Sunday, February 12, 2012

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो

संदर्भ वैलेनटाइन डे या प्यार का व्यवसायीकरण
राजेश त्रिपाठी
आप अंग्रेजी,हिंदी या किसी क्षेत्रीय भाषा का अखबार उठाइए आपको उनमें वैलेनटाइन डे छाया मिलेगा। उनमें इससे संबंधित जितने फीचर नहीं होंगे, उनसे कहीं ज्यादा उन वस्तुओं के विज्ञापन होंगे जिनमें प्रेमी-प्रेमिकाओं को इस बात के लिए लुभाया-ललचाया जा रहा होगा कि इस विशेष दिन पर वे आपस में किस तरह के  और कैसे-कैसे वेशकीमती तोहफों का आदान-प्रदान कर अपने प्रेम को और प्रगाढ़ कर सकते हैं। कुछ इस तरह जैसे पैसे बिना प्यार फिजूल है। ऐसे प्यार को प्रोत्साहन, बढ़ावा जो दिल नहीं दौलत देखता हो। जबकि सच्चे प्यार का मतलब होता है एक-दूसरे के प्रति सच्चा और पूर्ण समर्पण। ऐसा समर्पण जहां दौलत नहीं दिल की भूमिका हो। दो दिल खामोशी से भावों का इजहार करें और दौलत जहां गौण हो। लेकिन वैलेनटाइन डे तो विशुद्ध बाजार बन गया है। कभी किसी शुभ और सच्चे उद्देश्य के लिए कोई संत जिंदगी गंवा बैठा और उसका बलिदान दिवस प्रेमियो का दिन बन गया, जिसमें धीरे-धीरे व्यावसायिकता घर कर गयी। आज यह करोड़ों-अरबों का व्यवसाय बन गया है। आजकल तो प्रेमी-प्रेमिका ऐसा हैसियत दिखाने और होड़ में भी कर रहे हैं। कौन प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे को महंगा से महंगा तोहफा दे सकते हैं इसकी प्रतिस्पर्धा सी होने लगी है। यानी प्रेम गौण हो गया पैसा प्रमुख जो लोगों को बौरा रहा है और दिग्भ्रमित कर रहा है। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा कि प्यार के इजहार के लिए महज दो मीठे शब्द ही काफी हैं। हम तो यही कहेंगे कि प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो।
      आइए जरा अतीत की ओर लौटें और जानें की प्रेम को प्रतिष्ठा व महत्व देने वाला यह दिन क्यों और कैसे शुरू हुआ। कहते हैं कि कोई रोमन संत थे वैलेनटाइन जो प्रेमी-प्रेमिकाओं की शादी चोरी-छिपे कराते थे। कारण यह था कि वहां का राजा क्लाडियस द्वितीय चाहता था कि उसके राज्य के विश्वसनीय युवक कुंआरे ही रहें ताकि सिर्फ और सिर्फ उसके और उसकी सेना के प्रति वफादार रहें। वैलेनटाइन का कहना कि प्यार ईश्वर का वरदान है और उस पर किसी तरह का प्रतिबंध या बंदिश नहीं होनी चाहिए। राजा क्लाडियस ने संत को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन संत प्यार को पूजा मानते थे और प्रेमी युगलों की शादी कराने को पुण्य और वह अपने इस अभियान मे अड़िग रहे। राजा ने लाख समझाया लेकिन संत नहीं माने तो राजा की आज्ञा की अवहेलना कर प्रेमियों का विवाह कराते रहने के अपराध में राजा ने वैलेनटाइन को मौत की सजा सुना दी। वह 14 फरवरी का ही दिन था जिस दिन राजा की आज्ञा से संत वैलेनटाइन का सिर धड़ से अलग कर दिया गया। बस उसके बाद से ही प्रेमी-प्रेमिका प्रेम को प्रतिष्ठा दिलाने वाले इस संत के मृत्यु दिवस को उनकी याद में वैलेनटाइन डे के रूप में मनाने लगे। जिसमें पहले प्रेम ही प्रधान था पैसा नहीं। लेकिन ऐसा देर तक नहीं चल सका। हर भाव व भावना को बाजार बना देने, पैसे को ही दुनिया का भगवान और सब कुछ मानने वाले व्यवसायियों ने प्यार के अहसास और प्रणय निवेदन को भी पैसों में