Saturday, March 27, 2021

कथा होलिका दहन की और कुछ लाभदायक उपाय




होली का त्योहार हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है।रंग-गुलाल, हुलास, उत्साह और उमंग से हरे इस त्योहार के रंग बदलते युग के साथ मानाकि कुछ बदल गये हैं लेकिन समाप्त नहीं हुए। गांव-देहात में आज भी रंग-गुलाल की बहार होली में देखी जाती है, भंग की तरंग में लोग मस्त रहते हैं। साल भर की उदासी और रंजो गम को उतार लोग हर्ष,उल्लास उमंग से झूम उठते हैं। इस त्योहार में तरह-तरह के पकवान बनाये जाते हैं। लोग आपस में रंग गुलाल का लगा गले मिलते हैं। उत्तर प्रदेश और खासकर हमारे बुंदेलखंड में खोये और मैदे से बनी गुझिया होली के त्योहार का प्रमुख अंग होता है। 

होली का त्योहार किस उपलक्ष्य में मनाया जाता है इसे लेकर एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध व प्रचलित है। कथा इस प्रकार है -हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था। पिता के बार-बार मना करने के बावजूद प्रह्लाद ने विष्णु भक्ति और विष्णु नाम स्मरण नहीं छोट़ा। जब पुत्र ने विष्णु की भक्ति उनका नाम स्मरण नहीं छोड़ा तो हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को कई बार मारने की  कोशिश की लेकिन भगवान विष्णु उसकी रक्षा करते रहे और उसका बाल भी बांका नहीं हुआ। हिरण्कश्यपु की बहन होलिका को भगवान शंकर से ऐसा वरदान मिला था कि अग्नि उसे कभी जला नहीं सकेगी। 

होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ गई।भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ पर होलिका जल गयी। होलिका दहन के दिन होली जला कर होलिका नामक दुर्भावना और बुराई का अंत और भगवान द्वारा भक्त की रक्षा का पर्व मनाया जाता है। हिरण्यकशिपु के दूतों ने उसे जब यह समाचार सुनाया कि उसकी बहन होलिका अग्नि में जल कर स्वाहा हो गयी लेकिन प्रह्लाद फिर बच गया। दूतों से यह समाचार सुन कर हिरण्यकश्यपु बहुत क्रोधित हुआ और उसने प्रह्लाद को अपनी सभा में बुलवाया।

हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा- ” अरे दुष्ट ! जिसके बल पर तू ऐसी बहकी बहकी बातें करता है, तेरा  वह  ईश्वर कहाँ है? वह यदि सर्वत्र है तो मुझे इस खम्बे में क्यों नहीं दिखाई देता ? “

तब प्रह्लाद ने कहा – ” मुझे तो वे प्रभु खम्बे में भी दिखाई दे रहे हैं। “

यह सुनकर हिरण्यकशिपु क्रोध से आगबबूला हो गया और हाथ में तलवार लेकर सिंहासन से कूद पड़ा और बड़े जोर से उस खम्बे में एक घूँसा मारा। उसी समय उस खम्बे से बड़ा भयंकर शब्द हुआ और उस खम्बे को तोड़ कर एक विचित्र प्राणी बाहर निकलने लगा जिसका आधा शरीर सिंह का और आधा शरीर मनुष्य का था।  यह भगवान श्रीहरि का नृसिंह अवतार था। उनका रूप बड़ा भयंकर था। उनकी तपे हुए सोने के समान पीली पीली आँखें थीं, उनकी दाढ़ें बड़ी विकराल थीं और वे भयंकर स्वर से गर्जन कर रहे थे। 

उनके निकट जाने का साहस किसी में नहीं हो रहा था। यह देख कर हिरण्यकश्यपु सिंघनाद करता हुआ हाथ में गदा लेकर नृसिंह भगवान पर टूट पड़ा। तब भगवान भी हिरण्यकश्यपु के साथ कुछ देर तक युद्ध लीला करते रहे और अंत में उसे झपट कर दबोच लिया और उसे सभा के दरवाजे पर ले जाकर अपनी जांघों पर गिरा लिया और खेल ही खेल में  अपने नखों से उसके कलेजे को फाड़कर उसे पृथ्वी पर पटक दिया।

फिर वहाँ उपस्थित अन्य असुरों और दैत्यों को खदेड़ खदेड़ कर मार डाला। उनका क्रोध बढ़ता ही जा रहा था। वे हिरण्यकश्यपु के ऊंचे सिंघासन पर बैठ गए।

