http://rajeshtripathi4u.blogspot.in/ Kalam Ka Sipahi / a blog by Rajesh Tripathi कलम का सिपाही/ राजेश त्रिपाठी का ब्लाग

Tuesday, February 21, 2017

कहानी


पैसा बोलता है

राजेश त्रिपाठी

            बर्तन मांजती सुखिया ने रेखा से कहा- मालकिन बच्चा किसना के लिए चिंटू बाबा का कोई पुराना कपड़ा मिल जाता तो बड़ी किरपा होती। दीवाली के लिए उसके नये कपड़े नहीं ले सकती।'
            ‘अच्छा देखूंगी।
            रेखा की बात पर पास बैठी सास ने भौंहें तान लीं। सुखिया के जाने के बाद बहू को डांटा-खबरदार जो चिंटू का कोई कपड़ा उसे दिया।
            रेखा चौंकी, ‘क्यों मां? कितने कपड़े हैं चिंटू के जो उसे अब छोटे पड़ रहे हैं। गरीब है खरीद नहीं सकती। पेट ही भरने का पैसा नहीं जुटता।
            सास ने कहा, -‘मैं क्यों मना कर रही हूं, जानती हो?’
            ‘नहीं मां।
            ‘उसकी सास की सूरत डायन जैसी है। चिंटू के कपड़े पाकर पता नहीं वह क्या टोटका कर बैठे? ना, ना, भूल कर भी न देना।
            रेखा ने फिर कुछ नहीं कहा। वह नये विचारों की थी। डायन-वायन, टोटका-वटका नहीं मानती थी। एक दिन उसने चिंटू के नये दिखने वाले चार जोड़ी कपड़े चुपके से सुखिया को देकर कहा,- ‘छिपा कर ले जा। मां जी देख न पायें।
            सुखिया कुल चार घरों में बर्तन मांजने और झाडू-पोंछा का काम करती थी। सब मिला कर वह ढाई हजार कमा लेती थी।
            पति सरजू ईंट भट्ठे में मजदूरी करता था, जो पाता उसे दारू में उड़ा देता था। घर में फूटी कौड़ी तक न देता। चार जनों के उस परिवार के सभी आधा पेट खा पाते। सुखिया ने कई बार पति से प्रार्थना की, ‘मेहरबानी कर के दारू छोड़ दीजिए। मेरी कमाई से किसी को भरपेट खाना नहीं मिलता।
            यह सुनते ही सरजू बिगड़ जाता-जब देखो तब तू मेरी दारू के पीछे पड़ी रहती है, जैसे वह तेरी सौतन हो। आगे कुछ बोलेगी, तो अच्छा न होगा।
            सुखिया और कुछ बोलती, तो पति की लातें खा जाती। वह जानती थी कि उसका पति सास की लापरवाही से शराबी बना है। शादी के पहले वह दारू को हाथ तक नहीं लगाता था। जब वह पहले दिन पीकर आया  तो वह चौंक उठी। उसने सास से कहा- मां जी! आपका बेटा दारू पीकर आया है। मना कीजिए। यह बरबादी के लक्षण हैं।
            तब सास ने मुस्करा कर कहा-तुम भी बहू। छोटी सी बात का बतंगड़ बना रही हो। दोस्तों की संगत में थोड़ी सी पी ली होगी। रोज-रोज थोड़े पियेगा?’
            और जब वह रोज-रोज पीकर आने लगा और घर में एक पैसा भी न देता, कुछ मांगने पर मारने को आमादा हो जाता, तब सुखिया को मजबूरन दूसरों के बर्तन मांजना पड़ा। फिर उसने पति के खिलाफ सास से कुछ नहीं कहा। उसकी सास दो चार दिन भूखी रहती तब उसे पता चलता कि बेटे को दारू पीने से न रोकने की वजह से भूखे सोना पड़ रहा है।
*
            रेखा बहुत दयालु थी। वह सुखिया को हर माह दो सौ रुपये अधिक दे देती थी। वह प्राय: कहती- सुखिया, तेरा नाम तो दुखिया होना चाहिए था। सुखिया किसने रखा।
            दीवाली के दो दिन पहले रेखा ने उसके बच्चे के लिए कुछ फुलझडि़यां, पटाखे और मिठाई दी थीं।
            तब सुखिया ने खुश होकर कहा था-भगवान आपका भला करे मालकिन। आप जैसा बड़ा दिल सबको दे। आपने चिंटू बाबा के जो कपड़े हमारे बचुवा के लिए दिये थे, वे उसके ठीक नाप के थे। उसे बहुत पसंद आये। कहता था,-मां! मेरे लिए ऐसे ही कपड़े खरीदा करो। मालकिन वह उन कपड़ों को नया समझ रहा है।