तौलना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इसका व्यवसायीकरण बढ़ता गया। कई उत्पाद तो वैलेनटाइन दिन को सोच कर बनाये और विज्ञापित किये जाने लगे। व्यवसाय का सिर्फ एक ही उद्देश्य होता है पैसा और पैसा। इसलिए यह हर चीज, हर पक्ष को व्यवसाय के नजरिये से देखता है। हमें इस पर कोई एतराज नहीं कि जिसके पास दौलत है अगर वह चाहे तो उसे पानी तरह बहाये, जब जैसा चाहे उड़ाये लेकिन कम से कम मन से जुड़ी कोमल और पवित्र भावनाओं को तो दौलत के इस प्रदर्शन और दलदल से मुक्त रखा जाये। यह वह कोमल और पवित्र एहसास है जिसे दौलत का दंभ भरा प्रदर्शन कुत्सित, कलुषित और अपवित्र कर देता है। यह वैलेनटाइन डे का ही प्रभाव है कि दो-दो रुपयों में मारा-मारा फिरने वाला गुलाब का टहनी से जुड़ा एक फूल 20-25 रुपये और कहीं-कहीं उससे भी अधिक दाम पाकर इतराता फिरता है। प्यार के इजहार के लिए प्रेमी-प्रेमिका की एक मीठी मुसकान, हाथों का पुलकित कर देने वाला स्पर्श ही काफी है जो मन के अंतर के तारों को झंकृत कर देता है और पोर-पोर में पुलकन भर देता है। इसके आगे लाखों-करोड़ों के तोहफे गौण हो जाते हैं, पानी भरते नजर आते हैं। पैसा या तोहफा शाश्वत या दीर्घस्थायी नहीं। पैसे से खरीदी कोई वस्तु खत्म हो सकती है लेकिन आपके दिल से कहे गये मीठे बोल हमेशा के लिए उसके मन में मीठी बांसुरी से बजते रहेंगे जिसे आप चाहते हैं। प्रेम के इस दिवस को मनाने में जब से पैसा की भूमिका प्रमुख हुई तब से प्रेमी-प्रेमिकाओं को इस दिन का बड़ी शिद्दत से इंतजार रहने लगा है। उन्हें उन तोहफों की प्रतीक्षा और ललक रहती है जो उनके प्रेमी उनको देंगे यानी प्रेम में घुल गया लोभ और स्वार्थ का रंग। रंग ऐसा जो पैसे पर आधारित हो, पैसा बंद तो प्रेम का यह रंग उड़ते भी देर नहीं लगेगी।
      हम वैलेनटाइन डे का विरोध नहीं कर रहे वैसे यह भी सच है कि प्रेम को प्रतिष्ठा दिलाने और उसे महत्वपूर्ण मानने वाले महान लोगों की हमारे भारत में भी कमी नहीं रही। अगर हम यह कहें कि भारत वह भूमि है जहां कभी सिर्फ और सिर्फ प्रेम की धारा बहती थी। यह प्रेम कहीं प्रभु के प्रति था, कहीं अपने जनक के प्रति तो कहीं अपनी प्रेमिका के प्रति। प्रेम पर बलिदान होने वालों की अगनित कहानियां हमारे भारत से जुड़ी हैं। इनमें कहीं पैसा की भूमिका नहीं रही। अगर अतीत में काफी पीछे जायें तो राधा-कृष्ण का अमर प्रेम भारत भूमि में ही नजर आता है। गिरधर गोपाल की प्रेमरस में डूबी अनन्य भक्त मीरा भी इसी देश की थीं। पिता-माता के प्रेम को समर्पित श्रवण कुमार की प्रेरणादायक कथा भी भारत की है। ऐसी अनेक सात्विक और सच्चे प्रेम की प्रेरणादायक कथाएं भारत में मिल जायेंगी जहां धन की कोई भूमिका नहीं थी। अगर कुछ था तो श्रद्धा और निस्वार्थ समर्पण भाव। सच्चा प्रेम धन नहीं दिल के भावों और प्रेम को देखता है। दरअसल प्रेम के बीच जहां भी पैसा आता है, वहीं स्वार्थ और लोभ उसमें घर कर जाता है। जब तक तोहफे मिल रहते रहे तब तक प्रेम का प्रदर्शन (इसे प्रदर्शन ही कहेंगे जो पैसे पर टिका हो क्योंकि ऐसा प्रेम स्थाई नहीं होता जिसमें दिल के बजाय दौलत की भूमिका हो) चलता है। जब तोहफे बंद, पैसों की बारिश सूखी तो दिल में बहता प्रेम का दरिया भी सूख जायेगा। यानी इस तरह के प्रेम की उमर लंबी नहीं होती, यह