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Saturday, November 12, 2011

लता मंगेशकर

छोटी-सी गुड़िया की सुनो लंबी कहानी
-राजेश त्रिपाठी
जिंदगी में जो पहली हिंदी फिल्म ‘सीमा’ देखी थी उसमें लता मंगेशकर का गाया एक प्यारा गीत था- ‘ छोटी-सी गुड़िया की सुनो लंबी कहानी।’ लता का अपना लंबा सुरीला सफर , एक गुड़िया-सी बच्ची के जिंदगी के जद्दोजेहद में अपनी प्रतिभा के बलबूते नाकुछ से लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचने की दास्तान है। इस दास्तान में जहां लोकप्रियता, नाम-दाम और शोहरत की तड़क-भड़क है, वहीं है पल-पल काटता अकेलापन, तरह-तरह के विवाद और उदासियों के अनगिनत लमहे। इस सबसे लड़ कर , दर्द को खामोशी से पीकर लता भारतीय पार्श्वगायन की अदम्य, अनुपमेय साम्राज्ञी बन गयीं।
      जीते-जी किंवदंती बन जाने वाली लता की लोकप्रियता देश की सीमाएं लांघ विदेश तक जा पहुंची। 1962 में दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में ‘ ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आंख में भर लो पानी’ गाकर पंडित जवाहरलाल नेहरू तक को द्रवित कर देने वाली लता के गायन में एक खास गुण है। वे जो भी गाती हैं दिल से गाती हैं। हर गीत में वे ऐसी गहराई , ऐसी आत्मा भर देती हैं जो दिल की गहराई तक उतर जाता है और उतना ही व्यापक होता जाता है उसका असर।
      कभी लता के बारे में महान गायक (अब स्वर्गीय) कुमार गंधर्व ने कहा था--‘तानपुरे से निकलनेवाला राग गंधार शुद्ध रूप में सुनना हो तो लता का ‘आयेगा आनेवाला गाना सुनो।’
      लता के संगीत सफर के साथ जुड़े हैं अनगिनत सम्मान, अकूत सफलताएं। लंदन का अल्बर्ट हाल हो या कोई और ऑडीटोरियम हर जगह श्रोताओं ने उन्हें मंत्रमुग्ध होकर सुना। यह उनकी प्रतिभा है जिसका कायल होकर ‘टाइम’ मैगजीन ने ने 1959 में उन्हें ‘भारतीय पार्श्वगायन की निर्विवाद और अपरिहार्य साम्राज्ञी’ माना था।
      अपार सफलता पाने वाली लता मंगेशकर का शुरुआती जीवन  बहुत कठिन था।  पिता दीनानाथ गोवा के मंगेशी से आकर इंदौर में बस गये थे। इंदौर में ही लता का जन्म हुआ। दीनानाथ मशहूर शास्त्रीय गायक थे और उनकी एक ड्रामा कंपनी थी ‘बलवंत संगीत नाटक मंडल’ । इस कंपनी को लेकर वे महाराष्ट्र के कस्बों-शहरों में नाटक किया करते थे। उनकी चार बेटियां (मीना, ऊषा, आशा, लता) और एक बेटा हृदयनाथ पिता के साथ बंजारों का-सा जीवन बिताने को मजबूर थे। आज यहां तो कल वहां। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी कुछ खास नहीं हो पाती थी। पिता ने सोचा क्यों न इन लोगों को भी वही हुनर सिखाते चलें जिसमें वे माहिर हैं। इस तरह से छुटपन से ही ही उन्होंने चारों बेटियों और एक बेटे के मन में संगीत की जोत जला दी जिसका उजाला आगे चल कर दूर-दूर तक संगीत की मिठास लेकर फैलता रहा।
      इन बच्चों के अक्सर पिता के साथ उनकी नाटक कंपनी में छोटे-मोटे रोल भी निभाने पड़ते थे। गाना भी पड़ता था। इस तरह धीरे-धीरे पुख्ता होती उनके अंतर में संगीत की बुनियाद। बच्चे घर में होते तब भी पिता की सख्त हिदायत के मुताबिक गीत-संगीत का रियाज जारी रहता। नाटक कंपनी से खास आमदनी तो नहीं थी पर परिवार का किसी तरह गुजारा हो जाता था।
      भाई और बहनों में सबसे बड़ी लता को उस वक्त चेचक की बड़ी तकलीफ सहनी पड़ी जब वे सिर्फ दो साल की थीं। उनके दिन ठीक-ठाक गुजर रहे थे लेकिन 1934-35 में अर्देशिर ईरानी  की पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ नाटक कंपनियों पर कहर बन कर टूटी। एक के बाद एक नाटक कंपनियां बंद होने लगीं। बलवंत संगीत नाटक मंडल भी इससे अछूता न रहा। यह भी बंद हो गया। इसके बाद मंगेश परिवार सांगली चला गया और वहीं बस गया।
      सांगली में दीनानाथ ने फिल्म कंपनी शुरू करने के लिए पत्नी के गहने तक बेच डाले। अपने मराठी नाटकों को उन्होंने फिल्मों  में ढाला पर हाथ लगी नाकामी।  तंगी की हालत में वे सांगली छोड़ पुणे चले आये। यहां वे आकाशवाणी में गाने लगे और उससे मिले थोड़े-बहुत पारिश्रमिक से ही परिवार की गाड़ी किसी तरह घिसटने लगी।
      आर्थिक तंगी और कुंठाओं को दीनानाथ ज्यादा दिन झेल नहीं पाये। 1942 में वे दुनिया छोड़ गये। तब लता महज 13 साल की थीं। भाई हृदयनाथ और चारों बहनें बहुत छोटी थीं। उसी दिन से परिवार को पालन का भार लता के कंधों पर आ गया। गुड़ियों से खेलने की उम्र में ही लता परिवार की रोटी जुटाने की जद्दोजेहद में जुट गयीं।
      आसान नहीं था जीवन-संग्राम का शुरुआती अध्याय। एक छोटी-सी बच्ची को अपने परिवार वालों के लिए निवाले जुटाने के लिए जमीन-आसमान के कुलाबे एक करने पड़ते थ।  स्टूडियो दर स्टूडियो की खाक छाननी पड़ती थी। उनकी कर्मयात्रा मास्टर विनायक की प्रफुल्ल पिक्चर्स की मराठी फिल्म ‘पहिली मंगला गौर’ गायन और अभिनय से शुरू हुई। अपने पहले दिन के अनुभव के बारे में उन्होंने कभी कहा था-‘मुझे मेकअप से नफरत थी। जगमगाती रोशनी के बीच खड़े होने से हिचकती थी।  लेकिन करती भी क्या। अपने घर की अकेली कमाऊ बेटी थी मैं। जिस दिन पहली बार काम पर गयी, घर में खाने को कुछ भी नहीं था। ऐसे में मेरे पास कोई चारा नहीं था। ’
      मास्टर विनायक की कंपनी में उन्होंने 15 रुपये माहवार पर काम शुरू किया। सोचने में कितना अजीब लगता है कि वही लता बाद में एक गीत गाने का हजारों रुपये पारिश्रमिक पाने लगीं। 1947 में मास्टर विनायक की मौत के बाद प्रफुल्ल पिक्चर्स  कंपनी बंद हो गयी। उसके बाद लता बंबई (अब मुंबई ) आ गयीं। वहां उन्होंने पहले उस्ताद अमान अली खां फिर अमानत अली खां से बाकायदा शास्त्रीय  संगीत की शिक्षा ली। 1947 तक उनका काफी नाम हो गया था। फिल्म ‘मजबूर’ में उन्हें गायन का मौका संगीकार गुलाम हैदर ने दिया। फिल्मिस्तान के सुबोध मुखर्जी लता की आवाज से संतुष्ट नहीं थे लेकिन गुलाम हैजर अपने निश्चय पर अड़े रहे। उन्होंने मुखर्जी से यहां तक कह डाला-‘ देखना एक दिन यह लड़की नूरजहां (उस वक्त की प्रसिद्ध गायिका-नायिका) को भी पीछे छोड़ देगी।’ कहना न होगा कि उनकी यह बात सौ फीसदी सच साबित हुई। बाद में नूरजहां तक लता की प्रशंसिका बन गयी थीं। उसके बाद लता ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और फिल्मी पार्श्वगायन के क्षेत्र में दिन ब दिन कामयाबी की नयी मंजिलें तय करती रहीं। पुराने संगीतकारों अनिल विश्वास, नौशाद, हुसनलाल-भगतराम, खेमचंद्र प्रकाश, शंकर-जयकिशन और रोशन से लेकर नये संगीतकारों के निर्देशन में भी लता ने  बखूबी गाया।
      दशकों से सुबह-शाम, दिन-रात देशवासियों के कानों में मिसरी की मिठास घोलती आई है लता की आवाज। उत्सव, समारोहों में गूंजते रहे उनके नगमे। सिर चढ़ कर बोलता रहा उनकी आवाज का जादू। हर वर्ग, हर हैसियत के व्यक्ति के दिल को छूती है उनकी कोयल सी बोली। नयी गायिकाओं के आने लोकप्रिय होने के बाद भी अरसे तक लता की आवाज का जादू बरकरार रहा। उनकी आवाज में जो वैविध्य है वही उसकी विशेषता है। एक प्रेमिका का दर्द, मनुहार, शोखी को वे बखूबी अपनी पुरअसर आवाज के जरिये उभार सकती हैं।  वहीं उनकी आवाज में मां का वात्सल्य, पुजारन की श्रद्धा और शिशु की चपलता भी बड़ी खूबी से उनके स्वरों में ढलती है। एक शब्द में भारत के लिए ईश्वर का वरदान है लता।
      वे भाषाओं की सीमा में नहीं बंधीं, हर भाषा में गाया और खूब गाया। गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड में उनका नाम आया सबसे अधिक गीत गाने वाली गायिका के रूप में। 1946 से गा रही लता की एक खूबी यह भी है कि उन्होंने जिस भी हीरोइन के लिए गाया उसकी आवाज से अपने गाने का अंदाज मिलाने की उन्होंने हमेशा कोशिश की।
      किसी ने उनकी आवाज की विविधता के मद्देनजर एक बार मजाक में कहा था-‘लता को दोहरा पारिश्रमिक दे दिया जाये तो वे हीरो-हीरोइन दोनों के लिए गा सकती हैं। ’ लता की एक विशेषता यह भी रही है कि उनकी उम्र ज्यों-ज्यों बढ़ती गयी, उनकी आवाज की मिठास और गाढ़ी होती गयी। उनका स्वर और मधुर होता गया।

