http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग: प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो

Sunday, February 12, 2012

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो

संदर्भ वैलेनटाइन डे या प्यार का व्यवसायीकरण
राजेश त्रिपाठी
आप अंग्रेजी,हिंदी या किसी क्षेत्रीय भाषा का अखबार उठाइए आपको उनमें वैलेनटाइन डे छाया मिलेगा। उनमें इससे संबंधित जितने फीचर नहीं होंगे, उनसे कहीं ज्यादा उन वस्तुओं के विज्ञापन होंगे जिनमें प्रेमी-प्रेमिकाओं को इस बात के लिए लुभाया-ललचाया जा रहा होगा कि इस विशेष दिन पर वे आपस में किस तरह के  और कैसे-कैसे वेशकीमती तोहफों का आदान-प्रदान कर अपने प्रेम को और प्रगाढ़ कर सकते हैं। कुछ इस तरह जैसे पैसे बिना प्यार फिजूल है। ऐसे प्यार को प्रोत्साहन, बढ़ावा जो दिल नहीं दौलत देखता हो। जबकि सच्चे प्यार का मतलब होता है एक-दूसरे के प्रति सच्चा और पूर्ण समर्पण। ऐसा समर्पण जहां दौलत नहीं दिल की भूमिका हो। दो दिल खामोशी से भावों का इजहार करें और दौलत जहां गौण हो। लेकिन वैलेनटाइन डे तो विशुद्ध बाजार बन गया है। कभी किसी शुभ और सच्चे उद्देश्य के लिए कोई संत जिंदगी गंवा बैठा और उसका बलिदान दिवस प्रेमियो का दिन बन गया, जिसमें धीरे-धीरे व्यावसायिकता घर कर गयी। आज यह करोड़ों-अरबों का व्यवसाय बन गया है। आजकल तो प्रेमी-प्रेमिका ऐसा हैसियत दिखाने और होड़ में भी कर रहे हैं। कौन प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे को महंगा से महंगा तोहफा दे सकते हैं इसकी प्रतिस्पर्धा सी होने लगी है। यानी प्रेम गौण हो गया पैसा प्रमुख जो लोगों को बौरा रहा है और दिग्भ्रमित कर रहा है। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा कि प्यार के इजहार के लिए महज दो मीठे शब्द ही काफी हैं। हम तो यही कहेंगे कि प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो।
      आइए जरा अतीत की ओर लौटें और जानें की प्रेम को प्रतिष्ठा व महत्व देने वाला यह दिन क्यों और कैसे शुरू हुआ। कहते हैं कि कोई रोमन संत थे वैलेनटाइन जो प्रेमी-प्रेमिकाओं की शादी चोरी-छिपे कराते थे। कारण यह था कि वहां का राजा क्लाडियस द्वितीय चाहता था कि उसके राज्य के विश्वसनीय युवक कुंआरे ही रहें ताकि सिर्फ और सिर्फ उसके और उसकी सेना के प्रति वफादार रहें। वैलेनटाइन का कहना कि प्यार ईश्वर का वरदान है और उस पर किसी तरह का प्रतिबंध या बंदिश नहीं होनी चाहिए। राजा क्लाडियस ने संत को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन संत प्यार को पूजा मानते थे और प्रेमी युगलों की शादी कराने को पुण्य और वह अपने इस अभियान मे अड़िग रहे। राजा ने लाख समझाया लेकिन संत नहीं माने तो राजा की आज्ञा की अवहेलना कर प्रेमियों का विवाह कराते रहने के अपराध में राजा ने वैलेनटाइन को मौत की सजा सुना दी। वह 14 फरवरी का ही दिन था जिस दिन राजा की आज्ञा से संत वैलेनटाइन का सिर धड़ से अलग कर दिया गया। बस उसके बाद से ही प्रेमी-प्रेमिका प्रेम को प्रतिष्ठा दिलाने वाले इस संत के मृत्यु दिवस को उनकी याद में वैलेनटाइन डे के रूप में मनाने लगे। जिसमें पहले प्रेम ही प्रधान था पैसा नहीं। लेकिन ऐसा देर तक नहीं चल सका। हर भाव व भावना को बाजार बना देने, पैसे को ही दुनिया का भगवान और सब कुछ मानने वाले व्यवसायियों ने प्यार के अहसास और प्रणय निवेदन को भी पैसों में तौलना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इसका व्यवसायीकरण बढ़ता गया। कई उत्पाद तो वैलेनटाइन दिन को सोच कर बनाये और विज्ञापित किये जाने लगे। व्यवसाय का सिर्फ एक ही उद्देश्य होता है पैसा और पैसा। इसलिए यह हर चीज, हर पक्ष को व्यवसाय के नजरिये से देखता है। हमें इस पर कोई एतराज नहीं कि जिसके पास दौलत है अगर वह चाहे तो उसे पानी तरह बहाये, जब जैसा चाहे उड़ाये लेकिन कम से कम मन