Tuesday, December 21, 2021

तैरना सिखाते हुए अम्मा ने ऐसा किया कि मैं डूबते बचा

 आत्मकथा

कुछ भूल गया, कुछ याद रहा

राजेश त्रिपाठी

(भाग-19)

हमारे गांव जुगरेहली में एक बड़ा तालाब है जिसमें जब कमल के फूल खिलते हैं तो उसकी छटा देखती ही बनती है। कमल के फूल जब कमलगट्टे में बदलते तो हम तैर कर जाते और उन्हें तोड़ लाते। मां उनके हरे हरे बीजों की बहुत स्वादिष्ट सब्जी बनाती थीं। यही कमलगट्टे जब सूख जाते हैं तो उनके बीज काले रंग के हो जाते हैं। सुना है इन्हीं से तालमखाना बनता है। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में बाकायदा इसकी खेती होती है और देश में तालमखाना का सबसे अधिक उत्पादन वहीं होता है। अच्छी तरह याद है हम लोग पुरइन की सफेद जड़ खोद लाते थे। इसे हमारे यहां भसींड़ कहते हैं। कहीं-कहीं इसे भे भी कहा जाता है। इसकी सब्जी भी बहुत ही स्वादिष्ट बनती है।

 अब गांव के तालाब का जिक्र आया तो वहां कमल खिलाने का श्रेय भी मेरे बाबा (पिता जी) को जाता है। उन्होंने बताया था कि कमल की लता अर्थात पुरइन को लगाना भी आसान नहीं। इसकी जड़ का विवाह करा कर लाना पड़ता है फिर उसे तालाब में रोपना पड़ता है। मेरे बाबा ने अपने किसी परिचित के लड़के की शादी में यह पुनीत कार्य करना चाहा। उन्होंने लड़के के पिता से बात की जो यह सुन कर खुश हो गया कि हमारे गांव के बड़े तालाब में भी कमल खिला करेंगे। उन्हें सब समझा कर मेरे बाबा पास के किसी गांव से पुरइन की छोटी ज़ड़ ले आये और उसे दूल्हे के मौर में लगा दिया। जब वह विवाह कर वापस आया तो उस जड़ को मौर से निकाल कर बाबा ने तालाब के गहरे पानी के अंदर गाड़ दिया। वही पुरइन कुछ वर्षों में पूरे तालाब में फैल गयी और जब पूरे तालाब में लालिमा लिये कमल खिलते तो वह दृश्य बहुत सुहाना लगता। कुछ अरसा पहले गांव में पड़े सूखे में पूरा तालाब भी सूख गया था। उसके साथ ही पुरइन भी खत्म हो गयी थी। जब मैंने यह खबर सुनी तो मुझे बहुत दुख हुआ था। मैं इस बात को लेकर दुखी हुआ था कि गांव में मेरे बाबा के हाथों लगायी गयी एक सुंदर निशानी खत्म हो गयी। पिछले दिनो अपने गांव के मेरे सहपाठी और अनन्य मित्र बाबूलाल जी यादव सेवानिवृत जज से बातों-बातों में तालाब और कमल के बारे में पूछा-सूखे में अगर तालाब पूरी तरह सूख गया था तो पुरइन भी मर गयी होगी। उन्होंने जो सुखद समाचार दिया उसे सुन बहुत हर्ष हुआ। उन्होंने कहा कि –अच्छी वर्षा के चलते तालाब लबालब भर गया है और पुरइन पहले से ज्यादा क्षेत्र में फैल गयी है और अब कमल से भरा तालाब बहुत सुहाना लगता है। 

 तालाब की सीढ़ियां पक्की बनी हैं और एक गोल चबूतरे पर हनुमान जी की मूर्ति और कुछ खंडित मूर्तियां भी विराजमान हैं। ये खंडित मूर्तियां आक्रांताओं के दौर के जुल्म की मूक गवाह हैं। 

  इसी तालाब में छोटे में मां ने मुझे तैरना सिखाया था। तैरना भी कुछ इस तरह सिखाया कि मैं डूबते बचा था। हुआ यह कि मां तीन सप्ताह तक मुझे हाथ से संभाल कर तैरना सिखाती रही। मैं सिर्फ पैर छपछपा रहा था खुद आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। एक दिन मुझे बताये बगैर मां ने हाथ हटा लिया। मैं जब आधारहीन हो डूबने उतराने लगा तो घबराहट में हाथ-पैर मारता कुछ दूर चला गया। मैंने पाया कि हाथों से पानी काटने और शारीरिक संतुलन बनाये रखने से मैं कुछ दूर तक तैरता चला गया और फिर हिम्मत कर तैरते हुए वापस किनारे की सीढ़ियों तक आ गया और अम्मा को गुस्से से घूरते हुए बोला-इस तरह तैरना सिखाते हैं। मुझे तो लगा डूब कर मर ही जाउंगा ऐसे क्यों अचानक क्यों छोड़ दिया। 