            रेखा ने मुस्करा कर कहा-चलो अच्छा है। मैं भी यही चाहती थी। दूसरे के उतारे कपड़े सुन कर वह दुखी हो जाता।
            रेखा जब अखबार पढ़ कर सुखिया को सुनाती कि कहां पर कितने लोग जहरीली शराब पीकर मर गये, तो वह कांप उठती और रोकर कहती-मालकिन हमारा खसम भी चोरी से उतारी जा रही दारू पीता है। पता नहीं, कब क्या हो जाये। सास जी से कहती हूं तो वे साफ-साफ कह देती हैं- अब वह दारू छोड़ने वाला नहीं। ज्यादा मना करेंगे तो गुस्से में हम सब को छोड़ कर कहीं चला जायेगा। कभी-कभी मन करता है मालकिन किसना को लेकर हमेशा के लिए मायके चली जाऊं। मगर वहां भी गुजारा नहीं होगा। अम्मा, बापू बूढ़े हो गये हैं। एक बड़ा भाई है। वह घरवाली के इशारे पर चलता है। पांच दिन के लिए जाती हूं तो तीसरे दिन ही भाभी कहती हैं- कब लौट रही हो ससुराल? सुन कर बापू कुछ नहीं बोलते, वे मजबूर हैं। बेटे की कमाई खा रहे हैं। बेचारी अम्मा मन मसोस कर रह जाती हैं।
            रेखा उसे सांत्वना देती-मैं तुम्हारी परेशानी समझ रही हूं सुखिया। तुम्हारे लिए जितना कर सकती थी, कर रही हूं। हम कोई लखपती नहीं हैं। वे एक दफ्तर में क्लर्क हैं। थोड़ा पैसा और मिलता, तो कहती , जिस चीज की जरूरत हो, मांग लेना।
            ‘यह आपकी मेहरबानी है मालकिन। मैं जिन पैसे वालों के यहां काम करती हूं,  मुझसे बात करना पसंद नहीं करते। पैसा बढ़ाने को कहती हूं, तो जवाब मिलता है, आजकल बर्तन साफ नहीं हो रहे। झाड़ू-पोंछा भी ठीक से नहीं लगता। ऐसा कब तक चलेगा। मालकिन वे शादी ब्याह में बची मिठाई कूडादान में फिंकवा देते हैं, लेकिन नौकरों को नहीं देते।
            रेखा ने कहा-जानती हो क्यों ? कुछ पैसे वाले अपने नौकर को यह सोच कर अच्छी चीज नहीं देते, कि अगर उसे उसका स्वाद मिल गया, तो चोरी कर के खाना शुरू कर देगा।
            सुखिया ने माथा ठोंक कर कहा, - ‘ हे भगवान! कैसे -कैसे लोग हैं इस दुनिया में।
            रेखा ने कहा-और भी सुन। एक दिन मैं एक करोड़पति परिवार में किसी पूजा में गयी थी। वहां मैंने कुछ दूर खड़े एक बारह साल के लड़के को अपने पिता से कहते सुना-डैडी ! आप रामू को कम पैसे क्यों देते हैं। उनसे ज्यादा तो मुझे पाकेट खर्च मिलता है। उसे इतना तो दीजिए, जिससे उसका परिवार भरपेट खा सके। जानती हो सुखिया, उसके डैडी ने क्या जवाब दिया?’
            ‘क्या कहा मालकिन?’
            ‘बोले, हम रामू को इतनी तनख्वाह देते हैं, जिससे वह जिंदा रहे, मरे नहीं और तुम्हारी होने वाली संतान की सेवा के लिए एक अदद गुलाम पैदा किये जाये। ज्यादा पैसे देंगे, तो वह अपने बच्चे को पढ़ायेगा, वह बड़ा होने पर किसी दफ्तर में बाबू हो जायेगा। तब तुम्हारी संतान की सेवा के लिए गुलाम कहां से आयेगा।
            सुन कर सुखिया अवाक रह गयी।
            रेखा ने फिर कहा-जानती हो सुखिया! यह उस बच्चे का डैडी नहीं पैसा बोल रहा था।
            ‘लेकिन पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं मालकिन। पैसे वालों में आप जैसे भी लोग होंगे।
            ‘ हा हैं, जो खानदानी रईस होते हैं। जो बेईमानी से नहीं बने। जो तिकड़म कर के बने उन्हीं का पैसा बोला करता है, वे नहीं। लगता है तुम खानदानी रईसों की बात कर रही हो।
            पता नहीं मालकिन। ¢


