Thursday, June 17, 2021

क्या आज भी महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्यारत हैं परशुराम ?

 


 जिनको अमरत्व का वरदान प्राप्त है उनमें परशुराम जी का नाम भी सम्मिलित बताया जाता है। ऐसा माना जाता है कि वे आज भी सूक्ष्म शरीर में महेंद्रगिरि पर्वत पर आज भी तपस्या में लीन हैं। जब बहुत से अत्याचारी राजा तामसी प्रवृत्ति के हो गये तब विष्णु ने अपने अंश से परशुराम रूप में अवतार लिया और अत्याचारी राजाओं का नाश किया। जब राम ने जनकपुर के धनु, यज्ञ् में परशुराम के गुरु शिव जी का धनुष तोड़ दिया और यह संवाद परशुराम को मिला तो वे जनकपरु पहुंचे और गुरु के धनुष को खंडित देख कर बहुत क्रोध किया। राम के लघु भ्राता लक्ष्मण से उनका बड़ा तर्क वितर्क हुआ और अपनी शक्ति का बखान करने के लिए उन्होंने यह उल्लेख किया था कि उन्होंने अत्याचारियों से पृथ्वी को मुक्त किया। पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसका उल्लेख इन शब्दों में किया है-वीर विहीन मही मैं कीन्हीं। विपुल बार महिदेवन दीन्हीं।

परशुराम ने जब देखा कि कुछ राजाओं के अत्याचार बढ़ गया है तब उन्होंने हैहय वंशी राजाओं से कटिन संग्राम किया और विजय पायी। इनमें से ही एक सहस्त्रबाहु अर्जुन, थे जिनके बारे में यह प्रसिद्ध है कि उन्होंने महाप्रतापी रावण तक को कैद कर लिया था। उनसे भी परशुराम ने युद्ध किया और विजय पायी। जब शिव धनुष टूटने पर वे जनकपुर पहुंचे और उनकी लक्ष्मण जी से बहस होने लगी तो उन्हें डरवाने के लिए उन्होंने सहत्रबाहु अर्जुन पर विजय पाने की अपनी बात सुनायी। गोस्वामी तुलसीदास  ने अपने रामचरित मानस में इसका जिक्र इस तरह से किया है-सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥

भगवान परशुराम माता रेणुका और ऋषि जमदग्नि की चौथी संतान थे। शिव के अनन्य भक्त थे। शिव जी से उनको वरदान स्वरूप परशु (फरसा) मिला था। इसी कारण इनका नाम परशुराम पड़ा। धनुष यज्ञ के दौरान जब गुरु शिव का धनुष टूट जाने पर वे क्रोध करते हैं तो राम विनयी मुद्रा में जो कहते हैं उसका उल्लेख तुलसीदास ने रामचरित मानस में इस तरह किया है-राम मात्र लघु नाम हमारा परसु सहित बड़ नाम तोहारा।। देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें।।

माना जाता है कि भगवान परशुराम आज भी धरती पर हैं। इन्हें सात अमर देवताओं में एक माना जाता है।  भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार थे। भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ था। खास बात यह है कि इसी तिथि में भगवान के अन्य अवतार नर नारायण और हयग्रीव का अवतार भी इसी तिथि को हुआ था।

 

पिता की आज्ञा का मान रखने के लिए परशुराम को अपनी ही माता का वध करना पड़ा था। पिता से ही वरदान मांग कर उन्होंने अपनी माता को पुन: जीवित करा लिया। त्रेता युग में भगवान राम ने ही परशुराम को द्वापर युग तक सुदर्शन चक्र संभालने की जिम्मेदारी थी। इसीलिए गुरु संदीपनी के यहां आकर परशुराम ने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र सौंपा था।  परशुराम ने ही द्वापर युग के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारियों में गिने जानेवाले भीष्म और कर्ण को धनुर्विद्या सिखाई। कामधेनु का चमत्कार देखकर सहस्त्रबाहु उस पर मुग्ध हो गया। उसने जमदग्नि से कहा कि वे अपनी गाय उसे दे दें। किंतु जमदग्नि ने कामधेनु गौ देने से साफ मना कर दिया। उनके मना करने पर सहस्त्रबाहु ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले चलें।सहस्त्रबाहु कामधेनु को अपने साथ ले गया। उस समय आश्रम में परशुराम नहीं थे। परशुराम जब आश्रम में आए, तो उनके पिता जमदग्नि ने उन्हें बताया कि किस प्रकार सहस्त्रबाहु अपने सैनिकों के साथ आश्रम में आया  और किस प्रकार वह कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले गया। घटना सुन कर परशुराम क्रुद्ध हो उठे। वे कंधे पर अपना परशु रख कर सहस्त्रबाहु की नगरी महिष्मती की ओर चल पड़े। सहस्त्रबाहु अभी महिष्मती के मार्ग में ही था कि परशुराम उसके पास जा पहुंचे, सहस्त्रबाहु ने जब यह देखा कि परशुराम तीव्र गति से चले आ रहे हैं, तो उसने उनका सामना करने के लिए अपनी सेनाएं खड़ी कर दीं। एक ओर हज़ारों सैनिक थे, दूसरी ओर अकेले परशुराम थे, घनघोर युद्ध होने लगा।

