Sunday, May 16, 2021

कठिन संघर्ष से सफलता तक पहुंचे थे दुर्धष पत्रकार पांडेय जी

 


 


सन्मार्ग कोलकाता कार्यालय में लिये गये फोटो में बायें से दायें-हरिराम पांडेय, बुद्धिनाथ मिश्र जी, अभिज्ञात भाई, राजेश त्रिपाठी, (पीछे खड़े हुए) जयप्रकाश मिश्र, कमलेश पांडेय श्रवंतिका दास, अनुपम सिंह

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आदमी मुसाफिर है आता है जाता है, आते जाते रास्ते में यादें छोड़ जाता है। हाल ही हमें छोड़ गये भाई हरिराम पांडेय जी से जुड़ी कुछ यादें उपरोक्त पंक्तियों के साथ साझा कर रहा हूं। सचमुच अब उनकी यादें ही तो हैं जो हमारे दिलों में हमेशा उन्हें जिंदा रखेंगी। मैं यहां बताता चलूं की स्वभाव से अंतर्मुखी और जिनसे दिल, विचार मिलते हैं उनसे ही सहज हो पाता हूं या हिल-मिल पाता हूं। ऐसे लोगों में हमारे पांडेय जी भी शुमार थे। सच कहता हूं आज उन्हें थे लिखते हुए भी दिल में हूक-सी उठती है। मेरा नियम है कि मैं सुबह सबसे पहले अपना फेसबुक एकाउंट देखता हूं कि कहीं किसी ने अवांक्षित पोस्ट तो नहीं टैग कर दिया तो उसे पहले साफ कर दूं। इसी क्रम में 13 मई को भी जब मैं फेसबुक देख रहा था तभी मेरी नजर सुरेंद्र सिंह जी के एक लाइन वाले फेसबुक पोस्ट पर पड़ी तो दिल धक से रह गया। लिखा था हम सबके प्रिय हरिराम जी पांडेय नहीं रहे। बरबस रोना आ गया, विश्वास नहीं हो रहा था खबर पक्की है या नहीं जानने के लिए मैंने हरिराम पांडेय जी के बड़े पुत्र डाक्टर प्रशांत पांडेय जी को फोन किया, मैं सुबक रहा था, गला रुंध रहा था मेरी स्थिति भांप वे भी बिलख पड़े और बस इतना ही बोल पाये-हां अंकल पापा चले गये। जाहिर है उसके बाद का मेरा लंबा समय सुबकते बीता। जिस व्यक्ति के पास बैठ आपने कार्यालय में वर्षों काम किया हो, हंसे बोले हों उसका जाना अगर आपको रुला ना सके तो फिर आपको स्थितिप्रज्ञ ही कहेंगे। खैर नियति के आगे हम सभी हारे हैं और इस दुख को स्वीकारने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।

मुझसे उनकी जो यादें जुड़ी हैं उनमें विस्तार से जाने के पहले यह बताता चलूं कि वे सबको समान आदर देते थे। मुझे वे राजेश जी या त्रिपाठी जी नाम से ही संबोधित करते रहे। हां, एक बार मुझे भी उनके साथ राममंदिर के पास वाली गली में केसर वाली चाय पीने का अवसर मिला था।

उनसे मेरी पहली मुलाकात छपते छपते अखबार के कार्यालय में हुई थी। तब मैं आनंद बाजार प्रकाशन समूह के हिंदी साप्ताहिक रविवार में उप संपादक था। बाद में पांडेय जी सन्मार्ग में आ गये। इसे आत्मश्लाघा ना माना जाये यह तथ्य है कि उन्हें सन्मार्ग में लाने में प्रमुख भूमिका मेरे बड़े भैया रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म जी की थी। पांडेय जी अक्सर इस बात को स्वयं लोगों से कहा करते थे कि सन्मार्ग में उनका प्रवेश रुक्म जी की वजह से हुआ। आज के स्वार्थी और सुविधावादी युग में इतना मानना भी बड़ी बात थी।

पांडेय जी चर्चा में अक्सर यह जिक्र करते थे कि वे रांची में कन्वेंट में पढ़ते थे तो वहां उनके अध्यापक फादर कामिल बुल्के थे जो बच्चों को हिंदी बोलने को प्रोत्साहित करते थे। वे गाहे-बगाहे अपने पिता जी का भी जिक्र करते थे जो आजादी के समय पुलिस सेवा में थे। उनसे जुड़ी विचित्र और रोमांचित कर देने वाली कथाएं वे सुनाते थे। मैं उनसे बार-बार अनुरोध करता कि पिता जी से जुड़ी कुछ घटनाएं वे अपने ब्लाग या फेसबुक में साझा करें ताकि आज की पीढ़ी को भी पता चल सके कि कैसा था वह समय और उस समय के लोग। यह अनुरोध अपूर्ण ही रह गया। अपने श्वसुर शिक्षाविद बी.बी. मिश्र जी का भी वे जिक्र किया करते थे कि वे यूनिवर्सिटी आफ लंदन में पढ़ाते हैं और लंदन में ही बस गये हैं। वे अक्सर कहते-श्वसुर जी वहां अकेले हैं बहुत उम्र हो गयी मैं तो नहीं जाऊंगा बंटी (डाक्टर प्रशांत पांडेय का पुकारू नाम) को भेज कर उन्हें यहां बुलवा लेंगे। लेकिन वह भी संभव नहीं हो सका बी.बी. मिश्र जी साल भर पहले गुजर गये।

उस वक्त जब उनसे पूछा कि –बंटी भैया को क्यों  भेजेंगे आप क्यों नहीं जायेंगे तो वे बोले मुझे वे पसंद नहीं करते मैं पत्रकार हूं ना।

उनसे पूछा-पत्रकार होना गुनाह है क्या। तो उनका जवाब था कि श्वसुर जी कहते हैं पत्रकार बनना क्या जरूरी था और कुछ नहीं कर सकते थे।

अब उनके एक और प्रसंग पर आते हैं। यह बात भी उन्होंने ही सुनायी थी सच है या झूठ कह नहीं सकता पर उनके कहने का ढंग कुछ ऐसा था कि वह सच लगे। एक दिन उन्होंने बताया-त्रिपाठी जी रात की ड्यूटी कर के मैं सोया ही था कि अपने ही कार्यालय का एक व्यक्ति आया और मुझे झिंझोड़ कर जगाया। मुझे लगा कि कहीं कुछ गड़बड़ हो गया। मैंने हकबका कर पूछा- क्या हुआ, वह व्यक्ति बोला-अच्छा पांडेय जी अगर टार्च में बैटरी की जगह यूरेनियम भर दिया जाये तो क्या होगा। पांडेय जी ने बताया कि उन्हें इतना गुस्सा आया कि वे कह नहीं सकते। वे गुस्से को पीकर इतना भर बोले- टार्च का तो मैं नहीं जानता पर यूरेनियम रखने के जुर्म में तुम जेल में होगे।

वे सचमुच खोजी पत्रकार थे और उनकी हर स्टोरी चौंकानेवाली होती थी और कई सवाल खड़ी करती थी। कई बार लगता  था कि इस स्टोरी पर तो बवाल पक्का है। लेकिन कुछ नहीं होता था क्योंकि वे हर स्टोरी पर महीनों काम करते, सारे डाक्युमेंट जुटाते तब उसे छपने को देते थे। उनके बारे में तो सन्मार्ग के ही कुछ साथियों ने बताया था कि एक स्टोरी के तथ्य खोजने के लिए उन्होंने एक सामान्य मजदूर के रूप में रह कर वहां काम तक किया जहां खाद्य तेल में मिलावट की बात सुनने में आयी थी। यह उनका दुस्साहस ही था क्योंकि भेद खुल जाने में जान तक जाने का भय था।

कालांतर में मैं सन्मार्ग के ओडिशा संस्करण का स्थानीय संपादक बना और भुवनेश्वर में जाकर काम संभालने लगा। अगर कोई बड़ी स्टोरी हमारे कोलकाता संस्करण में छपती थी तो वह ओडीशा संस्करण में भी ली जाती थी। ऐसी ही पांडेय जी की स्टोरी छपी तो कटक (ओडीशा) से खुफिया विभाग का फोन मेरे पास आया और उनका पहला सवाल था-यह स्टोरी आपको कहां से मिली।हमें इसका डिटेल चाहिए।

मैंने जवाब दिया-यह स्टोरी हमारे मुख्यालय कोलकाता से ओरिजिनेट हुई है। मैं थोड़ी देर बाद इसका विस्तृत विवरण दे पाऊंगा।

इसके बाद मैंने पांडेय जी को फोन किया-अरे महाराज, क्या बवाल मचाये हैं, आपकी स्टोरी पर कटक के खुफिया विभाग से फोन आ गया वे पूरा डिटेल चाहते हैं।

इस पर पांडेय जी ने कहा-मेरा नंबर दे दीजिए बात कर लेते हैं, मेरे पास इससे संबंधित सारे डाक्युमेंट हैं।

यादें तो बहुत हैं, वर्षों उनके बगलवाली सीट में बैठ कर काम किया। कंप्यूटर के बारे में वे उतने स्पर्ट नहीं थे पास बैठता था मुझसे जो बन पड़ती सहायता कर देता था।खुश होते और कहते-त्रिपाठी जी आपने मेरी मुश्किल दूर कर दी।

मैं उनसे कहता ठीक से सीख लीजिए और वे सचमुच सीखने का आग्रह दिखाते।

उनसे जुड़ी तमाम यादें हैं जिन्हें थोड़े में समेटना आसान नहीं। मैंने जब सत्यनारायण व्रत कथा को गीत में ढाला और उसे बुंदेलखंड की कन्हैया कैसेट कंपनी ने संगीतबद्ध कर यूट्यूब में डाला तो पांडेय जी के पास भी वीडियो भेजा। उन्होंने मुझे बताया कि वह वीडियो उन्होंने अपने परिचितों,रिश्तेदारों तक भेज दी है। मैंने सोचा था कि मेरा मन रखने के लिए, मुझे प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने यह बात कही होगी लेकिन उनके छोटे बेटे गौरव पांडेय (गोलू) के विवाह के रिसेप्शन में जब मैं गया तो उन्होंने अपने परिचितों और रिश्तेदारों से यह कह कर ही परिचय कराया-यही हैं सत्यानारायण वाले हमारे राजेश त्रिपाठी।

