Wednesday, December 3, 2014

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-7


पांडेय बेचन शर्मा उग्र से भिडंत
(भाग-7)

राजेश त्रिपाठी
        दंगों के घाव भरने और महानगर को फिर से संभलने में लंबा वक्त लगा। जिन्होंने अपनों को खोया उन्हें खुद को संभालने और खोये विश्वास को पुनर्स्थापित करने में वक्त लगा। दंगे सिर्फ आदमी को ही नहीं उसकी आत्मा, उसके विश्वास को भी मार देते हैं। वह भीतर से टूट-बिखर जाता है। टूट कर जुड़ने में कभी-कभी सदियां लग जाती हैं। खैर कहते हैं ना कि वक्त की गर्द बड़े-बड़े गमों को ढंक देती है तो कलकत्ता (अब कोलकाता) भी एक बार फिर संभल कर उठ खड़ा हो गया। धीरे-धीरे सारी गतिविधियां भी स्वाभाविक हो गयीं। लोग गली-कूचों में बेखौफ निकलने लगे। दंगे क्यों हुए, किसकी इसमें प्रमुख भूमिका थी इन प्रसंगों पर जाना बेमानी  है क्योंकि इस तरह के दुखद इतिहास की याद और कचोट अगर समाज में कुछ लाती है तो वैमनस्य और नफरत जो शायद किसी भी अमनपसंद व्यक्ति की चाहत नहीं होगी।
   दंगे थमे, महानगर ने अपनी स्वाभाविक चाल पकड़ ली तो रुक्म जी की जिंदगी का कारवां भी आगे बढ़ा। वे सन्मार्ग में तो थे ही साथ ही अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं का भी संपादन करते रहे। इनमें पागल, राजश्री, गल्प भारती, स्वपनलोक आदि प्रमुख हैं। काफी अरसे बाद रुक्म जी कलकत्ता के बेलियाघाटा अंचल के मुंशीबाजार में रहने लगे थे। उन दिनों कलकत्ता में साहित्य और पत्रकारिता के बड़े-बड़े मनीषियों का आवागमन अक्सर होता रहता था। कुछ साहित्य मनीषी तो कलकत्ता में ही विराजते थे। इन लोगों का सन्मार्ग कार्यालय भी आना-जाना होगा। अब साहित्य परिशिष्ट रुक्म जी देखते थे तो उनसे भी इन लोगों का मिलना –जुलना होता ही था।
    इनमें से ही एक थे पांडेय बेचन शर्मा उग्र। वे अपने उपनाम उग्र को अपने लेखन और अपने आचार-विचार दोनों से शतशः चरितार्थ करते थे। एक बानगी लेखन की ही ले लें। वे सन्मार्ग में दानेदार बेदाने नाम से एक कालम लिखा करते थे। इसमें एक बार उन्होंने लिखा- मैं जब हावड़ा स्टेशन पर उतर कर चाय की चुस्की लेता हूं और उसमें पेशाब-सी गंध आती है तो समझता हूं पहुंच गये कलकत्ता।
  उग्र जी जब कलकत्ता में होते तो उनका डेरा सन्मार्ग के कार्यालय में ही होता। वे भांग के परम भक्त और लती थे। जब तक भांग का गोला ना चढ़ा लेते उन्हें चैन ही नहीं पड़ता था। कहते हैं तड़के उठ कर वे सिलबट्टा लेकर भांग घोंटने बैठ जाते। रात ड्यूटी कर के सोये पत्रकार सिलबट्टे की खटर-पटर की आवाज से बेचैन हो जाते लेकिन उग्र जी से किसी की कुछ भी कहने की हिम्मत न पड़ती। लोग चुपचाप यह जुल्म सहते रहते। डरते कि क्या पता यह भंगेड़ी आदमी डंडे से जवाब देने लगे।  रुक्म जी को भी यह नागवार गुजरता था कि रात ड्यूटी करने के बाद सोये उनके साथियों पर कोई इस तरह जुल्म ढाये। जब उनसे बरदाश्त नहीं हुआ तो एक दिन उग्र जी के सामने तन कर खड़े हो गये  और बोले- तुम मिर्जापुरी हो तो मैं भी बुंदेलखंडी हूं। अपनी खटर-पटर अभी से बंद करो वरना उठा कर पटक दूंगा। रुक्म जी अच्छे डीलडौल के और तगड़े थे। उग्र जी ने एक बार उनको सिर से पैर तक देखा और सिल बट्टा उठा कर सन्मार्ग की छत पर चले गये। रुक्म जी के सन्मार्ग के सहयोगी साथियों ने राहत की सांस ली। उसके बाद से उनको उग्र जी के भांग घोटने के जुल्म से निजात मिल गयी। वे तड़के भी गाढ़ी नींद में सोने लगे।
    उग्र का व्यवहार ऐसा था कि कोलकाता के कुछ प्रकाशक उनके नाम से खौफ खाते थे। इसका पता रुक्म जी को तब चला जब वे एक स्थानीय प्रकाशक के पास अपनी एक किताब लेकर पहुंचे। प्रकाशक ने किताब को देखा, उलटा-पलटा और रुक्म जी का चेहरा देखने लगा। प्रकाशक के मुखमंडल में चिंता के भाव देख कर रुक्म जी ने पूछा-क्या बात है, आप मेरी किताब देख कर यों डर क्यों गये?’
   प्रकाशक ने कहा-किताब नहीं, आपका नाम देख कर डर लग रहा है।
  रुक्म जी चौंके- नाम देख कर, नाम अटपटा जरूर है, हो सकता है आपको इसका अर्थ ना मालूम हो लेकिन इसमें डरने जैसी कोई बात तो नहीं है।
  ‘नहीं ऐसे ही मिलते-जुलते नाम के एक लेखक उग्र जी आये थे। उनकी एक किताब छाप दी थी। किताब क्या छापी मुश्किल मोल ले ली। एक दिन डंडा लिये आ गये। कहने लगे  मेरे पैसे दे दो। हमने कहा पंडित जी अभी पैसे नही हैं दो-एक दिन में ले जाइएगा। इस पर वे डंडा चमकाने लगे और बोले कि जो खुले पैसे हैं वही जोड़ कर दो, मुझे भांग लेनी है। आपका नाम रुक्म देखा तो वह घटना याद आ गयी। आप तो वैसे नहीं हैं ना?’
   ‘नहीं भाई, ना मैं भांग खाता हूं ना ही पैसे के लिए किसी से लड़ाई करता हूं।