Saturday, January 28, 2017

जीवनगाथा डॉ. रुक्म त्रिपाठी भाग-28

  
पत्नी नीरू को खोने के बाद वे हमेशा उदास रहने लगे थे

 भाभी के निधन के बाद से भैया पहले जैसे नहीं रहे। रोतों को हंसानेवाला आदमी हमेशा खोया-खोया और उदास लगने लगा। हमारी हमेशा कोशिश होती कि उनको ढांढस बंधायें और उन्हें गम के उस दर्द से बाहर लायें जिसमें शायद वे तिल-तिल कर खुद को खत्म करने लगे थे। हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी की संज्ञा दी गयी। उसे सहभागिनी कहा गया है। जिनमें धार्मिक आस्था और अपने पुनीत संस्कारों का भान है वे इन शब्दों को अक्षरश: मानते हैं। अगर किसी का साथी जीवन के सफर में पहले ही साथ छोड़ दे तो उसके लिए इससे बड़ा कोई दुख नहीं हो सकता। भरे-पूरे परिवार में भी वह व्यक्ति खुद को अकेला पाने लगता है। यही भैया रुक्म के साथ हो रहा था। वे लिखने-पढ़ने में खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करते लेकिन घर में भाभी की कमी उन्हें चौबीसों घंटे सालती रहती। उनकी वह बीमारी जो पहले कुछ ठीक हो गयी थी धीरे-धीरे उदासी और भाभी के गम में बढ़ने लगी। हम लोग उन्हें किसी तरह से समझा कर रखने की कोशिश करते लेकिन यह अक्सर असफल ही रहती क्योंकि जो सच था वह तो ढांढस से झूठ हो नहीं सकता था। इस पर पुराने यार-दोस्त मिलने और भाभी के निधन पर शोक जताने आते तो जैसे उनके गम के घाव फिर हरे हो जाते। कुछ दिन बाद तो आनेवालों से हम संकेत में समझाने लगे कि वे भाभी का जिक्र ना करें।
भैया रुक्म ने पत्रकारिता में एक युग बिताया था और उनके साथ तरह-तरह के अनुभवों का खजाना था। जब खाली होते तो उनको यादों के पुराने गलियारों में जाने और वहां से कुछ बातें सुनाने की जिद करता तो फिर पत्रकारिता के कई अनजाने किस्से अनावृत्त होते चलते। वे अक्सर समझाया करते अपना काम सत्य,निष्ठा और लगन से करते जाओ, मत सोचो कौन, क्या कर या कह रहा है। अगर तुम सच्चे हो, अपने काम के पक्के हो और ईमानदार हो तो भले ही तुम्हें कोई पुरस्कार मिले न मिले यह संतोष जीवन भर के लिए रहेगा कि तुमने कोई गलत काम नहीं किया। कभी ऐसा कुछ मत करना जिससे तुम्हारी तरफ कोई उंगली उठा सके। काम वैसा ही करना जिससे संतोष हो और जिसमें कोई दोष ना हो। पैसा कमाने का शार्ट कट दुनिया में कई बार मुसीबत भी लाता है। जो कमाया जाये उसमें ईमानदारी हो तो फिर भगवान भी मदद करते हैं। वे कहते कि उन्होंने कई ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने गलत ढंग से पैसे कमाये और खूब ऐशो आराम किया लेकिन अंत में भिखारी की मौत मरे। बुरे ढंग से कमाया गया , अधर्म का पैसा हमेशा शांति-सुख ही दे जरूरी नहीं।
उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था। जब भी कोई नयी पत्रिका निकलती वे मुझसे उसका पहला अंक लाने के लिए जरूर कहते। वे हर ऐसी पत्रिका में रचनाएं भेजते और अधिकांश में उनकी रचनाएं छपती भी थीं। जिनमें उनकी रचनाएं छपतीं वे अंक वे अपने पास सुरक्षित रख लेते थे। लिखने वगैरह के
मामले में मैं पहले से ही जरा सुस्त ही रहा हूं। वे अक्सर मुझसे कहते-अरे यही उम्र है खूब लिखो। तुम्हारी उम्र में मेरी कहानियां, उपन्यास तक प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे थे। मैं उन्हें गौर से सुनता पर शायद क्यों जो लिखता हूं स्वांत सुखाय ही कहीं भेजने का न मन करता है और  ना ही भेजता हूं। खुद भैया भी कभी-कभार कहते थे और मैं भी मानता हूं कि सभी जगह नहीं लेकिन कहीं-कहीं बार-बार कुछ जाने-पहचाने नामों को ही छापा जाता है। ऐसे में आपकी सही और सशक्त रचना भी वापस लौट आये तो ताज्जुब नहीं। तब आप अपने आपको उन लोगों से बौना महसूस करने लगेंगे जो बराबर छप रहे हैं। कुछ संपादक अपने जान-पहचान के लेखकों को तरजीह देना ज्यादा पसंद करते हैं। रुक्म जी ऐसे नहीं थे वे नये लोगों को ही ज्यादा मौका देते थे।  खैर उपरोक्त बातों  का जिक्र मैंने किसी पर दोष मढ़ने की गर्ज से नहीं किया बल्कि उस रवायत की ओर संकेत करने के लिए किया है जो आजकल कई पत्र-पत्रिकाओं में आम हैं। कुछ ऐसे नये लेखक जिनकी सशक्त रचनाएं तक बैरंग लौट आती हैं मुझसे इत्तिफाक करेंगे।
भैया रुक्म को हमने जिंदगी में इतना उदास और टूटा हुआ कभी नहीं पाया जितना भाभी के जाने के बाद पाया। दूसरों को हौसला देने वाले भैया खुद हौसला खो बैठे थे और जैसे तिल-तिल कर घुल रहे थे।  हमारे पास उन्हें दवाइयों और दिलासों के बल पर बचाये रखने के अलावा और कोई चारा नहीं था। हम वही कर रहे थे। बीमारियां भी शायद उदास और दुखी आदमी पर जल्दी और ज्यादा असर करती हैं। आदमी सुख-चैन से हो तो बहुत-सी बीमारियों को भूल कर जी सकता है। भैया वैसा नहीं कर पा रहे थे। वे अक्सर अपनी नीरू को खोजने लग जाते। उनकी सूनी-उदास नजरें कभी दरवाजे की तरफ घूमतीं तो कभी दूसरे कमरे की ओर शायद उस उम्मीद पर कि नीरू कहीं बाहर गयी होगी अभी आ जायेगी। लेकिन उनकी नीरू तो वहां चली गयी थी जहां से कोई लौट कर कभी नहीं आता। भैया को भी इस बात का शिद्दत से एहसास हो गया था लेकिन वे इस कमी को बरदाश्त नहीं कर पा रहे थे। उनकी बीमारियां और हमारी बेचैनियां एक साथ बढ़ने लगीं। उनकी रीढ़ की पुरानी चोट का दर्द फिर उभरने लगा और दिन ब दिन बढ़ने लगा था। उसका कोई इलाज नहीं था, जो था वह बहुत ही कष्टसाध्य और खतरनाक था। डाक्टरों से सलाह लेने पर उन्होंने बताया कि इसके लिए स्पाइन की सर्जरी करनी पड़ेगी जो सफल भी हो सकती है और नहीं भी सकती। इसमें सबसे बड़ा खतरा यह है कि अगर स्पाइन की कोई महत्वपूर्ण नर्व डैमेज हो गयी तो आदमी या तो गूंगा हो सकता है या उसे पैरालाइसिस हो सकता है। इस पर हिम्मत नहीं पड़ी। नब्बे वर्ष की उम्र को छू रहे व्यक्ति को इस टार्चर को झेलने के लिए मजबूर करना हमें अच्छा नहीं लगा। उनको ब्रांकाइटिस की पुरानी शिकायत थी जो अब धीरे-धीरे प्रबल होती जा रही थी। लोग सच कहते हैं कि वृद्धावस्था अपने आपमें एक बीमारी है उस पर अगर पहले कुछ बीमारियां शरीर में घर कर चुकी हों तो समझो आफत ही है। कब कौन प्रबल रूप धारण कर ले और गंभीर स्थिति आ जाये कहा नहीं जा सकता। (अगले भाग में जारी)


Friday, January 13, 2017

यह तुम भूल न जाना!