Saturday, July 13, 2013

प्राणहीन हुआ बॉलीवुड

चला गया कर्मनिष्ठ, ईमानदार भला आदमी
-राजेश त्रिपाठी

अगर किसी एक ऐसे शख्स का नाम जानना हो जो एक साथ कई व्यक्तित्व जी चुका हो, जिसे फिल्मी परदे पर देख बड़ों-बड़ों के दिल सहम जाते थे और जो परदे के बाहर बहुत ही प्यारा, मददगार और सबका यार हो तो आपकी तलाश बस एक नाम पर आकर टिक जायेगी। वह नाम है प्राण। प्राण जिन्होंने 6 दशक तक के लंबे अपने फिल्मी कैरियर में जिन अमर पात्रों को जिया, उनके साथ इस कदर खुद को आत्मसात कर लिया कि उन्हें उस किरदार से अलग नहीं किया जा सकता था। हालांकि उन्होंने 93 साल की लंबी जिंदगी पायी लेकिन उनके जाने से फिल्मों के एक युग का अंत हो  गया है। आज बॉलीवुड प्राणहीन हो गया है। प्राण हिंदी फिल्मों के एकमात्र ऐसे खलनायक थे जिन्होंने अपने चरित्रों को जितनी विविधता दी शायद ही कोई दे पाया हो। शायद यही वजह थी कि उनको फिल्मो के बड़े-बड़े नायकों तक से ज्यादा पारिश्रमिक मिलता था। आज जब वे नहीं हैं तो सब उन्हें अपने ढंग से याद कर रहे हैं। अभिनेता रजा मुराद ने उनके बारे में कहा कि-ताजमहल एक है, कश्मीर एक है,  हिमालय एक है, लता मंगेशकर एक है उसी तरह प्राण एक हैं। दूसरा प्राण अब नहीं पैदा होगा। वे परदे पर दानव और परदे के बाहर महामानव थे। सांसद और मंत्री राजीव शुक्ल ने कहा-इस शताब्दी में दूसरा प्राण नहीं होगा।
    अमिताभ, सुषमा स्वराज, प्रियंका चोपड़ा और बॉलीवुड व राजनीति से  जुड़ी कई हस्तियों ने प्राण साहब के निधन पर शोक जताया और उन्हें अनुपम और अतुलनीय बताया। प्राण ने अपने जीवन में फिल्मफेयर, पद्मभूषण, विलेन आफ मिलेनियम जैसे अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले लेकिन फिल्मों के लिए सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान दादा साहब फालके पुरस्कार को उन तक पहुंचने में काफी देर लगी। यों तो यह पुरस्कार कई कलाकारों तक  पहले पहुंच गया लेकिन उन तक जब यह मई 2013 में पहुचा इनकी जिदगी ह्वीलचेयर में सिमट कर रह गयी थी और स्मृति  भी उनका साथ छोड़ चुकी थी। जिन लोगों ने भी टीवी चैनल्स पर केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी द्वारा उनके मुंबई स्थिति घर में उनको दादा साहब फाल्के पुरस्कार देते देखा है, उन्होंने देखा होगा कि प्राण किस तरह चेतनाहीन से मूक दर्शक बने बैठे थे। शायद उन्हें यह भान भी नहीं हो रहा होगा कि वे देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजे जा रहे हैं। प्राण के बारे में जितना कुछ कहा जाये कम है। फिल्मी कलाकारों के बारे में फिल्म निर्माता और निर्देशकों की ज्यादातर यही शिकायत रहती थी कि वे सेच पर देर से आते हैं लेकिन प्राण साहब समय के इतने पाबंद कि 10 बजे के शेड्यूल के लिए
 साढ़े 9 बजे ही पहुंच जाते हैं। कहते हैं एक बार निर्माता-निर्देशक सुभाष घई ने उन से हाथ जोड़ कर कहा था- प्राण साहब आपकी शूटिंग दो बजे शरू होनी है आप साढ़ें नौ बजे आने का कष्ट न किया करें।
    पर प्राण क्या करते काम तो उनके लिए पूजा की तरह था और स्टूडियो जैसे मंदिर। वे अभिनय नहीं किया करते थे बल्कि उन चरित्रों को जिया करते थे जो उन्हें दिये जाते थे। वे अपनी भूमिकाओं के प्रति कितने गंभीर थे इसका पता इसी से चलता है कि वे अपने चरित्र का गेटअप वगैरह खुद तय किया करते थे। उनकी सबसे बड़ी ताकत थी उनकी बुलंद आवाज, रग-रग से उभरते अभिनय के सजीव रंग। प्राण परदे की जिंदगी में चाहे जितने भी खूंखार दिखते हों असल जिंदगी में वे उतने ही भले, भद्र और परोपकारी पुरुष थे। कई हस्तियों को उनका उपकार मिला लेकिन प्राण साहब ने कभी इसका प्रचार नहीं किया। क्रिकेटर कपिल देव एक बार काफी चोटिल हो गये। इस इलाज के लिए उस वक्त बीसीसीआई के पास पैसा नहीं था। जब इसका पता प्राण साहब को चला तो उन्होंन कहा कि कपिल के इलाज में जो भी खर्च आयेगा, वे देंगे। यह कपोल कल्पित कहानी नहीं खुद कपिल की जुबानी इसे सुना गया है।
    प्राण साहब के बारे में तरह-तरह की बातें प्रचलित हैं। कहते हैं कि वे जब अपनी कार में मुंबई की सड़कों पर गुजरते तो सड़क पर खड़े लड़के डर कर भागते और कहते -भागो साला प्राण आ रहा है। कहते हैं जब किसी ने उनसे िसके बारे में पूछा कि क्या उन्हें इस तरह की गालियां सुन कर गुस्सा नहीं आता तो वे हंसते हुए कहते- ये गाली नहीं पुरस्कार है। यह मेरी कामयाबी की मिसाल है कि मेरा खौफ परदे से बाहर समाज तक में उतर आया है। लोग तो सिनेमाघर के बाहर आते ही फिल्म और फिल्म के किरदार को भूल जाते हैं लेकिन मुझे तो लोग परदे के बाहर भी उसी रूप में देख रहे हैं।
    वे लोगों से कहते कि जब कभी उनके दोस्त अपने बच्चों को लेकर उनसे मिलने आते तो उनके बच्चे अपने माता-पिता के पीछे दुबके रहते। ये प्राण को अच्छा लगता था क्योंकि वे मानते थे कि जिस दिन इन बच्चों का भय खत्म हो जायेगा और ये सामने आ जायेंगे उस दिन मैं समझूंगा कि अब मैं नाकाम हो गया। बॉलीवुड के इस सबसे बड़े खलनायक की जिंदगी भी अजीब थी। वे बनना चाहते थे फोटोग्राफर यानी कैमरे के पीछे की जिंदगी उन्होंने चुनी थी लेकिन उन्हें तो कैमरे के सामने छाना और नाम कमाना था। अमिताभ बच्चन आज सदी का सितारा है लेकिन यह हकीकत है कि उनकी फिल्मी जिंदगी ने अगर कामयाबी की रोशनी देखी  तो उसका श्रेय भी प्राण को ही जाता है। कहते हैं कि फिल्म जंजीर  का रोल प्रकाश