    रुक्म जी तब तक कथाकार और उपन्यासकार के रूप में ख्यात हो चुके थे। उन्होंने अपनी कुछ कहानियों को कंपाइल कर एक संग्रह का रूप दिया था जिसे वे छपवाने वाले थे। एक बड़ी कापी में उन्होने इन कहानियों को करीने से लिख रखा था। वह कापी एक दिन वे सन्माग कार्यालय ले गये कि वहां काम से फुरसत मिलते ही एक बार गौर से पढ़ लेंगे। उस कापी पर उग्र जी की नजर पड़ी तो वे बोले-यार रुक्म जी, अरे भाई ये कहानी संग्रह मुझे दो ना, मैं पढ़ कर दो-चार दिन में लौटा दूंगा।'
उन दिनों ऐसे थे रुक्म जी

     रुक्म जी ने सोचा विद्वान लेखक हैं दे देते हैं अगर कोई सुझाव देंगे तो अच्छा रहेगा। उन्होंने सहर्ष वह कहानी संग्रह उग्र जी को दे दिया। धीरे-धीरे दो-चार दिन क्या चार सप्ताह बीत गये उग्र जी ने वह कहानी संग्रह नहीं लौटाया। रुक्म जी जब कभी पूछते तो कहते यार भूल गया कल दे दूंगा। जब वे इस तरह हीला-हवाला करते रहे तो रुक्म जी फिर थोड़ा कड़े हुए और बोले जैसे भी हो कल कहानी संग्रह मेरे हाथ में होना चाहिए। दूसरे दिन कहानी संग्रह आया तो लेकिन उसे देख कर रुक्म जी ने सिर पीट लिया। उग्र जी ने उस पर आंवले के केश तेल की सारी शीशी उलट दी थी और वह पूरी तरह बेकार हो चुकी थी। रुक्म जी मन मसोस कर रह गये, उन वरिष्ट साहित्यकार को कुछ कहते भी तो क्या फायदा। कहानी संग्रह तो नष्ट हो ही चुका था।  


    उग्र जी भले ही उग्र स्वभाव के रहे हों लेकिन वे महान लेखक और प्रखर बुद्धि के थे। वे अपने बेबाक और सशक्त लेखन लिए मशहूर थे। उन्होंने कई पत्रों का संपादन भी किया। उनकी रचना चाकलेट और आत्मकथा अपनी खबर बहुत मशहूर हुई। वे अपने समय के अनूठे और प्रखर लेखक थे। दृढ़प्रतिज्ञ ऐसे कि एक बार जहां से मन उचट जाये उन गलियों पर कदम भी नहीं रखते थे। कहते हैं कि सन्मार्ग में  भी उनकी अधिकारी से खटपट हुई तो उनको सन्मार्ग छोड़ना पड़ा। कहते हैं कि उसके बाद से वे चित्तरंजन एवेन्यू (जिसे सेंट्रल एवेन्यू भी कहते हैं) स्थित सन्मार्ग कार्यालय के सामने वाले फुटपाथ से नहीं चलते थे।  वे सड़क के उस पार वाले फुटपाथ से जाया करते थे। साहित्य मनीषी उग्र जी आला तबीयत के मस्तमौला इनसान थे और हमेशा मस्ती में जिये। अब यह मस्ती किसी को नागवार गुजरती रही हो तो गुजरे वे इसकी परवाह भी नहीं करते थे। (शेष अगले भाग में)