Friday, October 5, 2018

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी भाग-30



उन्हें खोकर हर दिल सहमा, हर आंख रोयी
राजेश त्रिपाठी
  2 नवंबर 2014 का वह दिन जिस दिन हमारे भैया रुक्म जी हमें छोड़ कर चले गये हमारी जिंदगी का सबसे मनहूस दिन था। इसके पहले मैं अपनी मां और फिर भाभी को खो चुका था। हमारे परिवार में बुजुर्ग भैया ही बचे थे जिनकी सलाह लेकर ही हम कोई काम करते थे। उनका होना हमारे लिए बड़ा संबल था लेकिन भाग्य पर कोई जोर नहीं चलता। जिसे जीवन में जितनी सांसें मिली हैं उतनी सांसों तक ही उनकी जिंदगी की सीमा होती है।
   रुक्म जी को पहचानने वाले जितने लोगों तक संभव हो सका हमने उनके निधन का समाचार पहुंचाया। सभी बेहद दुखी हुए क्योंकि वे अजातशत्रु थे और उनका सबसे बड़ा गुण था नये लेखकों को प्रोत्साहित करना, उनकी कहानियां ठीक करके छापना। उनसे संबंधित सभी लोग उनके व्यवहार के कायल थे। किसी अपरिचित से भी वे ऐसे मिलते जैसे वर्षों से पहचान हो। कुछ लोगों ने कविताएं लिख कर उऩको श्रद्धांजलि दी तो कुछ ने भाव भरे शब्दों में अपनी संवेदना व्यक्त की।
 तृणमूल कांग्रेस के तत्कालीन सांसद श्री विवेक गुप्त   (जो सन्मार्ग हिंदी दैनिक के निदेशक भी हैं) रुक्म जी को वर्षों से जानते थे। उनके सन्मार्ग में रुक्म जी ने आधी सदी गुजारी थी और आज जितने परिशिष्ट निकलते हैं सबकी शुरुआत वर्षों पहले उन्होंने ही की थी। उन्होंने भाल भरे शब्दों में अपना दुख व्यक्त करने के साथ ही सन्मार्ग में उनके योगदान को याद किया। उन्होंने लिखा-राजेश जी, श्री रुक्म त्रिपाठी जी के निधन से काफी मर्माहत हूं। यह आपके परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनकी कमी परिवार को खलती रहेगी। उनके रिक्त स्थान को समय शायद ही भर पायेगा। इस दुखद घड़ी में मैं शोकसंतप्त हूं तथा उनके निधन पर अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करता हूं।
एक समारोह में रुक्म को सम्मानित करते कवि नगेंद्र चौरसिया
रुक्म जी सन्मार्ग से दशकों तक जुड़े रहे तथा संपूर्ण निष्ठा, समर्पण, ईमानदारी और निपुणता के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। रिटायरमेंट के बाद भी वे अपनी रचनओं के माध्यम से सन्मार्ग से जुड़े रहे तथा पत्र के सर्वाधिक लोकप्रिय स्तंभों में से एक चकल्लससे वे पाठकों तथा सन्मार्ग की सेवा करते रहे।यह क्रम उनके जीवन के अंतिम दिन तक जारी रहा। निश्चित रूप से उनके निधन से एक शून्य पैदा हुआ है। मैं परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि दिवंगत  आत्मा  को  शांति प्रदान करें तथा आपको , आपके परिवार के सदस्यों, मित्रों को संकट की इस घड़ी तथा इस असामयिक दुख से उबरने की शक्ति दे।
 आपका
विवेक गुप्त
शिक्षक अगम शर्मा जी भैया के परिचितों में थे। वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। वे भैया को कितना मानते थे, कितनी श्रद्धा करते थे उसका अंदाजा उनकी ऩिम्नांकित कविता से मिल जायेगा जो उन्होंने रुक्म जी को श्रद्धांजलि देते हुए लिखी थी-
आदरणीय रुक्म जी के प्रति शब्दांजलि
आसमान से तारा जो आया जमीन पर।
अपनी चमक दिखा कर वापस चला गया।
धरती के आंचल में कम हो गया उजाला।

चांद शिकायत करता है ,वो छला गया है।
वो तारा जब गुलशन के फूलों में हंस कर ।
खुशबू के कंधों पर वीणा बजा रहा था।
एक गंधर्व समूह गुलिस्तां में छुप छुप कर।

आलापों से वासंती रुत सजा रहा था।
वो ऐसा तारा था जिसकी ज्योति शलाका।
शब्दों के प्यालों में अरुण वारुणी ढाले।
वो तारा एक रोज सूर्य से आंख मिला कर।

