http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग

Tuesday, March 27, 2018

कहानी



पड़िए गर बीमार...

राजेश त्रिपाठी

 
नरेंद्र ने नर्सिंग होम के अपने बेड में आंखें खोलीं तो अपने सामने पत्नी आराधना, बेटे सूरज और चंद्रभान को पाया। दोनों बेटे नरेंद्र के साथ आपरेशन थियेटर तक गये थे वे  भी बहुत चिंतित थे कि डाक्टर ने जिस आपरेशन को आधा घंटे में पूरा होने की बात की थी वह सवा घंटे तक क्यों खिंच गया।    आपरेशन के पहले दिये गये एनीस्थीसया के चलते नरेंद्र बेहोशी से पूरी तरह उबर नहीं पाया था लेकिन अपनों को देख और उनकी बातें सुन पा रहा था। एनीस्थीसिया के चलते उसके पूरे शरीर में एक अजीब-सी कंपन लगातार हो रही थी।    उसने सामने खड़े बेटे सूरज से पूछा-बेटे डाक्टर कुमार कहां हैं?’
    बेटा उत्तर देता इससे पहले नरेंद्र के बेड के सिरहाने खड़े डाक्टर कुमार ने उत्तर दिया-नरेंद्र जी, मैं यहां हूं। आपका आपरेशन सफल रहा। चिंता की कोई बात नहीं पर मुझे बहुत टाइम लगा। दरअसल पहले जो आपका इलाज हुआ, वह गलत था। उसके चलते आपका केस बहुत जटिल हो गया था।
नरेंद्र-वो कैसे डाक्टर साहब।
डाक्टर- दरअसल ज्यादा एंटीबायटिक देने से केस बिगड़ गया। आपके गालब्लैडर में स्टोन तो था ही इसमें इन्फेक्शन भी था जो सेप्टिक हो गया था। एंटीबायटिक लेने की वजह से उसका पस (मवाद) आसपास जम कर सूख गया और बेहद कड़ा हो गया। मैं जब स्टोन निकालने की कोशिश कर रहा था तो पहले मुझे गाल ब्लैडर के ऊपर से सूखे पस को खुरचने में पसीना छूट गया। एक क्षण तो ऐसा आया कि मैंने सोचा कि लैपोस्क्रोपिक सर्जरी से काम नहीं चल रहा, क्या करें एबडामेन ओपन कर दें। फिर लगा कि यह काम तो बेहद रिस्की हो सकता है। किसी तरह से मैं यह इरादा छोड़ सूखे पस को खुरच कर निकालता रहा। इसके चलते आधा घंटे का आपरेशन सवा घंटे तक चला।
    यह सुन कर नरेंद्र के साथ-साथ उसके दोनो बेटे और पत्नी भी सन्न रह गये। उन्हें यह सोच कर दुख हो रहा था कि अगर वे तभी डाक्टर कुमार से मिल लिये होते जब नरेंद्र को पहली बार बेचैनी भरा पेट दर्द हुआ था, तो शायद इतनी परेशानी नहीं होती। पर करते तो क्या करते नरेंद्र की स्थिति ऐसी थी कि बिना किसी बिलंब के उसे उन लोगों ने तत्काल नर्सिंग होम में भर्ती करना ही उचित समझा था। वहां उसका दुर्भाग्य कि वह डाक्टर राय जैसे दलाल के हाथ लग गया।*डाक्टर कुमार की बातें देर तक नरेंद्र के दिमाग में हैमर की तरह धमकती रहीं। वह बार-बार उस दिन को कोस रहा था जब वह डाक्टर राय के पल्ले पड़ गया था जो इसी नर्सिंगहोम के गैस्ट्रोलोजी विभाग से जुड़े थे। अपने विजिटंग कार्ड में उन्होंने खुद को गैस्ट्रो सर्जन के रूप में विज्ञापित कर रखा था पर पता नहीं वे क्या थे। इतना पता जरूर है कि रोगी को आतंकित करने में वे उस्ताद थे।
उसे याद है लगातार होनेवाले पेट दर्द के इलाज के लिए जब पहली बार उसको डाक्टर राय के पास लाया गया तो उन्होंने आनन-फानन नरेंद्र का यूएसजी करा डाला। नरेंद्र बराबर कहता रहा कि पांच-छह दिन से उसे स्टूल नहीं हुआ ऐसे में क्या यूएसजी क्लियर आयेगा।डाक्टर राय कुटिल हंसी हंसते हुए बोले-डाक्टर मैं हूं ना, क्या सही है क्या गलत मैं देखूंगा। 
यूएसजी पर नजर दौड़ाते हुए उन्होंने कहा-स्थिति बहुत खराब है। आप आज ही नर्सिंग होम में भर्ती हो जाइए।
नरेंद्र जिसे दामाद महेश नर्सिंग होम ले गये थे उनकी बात सुन कर घबरा गया।डाक्टर राय ने उसे खामोश खड़े देख कहा-चिंता की कोई बात नहीं। मैं सब संभाल लूंगा।
डाक्टर राय कुछ ऐसी आत्मीयता दिखा रहे थे जैसे दुनिया में उनसे भला, उनसे मददगार कोई और नहीं होगा।नरेंद्र थोड़ी देर तक खामोश रहा फिर बोला-मेरा आज ही नर्सिंगहोम में भर्ती होना संभव नहीं है। घर जाता हूं बेटे से सलाह-मशविरा करना होगा। मेडिक्लेम उसके ही नाम है। उसके लिए उससे बात करनी जरूरी है।
नरेंद्र ने देखा कि मेडिक्लेम शब्द सुनते ही डाक्टर राय के चेहरे पर एक अनोखी सी चमक और होंठों पर कुटिल मुसकान फैल गयी। वह समझ नहीं पाया कि उनकी इस खुशी का कारण क्या है। नरेंद्र के चैंबर छोड़ते-छोड़ते भी वे यही रट लगाये रहे की- आज ही भरती हो जाते तो अच्छा होता।
घर लौट कर नरेंद्र ने बड़े बेटे सूरज से सारी बात बतायी यह भी की डाक्टर ने तत्काल नर्सिंगहोम में भर्ती होने को कहा है।सूरज बोला-पापा, डाक्टर ने कहा है ठीक है पर मुझे मेडिक्लेम से पता करना होगा कि कैसे क्या करना होगा। मैं कल ही पता कर लेता हूं।
अगले ही दिन बेटे सूरज, चंद्रभान और दामाद महेश नरेंद्र को लेकर नर्सिंगहोम पहुंचे। नरेंद्र को दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू हो गयी।बेटे सूरज ने नर्सिंगहोम की मेडिक्लेम डेस्क की इनचार्ज लड़की से पूछा-आपके यहां पैकेज सिस्टम है क्या?’
वह लड़की बोली-आप रोगी को आज भर्ती कर रहे हैं, अगर तत्काल उनका आपरेशन नहीं हुआ और इलाज लंबा खिंचा तो पैकेज सिस्टम करने से कोई फायदा नहीं। अगर पैकेज किया गया तो उससे ज्यादा मेडिक्लेम आप नहीं पायेंगे और बाद का बिल आपको खुद चुकाना पड़ेगा। इसलिए मेरी सलाह है कि आप पैकेज में मत जाइए।
सूरज ने उसकी बात मान ली। पापा को भर्ती तो करना ही था । नरेंद्र नर्सिंगहोम में भर्ती हो गया। बेटे ने उसे विभिन्न रोगों से पीड़ित मरीजों के साथ जनरल वार्ड में रखने के बजाय एक केविन में भर्ती कर दिया। नरेंद्र के घर के कपड़े उतार दिये गये। उसे नर्सिंगहोम के कपड़े पहना दिये गये। कलाई में एक बैंड लगा दी गयी जिसमें मरीज का नाम, उम्र, भर्ती होने की तारीख आदि लिखी थी। अब वह अस्पताल के उस बेड पर था जिसे आवश्यकता अनुसार ऊपर-नीचे किया जा सकता था। नरेंद्र की भर्ती प्रकिया पूरी होते-होते शाम हो गयी थी। दोनो बेटे, दामाद वापस लौटने को ही थे कि डाक्टर राय वहां आ धमके। उनके चेहरे पर वही कुटिल मुसकान थी।नरेंद्र के साथ गये लोगों में से किसी ने पूछा-डाक्टर साहब आपरेशन किस दिन करेंगे?’
