http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-11

Sunday, February 1, 2015

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-11

जब गूंगी बहू की कहानी अनचाही प्यास पर फिदा हो गये ओ.पी.रल्हन
भाग(-11)
राजेश त्रिपाठी
    पहले ही बता आये हैं कि रुक्म जी जाने-माने पत्रकार संपादक होने के साथ ही सफल उपन्यासकार भी थे। उन्होंने रोशनी और रोशनी, अनचाही प्यास, बर्फ की आग, मेरे दुश्मन मेरे मीत, अंगूरी, नीली रोशनी उपन्यास लिखे। उनके बहके कदम और नरोत्तम नारायणी (विधानचंद्र राय की जिंदगी पर आधारित)उपन्यास धारावाहिक छपे। इनमें से अनचाही प्यास  ऐसा उपन्यास है जो आदि से अंत तक रहस्य, रोमांस और रोमांच से परिपूर्ण है। इसकी कहानी का प्लाट जब रुक्म जी के दिमाग में आया उस वक्त वे बंबई में ही थे। किसी कार्यवश उनको लेखक अभिनेता निर्माता, निर्देशक ओ. पी. रल्हन (फिल्म फूल और पत्थर पापी, तलाश हलचल, बंधे हाथ फिल्मों के निर्माता) से मिलना था। वे उनके आफिस गये। उऩ दिनं रल्हन साहब अमिताभ बच्चन, मुमताज अभिनीत फिल्म बंधे हाथ बना रहे थे। रुक्म जी ने बातों-बातों में रल्हन साहब को अपनी इस कहानी का सारांश सुना दिया। रल्हन को यह कहानी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने उस  पर फिल्म बनाने का निश्चय कर लिया और कहा- रुक्म जी यह बहुत ही अच्छी कहानी है। इस पर फिल्म बनी तो दर्शक आखिरी सीन तक सीट से चिपका रहेगा, वह पेशाब करने भी नहीं जायेगा। अभी इस फिल्म में उलझा हूं पर मेरी आपसे विनती है कि इसे आप पूरा कर के लाइए।
ओ पी रल्हन
जी आप कह रहे हैं तो पूरा करता हूं।रुक्म जी का जवाब था।
और हां, यह कहानी मेरी हुई। इस पर किसी और से बात मत कीजिएगा। रल्हन ने ताकीद की।
रुक्म जी ने कहा-ठीक है ऐसी ही होगा।
रुक्म जी कलकत्ता लौट आये और अपनी उस कहानी को विस्तार देने में लग गये। कुछ अरसे बाद उनके हाथों में एक पूरा उपन्यास था-.
'अनचाही प्यास' जो एक गूंगी बहू की ऐसी कहानी थी जिसका रहस्य आखिरी पन्ने तक बरकरार रहता है। ओ.पी. रल्हन से हुई बातचीत के अधार पर रुक्म जी अपनी इस पूरी कहानी को लेकर बंबई गये। उन्होंने रल्हन से भेंट की और रोज उन्हें कहानी सुनाने लगे। रल्हन इस सशक्त कहानी से इतने प्रभावित हुए कि वे कहानी सुनते समय उसे दृश्यों में ढालने लगे और रुक्म जी से कैमरा एंगल पर तक बात करने लगे कि इस दृश्य को ऐसे फिल्मायेंगे। रल्हन दिन में जो कहानी रुक्म जी से सुन कर जाते वह रात में अपनी पत्नी को भी सुनाते हैं। कहते हैं उन्हें भी कहानी इतनी पसंद आयी कि वे रल्हन के रोज घर लौटते ही पूछतीं-अरे बताओ उस गूंगी बहू का क्या हुआ।
रल्हन दूसरे दिन आफिस आते तो रुक्म जी से मिलने के बाद बताते कि किस तरह उनकी पत्नी भी इस कहानी को बेहद पसंद कर रही हैं। रल्हन ने फिल्म के उस क्लाइमेक्स सीन को फिल्माने के बारे में भी रुक्म जी को बताया कि नायक किस तरह बहू के सिर को आइने में पटक देगा और उससे उसका मस्तक कट जायेगा और वह नीचे गिर पड़ेगी। मस्तक से निकली खून की धार उसकी मांग भर देगी। वह यही चाहती थी कि नायक उसे अपनी पत्नी मान कर मांग भर दे। इतना बता कर रल्हन साहब रुक्म जी की तरफ मुड़े और बोले-रुक्म जी इस दृश्य को देख  कर लोग इस्स इस्स कर उठेंगे। महिला दर्शकों का तो दिल बैठ जायेगा आंखें नम हो जायेंगी।
यहां तक तो सब ठीक चल रहा था लेकिन इसके बाद रल्हन साहब ने कथानक के किसी ऐसे हिस्से में परिवर्तन की मांग कर डाली जो इस कहानी की जान था। रुक्म जी समझौतापरस्त कतई नहीं थे। वे अपनी कहानी में परिवर्तन के लिए तैयार नहीं थे लेकिन उस वक्त उन्होंने रल्हन साहब से कुछ नही कहा और कलकत्ता लौट आये। संयोग से रल्हन की फिल्म ' बंधे हाथ' बुरी तरह फ्लाप हो गयी और इससे रुक्म जी का मन और बदल गया। उन्होंने सोचा- एक असफल निर्माता के हाथों में कहानी देना शायद कहानी के साथ ही अन्याय होगा। वे चाहते थे कि यह कहानी किसी संवेदनशील फिल्मकार के हाथों से फिल्म का आकार ले। यह हो नहीं सका और गूंगी बहू की वह कहानी परदे तक नहीं आ सकी।