 मेहरा देव आनंद को देना चाहते थे लेकिन अमिताभ का नाम उन्हें प्राण ने ही सुझाया। कहना नहीं होगा कि फिल्म जंजरी सुपर-डुपर हिट हुई ओर उसके बाद अमिताभ ने पीचे मुड़ कर नहीं देखा और लगातार कामयाबी की ऊंचाइयां छूते हुए सदी का सितरा बनने का गौरव हासिल किया। अमिताब प्राण साहब का बहुत ही सम्मान करते थे।
    प्राण हिंदी फिल्मों के प्राण थे। उनका पार्थिव शरीर आज भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन अपनी फिल्मों और अपने जानदार अभिनय के बल पर वे आनेवाली कई सदियों तक याद आते और लोगों में जिंदगी का जज्बा भरते रहेंगे। प्राण साहब जैसे लोग तो अमर हो जाते हैं। उन्होंने जमाने को इतना दिया है, उनके लोगों पर इतने उपकार हैं कि वे रहती दुनिया तक लाखों लोगों में उम्मीद और हौसला बन कर जीते रहेंगे।
    प्राण साहब का पुरा नाम प्राण किशन सिकंद था। उनका जन्म 12 फरवरी 1920 को दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में हुआ था। उनके पिता लाला केवलकिशन सिकंद सिविल इंजीनियर  थे। उनकी तबादले की नौकरी थी इसलिए प्राण को भी जहां-जहां पिता तबादले में जाते जाना पडता था। इस तरह उनकी शिक्षा भी-मेरठ, कपूरथला, उन्नाव, देहरादून व रामपुर में हुई। प्राण साहब को फोटोग्राफी का बड़ा शौक था, उन्होंने इसके लिए दिल्ली की दास एंड कंपनी में एप्रेंटिश फोटोग्राफर के रूप में नौकरी शुरू की। बाद में उनका तबादला शिमला कर दिया गया। वहीं उन्होंने अपने अभिनय जिंदगी की एक तरह से शुरुआत की। वहां रामलीला पर आधारित एक नाटक में उन्होंने सीता की भूमिका निभायी थी जिसमें उनके साथी अभिनेता थे मदन पुरी। उनके फिल्मी अभिनय की शुरुआत लाहौर में पंजाबी फिल्म यमला जाट (1940) से हुई । इसके बाद तकरीबन 21 पंजाबी फिल्मों में वे हीरो के रूप में आये और ये फिल्में बहुत हिट रहीं। हिंदी फिल्म में उनकी शुरुआत खानदान (1942) से हुई। इसमें उनकी हीरोइन नूरजहां थीं जो उम्र में उनसे काफी छोटी थीं। 1945 में उनकी शादी शुक्ला अहलूवालिया से हुई। प्राण साहब के दो बेटे  और एक बेटी है। प्राण साहब देश विभाजन के बाद वे काम की तलाश में बंबई (अब मुंबई) चले आये। यहां लेखक शहादर हसन मंटो और अभिनेता श्याम की मदद से उन्हें शाहिद लतीफ की फिल्म जिद्दी (1948) में खलनायक की भूमिका मिली। इसमें देव आनंद और कामिनी कौशल की प्रमुख भूमिकाएं थीं। यह उनके अभिनय की दूसरी शुरुआत थी(लाहौर फिल्म कंपनी के बाद)। उनका यह प्रयास सफल रहा और 1948 से 1954 तक लगातार खलनायक की भूमिकाएं निभाते हुए उन्होंने इतनी कामयाबी हासिल की कि फिल्मों के सफलता के लिए उनको रखना जरूरी माना जाने लगा। फिल्मों के स्टारकास्ट का नाम देते वक्त अंत मे मोटे अक्षरों में लिखा जाने लगा - एंड प्राण। जैसे सारे कलाकारों पर यह एक नाम ही भारी पड़ने लगा। फिल्म की सफलता की गारंटी बन गया प्राण का नाम। उस समय के बड़े सितारों के साथ भी प्राण साहब ने काम किया। उस वक्त के बड़ें सितारों दिलीप कुमार , राज कपूर, देव आनंद में से कोई रहा हो उनकी फिल्मों में जब भी परदे पर प्राण आते दर्शक उनका स्वागत तालियों से करते। कई दृश्यों मे तो वे इन बड़े नामों पर इतने भारी पड़ते कि प्राण साहब के सामने वे पासंग लगने लगते।
    प्राण साहब ने एक से बढ़ कर एक भूमिकाएं हिंदी फिल्मों में निभायीं। उन्होंने कभी एक जैसा चरित्र नहीं निभाया। भले ही भूमिका खलनायक की रही हो लेकिन उन्होंने हर भूमिका में नया गेटअप, नया रंग भरने की कामयाब कोशिश की। देश विभाजन के बाद उन्होंने पिलपिली साहब (1954), हलाकू (1956) व कई अन्य फिल्में। कई फिल्मों में उन्होंने प्रमुख भूमिकाएं कीं जैसे -धर्मा, जंगल में मंगल, गद्दार, राहु केतु, एक कुंआरी एक कुंआरा70 के दशक में विनोद खन्ना, अमिताभ बच्चन, रणधीर कपूर, ऋषि कपूर, नवनी निश्चल और राजेश खन्ना के साथ कई फिल्में कीं। इनमें राजेश खन्ना को छोड़ कर बाकी सभी कलाकारों से ज्यादा पारिश्रमिक प्राण साहब को मिलता था। खलनायक की भूमिका में प्राण इस तरह रमे कि लगा जैसे वे इसके लिए ही बने हों। वे अपने अभिनय कैरियर से बहुत ही संतुष्ट थे इसीलिए जब उनसे किसी पत्रकार ने पूछा कि अगले जन्म में वे क्या बनना चाहेंगें उनका जवाब था-अगला ही क्यों मेरा वश चले तो आने वाले हर जन्म में मैं प्राण ही बनना चाहूंगा।
    उनकी प्रमुख फिल्में हैं- कश्मीर की कली, खानदान, औरत, बड़ी बहन, जिस देश में गंगा बहती है, हॉफ टिकट, उपकार, पूरब और पश्चिम, डॉन । उन्होंने तकरीबन 400 पिल्मों में काम किया.। खानदान (1942), पिलपिली साहेब (1954) और हलाकू (1956) जैसी फ़िल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभायी। उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय मधुमति (1958), जिस देश में गंगा बहती है (1960), उपकार (1967), शहीद (1965), आँसू बन गये फूल (1969), जॉनी मेरा नाम (1970), विक्टोरिया नम्बर 203 (1972), बेईमान (1972), ज़ंजीर (1973), डॉन (1978) और दुनिया (1984) फ़िल्मों में माना जाता है। राम और श्याम, धर्मा, साधू और शैतान, नन्हा फरिश्ता, परिचय आदि में भी उनकी भूमिकाएं खूब सराही गयीं।  राम और श्याम  के कड़क खलनायक के रूप में वे दर्शकों में अपनी खलनायकी का खौफ जमाने में खूब कामयाब रहे। मानाकि इसमें उनके साथ उस वक्त के ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार डबल रोस में थे लेकिन कई दृश्यों में प्राण साहब दिलीप पर भारी पड़े।
 