उन लोगों ने जिस मुसकान और प्रेम के साथ मेरा अभिवादन किया उससे प्रमाणित हो गया कि पांडेय जी ठीक ही कह रहे थे।

थोड़े शब्दों में कहें तो पांडेय जी अपनी मिसाल आप थे।  उन्होंने जीवन में बड़ा संघर्ष किया और अपने अध्यवसाय से सफलता, लोकप्रियता के शीर्ष तक पहुंचे। वे हमेशा हमारी यादों में जिंदा रहेंगे। लिखा तो बहुत जा सकता है पर अपनी इन दो पंक्तियों से इस स्मृति-यात्रा को विराम देता हूं कि-माना कि किसी के जाने से दुनिया खत्म नहीं होती। पर इससे जाने वाले की अहमियत तो कम नहीं होती।

Saturday, May 15, 2021

सुनो श्याम सुंदर

 

सुनो श्याम सुन्दर, क्षमा माँगता हूँ,
हुई जो ख़ताएँ, उन्हें मानता हूँ,
सुनो श्याम सुन्दर, क्षमा माँगता हूँ,
हुई जो खताएं, उन्हें मानता हूं।

ग़लती के पुतले, इंसान है हम,
भले है बुरे है, तेरी संतान है हम,
दया के हो सागर, मै जानता हूँ,
हुई जो खताएं, उन्हें मानता हूं,
सुनो श्याम सुन्दर, क्षमा माँगता हूँ,
हुई जो ख़ताएँ, उन्हें मानता हूँ।

कश्ती को मेरी, साहिल नहीं है,
तुम्हारे चरण के हम, काबिल नहीं है,
काबिल बनाओगे, ये मानता हूँ,
हुई जो खताएं, उन्हें मानता हूं,
सुनो श्याम सुन्दर, क्षमा माँगता हूँ,
हुई जो ख़ताएँ, उन्हें मानता हूँ।
हमारी ग़लती को, दिल पे ना लेना,
सजा जो भी चाहों श्याम, हमें तुम देना,
करुणा निधि हो तुम, पहचानता हूँ,
हुई जो खताएं, उन्हें मानता हूं,
सुनो श्याम सुन्दर, क्षमा माँगता हूँ,
हुई जो ख़ताएँ, उन्हें मानता हूँ।

सुनो श्याम सुन्दर, क्षमा माँगता हूँ,
हुई जो ख़ताएँ, उन्हें मानता हूँ,
सुनो श्याम सुन्दर, क्षमा माँगता हूँ,
हुई जो खताएं, उन्हें मानता हूं।

 

Friday, May 14, 2021

क्या वाल्मीकि के अवतार थे गोस्वामी तुलसीदास

 

