Wednesday, March 10, 2021

क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि

  


महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस बार यह पर्व गुरुवार 11 मार्च को है। ऐसी मान्यता है कि सृष्टि का प्रारम्भ भी इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ महादेव के विशालकाय स्वरूप अग्निलिंग के उदय से हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। साल में होने वाली 12 मासिक शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। 

महाशिवरात्रि हिंदुओं के सबसे पावन त्योहारों में से एक माना जाता है। यह पर्व हर वर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को पड़ता है। इसे भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन की रात के रूप में माना जाता है। इसे प्रकृति और पुरुष के मिलन की रात भी माना जाता है। महाशिवरात्रि के दिन शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ लग जाती है। दिन भर जलाभिषेक होता है।इसके अतिरिक्त शिव का दुग्ध अभिषेक भी किया जाता है। 

महाशिवरात्रि व्रत के बारे में एक कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों का शिकार कर वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ के अंदर कैद कर दिया।  उस दिन शिवरात्रि थी। दुख और तनाव में डूबा शिकारी ध्यान में लीन होकर मठ में हो रही शिव-संबंधी धार्मिक प्रवचन सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की व्रत कथा भी सुनी।

शाम को साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने को कहा। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वादा किया और उसको बंधन मुक्त कर दिया गया। मुक्त होने के बाद वह शिकारी हमेशा की तरह शिकार के लिए निकला। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधेरा हो गया तो उसने जंगल में ही रात बितानी की सोची। वह वन में तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। अपने लिए डालों के बीच बैठने की जगह बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भवती हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ा कर ज्यों ही डेर खींची, हिरणी बोली- 'मैं गर्भवती हूं। शीघ्र ही प्रसव होना है। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आऊंगी, तब मार देना।'

शिकारी ने धनुष की डोर ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में गायब हो गई। डोर चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उसके अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया।

कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनय करते हुए कहा- 'हे शिकारी! मैं  अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया।

दो बार शिकार को खोकर वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजा भी सम्पन्न हो गई।

इसके बाद एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह अच्छा मौका था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली- 'हे शिकारी! मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।'

 शिकारी हंसा और बोला- 'सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्याकुल हो रहे होंगे।'

उत्तर में हिरणी ने फिर कहा- जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करो, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने का वादा करती हूं।

हिरणी की बात सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी के धनुष की तनी डोर देखकर मृग बोला- ' हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे पास आ जाऊंगा।'

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा- 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार वचन देकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मान कर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे पास वापस आ जाऊंगा।'

 शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही सही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।

अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिवजी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जानकर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए।

शिकारी की कथानुसार महादेव तो अनजाने में किए गए व्रत का भी फल दे देते हैं। पर वास्तव में महादेव शिकारी की दया भाव से प्रसन्न हुए। अपने परिवार के कष्ट का ध्यान होते हुए भी शिकारी ने मृग परिवार को जाने दिया। यह करुणा ही वस्तुत: उस शिकारी को उन पंडित एवं पुजारियों से उत्कृष्ट बना देती है जो कि सिर्फ रात्रि जागरण, उपवास एवं दूध, दही, बेल-पत्र आदि द्वारा शिव को प्रसन्न कर लेना चाहते हैं। इस कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कथा में 'अनजाने में हुए पूजन' पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव किसी भी प्रकार से किए गए पूजन को स्वीकार कर लेते हैं अथवा भोलेनाथ जाने या अनजाने में हुए पूजन में भेद नहीं कर सकते हैं।

वास्तव में वह शिकारी शिव पूजन नहीं कर रहा था। इसका अर्थ यह भी हुआ कि वह किसी तरह के किसी फल की कामना भी नहीं कर रहा था। उसने मृग परिवार को समय एवं जीवन दान दिया जो कि शिव पूजन के समान है।

 पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है। मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। 

शिव जी की पूजा के लिए महाशिवरात्रि का पर्व सबसे उत्तम माना गया है। इस दिन को भोलेनाथ के भक्त चरम उत्साह से मनाते हैं।

शिव की स्तुति के कुछ श्लोक 

शिव पञ्चाक्षरि स्तोत्र

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय।

नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै न काराय नम: शिवाय ॥॥


मन्दाकिनी सलिल चन्दन चर्चिताय नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।

मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै म काराय नम: शिवाय ॥॥


शिवाय गौरी वदनाब्ज वृन्द सूर्याय दक्षाध्वर नाशकाय।

श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय ॥3॥

वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य मुनीन्द्रदे वार्चित शेखराय।

चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय तस्मै व काराय नम: शिवाय ॥4॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।

दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै य काराय नम: शिवाय ॥5॥

पंचाक्षरमिदं पुण्यं य: पठेत शिव सन्निधौ।

शिवलोकम अवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥॥

महाशिवरात्रि व्रत और पूजा का शुभ मुहूर्त

महाशिवरात्रि: 11 मार्च 2021

पूजा मुहूर्त: महा शिवरात्रि 11 मार्च दिन गुरुवार को है। महाशिवरात्रि पूजा का सबसे शुभ समय 11 मार्च को 12:06 मिनट से 12 मार्च को 12:55 तक है।

संक्षिप्त पूजा विधि

शिवरात्रि के दिन स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए।

इसके उपरांत विधिवत पूजा आरंभ करनी चाहिए।

पूजा के दौरान कलश में जल या दूध भरकर शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए।

शिवलिंग को बेलपत्र, आक या मदार के फूल, धतूरे के फूल आदि भी अर्पित करने चाहिए।

इस दिन शिवपुराण, महामृत्युंजय मंत्र, शिव मंत्र और शिव आरती का पाठ करना चाहिए।

महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण भी किया जाता है।

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