कितने आंसू पिये अभी तक, कितनी बार पड़ा था रोना।
कितने दिन तक फांका काटे, बिन खाये पड़ा था सोना।।
कितने अधिकार गये हैं छीने, कब-कब खायी थी मात।
राजनीति के छल-प्रपंच में, कितने ठगे गये हो तात।।
           मत की कीमत को पहचानो, मत देने अवश्य ही जाना।
           दल के दलदल में भाई, सही व्यक्ति को भूल न जाना।।
लंबी-चौड़ी हांक गये सब, जैसे दुख सब ये हर लेंगे।
जहां-जहां है बंजर धरती, सत्वर ये उपवन कर देंगे।।
बेकारों को काम मिलेगा, कामगार को पूरी मजदूरी।
दुखिया नहीं रहेगा कोई, ख्वाहिश सबकी होगी पूरी।।
           ये धरती पर स्वर्ग गढ़ेंगे, पल भर को हमने माना।
           बीते दिनों भी यही अलापा, यह तुम भूल न जाना।।
जाति-पांति का चक्कर छोड़ो, अब तो लो दिमाग से काम।
जाति नहीं है काम ही सच्चा, यह संदेश सुखद अभिराम।।
जांचो-परखो यह भी सोचो, क्या चाह रहा है अपना देश।
चहुंदिशि विकास हो ऐसा, मिट जाये जन-जन का क्लेश।।
      लोक लुभावन उन नारों से मेरे भाई मत भरमाना।
      अपना भाग्य हाथ में अपने, यह तुम भूल न जाना।।
जाने कितने चेहरे देखे, सबके अपने-अपने नारे।
सत्ता-सुख की खातिर, जो धूप में घूमे मारे-मारे।।
इनके इतिहास को देखो, देखो विकास का खाका।
इसको परखो तो जानोगे, इनमें से कौन है बांका।।
     उसको मत,  मत देना, जो ठग है जाना पहचाना।
     सच्चे को चुनना हितकर, यह तुम भूल न जाना।।
कितने दुर्दिन भोग रहा है, अपना प्यारा भारत देश।
सुख तो सपना है अब, बढ़ते जाते दिन-दिन क्लेश।।
महंगाई है, है बेकारी, दिशा-दिशा कोहराम मचा है।
क्या कहें किससे कहें,किसने जीवन-संग्राम रचा है।।
     देश-दुर्दशा से उबरे, सब सुख-चैन का गायें गाना।
     उसे ही चुनना जो सब कर दे, यह तुम भूल न जाना।।
वीर-धीर हो दृढ़प्रतिज्ञ हो, निर्णय ले सकता हो आला।
देश के बाहर से ला दे जो, धन जमा है जो भी काला।।
दुश्मनों को दे जवाब जो, जो जन-जन की हर ले पीर।
सीमाओं को करे सुरक्षित, देश को पूजे जो सच्चा वीर।।
     जिसमें हो साहस व दृढ़ता, सबका जो जाना-पहचाना।
     अब ऐसे ही शख्स को चुनना, यह तुम भूल न जाना।।
वादों और इरादों में अंतर जो, उसको जानो भाई।
झूठ बहुत मैदान में फैला, सच को मानो  भाई।।
जो सच के साथ खड़ा है, वही है सच्चा मीत ।
उसका गर दिया साथ तो, वह लेगा दिल जीत।।
     सच को पहले पहचानो, नहीं भुलावे में अब आना।
     पांच साल होगा पछताना, यह तुम भूल न जाना।।
-राजेश त्रिपाठी

    


     

Saturday, December 17, 2016

गीत

सीरत कुछ की काली देखी
           राजेश त्रिपाठी
हमने  इस जग की हरदम रीत निराली देखी।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत* कुछ की काली देखी।।
     कुछ खाये-अघाये इतने  खा-खा कर  जो बने हैं रोगी।
     शील, सौम्यता खो  गयी  बने आज ज्यादातर भोगी।।
     परमार्थ का भाव खो गया  सभी बन गये  सुविधावादी।
     पानी पीकर देश को कोसें चाहें गाली देने की आजादी।।
ऐसे लोगों में गुरूर भरा कंठ तक, तर्क की कोठी खाली देखी।
अपनी बात  मनाने को  लड़ते, आदत अजब  निराली देखी।।
     कितना लूटें, कितना समेंटे बस इनका यही  है धंधा।
     ये अपनों तक को ना छोड़ें मानस इनका होता गंदा।।
     मक्कर से ये दुनिया चलाते इनकी ऐसी होती चालें।
     लाख जतन कर बच ना पाये जिस पर फंदा डालें।।
पैसे के हित कुछ भी करते हरकत चौंकानेवाली देखी।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत कुछ  की काली देखी।।
     खून-पसीना एक कर जो बनाते हैं भवन निराले।
     अक्सर खाली पेट ही देखा मिलने नहीं निवाले।।
     ठंडे घऱों में श्रीमंत राजते वैभव से भरा खजाना।
     कभी-कभी श्रमिकों के घर होता एक न दाना ।।
उसकी जिंदगी  की झोली देखी अक्सर रहती खाली।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत कुछ की काली देखी।।
     धूप, शीत, बरसात  झेल कर खेती करे किसान।
     मौसम, महाजन की मार से जो रहता हलकान।।
     उसका श्रम कभी-कभी  जाता एकदम  बेकार ।
     जब उसे पड़ती है झेलनी सूखे-बाढ़  की मार।।
फसल के सही दाम कम मिलते उसकी थैली रहती खाली।
सूरत  देखी  साफ, मगर सीरत  कुछ की  काली देखी।।
     सब होवैं खुशहाल यहां सबको मिले सही सम्मान।
     सच कहें तो तभी बनेगा अपना पावन देश महान।।
     कोई  कमाये कोई खाये कोई हरदम करता फांका।
     इसका मतलब किसी के हक पर डाले कोई डाका।।
यह हालत ज्यादा अरसे तक अब नहीं है चलनेवाली।
सूरत देखी साफ, मगर सीरत कुछ की काली देखी।।
सीरत*= स्वभाव, चरित्र, प्रकृति

