http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-18

Thursday, March 26, 2015

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी-18


भाग (18)
  राजेश त्रिपाठी
जब एक डाकू लेखक रुक्म जी से लिपट कर बिलखने लगा
  पत्रकारिता के साथ ही रुक्म जी अनवरत साहित्य सृजन में भी लगे  रहे। उन्होंने हर विधा पर कलम चलायी चाहे वह कविता, गीत या गजल लेखन हो या फिर व्यंग्य कविताएं हों। उनके उपन्यास और कहानियों में हमेशा नयापन और सामाजिक सरोकार का पक्ष मिलता। जैसे लोग उनकी व्यंग्य कविताओं को एक मार्गदर्शक व गुरु के संदेश-सीख की तरह लेते थे वैसे ही उनकी लिखी कहानियां और उपन्यास भी पाठकों और सुधीजनों में समादृत होते थे। उनकी कहानियां अक्सर प्रारंभ में पाठक को अपने कथानक से बांध लेती और उनका अंत ऐसा होता कि वह उनके दिल को छू जाता, कुछ सोचने को विवश कर जाता। तेरह वर्ष की उम्र से लेखन से जुड़े रुक्म जी के लिए लिखना सांस लेने की तरह सहज था।
 लेखकों के बारे में सुना जाता है कि वे होश में रहते हुए अच्छा लेखन नहीं कर सकते। सुरा चढ़ा कर जब टुन्न हो जाते हैं तब कहीं उनकी लेखनी चलती है। यानी सारा श्रेय सुरा का जिसने उनके बंद दिमाग का ताला खोला। कुछ लोगों के बारे में सुनते हैं कि वे पहाड़ों के एकांत में ही साहित्य सृजन कर पाते हैं। कुछ लोग तो बाकायदा कोई उपन्यास या अन्य ग्रंथ लिखने के लिए महीनों के लिए होटल बुक कर लेते हैं ताकि निश्चिंत होकर, निपट एकांत में साहित्य का सृजन कर सकें। इसी तरह अपनी बौद्धिक ऊर्जा को जगाने के लिए कई लेखक कई तरह के तरीके इस्तेमाल करते हैं। रुक्म जी के सामने ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी। वह परिवार के बीच रह कर घर में बच्चों के शोर-शराबे के बीच उपन्यास, कहानियां और कविताएं व गीत लिखते रहते थे। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि बाहर माइक बज रहा है या कोई चीख –चिल्ला रहा है।
  भाई के बच्चे घर में धमाचौकड़ी मचाते और शोर करते तो रुक्म जी की पत्नी निरुपमा उन्हें डांटते हुए बोलतीं-अरे चुप करो, देखते नहीं अउआ (ताऊ जी के लिए यह संबोधन उनके भाई की बेटी अनामिका ने पहली बार जो उचारा तो फिर वे घर के बच्चों के अलावा मोहल्ले भर के बच्चों के अउआ हो गये) लिख रहे हैं।
  इस पर रुक्म जी हंसते हुए जवाब देते –बच्चों को क्यों डांटती हो। उन्हें खेलने दो। मैं अभी यहां हूं ही नहीं, मैं तो अपने पात्रों के साथ हूं और उनके साथ ही चल रहा हूं। मुझे इनके चिल्लाने से कोई फर्क नहीं पड़ता।   