प्रेमी की जेब पर टिकी होती है। ऐसे में इसे वैलेनटाइन क्या दुनिया का कोई भी संत नहीं बचा सकता। वैलेनटाइन ने जिस प्रेम को प्रोत्साहित किया वहां दिलों के बीच पनपते पावन एहसास अहम थे न कि जागतिक धन-दौलत। वैसा प्यार पवित्र और अदम्य होता है लेकिन आज हमारे यहां क्या हो रहा है। हम यह पूरे यकीन के साथ कह और लिख रहे हैं कि आज पैसे पर टिके प्यार के चलते कई अबोध और जमाने के ऊंच-नीच से अनजान युवतियों ठगी जाती हैं। कई प्रेमी ऐसे निकलते हैं कि वे कुछ दिन पैसा लुटा युवतियों की भावनाओं से खेलते हैं और एक दिन उन्हें ठुकरा कर किसी नयी की तलाश में निकल पड़ते हैं। ऐसा तब कभी नहीं होता अगर यह प्यार पैसा नहीं दिल के सच्चे एहसास पर आधारित होता। तब दो दिल एक-दूसरे से जुदा होने पर तड़पते लेकिन यहां तो पैसा प्रमुख है और आज तो लोगों में यह भाव घर कर गया है कि पैसे से कुछ भी खरीदा जा सकता है, यहां तक कि प्यार भी। ऐसे में क्या संत वैलेनटाइन और क्या कोई और प्रेम को प्रतिष्ठा कैसे दिला सकेंगे।
      हम तो बस यही कहना चाहते हैं कि किसी से भी प्यार करो तो दिल की गहराइयों से करो और भगवान के लिए निभाओ क्योंकि  दिल टूटने से बड़ा कोई दर्द नहीं होता और इससे बड़ा कोई पाप नहीं होता। किसी का कोई भला न कर सकें न करें लेकिन भगवान के लिए किसी का दिल न दुखायें। हमारे यहां के बड़े-बड़े संत और मनीषियों ने भी यही कहा है कि सबको प्रेम दो, किसी का दिल कभी न दुखाओ। संत वैलेनटाइन ने भी इसी उद्देश्य से प्रेमी-प्रेमिकाओं की मदद शुरू की होगी। उनके उस सत्प्रयास को आज व्यवसाय में बदल दिया गया है।
      प्रेम के इस पर्व को व्यवसाय बना देने के हम विरोधी हैं लेकिन इसके साथ ही हम उनके भी विरोधी हैं जो प्रेमी-प्रेमिका को ऐसा करने से रोकते हैं। हम आजाद देश के निवासी हैं जहां हर दिल स्वतंत्र है, यहां कहने, लिखने की आजादी (जिसके लिए हम खुद को खुशनसीब मानते हैं) है, यहां मन आजाद है, विचार आजाद हैं, हर एक को अपने ढंग से जीने की आजादी है। उन्हें वैसा करने दें, तब तक न रोकें जब तक ऐसा करने से समाज की कोई क्षति न होती हो। क्योंकि ऐसा करना किसी की आजादी में हस्तक्षेप है। उनकी जिंदगी है, वे जैसा चाहें जिएं, अगर वे कोई गलत कदम उठा रहे हैं तो विनम्रता से एक बार उन्हें आगाह कर दें, माने तो अच्छा न माने तो जैसी हरि इच्छा, उन्हें कल जब ठोकर लगेगी तो अपने आप चेत जायेंगे।
      शायद संत वैलेनटाइन ने भी यह न सोचा होगा कि एक राजा की हठधर्मिता के खिलाफ उन्होंने प्रेमी-प्रेमिकाओं को सम्मान और प्रतिष्ठा की जिंदगी जीने में मदद का जो महत कार्य वे कर रहे हैं, वह सदियों बाद व्यवसाय का जरिया बन जायेगा। प्यार कीजिए, तहेदिल से कीजिए। किसी की जिंदगी संवार सकें तो जरूर संवारिए लेकिन भगवान के लिए इसे पैसे से न तोलिए। प्यार पैसे से नहीं तोला जाता। यह दिल का वह पुनीत एहसास है जिसे दिल की गहराइयों से ही महसूस किया जाता है। सच्चा प्यार किसी की भी जिंदगी बदल सकता है। इस संदर्भ में फिल्म खामोशी का गीत याद आता है- हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू (ये अलग बात है कि क्या कभी आंखों में भी कोई खुशबू महकती है, संभव है कवि भावातिरेक में यह लिखा गया हो लेकिन सुनने में ये पंक्तियां अच्छी लगती