परशुराम ने अकेले ही सहस्त्रबाहु के समस्त सैनिकों को मार डाला। जब सहस्त्रबाहु की संपूर्ण सेना नष्ट हो गई, तो वह स्वंय रण के मैदान में उतरा, वह अपने हज़ार हाथों से हज़ार बाण एक ही साथ परशुराम पर छोड़ने लगा। परशुराम उसके समस्त बाणों को दो हाथों से ही नष्ट करने लगे। जब बाणों का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा, तो सहस्त्रबाहु एक बड़ा वृक्ष उखाड़कर उसे हाथ में लेकर परशुराम की ओर झपटा। परशुराम ने अपने बाणों से वृक्ष को खंड-खंड कर ही दिया, सहस्त्रबाहु के मस्तक को भी काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया। वह रणभूमि में सदा के लिए सो गया।परशुराम सहस्त्रबाहु को मारने के पश्चात कामधेनु को लेकर अपने पिता के पास लौट आये। महर्षि जमदग्नि कामधेनु को पाकर अतीव हर्षित हुए। उन्होंने परशुराम को ह्रदय से लगाया और उन्होंने बहुत-बहुत आशीर्वाद दिया। परशुराम अपने पिता के अनन्य भक्त थे। वे उन्हें परमात्मा मानकर उनका सम्मान किया करते थे। जमदग्नि बहुत बड़े योगी थे। उन्होंने योग द्वारा सिद्धियां प्राप्त की थीं।

 कहा जाता है वही महाबली अमर परशुराम महेंद्रगिरि पर्वत पर आज भी विद्यमान हैं। हर साल यहां बड़ी तादाद में श्रद्धालु आते हैं।  

- महेंद्रगिरि पर्वत उड़ीसा के गजपति जिले के परालखमुंडी में स्थित है।
- यह पर्वत धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह रामायण, महाभारत और पुराणों से जुड़ी हुई है।
- ऐसा माना जाता है कि महेंद्रगिरि पर्वत भगवान परशुराम की तप की जगह थी। और अंतत: वह उसी पर्वत पर तपस्या के लिए चले गए थे। - दरअसल, पौराणिक कथाओं में अश्वत्थामा, हनुमान की तरह परशुराम को भी चिरजीवी बताया गया है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस में भी यह उल्लेख है कि जब धनुष य़ज्ञ के समय राम ने शिव का धनुष तोड़ दिया गया तो परशुराम उन पर भी बहुत  क्रोधित हुए लेकिन बाद में वे बोले-राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥ देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥ जब संदेह मिट गया उसके बाद-कहि जय जय जय रघुकुल केतू। भृगुपति गये वनहिं तप हेतू। संदेह मिटने पर प्रभु राम से क्षमा मांग कर उन्हें प्रणाम कर परशुराम जी तपस्या करने वन को चले जाते हैं। मान्यता है कि तभी से वे महेंद्र गिरि पर्वत पर सूक्ष्म रूप से तपस्या में लीन हैं।

- महेंद्रगिरि पर्वत पर महाभारत काल के कई मंदिर मौजूद हैं, ऐसा कहा जाता है कि ये मंदिर पांडवों ने बनवाए थे।- यहां भीम, कुंती, युधिष्टिर के अलावा दारु ब्रह्म का मंदिर देखने मिलेंगे।  
 महाशिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

 

 

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