बोल था, अपनी किरणें गिन कर रक्खो।
मैं सहरा के कण कण में रोशनी भरूंगा।
सारी धूप समेटो सूरज घर पर रक्खो।
उस तारे ने शबनम को रागिनी सिखायी।
मौसम की अलमस्त अदा को दी अंगडाई।
चंदन वन में नागों का अभिमान दूर कर।
लहर लहर पर ऊर्जा की बांसुरी बजायी।
भूल नहीं जाना धरती की याद सितारे।
कभी कभी आशीष रश्मियों से खत लिखना।
कोई युवती अर्घ्य चढ़ाये जब सूरज को।
वहीं पास में तुम कविता लिखते दिखना।
अगम शर्मा
शर्मा जी ने भैया रुक्म को कितने भाव भरे, अलंकारमय शब्दों में याद किया इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है उनकी कविता।
 मधुर गीतों के रचयिता श्रीकांत कानोड़िया तो भैया रुक्म को न सिर्फ गुरु जी कहते अपितु मानते भी थे। वे अपने लिखे गीत पहले उनको सुनाते थे। उनके गीतों की पुस्तक मन के मीत और हनुमान जी की काव्यमय गाथा के लेखन में वे अक्सर भैया से सलाह लेते रहे और उनके सुझावों को मानते भी रहे। वे जब तक जीवित थे तब तक हर सप्ताह भैया से मिलने आते रहे। उनके पुत्र आदित्य कानोड़िया को भी लेखन कला विरासत में मिली। वे कहानियों के साथ-साथ कविता भी लिखते रहते हैं। उन्होंने तो भैया को श्रद्धांजलि के रूप में पूरी कविता लिख डाली और उसे लैमनेट कर के मुझे दिया। उनकी कविता यहां दे रहा हूं-
काव्यांजलि गीतों की
महाप्रयाण दिवस
2 नवंबर 2014
हुआ दीप साहित्य जगत का मध्यम छाया भारत माता  के आंगन में भी गम।
त्याग मृत्युलोक को जब हुए ब्रह्मलीन सरस्वतीपुत्र कपूत कलकतिया रुक्म।।
बना सदा  कलम को  हथियार, हर कुमार्ग को दिखलाया मार्ग  सन्मार्ग का।
कागजों  के  मैदानों पर  सदा  कर शंखनाद, धड़काया दिल पाप के बाप का।।
सदा होठों पर हंसी चेहरे पर मुस्कान बड़प्पन पाने पर किया नहीं कभी अभिमान।
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इसी तरह अन्य कई लोगों ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी और उनकी यादों को ताजा किया। कई ऐसे लोग जो उनसे उपकृत हुए उन्होंने भी उन्हें और उनसे मिले सहयोग प्रोत्साहन को याद किया।
    2 नवंबर 2014 को केवल मेरे बड़े भैया, गुरु रुक्म जी का ही ऩिधन नहीं हुआ, उनके रूप में एक समर्थ लेखक, संपादक और नये लेखकों को प्रोत्साहन देनेवाला शख्स चला गया। ऐसे शख्स जब जाते हैं तो अपने पीछे ऐसा शून्य छोड़ जाते हैं जिसका भरना मुमकिन नहीं होता। उनकी कही बातें हमारे लिए आज पाथेय हैं। सन्मार्ग हिंदी दैनिक को सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले श्री रामअवतार गुप्त और उसके बाद प्रिंटिंग और अखबार की साज-सज्जा में आधुनिकता और नवीनता लाने वाले उनके नाती विवेक गुप्त के समय तक वे इस समाचारपत्र से जुड़े रहे। वे सन्मार्ग से ओतप्रोत ढंग से जुड़े रहे। उनके द्वारा शुरू किये गये इस समाचारपत्र के सारे परिशिष्ट कामयाब रहे जिसका जिक्र रामअवतार गुप्त जी अक्सर किया करते थे। वे कहते -रुक्म जी तो मेरे लिए पारस पत्थर हैं, इन्हें जो भी पेज दिया इन्होंने चमका दिया। इसी क्रम में जब एक बार उन्होने रुक्म जी कहा-रुक्म जी अपना कोई शिष्य बना लीजिए। किसी को अपना काम सिखा दीजिए तो अच्छा रहेगा।
इस पर रुक्म जी का उत्तर था-गुप्ता जी, हमने तो गुरु के चरणों में बैठ कर सीखा है , अब के लड़के तो धौंस दिखायेंगे-सिखाता है या नहीं। कोई भी कला, कोई भी विद्या विनम्रता से और शिक्षक को आदर दिये बगैर नहीं सीखी जा सकती।
   रुक्म जी अपने आप में एक संस्था थे। दिन भर कुछ न कुछ लिखते रहते। इस ब्लागर ने उनसे जो सीखा उसके लिए वह आजीवन उनका ऋणी रहेगा। सिद्धांत के इतने पक्के थे कि जब तक सन्मार्ग के साहित्य संपादक रहे रविवारी परिशिष्ट या किसी दूसरे परिशिष्ट में मेरी रचनाएं नहीं छापीं। मेरी वही रचनाएं छपती थीं जो मान्यवर रामअवतार गुप्त जी के निर्देश से मैं लिखता था। मैं भी भैया के आदर्श का आदर करता था इसलिए रचनाएं बाहर ही भेजता था। अब उनका आदर्श ही हमारे पाथेय हैं और उनसे जो थोड़ा –बहुत सीख पाया वही मेरे लेखन का आधार है जिसकी बुनियाद उनकी छत्रछाया में ही पड़ी। उन्हें पुण्य स्मरण कर इस जीवनगाथा को यहीं विराम देता हूं। जानता हूं उनके जीवन के कई प्रसंग अनकहे रह गये होंगे लेकिन जितना बन सका उनके जीवन के विविध भावों, रंगों को समेटने की कोशिश की। (समाप्त)





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