http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: गरीबों के साथ बेहूदा और क्रूर मजाक

Thursday, September 22, 2011

गरीबों के साथ बेहूदा और क्रूर मजाक

-राजेश त्रिपाठी
गरीबी रेखा के बारे में सरकार के पुराने आंकड़ों पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद संप्रग सरकार ने गरीबी रेखा के निर्धारण के लिए जो नया पैमाना पेश किया है,वह न सिर्फ सरकार की अदूरदर्शिता, अविवेक और अपरिपक्वता दरशाता है। ये आंकड़े महंगाई की मार झेल रहे गरीबों के जख्म पर नमक छिड़कने की तरह हैं। सरकारी संस्था केंद्रीय योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को जो नया हलफनामा पेश किया है, उसके मुताबिक शहरों में 32 रुपये और गांवों में 26 रुपये प्रतिदिन खर्च करनेवालों को गरीब नहीं माना जायेगा। यह गरीबों के साथ एक क्रूर और बेहूदा मजाक है। उनका अपमान और उपहास है। यह भी कह सकते हैं कि देश के एक बड़े हिस्से से मुप्त सरकारी चिकित्सा, शिक्षा और अन्य रियायतें छीनने की यह एक सोची समझी साजिश है। माना कि ये आंकड़े अभी स्थायी नहीं लेकिन इनसे सरकार की मंशा तो जाहिर होती ही है कि लोग बहुत गरीबी-गरीबी चिल्ला रहे हैं चलो हम गरीबी को मिटाने का कोई नायाब तरीका इस्तेमाल करते हैं। वह नायाब तरीका योजना आयोग ने सुझा दिया। मंटेक सिंह अहलूवालिया एंड कंपनी ने गरीबी रेखा के मायने बदल कर देश की बड़ी जनसंख्या को अमीर होने का काल्पनिक ही सही आनंद दे दिया। उनकी इस योजना को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति के अर्थशास्त्री ने बिना जांचे परखे मुहर भी लगा दी। एक व्यक्ति के लिए जीवनयापन का जो दैनिक खर्च सरकार ने तय किया है वह चरम महंगाई के दौर में मूल्यवृद्धि के दबाव से अधमरी हुई जा रही देश की बड़ी आबादी के साथ सरासर बेईमानी और नाइंसाफी है। जाहिर है कि इसकी देश भर में आलोचना होनी थी, संप्रग सरकार के साथ जुड़े कई दलों तक ने इस अजीब से हलफनामे की आलोचना की है। आसार ऐसे हैं कि शायद केंद्र सरकार को अपना यह हलफनामा बदलने को मजबूर होना पड़े। सुना तो यहां तक जाता है कि योजना आयोग जिसने यह हलफनामा तैयार किया उसके सदस्यों में भी इसे लेकर मतभेद था लेकिन सरकार ने अंततः यह हलफनामा सुप्रीम कोर्ट को दे ही दिया ।  अब देखना है कि सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या राय देता है।
 योजना आयोग इससे पहले शहरों में शहरों में 20 और गांवों में 15 रुपये प्रतिदिन खर्च करनेवालों को गरीबी रेखा से ऊपर मानता रहा है। यह बात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट  को भी बतायी थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगायी कि 20 रुपये में शहरी क्षेत्र और 15 रुपये में ग्रामीण क्षेत्र में कोई सही ढंग से गुजारा नहीं कर सकता। इतने पैसे में उसे स्वस्थ रहने के लिए जरूरी कैलोरी भी नहीं मिल सकेंगी। इसके बाद सरकार ने नया हलफनामा पेश किया। पहले जो