 क्या वाल्मीकि के अवतार थे गोस्वामी तुलसीदास यह शीर्षक देने का उद्देश्य सनसनी फैलाना या किसी के सोच को प्रभावित करना नहीं है। ऐसे कुछ उल्लेख कहीं मिले इसीलिए इस विषय को उठाया और सोचा कि इसे आप तक भी पहुंचायें जिससे आप भी इस पर विचार मंथन करें। रत्नाकर दस्यु के श्रीमद् वालमीकि रामायण के रचयिता ऋषि वाल्मीकि की कहानी भी अनोखी है। रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास की भी जीवन गाथा भी कम विचित्र नहीं है। दोनों के रामकथा गाने का ढंग भी अलग-अलग और अनोखा है।  वाल्मीकि ने त्रेता युग में रामायण की रचना की। उनकी कथा के नायक  राम राजकुमार हैं, शासक हैं उन्हें वाल्मीकि ने जैसा देखा, जैसा पाया वैसा ही उनके चरित्र का वर्णन किया पर तुलसीदास ने राम गाथा को भक्ति भाव से लिखा। उनके रामचरित मानस के राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। तुलसी ने राम के आदर्श रूप को एक भक्त के रूप में प्रस्तुत किया। वाल्मीकि की रामायण संस्कृत भाषा में थी इसलिए वह तत्कालीन पाठक समाज के उसी वर्ग में समादृत और प्रचलित हुई जिन्हें संसकृत का ज्ञान था। कुछ लोगों का मत है कि उसी रामायण को जनभाषा और सरल भाषा में गाने के लिए कवि वाल्मीकि ने कलयुग में गोस्वामी तुलसीदास के रूप में अवतार लिया। उन्होंने अपने रामचरित मानस को अवधी मिश्रित हिंदी में रच कर जन-जन में लोकप्रिय और समादृत बना दिया।
वाल्मीकि के गोस्वामी तुलसीदास को रूप में अवतार लेने की एक यह कथा भी प्रचलित है। संभवत: बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि सर्वप्रथम रामायण की रचना हनुमान जी ने की थी। उन्होंने पत्थरों की शिलाओं में अपने सुदृढ़ नखों से कुरेद-कुरेद कर यह रामायण लिखी थी। इसका नाम 'हनुमद् रामायण ' था। कहते हैं जब वाल्मीकि जी ने उस रामायण को देखा तो उन्हें लगा उन्होंने  संस्कृत में जो रामायण लिखी है वह श्रेष्ठता में हनुमान जी की रामायण के आगे कहीं नहीं टिकती। वे प्रसन्नता से नाचने लगे। उन्हें प्रसन्न देख हनुमान जी ने कहा- तुम जो चाहो वरदान मांग लो। लेकिन वाल्मीकि ने सोचा कि इनकी रचना अगर विश्व विख्यात हो गयी तो उनकी रामायण को कोई नहीं देखेगा। हनुमान जी ने वरदान मांगने को कहा था तो वाल्मीकि जी ने उनसे कहा कि अगर आप मुझे वरदान देना ही चाहते हैं तो मैं यह वरदान मांगता हूं कि आप अपनी लिखी इस रामायण को समुद्र में प्रवाहित कर दीजिए। हनुमान जी ने तो वरदान मांगने  के लिए कह ही दिया था तो उन्होंने शिला पर लिखी अपनी रामायण को समुद्र में प्रवाहित तो कर दिया लेकिन उनको वाल्मीकि पर बड़ा क्रोध आया।
उन्होंने वाल्मीकि को कहा कि तुमने कलियुगी व्यक्ति की तरह आचरण किये। मुझे अपनी दुर्लभ रामायण समुद्र में प्रवाहित करने को विवश किया अब मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुमको कलियुग में भी अवतार लेना होगा। यह सुन कर वाल्मीकि भयभीत हो गये। इस पर हनुमान जी ने उन्हें यह भी विश्वास दिलाया कि वे सदा उनके साथ रहेंगे और कलियुग का प्रभाव उन पर नहीं पड़ने देंगे। हनुमान जी के इस शाप के चलते ही कलियुग में वाल्मीकि को गोस्वामी तुलसीदास के रूप में अवतार लेना पड़ा। सभी जानते हैं की कलियुग में वाल्मीकि ने जब तुलसीदास के रूप में अवतार लिया तो हनुमान जी ने कई अवसर पर उनकी मदद की यहां तक की उनकी सहायता से ही तुलसीदास को चित्रकूट में राम के दर्शन भी हुए।
तुलसी कृत श्रीरामचरित मानस भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान रखता है। उत्तर भारत में रामायण के रूप में कई लोगों द्वारा प्रतिदिन पढ़ा जाता है। श्रीरामचरित मानस में इस ग्रन्थ के नायक को एक महाशक्ति के रूप में दर्शाया गया है जबकि महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में श्रीराम को एक मानव के रूप में दिखाया गया है। तुलसी के प्रभु राम सर्वशक्तिमान होते हुए भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। रामचरित मानस के बारे में स्वयं तुलसी ने कहा है-
नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद्, रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोपि। स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा, भाषानिबंध मति मंजुलमातनोति।। अर्थात नाना पुराणों, वेद शास्त्र जिससे सहमत हैं रामायण में उसी का वर्णन किया गया है और कुछ नहीं। स्वयं सुख प्राप्ति के लिए अपनि मति के अनुसार इस रघुनाथ गाथा को भाषा में निबद्ध किया है। अत: यह विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज ने अपनी मौलिकता में और अपनी कल्पनाशीलता में सृजन धर्मिता का निर्वहन किया है। हृदयस्थ श्रीराम भक्ति के आश्रय में तथा भूतभावन भगवान शिव की कृपा से तत्कालीन उपलब्ध भारतीय पारम्परिक संस्कृत साहित्य का आधार लेकर श्रीरामचरितमानस को भाषा बद्ध किया है। रामायण के सृजन में उन्हें शोध की सामग्री महर्षि वेदव्यास प्रणीत पुराण, गीता, उपनिषद् आदि साहित्य से प्राप्त हुई है।
हृदय परिवर्तन के बाद दस्यु से ऋषि बन जाने वाले वाल्मीकि  ऋषि ने संस्कृत भाषा में एक महाकाव्य की रचना की। इस ग्रंथ में 24,000 श्लोकों को 500 सर्ग और 7 कांड में बांटा गया है। इस महाकाव्य में अयोध्या के राजा राम के चरित्र को आधार बनाकर विभिन्न भावनाओं और शिक्षाओं को बहुत सरल तरीके से समझाया गया है।
राजा राम का चरित्र वाल्मीकी ने एक साधारण मानव के रूप में चित्रित किया है जो बाल रूप से लेकर राजा बनकर न्यायप्रिय तरीके से राज करके अपनी प्रजा के हित के लिए किसी भी निर्णय को लेने में हिचकते नहीं हैं।  उनके द्वारा किये गए कामों में कहीं भी किसी दैवीय शक्ति का प्रयोग दिखाई नहीं देता है।
 अवधी भाषा में रची गयी रामचरित मानस सोलहवीं शताब्दी में तुलसीदास द्वारा रची गयी रचना है. वाल्मीकि रामायण को आधार मान कर रची गयी यह रचना एक भक्त का अपने आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक है. तुलसीदास जी ने इस ग्रंथ में राम के चरित्र का निर्मल और विशद चित्रण किया है।
कहते हैं कि तुलसीदासजी महर्षि वाल्मीकि का अवतार थे जो मूल आदि काव्य रामायण के रचयिता थे। गोस्वामी तुलसीदास एक महान कवि थे। उनका जन्म राजापुर गांव (वर्तमान चित्रकूट धाम जिला) उत्तर प्रदेश में हुआ था। अपने जीवनकाल में तुलसीदास जी ने 12 ग्रन्थ लिखे और उन्हें विद्वान होने के साथ ही अवधी और हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक माना जाता है।
कहते हैं कि तुलसीदासजी महर्षि वाल्मीकि का अवतार थे जो मूल आदि काव्य रामायण के रचयिता थे।
भुलई नाम का एक व्यक्ति था। वह भक्ति-पथ और गोस्वामीजी की निन्दा किया करता था। उसकी मृत्यु हो गयी। सब लोग उसे अर्थी पर सुलाकर शमशान ले जा रहे थे। भुलई की स्त्री रोती हुई आई, और उसने गोस्वामीजी को प्रणाम किया। गोस्वामीजी के मुंह से सहज में निकल गया कि 'सौभाग्यवती भव!'
जब उसने अपने पति मृत्यु की बात बताई तो तुलसीदासजी ने उसके पति का शव अपने पास मंगवा लिया और मुंह में चरणामृत देकर उसे जीवित कर दिया। उसी दिन से गोस्वामी जी ने नियम ले लिया और बाहर बैठना छोड दिया।
. तुलसीदास बहुत ही उदार थे। किसी के मुख से राम नाम निकल जाये तो वे उस पर बहुत प्रसन्न थे। एक बार एक हत्यारा ब्राह्मण उनके यहां आया। दूर खडा होकर वह राम-राम कहने लगा। अपने इष्टदेव का नाम सुनकर तुलसीदासजी आनन्द में खो गए और उसके पास जाकर उसे हृदय से लगा लिया। आदर से भोजन कराया और बडी प्रसन्नता से कहा-
तुलसी जाके मुखनि ते, धोखेहु निकसत राम।
ताके पगकी पगतरी, मेरे तन को चाम ।।
यह बात जल्द ही सारे नगर में फैल गयी। शाम होते ही ज्ञानी, ध्यानी, विद्वान इकट्ठे हो गए। उन लोगों ने गोस्वामीजी से पूछा यह हत्यारा कैसे शुद्ध हो गया? तुलसीदास ने कहा वेदों, पुराणों में नाम-महिमा लिखी है उसे पढकर देख लीजिए।
तब उन लोगों का कहना था कि आप कोई ऐसा उपाय करें जिससे हमें विश्वास हो जाए तुलसीदास ने उस हत्यारे के हाथों से भगवान शिव के नन्दी को भोजन कराया, यह देखकर सबको विश्वास हो गया। चारों ओर जय-जय की ध्वनि होने लगी। निन्दकों ने तुलसीदास के चरणों को पकड़कर क्षमा मांगी।
गंगा तट पर स्थित राजापुर में आत्माराम की पत्नी प्रसव व्यथा से व्याकुल हो रही थी। दुबे जी बाहर परेशान बैठे थे तभी बच्चे को जन्म दिलानेवाली दाई दौड़ी-दौड़ी बाहर आयी। दाई ने ऐसी खबर सुनाई कि आत्माराम दुबे अपना सर पकड़ कर बैठ गए। दाई ने कहा कि लड़का हुआ है। लेकिन बच्चे को जन्म देने की पीड़ा से आपकी पत्नी की जान चली गयी। दुबे जी दुख से व्याकुल हो गये। कहते हैं जन्म के समय ही तुलसी के दो दांत थे और उन्होंने जन्मते ही राम नाम का उच्चारण किया था। कहते हैं कि इसीलिए कुछ लोग रामबोला बुलाने लगे थे। आत्माराम पत्नी की मृत्यु से बहुत दुखी थे उन्होंने एक ज्योतिषी को बुला कर बालक का भविष्य जानना चाहा। ज्योतिषी ने बेटे को देख कर कि-यह ऐसे खराब नक्षत्र में जन्मा है कि जन्मते ही मां को खा गया। इसके चलते पिता पर भी प्राण का संकट है। ज्योतिषी की बात सुन कर आत्माराम दुबे अपने बेटे तुलसी को घर से निकाल दिया। दाई को उस बालक पर तरस आ गया और वह उसे लेकर अपने घर चली गई। चुनिया दाई बच्चे को घर लेकर गई तो उसकी सास और उसके पति ने उसे बहुत भला-बुरा कहा। कुछ दिनों बाद तुलसी के पित आत्माराम दुबे की मौत हो गई और चुनिया दाई की भी सांप के काटने से मौत हो गयी। चुनिया दाई के पति का शक अब यकीन में बदल चुका था उसने उस बच्चे को घर से बाहर निकाल दिया। वह बच्चा पेड़ के नीचे जाकर सोया खाने के लिए लोगों से भीख भी मांगी। लेकिन सारे उसे मनहूस समझ कर भगा दिया करते।एक दिन वह भीख मांगते-मांगते मंदिर पहुंच गया। वहां पर उसकी मुलाकात संत नरहरी दास से हुई। उन्होंने उस पर तरस खाकर उसको अपने पास रखा और उसे राम का पाठ पढ़ाया। संत जी उसे अपने आश्रम में ले गए और उसे वेदों का ज्ञान भी कराया। संत ने उन्हें यह भी बताया कि किस तरह राम भगवान ने 14 वर्ष का वनवास काटा गरीबों और मजदूरों की मदद करी। और फिर उन्हें आचार्य शेष सनातन के साथ काशी ले गए।
 वह चाहते थे कि आगे का ज्ञान वह आचार्य से प्राप्त करें सनातन बाबा ने उन्हें वेदों का ज्ञान दिया और उसे बहुत सारी धार्मिक किताबें भी पढ़ाई। शिक्षा पूरी होने के बाद उसके गुरु जी ने उससे दक्षिणा यह मांगा की जाओ सबको राम का पाठ पढ़ाओ।
तब तक तुलसी का नाम रामबोला ही था। वे वापस अपने गांव पहुंचे और वहां पर जाकर राम नाम पर सत्संग करने लगे सुनने के लिए बहुत लोग आया करते क्योंकि उसके सत्संग से लोगों के दुख मिट जाया करते थे। यही रामबोला आगे चल कर तुलसीदास हुए और उनके गुणों की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। उसके बाद एक गांव के बंधु पाठक को तुलसीदास के बारे में पता चला तो उन्होंने उससे अपनी बेटी का विवाह करवाने का निश्चय किया। तुलसीदास से रत्नावली का विवाह करा दिया।
तुलसी अपनी पत्नी रत्नावली से बहुत प्रेम करते थे। वह उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकते थे। एक दिन जब यह काम से घर वापस लौटे। उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी अपने मायके गई हुई है। वह उसके बिना नहीं सकते थे और तो उससे मिलने के लिए वह रात तेज बारिश की अंधेरी  रात में भी उफनती यमुना नदी को तैर कर पार करने के बाद अपनी पत्नी से मिलने गए। उसके घर चले गए उन्हें देख रत्नावली बहुत परेशान हुई । रामबोला को विक्षिप्त हालात में अपने पास आया देख उनका अनादर करते हुए कहा कि 'अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति। नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत।। ' यानी इस हाड़ मांस की  देह से इतना प्रेम, अगर इतना प्रेम राम से होता तो जीवन सुधर जाता सारे दुख मिट जाते। भव बाधा नहीं व्यापती।
पत्नी की इस झिड़की तो जैसे रामबोला का जीवन ही बदल दिया। उनके रामबोला से तुलसीदास बनने का सर्वाधिक श्रेय रत्नावली को ही जाता है। पत्नी के उपदेस ने उनका जीवन ही बदल कर रख दिया। पत्नी की बात सुनकर उन्होंने सब कुछ त्यागने का निश्चय कर लिया। वह गंगा के तट पर गए और राम नाम का जाप करने लग गए।
इसके बाद वह राजपुर गांव में गये और वहां पर उन्होंने राम का सत्संग हिंदी में शुरू कर दिया क्योंकि उस समय हिंदी और संस्कृत बोली जाती थी। उनके सत्संग से काफी लोगों को राहत मिल गई लेकिन कुछ ऐसे ब्राह्मण से जो चाहते थे कि रामायण का प्रचार केवल संस्कृत भाषा में होना चाहिए क्योंकि संस्कृत भाषा ही सही है रामायण को पढ़ने के लिए। कुछ ब्राह्मणों ने उनका बहिष्कार भी किया लेकिन वह अपना काम करते रहे।
तुलसी ने रामचरितमानस में भगवान श्रीराम के चरित्र का चित्रण जितने प्रभावशाली तरीके से किया गया है, उतने ही प्रभावशाली तरीके से भगवान राम के माध्यम से जीवन को जीने का तरीका भी बताया है। रामचरितमानस में मनुष्य को बताया गया है कि जीवन को सफल और सुखी बनाना है तो राम को भजने के साथ ही सांसारिक व्यवहार का भी ध्यान रखना होगा।
विरक्त हो जाने के उपरांत तुलसीदास ने काशी को अपना मूल निवास-स्थान बनाया।तुलसीदास के जीवन का सर्वाधिक समय यहीं बीता। काशी के बाद सबसे अधिक दिनों तक अपने आराध्य राम की जन्मभूमि अयोध्या में रहे। मानस के कुछ अंश का अयोध्या में रचा जाना इस तथ्य का प्रमाण है। उनके जन्म स्थान राजापुर के तुलसी कुटीर में उनके रामचरित मानस के हस्तलिखित पृष्ठ सुरक्षित हैं जिनके दर्शन किये जा सकते हैं। कुछ पृष्ठ चित्रकूट धाम में कामदगिरि की परिक्रमा में तुलसीदास द्वारा लगाये गये पीपल के पुराने वृक्ष के पीछे एक कुटी में रहनेवाले साधु के पास हैं जिन्हें वे आग्रही दर्शनार्थियों को प्रेम से दिखाते हैं। यहां अभी जो वीडियो आप देख रहे हैं उसमें मेरा छोटा बेटा अवधेश त्रिपाठी और छोटी बहू कल्याणी त्रिपाठी परिक्रमा पथ पर तुलसी की हस्तलिपि में रामयण के पृष्ठों को देख और उनके बारे में साधु से जानकारी ले रहे हैं। 
तीर्थाटन के क्रम में तुलसीदास प्रयाग, चित्रकूट, हरिद्वार आदि भी गए। रामायण की कथा उन्होंने सर्वप्रथम अपने गुरु नरहरि दास से ही सुनी। वे कहते हैं- मैं पुनि निज गुरु सन सुनी कथा सो सूकरखेत। समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहउ अचेत।
  वे कहते हैं कि उन्होंने अपने गुरु से सूकरखेत में यह कथा (रामकथा) सुनी पर उस समय बालपन था इसलिए समझ नहीं पाया।
जिस सूकरखेत का उल्लेख तुलसीदास ने यहां किया है वह वर्तमान  में उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का सोरों नगर है। यह नैमिषारण्य तीर्थ के समीप हैं।
आज भी यह माना जाता है की रामचरित्र मानस ही वाल्मीकि जी के रामायण का अनुवाद है ।और हनुमान जी आज भी धरती पे रहते हुए श्री राम जी भक्ति करते है कहते है जहा रामजी के भजन गाये जाते है वहा  हनुमान जी अवश्य होते हैं।
तुलसीदास ऋषि वाल्मीकि के ही अवतार थे इसका उल्लेख भविष्योत्तर पुराण में भी मिलता है। उसमें एक श्लोक है-

