Friday, February 19, 2021

परशुराम ने क्यों किया अपनी ही मां का वध?


परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। त्रेता युग में उनका जन्म एक ब्राह्मण ऋषि के यहां हुआ था। ऐसा उल्लेख मिलता है कि उनका जन्म भृगुकुल में हुआ था। महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि जमदग्नि के पुत्र थे परशुराम। ऐसा भी उल्लेख है कि पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप जमदग्नि की पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को परशुराम का जन्म हुआ। उनका नाम राम रखा गया। जमदग्नि का पुत्र होने के कारण वे जामदग्न्य कहलाये। शिवजी ने उनको परशु (कुठार या फरसा) प्रदान किया गया। इसके बाद उनके नाम में परशु जुड़ गया और उनका पूरा नाम परशुराम हो गया।  धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से शार्ङ्ग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र उन्हें प्राप्त हुआ।  चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया। वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। यहां हम उन्हीं परशुराम के जीवन की एक विचित्र गाथा सुनाने जा रहे हैं जिसमें उन्हें परिस्थितिवश अपनी ही मां का वध करना पड़ा था। 

परशुराम के जन्म की एक कता इस प्रकार है- कन्नौज नामक नगर में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम ‘सत्यवती’ था। ‘सत्यवती’ अत्यन्त रूपवती एवं गुणवती थी। राजा गाधि ने अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह भृगु ऋषि के पुत्र भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया। विवाह के पश्चात भृगुनन्दन ऋषीक अपनी पत्नी सत्यवती के साथ अपने पिता भृगु ऋषि का आशीर्वाद लेने पहुंचे।भृगु ऋषि ने अपने पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र प्राप्ति का वरदान माँगा। उन्होंने अपनी पुत्रवधू सत्यवती और उसकी मां दोनों को पुत्र होने का वरदान दिया।

भृगु ऋषि ने सत्यवती को दो फल दिए और बताया जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल के पेड़ का आलिंगन करे और तुम उसी कामना को लेकर गूलर के पेड़ का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिये गये इन फलों का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन कर लेना।

जब सत्यवती की माँ ने सुना कि भृगु ऋषि ने अपनी पुत्रवधू सत्यवती को उत्तम सन्तान होने का फल दिया है तो उन्होंने अपने फल को अपनी पुत्री के फल के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अज्ञानवंश अपनी माता वाले फल का सेवन कर लिया।

इस बात की जानकारी जब भृगु ऋषि को हुई तो उन्होंने अपनी पुत्रवधू सत्यवती के पास आकर कहा कि हे पुत्री, तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल किया है उन्होंने तुम्हारे फल का सेवन कर लिया और अपना फल तुम्हें दे दिया। इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी।

इससे परेशान होकर सत्यवती ने अपने ससुर भृगु ऋषि से निवेदन किया कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे।भृगु ऋषि ने उनकी यह विनती स्वीकार कर ली। कुछ समय बाद सत्यवती के गर्भ से महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ।

जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुये जिनके नाम थे रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस और परशुराम। इस तरह परशुराम का जन्म हुआ, जो जन्म से ब्राह्मण होते हुए भी कर्म से क्षत्रिय गुणों वाले थे।

कैसे बने राम से परशुराम ?

पुत्र परशुराम द्वारा अपनी ही मां के वध की कथा इस  प्रकार है- एक बार परशुराम की मां रेणुका नदी में स्नान के लिये गयी। उस समय वहां राजा चित्ररथ  जल-विहार कर रहा था। चित्ररथ को देख कर रेणुका का चित्त चंचल हो उठा। जब वे आश्रम पहुंची तो महर्षि जगदग्नि ने रेणुका के मन की बात जान ली और क्रोधित होकर उन्होंने एक-एक अपने पुत्रों को अपनी माँ का वध कर देने की आज्ञा दी।

लेकिन किसी भी पुत्र ने अपने पिता की आज्ञा का पालन नहीं किया। परशुराम ने पिता की आज्ञा मानते हुये अपनी माँ का सिर काट डाला। यह देखकर भृगु श्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि बेटे परशुराम से बहुत प्रसन्न हुए पर अपने शेष चारों पुत्रों से क्रोधित होकर उन्हें जड़ हो जाने का श्राप दे दिया।

जमदग्नि ने पुत्र परशुराम से वरदान मांगने को कहा। इस पर परशुराम ने उनसे आग्रह किया कि वे उनकी माता को जीवित कर दें और ऐसा भी कर दें कि उन्हें अपने मृत्यु की घटना याद न रहे। इसके अलावा उन्होंने अपने चारों भाइयों ई भी जड़ से फिर चेतन कर देने की प्रार्थना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने लिए यह वरदान मांगा कि वे कभी किसी से युद्ध में परास्त न हों साथ ही वे दीर्घजीवी हों। जमदग्नि ने परशुराम को उनके माँगे वर दे दिये।

परशुराम ने राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन या सहस्त्रार्जुन का भी वध किया था इसकी कथा इस प्रकार है-

एक दिन महिष्मती देश का राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन अपने मार्ग से गुजरते हुए महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा और वहां विश्राम किया। जमदग्नि मुनि ने सहस्त्रबाहु अर्जुन का बहुत आदर सत्कार किया और अपनी कामधेनु गौ की सहायता से सहस्त्रबाहु अर्जुन और उनकी पूरी सेना के लिए भोजन की व्यवस्था कर दी।

कामधेनु गौ की यह विशेषता देख कर राजा सहस्त्रबाहु को लालच हो गया और उसने जमदग्नि से कामधेनु गौ की माँग की। जमदग्नि ने उन्हें कामधेनु गौ देने से मना कर दिया। इस पर सहस्त्रबाहु अर्जुन ने क्रोध में आकर जमदग्नि ऋषि का वध कर दिया और कामधेनु गौ को अपने साथ ले जाने लगा। कामधेनु गौ सहस्त्रबाहु अर्जुन के हाथ से छूट कर स्वर्ग चली गई और सहस्त्रबाहु को बिना कामधेनु गौ के वापस लौटना पड़ा।

 परशुराम को जब इस बात का पता चला कि सहस्त्रबाहु ने उनके पिता के साथ बुरा बर्ताव किया है तो उन्होंने  फरसे से उसकी सारी भुजाएँ काट डालीं व सिर को धड़ से अलग कर दिया। तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके ध्यानस्थ पिता जमदग्नि की हत्या कर दी। रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस काण्ड से कुपित परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से हैहय वंसी क्षत्रियों का विनाश किया। अन्त में महर्षि ऋचीक ने परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका। इसके बाद परशुराम ने अश्वमेध यज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये और महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बना कर रहने लगे।

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