Sunday, May 30, 2021

जब पार्वती की परीक्षा के लिए शिवजी बने मगरमच्छ


 यह सभी जानते हैं कि पार्वजी ने अपने हर जन्म में शिव को पति के रूप में पाने का प्रण किया था। वे कहती तीं-बरहुं शंभु नत रहहुं कुंआरी। अर्थात या तो मेरा विवाह शंकर जी से होना अन्यथा मैं कुंआरी रहना ही पसंद करूंगी। यह भी विदित है कि हर जन्म में उन्हें शिवजी के लिए तप करना पड़ा। यहां हम आपको ऐसा एक प्रसंग सुनाने जा रहे हैं जब शिवजी ने उस समय पार्वती की परीक्षा लेनी चाही जब वे तपस्या कर रही थीं। उस परीक्षा के लिए शिवजी को मगरमच्छ का कपट रूप धारण करना पड़ा। जब शंकर जी पहाड़ पर तपस्या कर रहे थे उसी वक्त  देवतागण वहां पहुंचे और उनकी विनती गाने लगे। देवता माता पार्वती की अनुसंशा वहां पहुंचे थे। महादेव ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर ली। अब जानते हैं कि देवता शिव जी के पास क्या विनती लेकर पहुंचे थे। हुआ यह था कि माता पार्वती शिव जी से शादी करने का दृढ़ निश्चय कर चुकी थीं। सब कुछ त्याग वे घोर तपस्या में लीन हो गई थीं। वर्षों तक उनकी घोर तपस्या से देवता द्रवित हो गए और सीधे शिवजी के पास गये और उनसे पार्वती की तपस्या पर ध्यान देने और उनकी इच्छा पूरी करने का आग्रह किया। शिवजी ने देवताओं की प्रार्थना तो स्वीकार कर ली पर उनके सामने प्रश्न यह था कि जो देवता पार्वती की तपस्या के बारे में कह रहे हैं उसे कैसे मान लिया जाये। परीक्षा करना आवश्यक है। वे सोचने लगे कि पार्वती के तपोबल की परीक्षा लें तो कैसे। यदि वे अपने वास्तविक रूप में पार्वती के सामने जाते हैं तो संभव है वे क्रोधित भी हो जायें। वे इसी  सोच में डूबे थे कि तभी उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने सोचा सप्तऋषियों को माता पार्वती की परीक्षा लेने के लिए भेजा। सप्तऋषियों ने शिव से शादी करने के निर्णय के बारे में माता पार्वती से पूछा। पार्वती ने सप्तऋषियों के सामने भी शिवजी का जीभर कर गुणगान किया। शकर जी को उन्होंने सर्वगुण सम्पन्न और शक्तिमान सप्तऋषियों ने उनके सामने शिवजी के सैकड़ों अवगुण गिनवाए लेकिन पार्वती अपने फैसले से जरा भी पीछे नहीं हटीं वे अपने फैसले पर अटल रहीं। उन्होंने कहा कि शिवजी के अतिरिक्त किसी और से से विवाह करना उन्हें स्वीकार नहीं है। इसके पश्चात सप्तऋषि वहाँ से लौट आये और पूरी शिवजी को सुना दी। इसके बाद स्वयं शिवजी ने यह निश्चय किया कि क्यों स्वयं जाकर पार्वती की परीक्षा क्यों ना ले ली जाये।  यही सोच कर उन्होंने स्वयं पार्वती जी की परीक्षा लेने का निश्चय किया।

 उधर माता पार्वती जी एक तलाब के किनारे अपनी तपस्या में लीन थीं। तभी तलाब के किनारे एक बालक को एक मगरमच्छ ने पकड़ लिया। अपनी जान को विपत्ति में देख कर बालक शोर मचाने लगा। वो जोर-जोर से मगरमच्छ-मगरमच्छ चिल्लाकर अपनी जान बचाने के लिए सहायता मांगने लगा। पार्वती जी ने जब किसी बच्चे की चीख सुनी तो उनसे रहा नहीं गया और वो तपस्या छोड़ कर उसे बचाने के लिए तलाब के किनारे पहुंच गई। वहाँ उन्होंने देखा कि मगरमच्छ ने एक बालक को पकड़ रखा है और वह उसे खींच कर गहरे तलाब में ले जाने का प्रयत्न कर रहा है। पार्वती जी को देख कर बालक देवी को देखकर उनसे अपने जान बचाने के लिए विनती करने लगा और बोला- हे माता! प्राण संकट में है। यदि आप चाहेंगी तो मेरे प्राण बच सकते हैं। वैसे भी ना तो मेरी माता है और ना ही पिता। अब आप ही मेरी रक्षा कीजिये। मुझे बचाइए माता। देवी पार्वती से बच्चे की पुकार सुन कर रहा नहीं गया और उन्होंने मगरमच्छ से कहा- हे मगरमच्छ! इस निर्दोष बालक को छोड़ दीजिए बदले आपको जो चाहिए वो आप मुझसे मांग सकते हैं।