Monday, September 19, 2016

उरी के हमले से देश दहल गया है


बस, अब और नहीं कुर्बानी

राजेश त्रिपाठी
·       हम अपने वीर जवानों को इस तरह कुरबान नहीं कर सकते
·       सशक्त राष्ट्र इस तरह लुंज-पुंज, असहाय नहीं हुआ करते
·       दंभ और हुंकार बहुत देखी, अब कुछ कर दिखाने की बारी
·       देश आक्रोश में है, देश के रहनुमा भी अब कठघरे में हैं
·       उनकी कथनी-करनी का फर्क मुल्क का बेड़ा न गर्क कर दे
·       पाकिस्तान का जन्म ही भारत विरोधी भावों से हुआ था
·       उससे दोस्ती का सपना देखना दिवा स्वप्न जैसा है
·       तत्काल उससे सारे कूटनीतिक रिश्ते तोड़े जायें
·       उसका मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा तत्काल खत्म हो
·       भविष्य में उससे किसी भी मुद्दे पर वार्ता नहीं की जाये
·       हर वार्ता में वह वेवजह कश्मीर को खींच लाता है
·       वह कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेर रहा है
·       एक बिल्ली जैसा देश शेर जैसे देश को हेकड़ी दिखा रहा है
·       सीधी लड़ाइयों में हारा पाकिस्तान अब छाया युद्ध लड़ रहा है
·       कश्मीर में अढ़ाई महीने से व्याप्त अशांति में भी उसका हाथ
·       मोदी ने बलूचिस्तान मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय कर उसे चिढ़ा दिया
·       वह हमारे सैनिकों पर हमला कर उनका नैतिक बल तोड़ रहा है
·       सारा देश शर्मासार है, शोक संतप्त है,वह इसका जवाब चाहता है


उरी में शहीद हुए वीर जवानों की ये शव पेटियां पूरे राष्ट्र पर, देश की सत्ता में बैठे लोगों के चेहरे पर एक कलंक और उनकी उस शपथ पर एक सवाल हैं जो वे पद संभालने के समय लेते हैं। ये महज शव पेटियां नहीं, ये हमारे वीर सपूतों के सपनों की, उनके हौसलों, ऊंचे मनोबल की पुण्य निशानियां हैं। इन वीर जवानों को शत-शत नमन। पूरा राष्ट्र हमेशा इनका ऋणी रहेगा। इनको सिर्फ नंबर में मत आंको, देखो कि इनके पीछे कितनी आंखें नम हो गयीं, कितने बच्चे अनाथ हो गये, कितने घरों के सपने टूट गये जो इन पर निर्भर थे, कितने परिवार हमेशा के लिए दुख में डूब गये। इनमें से कोई अपने बेटे को दिलासा देकर गया था कि वह जल्द उससे मिलने आयेगा, कोई अपनी बेटी से कह गया था कि वह अच्छी तरह से पढ़ाई करे। अब इन बच्चों को अपने पिता कभी नहीं मिलेंगे, अब उनकी यादें, उनकी शौर्य-गाथा ही इनका सहारा है। यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने भारत पर इस तरह का कायराना और शर्मनाक हमला किया है। पाकिस्तान के जन्म के बाद से ही भारत पर उसके हमले शुरू हो गये थे। तब कबाइलियों ने इसकी शुरूआत की थी अब आतंकिस्तान बन चुके पाकिस्तान की शरण में फल-फूल और प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे आतंकवादी इसे अंजाम दे रहे हैं। सारा विश्व यह बात जान-मान चुका है कि पाकिस्तान आंतक की सबसे बड़ी फैक्ट्री है। वहां छोटे-छोटे बच्चों तक को जन्नत की मौज-मस्ती का ख्वाब दिखा कर आत्मघाती हमलावर बना दिया जाता है। जन्नत किसने देखी है उनकी जिंदगी तो शुरू होने से पहले ही खत्म कर दी जाती है। उनका कुछ ऐसे ब्रेनवाश किया जाता है कि वह किसी खास नशे में डूब कर खुद को, अपने परिवार को भूल जाते हैं और मरने को बेताब हो जाते हैं। अब तक भारत पर जितने हमले हुए वे पाकिस्तान में पल रहे आतंकवादियों के सरगनाओं के इशारे पर हुए, इसके पुख्ता सबूत भी मिले जो भारत ने उसे सौंपे लेकिन पाकिस्तान है कि मानता ही नहीं। न वह यह मानता है कि भारत में आतंकवादी हमलों में उसका हाथ है और न ही यह मानता है कि उसके यहां आतंकवादी पलते हैं। पूरा विश्व जानता है कि खुद पाकिस्तान भी आतंकवाद से तबाह है। उसके कब्जेवाले कश्मीर में बाकायदा आतंकवादियों के लिए ट्रेनिंग कैंप चल रहे हैं लेकिन वह इसे सिरे से नकार रहा है। उसी क्रम में उसने कश्मीर के उरी में 18 सितंबर को हुए हमले में भी पाकिस्तानियों का हाथ होने से साफ इनकार कर दिया हालांकि आतंकवादियों के पास से मिले सामान पाकिस्तान में बने पाये गये हैं। पाक प्रायोजित आतंकवादी हमलों में हमारे जितने जवान अब तक शहीद हुए हैं, उतने शायद ही किसी दूसरे देश में हुए हों। पाकिस्तान की ओर से संघर्ष विराम और घुसपैठ की घटनाएं तो आम हैं। इसी साल अब कर पठानकोट से लेकर उरी तक तकरीबन 100 घुसपैठ की घटनाएं हो चुकी हैं। कश्मीर में आतंकवादी हमलों में अब तक चार हजार जवान शहीद हो चुके हैं।
अब तक कश्मीर में हुई आतंकवादी घटनाओं में शहीद हुए जवानों की संख्या पर नजर डालें तो सिर शर्म से झुक जाता है। यहां प्रस्तुत है कुछ आतंकवादी हमलों की सूची-
पठानकोट
- 2 से 5 जनवरी 2016 : जैश-ए-मोहम्मद के 6 आतंकियों ने पठानकोट एयरबेस पर हमला किया।
- हमला 4 दिन चला। इसमें 7 जवान शहीद हुए।
अनंतनाग
4 जून 2016 : अनंतनाग में चेकपोस्ट पर हमला। 1 एएसआई, 1 कांस्टेबल शहीद।
- 1 दिन पहले ही बीएसएफ काफिले को निशाना बना 3 जवानों की जान ली थी।
पंपोर
26
जून 2016 : पंपोर के पास श्रीनगर जम्मू हाईवे पर सीआरपीएफ काफिले पर हमला। 8 जवान शहीद, 20 जख्मी हुए। लश्कर ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी।
ख्वाजा बाग
17
अगस्त 2016: हिजबुल ने श्रीनगर-बारामूला हाईवे पर सैन्य काफिले पर हमला। 8 जवान शहीद हुए।
पुलवामा हमला
9 सितंबर 2016: सीआरपीएफ कैंप पर हमला। इसमें किसी की जान नहीं गई। चार दिनों के भीतर यह चौथा आतंकी हमला था।
पुंछ
11
सितंबर 2016: पठानकोट एयरबेस अटैक की तरह ये मुठभेड़ 3 दिन चली। हमले में 6 सुरक्षाकर्मी मारे गए। लश्कर-ए-तैयबा के 4 आतंकी भी मारे गए।
14 मई, 2002 : कालूचक
सैनिकों के 36 परिजन मारे गए कालूचक छावनी पर हमला, 36 की मौत। ज्यादातर सैनिकों के परिजन थे।
जनवरी, 2013 : पुंछ सेक्टर
दो सैनिकों के सिर काट ले गएः पाक रेंजर-आतंकी भारतीय सीमा में आए। पुंछ सेक्टर में 13 राजपूताना राइफल्स के लांस नायक हेमराज और सुधाकर सिंह की हत्या कर उनके सिर काटकर ले गए।
26 सितंबर, 2013 : जम्मू-कठुआ
4 हमले, कर्नल सहित 8 की मौतःजम्मू कश्मीर में दो आत्मघाती हमलों में 3 आतंकी सहित 13 मौतें। कठुआ जिले में हमले में 4 पुलिसकर्मी-2 नागरिक और सांबा जिले में हुए हमले में ले.कर्नल बिक्रमजीत सिंह सहित 4 सैनिक शहीद।
5 दिसंबर, 2014 : मोहरा-उड़ी

