http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: प्रकृति के सामने हम कितने बौने हैं

Thursday, May 28, 2009

प्रकृति के सामने हम कितने बौने हैं

इसका अहसास पश्चिम बंगाल को मई को स्पर्श कर गये आइला तूफान ने करा दिया। इसने राज्य में तकरीबन 86 लोगों की बलि लेने और हजारों घरों और पेड़ो को तहसृनहस करे के बाद यह बंगलादेश की ओर बढ़ा और वहां हवा के निम्न दबाव के रूप में बदल कर इसने अपना विकराल रूप दिखाया और 130 से भी अधिक जानें लील गया। पश्चिम बंगाल के समुद्र तटीय इलाकों ने आइला की जो विनाशलीला देखी और भोगी वह उनको लंबे अरसे तक याद रहेगी। अपने घर-बार और कई परिजनों को खो चुके लोगों के दिलों में यह एक टीस बन उभरता रहेगा और जब-जब हवाओं का रुख तेज होगा वे सिहर-सिहर उठेंगे। आइला ने कोलकाता को भी कई दिनों के लिए स्तब्ध कर दिया। सड़क पर टूटे पड़े विकराल पेडों ने महानगर की गति मंथर कर दी। कहीं कहीं ये पेड़ बिजली के तारों पर जा गिरे और महानगर के कई इलाके कई दिनों तक प्रकाश, जल और आधुनिक सुख-सुविधाओं से वंचित रहे। सबसे अधिक असुविधा उन्हें हुई जो आधुनिक सुविधाओं के आदी हो चुके हैं। जो सुख-दुख में समभाव रहते हैं वे एसी के बिना ताड़ के पत्तों से बने पंखों से ही हवा का एहसास कर रहे, चैन से तो नहीं पर रहे। इस तूफान यह एहसास बड़ी शिद्दत से कराया कि प्रकृति के सामने हम आज भी बौने हैं और वह महाशक्तिमान है जो पल भर में महाविनाश ला सकती है। हम चांद तक पहुंच गये, विनाश के बड़े-बड़े हथियार हमने बना डाले लेकिन आपदा नियंत्रण या निवारण के क्षेत्र में हम दुनिया में कहां किस स्थान पर टिकते हैं यह गौर करना जरूरी है। भला हो आधुनिक तकनीक का जिसने तूफान की पूर्व जानकारी देने में हमें काफी हद तक सक्षम कर दिया है वरना प्राकृतिक आपदाओं से और भी बड़ी क्षति होती । याद आता है वर्षों पूर्व उड़ीसा में आया विनाशकारी चक्रवात जिसे उड़िया में महावात्या के नाम से जाना जाता है। उसने 20000 लोगों को असमय काल के काल में ठेल दिया था। उसकी विनाशलीला के जख्म आज भी देखे जा सकते हैं। कई जिलों के पूरे प्रखंड ही साफ हो गये थे। सर्वाधिक प्रभावित हुआ था जगतसिंहपुर और उसका एरसमा ब्लाक। आप अगर पुरी से मैरिन ड्राइव होते हुए कोणार्क आयें तो देखेंगे की समुद्र अपनी सीमा लांघ कर अंदर कितने दूर के इलाके में घुस गया था और राह में पड़ने वाले हर मकान या वस्तु को मिट्टी में मिलाता चला गया था। वहां खड़े पेड़ों के ठूंठ और दूसर तक फैले बालुओं के ढूह इस बात के गवाह हैं कि प्रकृति जब कुपित होती है तो कितना रौद्र रूप धारण करती है और दे जाती है कभी न भूलने वाला भय और जिन्हें खोया है उनके लिए आजीवन रोने का अभिशाप। अपने उड़ीसा प्रवास के दौरान मैंने देखा कि वहां आज भी काले बादलों को घुमड़ते देख और हवा के तेज झोंकों से लोग सिहर उठते हैं। भुवनेश्वर में तो तूफान की हालत में बिजली आफ कर दी जाती थी। हम प्रकृति से लड़ तो नहीं सकते लेकिन इतना तो किया जा सकता है कि पीड़ित मानवता के पास खड़े हों और मदद भी सही वक्त में पहुंचायी जा सके। प्रकृति ने यह दिखा दिया है कि वह आज भी अजेय और सर्वशक्तिमान है। उसका रुख भांप कर बचाव का रास्ता ही श्रेयस्कर है। आपके इस ब्लागर ने भी आइला का अपने हिस्से का दुख भोगा। कालोनी के अंदर एक पेड़ साहब पूरी तरह मेन बिजली की लाइन में जो धर गये तो हमें तीन दिन के लिए अंधेरा भोगने को मजबूर कर गये। किसी तरह उनकी विकरालों बांहों से बिजली के तार मुक्त हुए तो हम आपके समक्ष अपनी बात कह पाने के काबिल हुए। -राजेश त्रिपाठी (28 मई)

1 comment:

  1. सही कहा आपने, पर हम फिरभी इसे सीखना नहीं चाहते।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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