इसके बाद मगरमच्छ ने कहा कि मैं इसे एक बात पर छोड़ सकता हूँ। आपने तपस्या करके महादेव से जो वरदान प्राप्त किया है, यदि उस तपस्या का फल आप मुझे दे देंगी तो मैं इसे छोड़ दूंगा। पार्वती जी मगरमच्छ की यह बात मान ली और कहा- लेकिन आपको इस बालक को शीघ्र ही छोड़ना होगा। मगरमच्छ ने देवी को समझाते हुए कहा कि अपने इस फैसले पर फिर से विचार कर लीजिए। जल्दबाजी में आकर कोई वचन न दीजिये क्योंकि आपने हजारों वर्षों तक जिस प्रकार से तपस्या की है जो देवताओं के लिए भी असम्भव है। उसका सारा फल इस बालक के प्राणों के लिए मत गंवाइए। इस पर पार्वती जी ने कहा- मैं निर्णय कर चुकी हूं। मेरा इरादा अटल है, मैं आपको अपनी तपस्या का पूरा फल देने को तैयार हूँ परन्तु आप इसे तुरंत मुक्त कर दीजिए। मगरमच्छ ने पार्वती जी से अपनी तपस्या दान करने का वचन ले लिया और जैसे ही पार्वती जी ने अपनी तपस्या का दान की मगरमच्छ का शरीर तेज से चमकने लगा। फिर मगरमच्छ ने कहा- देखिये आपके तपस्या के तेज से मेरा शरीर कितना चमकने लगा है। फिर भी मैं आपको अपनी भूल सुधारने का एक मौका और देता हूँ। इसके उत्तर में पार्वती जी ने कहा कि तपस्या तो मैं फिर से कर सकती हूँ लेकिन यदि आप इस बच्चे को निगल जाते तो क्या इसका जीवन वापस मिल पाता?

इस पर मगरमच्छ ने कुछ जवाब नहीं दिया और इधर-उधर देखने लगा। इसी क्रम में देखते ही देखते वो लड़का और मगरमच्छ दोनों अदृश्य हो गए। पार्वती जी को इस पर आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है कि दोनों एक साथ अचानक से गायब हो गए। लेकिन पार्वती जी ने इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया और इस बात पर विचार करने लगी कि उन्होंने अपनी तपस्या का फल तो दान कर दिया पर फिर से इसे कैसे प्राप्त किया जाए? इसके लिए उन्होंने फिर से तपस्या करने का प्रण किया। वो तपस्या करने के लिए तैयारियां करने लगीं कि अचानक शिव जी उनके सामने अचानक प्रकट हो गए और वो कहने लगे कि हे देवी भला अब तपस्या क्यों कर रही हो? पार्वती जी ने कहा- हे प्रभु! आपको अपने स्वामी के रूप में पाने के लिए मैंने संकल्प लिया है लेकिन मैंने अपनी तपस्या का फल दान कर दिया है। ऐसे में मैं फिर से वैसे ही घोर तपस्या करके आपको प्रसन्न करना चाहती हूँ। इसके उत्तर में महादेव ने कहा कि हे पार्वती! अभी आपने जिस मगरमच्छ को अपनी तपस्या का फल दिया और जिस लड़के की जान बचाई इन दोनों रूपों में मैं ही था। अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक ही हूँ, मैं अनेक शरीरों में शरीर से अलग निर्विकार हूँ। यह मेरी ही लीला थी। मैं यह देखना चाहता था कि आपका मन प्राणी मात्र में सुख-दुःख का अनुभव करता है कि नहीं। इस पर पार्वती जी ने कहा- हे प्रभु! क्या मैं आपकी परीक्षा में सफल हुई तो शिव जी ने उत्तर दिया- हे देवी! आप प्राणियों का सुख-दुःख समझती हैं, आपमें दया और करुणा दोनों है। अब आपको और तपस्या करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि आपने अपनी तपस्या का फल मुझे ही दिया है। ये सुन कर माता पार्वती बहुत प्रसन्न हुईं और इसके बाद माता पार्वती और भगवान महादेव का विवाह हो गया।

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