   वाल्मीकिस्- तुलसीदासः कलौ देवि भविष्यति।              -       

  रामचन्द्रक- थामेतां भाषाबद्धां- करिष्यति॥

  इस श्लोक का अर्थ  यह है कि शिवजी पार्वती जी से कहते हैं कि हे देवि

वाल्मीकि कलियुग में तुलसीदास के रूप में अवतार लेंगे और सरल देशज

भाषा  रामकथा लिखेंगे।

एक उल्लेख यह भी मिलता है कि स्वयं ब्रह्मा ने वाल्मीकि से कहा था कि आप कलियुग में पुन:अवतार लीजिएगा और रामकथा को नये ढंग से सहज-सरल भाषा में

गायेंगे।


   तुलसीदास को संस्कृत विद्वान होने के साथ ही हिंदी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है। अपने जीवनकाल में उन्होंने 12 ग्रंथ लिखे। 
वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में बहुत सारे अन्तर हैं जिन्हें दोनों ग्रन्थ पढ़ने पर सरलता से देखा जा सकता है। इनमें से कुछ अन्तर इस तरह है...
सर्वप्रथम दोनों ग्रन्थों को लिखने की भावना में ही बहुत अन्तर है। ऋषि वाल्मीकि ने जहाँ मूलकथा को एक अवतार के रूप में बताने का प्रयत्न किया है, वहीं तुलसीदास ने श्रीराम की भक्ति में ग्रन्थ लिखा है। वाल्मीकि के राम देवताओं के हित के लिए विष्णु के अवतार हैं परन्तु तुलसीदास के राम स्वयं सर्वशक्तिशाली, अनादि, अनन्त ईश्वर हैं। स्वयंभुव मनु-शतरूपा तपस्या से राम को प्रसन्न कर उन्हें पुत्र रूप में पाने का वरदान माँगते हैं। तब प्रभु कहते हैं –आप सरिस कहं खोजहुं जाई। नृप तव तनय होब मैं आई। दूसरा अन्तर जो सभी जानते हैं, वह भाषा का है। रामायण कई शताब्दियों तक संस्कृत में पढ़ी-सुनी जाती रही, उसका अनुवाद दक्षिण भारत की अन्य भाषाओं में तो हुआ था परन्तु उत्तर भारत में नहीं। ऐसे में जब सम्पूर्ण भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार हो रहा था, धर्मांतरण का बोलबाला था, तुलसीदास ने श्रीराम के सुराज्य के अर्थ को समझाने हेतु रामकथा को जनमानस की भाषा में कहने का बीड़ा उठाया। उन्होंने इसके लिए अवधी भाषा को चुना। वह अयोध्या में रहते थे और उन्होंने अयोध्या में ही इस ग्रन्थ को रामनवमी के दिन लिखना प्रारम्भ किया। उन्होंने अपने रामचरित मानस ग्रंथ में भी इसका उल्लेख इस तरह किया है-संवत् सोलह सौ इकतीसा। कहहुं कथा प्रभु पद धर सीसा। नौमी भौमवार मधुमासा। अवध पुरी यह चरित प्रकाशा।।
 वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास के रामचरित मानस के कथा-प्रसंगों में भी बहुत अंतर है. रामायण में केवट का कोई वर्णन नहीं हैं। रामचरितमानस में रामभक्ति में ऐसे प्रसंग जोड़े गए हैं। रामायण में निषादराज गुह भारद्वाज ऋषि के आश्रम में नहीं गए थे जबकि रामचरितमानस में वह राम के साथ ही आश्रम में जाते हैं।
       रामायण में राम को भारद्वाज ऋषि चित्रकूट में रहने का सुझाव देते हैं, रामचरितमानस में वाल्मीकि यह सुझाव देते हैं। इससे संबंधित चौपाई है-चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहं सब भांति तुम्हार सुपासू।।
    
      रामायण में सीता राम से मृग को पकड़ कर लाने के लिए कहतीं हैं जिसे वह अयोध्या ले जा सकें। रामचरितमानस में सीता मृगचर्म लाने को कहतीं हैं।
रामायण में लक्ष्मण को पहले ही सन्देह हो जाता है कि मृग रूप में मायावी मारीच ही होगा परन्तु रामचरितमानस में ऐसा नहीं है।
रामायण में मारीच मरते समय सीता और लक्ष्मण दोनों को पुकारता है परन्तु रामचरितमानस में केवल लक्ष्मण को पुकारता है।
रामचरितमानस में सीता का नहीं छायासीता का हरण होता है जबकि रामायण में ऐसा नहीं है।

ऐसे और भी कई अंतर वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामचरित मानस में हैं।

तुलसीदास जी के जन्म-मरण के बारे में ये दोहे प्रचलित हैं।

पंद्रह सै चौवन विषै,कालिंदी (यमुना) के तीर,

सावन शुक्ला सप्तमी,तुलसी धरेउ शरीर।

गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म विक्रमी सम्वत् 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी को

संवत सोलह सौ असी ,असी गंग के तीर।श्रावण शुक्ला सप्तमी ,तुलसी तज्यो शरीर ॥

इस तरह से वह रामकथा गाकर जो आज पूरे विश्व में विख्यात है यह महाकवि अपनी इहलोक की लीला समाप्त कर परमधाम को सिधार गये। उनकी अमर कृति रामचरित मानस घर-घर में समादृत है। इसे धार्मिक प्रवृत्ति के लोग श्रद्धापूर्वक गाते हैं, इस पर आधारित रामकथा का मंचन रामलीला के रूप में करते हैं।

 

 
 
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Thursday, April 15, 2021

 