डाक्टर यह सुनते ही गंभीर हो गये। उनके होंठों की मुसकान जाने कहां गायब हो गयी। वह बोले-अभी आपरेशन का मतलब है मरीज तो जायेगा ही, डाक्टर भी जायेगा।
यह सुनते ही नरेंद्र का कलेजा मुंह को आने को हुआ। बेटे कुछ बोलें इससे पहले ही नरेंद्र बोल उठा-नहीं, नहीं डाक्टर साहब। मुझे कोई जल्दी नहीं। आप पर भरोसा है, आप जो सही समझें वैसा ही करें। आप जो इलाज करना चाहें कीजिए। अब मुझे आप पर ही भरोसा है। आपको सभी निर्णय लेने का हक है।
डाक्टर राय को लगा कि उनका डराना काम आया और मरीज उनकी मुट्ठी में आ गया है। वे यही तो चाहते थे। उनके चेहरे पर कुटिल मुसकान की वापसी हुई और उन्होंने कहा-इनके गालब्लैडर में भयंकर इन्फेक्शन है पहले उसे दूर करना होगा, इनका दर्द ठीक करना होगा। आपरेशन की बात फिलहाल भूल जाइए। इसके अलावा ये डायबेटिक भी हैं। इनके शुगर पर भी नजर रखनी होगी।
इतना कह कर डाक्टर राय चले गये। नरेंद्र के परिवार वालों को भी लगा कि डाक्टर के निर्णय के खिलाफ जाने का कोई अर्थ ही नहीं अगर स्थिति इतनी खराब है। परिवार वाले लौट गये। नरेंद्र की कलाई में चैनल बनाया गया। उसे सलाइन चढ़ा दिया गया।उस रात नरेंद्र को ठीक से नींद नहीं आयी। जिंदगी में पहली बार वह किसी नर्सिंगहोम के बिस्तर पर था। सलाइन चढ़ा दी गयी थी इसलिए सिर्फ सीधा ही लेट पा रहा था। चैनल बनाते समय भी काफी कष्ट हुआ था। दर्द तो हुआ ही था काफी खून भी निकला था। ऐसा उसके साथ पहली बार हो रहा था। यह कष्ट देख कर वह ईश्वर से प्रार्थना करने लगा कि –हे प्रभु अपनों को ही नहीं दुश्मन को भी कभी नर्सिंगहोम या अस्पताल का मुंह ना दिखाना।राम-राम कह कर, किसी तरह रात कटी। हाथ में सलाइन लगे होने की वजह से वह करवट भी नहीं ले पाया। सीधे लेटे रह कर रात काटनी पड़ी। करवट लेने पर डर था कि कहीं सलाइन खिंच ना जाये और तकलीफ बढ़ जाये। रात को कई बार उसकी अधकचरी नींद इसलिए भी खुल गयी कि सिस्टर आती और सलाइन की बोतल बदलती रही थीं। डाक्टर राय ने जैसे अभूतपूर्व सदाशयता दिखाते हुए उसे मोबाइल साथ रखने की इजाजत दे दी थी। उसने देखा सुबह के पांच बजे थे।अकेले केबिन में नरेंद्र को डर ना लगे इसलिए बेटे सूरज ने सिस्टर को कह दिया था कि केबिन का दरवाजा खुला रखें। ऐसे में सामने के हाल और नर्सिंग कार्नर में चहल-पहल देख कर पापा को अकेलापन महसूस नहीं होगा।अभी वह मोबाइल देख ही रहा था कि सिस्टर वहां आ धमकी। उसके हाथ में ब्लडप्रेसर नापने का यंत्र और एक छोटा-सा पाउच था। उसने पहले ब्लडप्रेसर देखा फिर उस पाउच से पेन जैसी एक चीज निकाली और मेरे हाथ को पकड़ कर उसकी एक उंगली में उस पेन को रख कर पेन की बटन नीचे की ओर दबायी हलकी-सी खच्च की आवाज और उंगली में चुभन एक साथ हुई। सिस्टर ने उंगली के सामने वाले हिस्से को दबाया और खून की एक बूंद उस पर उभर आयी। फिर एक छोटे से मोबाइल स्क्रीन जैसा एक यंत्र निकाल कर उस पर एक स्ट्रिप लगायी और ज्यों ही खून की बूंद का स्पर्श उससे कराया एक पिक की आवाज हुई और कुछ अंक स्क्रीन पर उभर आये।नरेंद्र ने सिस्टर से पूछा-यह क्या यंत्र है।
सिस्टर ने कहा-यह ग्लूकोमीटर है जिससे मैंने आपका ब्लड शुगर चेक किया है।
वह सिस्टर चली गयी तो दूसरी आयी जिसके हाथ में एक सीरिंज थी। उसने कलाई थामी और बोली-आपका ब्लड टेस्ट होगा। खून लेना है। नरेंद्र ने धीरे से सिर हिला कर स्वीकृति दे दी। फिर एक चुभन, फिर एक दर्द।दिन थोड़ा चढ़ा तो एक व्यक्ति ह्वील चेयर लेकर आ गया। बेड के पास आकर वह बोला-दादा चलिए आपका यूएसजी और एक्सरे होगा।
नरेंद्र नर्सिंग होम में अकेला था। वह डाक्टर राय और वहां की नर्सों और दूसरे लोगों का निर्देश चुप रह कर मानने को बाध्य था। गाल ब्लैडर की टीस और चुभन वाला दर्द उसे इतना सता रहा था कि वह उससे निजात पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार था।कुछ देर बाद ही नरेंद्र यूएसजी रूम के बिस्तर पर था और यूएसजी करनेवाला डाक्टर एक यंत्र में क्रीम लगा कर उसके पेट में उसे घुमा-घुमा कर भीतर के अंगों का मुआयना कर रहा था। वह स्क्रीन पर हर अंग को देखता और अपनी सहायक युवती को बताता जाता। कुछ चीजें नरेंद्र की समझ में आ रही थीं और कुछ नहीं। अचानक उस डाक्टर ने अपनी सहायक से कहा-अरे, गजब है, बहुत सीरियस मामला है। पेसेंट का तो पैंक्रियाज ही गायब है।
डाक्टर ने यह बात जरा जोर से कही। शायद डाक्टर राय के परामर्श से ही नरेंद्र को डराने के लिए यह बात कही गयी हो। नरेंद्र जानता है कि अच्छे डाक्टर या डायगोनिस्ट कोई गंभीर बात रोगी से साझा नहीं करते वे उसके साथ आये लोगों को अलग से बताते हैं। ऐसा इसलिए कि तकलीफ भोगनेवाला रोगी यह सुन कर कि उसका कोई महत्वपूर्ण अंग ही गायब है और नर्वस ना हो जाये। नरेंद्र के साथ ऐसा ही हुआ। डाक्टर की यह बात सुन कर नरेंद्र के हाथ-पैर ठंडे होने लगे। उसे लगा कि उसका केस बेहद गंभीर है। जो बीमारी गाल ब्लैडर स्टोन तक मानी गयी थी वह अकेली नहीं अब तो एक अंग ही शरीर से गायब बताया जाता है। उसके पास डाक्टर की बातें सुनने के अलावा और कोई चारा नहीं था।यूएसजी टेस्ट पूरा होने के बाद ह्वील चेयर में जब उसे वापस केबिन में लाया गया तब तक विजिटिंग टाइम शुरू हो चुका था और पत्नी आराधना आकर केबिन में बैठ गयी थी। नरेंद्र टेस्ट के बाद केबिन में लाया गया तब आराधना बहुत व्यग्र बैठी थी। वह यूएसजी टेस्ट का रिजल्ट जानना चाहती थी और नरेंद्र से उसने पूछा-आज यूएसजी टेस्ट में क्या निकला?'
नरेंद्र ने कुछ जवाब दिये बगैर हाथ के संकेत से उसे चुप रहने के कहा और अगले ही क्षण मोबाइल उठा कर एक नंबर घुमाया और फिर बोला-सूरज बेटे तुम हर हाल में आफिस से वापस लौटते वक्त नर्सिंग होम से होकर ही जाना।