फिल्म उपकार में मलंग चाचा के रूप में प्राण
   विक्टोरिया नंबर 203 में उन्होंने अशोक कुमार के साथ मिल कर कामेडी भी खूब की। एक बिन ताले की चाभी पाकर मारे-मारे फिरने वाले दो मस्तमौला दोस्तों की भूमिका में दोनों खूब जमे। इसका एक गाना-दो बेचारे बिना सहारे देखो खोज-खोज कर हारे, बिन ताले की चाबी लेकर फिरते मारे मारे इन पर फिल्माया गया था और इसमें दोनों ने बहुत अच्छा अभिनय किया। प्राण ने बाद में अपनी बुरे आदमी की इमेज से बाहर आने की ख्वाहिश की। इसमें कई लोगों ने उन्हें अलग ढंग का रोल देने का खतरा मोल लिया। एक जमे-जमाये खलनायक को चरित्र भूमिका और सकारात्मक भूमिका में लाना जोखिम ही था। हो सकता था कि अपने खलनायक को लोग उस रूप में पसंद न करें लेकिन प्राण ने जो भी भूमिका की बहुत खूब की। उपकार (1967) में मनोज कुमार ने उन्हें एक पैर से लंगड़े मलंग चाचा की भूमिका दी। मलंग चाचा जो अनाचार, भ्रष्टाचार और अत्याचार के खिलाफ  आवाज बुलंद करता है। वह आगाह करता है कि दुनिया के सारे रिश्ते-नाते, कस्मे-वादे झूठे हैं। यहां सब मतलब का व्यवहार है। कस्मे-वादे प्यार वफा सब बातें है बातों का क्या, कोी किसी का नहीं ये झूठे नाते हैं नातों का क्या गीत उन पर फिल्माया गया। इस पर उन्होंने इतना शानदार अभिनय किया कि पूरी फिल्म में अगर कोई चरित्र किसी के जेहन में असरदार ढंग से उतरा तो वह मलंग चाचा का था। इसके बाद से वे सकारात्मक भूमिकाएं निभाने लगे और उसमें भी अपने अभिनय का उन्होंने लाहा मनवा लिया।
   
फिल्म जंजीर में शेर खान की भूमिका में प्राण
प्रकाश मेहरा कि फिल्म जंजीर  में शेर खान की भूमिका में उनका अभिनय लोगों को भुलाये नहीं भूलेगा। यारी है ईमान मेरा यारमेरी जिंदगी गाने पर उनके ठुमके और एक काबुली  पठान के रूप में उनका रौबदार अभिनय इस फिल्म की जान था। कहते हैं कि अमिताभ प्राण साहब के रोल और रुतबे से सहमे-सहमे से थे। इस फिल्म के एक सीन में उनको गुस्से से एक कुरसी परठोकर मारनी थी लेकिन वे ऐसा कर नहीं पा रहे थे बाद में खुद प्राण साहब ने उनका हौसला बढ़ाया। प्राण और अमिताभ बच्चन के बीच बहुत ही दोस्ताना संबंध थे। कहते हैं कि मदद मांगने वालों की लाइन उनके द्वार पर हर हमेश लगती थी और वे किसी को निराश नहीं करते थे। सबकी यथा संबव मदद करते थे.। वैसे तो राजनीति पर उनकी कोई रुचि नहीं थी लेकिन राजनीति के नाम पर अनीति, अनाचार या स्वेच्छाचार उनको बरदाश्त नहीं था। यही कारण है कि आपातकाल के समय जब कई मुंह खामोश थे उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठायी। उन्होंने आपातकाल के विरोध में सीदे राष्ट्रपति के पास एक पत्र भेज दिया। इसी तरह मरोरजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता सरकार में भी कुछ ऐसा हुआ कि प्राण साहब को गलत लगा तो उन्होंने खुद मोरारजी देसाई के पास पत्र भेज कर इसकी शिकायत की। वे अपने सहकर्मियों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। यही वजह है कि जब तक हाथ-पैर चलते रहे वे सिने वर्कर्स एसोसिएशन की मदद के लिए प्रयासरत रहे।
उनकी कुछ अन्य फिल्में हैं-सनम बेवफ़ा, दाता , धर्मयुद्ध, धर्म अधिकारी , लव एंड गॉड , दुनिया, शराबी ,नास्तिक, सौतन , क्रोधी , कालिया,      धन दौलत , डॉन , गंगा की सौगन्ध ,अमर अकबर ,एन्थोनी,दस नम्बरी ,शंकर दादा ,सन्यासी ,मज़बूर, कसौटी , ज़ंजीर,बेईमान, हमजोली, यादगार,     जॉनी मेरा नाम     मोती ,    आँसू बन गये फूल ,साधू और शैतान ,एराउन्ड द वर्ल्ड ,दो बदन ,लव इन टोक्यो, सावन की घटा , खानदान , मेरे सनम, गुमनाम,शहीद , मनमौजी ,मुनीम जी        
  अपने अभिनय के लिए प्राण साहब को कई बार फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले।लेकिन कहते हैं कि एक बार फिल्म  बोईमान  के लिए मिलने वाले पुरस्कार को उन्होंने सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि उन्हें बेईमान  के संगीत के लिए शंकर-जयकिशन को  दिये गये पुरस्कार पर एतराज था। उनका विचार था कि पाकीजा  के संगीताकार गुलमा मोहम्मद इस पुरस्कार के ज्यादा हकदार हैं। हर दिल अजीज प्राण साहब को कई बड़े कलाकार तक अपना आदर्श मानते थे। कई लोगों ने तो उनसे वक्त पर स्टूडियो या शूटिंग स्थल पर पहुंचने की बात सीखी। आनेवाली की सदियों तक फिल्म इंडस्ट्री को इस बात का गर्व और गौरव होगा कि उसकी कला को प्राण जैसी एक महान शख्शियत ने समृद्ध किया। लोगों के जेहन में शेर खान का रौबीला चेहरा और मलंग बाबा की नसीहत -कस्मे वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या ताकयामत गूंजती रहेगी और उन्हें दुनिया के ऊंच नीच से आगाह करती रहेगी। प्राण कभी मरा नहीं करते प्राण मरेंगे नहीं। कभी प्राण ने खुद कहा था कि अभिनय तो उनकी आत्मा में व्याप गया है। आत्मा तो कभी मरती नहीं इसलिए प्राण का अभिनय भी अमर है और आनेवाले समय में वे उसके ही सहारे हर दिल में जिंदा रहेंगे।

Thursday, January 8, 2015

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-9

इंकलाबी कवि शलभ श्रीराम सिंह भी उन्हें बहुत मानते थे
(भाग-9)

राजेश त्रिपाठी
        यह तो पहले ही बता आये हैं कि रुक्म जी किशोर वय से ही कविताएं और कहानियां लिखने लगे थे। उन दिनों उनकी कहानियां बालसखा, मनोहर कहानियां, मनमोहन व दूसरी पत्रिकाओं में छपती थींं। बड़े-बड़े रचनाकारों के साथ छपती थींं उनकी कहानियां। कलकत्ता में भी पत्रकारिता के साथ उनका साहित्य सृजन जारी रहा। कलकत्ता के कई स्वनामधन्य कथाकारों और कवियों से उनकी जान-पहचान और मित्रता रही। उन दिनो ‘ज्ञानोदय’ पत्रिका कलकत्ता से ही निकलती थी और रुक्म जी भी गाहे-बगाहे उसमें छपते रहते थे। कलकत्ता के जिन कवि और कथाकारों से उनका परिचय था उनमें प्रमुख हैं कथाकार, कवि, आलोचक, संपादक प्रयाग शुक्ल, कथाकार छेंदीलाल गुप्त, कवि, गीतकार छविनाथ मिश्र, ललित निबंधकार डॉ.कृष्णबिहारी मिश्र, गीतेश शर्मा, एस.पी. सिंह, नारायण दुबे, विश्वंभर नेवर व अन्य। प्रयाग शुक्ल उन दिनों कलकत्ता में ही रहते थे। उनके भाई (शायद नाम था रामनारायण जिनकी अल्पायु में ही मृत्यु हो गयी थी) भी कथाकार थे। तब प्रयाग जी का रुक्म जी से अक्सर मिलना-जुलना होता था और वे उन्हें बड़े भाई सा सम्मान देते थे। छेंदीलाल गुप्त कथाकार थे और शायद वे उम्र में रुक्म जी से बड़े थे इसलिए वे उनका आदर पाते थे। छेंदीलाल गुप्त वामपंथी विचारधारा के थे और उनकी रचनाओं में भी यह झलकता था। गीतकार, कवि छविनाथ मिश्र जी भी कभी रुक्म जी के पड़ोसी हुआ करते थे। यह उस वक्त की बात है जब रुक्म  जी हावड़ा मे रहते थे। छविनाथ मिश्र जी ने ऋचाओं को हिंदी छंदों में ढालने का अभिनव और उत्तम प्रयास किया। वे अक्सर जब भी नयी कविता या गीत लिखते रुक्म जी को जरूर सुनाते। रुक्म जी भी श्रद्धा से उनको सुनते और उन्हें श्रद्धा से दद्दा दी ही कहते थे। रुक्म जी के परिचितों में ललित निबंधकार और वयोवृद्ध साहित्य मनीषी व शिक्षक डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र भी थे। जब तक रुक्म जी जीवित रहे गाहे-बगाहे मिश्र जी से मिलते रहे। मिश्र जी भी कभी राज मिठौलिया तो कभी कृपाशंकर चौबे जी के माध्यम से रुक्म जी के बारे में कुशल-क्षेम पूछते रहते थे। गीतेश शर्मा जी तो रुक्म जी को ‘गुरु जी’ कह कर ही संबोधित करते रहे। विविध  विषयों   पर  कई  चर्चित व   विदेश की यात्राओं पर आधारित पुस्तकों के लेखक
श्री गीतेश शर्मा