कभी नहीं देखा कि लिखने का मूड बनाने के लिए उन्हें किसी द्रव्य विशेष का सहारा लेना पड़ा हो। वे इस बारे में मजाक किया करते थे-अगर होशोहवाश में न रह कर शराब के नशे में लिखा तो उस लिखने का श्रेय लेखक का कहां रहा। मजा तो तब है कि आप होशोहवाश में अपनी कलम से कमाल कर दिखायें। हां, चाय उन्हें बहुत प्रिय थी सो लिखते समय कभी-कभी चाय जरूर मांग लिया करते थे। उनके लिखे उपन्यासों रोशनी और रोशनी, मेरे दुश्मन मेरे मीत, बर्फ की आग, अंगूरी, अनचाही प्यास (सभी प्रकाशित), नरोत्तम नारायणी, बहके कदम (अप्रकाशित) में विषयों की विविधता है। कोई जमींदारी रौबदाब और ठसके के खिलाफ खड़ा है तो कहीं सामाजिक रूढियों पर प्रहार है तो कोई किसी के दर्द की तर्जुमानी है। नरोत्तम नारायणी महान स्वाधीनता सेनानी और बंगाल के रूपकार डॉ. विधानचंद्र राय की जीवनी की छाया पर आधारित है। बहके कदम आधुनिक पीढ़ी की बंधनहीन स्वाधीन जिंदगी पर सवाल उठाता है।
 उन्होंने लेखन में भी समझौता नहीं किया। चूंकि वे गंभीर और सामाजिक विषयों पर उन्यास, कहानी लिखते थे इसलिए जब उनके प्रकाशक ने उनसे एक जासूसी उपन्यास लिखने को कहा तो बहुत नानुच के बाद वे राजी तो हो गये लेकिन एक शर्त रख दी। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास लिख तो रुक्म देगा लेकिन इसका लेखक कोई और होगा।
  पंजाबी प्रकाशक रुक्म जी की यह भेदभरी बात समझ नहीं पाया-अरे पंडित जी हम आपके जैसे बुद्धिमान नहीं। पहेलियां मत बुझाइए। यह क्या बात हुई कि इसे रुक्म लिख देगा लेकिन उसका लेखक वह नहीं होगा। जरा इसको साफ कीजिए।
 रुक्म जी मुसकराते हुए बोले-नहीं समझे! मैं उपन्य़ास लिख दूंगा लेकिन उसमें कोई कल्पित नाम दे दीजिएगा। रुक्म जासूसी लेखन ना करना चाहता है ना वैसे लेखक के रूप में ख्यात होना उसका अभीष्ट है।
 प्रकाशक मुसकाया और रुक्म जी की बात मान गया। उस उपन्यास का नाम नीली रोशनी था और वह रुक्म जी के छद्म नाम इंस्पेक्टर राज के नाम से छपा। उपन्यास बेहद पसंद किया गया और पाठकों के अनेक प्रशंसापत्र प्रकाशक के पास आये क्योंकि उसमें ना तो रुक्म जी का पता छपा था ना ही उनका फोटो जैसा दूसरे उपन्यासों में होता था। हर उपन्यास में उनका फोटो छपा होने का फायदा उनको क्या हुआ था यह पिछली एक किस्त में बता आये हैं। उनके कोलकाता चले आने के बाद उनके भाइयों ने जमीन-जायदाद के कागजात में उनको गायब लिखा दिया था। बाद में चकबंदी के दौरान एक अधिकारी जो उनके उपन्यासों का प्रशंसक था वह उनके नाम को देख पहचान गया। उसने उनके एक परिचित को खोजा और उनके बारे में जान कर उनको वहां बुलवाया तब उन्हें भी पता चला कि भाइयों ने उनको गायब लिखवा दिया है। यह है आज की दुनिया जो संपत्ति के लोभ में हद से नीचे गुजरने में भी संकोच नहीं करती।
 जो लेखक हैं उन्हें अपने लेखन के प्रति सचेत रहना चाहिए। उनका लेखन प्रगतिशील, क्रांतिकारी या लीक से हट कर भले ही हो लेकिन उसमें यह ध्यान अवश्य रहना चाहिए कि उससे किसी का अहित ना हो। साहित्य शब्द में अगर कल्पना करें तो कहीं न कहीं हितशब्द का हलका-सा अहसास होता है। तो लेखन का और कोई भी उद्देश्य हो न हो लेकिन उसमें हित की भावना हो तो सोने में सोहागा जैसी बात होगी। लेखकों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जैसे मुंह से निकले बोल और धनुष से छोड़ा गया तीर वापस नहीं आते वैसे ही जो लिखा छप गया वह