से जुड़ी कोमल और पवित्र भावनाओं को तो दौलत के इस प्रदर्शन और दलदल से मुक्त रखा जाये। यह वह कोमल और पवित्र एहसास है जिसे दौलत का दंभ भरा प्रदर्शन कुत्सित, कलुषित और अपवित्र कर देता है। यह वैलेनटाइन डे का ही प्रभाव है कि दो-दो रुपयों में मारा-मारा फिरने वाला गुलाब का टहनी से जुड़ा एक फूल 20-25 रुपये और कहीं-कहीं उससे भी अधिक दाम पाकर इतराता फिरता है। प्यार के इजहार के लिए प्रेमी-प्रेमिका की एक मीठी मुसकान, हाथों का पुलकित कर देने वाला स्पर्श ही काफी है जो मन के अंतर के तारों को झंकृत कर देता है और पोर-पोर में पुलकन भर देता है। इसके आगे लाखों-करोड़ों के तोहफे गौण हो जाते हैं, पानी भरते नजर आते हैं। पैसा या तोहफा शाश्वत या दीर्घस्थायी नहीं। पैसे से खरीदी कोई वस्तु खत्म हो सकती है लेकिन आपके दिल से कहे गये मीठे बोल हमेशा के लिए उसके मन में मीठी बांसुरी से बजते रहेंगे जिसे आप चाहते हैं। प्रेम के इस दिवस को मनाने में जब से पैसा की भूमिका प्रमुख हुई तब से प्रेमी-प्रेमिकाओं को इस दिन का बड़ी शिद्दत से इंतजार रहने लगा है। उन्हें उन तोहफों की प्रतीक्षा और ललक रहती है जो उनके प्रेमी उनको देंगे यानी प्रेम में घुल गया लोभ और स्वार्थ का रंग। रंग ऐसा जो पैसे पर आधारित हो, पैसा बंद तो प्रेम का यह रंग उड़ते भी देर नहीं लगेगी।
      हम वैलेनटाइन डे का विरोध नहीं कर रहे वैसे यह भी सच है कि प्रेम को प्रतिष्ठा दिलाने और उसे महत्वपूर्ण मानने वाले महान लोगों की हमारे भारत में भी कमी नहीं रही। अगर हम यह कहें कि भारत वह भूमि है जहां कभी सिर्फ और सिर्फ प्रेम की धारा बहती थी। यह प्रेम कहीं प्रभु के प्रति था, कहीं अपने जनक के प्रति तो कहीं अपनी प्रेमिका के प्रति। प्रेम पर बलिदान होने वालों की अगनित कहानियां हमारे भारत से जुड़ी हैं। इनमें कहीं पैसा की भूमिका नहीं रही। अगर अतीत में काफी पीछे जायें तो राधा-कृष्ण का अमर प्रेम भारत भूमि में ही नजर आता है। गिरधर गोपाल की प्रेमरस में डूबी अनन्य भक्त मीरा भी इसी देश की थीं। पिता-माता के प्रेम को समर्पित श्रवण कुमार की प्रेरणादायक कथा भी भारत की है। ऐसी अनेक सात्विक और सच्चे प्रेम की प्रेरणादायक कथाएं भारत में मिल जायेंगी जहां धन की कोई भूमिका नहीं थी। अगर कुछ था तो श्रद्धा और निस्वार्थ समर्पण भाव। सच्चा प्रेम धन नहीं दिल के भावों और प्रेम को देखता है। दरअसल प्रेम के बीच जहां भी पैसा आता है, वहीं स्वार्थ और लोभ उसमें घर कर जाता है। जब तक तोहफे मिल रहते रहे तब तक प्रेम का प्रदर्शन (इसे प्रदर्शन ही कहेंगे जो पैसे पर टिका हो क्योंकि ऐसा प्रेम स्थाई नहीं होता जिसमें दिल के बजाय दौलत की भूमिका हो) चलता है। जब तोहफे बंद, पैसों की बारिश सूखी तो दिल में बहता प्रेम का दरिया भी सूख जायेगा। यानी इस तरह के प्रेम की उमर लंबी नहीं होती, यह प्रेमी की जेब पर टिकी होती है। ऐसे में इसे वैलेनटाइन क्या दुनिया का कोई भी संत नहीं बचा सकता। वैलेनटाइन ने जिस प्रेम को प्रोत्साहित किया वहां दिलों के बीच पनपते पावन एहसास अहम थे न कि जागतिक धन-दौलत। वैसा प्यार पवित्र और अदम्य होता है लेकिन आज हमारे यहां क्या हो रहा है। हम यह पूरे यकीन के साथ कह और लिख रहे हैं कि आज पैसे पर टिके प्यार के चलते कई अबोध और जमाने के ऊंच-नीच से अनजान युवतियों ठगी जाती हैं। कई प्रेमी ऐसे निकलते हैं कि वे कुछ दिन पैसा लुटा युवतियों की भावनाओं से खेलते हैं और एक दिन उन्हें ठुकरा कर किसी नयी की तलाश में निकल पड़ते हैं। ऐसा तब कभी नहीं होता अगर यह प्यार पैसा नहीं दिल के सच्चे एहसास पर आधारित होता। तब दो दिल एक-दूसरे से जुदा होने पर तड़पते लेकिन यहां तो पैसा प्रमुख है और आज तो लोगों में यह भाव घर कर गया है कि पैसे से कुछ भी खरीदा जा सकता है, यहां तक कि प्यार भी। ऐसे में क्या संत वैलेनटाइन और क्या कोई और प्रेम को प्रतिष्ठा कैसे दिला सकेंगे।