अभिनेता मिठुन चक्रवर्ती के साथ पत्रकार राजेश त्रिपाठी
आज अभिनेता मिठुन चक्रवर्ती भाजपा में शामिल हो गये हैं । भाजपा के प्रचार के लिए वे जहां-जहां गये उनके चाहने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी। आज मिठुन मोनार्क ग्रुप आफ ग्रुप होटल के मालिक हैं। उनके होटल ऊटी, मुंबई, दार्जिलिंग आदि में हैं। आज लोग उन्हें नक्सलाइट और ना जाने क्या-क्या कह रहे हैं। कोई किसी विचारधारा का समर्थक हो इसमें तब तक कोई बुराई नहीं जब तक उसके विचार, उसका काम जनविरोधी, समाजविरोधी ना हों। मिठुन चक्रवर्ती के संघर्ष से लेकर सफलता और फिर अपने अभिनय कैरियर से उत्कर्ष तक पहुंचने की कहानी बहुतों को प्रेरणा दे सकती है। हम यहां उनके जीवन के फिल्मी नहीं बल्कि उनके ऐसे रूप को आपके सामने पेश करने जा रहे हैं जिससे शायद आप अनभिज्ञ होंगे। इसीलिए हमने शीर्षक रखा’ इस मिठुन चक्रवर्ती को आप नहीं जानते।’ मिठुन के सहृदय रूप की एक मिसाल यह भी। कई वर्ष पहले की बात है मिठुन उन दिनों कोलकाता आये थे। उन्होंने एक बंगला अखबार में एक खबर पढ़ी की कोई एक नन्हीं बच्ची को कचड़े के ढेर में फेंक गया और उसे कोई एक सहृदय व्यक्ति उठा कर ले गया है। मिठुन ने उस व्यक्ति की तलाश की और उसके घर गये और उस बच्ची को विधिवत सारी कागजी कार्रवाई पूरी कर गोद ले लिया और अपने साथ मुंबई ले गये। मिठुन और उनकी पत्नी योगिता बाली ने उस बच्ची का नाम रखा दिशानी चक्रवर्ती और उसे अपने बेटों की तरह ही पाला कोई भेदभाव नहीं किया। दिशानी ने न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी से अभिनय का प्रशिक्षण लिया है। वे जल्द ही अभिनय क्षेत्र में आ सकती हैं।
अब वह किस्सा जो मुझसे जुड़ा है। बात उन दिनों की है जब मैं कोलकाता में इंडियन एक्सप्रेस (मुंबई) के हिंदी दैनिक जनसत्ता में कार्यरत था। फिल्म से संबंधित समाचार व कार्यक्रमों के संकलन का जिम्मा मुझ पर ही था। उन्हीं दिनों मिठुन कोलकाता आये हुए थे। उनका पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से दार्जिंलिंग में नागरिक
अभिनंदन
किया जाना था। थोड़ी देर के लिए वे दमदम एयरपोर्ट के पास ही होटल अशोक (अब इसका अस्तित्व नहीं है) में ठहरे थे मैंने कहीं से उनका नंबर जुगाड़ किया और उनसे बात की कि मैं उनसे थोड़ी देर के लिए ही सही मिलना चाहता हूं। उन्होंने हामी भर ली और कहा –‘जल्द आ जाइए, मुझे कुछ देर बाद दार्जिंलिंग के लिए निकलना है।‘ मैंने कहा-‘हां मैं तुरत आ जाऊंगा।‘ बीच यह बताता चलूं कि इसके पहले भी मैं मिठुन से टालीगंज के एक स्टूडियो में मिल चुका था। तब वे फिल्मों में पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। अब जब मैं उनसे मिलने जा रहा था तब वे एक स्टार के रूप में स्थापित हो चुके थे।
मैं होटल अशोक पहुंचा तो वहां सेक्यूरिटी वालों की भीड़ थी। वे राजकीय अतिथि थे इसलिए सेक्यूरिटी से मिल कर उनकी अनुमति मिलने पर ही मिठुन तक पहुंचा जा सकता था। मैंने सेक्युरिटी वालों से कहा कि मुझे मिठुन से मिलना है, उनके समया ले रखा है पर वे राजी नहीं हुए। वे बोले कि वे दार्जिलिंग के लिए निकलनेवाले हैं अब किसी से नहीं मिलेंगे। मैंने आग्रह किया कि वे लोग फोन करके मेरा नाम लेकर मिठुन ,से पूछें कि अगर वे नहीं मिलना चाहते तो मैं यहीं से लौट जाऊंगा। खैर मेरा यह आग्रह स्वीकार हो गया और सेक्यूरिटी वाले ने मिठुन को फोन किया। ऊपर से जो उत्तर आया वह आशाजनक था। सेक्युरिटी वाले ने कहा –जल्द जाइए, मिठुन दादा आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं।
मैं तुरत ऊपर पहुंचा। देखा मिठुन दा पत्रकारों से घिरे थे। उनमें एक ‘युगांतर’ बंगला दैनिक के सिने संपादक भी थे जिनका बाकायदा चरण स्पर्श कर मिठुन ने स्वागत किया। पत्रकारों में मेरे परिचित ‘वर्तमान’ बंगला दैनिक के सिनेमा स्तंभ देखने वाले सुमन गुप्त भी थे।
मिठुन ने देखा और मुझे अपने पास बैठाया उसके बाद औपचारिक बातचीत शुरू हुई। सामने टेबल पर खिचड़ी और जलेबी रखी थीं। मिठुन की सदाशयता और सरल व्यवहार उस समय नजर आया जब वे मुझे भी जलेबी खाने का आग्रह करने लगे। मेरे लाख मना करने पर उन्होंने एक जलेबी खिला ही थी। वहीं टेबल पर एक शीशी रखी थी जिसमें हरे रंग की एक क्रीम थी। (ऊपर की तस्वीर में आप वह शीशी देख सकते हैं उसमें आपको टेबल के किनारे रखी वह शीशी नजर आयेगी।) उस शीशी को दिखाते हुए मिठुन बोले-’दादा, इटली के मेरे एक फैन ने यह क्रीम भेजी है। उसने कहा है कि कुछ दिन लगाने से रंग काफी साफ हो जायेगा। कुछ फर्क देख रहे हैं क्या।’ यहां यह बताता चलूं कि वर्षों पहले जब मिठुन से मिला था तो उनका रंग गहरा सांवला था अभी सामान्य फर्क तो दिख रहा था सो कह दिया –हां दादा कुछ तो फर्क है।
इस प्रसंग को आगे ना बढ़ाते हुए अब उस प्रसंग पर आते हैं जिसमें आपको वह मिठुन चक्रवर्ती मिलेंगे जिन्हें आपमें से कई लोग नहीं जानते होंगे। मैंने मिठुन का इंटरव्यू रिकार्ड कर लिया था और जब मैं कैसेट चला कर कोलकाता के बी के पाल एवेन्यू स्थित जनसत्ता के आफिस में कंपोज कर रहा था यह कहानी उसी वक्त शुरू होती है। जनसत्ता के साथ ही फाइनैंसियल एक्सप्रेस के लोग भी बैठते थे। मेरे बगल में ही फाइनैंसियल एक्सप्रेस के टाइपिस्ट बैठते थे। अब नाम नहीं याद आ रहा (संभवत: अजय नाम था)। उन्होंने जब मिठुन की आवाज कैसेट में सुनी तो बोले-‘इसमें मिठुन चक्रवर्ती की आवाज है क्या?’ मैंने ‘हां’ में उत्तर दिया इस पर उन्होंने आग्रह किया –‘काम हो जाने पर यह कैसेट एक दिन के लिए मुझे दे सकेंगे।’ मैंने कहा –‘हां दे दूंगा पर क्या बात है कुछ बतायेंगे।’
इसके बाद जो प्रसंग उन्होंने सुनाया वह मिठुन के ऐसे उदार, सहृदय रूप को पेश करता है जो अतुलनीय, प्रशंसनीय, अनुकरणीय है। उन्होंने जो कहानी बतायी मैं हूबहू यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। उन्होंने बताया कि उनके घर के पास ही एक परिवार रहता है जो बहुत गरीब है। उनके एकमात्र पुत्र है जो गंभीर हृदय रोग से पीड़ित था। उसे किसी तरह से उन्होंने बीएम बिड़ला हार्ट रिसर्च सेंटर में भर्ती तो करा दिया गया लेकिन परिवार के पास इलाज का खर्चा उठाने के लिए पैसे नहीं थे। बेटे की जान किस तरह बचाये इसी चिंता में डूबा पिता रोता रहता था। तभी उसके किसी परिचित ने उसे एक रास्ता बताया कि-‘मिठुन चक्रवर्ती किसी कार्यक्रम में भाग लेने दार्जिलिंग जाने वाले हैं। वे अभी कोलकाता के ग्रांड होटल में ठहरे हैं। वे बहुत दयालु हैं दूसरों का दुख दूर करने को बेताब रहते हैं। तुम किसी तरह गार्ड के हाथ पैर जोड़ कर उनसे मिलो और अपना दुख बताओ वे जरूर मदद करेंगे।’
बीमार बेटे का बाप किसी तरह से ग्रांड होटल पहुंचा, गार्ड से सारा हाल बताते हुए रोकर प्रार्थना की वह उसे मिठुन से मिल लेने दें। गार्ड भी उसकी बात सुन कर पिघल गया और बोला-‘जाओ अगर वे मिलना चाहें तो मिल लो।’
उस दुखी व्यक्ति से मिठुन दा ना केवल मिले अपितु उनके पास जो रुपये थे उसे देने के साथ ही हास्पिटल के लिए अपने लेटरपैड में एक पत्र लिख दिया कि बच्चे की चिकित्सा में जो भी खर्च आये वह उनके नाम दर्ज कर लिया जाये वे चुका देंगे।
मिठुन की कृपा से उस गरीब व्यक्ति के बच्चे का बेहतर चिकित्सा हुई उसकी जान बच गयी और उसकी चिकित्सा का सारा खर्च मिठुन चक्रवर्ती ने उठाया।
फाइनैंसियल एक्सप्रेस के हमारे उस टाइपिस्ट बंधु ने बताया कि जिस व्यक्ति के बच्चे की प्राण-रक्षा में मिठुन मददगार बने उस व्यक्ति ने अपने घर में देवताओं के चित्रों के बीच मिठुन चक्रवर्ती का चित्र भी लगा रखा है और धूप दीप से उनकी भी पूजा देवताओं की तरह करते हैं। उनका कहना है कि मेरे एकमात्र बच्चे की रक्षा के लिए तो मिठुन ही ईश्वर का एक रूप साबित हुए। उस व्यक्ति ने जब कैसेट में मिठुन की आवाज सुनी तो पुलकित हो गया। मेरे टाइपिस्ट बंधु ने बताया कि उस व्यक्ति ने मेरे लिए भी आशीषों की झड़ी लगा दी कि मैंने उसको उसके ईश्वर तुल्य मिठुन दा की आवाज सुनायी।

Wednesday, April 7, 2021

ओरछा जहां आज भी है राम राजा सरकार का राज


अगर आपसे यह कहा जाये कि अभी कलियुग में भी राजा राम एक जगह राजा के रूप में राज करते हैं  पर वह जगह अयोध्या नहीं है तो आपको शायद ही विश्वास हो। पर यह सच है कि राम राजा सरकार आज भी एक जगह राजा के रूप में विराजते हैं और उन्हें दिन में पांच बार सलामी दी जाती है। यह जगह है मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले का ओरछा टाउन। कथा प्रख्यात है कि 16 वीं शताब्दी में ओरछा की महारानी गणेश कुंवरि राम राजा को अयोध्या से लायी थीं और तब से राम राजा ओरछा में विराजते हैं पूरी राजकीय भव्यता के साथ यहां विराजते हैं। यहां उनकी ही सत्ता चलती है इसीलिए उनको ओरछा में राम राजा सरकार के रूप में ही जाना और पुकारा जाता है।  21 दिन के तप के बाद रानी गणेश कुंवरि राम राजा को अयोध्या ले लायी थीं। राम ने अयोध्या से ओरछा आने के लिए तीन शर्तें रखी थीं जिन्हें पूरा कर के ही रानी राम को ओरछा लायी थीं।

