिवारी हमारे अध्यापक थे उनका हमने अंग्रेजी में शार्ट में नाम डीडीटी रख लिया था। जहां तक याद आता है एक शिक्षक थे ओपी गुप्ता। बहुत लंबी-लंबी टांगे थीं उनकी। उनका तकिया कलाम था डोंट टाक। वे कक्षा में जब घुसते तो भले ही वहां सन्नाट हो वे यह चिल्लाना नहीं भूलते डोंट टाक। एक बार ऐसा हुआ कि दुर्गादयाल तिवारी जी का क्लास था वे आये नहीं थे तो बुंदेलखंड के लड़के क्यों चूकते मचाने लगे हुड़दंग। जोर-जोर से चिल्लाने लगे और वाज प्रिंसिपल ज्वाला प्रसाद शर्मा जी के कक्ष में सुनाई दी और डिस्पले पैनल में हमारी कक्षा का नंबर उठ गया। छोटे कद पर बड़े दिमाग के हमारे प्रिंसिपल ज्वाला प्रसाद शर्मा जी हमारे कक्ष के सामने आये और पूछले लगे किसका पीरियड है संयोग से मैं ही सामने था मेरे मुंह से निकल गया सर डीडीटी सर का। प्रिंसिपल साहब चौंके किसका मुझे अपनी गलती समझ आ गयी मैंने तुरत सुधारा-सर दुर्गादयाल तिवारी जी का।

 प्रिंसिपल साहब वापस चले गये और उन्होंने अपने कक्ष से शिक्षकों के विश्राम कक्ष का नंबर आन कर कहा-अगर दुर्गादयाल तिवारी जी वहां हैं तो जल्द अपना क्लास ज्वाइन करें वहां बहुत शोरगुल हो रहा है।

 कुछ देर में ही दुर्गादयाल तिवारी जी हमारी कक्षा में आ गये और आते ही बोले-गजब कर रहे हैं आप लोग, हम लोगों को पल भर विश्राम भी नहीं करने दोगे। आप लोगों के शोर से मुझे प्रिंसिपल साहब की झिड़की सुननी पड़ी।

कालेज की एक बड़ी फील्ड थी जहां खेल कूद होते थे। एक बार वहीं हाकी के खेल के दौरान हाकी लग कर मेरा होंठ फट गया था। वहां प्रयोगशला के सामने के मैदान में हम लोग पोल वाल्ट का अभ्यास किया करते थे। यहां हमारे गांव के बी एल यादव भी हमारे सहपाठी थे जो अब जज के पद से सेवानिवृत होकर जनपद बांदा में रहते हैं।

 अपने कालेज से ही मैंने एसीसी का सार्टिफिकेट प्राप्त की थी। इसी कालेज से मैंने नेशनल फिजिकल एफिसिएंसी के उत्तर प्रदेश शाखा की शारीरिक दक्षता परीक्षा पास कर थ्री स्टार जीते थे। यह परीक्षा मैंने अपने कालेज की ही फील्ड से जीती थी। जहां तक याद आ रहा है इसमें सौ मीटर की दौड़, चार सौ मीटर की दौड़, पोल वाल्ट, लांग जंप, हाई जंप, जैबलन थ्रो, आठ सौ मीटर की दौड़ आदि में टाप आना था। सारी प्रतियोगिताएं तो मैंने सफलता से पूरी की बस आठ सौ मीटर की आखिरी लैप में मेरा दम फूलने लगा था। मेरी यह स्थिति देख कर हमारे शिक्षक इनायत हुसैन खान चिल्लाये –रूमाल निकाल कर मुंह में रखो दम फूलना बंद हो जायेगा। मैंने वैसा ही किया और जब लैप पूरा हुआ तो सामने खान साहब ही थे जिन्होंने अगर मुझे बांहों में ना थाम लिया होता तो मैं गिर ही जाता। उन्होंने मुझे छाती से लगा लिया और बोले-तुमने कालेज का मान रख लिया। तुम जीत गये थ्री स्टार।

मुझे बाद में पता चला कि नेशनल फिजिकल एफिसिएंसी सरकारी संस्था थी जिसका मैं थ्री स्टार विनर बन चुका था।

यहां चह बताता चलूं कि तब तक हमारे भैया अमरनाथ द्विवेदी इलाहाबाद से अपनी पढ़ाई पूरी कर वापस आ गये थे। खुशी की बात यह थी कि वे जुलोजी और बाटनी के लेक्चरर के रूप में हमारा इंटर कालेज बबेरू ज्वाइन कर चुके थे। कुछ अरसे में ही वे हमारे प्रिंसिपल ज्वाला प्रसाद शर्मा जी के बहुत ही प्यारे बन गये थे। शर्मा जी एक पुत्री भर थी कोई पुत्र नहीं था। अगर यह कहें कि वे भैया अमरनाथ जी से पुत्रवत स्नेह करते थे तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे उनके लिए मुश्किल आसान भी थे। हम लोग विज्ञान विभाग में थे। कालेज में एक कक्ष ऐसा था जो सीढ़ीदार था। पीछे से ऊंची सीढ़िया क्रमश: नीची होते हुए सामने की ओर आती थीं। सामने एक स्टेज जैसा था जिस पर खड़े होकर शिक्षक साइंस का कोई प्रयोग दिखाते थे जो पीछे की पंक्ति में बैठे छात्र तक को साफ-साफ दिखाई देता था। एक बार हमारे शिक्षक ने प्रिंसिपल साहब से अनुरोध किया कि वे बारहवीं कक्षा के छात्रों को एक घंटे के लिए किसी और कक्षा में बैठा दें तो वे अपनी कक्षा के छात्रों को सीढ़ी वाले क्लास में विज्ञान का प्रयोग दिखा सकें। प्रिंसिपल से लेकर कई अध्यापकों ने तक ने जोर लगा कर देख लिया लेकिन बारहवीं के लड़के एक घंटे के लिए भी क्लास छोड़ने को तैयार नहीं थे। विरोध का नेतृत्व एक ठाकुर का लड़का कर रहा था। जब सभी हार गये तो प्रिंसिपल साहब ने एक शिक्षक से कहा -द्विवेदी को बुलाओ, द्विवेदी अर्थात हमारे भैया अमरनाथ जी।

हमारे गांव जुगरेहली में भैया अमरनाथ (लाल स्वेटर में दायें) , बीच में  मैं और बायें हमारे सहपाठी बी एल यादव (सेवनिवृत जज)
 अमरनाथ जी को बुलाया गया। वे आते ही बोले- कौन है बे जो क्लास खाली नहीं करना चाहता।

 उस ठाकुर लड़के ने बड़े गुरूर से कहा- जी मैंने।

भैया अमरनाथ ने आव देखा ना ताव झन्नाटेदार तमाचा उसके गाल पर जड़ते हुए बोला-अभी इसी वक्त एक घंटे के लिए क्लास खाली करो नहीं तो कल से कालेज में भी घुसने नहीं दिया जायेगा।