      हम तो बस यही कहना चाहते हैं कि किसी से भी प्यार करो तो दिल की गहराइयों से करो और भगवान के लिए निभाओ क्योंकि  दिल टूटने से बड़ा कोई दर्द नहीं होता और इससे बड़ा कोई पाप नहीं होता। किसी का कोई भला न कर सकें न करें लेकिन भगवान के लिए किसी का दिल न दुखायें। हमारे यहां के बड़े-बड़े संत और मनीषियों ने भी यही कहा है कि सबको प्रेम दो, किसी का दिल कभी न दुखाओ। संत वैलेनटाइन ने भी इसी उद्देश्य से प्रेमी-प्रेमिकाओं की मदद शुरू की होगी। उनके उस सत्प्रयास को आज व्यवसाय में बदल दिया गया है।
      प्रेम के इस पर्व को व्यवसाय बना देने के हम विरोधी हैं लेकिन इसके साथ ही हम उनके भी विरोधी हैं जो प्रेमी-प्रेमिका को ऐसा करने से रोकते हैं। हम आजाद देश के निवासी हैं जहां हर दिल स्वतंत्र है, यहां कहने, लिखने की आजादी (जिसके लिए हम खुद को खुशनसीब मानते हैं) है, यहां मन आजाद है, विचार आजाद हैं, हर एक को अपने ढंग से जीने की आजादी है। उन्हें वैसा करने दें, तब तक न रोकें जब तक ऐसा करने से समाज की कोई क्षति न होती हो। क्योंकि ऐसा करना किसी की आजादी में हस्तक्षेप है। उनकी जिंदगी है, वे जैसा चाहें जिएं, अगर वे कोई गलत कदम उठा रहे हैं तो विनम्रता से एक बार उन्हें आगाह कर दें, माने तो अच्छा न माने तो जैसी हरि इच्छा, उन्हें कल जब ठोकर लगेगी तो अपने आप चेत जायेंगे।
      शायद संत वैलेनटाइन ने भी यह न सोचा होगा कि एक राजा की हठधर्मिता के खिलाफ उन्होंने प्रेमी-प्रेमिकाओं को सम्मान और प्रतिष्ठा की जिंदगी जीने में मदद का जो महत कार्य वे कर रहे हैं, वह सदियों बाद व्यवसाय का जरिया बन जायेगा। प्यार कीजिए, तहेदिल से कीजिए। किसी की जिंदगी संवार सकें तो जरूर संवारिए लेकिन भगवान के लिए इसे पैसे से न तोलिए। प्यार पैसे से नहीं तोला जाता। यह दिल का वह पुनीत एहसास है जिसे दिल की गहराइयों से ही महसूस किया जाता है। सच्चा प्यार किसी की भी जिंदगी बदल सकता है। इस संदर्भ में फिल्म खामोशी का गीत याद आता है- हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू (ये अलग बात है कि क्या कभी आंखों में भी कोई खुशबू महकती है, संभव है कवि भावातिरेक में यह लिखा गया हो लेकिन सुनने में ये पंक्तियां अच्छी लगती हैं।) प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो। हम भी यही चाहते हैं कि बराये मेहरबानी प्यार को प्यार ही रहने दीजिए और इसे किसी और रूप में न देखिए और न ढालिए। एक बात और प्यार का साल में एक दिन ही क्यों हो? क्या हम जिंदगी के हर दिन को प्यार का दिन नहीं मान सकते ? हर दिन जब प्यार का दिन होगा तो हर प्रेमी का दिन सुंदर और सार्थक हो जायेगा। यह प्यार प्रेमी-प्रेमिका तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, माता-पिता और अपने बड़ों तक भी होना चाहिए इसका विस्तार। वैसे समाज का एक तबका तो आज बड़े-बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में डालने लगा है। मेहरबानी कर के उन लोगों के साथ ऐसा सुलूक न कीजिए जिनकी वजह से आप वो हैं जो आज हैं। उन्हें जिंदगी के आखिरी क्षणों तक भरपूर प्यार दीजिए ताकि वे जमाने के दर्द-गम भूल कर अपने आखिरी क्षण खुशी से जी सकें। उन्हें बच्चों से घुलने-मिलने दीजिए, अपने सुख-दुख उनसे बांटिए ताकि वे यह समझ सकेंगे कि जिंदगी के अवसान के क्षणों में भी वे महत्वपूर्ण हैं, परिवार और समाज को उनकी जरूरत है। वे अप्रासंगिक नहीं हुए बल्कि अपने जीवनानुभवों से अपने परिवार और समाज के पथ प्रदर्शक बने हुए हैं। शायद संत वैलेनटाइन ने जिस प्रेम की पूजा की उसमें इन बुजुर्गों के प्रति प्रेम के भाव भी अंतर्निहित रहे होंगे। आज ऐसे प्यार की समाज को बड़ी जरूरत है।  ईश्वर करे ऐसा हो और धरती से तनाव, दुराव और अलगाव का दुख मिट जाये। सबको सच्चा प्यार और महत्व मिले। हम ऐसे वक्त की कामना करते हैं, क्या आप नहीं करते?