  व 'जनसंसार' के संपादक गीतेश शर्मा जी अपने आप में अनुभवों को समेटे एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने एक लंबा युग देखा है और पत्रकारिता के कई आयामों को बनते-बिगड़ते देखा है। वे कभी रुक्म जी द्वारा सन्मार्ग में चलाये जा रहे बाल विनोद के सदस्य हुआ करते थे। एस.पी. सिंह जिन्हे मीडिया महानायक कहा गया भी रुक्म जी के द्वारा संपादित बाल विनोद के सदस्य थे।  आगे चल कर एस.पी. सिंह चर्चित पत्रिका ‘रविवार’ के संपादक बने तो जब रुक्म जी का उनसे मिलना हुआ तो एस.पी. सिंह ने बाकायदा बाल विनोद का अपना सदस्यता नंबर तक उन्हें बता दिया। नारायण दुबे अक्सर रुक्म जी से मिलने सन्मार्ग जाते थे। जब उन्होंने सन्मार्ग छोड़ दिया तो वे उनसे मिलने उनके काकुड़गाछी स्थित फ्लेट में भी आते रहे और रुक्म जी व उनके परिवार के लिए वे हमेशा घर के किसी सदस्य के ही तरह रहे। दुबे जी ‘बंगाल मेल’ नामक एक पत्र भी निकालते थे। अभिनय और लेखन का शौक भी उन्हें था। वे भी रुक्म जी के परिशिष्ट में नारायण दुबे सारंगपुरी के नाम से अक्सर व्यंग्य और आलेख लिखते रहते थे। किसी फिल्म की पटकथा लिखते या अभिनय करते तो यह जानकारी रुक्म जी से साझा करने से ना भूलते। रुक्म जी भी हमेशा उनकी हौसलाआफजाई ही करते।
   छपते छपते के संपादक और ताजा टीवी के विश्वंभर नेवर जी भी रुक्म जी का बड़ा आदर करते थे। कहते हैं छपते छपते निकालने से पहले एक बार वे रुक्म जी से मिले तो उन्होंने कहा कि वे ‘छपते छपते’ नाम का अखबार निकालने वाले हैं। रुक्म जी को ताज्जुब हुआ यह अनोखा नाम सुन कर। आजकल जिस
श्री विश्वंभर नेवर

तरह से टीवी  में ब्रेकिंग न्यूज का चलन है उसी तरह से उन दिनों अखबारों में लेट अवर पायी खबरों को संक्षिप्त में `छपते छपते' स्लग लगा कर छापने की परंपरा थी लेकिन इस नाम से अखबार निकालने की बात उस वक्त रुक्म जी के गले नहीं उतरी लेकिन बाद में इस अखबार का नाम लोगों के होंठों पर आ गया तो रुक्म जी नेवर जी की बुद्धि का लोहा मान गये। इनके अलावा भी कई ऐसे लोग थे जिनसे रुक्म जी का परिचय रहा। ऐसे कुछ लोगों का जिक्र आगे की किस्तों में करने की कोशिश करेंगे।
इंकलाबी कवि और यायावर व्यक्तित्व शलभ श्री राम सिंह के परिचय के लिए उनकी ये चंद पंक्तियां ही काफी हैं-‘नफस नफस कदम कदम। बस एक फिक्र दम बदम। घिरे हैं हम सवाल से जवाब चाहिए। जवाब दर सवाल है इंकलाब चाहिए। ‘  ये पंक्तियां कभी हक के लिए लड़नेवालों की आवाज बन गयी थीं। रुक्म जी से शलभ श्रीराम सिंह का परिचय भी काफी गहरा था। इंकलाबी कवि और विद्रोही तेवर के व्यक्तित्व वाले शलभ जी को अभिनय का भी शौक था यह बात शायद कम लोगों को पता होगा। उन्होंने साहित्य के अलावा अभिनय व पत्रकारिता में भी हाथ आजमाया। पत्रकारिता में उनके मददगार रहे रुक्म जी उनके बड़े भैया ही बने रहे।
शलभ श्रीराम सिंह