उस लड़के को इस तरह के जवाब की स्वप्न में भी उम्मीद नहीं थी। कुछ मिनट में ही बारहवीं की क्लास खाली हो गयी और हमारी विज्ञान प्रयोग की क्लास वहीं लगी।

भैया अमरनाथ जी का जिक्र आया है तो फिर उनकी हिम्मत की भी बात करते चलते हैं। कालेज में नयी ब्लिडिंग बनाने के लिए ईंटें रखी थीं। बरसात का महीना था। एक बार लड़कों ने ईंट के ऊंचे ढेर के नीचे एक सांप को झाकते देखा और दौड़ कर भैया अमरनाथ को यह खबर दी। और क्लोराफार्म और एक जार लेकर दौड़े-दौड़े आये और यह सोच कर कि बच्चों को पढ़ाने के लिए अच्छा स्पेसिमेन मिल जायेगा सांप को पकड़ने की कोशिश करने लगे। इसी दौरान सांप ने उन्हें काट लिया। उन्होंने लड़कों से कहा-इस पर क्लोरोफार्म डाल कर इसे बेहोश करो और किसी तरह से जार में रखो मुझे इसने काट लिया है मैं सरकारी अस्पताल इंजेक्शन लेने जा रहा हूं। वे दौड़े-दौड़े अस्पता गये जो कालेज से तकरीबन आधा मील दूर था।

 अस्पताल में पहुंचते ही उन्होंने एक डाक्टर से कहा- मुझे जल्दी एंटी स्नेक वेनम इंजेक्शन लगाइए सांप ने काट लिया है।

 एक सांप काटे व्यक्ति को इस तरह निर्भीकता से बोलते देख डाक्टर हक्का-बक्का रह गये।

इस पर भैया अमरनाथ ने डांटा-यार इंजेक्शन लगाओ मार डालोगे क्या, सांप ने मुझे काटा है तुम्हें नहीं।

 डाक्टरों ने तुरत उन्हें इंजेक्शन लगाया और तकरीबन आधा घंटा बैठा कर रखा।

 जब तक भैया अमरनाथ सकुशल कैलेज नहीं लौट आये मैं बहुत घबराया हुआ था। मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि –हे प्रभु मेरे भैया की रक्षा करना।

 भैया सकुशल वापस आये और अस्पताल का हाल बताया- अरे यार सांप ने मुझे काटा और यह सुनते ही डाक्टरों के हाथ-पांव फूल गये। मैं डांटता नहीं तो शायद वे हिम्मत ही नहीं कर पाते।

 जब वे वापस आये उन्हें काटनेवाला सांप स्पेसिमेन बन कर जार में स्थापित हो अपनी जान गंवा चुका था।

 यहां एक बार और बताता चलूं कि कालेज में मेरे अभिभावक थे भैया अमरनाथ जी। अब जब मेरे अपने सभी अभिभावक नहीं रहे तो गांव में अपना अभिभावक कहा जानेवाला कोई रह गया है तो सिर्फ और सिर्फ भैया अमरनाथ। (क्रमश:)

 

 

Thursday, January 13, 2022

हमारे प्रिंसिपल ज्वाला प्रसाद शर्मा अनुशासन प्रिय और योग्य प्रशासक थे

 आत्मकथा

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

भाग-23

बबेरू में हमारी शिक्षा सुचारु रूप से चल रही थी। सारे शिक्षक बहुत ही अच्छे थे और बहुत मददगार। हम भले ऊब जायें वे हमें ज्यादा से ज्यादा पढ़ाने समझाने से कभी नहीं ऊबते थे। वे विषय को इस तरह समझाते थे कि पूरी तरह से छात्रों की समझ में आ जाये। वे यह निश्चय करना नहीं भूलते थे कि उनका पढ़ाया विषय सबकी समझ में आया या नहीं। उनमें हमारे संस्कृत के अध्यापक आचार्य प्रभाकर द्विवेदी, अंग्रेजी के अध्यापक इनायत हुसैन खान के पढ़ाने का ढंग बहुत ही प्रभावी और बोधगम्य था। खान साहब अंग्रेजी में पद्य या गद्य जो भी पढ़ाते उसे रटाते नहीं थे। वे पढ़ाते समय कहते कि जो भाग मैंने पढ़ाया उसमें से किस शब्द का अर्थ नहीं आता वह में बता दूंगा पर इस पूरे पैसेज का अर्थ तुम्हें खुद निकालना है। जब अर्थ तुम रटने के बजाय उसे खुद निकाल लोगे तो फिर वह कभी नहीं भूलेगा। अगर रट्टू तोते बन जाओगे तो जहां गाड़ी अटक गई फिर उसके आगे नहीं बढ़ पायेगी।

  हमारे प्रिंसिपल ज्वाला प्रसाद शर्मा जी छोटे कद के पर बड़े बुद्धिमान प्रशासक थे।वे अंग्रेजों जैसा गोला हैट लगाते थे। वे आगरा से आये थे कृषि टीचर के रूप में और उन्होंने विद्यालय को नये ढंग से सजाया, संवारा और अपनी काबिलियत पर कुछ अरसे में ही प्रिंसिपल बन गये। वे अपने विद्यालय के एक-एक छात्र से बहुत प्रेम करते थे लेकिन अनुशासन विरुद्ध काम करने पर वह बहुत नाराज होते थे। बबेरू तब एक छोटा सा कस्बा था। इलाके के लिए वह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि वहां तहसील, सरकारी अस्पताल और थाना था।

 अक्सर दोपहर में जब टिफिन की छुट्टी होती तो आसपास के गांवों से आनेवाले छात्र अपनी साइकिल उठा कस्बे के अंदर चल पड़ते। प्रिंसिपल ज्वाला प्रसाद शर्मा जी की खूबी यह थी कि वे एक-एक बच्चे का चेहरा पहचानते थे। यहां तक कि कोलकाता में कुछ साल गुजारने के बाद जब मैं गांव लौटा और अपने बड़े भैया के साथ बबेरू अपने कालेज गया तो भैया ने ज्वाला प्रसाद शर्मा जी से पूछा-इसे पहचानते हैं शर्मा जी। शर्मा जी ने उत्तर दिया-हां यह हमारा अच्छा छात्र रामहित है।

 कालेज की ओर से छात्रों को साइकिल पर डबल लेने की मनाही थी। अगर कोई डबल लिये पाया जाता तो उसका नाम लिख लिया जाता था और 20 रुपये का फाइन उसकी फीस में जोड़ दिया जाता था। छात्र अपनी गलती के लिए लगा फाइन चुपचाप दे देते। कभी किसी ने उनके इस निर्णय का विरोध नहीं किया।