4 comments:

  1. सार्थक पोस्ट आभार

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  2. sach pyar koi khel-tamasha nahi, phir bhi kuch log isko vywsya ka roop dekar apna ullu sadhne ki koshish mein lage rahte hai..
    sundar samyim sarthak prastuti..

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  3. आपने जिस गाने के आधार पर अपनी पोस्ट का शीर्षक रखा है उशी गाने में प्यार के सही मायने छुपे हैं .... सुंदर सार्थक पोस्ट शुभकामनायें

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  4. विरोध तो नहीं है मगर एक प्रश्न जरुर है की हमे संस्कारो और त्योहारों के आयात की जरुरत सचमुच है क्या???
    मेरा व्यक्तिगत विचार है की अगर पश्चिम में मानसिक और बौधिक रूप से इतना प्रेम भरा पड़ा है की, वहां से प्रेम का त्यौहार, हमे उस धरती पर आयात करना पड़ रहा है जहाँ निष्काम प्रेम में सर्वस्व समर्पण की प्रतिमूर्ति मीराबाई पैदा हुई, तो पश्चिम में ओल्ड एज होम सबसे ज्यादा क्यों हैं?? क्यों पश्चिम का निष्कपट प्रेम वहां होने वाले विवाह के रिश्तों को कुछ सालो से ज्यादा आगे नहीं चला पाता.उस प्रेम की मर्यादा और शक्ति तब कहा होती है ,जब तक बच्चा अपना होश संभालता है ,तब तक उसके माता पिता कई बार बदल चुके होते हैं और जवानी से पहले ही वो प्रेम से परे एकाकी जीवन व्यतीत करता है I

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