फिर वापस नहीं हो सकता। इसका ध्यान वे हमेशा रखते थे। उनका लेखन कभी किसी वाद या विवाद से नहीं जुड़ा। उनके लेखन का उद्देश्य था बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय़। उनका कहना था कि किसी वाद या धारा से जुड़ने का अर्थ है किसी एक बने-बनाये मापदंड की परिधि में घिर जाना। लेखन को तो बंधन मुक्त, व्यापक और विस्तृत होना चाहिए। आपके हाथ खुले हों तभी आप बेहतर काम कर पायेंगे। उनमें किसी वाद की जंजीर हो तो वह आपको उतनी ही आजादी देगी जितनी दूर उसकी विचारधारा दृष्टि जाती है। जनवादी, प्रगतिशील जैसे विशेषणों से उनको गुरेज था। वे कहते थे- जिन पर यह ठप्पा लग गया वे जनवादी, प्रगतिशील और हम अगर जनहित की बातें लिखते रहें, लेखन में प्रगतिशील और सुलझी, सुदृढ़ दृष्टि रखते हों तो हम सिर्फ इसलिए जनवादी या प्रगतिशील नहीं कि ऐसे किसी संगठन के सदस्य नहीं या उसका ठप्पा हम पर नहीं लगा।
  किसी का लिखा हुआ कहां-कहां तक पहुंच सकता है और क्या असर कर सकता है इस बारे में वे अक्सर अपने साथ घटी एक घटना सुनाते थे। पहले की किस्त में बता आये हैं कि उनकी लिखी काव्यमय प्रेमकथा सदावृक्ष सारंगा को इलाहाबाद स्टेशन में गाते कुलियों वा दूसरे लोगों ने जब उन्हें पाया और जाना कि वही उसके लेखक हैं तो बहुत खुश हुए, उनको बहुत मान दिया।
 एक बार वे कोलकाता से बांदा जिले के अपने गांव जा रहे थे। इलाहाबाद में ट्रेन से उतर कर उन्होंने जीरो रोड के रोडवेज स्टैंड से बांदा जानेवाली बस पकड़ी। यह बस कर्वी (चित्रकूट धाम के पास) से होती हुई बांदा तक जाती है। बस जब कर्वी के पास रुकी तो वहां से एक बड़ी-बड़ी मूंछों और दाढ़ी वाला व्यक्ति बस में चढ़ा। वह रुक्म जी के पास ही जा बैठा। उसका रौब-दाब देखने लायक था। उसकी चमकती बड़ी-बड़ी आंखें बहुत डरावनी लग रही थीं। उस व्यक्ति को तकलीफ ना हो इसलिए रुक्म जी और भी सिमट गये। उनके सिमटने के बाद वह इत्मीनान से और फैल गया।
 एक विचित्र से खौफनाक व्यक्ति को अपने पास पाकर रुक्म जी असहज महसूस कर रहे थे। वे उसकी ओर से ध्यान हटा कर खिड़की ओर देखने लगे। थोड़ी देर बाद जब वापस उस व्यक्ति की ओर उन्होंने नजर पलटायी तो पाया कि वह बड़ी गंभीरता से उनको ही देखे जा रहा है।
 आप कहीं अकेले हों और कोई खौफनाक व्यक्ति आपको बराबर घूरे जा रहा हो तो आप कितनी असहजता महसूस करेंगे यह वही जान सकता है जिसने यह झेला हो।  ऐसे में आदमी बहुत असहज और विचलित हो जाता है।
  इसके बावजूद रुक्म जी खामोश रहे। वह आदमी कुछ मिनटों तक उनको घूरता रहा फिर अचानक उसने पूछा-भाई साहब! एक बात पूछें नाराज तो नहीं होंगे।
   अब रुक्म जी के चौंकने की बारी थी। वे घबराये कि जाने यह कौन आदमी है और उनसे क्या पूछना चाहता है। सामान्य कद-काठी और हावभाव वाला आदमी होता तो शायद ना ही वे कुछ सोचते और ना घबराते। यह खूंखार आदमी कौन है और उनसे क्या पूछना चाहता है।
  थोड़ी देर की ऊहापोह के बाद वे बोले-पूछिए, नाराज होने की क्या बात है?’