हैं।) प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो। हम भी यही चाहते हैं कि बराये मेहरबानी प्यार को प्यार ही रहने दीजिए और इसे किसी और रूप में न देखिए और न ढालिए। एक बात और प्यार का साल में एक दिन ही क्यों हो? क्या हम जिंदगी के हर दिन को प्यार का दिन नहीं मान सकते ? हर दिन जब प्यार का दिन होगा तो हर प्रेमी का दिन सुंदर और सार्थक हो जायेगा। यह प्यार प्रेमी-प्रेमिका तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, माता-पिता और अपने बड़ों तक भी होना चाहिए इसका विस्तार। वैसे समाज का एक तबका तो आज बड़े-बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में डालने लगा है। मेहरबानी कर के उन लोगों के साथ ऐसा सुलूक न कीजिए जिनकी वजह से आप वो हैं जो आज हैं। उन्हें जिंदगी के आखिरी क्षणों तक भरपूर प्यार दीजिए ताकि वे जमाने के दर्द-गम भूल कर अपने आखिरी क्षण खुशी से जी सकें। उन्हें बच्चों से घुलने-मिलने दीजिए, अपने सुख-दुख उनसे बांटिए ताकि वे यह समझ सकेंगे कि जिंदगी के अवसान के क्षणों में भी वे महत्वपूर्ण हैं, परिवार और समाज को उनकी जरूरत है। वे अप्रासंगिक नहीं हुए बल्कि अपने जीवनानुभवों से अपने परिवार और समाज के पथ प्रदर्शक बने हुए हैं। शायद संत वैलेनटाइन ने जिस प्रेम की पूजा की उसमें इन बुजुर्गों के प्रति प्रेम के भाव भी अंतर्निहित रहे होंगे। आज ऐसे प्यार की समाज को बड़ी जरूरत है।  ईश्वर करे ऐसा हो और धरती से तनाव, दुराव और अलगाव का दुख मिट जाये। सबको सच्चा प्यार और महत्व मिले। हम ऐसे वक्त की कामना करते हैं, क्या आप नहीं करते?

Thursday, January 26, 2012

गांधीवाद से थप्पड़ पर क्यों उतर आये अन्ना?

-राजेश त्रिपाठी

अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी गयी मुहिम का पूरे देश ने जी जान से साथ दिया था। लोगों को लगा था जैसे भ्रष्टाचार के बढ़ते घटाटोप से उन्हें मुक्त कराने कोई मसीहा आ गया है। उनकी बातें लोगों को इसलिए भी भायीं क्योंकि उन्होंने अपने आंदोलन के लिए महात्मा गांधी का अहिंसा का मार्ग चुना था। अन्ना की एक पुकार पर देश के युवा, वृद्ध सब जैसे उनकी राह पर चल पढ़े। दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ जैसे पूरा देश उमड़ पड़ा लेकिन इस आंदोलन का जो हस्र  होना था, वही हुआ। अन्ना को पता नहीं क्यों इस बात का अहसास नहीं हुआ कि राजनेता इतने घाघ और चतुर होते हैं कि वे बड़े-बड़ों को आसानी से सलटा देते हैं। उन्होंने अन्ना को भी एक तरह से निपटा दिया। उन्हें दिलासा दिया की वे उनका ही जन लोकपाल लायेंगे और उसके बात उन्हें धता बता अपने मन मुआफिक विधेयक पेश कर दिया। उनके आंदोलन के समर्थन में अनेक दलों के नेता उनके मंच पर बैठे और उन्हें दिलासा दिया कि वे उनके जन लोकपाल के साथ  हैं लेकिन संसद में उन्होंने ही उसका जम कर विरोध किया। ऐसे में जन लोकपाल का वही हस्र हुआ जो होना था। इससे लगता है कि अन्ना का धीरज टूट गया तभी तो वे गांधीवादी तरीके की बात छोड़ थप्पड़ मारने की बात पर उतर आये हैं। उन्होंने कहा है कि भ्रष्टाचारियों से निपटने का एक ही तरीका है कि उन्हें थप्पड़ मारो। कहते हैं कि अन्ना ने यह टिप्पणी फिल्म ‘गली गली में चोर है’ देखने के बाद की। इस फिल्म में एक दृश्य है जब आम आदमी की भूमिका निभा रहा कलाकार एक अधिकारी के थप्पड़ मारता है और कहता है-‘यह है सिस्टम के गाल पर आम आदमी का थप्पड़।’ कहते हैं कि अन्ना को यह देख कर उत्साह आया और उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति भ्रष्टाचार सहने की शक्ति खत्म हो जाती है तो उसके पास थप्पड़ के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं बचता। अगर भ्रष्टाचारी को थप्पड़ जमा दिया जाये तो उसका दिमाग सही हो जायेगा। बस अन्ना के इस आह्वान से तूफान खड़ा हो गया। इस गांधीवादी नेता के रुख में बदलाव से वे सारे दल उनके खिलाफ मुखर हो गये जो कभी उनकी मुहिम के पक्ष में खड़े थे। सबको गांधीवादी समाजसेवी का यह बदलाव अखर गया। कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह अन्ना और उनकी टीम पर शब्दों को तीर छोड़ने का कोई मौका नहीं खोना चाहते। उन्हें अच्छा मौका मिल गया। उन्होंने कहा-उनका हिंसक बयान संघ की उनकी संगत का नतीजा है। इस बयान के बाद मेरे मन में उनके प्रति जो सम्मान था, वह घटा है। मैं उन्हें एक गांधीवादी के तौर पर देखता हूं लेकिन वह जिस तरह से हिंसा की बातें कर रहे हैं, उससे उनका सम्मान कम हुआ है। भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन ने कहा थप्पड़ के इस्तेमाल की कोई जरूरत नहीं। भ्रष्टाचार के लिए वोट का थप्पड़ ही काफी है। समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने कहा कि-अन्ना अपने रास्ते से भटक गये हैं। अन्ना थप्पड़ की बात कर रहे हैं ,उनकी टीम के बाकी लोग गोली की बत करेंगे। जब टीम का कमांडर ही हिंसा की बात करेगा तो उसकी टीम इससे बढ़ कर काम करेगी ही।
इस तरह से देखें तो अन्ना ने अपने ताजा बयान ने अपने विरोधियों की संख्या बढ़ा ली है। यह उनके उद्देश्य और आंदोलन दोनों के लिए अच्छा नहीं है। अन्ना राजनेताओं और दलों से बहुत उम्मीद लगाये बैठे थे। उन्होंने जब पैंतरा बदल दिया तो अन्ना को धक्का लगा। उन्होंने कहा कि उन्हें जन लोकपाल के बारे में धोखा दिया गया है। अन्ना को कम से कम नेताओं की पल-पल बदलती मंसा से यह अहसास हो जाना चाहिए था कि उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। अहिंसा से थप्पड़ पर उतरना उनकी निराशा और हताशा को दरसाता है। उनका यह बदलाव सुखद तो नहीं कहा जा सकता।  
 अन्ना को यह समझना चाहिए था कि वे जिस जन लोकपाल की बात कर रहे हैं उसे वे उनसे ही पास कराना चाहते हैं जिससे (अगर यह विधेयक सशक्त रूप में आ गया) कभी-कदा उनकी भी गरदन फंस सकती है। वे भला अपने लिए मुसीबत क्यों खड़ी करने लगे। दरअसल भ्रष्टाचार आज एक आम बात हो गयी। संत्री से लेकर मंत्री तक इसका दायरा फैल चुका है। एक तरह से यह एक दस्तूर बन चुका है जिसे सबने सहजता से स्वीकार लिया है क्योंकि अक्सर हर काम के लिए आज घूस देनी पड़ती है। भ्रष्टाचार से अगर लड़ना है तो इसकी जड़ों पर प्रहार करना पड़ेगा। ऐसा समाज बनाना पड़ेगा जो हर स्तर पर भ्रष्टाचार ले लड़ने का व्रत ले। जहां तक कानून का सवाल है तो आज हमारे पास जो कानून है वही सही ढंग से काम कर पाये तो हर अपराध को समूल नष्ट किया जा सकता है। लेकिन वह सही ढंग से कहां काम कर पाता है। सभी को पता है कि इसमें कई तरफ से कई तरह के दबाव आते हैं। अगर न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से काम कर पाये तो भ्रष्टाचार जैसी कई बुराइयों से यह कारगर तरीके से निपट सकती है।