 उत्तरप्रदेश  के  झांसी  से  ओरछा की  दूरी  लगभग  14 किलोमीटर  है। ओरछा की स्थापना 15वीं शताब्दी में रुद्र प्रताप सिंह जू बुन्देला ने की थी। ओरछा की ख्याति देश में जिस एक मंदिर को लेकर है वह है राम राजा सरकार का मंदिर। यह मंदिर भगवान राम की मूर्ति के लिए बनवाया गया था, लेकिन मूर्ति  की स्थापना वहां नहीं कि जा सकी क्योंकि मूर्ति जहां लाकर रख दी गयी थी वहां से हिली ही नहीं। 

इस मूर्ति को मधुकर शाह बुन्देला की रानी गनेश कुंवरि अयोध्या से लाई थीं। चतुर्भुज मंदिर बनने से पहले रानी पुष्य नक्षत्र में अयोध्या से पैदल चल कर बाल स्वरूप भगवान राम लला को ओरछा लायीं लेकिनरात्रि हो जाने के कारण भगवान राम को कुछ समय के लिए महल के भोजन कक्ष में स्थापित किया गया। लेकिन मंदिर बनने के बाद कोई भी मूर्ति को उसके स्थान से हिला नहीं पाया। इसे ईश्वर का चमत्कार मानते हुए महल को ही मंदिर का रूप दे दिया गया और इसका नाम रखा गया राम राजा मंदिर। आज इस महल के चारों ओर शहर बसा है और राम नवमी पर यहां हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं। भगवान राम को यहां भगवान मानने के साथ का राजा भी माना जाता है, क्योंकि उस मूर्ति का चेहरा मंदिर की ओर न होकर महल की ओर है। आज भी भगवान राम को राजा के रूप में राम राजा सरकारकी तरह ओरछा के मंदिर में पूजा जाता है और उन्हें मध्यप्रदेश पुलिस के गार्डों द्वारा सलामी दी जाती है। ओरछा में ४०० वर्ष पूर्व भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था और तब से आज तक  श्रीराम को राजा के रुप में पूजा जाता है। 

भगवान राम के अयोध्या से ओरछा आने की कहानी इस प्रकार है। एक दिन कृष्ण भक्त ओरछा नरेश मधुकरशाह ने अपनी रानी गणेश कुंवरि से कृष्ण दर्शन की इच्छा से वृंदावन की यात्रा पर चलने को कहा। रानी गणेश कुंवरि राम भक्त थीं। उन्होंने वृंदावन जाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे तो राम के दर्शन के लिए अयोध्या जाना चाहती हैं। अपनी आज्ञा की अवहेलना से राजा क्रोधित हो गये। उन्होंने रानी से कहा कि अगर वे सच्ची रामभक्त हैं तो फिर अयोध्या जाकर अपने राम को ओरछा ले आयें। रानी गणेश कुंवरि ने अयोध्या जाकर सरयू नदी के किनारे लक्ष्मण किले के पास अपनी कुटी बनायी और वहीं राम की तपस्या प्रारंभ कर दी। यह उन दिनों की बात है जब पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास भी अयोध्या में भगवान राम की तपस्या कर रहे थे। संत शिरोमणि तुलसीदास से आशीर्वाद पाकर रानी गणेश कुंवरि राम की आराधना में लीन हो गईं। लेकिन रानी को कई महीनों तक रामराजा के दर्शन नहीं हुए। निराश होकर गणेश कुंवरि अपने प्राण त्यागने के लिए सरयू नदी में कूद गयीं। वहां जल की गहराई में उन्हें रामराजा के दर्शन हुए। रानी ने उनसे अपनी इच्छा बतायी। रामराजा ने ओरछा चलना स्वीकार तो किया लेकिन इसके लिए तीन शर्तें रख दीं। इनमें से पहली शर्त यह थी कि अयोध्या से लेकर ओरछा तक की पूरी यात्रा पैदल होगी, दूसरी शर्त यह कि यात्रा केवल पुष्प नक्षत्र में होगी, तीसरी शर्त यह कि रामराजा की मूर्ति एक बार जिस जगह रख दी जाएगी वहां से फिर नहीं उठेगी।

इसके बाद रानी  गणेश कुंवरि ने राजा मधुकरशाह को संदेश भेजा कि वह रामराजा को लेकर ओरछा आ रहीं हैं। राजा मधुकरशाह ने रामराजा की मूर्ति स्थापना को स्थापित करने के लिए करोडों की लागत से चतुर्भुज मंदिर का निर्माण कराया। जब रानी ओरछा पहुंचीं तो उन्होंने यह मूर्ति अपने महल में रख दी। यह निश्चित हुआ कि शुभ मुर्हूत में मूर्ति को चतुर्भुज मंदिर में रख कर इसकी प्राण प्रतिष्ठा कर दी जायेगी। लेकिन राम के इस विग्रह ने चतुर्भुज मंदिर जाने से इनकार कर दिया। कहते हैं कि राम की वह बालरूप मूर्ति किसी से टारे नहीं टरी। राम आज भी इसी महल में विराजमान हैं और उनके लिए बना करोडों का चतुर्भुज मंदिर खाली पडा है।

राम राजा की जो मूर्ति ओरछा में विराजमान है उसके बारे में कहा जाता है कि जब राम वनवास जाने लगे तो उन्होंने अपनी मां कौशल्या को एक बाल मूर्ति दी थी। मां कौशल्या उसी को बाल भोग लगाया करती थीं। जब राम वनवास समाप्त कर अयोध्या लौट आये तो कौशल्या ने यह मूर्ति सरयू नदी में विसर्जित कर दी। यही मूर्ति रानी गणेश कुंवरि को सरयू की मझधार में मिली थी। यह विश्व का अकेला ऐसा मंदिर है जहां राम की पूजा राजा के रूप में होती है और उन्हें सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के बाद सलामी दी जाती है। श्रीराम की प्रतिमा को लेकर रानी गणेशकुंवरि साधु संतों और महिलाओं के बड़े काफिले के साथ अयोध्या से लगभग पांच सौ किलोमीटर दूर ओरछा की यात्रा पर निकल पड़ीं। साढ़े आठ माह में प्रण पूरा करके रानी रामनवमी को ओरछा पहुंचीं। ओरछा नरेश मधुकरशाह ने सेना के साथ भगवान राम का ओरछा में शाही सम्मान से स्वागत किया और उन्हें ओरछा के श्री रामराजा सरकार के रूप में मान्यता दी। तब से आज भी रामराजा सरकार को सशस्त्र बल के साथ सुबह शाम राजकीय सेल्यूट देने सरयू से जलसमाधि करने के दौरान साधू ने दी। रानी सरयू में जलसमाधि लेने को तैयार हो गईं। 

तभी एक साधु ने सरयू के किलाघाट की बालू से निकाल कर भगवान राम, सीता, लक्ष्मण की प्रतिमाएं रानी को दे दीं जो उन्होंने राममंदिर के टूटने के पहले छिपा कर रख दी थीं। 

यहां राम की मान्याता ओरछाधीश के रूप में है। रामराजा मंदिर के इर्द गिर्द हनुमान जी के मंदिर हैं। छडदारी हनुमान, बजरिया के हनुमान, लंका हनुमान के मंदिर एक सुरक्षा चक्र के रूप में चारों तरफ हैं। 

राज महल के समीप स्थित चतुर्भुज मंदिर ओरछा का मुख्य आकर्षण है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण राजा मधुकर ने करवाया था। 

ओरछा का नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो है जो 163 किलोमीटर की दूरी पर है। यह एयरपोर्ट दिल्ली, वाराणसी और आगरा से नियमित उड़ानों से जुड़ा है। झांसी ओरछा का नजदीकी रेल मुख्यालय है। दिल्ली, आगरा, भोपाल, मुम्बई, ग्वालियर आदि प्रमुख शहरों से झांसी के लिए अनेक रेलगाड़ियां हैं। वैसे ओरछा तक भी रेलवे लाइन है।

राम राजा सरकार के दर्शन के लिए विदेशी पर्यटक भी आते हैं । रामराजा मंदिर भगवान राम और जानकी जी की मूल प्रतिमाओं के लिए विशेष स्थान रखता है। ओरछा के राम राजा सरकार के दर्शन के लिए प्रतिवर्ष लाखों लोग आते हैं।

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Saturday, April 3, 2021

क्या महाभारत युद्ध में हुआ था परमाणु अस्त्रों का प्रयोग ?