31 फील्ड रेजीमेंट हमला, 12 शहीदः बारामुला के उड़ी सेक्टर में मोहरा में सेना के 31 फील्ड रेजिमेंट पर हमला। एक लेफ्टिनेंट कर्नल-7 जवान शहीद, जम्मू पुलिस का एक एएसआई, 2 कांस्टेबल भी शहीद। इसमें 6 आतंकी भी मरे।
27 जुलाई 2015 : गुरदासपुर, पंजाब

आर्मी ड्रेस में किया हमला, 7 की मौतः पंजाब के गुरदासपुर में आर्मी की ड्रेस पहने 3 आतंकियों ने दीना नगर पुलिस स्टेशन पर हमला किया। हमले में एसपी सहित 4 पुलिसकर्मी एवं 3 सिविलियन मारे गए।

अगर पाकिस्तान को सबक न सिखाया गया तो यह सिलसिला आनेवाले दिनों में भी जारी रहेगा। हमें पता है कि पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी कैंप चल रहे हैं, क्या हम उन्हें खत्म करने की भी कूवत नहीं रखते। हम मानते हैं कि किसी भी तरह का एंडवेंचरिज्म या कहें दुस्साहस उलटे परिणाम भी ला सकता है लेकिन क्या जो अभी हमारे साथ हो रहा है वह बहुत अच्छा है? इजराइल जैसा छोटा देश आतंकवाद को कुचल सकता है तो भारत के हाथ कौन-सी मजबूरी बांध रही है? क्या इस बात का डर की पाकिस्तान के सिर पर चीन का हाथ है? अगर ऐसा है तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्वभर की अपनी यात्राओं और विश्वनेताओं से अपने संपर्क का फायदा उठायें। उनको पाकिस्तान की शैतानी हरकतों से परिचित करायें और उनको साथ लें कि वे उनके साथ आंतकवाद के खिलाफ लड़ाई में समर्थक बनें। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की हरकतों को और पुख्ता ढंग से पेश करें और आतंकवाद के खिलाफ पूरे विश्व में सशक्त जनमत तैयार करे। चीन को पाकिस्तान के साथ रहने दे भारत अमरीका, रूस और दूसरे देशों को अपने पक्ष में कर सकता है। कम से कम इतना तो कीजिए कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने उसे आतंकवादी देश के रूप में पेश कर के दक्षिण एशिया में अलग-थलग कर दीजिए, वह खुद ही परेशान हो जायेगा। हम मानते हैं कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं होते कुछ नयी समस्याएं ले कर आते हैं लेकिन आप तब क्या करेंगे जब आप हम हमले पर हमले होते रहें तब भी क्या आप सिर्फ कायरों की तरह मार खाते रहेंगे या पलट कर जवाब देंगे। गया गांधी का वह युग की कोई एक गाल में थप्पड़ मारे दो दूसरा बढ़ा दो। यह शठे शाठ्यम् समाचरेत का युग है। शठ से शठता से ही निपटा जा सकता है। जो हाथ आप पर उठे उसे तत्क्षण तोड़ दें ताकि वह किसी दूसरे निरपराध, निरीह व्यक्ति पर न उठ सके। उरी में जिस तरह सोते सैनिकों पर चोरी छिपे हमला किया गया वह शर्मनाक और निंदनीय है। शत्रु से आमने-सामने सीना तान कर लड़ाई के अभ्यस्त हमारे बीर-बांकुरे इन दुष्टों की चाल समझ नहीं पाये और हमने इतने जवान गंवा दिये। उनके परिजन बिलख रहे हैं, उन्हें बदला चाहिए। बदला कौन लेगा, सेना के हाथ खुले होते तो वह खुद ले लेती। अब जिन पर यह दारोमदार है उन्हें मुंह तोड़ जवाब दिया जायेगा।‘, ‘बरदाश्त नहीं करेंगे जैसे रटे-रटाये जुमलों से हट कर कुछ ठोस कार्रवाई करनी होगी, जो जमीनी स्तर पर दिखे और जिनके खिलाफ की गयी है उनकी भी कमर तोड़ने में सक्षम हो। अक्सर सरकारी अधिकारियों या शासक दल के नेताओं से सुनते हैं किसी को देश में आतंक फैलाने या माहौल बिगाड़ने की इजाजत नहीं दी जायेगी। यहां सवाल यह उठता है कि कौन-सा आतंकवादी गुट है जो आपसे इजाजत लेकर वारदात करता है। आपका तो खुफिया तंत्र भी इतना लुंज-पुंज है कि उसे भी पता हमला हो जाने के बाद ही चलता है। अब आतंकवादियों के दल के दल आते हैं वे अच्छे खासे कद-काठी के हैं चींटी तो नहीं कि कोई देख न पाये। वे हफ्तों आपके यहां आकर रेकी करते हैं फिर वारदात को अंजाम देते हैं, तब कहां सोया रहता है आपका खुफिया तंत्र। उनको निश्चित ही स्थानीय लोगों का समर्थन प्राप्त होता है वरना कई अजनबी किसी इलाके में घूमते रहें और लोग पुलिस को खबर तक नहीं करेंगे। वह भी जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में । क्या आपके पास ऐसा तंत्र नहीं कि आतंकवादियों की मदद करने वालों को पकड़ कर जेल में ठूंस सकें। क्या आतंकवाद के साथ खड़े होना या उनका समर्थन करना देशद्रोह की घटनाएं नहीं।