जिन दिनों की ये बात है उन दिनों आज का मूनलाइट सिनेमा नाटकों के लिए मशहूर था। उसमें अक्सर नाटकों  का मंचन होता था जिसमें कुछ पारसी स्टाइल के हुआ करते थे। शलभ श्रीराम सिंह अपने अभिनय की भूख इन नाटकों में मिटाते थे।    रुक्म जी सन्मार्ग के सिनेमा पृष्ठ का संपादन करते थे जिसमें उन दिनों नाटकों की समीक्षा व खबरें भी जाती थीं इसलिए वे अक्सर नाटक देखने जाते थे एक समीक्षक के रूप में। मूनलाइट में भी वे नाटक देखने जाते थे। नाटक देखने के दौरान कई बार उन्होंने देखा कि उसमें पुलिस की भूमिका निभानेवाला कलाकार उनको देखते ही किसी दूसरे कलाकार के पीछे छिप जाता है। एक बार वे ग्रीनरूम में गये तो पुलिस की वेशभूषा में शलभ जी को पाया। तब तक शलभ की कविताओं से रुक्म जी का परिचय हो चुका था। उन्होंने उनसे कहा कि तुम अपने लेखन कला, प्रतिभा को ही विकसित करो, चाहो तो उससे मिलता-जुलता पेशा पत्रकारिता भी कर सकते हो। उसके बाद शलभ जी ने वैसा ही किया। वे अपनी रचनाओं के लिए ख्यात हो गये। उनकी कविताओं में नये उपमान और नयी जान होती। उनकी कविताओं में विद्रोही और क्रांतिधर्मा स्वर उनको उन कवियों से अलग साबित करते रहे जो पुरस्कारों या सम्मानों के लोभ में ठकुरसुहाती ही लिखते हैं और जिनकी रचनाधर्मिता स्वार्थ के ताने-बाने में उलझ कर रह जाती हैं। जहां-जहां जनचेतना या सार्थक जनांदोलनों को कुचलने की साजिश हुई शलभ की कविता वहां-वहां आगाह करने  पहुंच गयी।इन पंक्तियों के निहातार्थ से आप इस बात को बखूबी समझ सकते हैं-"पूरब में चमकते सूरज के खिलाफ एक साजिश चल रही है। ताकीद दी जा रही है लोगों को कि वे। झोले में अपना-अपना सूरज लेकर चलें।" जिंदगी की आपाधापी, आदमी का मशीन बन जाना सब कुछ सिर्फ पेट भरने, जीवनयापन के लिए ही तो होता है। पेट ही परमात्मा है, पेट ही गुरु है, यह आदमी से क्या-क्या नहीं करा लेता। इस पर शलभ जी ने बेजोड़ पंक्तियां लिखी हैं-पेट के इशारों पर उठते हैं हाथ। पाँव चलते हैं पेट के इशारों पर। पेट के इशारों पर हरकत में आता है शरीर। पेट आत्मा का पहला ग्रन्थ है। परमात्मा का आइना है पेट। पेट हमारा पहला और आखिरी उस्ताद है। ऐसी ओजस्वी कविताएं लिखनेवाले शलभ जी रुक्म जी के हमेशा बहुत ही करीब रहे। वे उन्हें बड़े भैया कहते थे और रुक्म जी भी उन्हें छोटे भाई –सा स्नेह करते थे। शलभ जी उत्तरप्रदेश के फैजाबाद जिले के एक गांव के थे और रुक्म जी भी उत्तरप्रदेश के ही थे इसलिए दोनों में खूब पटती थी। .यह जिन दिनों की बात है तब शलभ जी युवा थे और उभरते कवि के रूप में ख्याति प्राप्त कर रहे थे। जिस समय का यह जिक्र है उस समय रुक्म जी कलकत्ता के वेलिंग्टन स्क्वायर के करीब हिंद सिनेमा के पास 2 ए अक्रूर दत्त लेन में रहते थे। शलभ जी को जब भी घर का खाना खाने की इच्छा होती वे अपने बड़े भैया के घर पहुंच जाते और भाभी के हाथ का खाना बड़े भैया के साथ बैठ कर खाते थे। जब तक शलभ कलकत्ता में रहे रुक्म जी से बराबर मिलते रहे।
      कालांतर में उनकी शादी कल्याणी जी से हुई जो संयोग से खुद भी कवियत्री हैं। बाद के वर्षों में शलभ जी कलकत्ता छोड़ कर मध्यप्रदेश के विदिशा चले गये जहां उन्होंने रामकृष्ण प्रकाशन में संपादक के रूप में सफलतापूर्वक काम किया। विदिशा में ही उनकी अपने अभिन्न और पुराने मित्र विजयबहादुर सिंह जी से मुलाकात हुई जिनसे उनका परिचय कलकत्ता में ही हो चुका था। विजयबहादिर सिंह जी का नाम लिए बिना शलभ जी का परिचय अधूरा रह जायेगा। विजय जी शलभ जी को जितना जानते हैं साहित्य जगत का शायद ही कोई दूसरा आदमी उतना जानता हो। वे शलभ की जिंदगी के चलते-फिरते इनसाईक्लोपीडिया हैं और उन पर उन्होंने लिखा भी खूब है। बिदिशा में रहते हुए भी शलभ जी जब कभी कलकत्ता आते तो अगर अपने बड़े भैया रुक्म जी से साक्षात्कार नहीं कर पाते तो फोन से जरूर बातें कर लेते थे। अपने प्यारे बड़े भैया से बातें करते वक्त अक्सर उनकी आंखें हर्ष से नम हो जातीं। बहुत ही दिलअजीज और प्यारे थे शलभ जी। पहली बार मिलने वाले से भी वे इतने खुलूस और अपनापे के भाव के साथ मिलते कि मिलने वाले को लगता कि इस शख्स को वह जैसे वर्षों से जानता है।
      अक्रूर दत्त लेन में ही मशहूर संगीतकार वी .बालसारा जी रहते थे जो गुजरात से थे लेकिन.कलकत्ता आने के बाद फिर यहीं के हो गये। वे रुक्म जी के पड़ोसी थे इसलिए उनसे भी उनका अच्छा परिचय था। बालसारा ऐसे संगीतकार थे जिनके हाथों में आया हर साज ऐसे स्वर छेड़ता कि सुननेवाला मंत्रमुग्ध हो जाता। जितने साज वे पारंगता से बजा लेते थे, शायद ही दूसरा कोई संगीतकार बजा पाता हो। उनके घर बड़े-बड़े कलाकारों का आना-जाना लगा ही रहता था। एक बार उनके घर भारत कोकिला लता मंगेशकर जी आ गयीं। अब समस्या थी कि उनके लिए खाना कौन बनायेगा। बालसारा जी को अपने परिचित रुक्म जी का खयाल आया और उन्होंने उनसे अपनी समस्या बतायी। इस पर रुक्म जी ने कहा-‘इसमें परेशान होने की क्या बात है नीरू (पत्नी निरुपमा त्रिपाठी को प्यार से वे इसी नाम से पुकारते थे) बना देगी और लता जी को खिला भी देगी।‘ वैसा ही हुआ निरुपमा त्रिपाठी ने खाना बनाया और खुद जाकर उन लता दीदी को खिलाया जिनकी वह बहुत बड़ी प्रशंसक थीं।  (शेष अगले भाग में)


Saturday, July 20, 2019

दिमाग से नहीं दिल से लिखते थे नीरज


उनका एक-एक बोल सीधे दिल में उतर जाता था
राजेश त्रिपाठी
   नीरज जी जैसे गीतकार और जन-जन के कवि धरा पर बार-बार नहीं आते। नीरज यह नाम गीतों की दुनिया में ऐसे अमर हो गया कि उनका मूल नाम गोपाल प्रसाद गौण हो गया। उनके मूल नाम को भले ही गिने-चुने लोग जानते हों लेकिन सरस गीतों, भाव-भरी और सशक्त कविताओं के रचयिता नीरज से शायद ही कोई हिंदी साहित्य प्रेमी अपरिचित हो। गीतकार तो बहुत हैं लेकिन उनमें कुछ ही हैं जो पढ़ने-सुनने वालों से सीधे जुड़ पाते हैं। नीरज जब गीत गाते या अपनी कविताएं पढ़ते तो सुनने वालों से उनका सीधा तादाम्य होता था। मंत्रमुग्ध हो जाता था श्रोता उनके भाव,उनके सशक्त शब्द सुन कर क्योंकि नीरज दिमाग से नहीं दिल से लिखते थे। उनका एक-एक शब्द सुनने वालों के दिल में उतर जाता था।
     नीरज का जीवन खुली किताब था, कुछ भी ढंका-छिपा नहीं रहा इसलिए उनसे जुड़ी हर अच्छी-बुरी चीजें बाहर आती रहीं। इस प्रसंग में विस्तार से न जाते हुए खुद उन्हीं के शब्दों में इस बारे में कहें जो स्वीकारोक्ति ही लगते हैं-
इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में।
लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में ।।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर।
ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में।।
     नीरज समानता, समरसता के हामी थे। वे चाहते थे कि विकास का उजाला जन-जन तक पहुंचे। धरा का कोई भी कोना अंधेरा न रह जाये। इन सार्थक भावों को समेटे उनका गीत प्रस्तुत है-
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहां रोज आए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेगे तभी यह अंधेरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए
नीरज का कवि हृदय में जमाने में व्याप्त विषमता, जाति, वर्ग को लेकर दिनों-दिन बढ़ते अंतर, विद्वेष से भीतर तक मर्माहत था। मानव-मानव में भेद को कवि बरदाश्त नहीं कर पा रहा था इसीलिए उसका दिल बड़ी अकुलाहट, बड़ी बेचैनी से कह उठता है-
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए। 
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए। 
आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहां जाके नहाया जाए। 
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अंधेरे को उजाले में बुलाया जाए। 
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए। 