 


ब्रह्मास्त्र का निर्माण ब्रह्मा जी ने किया था. इसको राक्षसों के विनाश के लिए बनाया गया था। उनके नाम से ही इसे ब्रहमास्त्र के रूप में जाना जाता है। रामायण और महाभारत युद्ध में भी ब्रह्मास्त्रों का प्रयोग किया गया था। आपने उस समय के युद्ध के प्रसंगों में इन अस्त्रों के प्रयोग के समय किसी को प्रयोगकर्ता को यह सावधान करते पाया होगा कि इसका प्रयोग मत करो इससे बड़ा विनाश होगा। वैज्ञानिकों ने भी अपने प्रयोगों में पाया है कि ब्रह्मास्त्रों का प्रयोग बहुत पहले से होता आया है। हमारे मिसाइल मैन नाम से प्रसिद्ध महान वैज्ञानिक और हमारे देश के राष्ट्रपति रहे एपीजे अब्दुल कलाम ने भी माना  था कि महाभारत और रामायण काल में भी परमाणु अस्त्रों का प्रयोग हुआ था जो उस वक्त ब्रह्मास्त्र के रूप में जाने जाते थे। कहते हैं कि ब्रह्मास्त्र का पहला प्रयोग महर्षि विश्वामित्र ने वसिष्ठ जी पर किया था। वैज्ञानिकों ने अपने कई शोधों में पाया है कि महाभारत युद्ध में कई तरह के ब्रह्मास्त्रों या परमाणु अस्त्रों का प्रयोग किया गया था। रामायण और महाभारत काल में जिन ब्रह्मास्त्रों का इस्तेमाल किया गया वे आज के परमाणु अस्त्रों से भी ज्यादा ऊर्जा का सृजन करने वाले और उनसे कई गुना ज्यादा विनाशकारी थे। कहते हैं जब ब्रह्मास्त्र छोड़ा जाता था तो बहुत ऊर्जा उत्पन्न होती थी लगता था एक साथ जैसे सैकडों ज्वालामुखियों में विस्फोट हो गया हो। इनकी ऊर्जा सूर्य की ऊर्जा से भी बहुत अधिक होती थी। 

अमेरिका के जे राबर्ट ओपनहाइमर और डॉक्टर वर्तक की रिसर्च में ब्रह्मास्त्र को परमाणु हथियार माना गया। ऐसा इसलिए क्योंकि महाभारत में लाखों लोगों के एक साथ मारे जाने का उल्लेख है और यह एक परमाणु हथियार से ही संभव था। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मास्त्र एक दैवीय हथियार था। माना जाता है कि यह अचूक और सबसे भयंकर अस्त्र था।

ओपनहीमर ने गीता और महाभारत का गहन अध्ययन किया था। उन्होंने महाभारत में बताए गए ब्रह्मास्त्र की मारक क्षमता पर रिसर्च किया और अपने मिशन को नाम दिया था ट्रिनिटी अर्थाच त्रिदेव। इस रिसर्च के बाद वैज्ञानिकों ने माना कि महाभारत में परमाणु अस्त्रों का प्रयोग हुआ था।

जे रॉबर्ट के साथ 1939 से 1945 के बीच वैज्ञानिकों के एक दल ने अनुसंधान किया था। पुणे के पद्माकर विष्णु वर्तक ने भी अपने अनुसंधान के आधार पर कहा था कि महाभारत के समय जो ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल किया गया था, वह परमाणु बम के समान ही था।

प्राचीन या पौराणिक काल में 5 सबसे महाप्रलयंकारी अस्त्र थे। येथे ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, पाशुपतास्त्र वज्र और सुदर्शन चक्र।

ब्रह्मास्त्र के प्रभाव का वर्णन महाभारत के इस श्लोक में किया गया है-

तदस्त्रं प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमंडल संवृतम।

सशब्द्म्भवम व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम।

चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा।। महाभारत ।। 8-10-14 ।। अर्थात ब्रह्मास्त्र छोड़े जाने के बाद भयंकर वायु जोरदार थपेड़े मारने लगी। सहस्रों उल्का आकाश से गिरने लगे। प्राणियों के लिए भयंकर महाभय उत्पन्न हो गया। आकाश में बड़ा शब्द हुआ। आकाश जलने लगा। पर्वत, अरण्य, वृक्षों के साथ पृथ्वी हिल गई।

ब्रह्मास्त्र एक दैवीय हथियार था। माना जाता है कि यह अचूक और सबसे भयंकर अस्त्र था। जो व्यक्ति इस अस्त्र को छोड़ता था, वह इसे वापस लेने की क्षमता भी रखता था, लेकिन अश्वत्थामा को इसे वापस लेने का तरीका पता नहीं था। रामायण और महाभारतकाल में ये अस्त्र गिने-चुने योद्धाओं के पास थे।

 

सौप्तिक पर्व में ऐषीक पर्व नामक एक उपपर्व है। अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्य-कौरव पक्ष के शेष इन तीन महारथियों का वन में विश्राम, तीनों की आगे के कार्य के विषय में मत्रणा, अश्वत्थामा द्वारा अपने क्रूर निश्चय से कृपाचार्य और कृतवर्मा को अवगत कराना, तीनों का पाण्डवों के शिविर की ओर प्रस्थान, अश्वत्थामा द्वारा रात्रि में पाण्डवों के शिविर में घुसकर समस्त सोये हुए पांचाल वीरों का संहार, द्रौपदी के पुत्रों का वध, द्रौपदी का विलाप तथा द्रोणपुत्र के वध का आग्रह, भीम द्वारा अश्वत्थामा को मारने के लिए प्रस्थान करना और श्रीकृष्ण अर्जुन तथा युधिष्ठिर का भीम के पीछे जाना, गंगातट पर बैठे अश्वत्थामा को भीम द्वारा ललकारना, अश्वत्थामा द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग, अर्जुन द्वारा भी उस ब्रह्मास्त्र के निवारण के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग, व्यास की आज्ञा से अर्जुन द्बारा ब्रह्मास्त्र का उपशमन, अश्वत्थामा की मणि लेना और अश्वत्थामा का मानमर्दित होकर वन में प्रस्थान आदि विषय इस पर्व में वर्णित है।

ब्रह्मास्त्र अचूक और एक विकराल अस्त्र है। यह शत्रु का नाश करके ही छोड़ता है। इसका काट केवल दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं। ये वे आयुध हैं, जो मन्त्र से चलाये जाते हैं। ये दैवी हैं। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तुत: इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र भा कहते हैं।

दो ब्रह्मास्त्रों के आपस में टकराने से प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इससे समस्त पृथ्वी के समाप्त होने का भय रहता है। महाभारत के युद्ध में ब्रह्मास्त्र का बड़ा ही रोचक वर्णन आया है, जो इस प्रकार से है-

'महाभारत का युद्ध अठारह दिन तक चला। अश्वत्थामा को जब दुर्योधन के अधर्म-पूर्वक किये गये वध के विषय में पता चला, तो वे क्रोध से अंधे हो गये। उन्होंने शिविर में सोते हुए सभी पांडव पुत्रों का वध कर दिया। द्रौपदी को जब इसका पता चला तो उसने अनशन कर दिया और कहा कि वह अनशन तभी तोड़ेगी, जबकि अश्वत्थामा के मस्तक पर सदैव बनी रहने वाली मणि उसे प्राप्त होगी। कौरव-पांडवों के युद्ध में अश्वत्थामा ने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। शिव-प्रदत्त पाशुपत अस्त्र से अर्जुन ने ब्रह्मास्त्र को निरस्त कर दिया था।  पांडवों को जड़-मूल से नष्ट करने के लिए अश्वत्थामा ने गर्भवती उत्तरा पर भी वार किया था। अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा, प्रत्युत्तर में अर्जुन ने भी छोड़ा। अश्वत्थामा ने पांडवों के नाश के लिए छोड़ा था और अर्जुन ने उसके ब्रह्मास्त्र को नष्ट करने के लिए। नारद तथा व्यास के कहने से अर्जुन ने अपने ब्रह्मास्त्र को वापस कर लिया पर अश्वत्थामा ने कहा कि उसे ब्रह्मास्त्र वापस लेने की कला नहीं आती और उसने अपना ब्रह्मास्त्र अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा का गर्भ नष्ट करने के लिए छोड़ दिया। कृष्ण ने अश्वत्थामा से कहा- 'उत्तरा को परीक्षित नामक बालक के जन्म का वर प्राप्त है। उसका पुत्र होगा ही। यदि तेरे शस्त्र-प्रयोग के कारण मृत हुआ तो भी मैं उसे जीवनदान करूंगा। वह भूमि का सम्राट होगा और तू? नीच अश्वत्थामा! तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ तीन हज़ार वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की गंध आती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।' जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि थी, जो कि उसे दैत्य, दानव, अस्त्र-शस्त्र आदि व्याधियों से निर्भय रखती थी। वही मणि द्रौपदी ने मांगी थी। व्यास तथा नारद के कहने से उसने वह मणि द्रौपदी के लिए दे दी। उल्लेख है कि उत्तरा का  गर्भ नष्ट हो इससे पहले कृष्ण ने अपने प्रभाव से गर्भ के आस पास ऐसा सुरक्षा कवच बना दिया जिससे अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र निष्फल हो गया।

राम रावण युद्ध के दौरान भी ब्रह्मास्च्र का प्रयोग हुआ था। रावण का पुत्र मेघनाद ब्रह्म विद्या में निपुण था। इस विद्या में वह रावण से भी कहीं बढ़कर था। विस्‍फोटक व विंध्‍वसक अस्‍त्रो का तो इस युद्ध में खुल कर प्रयोग हुआ जिसमें ब्रह्मास्‍त्र सबसे खतरनाक था। इन्‍द्र ने शंकर से राम के लिए दिव्‍यास्‍त्र और पशुपतास्‍त्र मांगे थे। इन अस्‍त्रों को देते हुए शंकर ने अगस्त्य को चेतावनी देते हुए कहा, ‘अगस्‍त्‍य तुम ब्रह्मास्‍त्र के ज्ञाता हो और रावण भी। कहीं अणुयुद्ध हुआ तो वर्षों तक प्रदूषण रहेगा। जहां भी विस्‍फोट होगा, वह स्‍थान वर्षों तक निवास के लायक नहीं रहेगा। इसलिए पहले युद्ध को मानव कल्‍याण के लिए टालना ?' लेकिन अपने-अपने अहं के कारण युद्ध टला नहीं। ब्रह्माशास्‍त्र के प्रस्‍तुत परिणामों से स्‍पष्‍ट हो जाता है कि ब्रह्मास्‍त्र परमाणु बम ही था।