ज्वाला प्रसाद शर्मा जी
 सभी छात्र ज्वाला प्रसाद शर्मा जी का बड़ा आदर करते थे। एक बार की बात है शर्मा जी ने कस्बे के अंदर एक छात्र को साइकिल पर अपने साथ एक साथी को डबल लिये जाते देखा। उन्होंने उसे तुरत उतरने को कहा। वह उतर गया तो उसका नाम और रोल नंबर जानने के बाद उसके कान ऐंठने चाहे। छात्र कद में बहुत लंबा था और शर्मा जी नाटे कद के । जब बहुत कोशिश करने के बाद भी शर्मा जी के हाथ उसके कान तक नहीं पहुंचे तो वह लड़का खुद झुक गया। इतना मानते थे छात्र हमारे प्यारे प्रिंसिपल शर्मा जी को।

बबेरू जहां कोई शिक्षण संस्था नहीं थी वहां पहले हाई स्कूल और फिर इंटर कालेज देने का श्रेय़ ज्वाला प्रसाद शर्मा जी को ही जाता है। बबेरू में मढ़ीदाई के मंदिर के पास के दो टीलों में जब छात्र नहीं समाने लगे और हाई स्कूल से कक्षा बारह तक बढ़ाने की बारी आयी तो शर्मा जी ने बबेरू चौराहे और नहर के पास एक बड़े भूखंड में इंटर कालेज बबेरू इमारतें खड़ी करवाईं। यहां एक बड़ा खेल का मैदान भी था और विज्ञान के लिए प्रयोगशाला भी। अब तो यह और विस्तृत हो गया है। यहां नहर किनारे एक खेत भी था जिसमें छात्र धान की खेती करते थे और उससे जो धान उपजता था उसे बेच कर मिठाई खरीद कर छात्रों को बांटी जाती थी। नये बने इंटर कालेज का नाम शर्मा जी को सम्मान देते हुए उनके ही नाम पर श्री जे.जी. शर्मा इंटर कालेज बबेरू रखा गया है।



हम लोग आठवीं कक्षा तक मढ़ीदाई मंदिर के पास के टीलों में ही रहे। वहां हमें दो खेत मिले थे जहां हम लोग टमाटर, पत्ता गोभी और फूल गोभी आदि उगाते थे। उन खेतों के पास ही एक कुंआ था। उससे सटा हमारे प्रिंसिपल शर्मा जी का घर था जहां वह अपनी पत्नी और बेटी के साथ रहते थे। शर्मा जी की पत्नी जिन्हें हम लोग माता जी कहते थे हम लोगों को बहुत मानती थीं।

 वहां खेत में जब हम लोग पानी देते तो मेरे साथ मेरे सहपाठी गुलाब सिंह कभी पानी खींचते और मैं क्यारियों में पानी देता था तो हम लोग एक चालाकी करते थे। गुलाब सिंह पानी डाल कर पका टमाटर नाली में डाल देते और कहते आये राम यह कोड वर्ड था यानी टमाटार आ रहा है पा लो। मैं टमाटर मुंह में रख कर गप्प कर जाता। फिर मेरी पानी खींचने की बारी आती तो मैं भी पानी डाल कर पका टमाटर नाली में डाल कर चिल्लाता आये राम और गुलाब सिंह टमाटर गप्प कर जाते। एक दिन गजब हो गया, अभी मैंने टमाटर मुंह में डाला ही था कि हमारे क्लास टीचर वहां आ गये। वे शायद देखने आये थे कि हम काम ठीक से कर रहे हैं कि नहीं। अब करें तो क्या करें। मैंने तत्काल कान में जनेऊ चढ़ाया और दीवाल की ओट में जाकर लघुशंका करने का बहाना करने लगा। जब मुझे आभास हुआ कि क्लास टीचर मेरे सहपाठी गुलाब सिंह से पूछताछ कर वापस लौट गये हैं तो मैं भी झूठी लघुशंका पूरी कर चुका था। उस दिन हमने शपथ ली अब टमाटर खाना बंद। यह टमाटर, गोभी व अन्य सब्जियां संक्रांति के दिन इकट्ठी की जातीं और सारे विद्यार्थियों में बांट दी जाती थीं।

 हमारे विद्यालय में एक टीचर रामबिलास तिवारी लखीमपुर खीरी से आये थे। वे गौर वर्ण, मृदुभाषी थे। उनका गला थोड़ा रुंधा-सा रहता था यह उनके बात करने पर महसूस होता था। एक बार उन्होंने बात-बात में बताया कि वे बांदा में अपने मामा के यहां रह कर पढ़ाई करते थे। यह सुन कर मैंने कहा कि मेरे ममेरे भाई भी बांदा में ही अपने मामा के संग रह कर पढ़ाई करते थे।

 मेरे इतना कहते ही उन्होंने पूछा-तुम्हारे भाई का क्या नाम है?

मैंने बताया- उनका नाम रामखिलावन त्रिपाठी है।

नाम सुनते ही उनका चेहरा खिल गया। वे बोले- अरे तुम्हारे भैया तो हमारे सहपाठी थे।

मैंने खुश होते हुए कहा-सर मैं अपने भैया को पत्र में आपका जिक्र करूंगा।

 वे बोले रामहित तुम मुझको सर नहीं तिवारी जी कह कर बुला सकते हो।

मैंने भैया को लिखे पत्र में रामविलास तिवारी जी का जिक्र किया तो उन्होंने पत्र में लिखा-हां हम लोग साथ-साथ पढ़ते थे और यह भी सच है कि मैं अपने मामा के यहां रह कर पढ़ता था और वे अपने मामा के यहां रह कर।

 मैंने तिवारी जी को वह पत्र दिखाया तो वे बोले-एकदम सही इनकी राइटिंग भी मेरी जानी-पहचानी है।

 रामबिलास तिवारी जी बहुत संकोची स्वभाव के थे और बहुत कम बोलते थे। वे अक्सर हम लोगों से कहा करते थे वही टीचर अपने छात्रों को पीटते हैं जो खुद अपने छात्र जीवन में अध्यापकों के हाथों पिट चुके होते हैं। मेरा तो यही विचार है कि अगर आपको अपनी बात समझाने-मनवाने के लिए बलप्रयोग करना पड़ता है तो आप सफल अध्यापक नहीं हैं।

 ऐसी बात हमने अब तक किसी भी अध्यापक से नहीं सुनी थी। लेकिन कहते हैं ना कि कब क्या हो जाये कोई कह नहीं सकता। तिवारी जी को यह बताये कि जो अध्यापक छात्र  जीवन में पिटते हैं वही छात्रों को पीटते हैं अभी पंद्रह दिन ही गुजरे थे कि एक दुर्घटना हो  गयी।

 हमारे साथ एक फेरन सिंह नामक छात्र था जो बड़ा ही हंसोड़ और मसखरा था। वह क्लास चलते समय भी बातचीत करता रहता था। एक दिन जब रामविलास तिवारी जी पढ़ा रहे थे फेरन सिंह अपने बगल में बैठे छात्र से जोर-जोर से बात कर रहे और बीच-बीच में ठहाका लगा रहा था। तिवारी जी ने कई बार उनको टोंका-फेरन सिंह शांत रहिए, मैं पढ़ा रहा हूं।