 उसने पूछा-आप लेखक हैं क्या।
  जी हां।
 ‘उपन्यास वगैरह भी लिखते हैं?’
हां लिखता हूं। भाई साहब बात क्या है। आप मेरा इंटरव्यू क्यों ले रहे हैं और कौन हैं आप।
 ‘बताता हूं, बताता हूं, पहले आपके बारे में अच्छी तरह जान तो लूं।अच्छा आप रामखिलावन त्रिपाठी रुक्महैं क्या।
 रुक्म जी चौंके। अरे, यह तो मेरा नाम भी जानता है। फिर हामी भरी – हां भाई मै रामखिलावन त्रिपाठी रुक्म ही हूं। बात क्या है अब तो बताइए।
 ‘आपने ही अंगूरी उपन्यास लिखा है?’
जी हां लिखा है तो?’
 इसके बाद वह आदमी रुक्म जी से लिपट कर सुबक-सुबक कर रोने लगा। उसका रोना सुन कर बस के बाकी यात्री भी पीछे मुड़ कर देखने लगे कि माजरा क्या है एक आदमी पास के यात्री से चिपक कर बिलख क्यों रहा है। जिसका जैसा दिमाग वैसे ही कल्पना की कुलांचें भरने लगा। कुछ ने सोचा कि शायद परिचित होंगे, बरसों बाद मिले होंगे और परिवार की किसी दुखद घटना को याद कर रो रहे होंगे।
 उलझन के बादल रुक्म जी के मन में भी घिर रहे थे। वे भी समझ नहीं पा रहे थे कि एक अजनबी उनका नाम सुन कर यह जान कर कि वे अंगूरी उपन्यास के लेखक हैं बिलखने क्यों लगा। उनसे क्या खता हो गयी।
 थोड़ी देर बाद हिम्मत जुटा कर उन्होंने पूछा-भाई साहब! अब मैं आपसे एक बात पूछूं तो आप तो बुरा नहीं मानेंगे।
 ‘अरे नहीं देवता, आपसे भला हम क्यों बुरा मानने लगे। वह आदमी विनीत स्वर में बोला।
 रुक्म जी ने पूछा-आपने मेरा पूरा इंटरव्यू लिया, नाम जाना, फिर मैं अंगूरीका लेखक हूं यह जान कर आप बिलखने क्यों लगे। क्या मुझसे कुछ भूल हुई है?’
   वह बोला –नहीं पंडित जी। दरअसल बात यह है कि अंगूरी मेरी कहानी है। अपनी बीती जिंदगी याद आयी तो दिल रोने लगा। और जिस आदमी ने मेरी कहानी कही उसके कंधे से टिक कर मैं रो पड़ा।
 रुक्म जी ने कहा- भाई साहब अब आप मेरे लिए पहेली बन गये। आप हैं कौन?’