पत्नी आराधना की चिंता अब और बढ़ गयी। नरेंद्र ने पहले उसे संकेत से खामोश रहने को कहा अब बड़े बेटे को बुला रहे हैं। जरूर कुछ गंभीर बात है। उसका चेहरा उतर गया।बेटे सूरज ने शायद जानना चाहा कि ऐसी क्या इमर्जेंसी आ गयी।नरेंद्र ने बेटे सूरज को उत्तर दिया –बेटे! अभी-अभी मुझे यूएसजी रूम से लाया गया है। यूएसजी करनेवाले डाक्टर बताया कि मेरा पैंक्रियाज नहीं दिख रहा,गायब है। ऐसा कहते वक्त डाक्टर का चेहरा उतर गया था। अब तुम सोचो कि ऐसे मरीज पर जो पहले से लगातार होने वाले दर्द से बेचैन है, आपरेशन के लिए भर्ती हुआ है उससे कहा जा रहा है कि उसके शरीर का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग ही गायब है। तुम ही बताओ कि यह सुन कर किसी पर क्या गुजरी होगी। मैं इतना तो जानता हूं कि पैंक्रियाज शरीर का महत्वपूर्ण अंग है और वह गायब है तो आदमी बात कैसे कर रहा है।
बेटे ने उधर से सांत्वना भरे शब्दों में समझाया कि वह आफिस से सीधे नर्सिंगहोम जायेगा और डाक्टर से बात करेगा।नरेंद्र ने कहा-बात नहीं करना, तुम यहां से मुझे कहीं और ले चलो। इस तरह रोज ये मुझे डरा कर मेरी बीमारी को और बढ़ा देंगे। मैं यहां ठीक होने आया हूं और ये मेरे नये-नये रोग निकालने लगे।
आराधना चुपचाप नरेंद्र की बातें सुन रही थी उसके चेहरे पर विस्मय और विषाद के चिन्ह साफ पढ़े जा सकते थे। उसकी आंखें छलछला आयी थीं। वह बोली-सूरज का इंतजार क्या करना आप कहें तो मैं डाक्टर से बात करूं और आपको आज ही छोड़ देने को कहूं।
नरेंद्र बोला-नहीं सूरज को आ जाने दो। वह सही ढंग से बात कर सकेगा और जरूरत पड़ी तो अच्छी तरह से निपट सकेगा। तुम किससे और कैसे बात करोगी। यह जरूर है कि यहां कुछ गड़बड़ है। डाक्टर का काम होता है मरीज का ढांढस बंधाना, उससे कहना कि जो कुछ भी परेशानी है ठीक हो जायेगी घबराने की जरूरत नहीं। समझदार डाक्टर अगर यह देखते हैं कि स्थिति सही नहीं तो पहले वे परिवार के लोगों को बताते हैं। मरीज को समझाना भी है तो सलीके से समझाते हैं। यहां तो यूएसजी वाले डाक्टर ने मुझे डराने  के लिए ही यह कहा।
आराधना बोली-अगर ऐसा है तो आज ही यहां से चलते हैं। इतने बड़े शहर में डाक्टरों और नर्सिंगहोम की कमी है क्या।
शाम को आफिस से लौटते वक्त बेटा सूरज सीधे नर्सिंगहोम आया और आते ही नरेंद्र के केबिन में चला गया। आराधना वहां पहले से ही परेशान,उदास बैठी थी। नरेंद्र ने सूरज से यूएसजी का सारा किस्सा सुना दिया कि किस तरह से उससे कहा जा रहा है कि उसका महत्वपूर्ण अंग पैंक्रियाज ही गायब है। क्या पता कल ये किसी और अंग को गायब बता दें।पिता से यह बात सुनते ही सूरज सीधे डाक्टर राय को तलाशने लगा। डाक्टर राय सुबह से लेकर रात साढ़े बारह तक नर्सिंग होम में ही डटे रहते थे। उनके इस समर्पण-भाव का भेद बाद में खुला।कुछ देर में ही डाक्टर राय नर्स से गप्प लगाते मिल गये। सूरज ने तपाक से पूछा-क्या बात है राय साहब आप हमारे पापा को इस तरह डरा क्यों रहे हैं। आपके यूएसजी के डाक्टर ने यह क्यों कहा कि इनका पैक्रियाज गायब है। आपको पता है कि एक रोगी को जो पहले से परेशान है, इस तरह शॉक ट्रीटमेंट देना कितना घातक हो सकता है। उन्हें यहां ट्रीटमेंट के लिए भर्ती किया गया है।
डाक्टर राय ने हंसते हुए कहा-अरे नरेंद्र जी ने यूएसजी वाले डाक्टर से दोस्ती कर ली इसलिए उन्होंने दोस्ती में यह बात बता दी होगी।
सूरज- क्या मजाक करते हैं डाक्टर राय। यह दोस्ती की बात हुई या दुश्मनी की। मैं तो अपने पापा को आज ही डिस्चार्ज कर के ले जाने की बात सोच कर आया था लेकिन मैं आपको एक मौका और देता हूं सही ढंग से इलाज कीजिए।
सूरज वापस केबिन में आकर पापा से बोला-डाक्टर राय का कहना है कि यूएसजी वाले डाक्टर से आपने जान-पहचान कर ली है इसलिए उन्होंने आपको ऐसा बताया है। खैर देखते हैं कुछ दिन अगर सही नहीं लगा तो यहां से ले चलेंगे।
इसके बाद उसने मां आराधना की ओर मुड़ते हुए कहा-थोड़ा कष्ट सह कर तुम यहां रह लो वरना पापा बहुत घबरा जायेंगे। आराधना ने कहा –मैंने भी तो यही सोच रखा था। यहां किसी को रहना ही होगा वरना पता नहीं ये क्या-क्या टेस्ट कर के पैसा बढ़ाते रहेंगे।
इसके बाद सूरज वहां से चला गया।जब से नरेंद्र ने पैंक्रियाज गायब होने की बात सुनी चिंता से वह परेशान था। सलाइन चढ़े होने के कारण वैसे भी वह केवल सीधे ही लेट सकता था करवट लेना तक मुहाल था। रात में कई बार सिस्टर आयी कभी सलाइन बदलने कभी शुगर और ब्लडप्रेसर चेक करने।*सुबह होते ही दो व्यक्ति ह्वील चेयर लेकर हाजिर हो गये। नरेंद्र कुछ समझ पाता इससे पहले वे बोले-चलिए साहब आपका यूएसजी होगा।
नरेंद्र बोला-कई दिन से मुझे स्टूल नहीं हुआ, पहले स्टूल हो इसकी व्यवस्था होनी चाहिए। ऐसे में यूएसजी कराना बेकार होगा। आज भी फिर कोई अंग गायब बता देंगे।
वे बोले- हमें पता नहीं डाक्टर राय ने कहा है, चलिए।
नरेंद्र डाक्टर राय के जाल में फंस गया था क्या करता उसे जाना पड़ा। उसकी आशंका सही निकली आज यूएसजी वाले डाक्टर ने निष्कर्ष निकाला स्पिलिन (तिल्ली) भी प्रभावित है।नरेंद्र को यूएसजी केबिन से वापस लाकर अभी लिटाया ही गया था कि तभी स्ट्रेचर लेकर दो लोग आ गये और बोले-भैया चलिए आपका एक्सरे होगा।
नरेंद्र की चेस्ट का एक्सरे  किया गया और एक्सरे करने वाले डाक्टर ने पाया कि फेफड़े में पानी है। नरेंद्र के लिए यह भी चिंता का विषय था।शाम को जब डाक्टर राय केबिन में आये तो नरेंद्र ने कहा-डाक्टर साहब मुझे  एक हफ्ते से स्टूल नहीं हुआ। ऐसे में आपका रोज-रोज यूएसजी कराना बेकार है। पहले पेट साफ कराने की कोशिश कीजिए तब कहीं सही तस्वीर आयेगी।
डाक्टर राय-ठीक है व्यवस्था कराते हैं। अभी आपको देखने कुछ डाक्टर आयेंगे जिनमें एक हृदय विशेषज्ञ भी होंगे जो आपके हृदय का स्वास्थ्य जांचेंगे।
नरेंद्र आपने कल ही तो ईसीजी कराया था फिर दोबारा जांच?’
राय-इको से तस्वीर बिल्कुल साफ हो जायेगी।