फेरन सिंह कई बार अनुरोध करने पर भी नहीं माना तो तिवारी जी को गुस्सा आ गया। उन्होंने उसे एक थप्पड़ मारा और वह बेहोश होकर गिर गया और कांपने लगा। पता नहीं उसे मिर्गी का रोग था या क्या। उसकी दशा देख कर तिवारी जी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं वे फेरन तक आये उसे पंखा झलने लगे और पुचकारते हुए बोले-बेटा मैं तुमको मारना नहीं चाहता था तुमने मुझे बाध्य किया। मैं जो स्वयं मारपीट का विरोधी हूं उसे वही करने को बाध्य होना पड़ा। तिवारी जी बिलख रहे थे। हमने फेरन के चेहरे पर पानी डाला थोडी देर में उसको होश आया गया और वह तिवारी जी को धमकी देने लगा। तिवारी जी बार-बार उससे माफी मांह रहे थे-बेटा गलती हुई मुझे माफ कर दो।

  हम लोगों ने फेरन को समझाया –गलती तुम्हारी थी तिवारी जी ने बार-बार मना किया। कक्षा में अच्छा नहीं लग रहा था तो बाहर चले जाते। तुम्हारे चलते दूसरे छात्रों का भी नुकसान हुआ।

 हमने देखा रामविलास तिवारी जी की आंखें अब भी नम थीं और चेहरा उतरा हुआ था।

  कक्षा समाप्त हुई तो रामविलास तिवारी जी ने मुझे उस कक्ष में बुलाया जहां अध्यापक विश्राम करते थे। मेरे वहां पहुंचते ही उनके दुख का बांध जैसे फूट पड़ा। उस वक्त वहां उनके और मेरे अलावा कोई नहीं था।

वे बिलख बिलख कर रोते हुए बोले-मुझे उसे मारने का दुख तो है ही इस बात का सबसे ज्यादा दुख है कि मैं जिस बात का उपदेश दे रहा था उसी के विपरीत काम करने को फेरन में मुझे बाध्य कर दिया।

 मैंने समझाया-तिवारी जी आपकी इसमें कोई गलती नहीं। उस लड़के ने बदमाशी की। लगता है उसके परिवार ने उसे यह नहीं सिखाया कि कहां कैसा व्यवहार करना चाहिए। आप अपने को क्यों अपराधी मानते हैं, अपराधी तो फेरन ही है। आप बेकार में मत सोचिए।

तिवारी जी बोले- नहीं नहीं अब मैं एक दिन भी यहां नहीं रहूंगा, मेरा मन उचट गया है।

दूसरे दिन जब हम विद्यालय पहुंचे तो पूरे स्कूल में इस बात का शोर था कि तिवारी जी इस्तीफा देकर चले गये हैं।

मेरे लिए तो यह बहुत दुख की बात थी कि जो रामविलास तिवारी जी मुझे बहुत मानने लगे थे उनसे हम कभी नहीं मिल पायेंगे।

*

हमारे विद्यालय में बीटीसी की ट्रेनिंग भी होती थी जिसमें शिक्षक बनने के इच्छुक इस ट्रेनिंग को  करने आते थे। वे हम लोगों का एक-दो क्लास लेते थे। मैं उन दिनों अपनी कक्षा का मानीटर था। जो शिक्षक बनने का अभ्यार्थी हमारी कक्षा में पढ़ाने आता था वह मुझसे बहुत चिढ़ता था। इसका कारण यह था कि मैं उससे ज्यादा सवाल पूछता था। वह कक्षा में घुसते ही मुझसे बोलता-आप तशरीफ का टुकड़ा बाहर ले जाइए। बाहर जाइए। मैं उसके कहने पर निकल जाता और लाइब्रेरी में बैठ जाता।

मैं कई दिन तक यह बर्दाश्त करता रहा फिर अपनी पूरी कक्षा से बात कर हमने एक योजना बनायी। उन दिनों ऐसे पेन मिलते थे जिनमें काफी मात्रा में स्याही भरी जा सकती थी। मेरी योजना के अनुसार सारे सहपाठी अपने हथियारों के साथ तैयार थे। उस दिन पता नहीं क्यों उस बीटीसी ट्रेनिंग वाले ने मुझे बाहर जाने को नहीं कहा। उस दिन वह लक्क दक्क सफेद शर्ट पहन कर आया था। जब वह पढ़ा कर जाने लगा तो मेरे इशारे पर सारे छात्रों ने अपने-अपने पेनों की स्याही उसकी शर्ट पर खाली कर दी।

 वह जब शिक्षकों के विश्राम करने के कक्ष में पहुंचा तो वहां मौजूद सभी शिक्षक उसे देख हंसने लगे। उन लोगों ने उससे कहा –अरे तुम्हारी शर्ट किसने रंग दी।

इतनी बात सुनते ही उसने शर्ट उतार कर देखा तो दंग रह गया पूरी शर्ट हम लोगों के पेन की स्याही से नीली हो गयी थी। उसका शक सीधे मुझ पर गया और उसने तुरत मेरी शिकायत इनायत हुसैन खान साहब से कर दी। मैं खान साहब को बहुत मानता था और वे भी मेरा बहुत खयाल रखते थे। उनके कहने पर ही मैंने एससी ज्वाइन किया था। उस बीटीसी ट्रेनिंग वाले खान साहब से बताया कि तिवारी ने अपने साथियों से कह कर मेरी यह हालत कर दी है।

 खान साहब ने एक छात्र को भेज कर मुझे बुलाया। मैंने नमस्कार किया तो वे बोले- क्या भाई आपने इनके साथ क्या किया। कोई छात्र ऐसा करता है?

 मैं समझ गया कि अगले ने जम कर मेरी शिकायत खान साहब से की है।

मैं बोला- सर जी  यह नुझे गाली देते हैं।

खान साहब ने पूछा- कैसी गाली?