     गीतकार हसरत जयपुरी (जिनका जिक्र पहले भी कर चुके हैं) रुक्म जी के जिगरी दोस्तों में से थे। वे उन्हें अपने घर ले जाते, कभी उनसे मिलने उस होटल में आ जाते जहां रुक्म जी ठहरे होते। रुक्म जी बंबई (अब मुंबई) जाते   तो अक्सर दादर के अरोमा होटल में ठहरते जिसके मैनेजर से भी उनकी अच्छी पहचान हो गयी थी। एक बार जब हसरत जयपुरी साहब रुक्म जी मिलने होटल गये तो फिर दोनों दोस्तों में फिल्मों से सबंधित विषयों पर चर्चा होने लगी।
रुक्म जी ने पूछा-हसरत साहब! क्या बात है, आजकल फिल्मी गीतों में पहले जैसी बात नहीं रही। पहले उनमें अच्छी शायरी होती थी और उनका एक-एक शब्द दिल की गहराई तक उतर जाता था।
अरे क्या करें। आजकल तो गीत लिखने का ढर्रा ही बदल गया है।
वह कैसे?’ रुक्म जी ने पूछा।
वह ऐसे कि पहले हम गीत लिखते थे उसके बाद संगीतकार उसकी धुन बनाता था अभी पहले धुन बनायी जाती है फिर हमें उसके आधार पर बोल रचने होते हैं।
रुक्म जी थोड़ी देर चुप रहे और फिर बोले-अरे यार यह तो कफन के आकार का मुर्दा खोजने की बात हुई।
बिल्कुल यही हो रहा है। पहले तो अपनी शायरी के मीटर में बंधे होते थे अब हमको धुन के मीटर पर बंध कर लिखना होता है। अदब बंधन में बंध कर वैसा नहीं लिखा जा सकता जैसा यह आजाद रह कर लिखा जा सकता है।
कितनी बड़ी बात कह गये थे हसरत साहब। वाकई तरह-तरह के प्रयोगों ने धीरे-धीरे फिल्मी गीतों से न सिर्फ मेलोडी बल्कि अच्छे गीत भी छीन लिये। धीरे-धीरे अच्छे गीतों की जगह तुकबंदी और ऊल-जलूल शब्दों ने ले लिया।
अभिनेता चंद्रशेखर के साथ रुक्म जी
रुक्म जी के परिचितों में अभिनेता चंद्रशेखर भी रहे हैं जिन्होंने 112 से भी अधिक फिल्मों में काम किया था। उन्होने दो फिल्मों चा चा चाऔर स्ट्रीट सिंगर जैसी फिल्मों को निर्माण भी किया था। चा चा चा में चंद्रशेखर की हीरोइन हेलन थीं और यह हिट संगीतमय फिल्म थी। 1954 में औरत तेरी यही कहानी फिल्म से अपने अभिनय जीवन की शुरुआत करनेवाले चंद्रशेखर ने कई सफल फिल्मों में काम किया जिनमें-सुरंग, रुस्तमे बगदाद, बसंत बहार,कटी पतंग, शराबी, शक्ति, अजनबी, महबूबा आदि प्रसिद्ध हैं। उनकी आखिरी फिल्म खौफ थी। रामानंद सागर के प्रसिद्ध धार्मिक धारावाहिक रामायण में सारथी सुमंत्र की भूमिका में भी उन्होंने अच्छा अभिनय किया था।  
रुक्म जी जब भी बंबई जाते अपने प्रिय मित्र चंद्रशेखर से मिलना ना भूलते। चंद्रशेखर भी कभी अपनी जिंदगी और कभी फिल्म उद्योग की चर्चा उनसे करते। वे अक्सर एक्स्ट्रा कलाकारों बुजुर्ग कलाकारों की कल्याण के लिए चिंतित रहते थे। एक्स्ट्रा कलाकारों को उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता था और बुजुर्ग कलाकारों का जीवन बड़ा दयनीय था। अक्सर वे रुक्म जी को इस बारे में बताते और वह उनकी भावनाओं को अपने पत्र-पत्रिकाओं में स्थान देते। बाद में चंद्रशेखर जी ने ऐसे कलाकारों के कल्यार्थ एक संस्था भी बनायी थी। इस संस्था ने टीवी धारावाहिक भी बनाया जिसकी आमदनी इन कलाकारों की चिकित्सा व अन्य तरह से सहायता में खर्च की गयी।

अभिनेत्री इंद्राणी मुखर्जी के साथ रुक्म जी
रुक्म जी का परिचय अभिनेत्री इंद्राणी मुखर्जी से भी था। इंद्राणी मुखर्जी का जन्म इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने कई हिंदी फिल्मों में काम किया। इनमें –उसने कहा था, आखिरी खत, परवरिश, धरम-वीर, देश परदेस, चाचा भतीजा, पलकों की छांव में, अपना खून, जाने बहार, मिस्टर नटवरलाल, द बर्निंग ट्रेन व राजपूत आदि। वे चाहे बंबई में रहें या कोलकाता में रुक्म जी से उनका संपर्क हमेशा बना रहता था। वे हमेशा  अपनी फिल्मी गतिविधियों से उनको अवगत कराती रहती थीं। (शेष अगले भाग में)

No comments:

Post a Comment