इतना कह कर डाक्टर राय चले गये तो एक डाक्टर एक बड़ी सी मशीन को खिसकाते हुए केबिन में दाखिल हुए। वे उस मशीन से नरेंद्र के हृदय के बाल्व व अन्य हिस्सों की गहराई से जांच करने लगे। नरेंद्र उनकी मशीन में अपने दिल की आवाज लुबडुक-लुबडुक साफ सुन रहा था। थोड़ी देर के मुआयने के बाद डाक्टर ने नरेंद्र से जो कुछ कहा वह अब तक के मेंटल  टार्चर में बेहद सुखद एहसास था। । उन्होंने कहा कि आपका हृदय बिल्कुल दुरुस्त है, कोई चिंता की बात नहीं। नरेंद्र ने हाथ जोड़ कर उनका शुक्रिया किया। उन्होंने बताया कि नरेंद्र का दिल स्वस्थ है, उसमें कोई परेशानी नहीं है।उनके जाने के बाद एक गैस्ट्रोलोजिस्ट और एक डाइबिटीज के डाक्टर आये। गैस्ट्रो के डाक्टर ने कहा कि अगर आपके पैंक्रियाज में कुछ खराबी है तो वह दवाओं  से ठीक हो जायेगी लेकिन गालब्लैडर के स्टोन के लिए आपरेशन करना पड़ेगा लेकिन चिंता की कोई बात नहीं।इन दोनों डाक्टरों के जाने के बाद गले में स्टेथेस्कोप डाले सांवले रंग का एक युवा डाक्टर केबिन आया। उसने मुस्कराते हुए अपना परिचय देते हुए बताया कि उसका नाम विमल है और वह डाक्टर राय का बेटा है। नरेंद्र उससे बात करने लगा तो वह वहीं एक सोफे में जम गया और अपनी जीवनगाथा सुनाने लगा। किस तरह वह संन्यास ग्रहण करने के लिए घर से भागा फिर वहां के रंग-ढंग देख विरक्ति हुई तो वापस लौट कर डाक्टरी की पढ़ाई की। वह बच्चों का चिकित्सक था लेकिन उसके बाद से दिन में कभी रात में लगातार नरेंद्र के पास आता रहा। कुछ दिन तक तो स्टेथेस्कोप आदि से वह उसको चेक करता रहा फिर केबिन में खड़े-खड़े ही उसका हाल पूछ वापस लौटता रहा। नरेंद्र को लगा था कि वह कितना भला आदमी है जो निस्वार्थ भाव से उसका हाल-चाल लेने आता है।दूसरे दिन सुबह होते ही एक व्यक्ति आया और बोला-आपका ब्लड चहिए टेस्ट होगा।
नरेंद्र बेबस था। उसने उदासीन भाव से हाथ बढ़ा दिया। उसके बाद से हर दूसरे दिन ब्लड खींचा जाता रहा। शुगर टेस्ट के लिए दिन में तीन-चार बार उंगलियों को कोंचना भी जारी रहा। नरेंद्र की तकलीफ तो कम होने का नाम नहीं ले रही थी और शारीरिक, मानसिक टार्चर अलग बढ़ते जाते थे।अगले दिन डाक्टर राय ने यह कृपा अवश्य की कि डूश लगवा दिया जिससे करीब एक सप्ताह बाद नरेंद्र को स्टूल हुआ। इसके तुरत बाद फिर दो लोग ह्वील चेयर लेकर आ गये और कहा कि यूएसजी के लिए चलना है। नरेंद्र बिना कुछ बोले यंत्रवत ह्वील चेयर में बैठ गया। यूएसजी केबिन जाकर उसने देखा कि आज वहां एक महिला डाक्टर मौजूद थी। उसे लगा कि चलो शायद यह आतंकित नहीं करेंगी। लेकिन उसका सोचना गलत निकला,लगता यह था कि ऊपर से नीचे तक सबको कह दिया गया था कि इस मरीज को जितना हो सके आतंकित किये रखना है। महिला डाक्टर ने भी यूएसजी के दौरान पूछा-क्या कभी आपका प्रोस्टेट का आपरेशन हुआ है। नरेंद्र ने ना में सिर हिला दिया। डाक्टर ने पेशाब कर के आने को कहा और फिर यूएसजी की और वापस भेज दिया।डाक्टर राय ने ढेरों एंटीबायटिक दवाइयां चालू कर दी थीं। रोजना औसतन आठ-दास कैपसूल और टेबेलेट तो नरेंद्र खा ही रहा था। डाक्टर राय जब भी केबिन में राउंड पर आते नरेंद्र के लिए किसी नयी बीमारी का नाम सोच कर आते और उसे आतंकित करने के लिए जरूर पूछते कि कहीं उसको वह तकलीफ तो नहीं।उस रात तकरीबन साढ़े बारह बजे डाक्टर राय आये। नरेंद्र के केबिन में गये और पेट को कई जगह कोंचने के बाद स्टेथेस्कोप लगा कर चेक करने के कुछ देर बाद ही गंभीर होकर बोले-आपको खांसी आती है क्या?’ नरेंद्र ने ना में सिर हिला दिया।
डाक्टर राय रोज आते रहे और उनका बेटा विमल भी। यह सिलसिला लगातार कई दिन चलता रहा। विमल भी अक्सर नरेंद्र को किसी ना किसी बीमारी का नाम लेकर डराने की कोशिश करता रहता। नरेंद्र पत्नी आराधना की तकलीफ देख कर परेशान था। वह एक बेहद छोटे सोफे पर आधी-अधूरी टिक कर अधसोयी और उनींदी रह कर रात बिता रही थी। नरेंद्र चाहता था कि वह घर चली जाये लेकिन डाक्टर राय का रुख और व्यवहार देख कर वह बुरी तरह डर गया था। उसे डर था कि अगर उसके पास घर का कोई आदमी नहीं रहेगा तो पता नहीं यहां उसके साथ क्या हो जाये।*उस दोपहर  बेटा सूरज जब विजिटिंग आवर में पापा से मिलने आया तो नरेंद्र से उसने पूछा –पापा, और कोई नया डेवलपमेंट?’
नरेंद्र बोला- हां, आज फिर यूएसजी हुआ। एक महिला डाक्टर ने किया। वह पूछने लगी कभी प्रोस्टेट का आपरेशन हुआ है क्या? देखो यहां मेरे साथ रोज कोई ना कोई नया रोग जोड़ा जा रहा है। तरह-तरह के प्रयोग हो रहे हैं। इनका इरादा किसी तरह से मुझे ज्यादा दिनों तक यहां फंसाये रख कर पैसा खींचना है और कुछ नहीं। एक सप्ताह से ऊपर हो गया लेकिन मेरा दर्द पहले जैसा है। मेरे ख्याल से हमें अब कुछ और सोचना चाहिए।
सूरज ने कहा- हां, मुझे भी लग रहा है कि इन्होंने मेडिक्लेम की बात जब से जान ली है तभी से जो टेस्ट जरूरी नहीं हैं वह भी करा रहे हैं और दवाइयां भी महंगी से महंगी दे रहे हैं। उन दवाओं से कुछ फायदा होता तो कुछ बात थी लेकिन आपकी तकलीफ तो पहले जैसी ही है। ये अभी आपरेशन के लिए भी तैयार नहीं हैं।
नरेंद्र- देखो, तुम मुझे घर ले चलो। वहां किसी और डाक्टर से सेकंड ओपीनियन लेकर देखेंगे। यह जिस तरह पैसे के पिशाच बन रहे हैं वैसे में सचमुच कुछ ऊटपटांग दवा देकर मुझे सीरियस ना कर दें। जिन्हें पैसे का लोभ लग जाता है वह कितना भी नीचे गिर सकते हैं।
  अभी वह बेटे सूरज से बात ही कर रहा था कि तभी वहां डाक्टर राय आ गये। आते ही उन्होंने पूछा- और कैसे हैं मिस्टर नरेंद्र?’
  नरेंद्र कुछ बोलता इससे पहले सूरज ने ही उत्तर दे दिया-क्या पूछ रहे हैं। हमने जैसा भर्ती किया था वैसे ही हैं। इन्हें तो ट्रीटमेंट से कोई फायदा ही नहीं हुआ। इस तरह इन्हें यहां रखने से क्या फायदा?’
    डाक्टर राय- फायदा है ना! यहां इनकी सही देखभाल हो रही है। समय पर दवाइयां मिल रही हैं। समय-समय पर इंसुलिन दी जा रही है। घर में वैसा हो पायेगा क्या?’सूरज-आप जिस तरह से दवाएं खाने को बोलेंगे उसी तरह खिलाया जायेगा। जैसा कहेंगे वैसा ही किया जायेगा पर अब हम इन्हें यहां रखने के पक्ष में नहीं हैं। आप ही बतलाइए जब इनका आपरेशन अभी नहीं हो सकता तो इन्हें यहां रखने से क्या फायदा। मेडिसन तो ये घर पर रह कर भी खा सकते हैं। छह सप्ताह बाद इन्हें फिर आपरेशन के लिए यहां भर्ती कर देंगे।