हलफनामा पेश किया गया था उसके लिए 2004-2005को आधार वर्ष मान कर सुरेश तेंदुलकर समिति की सिफारिश के अनुसार शहरी क्षेत्रों में 578 रुपये प्रतिमाह और ग्रामीण क्षेत्रों में 447 रुपये प्रतिमाह कमाने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर का दर्जा दिया गया था। अब यह राशि बढ़ा कर शहरी क्षेत्रों के लिए 965 रुपये प्रतिमाह और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 781 रुपये प्रतिमाह कर दी गयी है।
 केंद्र की संप्रग सरकार गाहे-बगाहे ऐसा कुछ जरूर करती रहती है जिससे उसे न सिर्फ शर्मशार होना पड़ता है बल्कि कभी-कभी अपने किये पर पीछे हटने तक को मजबूर होना पड़ता है। गरीबी रेखा के मानक के रूप में नया जो हलफनाम सरकार ने पेश किया है उसकी भी जम कर आलोचना हो रही है। खुद संप्रग सरकार के सहयोगी दल एनसीपी तक ने इसे अनुचित करार देते हुए कहा है कि -अगर आप गरीबों का दुख दूर नहीं कर सकते तो कम से कम उनका अपमान तो मत कीजिए। इस असंवेदनशील निर्णय पर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति खफा हो सकता है। सरकार बहादुर अपने देश के गरीबों की नहीं अपने इन साथियों की तो सुनिए, जिनकी बैसाखी पर आपकी बादशाहत टिकी है! वैसे आपके स्वामिभक्त, जरूरत से ज्यादा चतुर और ठकुरसुहाती कहने वाले प्रवक्ताओं ने सरकार के निर्णय को सही ठहराने के लिए अपने तर्क बखूबी पेश करने शुरू कर दिये हैं। उन्हें अपने सहयोगियों के एतरात तक की फिक्र नहीं। वे तो कह रहे हैं कि इस तरह की टिप्पणियों का कोई मतलब नहीं, इस बारे में विचार-विमर्श के लिए सबसे सही मंच तो योजना आयोग ही है। अमरीका के स्वनामधन्य राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक बार बढ़ती महंगाई का एक अनोखा और अनाप-शनाप-सा तर्क दिया था। उनका कहना था भारतीय बहुत ज्यादा खाने लगे हैं इसलिए महंगाई बढ़ रही है। यानी ओबामा साहब चाहते हैं कि भारतीय अटखाये रहें अब शायद हमारी सरकार भी यही चाहती है। कारण जितने रुपये उन्होंने एक आदमी के जीवनयापन के लिए तय किये हैं,  उनमें किसी आदमी का पेट भरना तो मुमकिन नहीं है। तय है कि इस हलफनामे को जायज ठहराने की कोशिशें जल्द ही शुरु हो जायेंगी।
    अब चाहे योजना आयोग की दुहाई दी जाय या सरकार आंकड़ों के भंवरजाल में देश को नाहक फंसाने की कोशिश करे सच तो यह है कि सरकार अपने ही बिछाये जाल में फंस गयी है। जाल जो उसने शायद देश की बड़ी आबादी को तमाम तरह की मुफ्त सरकारी सुविधाओं से वंचित करने के लिए फेंका था। अगर गरीबी रेखा के नये पैमाने को मान लिया जाता है तो इससे देश की एक बड़ी आबादी रातों रात गरीबी रेखा से बाहर हो जायेगी और गरीबी रेखा के नाम पर मिलने वाली सुविधाओं से भी वंचित हो जायेगी। जाहिर है इससे फायदा सरकार को ही होगा क्योंकि वह देश के बड़े हिस्से के शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य मद में दी जाने वाली सुविधाओं से मुक्त हो जायेगी। कहीं यह सब अमरीकी आकाओं