 अम्मा हंसते हुए बोली-सीख गया ना। अगर मैं सहारा देती रहती तो तुम खुद सीखने की कोशिश ही नहीं करते। 

*

मुझे याद आया कि गुरु जी से एक सप्ताह का अवकाश ले कर आया था और बारह दिन हो गये। दूसरे दिन ही अम्मा, बाबा से विदा ले मैं साथी की ओर वापस लौट पड़ा। मेरे वापस लौटते समय बाबा और मां बहुत रोये पर यह सोच कर कि कहीं मेरे आगे बढ़ते कदम रुक ना जायें वे आंसू पी गये। और जबरन मुसकाते हुए मुझे विदा करने की असफल कोशिश करने लगे।

आंसू मेरी आंखों में थे लेकिन लौटना तो था ही। लगभग आठ किलोमीटर का फासला तय कर शाम तक मैं साथी पहुंच गया। 

 दूसरे दिन सुबह जब संस्कृत विद्यालय पहुंचा तो गुरु जी पहले तो काफी क्रोधित हुए फिर बोले- तुम्हारे लिए एक खबर है तुम्हें दो दिन बाद कोर्रम की रामलीला टीम के साथ यमुना तट पर स्थित एक गांव खेर जाना है जहां तुम लोगों को पंद्रह दिन तक रामलीला करना है। खेर के किसी व्यक्ति की रिश्तेदारी कोर्रम में है जिसने वहां की रामलीला देखी उसे बहुत पसंद आयी। उनके गांव में सिंहवाहिनी देवी का बहुत प्रसिद्ध मंदिर है जहां एक महीने तक मेला लगता है। उसी मेले में पंद्रह दिन तुम लोगों की रामलीला होगी। तुम आज भी नहीं आते तो मैं परेशान हो जाता। कोर्रम में रामलीला कमेटी का कई बार संदेश आ चुका है। अब तुम तैयारी कर लो।

  मैंने गुरु जी का आदेश सुना तो परेशान हो गया कि अभी-अभी गांव से आया और फिर एक लंबा सफर और पंद्रह दिन रामलीला। लेकिन कोई उपाय नहीं था। 

 दो दिन बाद गुरु जी से आदेश लेकर मैं कोर्रम की ओर चल पड़ा। भैया गयाप्रसाद से मैं पहले ही सब कुछ बता चुका था। 

 कोर्रम में पहुंचा तो हमारी रामलीला मंडली के मैनेजर की जान में जान आयी। वे बोले- अच्छा हुआ जो आ गये वरना हम सब मुश्किल में पड़ जाते, खेर वालों को वचन दे चुके हैं।

 दूसरे दिन हमारी पूरी मंडली, मैनेजर और सहायक कई बैलगाड़ियों में खेर की ओर चल पड़े। रास्ते में रात हो गयी। हम लोग देख रहे थे कि दूर जहां क्षितिज पृथ्वी से मिलती सी प्रतीत  होती है वहां अचानक आग की लपट सी उठती और बुझ जाती थी। हम लोगों में  से जो लोग छोटी उमर के थे वे डरने लगे कि यह कहीं भुतहा छल-छंद तो नहीं। जब हमने बड़ो से अपनी आशंका जतायी तो उनमें से एक समझदार व्यक्ति ने बताया यह भूत-प्रेत का काम नहीं असल में वातावरण में फासफोरस मौजूद है वही कभी-कभी हवा के स्पर्श में आकर अचानक जलता फिर बुझ जाता है। हमें उस जवाब से थोड़ा संतोष मिला। रात बीतते पौं फटते हम खेर पहुंच गये। वहां मेला कमेटी वालों ने हम सब के ठहरने का प्रबंध कर दिया था। भले ही बैलगाड़ियों पर आये थे लेकिन इतने लंबे सफर में हम लोग अकड़ से गये थे। हमने सोचा पहले कुछ देर आराम कर फिर स्नानादि कर के सिंहवाहिनी माता के दर्शन करने जायेंगे। (क्रमश:)


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