Tuesday, February 23, 2021

शिव के वाहन नंदी कौन थे ?



नंदी को भगवान शिव के प्रमुख गणों में एक माना जाता है। शिव के अन्य गण हैं भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। सभी के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि शिव को नंदी कब और कैसे मिले। यह भी कि शिव के वाहन नंदी कौन थे, क्या है उनकी पूरी कहानी। आज हम आपको नंदी की कथा ही सुनाने जा रहे हैं।

पुराणों में उल्लेख मिलता है कि नंदी शिलाद ऋषि के पुत्र थे। शिलाद ऋषि ब्रह्मचारी थे। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते-करते शिलाद ऋषि के मन एक डर बैठ गया। डर इस बात का कि यदि निस्संतान रहते उनकी मृत्यु हो गयी तो उनके बाद उनका वंश समाप्त हो जाएगा। अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने एक बच्चा गोद लेने की सोची। ऋषि शिलाद ऐसे बालक को गोद लेना चाहते थे, जिस पर भगवान शिव की कृपा हो।

 ऐसा बालक मिलना मुश्किल यह सोच ऋषि भगवान की घोर तपस्या में लीन हो गए। लंबे समय तक तप करने के बाद भी उन्हें इसका कोई भी फल प्राप्त नहीं हुआ। ऐसे में ऋषि शिलाद ने अपनी तपस्या को और भी कठोर कर दिया। काफी समय के कठोर तप के बाद आखिर भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने ऋषि शिलाद को दर्शन दिए।

भगवान शिव ने शिलाद ऋषि से कहा, “मांगो, क्या वर मांगना चाहते हो।” ऋषि शिलाद ने अपनी कामना भगवान शिव से जाहिर की। भगवान शिव ने शिलाद को पुत्र का आशीर्वाद दिया और वहां से चले गए। अगले ही दिन जब ऋषि शिलाद पास के खेतों से गुजर रहे थे तो उन्हें वहां एक नवजात बच्चा मिला। 

बच्चे का मुख बेहद ही मनमोहक और लुभावना था। ऋषि बच्चे को देख बहुत खुश हुए और यह सोच कर इधर-उधर देखने लगे कि इतने प्यारे बच्चे को इस हाल में यहां छोड़कर कौन चला गया। तभी भगवान शिव की आवाज आई और उन्होंने कहा शिलाद यही है, तुम्हारा पुत्र।

 ऋषि शिलाद बहुत प्रसन्न हुए। वह उसे अपने साथ अपने घर ले आए और उसका लालन-पालन करने लगे। देखते देखते नंदी बड़ा हो गया। एक दिन ऋषि शिलाद के घर दो सन्यासी आए। ऋषि शिलाद की  आज्ञा से नंदी ने दोनों सन्यासियों का खूब आदर सत्कार किया। उन्हें भोजन कराया।

ऋषि शिलाद के घर मिले इस सेवा भाव से दोनों सन्यासी अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋषि शिलाद  को दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया, लेकिन नंदी जिसने उनकी इतनी मन से सेवा की थी उसके लिए  एक शब्द भी नहीं कहा। सन्यासियों द्वारा ऐसा किए जाने पर ऋषि शिलाद को आश्चर्य हुआ। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए शिलाद ने सन्यासियों से इसका कारण पूछा।

 सन्यासियों ने बताया कि इस पुत्र की आयु बहुत कम है। इसलिए, हमने इसे कोई आशीर्वाद नहीं  दिया। नंदी ने सन्यासियों की यह बात सुन ली।

नंदी ने अपने पिता से कहा, “आपने मुझे स्वयं भगवान शिव के आशीर्वाद से पाया है, तो मेरे इस  जीवन की रक्षा भी भगवान शिव ही करेंगे। आप इस बात की बिलकुल भी चिंता न करो।”

इतना कहते हुए नंदी भगवान शिव की अराधना में लग गये। अपने पिता की तरह ही नंदी ने भी भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया। उसके तप से भगवान शिव प्रसन्न हो गये और नंदी को बैल का मुख देकर अपना सबसे प्रिय और वाहन बना लिया। इस प्रकार नंदी भगवान शिव के सबसे प्रिय वाहन बने और समाज में उन्हें पूजनीय स्थान भी मिला। यही वजह है कि भगवान शिव की आराधना से पूर्व उनके प्रिय नंदी की पूजा की जाती है। जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। आमतौर पर खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला बताया गया है। इसके अलावा वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। हिन्दू धर्म में, नन्दी उस कैलाश के द्वारपाल माने जाते हैं, जो शिव का निवास है। वे शिव के वाहन भी हैं जिन्हे बैल के रूप में शिवमंदिरों में प्रतिष्ठित किया जाता है। संस्कृत में 'नन्दि' का अर्थ प्रसन्नता या आनन्द है। नंदी को शक्ति-संपन्नता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि नंदी चैतन्य अवस्था में शिव के मंदिर में रहते हैं। जो भी भक्त भगवान शिव के पास अपनी समस्या  लेकर आता है अपनी बात नंदी के कान में कह देते हैं और नंदी भक्तों की सारी बातें जस की तस शंकर जी तक पहुंचा देते हैं। भक्तों को यह भी विश्वास रहता है कि नंदी उनकी बात शिवजी तक पहुंचाने में कोई भेदभाव नहीं करते और वे शिवजी के प्रमुख गण हैं इसलिए शिवजी भी उनकी बात अवश्य मानते हैं।

नंदी के कान में भी अपनी समस्या या मनोकामना कहने के कुछ नियम हैं उनका पालन करना आवश्यक है। नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आपकी कही हुई बात कोई ओर न सुनें। अपनी बात इतनी धीमें कहें कि आपके पास खड़े व्यक्ति को भी उस बात का पता ना लगे। नंदी के कान में अपनी बात कहते समय अपने होंठों को अपने दोनों हाथों से ढंक लें ताकि कोई अन्य व्यक्ति उस बात को कहते हुए आपको ना देखें। नंदी के कान में कभी भी किसी दूसरे की बुराई, दूसरे व्यक्ति का बुरा करने की बात ना कहें, वरना शिवजी के क्रोध का भागी बनना पड़ेगा। नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहने से पूर्व नंदी का पूजन करें और मनोकामना कहने के बाद नंदी के समीप कुछ भेंट अवश्य रखें। यह भेंट धन या फलों के रूप में हो सकती है। अपनी बात नंदी के किसी भी कान में कही जा सकती है लेकिन बाएं कान में कहने का अधिक महत्व है।

नंदी की  पूजा का  मंत्र :-

ॐ महाकालयम महावीर्यं

शिव वाहनं उत्तमम

गणनामत्वा प्रथम वन्दे

नंदिश्वरम महाबलम

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1 comment:

  1. बहुत अच्छी पौराणिक जानकारी

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