के कहने पर तो नहीं किया जा रहा जो अरसे से भारत को निर्देश देते रहे हैं कि वह अपने यहां तमाम तरह की रियायतों को खत्म कर दे। कहीं यह गैस सिलिंडर का दाम 800रुपये प्रति सिलिंडर और रियायती मूल्य के सिलिंडरों की संख्या कम करने के लिए अपनायी जाने वाली पूर्व भूमिका तो नहीं। जाहिर है अगर देश का बड़ा हिस्सा गरीब नहीं रहेगा तो फिर वह इन रियायतों से भी वंचित हो जायेगा और इसमें सरकार पर पड़नेवाला बोझ भी कम हो जायेगा।
   देश में महंगाई का अभी चरम पर है दाल, चावल, आटा, तेल से लेकर तमाम नित्य प्रयोजनीय वस्तुओं के दाम गरीबों की पहुंच से दिन पर दिन बाहर होते जा रहे हैं ऐसे में उनके लिए जीने की सीमा निर्धारित कर देना उनके साथ बेईमानी है। यह बेहूदा और क्रूर मजाक है। सरकार ने अपने नये हलफनामे में कहा है कि 3860 रुपये चार सदस्यों के परिवार के लिए एक माह के गुजारे के लिए काफी हैं। इसी तरह से 781 रुपये प्रतिमाह गांवों में और 965 रुपये प्रतिमाह शहरों में खर्च करनेवाला व्यक्ति गरीब नहीं माना जायेगा। सरकार ने कहा है कि शहरों में 32 रुपये रोज खर्च करनेवाले गरीब नहीं माने जायेंगे। हर दिन खाने पर सरकार सिर्फ 12.69 रुपये ही खर्च करने को कह रही है। लेकिन सरकार यह भूल जाती है कि खाना बनाने के लिए गैस भी लगती है जिसकी कीमत प्रति सिलिंडर 400 रुपये से ज्यादा है। इसके अलावा मसाला व तेल की कीमत अलग है। पेट्रोल की कीमत 70 रुपये प्रति लीटर को पार कर गयी है। सरकार के पैमाने को माने तो 11580 रुपये सालाना कमाने वाला अपनी जिंदगी आराम से बिता सकता है। जहां गैस पर ही रोजाना तकरीबन 13.33 रुपये प्रति व्यक्ति खर्च पड़ता हो वहां भला 32 रुपये पर एक दिन का खर्च कैसे चल सकता है। क्या सरकार बहादुर बतायेंगे? वैसे इस सबसे उन सांसदों का क्या लेना-देना जिन्होंने पिछले साल ही अपने वेतन में तीन गुना वृद्धि करा ली है। उन्हें कई तरह की सुविधाएं मुफ्त मिलती हैं। उन्हें क्या पता कि गरीब किस तरह रोज मर-मर कर जीता है और महंगाई ने उसकी नाक पर दम कर लिया है। सरकर मू्ल्यवृद्धि को रोकने के लिए कोई ठोस उपाय तो कर नहीं रही ऊपर से गरीबों पर जुल्म पर जुल्म ढाल रही है, उनकी मुश्किलें बढ़ाती जा रही है। जो अमरीका भारत को तमाम तरह की रियायतों को खत्म करने की बात कर रहा है वहां पांच लोगों के ऐसे परिवार को गरीबी रेखा से नीचे समझा जाता है जो 10 लाख रुपया सालाना कमाता हो। एक व्यक्ति के लिए यह सीमा 5 लाख रुपये है। माना कि वहां का जीवन स्तर भारत से अलग है लेकिन ऐसे कोई आंकड़े बनाने से पहले जनहित और जमीनी हकीकत को मद्देनजर रखा जाना जरूरी है।
   अब तो लोग यह कहने लगे हैं कि सरकार ने जो रकम तय की है उस पर किसी का घर चला कर दिखा दे तो  उसे खुद हकीकत का पता चल जायेगा। सरकार ने 32 रुपये एक आदमी के एक दिन के खान-पान और निजी खर्च के लिए निर्धारित किये है। अब यह अलग बात है कि इन 32 रुपयों में तो आदमी का रोज का खर्च चलना मुश्किल है।

      योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामे के तौर जो   हलफनामा दिया उसके मुताबिक गरीबी रेखा का नया मापदंड सुझाते हुए कहा है कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3860 रुपये खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता। इस हास्यास्पद परिभाषा पर हो- हल्ला मचना शुरू हो चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक, एक दिन में एक आदमी प्रति दिन अगर 5.50 रुपये दाल पर, 1.02 रुपये चावल-रोटी पर, 2.33 रुपये दूध, 1.55 रुपये तेल, 1.95 रुपये साग-सब्‍जी, 44 पैसे फल पर, 70 पैसे चीनी पर, 78 पैसे नमक व मसालों पर, 1.51 पैसे अन्‍य खाद्य पदार्थों पर, 3.75 पैसे ईंधन पर खर्च करे तो वह एक स्‍वस्‍थ्‍य जीवन यापन कर सकता है। साथ में एक व्‍यक्ति अगर 49.10 रुपये मासिक किराया दे तो आराम से जीवन बिता सकता है और उसे गरीब नहीं कहा जाएगा। योजना आयोग की मानें तो स्वास्थ्य सेवाओं पर 39.70 रुपये प्रति महीने खर्च करके आप स्वस्थ रह सकते हैं। शिक्षा पर 99 पैसे प्रतिदिन खर्च करते हैं तो आपको शिक्षा के संबंध में कतई गरीब नहीं माना जा सकता। यदि आप 61.30 रुपये महीनेवार, 9.6 रुपये चप्पल और 28.80 रुपये बाकी पर्सनल सामान पर खर्च कर सकते हैं तो आप आयोग की नजर में बिल्कुल भी गरीब नहीं कहे जा सकते। आयोग ने यह डाटा बनाते समय 2010-11 के इंडस्ट्रियल वर्कर्स के कंस्यूमर प्राइस इंडेक्स और सुरेश तेंदुलकर कमिटी की 2004-05 की कीमतों के आधार पर खर्च का हिसाब-किताब दिखाने वाली रिपोर्ट पर गौर किया है। हालांकि, रिपोर्ट में अंत में कहा गया है कि गरीबी रेखा पर अंतिम रिपोर्ट एनएसएसओ सर्वेक्षण 2011-12 के बाद पेश की जाएगी। सरकार के इस निर्णय की सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ कॉलिन गोंजाल्विस ने भी आलोचना की है। उनका कहना है कि इससे गरीब बीपीएल कार्ड व अन्य सुविधाओं से वंचित हो जायेंगे। उन्हें सरकारी अस्पतालों में मुफ्त चिकित्सा सुविधा भी नहीं मिलेगी क्योंकि सरकार की नजर में वे गरीब नहीं रह जायेंगे। 32 रुपये में आज किसी व्यक्ति का  गुजारा करना मुश्किल है।
अब आदमी के पास टाइम मशीन तो है नहीं कि वह 20-30 साल पहले चला जाये और उस वक्त का आनंद उठाये जब कीमतें उसकी पहुंच में थीं। आज तो स्थिति यह है कि जो चीज आज 10 रुपये में मिलती है कल अगर आपको उसके 15 रुपये देने पड़ जायें तो ताज्जुब नहीं उस पर परेशानी यह कि इस बढ़ी कीमत की कोई तर्कसंगत वजह भी आपको बताने की जरूरत नहीं समझी जायेगी।
 सरकार को चाहिए कि वह इस तरह के बेतुके और अनावश्यक शिगूफों से परे कुछ ऐसा करे जिससे महंगाई की मार से जूझती जनता को राहत मिल सके। इस  तरह के कदम उसकी मुश्किलें और बढ़ायेंगे जो पहले से तमाम तरह के आंदोलनों,दिन पर दिन बढ़ती आतंकवादी घटनाओं और अपने कुछ सहयोगियों के प्रत्यक्ष या परोक्ष दबावों से काहिल और बेचैन है। जरूरत इस बात की है कि हालात को जमीनी स्तर तक जा कर समझा जाये और फिर कोई ऐसा कदम उठाया जाये, जो सर्वमान्य और उचित हो।

   

1 comment:

  1. यह आंकड़े गरीबी क माजक उड़ने के लिए हैं |जब अपना ही सिक्का खोटा है तो किस को दोष दें बहुत अच्छी पोस्ट आइना दिखाती हुई | आभार

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