जहां तक पाकिस्तान से वार्ता का प्रश्न है तो उसका दूर-दूर तक कोई फायदा नजर नहीं आता। ना पाकिस्तान कश्मीर का राग छोड़ेगा और ना ही ऐसे माहौल में किसी वार्ता को सार्थक परिणाम तक ही पहुंचना है। उरी के हमले के बाद विरोधी दल के नेता तक यह कह रहे हैं कि सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करे तो उनका उसे समर्थन है। इसके साथ ही फिर सभी नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनकी 56 इंच की छाती की उक्ति को लेकर तंज कसने लगे हैं। उनका कहना है कि कहां है 56 इंच की छाती क्या वह हमारे शहीदों के बलिदान का बदला ले पायेगी। मोदी जी कुछ तो कीजिए, कुछ कीजिए कि देश आपसे बहुत उम्मीद लगाये हैं। हम जानते हैं कि आप भी इससे भीतर तक मर्माहत होंगे लेकिन संभलिए और जो भी कुछ किया जा सकता है उसे कीजिए। कारण, अगर पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज ना जाये और देश के बेटे ऐसे ही शहीद होते रहे तो कहीं देश की जनता ही ना धैर्य खो बैठे। वह वक्त ना सिर्फ देश के वर्तमान शासकों बल्कि सबके लिए बहुत ही मुश्किल का दौर होगा।
मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान से राजनीतिक संबंध हर हाल में बनाये रखना भारत की मजबूरी है। भारत उसके रहमो-करम पर तो टिका नहीं हां अगर पाकिस्तान सचमुच समझदार होता तो भारत से बना कर चलता। तब शायद उसके लिए बहुत-सी चीजें आसान होतीं लेकिन वह तो आतंक की फैक्ट्री चला रहा है। वहां कहने को गणतंत्र है लेकिन सत्ता पर पूरी पकड़ सेना की है। वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई वर्षों से आतंकवादियों को खुलेआम समर्थन दे रही है और उन्हें भारत की सीमा से अंदर प्रवेश कराने में मदद कर रही है। यह सारी दुनिया जानती है पर पाकिस्तान हमेशा इससे इनकार करना रहा है। भारत में मुंबई हमले के आका पाकिस्तान में शाही अंदाज से रहते हैं, शानदार रैलियां करते हैं, खुलेआम भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। इतना ही नहीं कश्मीर में अशांति बनाये रखने के लिए, वहां आतंकवादी गतिविधियां कराने के लिए खुलेआम पाकिस्तान में चंदा वसूलते हैं। हम उस देश से दोस्ती की उम्मीद कर रहे हैं यह परले दर्जे की नामसमझी है। हम जाने कितने वीर जवान आतंकवादी की लड़ाई में कुरबान कर दिये, अब और कुरबानी नहीं। अब डट कर लड़ने का वक्त आ गया है। सशक्त राष्ट्र हिमालय की तरह अडिग और अमनीय दिखना चाहिए लुंज-पुंज नहीं । अभी तो यह लगता है जैसे हम आतंकवाद के सामने आत्मसमर्पण कर बैठे हैं। दंभ और हुंकार तो नेता हर ऐसी घटना के बाद भरते हैं लेकिन कभी लगा नहीं कि वे इस विपदा के खिलाफ लड़ने को गंभीर हैं। जबानी जमा खर्च बहुत हुआ अब चेतिए वरना स्थिति हाथ से निकल जायेगी। देश इस वक्त आक्रोश में है और हर वह नेता, अधिकारी जो देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी से जुड़ा है आज कठघरे में है। अब कथनी-करनी का फर्क मिटना चाहिए। जबसे मोदी ने बलूचिस्तान के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय किया है, पाकिस्तान बौखला गया है। सीधी लड़ाइयों में हमसे मुंह की खा चुका पाकिस्तान अब आंतकवाद के रूप में छाया युद्ध लड़ रहा है और सैनिकों पर घात लगा कर हमला कर के उनका मनोबल तोड़ना चाहता है। अभी वक्त का तकाजा यही है कि पाकिस्तान से सारे कूटनीतिक संबंध खत्म कर दिये जायें, वहां से अपने राजनयिक वापस बुला लिये जायें और उसका मोस्ट फेवर्ड नेशन का तत्काल खत्म किया जाये। उरी की घटना के बाद से भारत बेहद दबाव में है। यह दबाव जनता का है जो रोज-रोज अपने बेटों की मौत देख कर बौखला गयी है यह दबाव विपक्ष का है जिसके शासनकाल में ऐसी घटनाओं पर भाजपा उसे धिक्कारती रही है। मोदी जी को इन सबसे पार पाना है तो कुछ न कुछ तो करना ही होगा।