 अन्ना का अपना आंदोलन इस तरह औंधे मुंह गिरेगा किसी को यकीन नहीं था। खुद इस ब्लागर ने इस आंदोलन से जरूरत से ज्यादा उम्मीद बांध रखी थी और इसके पक्ष में तल्ख से तल्ख अंदाज में लिखा लेकिन आंदोलन की जो परिणति हुई उसने बहुत दुख दिया। अन्ना को इस ब्लागर ने बार-बार सलाह दी कि वे अगर संसदीय प्रणाली में बदलाव चाहते हैं, भ्रष्ट तंत्र से निपटना चाहते हैं तो उनकी संसद में हिस्सेदारी आवश्यक है। आप अगर तैरना सीखना चाहते हैं तो आपको पानी में उतरना ही होगा। अन्ना किनारे पर खड़े रह कर ही तैरना सीखना चाहते हैं जो असंभव ही नहीं, नामुमकिन है। उनके आंदोलन में देश साथ दे रहा था, ऐसे में देश भर से ईमानदार और सच्चे लोगों को खोजना मुश्किल नहीं था जो संसद और विधानसभा के चुनावों में उनके दल के उम्मीदवार बनते और संसद व विधानसभाओं में उनकी बड़ी संख्या में भागीदारी होती। अगर ऐसा होता तो किसी भी विधेयक को पास कराने में उन्हें दिक्कत नहीं होती। अगर आपको कोई लड़ाई जीतनी है तो इसके लिए जरूरी है कि आपकी उसमें सक्रिय हिस्सेदारी हो, आप दूर रह कर युद्ध जीत नहीं सकते। अगर व्यवस्था बदलनी है तो आपको उसका हिस्सा बनना पड़ेगा। माना कि राजनीति से नीति गौण हो चली है लेकिन इसकी पुनर्प्रतिष्ठा के लिए अन्ना जैसे ईमानदार और सच्चे लोगों के समानधर्मी समर्थकों का प्रवेश इसमें अत्यावश्यक है। राजनीति को अछूत क्यों मान रहे हैं अन्ना? इसे सुधारना है तो अपनी नीतियों पर चलनेवाले लोगों को वे संसद और विधानसभाओं में लाने से सकुचाते क्यों हैं। अन्ना को अपने आंदोलन का हस्र अपने अनशन के दूसरे दौर में ही पता चल गया होगा जहां लोगों की भीड़ पहले के आंदोलन से पतली हो गयी थी। इससे यह जाहिर होता है कि जनता भी शायद उनके तरीके से ऊब गयी है। वह भी परिणाम चाहती है जो शायद इस तरीके से आना आसान नहीं। अभी भी मौका था पांच राज्यों के चुनावों में अगर अन्ना के समर्थक खड़े होते तो जनता के प्रति उनके रुख का पता चल जाता और संसद व विधानसभाओं में अन्ना के लोगों की पैठ का रास्ता भी खुल जाता।
 अन्ना के समर्थकों से भी यह अपील है कि उनकी तपस्या और शरीर को कष्ट पहुंचा कर एक सशक्त जनांदोलन की हवा को बेकार न जाने दें। यह आंदोलन चलता रहना चाहिए और इसे उसी परिणति तक पहुंचाना चाहिए जहां तक देश और उसकी जनता चाहती है। जब जनता साथ है तो फिर अन्ना को मंत्रियों का मुंह क्या देखना । अगर वे जनतांत्रिक प्रणाली में विश्वास रखते हुए चुनाव को अपना अस्त्र बनायें तो उनकी सफलता अवश्यंभावी है। हां किसी भी दल के खिलाफ चुनाव प्रचार करना उनके उद्देश्य को कामयाब बनाने के बजाय उनके दुश्मनों की संख्या ही बढ़ायेगा जो शायद उनका भी काम्य नहीं है। अन्ना और उनके समर्थकों से यही अपील है कि वक्त की नजाकत को समझें और उसके मुताबिक कदम उठायें। गांधी के देश में हिंसा के पथ पर चलने की सलाह तो कतई न दें, उनका यह दांव उलटा पड़ सकता है। वैसे भी उनके टीम के लोगों के विरुद्ध तरह-तरह से प्रचार किया जा रहा है और उन पर हमले भी हो रहे हैं। यह सही नहीं है। हम अन्ना तो हर हाल में विजयी देखना चाहते हैं और चाहते हैं कि वे इसके लिए अपने सद्प्रयास चतुराई से करें।