राम द्वारा सेना के साथ लंका प्रयाण के समय द्रुमकुल्‍य देश के सम्राट समुद्र ने रावण से मैत्री होने के कारण राम को अपने देश से मार्ग नहीं दिया तो राम ने अगस्‍त्‍य के अमोध अस्‍त्र (ब्रह्मास्‍त्र) को छोड़ दिया। जिससे पूरा द्रुमकुल्‍य देश ही नष्‍ट हो गया। यह अमोध अस्‍त्र हाइड्रोजन बम अथवा एटम बम ही था। मेघनाद की वेधशाला में शीशे (लेड) की भट्‌टियां थीं। जिनमें कोयला और विद्युत धारा प्रवाहित की जाती थी। इन्‍हीं भट्‌टियों में परमाणु अस्‍त्र बनते थे और नाभिकीय विखण्‍डन की प्रक्रिया की जाती थी।

 महाभारत में पांडवों और कौरवों के बीच कुरुक्षेत्र का युद्ध इतिहास में अपनी अलग ही छाप छोड़ता है। यह दोनों ही युद्ध कोई साधारण युद्ध नहीं थे। इसमें ब्रह्मास्त्र जैसे अस्त्रों का प्रयोग हुआ। रामायण और महाभारत दोनों युद्धों में विनाश के अस्त्र- शस्त्रों का जम कर जिन्हें भीषण विध्वंस मचानेवाला माना जाता है। इससे यह ज्ञात होता है कि आज जो अणु अस्त्र पाये जाते हैं उनका आवष्कार हजारों वर्ष पहले ही हो गया थ।

यह भी पता चलता है कि महाभारत या रामायण कालीन ब्रह्मास्त्र मंत्र बल से संचालित होते थे और प्रयोग करनेवाला चाहे तो उन्हें वापस भी ले सकता था।

महाभारत में भीम के पौत्र बरबरीक को भगवान शिव ने तीन बाण दिए थे, जिसने उसे महाभारत के युद्ध का सबसे ताकतवर योद्धा बना दिया। कार्य क्षमता- निशाना साधने के बाद, ये साधे निशाने को ही भेदते हैं। ये कभी निशाना नहीं चूकते।

पाशुपतास्त्र भगवान शिव की आराधना से प्राप्त किया जाता था। इसे रोकने की शक्ति ब्रह्मास्त्र में थी। यह लक्ष्य को पूरी तरह से तबाह कर देता था।

 

देवेंद्र इंद्र का अस्त्र इंद्रास्त्र ऐसा था जिससे एक साथ कई लोगों को मारा जा सकता है। यह एक साथ अनेकों बाणों की वर्षा कर सकता था।

अग्नि देव का अस्त्र आग्नेयास्त्र था  इस अस्त्र से ऐसी ज्वाला और आग निकलती थी, जिसे बुझाया नहीं जा सकता।

भगवान विष्णु के सर्वप्रमुख अस्त्र ने कई बार सुदर्शन चक्र का नाम आता है।  इसका प्रयोग कई रूपों में किया जाता था। यह केवल भगवान विष्णु की आज्ञा का पालन करता था और लक्ष्य को पूरी तरह तबाह कर देता था।

इंद्र का एक और अस्त्र था। महर्षि दधिचि की हड्डियों से बने इस शस्त्र से बिजली निकलती थी। यह शत्रु को  ना सिर्फ रोकती बल्कि नष्ट कर देता था।

ब्रहामास्त्र  भगवान ब्रह्मा द्वारा बनाया अस्त्र माना जाता है जिसका प्रयोग महाभारत युद्ध में हुआ था। राम-रावण युद्ध में इसका प्रयोग मेघनाद ने  राम पर भी किया था। यह लक्ष्य का संपूर्ण विनाश करने में सक्षम था। इससे एक समय पर कई तरह का विनाश किया जा सकता था। कल्युग समानतापरमाणु बम इसे देख कर लगता है कि सूर्य के लिए कुछ भी नया नहीं। वो यह सब पहले भी देख चुका है।

महाभारत में पांडवों और कौरवों के बीच कुरुक्षेत्र का युद्ध इतिहास में अपनी अलग ही छाप छोड़ता है। यह दोनों ही युद्ध कोई साधारण युद्ध नहीं थे। दैवीय शक्तियों से युक्त यह अस्त्र-शस्त्र आज भी काफी प्रासंगिक हैं। दोनों ही युद्धों में विनाश के उन शस्त्रों का प्रयोग हुआ, जो भीषण विध्वंस का कारण बने आज के विनाशकारी परमाणु अस्त्र भी पौराणिक के अस्त्रों जैसे ही हैं।

ब्रह्मास्त्र ऐसा दिव्यास्त्र था जिसे एक बार चलाने पर विपक्षी प्रतिद्वन्दी के साथ साथ विश्व के बहुत बड़े भाग का विनाश हो जाता था।

            यदि एक ब्रह्मास्त्र भी शत्रु के खेमें पर छोड़ा जाए तो ना केवल वह उस खेमे को नष्ट करता है बल्कि उस पूरे क्षेत्र में १२ से भी अधिक वर्षों तक अकाल पड़ता है। और यदि दो ब्रह्मास्त्र आपस में टकरा दिए जाएं तब तो मानो प्रलय ही हो जाता है। इससे समस्त पृथ्वी का विनाश हो जाएगा।

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के सपने को इसरो के डीआरडीओ ने स्क्रैमजेट इंजन तकनीक का प्रदर्शन करके वास्तविकता में बदलने की उम्मीद जगायी है। हाइपरसोनिक स्क्रैमजेट इंजन की तकनीक आने के बाद भविष्य में अपने देश में ब्रह्मास्त्र और रावण द्वारा प्रयोग किए गए पुष्पक विमान को विकसित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। डीआरडीओ के एक पूर्व प्रमुख के अनुसार उन्हें यह सपना पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम दिखाया था।

 

ब्रह्मास्त्र के बारे में यह कहा जाता है कि इस अस्त्र  में इतनी शक्ति थी कि  इससे पूरी पृथ्वी तबाह हो सकती थी। महाभारत में इसका उल्लेख इस तरह मिलता है-अत्यंत  शक्तिशाली  विमान  से एक शक्ति युक्त  अस्त्र  प्रक्षेपित  किया  गयाधुएँ के साथ अत्यंत  चमकदार ज्वाला , जिसकी  चमक दस हजार सूयों की चमक के बराबर थी, तीव्र उजाले का एक स्तंभ  उठावह वज्र के समान  अज्ञात अस्त्र  साक्षात् मृत्यु का भीमकाय दूत था, जिसने वृष्ण और अंधक के समस्त वंश को  भस्म कर दिया। उनके जले शव पहचानने  योग्य नहीं रह गये थे ।

महाभारत के कई  सालों पहले गुरु विश्वामित्र ने ब्रम्हास्त्र का  उपयोग कीया  था | जब गुरु विश्वामित्र और गुरु वशिष्ठ मे कामधेनु गाय के लिए युद्ध हुवा तब विश्वामित्र ने गुरु वशिष्ठ पे ब्रम्हास्त्र चलाया था | तब गुरु वशिष्ठ ने ब्रह्मांडास्त्र का उपयोग करके ब्रम्हास्त्र को निरस्त्र  कर दिया  था |

ब्रम्हास्त्र का उपयोग महाभारत काल  में तो हुआ ही था , साथ  ही रामायण काल  मे भी लक्ष्मण इसका उपयोग करना चाहते लेकिन राम के कहने पर उन्होंने ऐसा नहीं किया| श्रीराम ने  कहा था कि  इसके उपयोग से पूरी लंका तबाह हो जाएगी इसलीए इसका उपयोग करना सही नहीं है।

आधुनिक युग के वैज्ञानिक रॉबर्ट जे ओपेनहाइमर ने परमाणु बम का आविष्कार किया था| ओपेनहाइमर सिर्फ वैज्ञानिक ही नहीं वे संस्कृत भाषा के अच्छे ज्ञाता भी थे| उन्होंने महाभारत और भागवत गीता का गहन अध्ययन किया था|  ओपेनहाइमर को  ब्रह्मास्त्र के ज्ञान से ही परमाणु बम बनाने की बात सूझी थी| अपने परमाणु बम के योजना का नाम ट्रिनिटी अर्थात त्रिदेव पर रखा |16 जुलाई 1945 को परमाणु बम का पहला  सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया था इससे जो नतीजे सामने आये वो सभी ब्रम्हास्त्र के प्रयोग से होने वाले नतीजों के मिलते थे।

हड़प्पा और मोहनजो-दारो में पुरातत्व अभियानों के दौरान  एक स्थान पर कई कंकाल पाए गए थे। वैज्ञानिक शोध के बाद, यह प्रमाणित हुआ कि अचानक हुई अत्यधिक असमान्य गर्मी के निर्माण के कारण उनकी मृत्यु हो गई।ऐसी गर्मी केवल परमाणु प्रतिक्रिया से ही बनती है। उन कंकालों में रेडिएशन के प्रमाण मिले हैं| और वहां कुछ ईटें पिघली

भारत में हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो जैसी कई ऐतिहासिक स्थल मिले हैं जहां पे विकिरण के प्रमाण मिले है |

 कहा तो यहां तक  जाता है कि जिस कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध हुआ था वहां की धरती अब भी लाल है। हजारों योद्धाओं का  खून वहां  बहा था, वे मारे गये थे। आज से लगभग 5,300 वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था। उस दौरान गुरु द्रोण के पुत्र अश्‍वत्थामा ने भगवान कृष्ण के मना करने के बावजूद ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था जिसके चलते युद्ध क्षेत्र में इतना जोर का धमाका हुआ था कि गर्भ में पल रहे शिशुओं तक की मौत हो गई थे। इन सारे उदाहरणों और प्रमाणों से यह पता चलता है कि महाभारत काल के ब्रह्मास्त्र जैसे अस्त्र आज के परमाणु  हथियारों से कहीं बहुत अधिक घातक थे।

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