डाक्टर राय – तो आप इन्हें घर ले जाना चाहते हैं।
सूरज-जी! हम कल ही उन्हें डिस्चार्ज कराना चाहते हैं।
अभी सूरज और डाक्टर राय में बातचीत हो ही रही थी कि तभी एक नर्स आयी और डाक्टर राय की ओर मुखातिब होते हुए बोली –सर! कल इनके दो-तीन टेस्ट होने हैं।
इस पर डाक्टर राय ने मुंह लटकाते हुए कहा- अब कैसा टेस्ट। चिडिया तो कल उड़ जायेगी।
नर्स से कहे डाक्टर राय के आखिरी शब्द नरेंद्र के हृदय में तीर से चुभे। तो इन लोगों ने उसे पिंजड़े का पक्षी बना रखा है। दवाइयां चुगा रहे हैं और पैसे लूट रहे हैं। डाक्टर राय सूरज से बोले-ठीक है, कल आप इनको डिस्चार्ज करा लीजिए लेकिन उससे पहले हम चाहते हैं कि इनका एक एमआरआई करा लें।
इतना सुनते ही नरेंद्र बोला-डाक्टर साहब आपने तो कहा था कि एमआरआई ऐन आपरेशन के एक दिन पहले ही किया जाना चाहिए ताकि स्टोन की सही पोजीशन का पता चल सके। पहले से करना बेकार होता है। मुझे तो छह सप्ताह बाद आपरेशन के लिए आना है फिर अभी एमआरआई करने से क्या फायदा?’
डाक्टर राय- हमको संतोष हो जाता।
सूरज बोला- आपके संतोष के लिए हम छह हजार रुपये बेकार लगा दें। छह हफ्ते बाद हमारे लिए तो वह रिपोर्ट किसी काम की नहीं होगी।
डाक्टर नरेंद्र को लगा कि उनकी चाल पकड़ी गयी और अब उनकी कोई माया नहीं चलेगी, उनका दिखाया कोई डर इस मरीज को नहीं रोक पायेगा। उन्होंने अनमने ढंग से ही सही नरेंद्र को सुबह डिस्चार्ज करने की बात मान ली।डिस्चार्ज करने से पहले डाक्टर राय ने एक पेंच फंसा दिया। उन्होंने सूरज को समझाया कि –आप अभी एक ग्लूकोमीटर खरीद लीजिए। नाश्ते, लंच और डिनर के पहले रोज इनका ब्लड शुगर अवश्य चेक कीजिएगा। उसके बाद नियमित हमें बताते जाइएगा हम यहां से बतायेंगे कि कब कितना यूनिट इंसुलिन देना है।
सूरज ने बिना कोई बहस किये डाक्टर की बात मान ली पर ज्यों ही डाक्टर वहां से गये वह पिता नरेंद्र से बोला-पापा! इस चक्कर में कभी मत पड़िएगा यह आदमी घर पर रहते वक्त भी आपको अपनी गिरफ्त में रखना चाहता। अगर इसकी बात मानी तो यह वहां रहते हुए भी आपको तरह-तरह से डरवाता रहेगा। इसके अलावा हम आपको इंसुलिन डिपेंडेंट नहीं बनाना चाहते । आप शुगर के लिए पहले की ही तरह टेबलेट लेते रहिएगा। जरूरी हुआ तो किसी और डाक्टर को दिखा लेंगे। यहां अब एक भी दिन नहीं रहना।
दूसरे दिन सूरज सुबह-सुबह नर्सिंग होम पहुंच गया और दोपहर होते-होते उसने एकाउंट सेक्शन में जाकर मेडिक्लेम के जरिये सारा पेमेंट चुका दिया। एकाउंट वालों ने उस दिन का भी रूम चार्ज ले लिया क्योंकि डाक्टर राय ने डिस्चार्ज सार्टिफिकेट लिखते-लिखते शाम के सात बजा दिये। इसके लिए तरह-तरह के बहाने बनाये कि सभी डाक्टर जो नरेंद्र को देख रहे थे वे मेडिसिन लिखेंगे। खैर रात गहराने से पहले नरेंद्र घर आ गया।*  दूसरी सुबह बेटा सूरज पास की दवा की दुकान में दवा लेने गया। दवा की दुकान का मालिक लड़का सिर्फ परिचित नहीं अपितु हम लोगों को परिवार की तरह मानता था। उसने उसे उदास देखा तो उसे लगा कि कुछ बात जरूर है।    उसने सूरज से पूछा-क्या बात है सूरज। बहुत परेशान दिखते हो। किसी की तबीयत खराब है क्या।
    सूरज-अरे दादा, पापा की तबीयत खराब है। उनके गाल ब्लैडर में स्टोन है। उनको इलाज के लिए प्रार्थना नर्सिंग होम में भर्ती किया था। वहां डाक्टर राय के अंडर में भर्ती थे। दो हफ्ते वहां रहने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ। अनाप-शनाप रुपया खर्च हुआ वह अलग से।
    इतना सुनना था कि दवा की दुकान का वह लड़का गुस्सा होते हुए बोला-राय को तुम डाक्टर कहते हो। वह कुछ नहीं जानता, पक्का दलाल है। अरे सूरज किस बेवकूफ के चक्कर में पड़ गये। तुम मुझसे नहीं पूछ सकते थे कि किसे दिखायें।    सूरज बोला-दादा क्या करें पापा को अचानक इतनी तकलीफ हो गयी कि हड़ब़ड़ी में प्रार्थना नर्सिंग होम ले गये और हमारा दुर्भाग्य कि हमें वही ठग डाक्टर मिला। अब तुम्हीं बताओ किसको दिखायें।    वह बोला- मेरी बात सुनो। तुम डाक्टर कुमार से बात कर लो वह कोलकाता के माने हुए लैपोस्क्रोपिक सर्जन हैं। उन्हें मैं जानता हूं बहुत अच्छे और ईमानदार डाक्टर हैं। चाहो तो मेरा नाम ले सकते हो,वे मुझे पहचानते हैं।    सूरज ने उसको धन्यवाद किया और घर आकर सारी बात अपनी मां और पापा को बतायी। तय हुआ कि सूरज और दामाद महेश जाकर डाक्टर कुमार से बात कर लेंगे और फिर नरेंद्र को उनके नर्सिंग होम में चेकअप के लिए ले जायेंगे। दोनों नरेंद्र की सारी रिपोर्ट लेकर डाक्टर कुमार के पास गये और उनसे बात की।
    डाक्टर कुमार ने सारी कहानी सुनने के बाद कहा-उस वक्त आते तो मेरे लिए बहुत सहूलियत होती लेकिन कोई बात नहीं जो रिपोर्ट आप लाये हैं उनसे मैं संतुष्ट नहीं। आपको ब्लड टेस्ट, यूएसजी फिर से कराना होगा। और हां अगर एमआईआर की जरूरत पड़ी तो मैं लिख दूंगा वह कंशेसनल रेट में हो जायेगा।
    सूरज और महेश घर लौट आये। दूसरे दिन से टेस्ट वगैरह शुरू हो गये। ब्लड टेस्ट, चेस्ट एक्सरे के बाद यूएसजी करवाया गया। यूएसजी में नीचे नोट लिख दिया गया- एमआरसीपी सजेस्टेड। जब डाक्टर कुमार ने रिपोर्ट देखी तो उन्होंने बताया कि ब्लड टेस्ट वगैरह तो ठीक है लेकिन एमआरसीपी करानी होगी जिससे स्टोन की क्लीयर पोजीशन मिल जायेगी। उन्होंने अपने प्रेसक्रिप्शन में ही डाइगोनेस्टिक सेंटर के लिए लिख दिया कि एमआरसीपी कंशेसनल रेट पर कर दिया जाये। नरेंद्र को उनकी इस सदाशयता से ही पता चला कि अब वह सही डाक्टर के पास आया है जो उसके लिए डाइगोनेस्टिक सेंटर से अपना कमीशन भी छोड़ रहे हैं।    दूसरे दिन वह दामाद महेश के साथ पास के ही एक डाइगोनेस्टिक सेंटर गया। वहां कुछ प्राथमिक जांच के बाद उसे एक मैगनेटिक टलेन के भीतर डाल दिया गया। उसे एक खास पोजीशन में लिटा दिया गया और हिलने-डुलने से मना कर दिया। नरेंद्र के लिए इस तरह की जांच जिंदगी का पहला अनुभव थी।    थोड़ी देर बाद ही डाइगोनेस्टिक चैंबर का सहायक चिल्लाया-सांस रोकिए।