मैंने कहा-यह हमारे क्लास में घुसते ही बोलते हैं –आप तशरीफ का टुकड़ा बाहर ले जाइए।

खान साहब मुसकरा कर बोले-यह गाली नहीं है उर्दू में कही बात है।

मैंने कहा –अगर गाली नहीं है तो भूल हुई मैं माफी मांगता हूं। इन्हें कहिए जो कहें हिंदी में कहें ताकि हमारी समझ में आ जाये।

खान साहब मुसकरा कर बोले जाइए। (क्रमश:)

 

 

 

 

 

Thursday, January 6, 2022

एक दुर्घटना के चलते जब मुझे करनी पड़ी सीता की भूमिका

 आत्मकथा

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

भाग-22

हमारे गांव जुगरेहली से बबेरू आठ किलोमीटर है। वहां हाईस्कूल आने-जाने के लिए हमें गांव से आठ किलोमीटर का फासला पैदल ही तय करना पड़ता था। सुबह हलका-फुलका नाश्ता कर हम बबेरू के लिए रवाना हो जाते। मां रोटी बना कर उसमें घर की गायों का असली घी खूब चुपड़ कर साथ दे देती जो हम लोग दोपहर में अपने सहपाठियों से बांट-बांट कर खाते। वे अपने यहां से बनायी कुछ चीजें लाते वह हमें देते और हम अपनी घी चुपड़ी रोटियां उनसे साझा करते।

  यहां यह बताते चलें कि उन दिनों अध्यापकों के पढ़ाने का ढंग बहुत ही अच्छा था। इसमें छात्रों को रट्टू तोता बनाने की बजाय जोर इस पर दिया जाता था कि छात्र को उस विषय का सम्यक ज्ञान कराया जाये ताकि उसे परीक्षा में कहीं अटकना ना पड़े।

 हमारे संस्कृत के अध्यापक आचार्य प्रभाकर द्विवेदी अपने सामने पुस्तक नहीं रखते थे लेकिन अगर छात्र गलत पढ़ रहा होता तो तुरत टोंक देते। वे कहते मेरे पास पुस्तक नहीं है लेकिन मैं समझ रहा हूं कि तुम गलत पढ़ रहे हो। वे प्रकांड पंडित थे और बहुत सुंदर गौर और देदीप्यमान रंग-रूप था उनका। उनका व्यक्तित्व बहुत ही प्रभावशाली था और उतना ही उत्तम था उनके पढ़ाने का ढंग।

 एक दिन आचार्य जी ने मुझे पास बुलाया और पूछा- अरे भाई तुम्हारा यह नाम किसने रखा है।

मैंने उत्तर दिया- जी गांव की कुछ महिलाओं ने रखा था जैसा मेरी मां ने बताया था।

आचार्य जी बोले –यह रामहेती नाम निरर्थक है इसकी जगह रामहित होना चाहिए। रामस्य हितू सा रामहित: अर्थात जो राम से प्रेम करता है वही रामहित है। तुम मेरा नाम लेकर अपने कक्षा के अध्यापक से कहना वे रजिस्टर में तुम्हारा नाम ठीक करा देंगे।

 मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया और आचार्य जी को प्रणाम कर वापस आकर अपनी सीट पर बैठ गया।

 उसी दिन मैंने अपनी कक्षा के अध्यापक से कह कर अपना नाम ठीक करा लिया। उसके बाद से मैं रामहेती से रामहित हो गया। आचार्य जी से मैंने बताया था कि मेरे अध्ययन का प्राथमिक आधार संस्कृत रही है यह सुन कर वे बहुत प्रसन्न हुए। वे पौरहित्य कार्य भी करते थे, विवाह आदि करवाते थे। इसके बाद आसपास कहीं अगर वे विवाह कराने जाते तो मुझे साथ ले लेते। विवाह के अंत में शाखोच्चार पाठ किया जाता है जिसमें लोग वर-वधू के ऊपर अक्षत छिड़कते हैं और शाखोच्चार मंत्र पढ़ते हैं। तकरीबतन आधी सदी बीत जाने के बाद अब वह मंत्र तो याद नहीं बस इतना याद रह गया है कि अंत में –सदा रहो कुशलम् वर कन्यययो कहा जाता था।

*

बबेरू और हमारे गांव जुगरेहली के मार्ग के बीच में हमारे गांव से लगभग तीन मील दूर एक जगह पड़ती थी खेर। सुना था कभी वहां बसा बसाया गांव था जो अचानक आये भूकंप से धरती में समा गया और अवशेष के रूप में सड़क के इधर-उधर दो बड़े टीले और एक छोटी-सी कुइयां भर रह गयी। जाने क्यों उस जगह गुजरते हुए दिन में भी पल  भर के लिए शरीर पर सिहरन दौड़ जाती थी।

 एक दिन की बात है, हमारे विद्यालय में जिला विद्यालय निरीक्षक आये थे और उनके सम्मान में हम लोगों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा था जिसमें दो नाटकों का मंचन भी शामिल था। एक नाटक था चाणक्य जिसमें मैंने स्वयं चाणक्य की भूमिका निभायी थी और दूसरा रमई काका की रचना पर आधारित हास्य नाटक बहरे बोधन बाबा। इसमें भी मेरी ही प्रधान भूमिका थी। हमारे नाटक बहुत पसंद किये गये। सबसे अधिक प्रशंसा जिला विद्यालय निरीक्षक जी से मिली जिसे सुन कर हमारे शिक्षक और साथ ही हमारे प्रिंसिपल ज्वाला प्रसाद शर्मा जी बहुत प्रसन्न हुए।

  कार्य़क्रम खत्म होते-होते रात के साढ़े बारह बज चुके थे। चांदनी रात थी। मैंने और मेरे गांव के ही मेरे सहपाठी बाबूलाल यादव जी (जो अब सेवानिवृत जज हैं) ने तय किया कि चांदनी रात है हम दोनों गांव निकल चलते हैं। यह निश्चय कर हम लंबे-लंबे डग भरते अपने गांव की तरफ जानेवाली सड़क पर चल पड़े जो बबेरू से हमारे जनपद बांदा तक जाती है। हम दोनों आपस में बाते करते चटख चांदनी में तेजी से बढ़ते जा रहे। जब हम लोग खेर के पास आये तो जाने क्यों रोंगटे खड़े होने लगे। आधी शताब्दी बीत जाने पर भी उस दिन को याद करते हुए शरीर में भय की एक झुरझुरी दौड़ जाती है।

  हम अभी खेर के बीच के गुजर ही रहे थे कि हमें कुछ दूरी पर दो सफेद छायाएं हवा में लहराती दिखीं। हमने नीचे से ऊपर तक नजर दौडायी पर कहीं उनका अंत दिखायी नहीं दे रहा था। अब हमें काटो तो खून नहीं। हम जीवन में पहली बार ऐसा दृश्य देख रहे थे। हमने उन अद्भुत सफेद आकृतियों से अपनी नजर हटायी और जोर-जोर से हनुमान चालीसा की चौपाइयां दोहराते हुए तेजी से गांव  की ओर भाग चले। हमने घर जाकर दम लिया। हमारे दिल तेजी से धड़क रहे थे। हमने घर में जब इस घटना जिक्र किया तो अम्मा और बाबा ने बहुत डांटा। उन लोगों ने कहा –रात को नहीं आना था, वहीं विद्यालय के कर्मचारियों के कमरों में रात गुजार लेते। हमें भी अपनी गलती का एहसास हुआ और हमने तय किया कि अब से अगर ऐसा कोई कार्यक्रम हुआ तो हम विद्यालय में ही रुक जाया करेंगे।