 उनकी क्रोधपूर्ण मुखाकृति को देख कर किसी को भी उनके पास जाकर उनको प्रसन्न करने का साहस  नहीं हो रहा था।हिरण्यकश्यपु की मृत्यु का समाचार सुन कर उस सभा में ब्रह्मा, इन्द्र, शंकर, सभी देवगण, ऋषि-मुनि,  सिद्ध, नाग, गन्धर्व आदि पहुँचे और थोड़ी दूरी पर स्थित होकर सभी ने हाथ जोड़ कर भगवान की  अलग-अलग से स्तुति की पर भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ।

 इसके बाद देवताओं ने माता लक्ष्मी को उनके निकट भेजा पर भगवान के उग्र रूप को देखकर वे भी भयभीत हो गयीं।

 तब ब्रह्मा जी ने प्रह्लाद से कहा – ” बेटा ! तुम्हारे पिता पर ही तो भगवान क्रुद्ध हुए थे, अब तुम्ही जाकर उनको शांत करो। “

तब प्रह्लाद भगवान के समीप जाकर हाथ जोड़कर साष्टांग भूमि पर लोट गए और उनकी स्तुति करने लगे। बालक प्रह्लाद को अपने चरणों में पड़ा देख कर भगवान दयालु हो गए और उसे उठा कर गोद में बिठा लिया और प्रेमपूर्वक बोले –” वत्स प्रह्लाद ! तुम्हारे जैसे भक्त को यद्यपि किसी वस्तु की अभिलाषा नहीं रहती फिर भी तुम केवल एक मन्वन्तर तक मेरी प्रसन्नता के लिए इस लोक में दैत्याधिपति के समस्त भोग स्वीकार कर लो।

भोग के द्वारा पुण्यकर्मो के फल और निष्काम पुण्यकर्मों के द्वारा पाप का नाश करते हुए समय पर शरीर का त्याग करके समस्त बंधनों से मुक्त होकर तुम मेरे पास आ जाओगे। देवलोक में भी लोग  तुम्हारी कीर्ति का गान करेंगे। “

यह कहकर भगवान नृसिंह वहीँ अंतर्ध्यान हो गए। विष्णु पुराण में कहा गया है कि ” भक्त प्रह्लाद की कहानी को जो भी सुनते हैं उनके पाप  नष्ट हो  जाते हैं।

होलिका दहन, जिसे छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है। होलिका दहन का मुहूर्त किसी त्यौहार के मुहूर्त से ज्यादा महवपूर्ण और आवश्यक है। यदि किसी अन्य त्यौहार की पूजा उपयुक्त समय पर न  की जाये तो मात्र पूजा के लाभ से वञ्चित होना पड़ेगा परन्तु होलिका दहन की पूजा अगर अनुपयुक्त  समय पर हो जाये तो यह दुर्भाग्य और पीड़ा देती है। 

इस बार होली पर कई योग बन रहे हैं। 

इस साल होली पर ध्रुव योग, अमृत योग, सिद्धि योग बन रहे हैं। ये तीनों योग बहुत शुभ माने जाते हैं। 

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते  हैं। पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः दो नियम ध्यान में रखने चाहिए  पहला- उस दिन 'भद्रा' नहीं होनी चाहिए। दूसरी बात- उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में  पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए।

 होलिका दहन से पहले होली का पूजन किया जाता है। पूजा सामग्री में एक लोटा गंगाजल यदि  उपलब्ध न हो तो ताजा जल भी लिया जा सकता है, रोली, माला, रंगीन अक्षत, गंध के लिये धूप या  अगरबत्ती, पुष्प, गुड़, कच्चे सूत का धागा, साबूत हल्दी, मूंग, बताशे, नारियल एवं नई फसल के अनाज  गेंहू की बालियां, पके चने आदि। पूजा सामग्री के साथ होलिका के पास गोबर से बल्ले रखे जाते  हैं।होलिका दहन के शुभ मुहूर्त के समय चार मालाएं अलग से रख ली जाती हैं। जो मौली, फूल, गुलाल, ढाल और खिलौनों से बनाई जाती हैं। इसमें एक माला पितरों के नाम की, दूसरी श्री हनुमान जी के लिये, तीसरी शीतला माता, और चौथी घर परिवार के नाम की रखी जाती है। इसके पश्चात पूरी श्रद्धा  से होली के चारों और परिक्रमा करते हुए कच्चे सूत के धागे को लपेटा जाता है। होलिका की परिक्रमा  तीन या सात बार की जाती है। इसके बाद शुद्ध जल सहित अन्य पूजा सामग्रियों को एक एक कर होलिका को अर्पित किया जाता है। पंचोपचार विधि से होली का पूजन कर जल से अर्घ्य दिया जाता है। 