    नरेंद्र ने सांस रोकी। उसके तुरत बाद उस टनेलवाली मशीन में ऐसी कानफोड़ू आवाज उभरने लगी जिससे नरेंद्र का सिर भन्नाने लगा। वह विवश था उसे हिलने-डुलने से मना कर दिया गया था। वह आवाज इतनी तेज थी कि वहां के सहायक को नरेंद्र को निर्देश माइक से देने पड़ रहे थे। वह बार-बार सांस रोकिए, सांस छोड़िए कहता रहा और बेबस नरेंद्र उसका आदेश मानता रहा। उसके पास उसका आदेश मानने के अलावा और कोई चारा ही नहीं था। वह तकरीबन 25 मिनट तक टनेल के अंदर ही उस कानफाड़ू आवाज का टार्चर झेलता रहा।
    नरेंद्र जब टेस्ट के बाद बाहर आया तो दामाद महेश ने पूछा-पापा एक बहुत तेज आवाज आ रही थी किस चीज की आवाज थी?’
    नरेंद्र-अरे इस मशीन की जिसके अंदर मुझे डाल दिया गया था। पहले बता देता कि इस तरह की आवाज होगी तो शायद मैं अपने को उसे झेलने को तैयार कर लेता लेकिन अचानक हुई आवाज ने परेशान कर दिया।
    डाक्टर कुमार को एमआरसीपी की रिपोर्ट दिखायी गयी। उन्होंने कहा-ठीक है आप दो दिन बाद प्रार्थना नर्सिंगहोम में भर्ती हो जाइए। उसी दिन आपरेशन कर देंगे और चार दिन बाद छुट्टी।
    नरेंद्र प्रार्थना नर्सिंग होम का नाम सुनते ही चौंका। उसने डाक्टर कुमार से कहा-प्रार्थना नर्सिंग होम के अलावा और कहीं नहीं हो सकता क्या।
 डाक्टर कुमार ने मुसकराते हुए पूछा-क्यों त्रिपाठी जी, उस नर्सिंगहोम से कोई दिक्कत है क्या?’
    नरेंद्र बोला-दिक्कत जैसी दिक्कत। वहां का नाम सुनते ही डर लगता है और फिर वहां डाक्टर राय भी तो है। उसकी तो मैं शक्ल भी नहीं देखना चाहता।
    डाक्टर कुमार मुसकराते हुए बोले-डरिए मत मेरा वहां अच्छा होल्ड है। डाक्टर राय आप तक पहुंच ही नहीं पायेगा। दरअसल वहां का नर्सिंग स्टाफ अच्छा है इसीलिए मैं वहां के लिए प्रेफर करता हूं।
    सबने ने डाक्टर कुमार की राय मान ली। तय दिन नरेंद्र प्रार्थना नर्सिंगहोम में भर्ती हो गया। उसके भर्ती होते ही आपरेशन पूर्व की सारी तैयारियां शुरू हो गयीं। उसे पानी तक पीने के लिए मना कर दिया गया। उसका ब्लड शुगर चेक किया गया। फिर दो घंटे बाद आपरेशन थिएटर ले जाया गया। आपरेशन थिएटार खाली नहीं था इसलिए उसे उसके बेड के गलियारे में ही रख दिया गया। वहां फिर एक बार शुगर चेक किया गया। गलियारे में ही बड़ा बेटा सूरज और छोटा बेटा चंद्रभान भी खड़े थे।    तभी डाक्टर कुमार बेड़ के पास आये और बोले-त्रिपाठी जी डर रहे हैं क्या?’
    नरेंद्र ने कहा-आप हैं तो डर किस बात का।    इसके बाद आपरेशन थिएटर खाली होते ही उसे अंदर ले जाया गया। उसे बेड से हटा कर आपरेशन टेबल पर लिटा दिया गया जिसके ऊपर विशाल लाइट लगी हुई थी। वहां एक और डाक्टर थे। जिनका परिचय बाद में पता चला कि वे एनाथिसिस्ट प्रशांत थे।    प्रशांत ने नरेंद्र से बातचीत शुरू की-और नरेंद्र जी कहां काम करते हैं।
    नरेंद्र अपने बारे में बताने लगा फिर वह कब बेहोश हो गया उसे पता ही नहीं चला। ना उसे कोई मास्क लगाया गया, न ही किसी इंजेक्शन का दर्द ही उसे महसूस हुआ।    पता नहीं उसके आपरेशन में कितना वक्त लगा। जब उसकी बेहोशी की तंद्रा थोड़ी टूटी तो उसे अपने आसपास सब धुंधला लग रहा था। बोलने में जुबान लड़खड़ा रही थी। उस अवस्था में भी वह बड़ी कोशिश के बाद बोल पाया- डाक्टर साहब कहां है। डाक्टर कुमार उसके बेड के साथ ही चल रहे थे वे बोले- मैं .हीं आपके पास ही हूं मिस्टर नरेंद्र।
    उसे जब उसके केबिन में लाकर उसके बेड पर लिटाया गया तो बहुत देर से परेशान पत्नी आराधना की जान में जान आयी। उसे पता था कि आपरेशन आधा घंटे में पूरा हो जायेगा लेकिन आपरेशन में सवा घंटे लग गये।    उसके बाद फिर नये सिरे से सलाइन के लिए चैनल लगाये गये दवाइयां शुरू कर दी गयीं।    चौथे दिन सुबह साढ़े पांच बजे ही डाक्टर कुमार पहुंच गये। उन्होंने घावों की ड्रेसिंग की दूसरी चिकित्सीय सलाह दी और डिस्चार्ज सर्टिफिकेट लिखने के बाद फिर नरेंद्र के केबिन में आये।    नरेंद्र को दवा आदि खाने के बारे में समझाने के लिए हेड नर्स को उनहोंने सलाह दी फिर नरेंद्र की ओर मुसकराते हुए देखने के बाद बोले-क्या नरेंद्र जी, डाक्टर राय को एक बार आपके पास भेज दूं क्या।
    नरेंद्र ने हाथ जोड़ते हुए कहा-मेरी जान बचा कर आपने मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा उपकार किया है, अब उस दुष्ट का नाम मत लीजिए। मैं उसका मुंह तक नहीं देखना चाहता।
    डाक्टर कुमार मुसकराये-अरे मैं ऐसे ही मजाक कर रहा था।
    डाक्टर    कुमार चले गये। उऩ्हें शहर में और कोलकाता से बाहर कहीं अर्जेंट आपरेशन करने थे। उन्होंने बताया कि वे इतने व्यस्त हैं कि उनको सोने का भी समय नहीं मिलता। बस रास्ते में कार में ही झपकी ले लेते हैं।    डाक्टर कुमार गये तब तक बेटा सूरज भी एकाउंट सेक्शन से मेडिक्लेम का मुद्दा सलटा कर आ गया था। उसने आकर जो जानकारी दी उससे डाक्टर राय के बारे में पता चला कि सचुमच ही वह दलाल है। सूरज ने बताया कि एकाउंट सेक्शन वालों से वह कह रहा था कि जो डाक्टर वह अपने रोगियों के लिए बुलाता है उनका पैसा उसे दे दिया जाये, वह खुद उनको पेमेंट कर देगा। निश्चित है कि उनकी फीस में से भी वह अपना कमीशन काटता होगा।    जो भी हो प्रार्थना नर्सिंग होम के दिन नरेंद्र के लिए ऐसे दुस्वप्न के दिन थे जो उसे ताउम्र याद रहेंगे। खुद उसके और पत्नी आराधना के कुछ पुण्यों का फल रहा होगा जो उसे डाक्टर कुमार जैसे भले डाक्टर मिले जिनके लिए यह कहने में कोई संकोच नहीं कि डाक्टर भगवान का रूप होते हैं। ईश्वर करे कि कभी किसी दुश्मन को भी डाक्टर राय जैसा डाक्टर ना मिले।  