यहां यह बता दें कि हमारा भी भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं था लेकिन जो उस दिन देखा वह दृष्टि का भ्रम नहीं था। वैसे भी हमारे धर्म ग्रंथों में भी आत्माओं का उल्लेख मिलता है। धुंधकारी का प्रसंग तो जग विख्यात है जिसे प्रेत योनि से मुक्त कराने के लिए उसके भाई गोकर्ण ने श्रीमद्भागवत का पाठ कराया था। कहते हैं कि सात दिन भागवत का पाठ हुआ था। उसके लिए जो मंच बना था उसके एक किनारे सात गांठ वाले हरे बांस का एक टुकड़ा बांधा गया था। सातवें दिन जब भागवत समाप्त हुई तो कहते हैं कि बांस की सातवीं गांठ फट गयी। इस पर भागवत पाठ करने वाले ब्राह्मण ने गोकर्ण सेकहा कि- देखो बांस की सातवीं गांठ के फटने का अर्थ है कि तुम्हारे भाई धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्ति मिल गयी।  

 हमने यह सुन रखा था कि जो अपनी पूरी उम्र नहीं जी पाता और किसी दुर्घटना या अपघात में बीच ही मारा जाता है और सही ढंग से उसका श्राद्धकर्म आदि नहीं किया जाता तो वह प्रेत योनि में पृथ्वी पर भटकता रहता है।

*

कोई नहीं जानता कि उसे कब कैसी समस्या का सामना करना पड़े। अपने साथ अचानक हुई एक घटना का जिक्र यहां कर रहा हूं। हुआ यह कि एक दुर्घटना के वाकये के चलते मुझे रामलीला में सीता की भूमिका निभानी पड़ी। हुआ यह कि मेरी बहन लगनेवाली एक लड़की का विवाह था। लड़की वालों ने बारातियों का मनोरंजन कराने के लिए गांव ब्यौंजा की रामलीला मंडली को बुलाया था। रामलीला के सारे कलाकार आ गये थे। सीता की भूमिका निभानेवाला कलाकार रह गया था जिसके बारे में पता चला कि उसे कोई साइकिल पर ला रहा है और रामलीला शुरू होने के पहले वह आ जायेगा। उस दिन धनुष यज्ञ की लीला का मंचन होना था। हम सब लोग बहुत आनंदित थे कि बहुत दिन बाद रामलीला और वह भी धनुष यज्ञ की महत्वपूर्ण लीला देखने को मिलेगी।

 अभी हम लोग यही सोच रहे थे कि तभी एक आदमी साइकिल से आया और उसने जो खबर दी उससे हमारी सारी खुशी काफूर हो गयी। उसने बताया कि सीता की भूमिका करनेवाले जिस लड़के को वह साइकिल में ला रहा था उसके साथ रास्ते में दुर्घटना हो गय़ी। साइकिल की चैन में फंस कर उसकी पूरी पिंडली फट गयी। और वह उसे बबेरू के अस्पताल में भर्ती कर के आया है। इतनी खबर देकर वह वापस अस्पताल लौट गया।

 बड़ी समस्या आ गयी अब रामलीला हो तो कैसे। धनुष यज्ञ की लीला वह भी सीता के बिना असंभव। रामलीला कमेटी वालों ने हमारे गांव के गणमान्य व्यक्ति काशीप्रसाद जी द्विवेदी से बात कर सारी समस्या बतायी और उनसे मदद मांगी। सबने कहा कि उनके साथ-साथ यह गांव की इज्जत का सवाल भी है।

 काशीप्रसाद जी को हम लोग आदर से काका कहते थे। वे हमारे बड़े भैया अमरनाथ जी द्विवेदी के पिता जी थे। उनके सामने जब भी इस तरह की या अन्य समस्या आती तो वे मुझे भी याद करते थे। रामलीला कमेटी वालों ने जब अपनी समस्या बतायी तो काशीप्रसाद काका ने अपने यहां काम करनेवाले एक सेवक से कहा-जाओ तिवारी के लड़के को बुला लाओ।

 सेवक जब हमारे घऱ आया तो उसने कुछ बताया नहीं बस इतना कहा-भैया तुम्हैं काका जी बुलाय रहे हैं।

 मैं तुरत काशीप्रसाद काका के पास गया और उनको प्रणाम कर पूछा- काका क्या काम है।

उन्होने संक्षेप में सारी घटना बता कर कहा- गांव की इज्जत का सवाल है अब तुम्हीं हमें इस मुश्किल से उबारो। ब्यौंजा की जो रामलीला मंडली आयी उसमें आज सीता की भूमिका कर लो।

  कोई और होता तो मैं टाल भी जाता लेकिन काका जी का आदेश मेरे लिए हर हाल में शिरोधार्य था। मैंने जब हामी भर ली तो उन्होंने राहत की सांस ली।

  शाम होते ही मैं वहां था जहां रामलीला के सारे कलाकार मेकअप कर रहे थे। मेकअप मेरा भी किया गया जनकनंदिनी सीता के रूप में। इस मंडली में जो परशुराम की भूमिका करते थे उनका अभिनय मैं पहले भी देख चुका था। वे अपने अभिनय में खो जाते थे। उनके बारे में यह भी प्रसिद्ध था कि धनुष भंग के बाद जब क्रोध में कूदते-फांदते थे तो तख्त तक तोड़ देते थे। गांव के एक व्यक्ति ने यह सुन कर अपना मजबूत तख्त भेजा और कहा था कि परशुराम जी इसे तोड़ कर दिखायें।

 जो पंडित जी परशुराम की भूमिका करते थे उन्हें देखा कि मेकअप करने से पहले उन्होंने  लगभग आधा पाव घी उसमें एक पेडा और कुछ कालीमिर्च डाल कर खा लिया। पता चला कि उनका यह बराबर का नियम था। परशुराम के रूप में उनके शरीर में भस्म लगाया गया और उन्होंने कोपीन (लंगोट) पहन लिया।

 मुझे सुंदर-सी साड़ी और गहनों में सीता के रूप में सजाया गया। धनुष भंग होने के बाद मुझे जयमाल लेकर जाना था और राम के गले में डालना था। धनुष भंग हो गया सीता बना मैं सखियों के साथ जयमला ले चल पड़ा। सखियां गा रही थीं-हमार सिया प्यारी धीरे चलो सुकुमारी। उनके गाने के साथ ही कुछ दूर चलने के बाद मैं आगे ना बढ़ सका। सखियां गाये जा रही हैं और मेरे पैर जैसे एक जगह ठहर कर रह गये थे। हुआ यह था कि मेरी साड़ी एक तख्त की कील में अटक गयी थी। दृश्य को खराब होने से बचाने के लिए मैंने पैर से किसी तरह कील के बंधन से साड़ी को मुक्त किया। हाथ में जयमाल थमी थी उसकी मदद तो ले नहीं सकता था। इसके बाद जयमाल का कार्यक्रम संपूर्ण हुआ।