 पंडित जी मैं एक डाकू हूं।
रुक्म जी को काटो तो खून नहीं। कुछ पूछने को हुए तो शब्द गले में ही अटकते से लगे फिर भी पूछा- आप डाकू हैं।
वह बोला-हां मैं डाकू हूं और मेरी कहानी हूबहू वही है जैसी आपने अंगूरी में एक डाकू की कहानी कही है।
अरे भाई मैंने तो यह सोच कर लिखा नहीं था कि ऐसा कोई जीवित चरित्र भी होगा। कथानक आपके जीवन से मेल खा गया यह तो संयोग ही है। माफ कीजिएगा यह सब सायास (जानबूझ कर ) नहीं अनायास ही हो गया। आखिरकार हम कथानक समाज से ही तो उठाते हैं संभव है वह किसी की जिंदगी से मेल खा जाये। हम जब किसी व्यक्ति विशेष को कथानक बनाते हैं तो बताते हैं कि य़ह उपन्यास या कहानी अमुक हस्ती की जीवनी पर आधारित है। आपसे कहानी मिल गयी यह तो संयोग ही है।
 ‘अरे नहीं पंडित जी माफी मांग कर मुझे पाप का भागी क्यों बनाते हैं।हम लोग तो पापी हैं आप आशीर्वाद देंगे तो खुशी होगी। अरसे तक मानिकपुर के जंगलों में मेरा राज चलता था। कोई भी ठेकेदार मुझे चढ़ावा चढ़ाये बगैर तेंदू पत्ता नहीं काट सकता था। कई जाने भी इन अधम हाथों ने ले लीं।अब तो सब छोड़-छाड़ कर खेती-बारी और प्रभु भजन कर रहा हूं। पढ़ने का शौक है। आपकी किताब अंगूरी देखी तो खरीद कर पढ़ डाली।उसे पढ़ते वक्त भी इसी तरह रोया था, जैसा आज रो रहा हूं।
 यह कह और रुक्म जी से प्रणाम कर वह पूर्व डाकू अगले किसी स्टाप पर उतर गया लेकिन रुक्म जी के दिमाग पर एक विचार लाद गया कि अकस्मात लिखी चीज भी किसी की जिंदगी से मेल खा सकती है।
 नये लेखकों के बारे में उनका सुझाव होता था कि आप अपने कथानक या कथ्य को पहले गंभीरता से सोचिए। अगर उपन्यास या कहानी है तो उसका पूरा खाका दिमाग में पहले खींच लीजिए। पात्र कितने हैं, विषय क्या है, किस पात्र का चरित्र उसका व्यवहार कैसा है वगैरह-वगैरह। जब रूपरेखा बन जाय, दिमाग में विषयवस्तु जम जाये तो लिखना शुरू कर दीजिए। वे कहा करते थे कि-एक बार जब मैं लिखना शुरू कर देता हूं तो मेरे पात्र ही मेरी मदद करने लगते हैं। मैं उनके साथ होता हूं, आसपास की दुनिया से कटा हुआ और ज्यों-ज्यों कहानी विकसित होती है, मेरे पात्र यह संकेत देते रहते हैं कि हमें इस ओर जाना है, यह करना है। आपमें अगर चित्त की एकाग्रता और कथानक की पूरी समझ है तो शोर-शराबे के बीच भी आप बखूबी लिख सकते हैं। यह भी सच है कि कुछ लोगों की एकाग्रता एकांत चाहती है।
 रुक्म जी ने उपन्यास के अलावा अपने प्रकाशक के कहने पर फिल्म कलाकारों की जीवनी पर भी पुस्तकें लिखीं। उन्होंने राजेश खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा और हेमा मालिनी की जीवनी भी लिखी थी।
  नये लेखकों के बारे में वे कहते थे कि लिखने से पहले दुनिया भर के बड़े-बड़े उपन्यासकारों और लेखकों,कवियों को पढ़ना जरूरी होता है ताकि शिल्प और लेखन की दशा-दिशा और धारा से परिचय हो सके। इसके बाद के प्रसंग में ना चाहते हुए भी इस ब्लागर को भी घुसना पड़ रहा है क्योंकि उसका मुख्य पात्र वही है। इस ब्लागर को भी कहानियां, उपन्यास, कविताएं लिखने का शौक था। बचपन से कुछ ऐसे संस्कार भरे गये कि बड़े भाई (रुक्म जी) से ना तो ज्यादा बातें होतीं और ना ही उनसे आंखें मिला कर कोई बात ही करता था। ऐसे में कुछ लिखता तो भाभी को इस अनुरोध के साथ थमा देता –प्लीज जरा भैया को दिखा लीजिएगा।

  