Wednesday, March 7, 2018

गीत- दर्द दिल में छिपा मुसकराते रहे











वक्त कुछ इस कदर हम बिताते रहे ।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।
      जिसपे भरोसा किया उसने हमको छला।
     परोपकार करके हमें क्या मिला।।
     पंख हम बन गये जिनके परवाज के।
     आज बदले हैं रंग उनके अंदाज के।।
 मुंह फेरते हैं वही गुन हमारे जो गाते रहे।
 दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।
       कामनाएं तड़पती सिसकती रहीं।
       प्रार्थनाएं ना जाने कहां खो गयीं।।
       हम वफाओं का दामन थामे रहे ।
       जिंदगी हर कदम हमको छलती रही।।
जुल्म पर जुल्म हम बारहा उठाते रहे।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।

        मेहरबानियां उनकी कुछ ऐसी रहीं।
        आंसुओं का सदा हमसे नाता रहा।।
        नेकनीयत पर हम तो कायम रहे।
        हर कदम जुल्म हम पे वो ढाते रहे।
दिल दुखाना तो उनका शगल बन गया।
दर्द  दिल  में  छिपा मुसकराते रहे ।।


Saturday, December 16, 2017

कथा सौ साल पुराने शंख की


  • यादों के आईने में

राजेश त्रिपाठी

अपने पूर्वजों की वस्तुओं को सहेज, संभाल कर रखना अपने आप में एक सुखद और गौरवपूर्ण एहसास होता है। उन वस्तुओं को देखते ही आपका पुरानी यादों में खो जाना, उन क्षणों को महसूस करना जो बहुत-बहुत पीछे छूट चुके हैं, स्वाभाविक है।आज मैं यहां अपने पिता जी के द्वारा प्रयुक्त जिस चतुर्मुखी शंख की कहानी सुनाने जा रहा हूं, वह अब एक शताब्दी पुराना हो चुका है। आप जब अपनी जड़ों से उखड़ कर कहीं और बसने जाते हैं तो अपने पीछे कई खट्टी-मीठी यादों के साथ कुछ वस्तुएं भी छोड़ जाते हैं जिन्हें साथ लाना संभव नहीं होता। पिछले साल इसी महीने में जब गांव गया था तो यह देख कर बहुत खुशी हुई कि वर्षों पहले मैंने जिस घर में जन्म लिया था, वह अब एक परिवार का आसरा बना हुआ है। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के बबेरू तहसील के उस गांव से मेरा पूरी तरह से नाता उस वक्त टूटा जब 95 वर्ष की उम्र में पिता जी का देहावसान हो गया। मां अकेली पड़ गयीं तो उन्हें अपने साथ रखने के लिए कोलकाता लाना पड़ा। उस वक्त पिता जी के स्मृति चिह्न के रूप में मैं जिस शुभ और मंगलकारी वस्तु को ला पाया, वह है एक चतुर्मुखी शंख। वह शंख अब भी मेरे पास पिता जी की पावन स्मृति के रूप में विद्यमान है। पिता जी हमेशा पूजा-पाठ और भजन में तल्लीन रहते थे। आशु कवि थे, जमाने भर की कहानियां उन्हें याद थीं। अंग्रेजों के शासनकाल में बांदा में कैनाल सेक्शन में अंग्रेज अधिकारियों के साथ काम कर चुके थे। उस वक्त की स्मृतियां वे अक्सर हम लोगों से उस वक्त साझा करते थे जब हम शैशवकाल में थे। हमने तो अंग्रेजों के शासन को देखा नहीं पर उनके मुंह से सुना कि भले ही हम गुलाम थे, पराधीन थे लेकिन उस समय का शासन अपराधियों के लिए बहुत सख्त था इसलिए आपराधिक घटनाएं कम होती थीं। बातों-बातों में वे हमें कई अनोखी और वह जानकारियां भी दे देते थे जो हमें पता नहीं थीं। उन्होंने ही हमें जेबी कुत्ते (छोटी प्रजाति का कुत्ता) के बारे में बताते हुए अपने जीवन की एक घटना साझा की थी। बात उस वक्त की थी जब वह हमारे गृह जनपद बांदा में रहते थे और अंग्रेज अधिकारियों के साथ कैनाल सेक्शन में काम करते थे। उन्होंने बताया कि एक बार मजदूर कैनाल (नहर) की खुदाई कर रहे थे कि कहीं से जंगली भैंसा आकर उस हिस्से में बैठ गया जो उस दिन मजदूरों को खोदना था। मजदूरों ने भैंसे को हटाने की बड़ी कोशिश की लेकिन वह हटने के बजाय फूं-फां करके, सींग हिला कर उन्हें ही डराने लगा। जब मजदूर सब कुछ कर के हार गये तो उन्होंने वहां उपस्थित पिता जी को पुकारा-पंडित जी, साहब को बुलाइए, ऐसे में तो काम बंद कर देना पड़ेगा।
पिता जी गये और साहब को बुला लाये। ओवरसियर साहब अपने घोड़े में टप-टप करते आ गये। वे एक लंबा सा ओवरकोट पहने थे जिसमें दो बड़ी-बड़ी पाकेट थीं। उन्होंने उनमें से एक पाकेट में एक बेहद छोटे (जेबी) कुत्ते को निकाला, उसके सिर पर हाथ फेरा और भैंसे की ओर इशारा करते हुए उसे छोड़ कर सीटी बजा दी। वह जेबी कुत्ता बिजली की गति से दौड़ता हुआ गया और उछल कर भैंसे की गरदन में चिपक गया। उसके नुकीले दातों की चुभन से छूटने के लिए पहले तो भैंसे ने गरदन हिलायी पर सब कुछ बेकार रहा। इसके बाद भैंसा वहां से जान बचा कर भागा। उसे भागते देख साहब ने फिर एक सीटी बजायी और वह जेबी कुत्ता भैंसे की गरदन छोड़ कूदता-फांदता मालिक की गोद में आ बैठा। ओवरसियर साहब ने एक रूमाल निकाला और कुत्ते का मुंह पोछ कर उसे फिर पाकेट में रख लिया। 
हम लोग पिता जी के मुंह से यह घटना सुन कर खूब हंसा करते थे और कहते थे- इतना छोटा कुत्ता तो हो ही नहीं सकता। 
कोलकाता आये तो उस तरह के ढेरों कुत्ते देख कर लगा पिता जी ने जो कहा वह सच था।  वह हमें इसलिए झूठ लग रहा था क्योंकि हमने वैसा कुछ देखा नहीं था।  