राशिनुसार होली की पूजा

मेष राशि –मेष राशि वाले होलिका दहन खैर या खादिर की लकड़ी से करें, साथ में गुड़ की आहुति भी  दें। ऐसा करने से आपको मानसिक परेशानियों से निजात मिलेगा।

वृष राशि – इस राशि के जातक होलिका दहन गूलर टा ऊमर की लकड़ी से करें और चीनी से आहति दें। ऐसा करने से सभी कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होंगी।

मिथुन राशि – मिथुन राशि वाले अपामार्ग या लटजीरा और गेंहू की बाली से होलिका दहन करें, साथ ही  कपूर से आहुति दें। ऐसा करने से आपकी धन से जुड़ी परेशानियों का समाधान होगा।

कर्क राशि – कर्क राशि वाले पलाश की लकड़ी से होलिका दहन करें और लोबान से आहुति दें। ऐसा करने से इस राशि के जातकों को नौकरी और करियर से जुड़ा शुभ सामाचार मिलेगा।

सिंह राशि – सिंह राशि वाले आक या मदार की लकड़ी से होलिका दहन करें और गुड की आहुति देकर पितरों को याद करना न भूलें। ऐसा करने से व्यापार से जुड़ी आपकी समस्त परेशानियां दूर हो जाएंगी।

कन्या राशि – कन्या राशि के जातक अपामार्ग की लकड़ी से होलिका दहन करें, कपूर की आहुति दें और साथ ही सभी देवी देवताओं का स्मरण करें। ऐसा करने से कार्यक्षेत्र में आने वाली सभी बाधाएं दूर  होंगी।

तुला राशि – तुला राशि वाले जातक होलिका दहन में गूलर की लकड़ी जलाएं और कपूर की आहुति दें। ऐसा करने से जीवन की परेशानियों से निजात मिलेगी।

वृश्चिक राशि – इस राशि वाले खैर की लकड़ी से हालिका दहन करें और गुड़ की आहुति दें। ऐसा करने  से आपको लाभ मिलेगा।

धनु राशि – धनु राशि वाले पीपल की लकड़ी से होलिका दहन करें और जौ व चना की आहुति दें। साथ में भगवान विष्णु की पूजा भी करें। ऐसा करने से पदोन्नति में आने वाली बाधाएं दूर होंगी।

मकर राशि- वाले शमी की लकड़ी से होलिका दहन करें और तिल की आहुति दें। ऐसा करने से आपके जीवन में आने वाली परेशानियां दूर होंगी।

कुंभ राशि – आप शमी की लकड़ी से होलिका दहन करें और तिल की आहुति दें। ऐसा करने से कर्ज आदि की समस्या से यदि परेशान हैं तो उससे मुक्ति पा सकेंगे।

मीन राशि- मीन राशि वाले जातक पीपल की लकड़ी से होलिका दहन करें और जौ व चना की आहुति  दें। इसके बाद पितरों का आभार व्यक्त करें। ऐसा करने से आपकी सभी स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियां दूर हो जाएंगी।

होलिका दहन का बहुत महत्व है। मान्यता है कि इस दिन समाज की समस्त बुराईयों का अंत होता है। 

यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। 

अब आपको कुछ ऐसे उपाय बताते हैं जिन्हें करने से आपको सुख-शांति,लाभ की प्राप्ति होगी।

 * होलिका दहन के दिन शरीर में उबटन लगा कर उसे होलिका में जलाने से नकारात्मक यानी निगेटिव शक्तियां दूर होती हैं।

 * घर, दुकान और कार्यस्थल की नजर उतार कर उसे होलिका में दहन करने से लाभ होता है।

 * होलिका दहन के बाद जलती अग्नि में नारियल दहन करने से नौकरी की बाधाएं दूर होती हैं।

 * जो लोग लगातार बीमारी से परेशान रहते हैं उन्हें होलिका दहन के बाद बची राख मरीज के सोने वाले स्थान पर छिड़क देना चाहिए इससे रोग से मुक्ति मिल सकती है। 