 जयमाल कार्यक्रम संपूर्ण हो जाने के बाद परशुराम आये और गुरु का धनुष भंग हो जाने पर बहुत क्रोधित हुए और इस तख्त से उस तख्त पर क्रोध से कूदने लगे। हुआ यह था कि राम परशुराम का क्रोध शांत करने का प्रयास करते तो लक्ष्मण फिर कुछ कह कर उनका क्रोध बढ़ा देते।

 दूसरे दिन पता चला कि परशुराम जी ने वह तख्त भी तोड़ डाला था जिसे गांव के व्यक्ति ने इस शर्त के साथ दिया था कि मेरे तख्त को तोड़ कर दिखलायें।

  वैसे मैं सीता की भूमिका के लिए तैयार नहीं था लेकिन मुझे यह जान कर संतोष था कि मैंने अपने आदरणीय काशीप्रसाद काका जी का आदेश पालन किया और एक तरह से अपने गांव की इज्जत भी बचा ली। (क्रमश:)

 

Tuesday, January 4, 2022

क्या दशावतार पर आधारित हैं डार्विन के सिद्धांत

 


इसे अद्भुत ही कहा जायेगा कि पौराणिक ग्रंथों में उल्लिखत कथाओं में दशावतार की कथा और डारविन के क्रमिक विकास के सिद्धांत में चौंकानेवाली समानता है। इससे यह सिद्ध होता है कि हमारे प्राचीन पौराणिक ग्रंथों में दशावतार का जो उल्लेख मिलता है वह आधारहीन या असत्य नहीं है। हजारों लाखों वर्ष पहले जो कहा गया बाद में डार्विन ने भी उसी अवधारणा को अपने ढंग से व्याख्यायित किया। इस तरह हम पाते हैं कि भारतीय पौराणिक ग्रंथों में जो कथाएं हैं वह किस न किसी तरह से वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। यह कथाएं सिद्ध करती हैं कि वैदिक काल में विज्ञान काफी समृद्ध था।

मनुष्य की उत्पत्ति कैसे हुई इसकी वैज्ञानिक और धार्मिक व्याख्या अलग-अलग है। क्या मनुष्य का जन्म बंदर से हुआ। डायनोसार युग के अंत के लिए कहा जाता है कि बहुत बड़ा धूमकेतु पृथ्वी पर गिरा जिससे इनकी पूरी प्रजाति का अंत हो गया। डायनोसार के अंत ने एक नयी प्रजाति के जन्म  का मौका दिया। यह जाति थी स्तनधारियों की। आज से लगभग सवा पांच करोड़ वर्ष पहले यह परिवर्तन हुआ। इसके बाद प्राणियों की ऐसी जाति आयी जो सीधी होकर चलने लगी।ये एप्स कहलाये जो बाद में धीरे-धीरे इन एप्स में से कुछ गोरिल्ला और चिंपैंजी में बदल गये और कुछ इनसानों में। यह इनसान ही आदि मानव थे जो गुफाओं  में रहते थे और वन्य जीवों शिकार कर अपना जीवन यापन करते थे। विज्ञान मानता है कि इन्हीं से बाद में मनुष्य का विकास हुआ।

यह वैज्ञानिक आधार ही था, जिसने उस समय के समाज और वर्तमान समाज में काफी परिवर्तन लाकर खड़ा किया।

यदि हम चार्ल्स डार्विन के 'विकास के सिद्धांत' पर नजर डालें तो पता चलता है कि मनुष्य का विकास के क्रम में जटिल जीवित प्राणी, मछली, उभयचर (जल-थल में समान रूप से चलनेवाला), आगे और इतने पर जैसे बहुत सरल जीवों से विकसित हुए हैं। डार्विन के अनुसार यह प्रक्रिया प्राकृतिक और क्रमिक थी।

ठीक इसी सिद्धांत की तरह भगवान विष्णु के दस अवतारों को देखा जाता है। जब विष्णु ने पहला अवतार लिया तो सृष्टि जलमग्न थी सब कुछ खत्म हो चुका था। उनके पहले मत्स्य अवतार के समय पृथ्वी पर सब कुछ नष्ट हो चुका था।

लेकिन मनु और जीव और वृक्ष  आदि  कुछ विशेष वस्तुएं बचा ली गयी थीं। ठीक इसी तरह जब विष्णु का अंतिम अवतार कल्कि भगवान के रूप में होगा तब भी सब कुछ नष्ट हो चुका होगा! कल्कि पुराण में ऐसा ही उल्लेख मिलता है।

गीता में भी श्रीकृष्ण ने कि जब-जब धर्म की हानि होगी, अधर्म बढ़ेगा मैं तब-तब पृथ्वी पर आऊंगा।

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युथानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे॥

अर्थात् जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान हो जाता है, तब-तब सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए मैं विभिन्न युगों में उत्पन्न होता हूँ।

विष्णु ने क्रमशः मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह,वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध अवतार लिए हैं और कल्कि अवतार भविष्य में कलयुग के अंत में होगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि विष्णु का हर अवतार मत्स्य अवतार के बाद मानव जीवन के विकास की ओर ही संकेत करता है। यही डार्विन के भी मानव जीवन के क्रमिक विकास के सिद्धांत में निहित है।

 दुनिया बदल रही है और बदलती दुनिया में अपने आप को बनाए रखने के लिए परिवर्तन आवश्‍यक है। इसी परिवर्तनशील आचरण के सार्थक उदाहरण हमारी सनातन संस्कृति और धर्म में व्याख्यायित दशावतार हैं, जो जीव विज्ञानी चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन की जैव विकास संबंधी अवधारणा की पुष्टि करते हैं। संभव है, डार्विन ने दशावतारों की आवधारण से ही अपना सिद्धांत सिद्ध करने की प्रेरणा ली हो।

 वास्तव में दशावतार जैव और मानव विकास को क्रमबद्ध रेखांकित किए जाने की सटीक अवधारणा है, क्योंकि इनमें एक स्पष्‍ट और तार्किक कालक्रम का सिलसिला  विद्यमान है। पहला अवतार मत्स्य अर्था मछली के रूप में आया। विज्ञान भी मानता है कि जीव-जगत में जीवन पानी में ही विकसित हुआ। दूसरा अवतार कच्छप हुआ, जो जल और जमीन दोनों स्थलों पर रहने में सक्षम था। तीसरा वराह था, जो थलचर था और बुद्धिहीन था। चौथा, नरसिंह अवतार, जानवर से मनुष्य बनने के संक्रमण को प्रतिबिंबित करता है। यहां डार्विन के सिद्धांत मात्र इतना अंतर है कि डार्विन मानवों के पूर्वज बंदरों को बताते हैं। पांचवां, वामन-अवतार, लघु रूप में मानव जीवन के विकास का प्रतीक है।