एक विनती वर्तमान शासकों से यह भी है कि देश की सुरक्षा के लिए, आतंकवाद से निपटने के लिए जो भी योजनाएं बनायी जाये मेहरबानी करके उसके सार्वजनिक ना करें। कम से कम देश की सुरक्षा की चीजों को तो गुप्त रखिए। आज के इलेक्ट्रानिक युग में हो यह रहा है कि सरकारी सूत्रों से जानकारी टीवी चैनलों तक पहुंचती है और फिर वह पूरी दुनिया के कोने-कोने में पहुंच जाती है। टेलीविजन चैनल छाती फाड़-फाड़ कर चिल्लाते हैं-अब देश के दुश्मनों की खैर नहीं, सीमा पर लेजर बीम और थर्मल पहरा उन्हें पकड़ ही लेगा।उसके बाद वे उसकी बारीक से बारीक जानकारी दे देते हैं। जैसे अभी उरी हमले के बाद सभी चैनल चिल्लाने लगे –अब पाक अधिकृत कश्मीर के आतंकी ट्रेनिंग कैंप पर हमला हो सकता है। हालांकि सरकार ने ऐसी कोई घोषणा आधिकारिक तौर पर नहीं की और करनी भी नहीं चाहिए।  ऐसे अभियानो की सफलता इसी में निर्भर होती है कि इसकी किसी को कानो-कान खबर न पड़े। खबर हो गयी तो क्या अगला इतना बेवकूफ है कि अपने बचने का भी प्रयास नहीं करेगा। टेलीविजन चैनलों, प्रिंट मीडिया को भी आत्म संयम बरतना चाहिए। एक ऐसी आचार संहिता बनानी चाहिए कि जो भी बात देश की सुरक्षा से जुड़ी है और जिसके जगजाहिर होने से देश को खतरा हो सकता है  वह कदापि नहीं दिखायें। किसी भी टीआरपी या प्रसार संख्या से बड़ा और अहम होता है देश । मुंबई हमलों का लाइव प्रसारण करके टेलीविजन चैनलों ने कितना अनर्थ किया था, सभी जानते हैं। वे लगातार सुरक्षाबलों की पोजीशन का प्रसारण कर रहे थे और वहां दूर पाकिस्तान में बैठे हमलावरों के आका उस प्रसारण को देख कर तदनुसार अपने आंतकवादियों को निर्देश दे रहे थे। बाद में सरकार को जब इसकी भनक मिली तो तत्काल लाइव प्रसारण बंद कराया गया। मीडिया को छूट है भ्रष्टाचार का परदाफाश करे, नेताओं की गलती पर उनकी आलोचना करे, जहां अनर्थ हो रहा हो, अनाचार हो उस पर प्रहार करे लेकिन सुरक्षा बलों की तैयारी, तैनाती और उनको दिये जा रहे अत्याधुनिक साज-समान के बारे में विस्तार से कदापि ना बतायें। उनको याद रखना चाहिए कि वे भी इस देश के नागरिक हैं और उनका भी इस देश के प्रति दायित्व बनता है टीआरपी तो घटती-बढ़ती रहेगी कहीं देश पर संकट आ गया तो सबकी मुश्किल होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगामी सार्क सम्मेलन के लिए पाकिस्तान नहीं जाना चाहिए। इससे एक कड़ा संदेश तो जायेगा ही कि भारत के सहने की सीमा अब खत्म हो चुकी है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने परमाणु बम की धमकी दी है इससे ही उनका इरादा साफ है कि वे भारत डरा कर दबाव में रखना चाहते हैं। भारत भी परमाणु संपन्न देश है। हम नहीं चाहते कि बुद्ध का यह देश युद्ध की राह पर चले लेकिन अगर आप पर ऐसा कुछ थोप दिया जाता है तो आप क्या करेंगे, पीठ दिखा कर भागने की कोशिश या मुंहतोड़ जवाब देने का जज्बा दिखायेंगे जैसा आपने पिछली लड़ाइयों और कारगिल में दिखाया। मान्यवर मोदी जी अब आपका सिद्धांत-न दैन्यम्, न पलायनम् का होना चाहिए। देश आपसे यही चाहता है। आप जैसे राष्ट्रवादी के लिए यह परीक्षा की घड़ी है और देश आपकी ओर उम्मीद से देख रहा है। उसे नाउम्मीद तो नहीं करेंगे ना मोदी जी!