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आंसू तेरी पलकों से उठाया जाए।
  नीरज के बारे में जितना कुछ कहा-लिखा जाये वे जग के हर उपमान से बड़े थे क्योंकि वे यथार्थ के धरातल पे खड़े थे। उनके शब्द उनकी मुकम्मल पहचान होते थे और कवि सम्मेलनों में उनका होना सुकून का सबब बनता था। श्रोता उन्हें सुन धन्य होता था क्योंकि उनकी कविता उसके दिल, उसके एहसास पर गहरा असर छोड़ती थी। एक लेख में उनके महान व्यक्तित्व को समेटना आसान नहीं, यह तो सूरज को दीपक दिखाने के समान है।
     अब उनके फिल्मी गीतकार के रूप में मशहूर होने के प्रसंग में आते हैं। मेरे बड़े भाई साहब स्वर्गीय रामखिलावन त्रिपाठी ‘रुक्म’ कोलकाता के हिंदी पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े लोगों में जाना-पहचाना नाम था। उन्होंने प्रसिद्ध हिंदी दैनिक ‘सन्मार्ग’ में रहते हुए कुछ पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। इनमें कुछ फिल्मी पत्र-पत्रिकाएं भी थीं जिनके लिए उनको अक्सर बंबई (अब मुंबई) जाना पड़ता था। इस क्रम में अशोक कुमार, राज कपूर, धर्मेंद्र ( जो उनको गुरु जी कहते थे और जिन्हें भैया ने उनका पहला सचिव दीनानाथ शास्त्री दिया था), दिलीप कुमार, भारत भूषण (बैजू बावरा फेम), हसरत जयपुरी, देव आनंद, मनोज कुमार व अन्य से उनका परिचय था। उन्होंने नीरज जी से जुड़ा एक संस्मरण मुझे सुनाया जो मैं यहां प्रस्तुत करता हूं- भैया किसी एक निर्माता (नाम जानते हुए भी देना नहीं चाहता) के कार्यालय में गये। उन्होंने देखा कि नीरज जी बाहर सोफे पर बैठे हैं।
 भैया ने उनको नमस्कार किया और पूछा-‘नीरज जी आप यहां?’
  नीरज जी बोले-‘हां, निर्माता से मिलने आया हूं। भीतर विजिटिंग कार्ड भेजा है, कोई जवाब नहीं आया।‘
        निर्माता भैया के परिचित थे। उन्होंने भीतर जाकर उनसे कहा-‘अरे भाई आपने जिनको बाहर बैठा रखा है वे हिंदी के महान गीतकार हैं। उन्हें तुरत अंदर बुलाइए।‘
        निर्माता को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने तुरंत नीरज जी को अंदर बुलाया। बाद में फिल्म ‘पहचान’ के टाइटिल सांग ‘पैसे की पहचान यहां इनसान की कीमत कोई नहीं बच के निकल जा इस बस्ती में करता मुहब्बत कोई नहीं ’ में नीरज जी ने अपने उस उपेक्षा की शिकायत की जो बहुत से मशहूरो-मारूफ लोगों को उनके हाथों झेलने पड़ती है जिनका साहित्य से कोई नाता नहीं और जो सस्ते, सतही, फूहड़ गाने ही पसंद करते और फिल्मों में भरते हैं।
     फिल्मी गीतों को जो ऊंचाई शकील बदायूंनी, कैफी आजमी, शैलेंद्र, गुलजार,इंदीवर जैसे गीतकारों ने दी वह अब जावेद अख्तर के अलावा किसी और में नहीं दिखती। फिल्मी गीतों के गिरते स्तर के बारे में एक बार प्रसिद्ध गीतकार इंदीवर ( अब स्वर्गीय) से चर्चा हुई। यहां यह बताना अप्रासंगिक न होगा कि श्यामलाल बाबू राय यानी इंदीवर मेरे बांदा जिले के पड़ोसी जिले झांसी के थे।  फिल्म ‘सरस्वतीचंद्र’ के गीत ‘चंदन सा बदन, चंचल चितवन’  लिखनेवाले इंदीवर जब ‘झोपड़ी में चारपाई ’ जैसा सस्ता, फूहड़, निम्न कोटि का गीत लिखते हैं तो मेरे जैसे व्यक्ति को जो ‘चंदन सा बदन’ लिखनेवाले इंदीवर का भक्त था, गहरी चोट पहुंचती है। इंदीवर जी एक फिल्म (जो बनी नहीं, मुहूर्त तक ही सिमट कर  रह गयी) के गीत लिखने कोलकाता आये थे। मुहूर्त कवरेज के लिए मैं भी गया था। उनसे भेंट हुई तो मैंने  शिकायती लहजे में कहा-‘क्या इंदीवर जी ‘चंदन सा बदन’ लिखनेवाला लेखक इतनी नीचे उतर गया ‘झोपड़ी में चारपाई’ यह साहित्य का कौन-सा उत्कर्ष है।‘
        उन्होंने जो उत्तर दिया वह दिल का दुख और गहरा कर गया। उन्होंने कहा-‘भैया ऐसा पेट की खातिर करना पड़ा। अब कोई भी चंदन सा बदन नहीं  लिखाना चाहता। ऐसे सस्ते, फूहड़ गानों का दौर है, न लिखें तो भूखों मरें।‘
        उनका जवाब सुन कर मैं स्तब्ध रह गया। मेरे सवाल का जवाब मुझे मिल गया था। इस प्रसंग को लिखने का एक ही मतलब था कि फिल्मी दुनिया में अब साहित्यकारों की कोई इज्जत नहीं। वैसे दृष्टांत है कि अतीत में भी कई बड़े-बड़े साहित्याकारों का जिन्होंने फिल्मों की ओर रुख किया था जल्द ही मोहभंग  हो गया।
     यह जरूर है कि नीरज जी जब फिल्मी दुनिया में गये तो छा गये। उनका एक-एक गीत हिट हुआ। सुना है कि फिल्मों में उन्हें लाने का श्रेय देव आनंद को जाता है। उनकी फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ में उन्होंने शानदार गीत लिखा ‘रंगीला रे तेरे रंग में क्यूं रंगा है मेरा मन’ जिसे सचिन देव बर्मन ने संगीत से सजाया और लता मंगेशकर ने गाया था बहुत हिट हुआ। वैसे फिल्म ‘नयी उमर की नयी फसल’ के गीत ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे’ को जितनी तारीफ मिली शायद ही किसी गीत को मिली हो। इस गीत का एक-एक बंद जिंदगी का आईना है जिसमें उभरते अक्स किसी के भी हो सकते हैं। इसकी स्थितियां बहुत ही जानी-पहचानी लगती हैं और यह गीत सीधे दिल में उतरता है।
          नीरज के लिखे हर फिल्मी गीत में उनकी अपनी अलग पहचान थी। चाहे वह ‘ कन्यादान’ फिल्म का ‘लिखे जो खत तुझे’ हो या ‘शोखिय़ों में घोला जाये फूलों का शवाब’ (फिल्म प्रेमपुजारी) या ‘कहता है जोकर सारा जमाना’ (मेरा नाम जोकर) या इसी फिल्म का ‘ये भाई जरा देख के चलो’ गीत दोनों ही प्रासंगिक, कथानक से ओतप्रोत जुड़े और जीवन के ऊंच-नीच की कहानी कहते सार्थक गीत हैं।
     नीरज जी का व्यक्तित्व अथाह सागर है जिसमें अवगाहन करना हम जैसे अकिंचन के लिए आसान नहीं। उनके बारे में जो जाना-सुना उसके आधार पर उनके व्यक्तित्व का एक खाका खींचने की कोशिश की। जानता हूं बहुत कुछ छूट गया होगा क्योंकि नीरज जी के जीवन को शब्दों में समेटना आसान नहीं।


Friday, October 5, 2018

श्रद्धांजलि


दिमाग से नहीं दिल लिखते थे नीरज
उनका एक-एक बोल सीधे दिल में उतर जाता था
राजेश त्रिपाठी
नीरज जी का जाना हिंदी गीत विधा के एक सशक्त अध्याय की परि समाप्ति जैसा है। कारण, नीरज जी जैसे गीतकार और जन-जन के कवि धरा पर बार-बार नहीं आते। नीरज यह नाम गीतों की दुनिया में ऐसे अमर हो गया कि उनका मूल नाम गोपाल प्रसाद गौण हो गया। उनके मूल नाम को भले ही गिने-चुने लोग जानते हों लेकिन सरस गीतों, भाव-भरी और सशक्त कविताओं के रचयिता नीरज से शायद ही कोई हिंदी साहित्य प्रेमी अपरिचित हो। गीतकार तो बहुत हैं लेकिन उनमें कुछ ही हैं जो पढ़ने-सुनने वालों से सीधे जुड़ पाते हैं। नीरज जब गीत गाते या अपनी कविताएं पढ़ते तो सुनने वालों से उनका सीधा तादाम्य होता था। मंत्रमुग्ध हो जाता था श्रोता उनके भाव,उनके सशक्त शब्द सुन कर क्योंकि नीरज दिमाग से नहीं दिल से लिखते थे। उनका एक-एक शब्द सुनने वालों के दिल में उतर जाता था।
     नीरज का जीवन खुली किताब था, कुछ भी ढंका-छिपा नहीं रहा इसलिए उनसे जुड़ी हर अच्छी-बुरी चीजें बाहर आती रहीं। इस प्रसंग में विस्तार से न जाते हुए खुद उन्हीं के शब्दों में इस बारे में कहें जो स्वीकारोक्ति ही लगते हैं-
इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में।
लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में ।।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर।
ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में।।
     नीरज समानता, समरसता के हामी थे। वे चाहते थे कि विकास का उजाला जन-जन तक पहुंचे। धरा का कोई भी कोना अंधेरा न रह जाये। इन सार्थक भावों को समेटे उनका गीत प्रस्तुत है-
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहां रोज आए।