चूंकि पिता जी धार्मिक प्रकृति के थे तो उनका हम से भी यह आग्रह रहता था कि हम धर्म के आस्था के पथ पर चलें। जितना हो सके ईश वंदना, अर्चना और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन मनन करें, उनके पावन, जनहितकारी संदेशों को जीवन में उतारें और तदनुसार जीवन जीएं। जब हम प्राथमिक शाला में थे तभी से हमारे लिए सुबह के नाश्ते से पहले स्नान और हनुमान चालीसा का पाठ अनिवार्य कर दिया गया था। पिता जी कहते थे कि जिस घर में पूजा होती है और शंख की ध्वनि होती है वहां प्रभु की कृपा से बाधाएं नहीं आतीं। कुछ प्रगतिशील और पाश्चात्य भावनाओं से जीवन जीने वाले इसमें आडंबर और ढोंग देखें हमें कोई दुख नहीं, हम इस बात की गारंटी भी नहीं देते कि सचमुच शंख बजाने या पूजा करने से भवबाधाओं से बचा जा सकता है। हां इतना जरूर कह सकते हैं कि पूजा करने, धर्मग्रंथों को पढ़ने से मानसिक शांति और सात्विक, सुंदर और उत्तम जीवन जीने का संदेश अवश्य मिलता है। अपनी आस्थाओं, धार्मिक प्रवृत्तियों और आचरणों से जुड़े रहने की प्रेरणा माता-पिता जी से मिली। पिता जी ब्राह्म मुहूर्त में उठ कर माला लेकर रामनाम का जाप करने बैठ जाते थे। मां ग्राम देवी के स्थान में शाम को दीपक जलाना कभी नहीं भूलती थीं। उनके साथ शंख लेकर मैं भी जाता था। मेरा काम शंख बजाना था। जो चतुर्मुखी शंख हमारे पास है वह आम शंखों से कुछ बड़ा है और उसे बजाने के लिए अच्छा-खासा जोर लगाना पड़ता था।
शंख का धार्मिक अनुष्ठानों में बड़ा महत्व है। इसकी ध्वनि से वातावरण शुद्ध होता है। पूजा के समय शंख में जल भर कर रख दें, पूजा संपन्न होने के बाद घर में उसे छिड़क दें वातावरण शुद्ध होगा, सकारात्मक ऊर्जा का सृजन होगा। शालिगराम को भी स्नान शंख के जल से ही कराया जाता है। पिताजी कहा करते थे कि अगर शंख के पिछले हिस्से को कान में लगाओ तो राम-राम की ध्वनि सुनायी देती है। हमने कई बार ऐसा करके देखा लेकिन राम-राम तो नहीं लेकिन ऐसा करते वक्त निरंतर हवा की एक अविरल ध्वनि अवश्य सुनायी देती रही। एक शतक प्राचीन इस शंख का प्रयोग आज भी हमारे यहां छोटी-बड़ी पूजाओं में होता है। मिथ्या भाषण नहीं करूंगा, अब नित्य तो इसे बजा नहीं पाता।
पूर्वजों की स्मृतियां सहेजे हमारा सौ साल पुराना शंख

एक वक्त था जब मैं अपने गांव से तकरीबन आठ किलोमीटर दूर बबेरू के कॉलेज में पढ़ता था, तब भी अपने गांव के विशाल तालाब में एक चबूतरे में पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा के पास रोज शाम दीपक जलाता था। दीपक जलाने के बाद मैं काफी देर तक शंख बजाता था। शाम के सन्नाटे में वह ध्वनि आठ किलोमीटर तक का फासला तय कर लेती है इसका पता मुझे अपने कॉलेज के होस्टल में रहनेवाले कुछ साथियों से चला। उनमें से किसी ने एक दिन पूछा की रोज शाम को आपके गांव की ओर से शंख की ध्वनि आती है। पता नहीं कौन नियमित शाम को शंख ध्वनि करता है। मैंने मुस्करा कर कहा भाई –मैं ही हनुमान जी के स्थान पर दीपक जला कर शंख ध्वनि करता हूं।उनमें से एक साथी बोला-यार आपकी शंख ध्वनि तो आठ किलोमीटर दूर तक सुनी जाती है। संभव है इससे दूर भी जाती हो।
उस शंख से मुझे इतना लगाव है कि मैं हमेशा उसको सुरक्षित और अक्षत रखने के प्रयास में रहता हूं। उसे हाथ से स्पर्श करते और बजाते वक्त बरबस पिता जी की स्मृति ताजा हो जाती है। एहसास होता है कि कभी इसे उनका स्पर्श मिला था। यह शंख मेरे लिए मात्र एक शंख नहीं उस कालखंड की अमोल धरोहर है। ऐसी कई चीजें गांव में छूट गयीं जो पूर्वजों की अमोल स्मृतियां बन सकती थीं। उनमें से एक मेरे चाचा स्वामी कृष्णानंद जी की पीतल की एक बालटी भी थी जिसमें नीचे उनका नाम खुदा था-स्वामी कृष्णानंद जी, कुटी बिलबई। उसे मां ने कब बेंच दिया मैं जान नहीं पाया. स्वामी कृष्णानंद जी मेरे सगे चाचा थे और संस्कृत के निष्णांत विद्वान थे। उन्होंने चित्रकूट की पीलीकोठी के संस्कृत विद्यालय से शिक्षा पायी थी। उन्होंने सांसारिक बंधनों में फंसने के बजाय स्वामी बनना पसंद किया और बांदा-बबेरू रोड में बिलबई ग्राम के पास एक कुटी बनायी, वहां एक मंदिर और कुएं का निर्माण कराया। मैंने अपने चाचा को देखा नहीं उनके जीवन की कहानियां पिता जी से ही सुनी। पिता जी ने बताया कि जब चाचा ने मंदिर और कुंआ बनाया तो ईंटें पथवाईं और उन्हें पकाने के लिए भट्ठा लगवाने के लिए सड़क किनारे के पेड़ काट कर उस लकड़ी का इस्तेमाल कर लिया। अब सरकारी मोहकमे को पता चला कि स्वामी जी ने सरकारी पेड़ कटवा लिये तो केस दर्ज हो गया। स्वामी कृष्णानंद जी को कोर्ट में तलब किया गया।
जज ने उनसे पहला सवाल किया-स्वामी जी। आपने यह क्या किया, सरकारी पेड़ काट कर भट्टे में लगा डाले।
स्वामी-क्या करे हुजूर, कुआं बनवाना था, वहां आज बांदा-बबेरू मार्ग के यात्री पल भर रुक कर गर्मी के दिनों में पानी पीते हैं, कुटी में थोड़ा सुस्ता लेते हैं और फिर अपने गंतव्य को बढ़ जाते हैं। प्रभु का  छोटा- सा मंदिर भी बना लिया है।
जज- वह सब तो ठीक है लेकिन सरकारी संपत्ति का बिना इजाजत इस्तेमाल कर आपने गलत काम किया है आपको जुर्माना तो देना ही पड़ेगा।
स्वामी-हुजूर मैं तो ठहरा भिखारी। जुर्माना भरने के लिए तो मुझे लोगों के सामने झोली फैलाने पड़ेगी। मैं शुरुआत आपसे ही कर रहा हूं। जितना जुर्माना बनता हो आप ही भर दें हुजूर। मैं कहां से लाऊं।
स्वामी कृष्णानंद जी का जवाब सुन जज मुसकराये और बोले –जाइए स्वामी जी, आपसे कौन पार पायेगा। अब से ऐसा मत कीजिएगा।
स्वामी- नहीं हुजूर, अब ऐसी गलती नहीं होगी।
पिछले साल इसी माह में 35 साल बाद जब गांव गया तो स्वामी कृष्णानंद जी की कुटी देखने भी जाने का सुअवसर मिला। मैं तो पहले भी गांव में था तो बांदा आते-जाते कुटी में जरूर उतरता था। पिछली बार जाकर देखा की कुटी तो नहीं रही लेकिन कुछ सुजान लोगों ने उस जगह पर विद्यालय बनवा दिया है जहां बच्चे पढ़ते हैं। किसी ने मंदिर और कुएं में रंग-रोगन भी करवा दिया था। यह देख कर अच्छा लगा कि चाचा की स्मृति को कई दशक बाद भी गांव वालों ने संभाल कर रखा है। उन ग्रामीणों के प्रति जितनी कृतज्ञता व्यक्त करें कम होगी।
कहते हैं हम उन्हीं स्वामी कृष्णानंद जी के अवतार हैं। हम नहीं जानते कि यह कहां तक सच है लेकिन एक बात तो है कि अगर हममें कूट-कूट कर धार्मिक प्रवृत्ति भरी है तो यह हमारे पूर्वजों की ही प्रेरणा और देन हो सकती है। एक संयोग यह भी कि हमने भी एक गुरुकुल में कुछ वर्ष तक संस्कृत का अध्ययन किया। वहां लघु सिद्धांत कौमुदी के सूत्र, रघुवंश, अभिज्ञान शाकुंतलम् और हितोपदेश आदि का सम्यक अध्ययन किया।