भैया रुक्म जी के साथ ब्लागर राजेश त्रिपाठी

भाभी का यह क्रम बन गया था कि भैया जब भी आफिस से लौटें वे मेरा लिखा उनको थमा देतीं। वे पढ़ते और हुंहकहते हुए फाड़ कर फेंक देते। यह खबर मुझे भाभी से मिल जाती। मेरा यह साहस नहीं होता था कि भैया से पूछता कि क्या गलती है, कैसे लिखते हैं। यह क्रम महीनों तक चलता रहा। भैया ने सोचा कुछ दिन के बाद यह थक जायेगा तो अपने आप लेखक बनने का भूत उतर जायेगा। लेकिन जब उनके पास मेरी कहानियां पहुंचने का सिलसिला जारी रहा तो एक दिन भाभी से बोले-उससे कहो, पहले पढ़े कैसे कहानियां लिखी जाती हैं। विदेशों में लेखक चालीस-पैंतालीस साल की उम्र तक पढ़ते हैं तब कहीं कुछ लिखने के लिए कलम थामते हैं।कहानियां लिखना हंसी-मजाक नहीं। यह स्कूली निबंध नहीं कि गाय पर लिख डाला, मेले पर लिख डाला।
 दूसरे दिन से मैंने उनमें एक बदलाव देखा। भैया जब भी आफिस से लौटते उनके हाथों में कुछ कहानी संग्रह या उपन्यास होते। ये बंगला, हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू (तब तक मैं उर्दू पढ़ना सीख चुका था) में होते थे। इन्हें भाभी को देकर उनका आदेश होता-भाई को बोलना इन्हें पढ़े। अब चूंकि मुझे भी लेखक बनने की धुन सवार थी सो मैं उन मोटी-मोटी किताबों में डूबा रहने लगा। उन्हें गंभीरता से पढ़ता और कोशिश करता कि उनकी शैली, कथा को कहने का प्रभावी ढंग थोड़ा ही सही अपने दिमाग में उतार सकूं। कई महीने बीत गये । भैया इस बात से आश्वस्त थे कि चलो भाई की कहानियां उन तक आनी बंद हुईं। उन्होंने सोचा उसे उलझा दिया है अब क्या लिखेगा लेकिन उन्हें क्या पता था कि इधऱ निश्चय दृढ़ और इरादा अटल है। हम भी मैदान छोडने वालों में नहीं थे। छह माह बीते होंगे कि हिम्मत करके एक और कहानी भाभी को थमा दी और वही पुराना अनुरोध दोहराया –प्लीज भैया को दिखा लीजिएगा।
  शाम को भैया आफिस से घर आये। थोड़ा नाश्ता वगैरह कर के अखबार देख रहे थे कि भाभी ने मेरी नयी कहानी थमा दी। भाई चौंके, उन्हें लगा था कि अब  कहानियां उन तक नहीं आयेंगी। उन्होंने अखबार परे रख दिया और उत्सुकतावश कहानी पढ़ने लगे कि देखें लिखनेवाले में सुधार आया है या अभी तक कचरा ही लिख रहा है। उन्होंने पूरी कहानी पढ़ी, उनकी आंखें सजल हो गयीं, पुलकित हो उठे वह और खुशी से रुंधे गले से भाभी से बोले-तुम्हारा देवर लेखक बन गया नीरू। बहुत अच्छी कहानी लिखी है उसने, मुझे तो रोना आ गया। उसे कहना यह सन्मार्ग के अलावा किसी दूसरे अखबार में भेज दे। सन्मार्ग में भेजेगा तो वहां अच्छी कहानी से पहले लोगों को संबंध दिखेगा। सोचेंगें भाई साहित्य संपादक है इसलिए छाप दिया। यह मेरे लिए भैय़ा का पहला आशीर्वाद था जो मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं था। जो भी दो-चार शब्द गढ़ या लिख लेता हूं उनकी छत्रछाया में ही रह कर सीख पाया । मैं तो लोगों से सगर्व कहता हूं कि लोग गुरु खोजने बाहर जाते हैं, प्रभु कृपा से मुझे गुरु घर में ही मिल गये बड़े भैया रुक्म जी के रूप में। मैंने भैया का कहा अक्षरशः माना। अपनी काले मन उजले लोग शीर्षक उस कहानी को मैंने विश्वमित्र के पूजा-दीपावली विशेषांक के लिए भेजा, वह वहां छपी और समादृत भी हुई।