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेगे तभी यह अंधेरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए
नीरज का कवि हृदय में जमाने में व्याप्त विषमता, जाति, वर्ग को लेकर दिनों-दिन बढ़ते अंतर, विद्वेष से भीतर तक मर्माहत था। मानव-मानव में भेद को कवि बरदाश्त नहीं कर पा रहा था इसीलिए उसका दिल बड़ी अकुलाहट, बड़ी बेचैनी से कह उठता है-
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए। 
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए। 
आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहां जाके नहाया जाए। 
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अंधेरे को उजाले में बुलाया जाए। 
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए। 

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आंसू तेरी पलकों से उठाया जाए।
  नीरज के बारे में जितना कुछ कहा-लिखा जाये वे जग के हर उपमान से बड़े थे क्योंकि वे यथार्थ के धरातल पे खड़े थे। उनके शब्द उनकी मुकम्मल पहचान होते थे और कवि सम्मेलनों में उनका होना सुकून का सबब बनता था। श्रोता उन्हें सुन धन्य होता था क्योंकि उनकी कविता उसके दिल, उसके एहसास पर गहरा असर छोड़ती थी। एक लेख में उनके महान व्यक्तित्व को समेटना आसान नहीं, यह तो सूरज को दीपक दिखाने के समान है।
    
अब उनके फिल्मी गीतकार के रूप में मशहूर होने के प्रसंग में आते हैं। मेरे बड़े भाई साहब स्वर्गीय रामखिलावन त्रिपाठी ‘रुक्म’ कोलकाता के हिंदी पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े लोगों में जाना-पहचाना नाम था। उन्होंने प्रसिद्ध हिंदी दैनिक ‘सन्मार्ग’ में रहते हुए कुछ पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। इनमें कुछ फिल्मी पत्र-पत्रिकाएं भी थीं जिनके लिए उनको अक्सर बंबई (अब मुंबई) जाना पड़ता था। इस क्रम में अशोक कुमार, राज कपूर, धर्मेंद्र ( जो उनको गुरु जी कहते थे और जिन्हें भैया ने उनका पहला सचिव दीनानाथ शास्त्री दिया था), दिलीप कुमार, भारत भूषण (बैजू बावरा फेम), हसरत जयपुरी, देव आनंद, मनोज कुमार व अन्य से उनका परिचय था। उन्होंने नीरज जी से जुड़ा एक संस्मरण मुझे सुनाया जो मैं यहां प्रस्तुत करता हूं- भैया किसी एक निर्माता (नाम जानते हुए भी देना नहीं चाहता) के कार्यालय में गये। उन्होंने देखा कि नीरज जी बाहर सोफे पर बैठे हैं।
 भैया ने उनको नमस्कार किया और पूछा-‘नीरज जी आप यहां?’
  नीरज जी बोले-‘हां, निर्माता से मिलने आया हूं। भीतर विजिटिंग कार्ड भेजा है, कोई जवाब नहीं आया।‘
        निर्माता भैया के परिचित थे। उन्होंने भीतर जाकर उनसे कहा-‘अरे भाई आपने जिनको बाहर बैठा रखा है वे हिंदी के महान गीतकार हैं। उन्हें तुरत अंदर बुलाइए।‘
        निर्माता को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने तुरंत नीरज जी को अंदर बुलाया। बाद में फिल्म ‘पहचान’ के टाइटिल सांग ‘पैसे की पहचान यहां इनसान की कीमत कोई नहीं बच के निकल जा इस बस्ती में करता मुहब्बत कोई नहीं ’ में नीरज जी ने अपने उस उपेक्षा की शिकायत की जो बहुत से मशहूरो-मारूफ लोगों को उनके हाथों झेलने पड़ती है जिनका साहित्य से कोई नाता नहीं और जो सस्ते, सतही, फूहड़ गाने ही पसंद करते और फिल्मों में भरते हैं।
     फिल्मी गीतों को जो ऊंचाई शकील बदायूंनी, कैफी आजमी, शैलेंद्र, गुलजार,इंदीवर जैसे गीतकारों ने दी वह अब जावेद अख्तर के अलावा किसी और में नहीं दिखती। फिल्मी गीतों के गिरते स्तर के बारे में एक बार प्रसिद्ध गीतकार इंदीवर ( अब स्वर्गीय) से चर्चा हुई। यहां यह बताना अप्रासंगिक न होगा कि श्यामलाल बाबू राय यानी इंदीवर मेरे बांदा जिले के पड़ोसी जिले झांसी के थे।  फिल्म ‘सरस्वतीचंद्र’ के गीत ‘चंदन सा बदन, चंचल चितवन’  लिखनेवाले इंदीवर जब ‘झोपड़ी में चारपाई ’ जैसा सस्ता, फूहड़, निम्न कोटि का गीत लिखते हैं तो मेरे जैसे व्यक्ति को जो ‘चंदन सा बदन’ लिखनेवाले इंदीवर का भक्त था, गहरी चोट पहुंचती है। इंदीवर जी एक फिल्म (जो बनी नहीं, मुहूर्त तक ही सिमट कर  रह गयी) के गीत लिखने कोलकाता आये थे। मुहूर्त कवरेज के लिए मैं भी गया था। उनसे भेंट हुई तो मैंने  शिकायती लहजे में कहा-‘क्या इंदीवर जी ‘चंदन सा बदन’ लिखनेवाला लेखक इतनी नीचे उतर गया ‘झोपड़ी में चारपाई’ यह साहित्य का कौन-सा उत्कर्ष है।‘
        उन्होंने जो उत्तर दिया वह दिल का दुख और गहरा कर गया। उन्होंने कहा-‘भैया ऐसा पेट की खातिर करना पड़ा। अब कोई भी चंदन सा बदन नहीं  लिखाना चाहता। ऐसे सस्ते, फूहड़ गानों का दौर है, न लिखें तो भूखों मरें।‘
        उनका जवाब सुन कर मैं स्तब्ध रह गया। मेरे सवाल का जवाब मुझे मिल गया था। इस प्रसंग को लिखने का एक ही मतलब था कि फिल्मी दुनिया में अब साहित्यकारों की कोई इज्जत नहीं। वैसे दृष्टांत है कि अतीत में भी कई बड़े-बड़े साहित्याकारों का जिन्होंने फिल्मों की ओर रुख किया था जल्द ही मोहभंग  हो गया।
     यह जरूर है कि नीरज जी जब फिल्मी दुनिया में गये तो छा गये। उनका एक-एक गीत हिट हुआ। सुना है कि फिल्मों में उन्हें लाने का श्रेय देव आनंद को जाता है। उनकी फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ में उन्होंने शानदार गीत लिखा ‘रंगीला रे तेरे रंग में क्यूं रंगा है मेरा मन’ जिसे सचिन देव बर्मन ने संगीत से सजाया और लता मंगेशकर ने गाया था बहुत हिट हुआ। वैसे फिल्म ‘नयी उमर की नयी फसल’ के गीत ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे’ को जितनी तारीफ मिली शायद ही किसी गीत को मिली हो। इस गीत का एक-एक बंद जिंदगी का आईना है जिसमें उभरते अक्स किसी के भी हो सकते हैं। इसकी स्थितियां बहुत ही जानी-पहचानी लगती हैं और यह गीत सीधे दिल में उतरता है।
          नीरज के लिखे हर फिल्मी गीत में उनकी अपनी अलग पहचान थी। चाहे वह ‘ कन्यादान’ फिल्म का ‘लिखे जो खत तुझे’ हो या ‘शोखिय़ों में घोला जाये फूलों का शवाब’ (फिल्म प्रेमपुजारी) या ‘कहता है जोकर सारा जमाना’ (मेरा नाम जोकर) या इसी फिल्म का ‘ये भाई जरा देख के चलो’ गीत दोनों ही प्रासंगिक, कथानक से ओतप्रोत जुड़े और जीवन के ऊंच-नीच की कहानी कहते सार्थक गीत हैं।
     नीरज जी का व्यक्तित्व अथाह सागर है जिसमें अवगाहन करना हम जैसे अकिंचन के लिए आसान नहीं। उनके बारे में जो जाना-सुना उसके आधार पर उनके व्यक्तित्व का एक खाका खींचने की कोशिश की। जानता हूं बहुत कुछ छूट गया होगा क्योंकि नीरज जी के जीवन को शब्दों में समेटना आसान नहीं। जितना कह पाया उतना ही उनको श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित है। इस महान व्यक्तित्व को शतश: नमन।