 विष्‍णु का छठा अवतार, परशुराम स्वरूप मनुष्य के संपूर्ण विकास का अवतरण है। इसी अवतार के माध्यम से मानव जीवन को व्यवस्थित रूप में बसाने के लिए वनों को काटकर घर बसाने और बनाने की स्थिति को अभिव्यक्त किया गया है। परशुराम के हाथ में फरसा इसी परिवर्तन का द्योतक है। सातवां अवतार राम का धनुष-बाण लिए प्रकट होना इस बात का द्योतक है कि मनुष्‍य मानव बस्तियों से दूर रह कर भी अपनी सुरक्षा करने में सक्षम हो चुका था। आठवें अवतार बलराम हैं, जो कंधे पर हल लिए हुए हैं। यह मानव सभ्यता के बीच कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के विकास का संकेत करता है। नवें अवतार कृष्‍ण हैं। कृष्‍ण मानव सभ्यता के ऐसे प्रतिनिधि हैं, जो गायों के पालन से लेकर दूध व उसके उत्पादों से मानव सभ्यता को जोड़ने व उससे अजीविका चलाने के प्रतीक हैं। कृष्‍ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में गीता का जो उपदेश दिया है, उसे उनका दार्शनिक अवतार भी कहा जा सकता है। दसवां, कल्कि एक ऐसा काल्पनिक अवतार है, जो कलियुग में होना है।

ब्रिटेन के आनुवंशिकी और विकासवादी जीव विज्ञानी जान बर्डन सैंडर्सन हल्डेन को राजनीतिक असहमति के चलते भारत आना पड़ा। उन्होंने संभवतः जैव व मानव विकास के व्यवस्थित क्रम में अवतारों का पहली बार बीती सदी के चौथे दशक में अध्ययन किया। उन्होंने पहले चार अवतार मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह को सतयुग से, इसके बाद के तीन वामन, परशुराम और राम को त्रेता से और आगामी दो बलराम और कृष्‍ण को द्वापर युग से जोड़कर कालक्रम को विभाजित किया है। हाल्डेन ने इस क्रम में जैविक विकास के तथ्य पाए और अपनी पुस्तक द कॉजेज आफ इवोल्यूशनमें इन्हें रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्‍ट किया कि विज्ञान जीव की उत्पत्ति समुद्र में मानता है, इस लिहाज से इस तथ्य की अभिव्यक्ति मत्स्यावतार में है। कूर्म यानी कछुआ जल व जमीन दोनों में रहने में समर्थ है, इसलिए यह उभयचर कूर्मावतार के रूप में सटीक मिथक है। अंडे देने वाले सरीसृपों से ही स्तनधारी प्राणियों की उत्पत्ति मानी जाती है, इस नाते इस कड़ी में वराह अवतार की सार्थकता है। नरसिंह ऐसा विचित्र अवतार है, जो आधा वन्य-प्राणी और आधा मनुष्‍य है, इस विलक्षण अवतार की परिकल्पना से यह स्पष्‍ट होता है कि मनुष्‍य का विकास पशुओं से हुआ है। यह लगभग वही धारणा है, जो चार्ल्स डार्विन ने प्रतिपादित की है। इन जैविक अवतारों के बाद हल्डेन ने मानवीय अवतारों में वामन को सृष्टि विकास के रूप में लघु मानव माना।

 राम सामंती मूल्यों को सैद्धांतिकता देने और एक आचार संहिता की मर्यादा से आबद्ध करने वाले अवतार हैं। हल्डेन बलराम को महत्व नहीं देते, किंतु कृष्ण को एक बौद्धिक पुरुष की परिणति के रूप में देखते हैं।

यदि हम इन अवतारों का गहराई से विज्ञान-सम्मत अध्यन करें तो हमारी अनेक प्रचलित मान्यताएं वैज्ञानिकता पर सिद्ध होती हैं। वैज्ञानिक शोध व दृष्‍टांतों से जोड़कर उनका वस्तुपरक विश्‍लेषण करें तो इनमें चमत्कारिक रूप से कई जटिल विषयों के व्यावहारिक गुण-सूत्र मिलते हैं। ये अवतार सृष्टि के उद्गम से लेकर जैव विकास के ऐसे प्रतिमान हैं, जो भूलोक से लेकर खगोल तक विद्यमान थल, जल व नभ में विचरण करने वाले जीव-जगत की पड़ताल तो करते ही हैं, खगोलीय घटनाओं का वैज्ञानिक विवेचन और विश्‍लेषण भी करते हैं। इसीलिए इन अवतारों की परिधि में इतिहास और भूगोल तो हैं ही, ब्रह्माण्ड के रहस्य भी सम्मिलित हैं। स्पष्ट है कि वैदिक धर्म व दर्शन अंधविश्‍वास से दूर जिज्ञासा और ज्ञान पर आधारित है। ज्ञान और जिज्ञासा ही बौद्धिकता के वे मूल-भूत स्रोत हैं, जो ब्रह्माण्ड में स्थित जीव-जगत के वास्तविक रूप की अनुभूति और आंतरिक रहस्य को जानने के लिए बेचैन रहते हैं।

दशावतार काल्पनिक नहीं बल्कि जैव विकास-गाथा का पूरा एक कालक्रम हैं।

इसी परिवर्तनशील आचरण के सार्थक उदाहरण हमारी सनातन संस्कृति और धर्म में व्याख्यायित दशावतार हैं, जो जीव विज्ञानी चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन की जैव विकास संबंधी अवधारणा की पुष्टि करते हैं। ... विज्ञान भी मानता है कि जीव-जगत में जीवन पानी में ही विकसित हुआ।

 वास्तव में दशावतार जैव और मानव विकास को क्रमबद्ध रेखांकित किए जाने की सटीक अवधारणा हैं, क्योंकि इनके (विशेषकर जैव अवतार) मिथकीयकरण में एक सुस्पष्ट और तार्किक कालक्रम का सिलसिला मौजूद है। डार्विन के सिद्धांत में महज फर्क इतना है कि डार्विन मानव के पूर्वज बंदर को बताते है।

अगर हम यह सारी बात समझें तो हमें पता चलेगा कि जिसको डार्विन बहुत बाद में विज्ञान की भाषा में कह सके, जिसे पुराण की भाषा में बहुत पहले कहा जा चुका है। लेकिन आज भी, अभी भी पुराण की ठीक-ठीक व्याख्या नहीं हो पाती है। अगर इनकी सही व्याख्या हो तो हम पायेंगे कि इनमें ज्ञान का वह भंडार भरा है जो काल्पनिक नहीं बल्कि यथार्थ के धरातल पर आधारित है। हम पाते हैं कि आज के अधिकांश वैज्ञानिक संदर्भों, विषयों का उल्लेख हमारे पौराणिक ग्रंथों, वेदों में बहुत पहले ही तार्किक रूप में किया जा चुका है।

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