उसके बाद फिर भैया ने लिखने से नहीं रोका बल्कि कहानियां और कविताएं ठीक करने लगे। छंदबद्ध कविता कैसे लिखी जाती है यह भी सिखाने लगे। वे छंदबद्ध कविताओं और गीतों के वे पक्षधर थे लेकिन अकविता लिखनेवाले कवियों की कभी उन्होंने आलोचना नहीं की। उन्होंने कहा वह भी एक विधा है और जो उसमें पारंगत हैं वे भी प्रशंसनीय हैं।
 वे लेखकों को बहुत मानते थे। बाहर के लेखक भी अगर कभी कोलकाता आते तो उनकी मिलनसारिता के कायल होकर ही जाते थे। ऐसे ही एक कवि हैं डॉ, हृदयनारायण सिंह अभिज्ञात। वे पहले नागपुर में रहते थे और वहां से कविताएं पोस्टकार्ड में रुक्म जी के पास भेजते थे। तब उनका पेननेम था हृदय बेमिसाल। यह ब्लागर उन दिनों आनंदबाजार प्रकाशन समूह के हिंदी साप्ताहिक रविवारमें था। अक्सर शाम को लौटते हुए अपने भाई रुक्म जी से मिलते हुए  घर लौटता था।
अभिज्ञात 
 ऐसे ही एक दिन जब यह ब्लागर सन्मार्ग कार्यालय पहुंचा तो वहां एक युवक को रुक्म जी के पास बैठा पाया। वह युवक इस ब्लागर के लिए अपरिचित था लेकिन रुक्म जी उसे जानते थे क्योंकि वह उनके रविवारी परिशिष्ट में छपता था। मेरे और उस अजनबी लेखक के बीच के अपरिचय की धुंध को खुद रुक्म जी ने ही खत्म किया।
 रुक्म जी बोले-देखो भाई, यही हैं पोस्टकार्ड वाले कवि हृदय बेमिसाल। ये नागपुर में रहते हैं और अभी कलकत्ता आये हैं।हम दोनों में नमस्कार का आदान-प्रदान हुआ और फिर रुक्म जी बोले-चलो भाई, जरा इनको चाय वगैरह पिला लायें। उसके बाद वे इस ब्लागर और हृदय बेमिसाल जी के साथ कार्यालय से नीचे आये और एक चाय की दूकान तक गये। बगल में ही पकौड़े तले जा रहे थे उन्होंने गरमागरम पकौड़ों  का आर्डर दिय़ा और एक प्लेट मुझे, एक हृदय बेमिसाल जी को थमा कर खुद भी एक प्लेट थाम ली। पकौड़े खत्म कर हम सभी ने गरमागरम चाय पी और यह ब्लागर कांकुड़गाछी के उस फ्लैट लौट गया जहां वह भाई-भाभी के साथ रहता था। हृदय बेमिसाल अपने टीटागढ़ वाले घर लौट गये।
  बाद के दिनों में कुछ ऐसा संयोग बना कि यह ब्लागर और हृदय बेमिसाल ( जो तब अभिज्ञात हो गये थे) साथ-साथ एक अखबार में काम करने लगे। वहां एक बार जब रुक्म जी के लेखकों से संबंध और व्यवहार की चर्चा शुरू हुई तो अभिज्ञात जी ने माना कि वे भी उन लेखकों में शामिल हैं जिन्हें रुक्म जी की मेहमाननवाजी पाने का मौका मिला। इसका जिक्र करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे पहले सोचा करते थे कि रुक्म जी यह खर्च आफिस के पैसे पर करते हैं लेकिन बाद में उन्हें अन्य लोगों से पता चला कि नहीं यह सब वे खुद अपनी तरफ से करते हैं। लेखकों से मिल कर, बात करके उन्हें खुशी होती थी। यही बात है कि जब वे रिटायर हो गये उसके बाद भी उनके पुराने दोस्त उन्हें खोजने, उनसे मिलने सन्मार्ग जाते रहे। जो ज्यादा करीब थे वे उनके कांकुड़गाछी स्थित फ्लैट तक उनसे मिलने पहुंच जाते थे। ऐसा था उनका व्यवहार। (शेष अगले अंक में)

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