 * किसी को कार्य में सफलता प्राप्ति में अड़चन आ रही हो तो होलिका में नारियल, पान तथा सुपारी चढ़ानी चाहिए।

 * घर में निरंतर झगड़ा या कलह होता हो तो उससे मुक्ति पाने और सुख-शांति के लिए होलिका की अग्नि में जौ का आटा चढ़ाना चाहिए।

 * होलिका दहन के दूसरे दिन ठंड़ी राख लेकर उसे लाल रुमाल में बांधकर पैसों के स्थान पर रखने से व्यर्थ में होने वाले खर्च रुक जाते हैं।

 *विवाह में देरी हो रही हो या अड़चन आ रही हो तो होली के दिन सुबह एक पान के पत्ते पर समूची  सुपारी और हल्दी की गांठ लेकर शिवलिंग पर चढ़ाएं और फिर बिना पलटे घर आ जाएं। अगले दिन भी यही प्रयोग करें। आशुतोष की कृपा से इच्छा पूरी होगी।

 * होली के दिन आधी रात को किसी पीपल वृक्ष के नीचे घी का दीपक जलाने और सात परिक्रमा  करने से सारी बाधाएं दूर होती हैं।

 * वास्तुदोषों से मुक्ति पाने के लिए होली दहन के अगले दिन सर्वप्रथम अपने इष्ट देव को गुलाल अर्पित कर अपने निवास के ईशान कोण पर पूजन कर गुलाल चढ़ायें। पूर्व और उत्तर दिशा जहां पर मिलती हैं उस स्थान को ईशान दिशा कहते हैं यह उपाय करने से आपका घर वास्तुदोष से मुक्त हो जायेगा।

 * यदि किसी के उपर कोई भय का साया है तो वह होली पर एक नारियल, एक जोड़ा लौंग व पीली सरसों इन सभी वस्तुओं को लेकर पीडि़त व्यक्ति के उपर से 21 बार उतार कर होली की अग्नि में डाल दें। सारा दुष्प्रभाव समाप्त हो जायेगा।

 * यदि आपको बार-बार आर्थिक हानि का सामना करना पड़ रहा है तो आप होलिका दहन की शाम को अपने मुख्यद्वार की चौखट पर दोमुखी आटे का दीपक बनायें। चौखट पर थोड़ा सा गुलाल छिड़ककर दीपक जला कर रख देना चाहिए। दीपक जलने के साथ ही मानसिक रूप से आर्थिक हानि दूर होने के लिए निवेदन करना चाहिए। 

 * होलिका दहन की राख को घर के चारों ओर और दरवाजे पर छिड़कें। ऐसा करने से घर में नकारात्मक शक्तियों का घर में प्रवेश नहीं होता है। माना जाता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।


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Thursday, March 25, 2021

सती अनुसुइया ने ब्रह्मा,विष्णु,महेश को क्यों बनाया शिशु ?



सती अनुसुइया महर्षि अत्रि की पत्नी थीं। अत्रि ऋषि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और सप्तऋषियों में से एक थे। अनुसुइया का स्थान भारतवर्ष की सती-साध्वी नारियों में बहुत ऊँचा है। इनका जन्म अत्यन्त उच्च कुल में हुआ था। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि अत्रि को इन्होंने पति के रूप में प्राप्त किया था। अत्रि मुनि की पत्नी जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थीं। इन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सेवा करके उन्हें प्रसन्न किया और ये त्रिदेव क्रमश: सोम, दत्तात्रेय और दुर्वासा के नाम से उनके पुत्र बने। अनुसुइया पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध हैं। वनवास काल में जब राम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी।

इस प्रसंग को पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में इस तरह प्रस्तुत किया है-

अनुसुइया के पद गहि सीता । मिली बहोरि सुशील विनीता।।

ऋषि पत्नी मन सुख अधिकाई। आशीष देई निकट बैठाई।।

दिव्य वसन भूषण पहिराये। जे नित नूतन अमल सुहाये।।

 इसी आश्रम में सतीअनुसुइया ने उनके पातिव्रत्य धर्म की परीक्षा लेने आये ब्रह्मा.विष्णु.महेश को शिशु बना दिया था। 

महर्षि अत्रि एवं माता सती अनुसुइया के आश्रम से पयस्विनी या मंदाकिनी नदी निकली है। ऐसा कहा एसा कहा जाता है कि सती अनुसुइया ने अपने तपोबल से मंदाकिनी को उत्पन्न किया था। तुलसीदास जी ने राममचरितमानस में इसके बारे में लिखा है कि-

नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रि प्रिया निज तप बल आनी।

कहा यह जाता है कि अत्रि मुनि गंगा स्नान के लिए प्रतिदिन प्रयागराज जाते थे। यह देख कर अनुसुइया ने एक बार ध्यानस्थ होकर कहा कि अगर मेरे तपोबल में शक्ति है तो गंगा को यहां हमारे आश्रम के पहाड़ से निकलना होगा। कहते हैं कि उनके तप के प्रभाव से पहाड़ से निकले स्रोत ने नदी का रूप ले लिया जो मंदिकनी या पयस्वनी कहलायी। आपके इस यूट्यूबर राजेश त्रिपाठी ने कभी स्वयं पहाड़ की तलहटी से निकलते स्रोत से बनती नदी देखी थी। 2016 में अपनी तीसरी चित्रकूट यात्रा में पाया अब वह स्रोत नहीं दिखते क्योंकि एक बार आयी विनाशक बाढ़ ने वहां का भूगोल ही बदल दिया। वे स्रोत खो गये हालांकि नदी के तट में सीमेंट के घेरे में कुछ स्रोत सुरक्षित रखे गये हैं। सुरम्य वनांचल और पहाड़ों से घिरा यह आश्रम बहुत ही सुरम्य है। बाढ़ में पुराना अनुसइया आश्रम भी क्षतिग्रस्त हो गया था उसके स्थान पर भव्य मंदिर बनाया गया है। इस भव्य मंदिर का  जो वीडियो आप यहां देख रहे हैं वह इस यूट्यूबर ने 2016 में अनुसूइया आश्रम में बनाया था। वीडियो में भव्य मंदिर के सामने प्रवाहमान मंदाकिनी नदी परिलक्षित है। अनुसुइया आश्रम चित्रकूट धाम के रामघाट से 18 किलोमीटर की दूरी पर है।

अब मूल प्रसंग में आते हैं जिसके अनुसार इस आश्रम में अनुसुइया ने तीन देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को अपनी दिव्य शक्ति से बाल स्वरूप बना कर पलने में पौढ़ा दिया था। क्योंकि ये तीनों माँ अनुसुइया की परीक्षा लेने आये थे। सती अनुसुइया द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और महेश को बालक बना देने और अपना दुग्धपान कराने की कथा इस प्रकार है। एक बार नारदजी विचरण कर रहे थे तभी उन्होंने तीनों देवियां मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां पार्वती को आपस में कुछ विमर्श करते देखा। तीनों देवियां अपने सतीत्व और पवित्रता की चर्चा कर रही थीं। नारद जी उनके पास पहुंचे और उन्हें अत्रि महामुनि की पत्नी अनुसुइया के असाधारण पातिव्रत्य के बारे में बताया। नारद जी बोले कि अनुसुइया के समान पवित्र और पतिव्रता तीनों लोकों में नहीं है। तीनों देवियों को मन में अनुसुइया के प्रति ईर्ष्या होने लगी। तीनों देवियों ने सती अनुसुइया के पातिव्रत्य को खंडित करने के लिए अपने पतियों से कहा तीनों ने उन्हें बहुत समझाया पर पर वे नहीं मानीं।  

 विशेष आग्रह करने पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सती अनुसुइया के सतीत्व और ब्रह्मशक्ति को परखने की बात सोची। जब अत्रि ऋषि आश्रम से कहीं बाहर गए थे तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ने संन्यासियों का भेष धारण किया और अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंच कर भिक्षा मांगने लगे। 

 अतिथि-सत्कार की परंपरा के चलते सती अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत कर उन्हें खाने के लिए निमंत्रित किया। लेकिन संन्यासियों के भेष में त्रिमूर्तियों ने एक स्वर में कहा,-‘हे साध्वी, हमारा एक नियम है कि जब तुम निर्वस्त्र होकर भोजन परोसोगी, तभी हम भोजन करेंगे।'

 अनसुइया असमंजस में पड़ गई कि इससे तो उनके पातिव्रत्य धर्म के खंडित होने का संकट है। उन्होंने मन ही मन ऋषि अत्रि का स्मरण किया। दिव्य शक्ति से उन्होंने जाना कि यह तो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। मुस्कुराते हुए माता अनुसूया बोली 'जैसी आपकी इच्छा' इसके बाद तीनों संन्यासियों पर जल छिड़क कर उन्हें तीन शिशुओं में बदल दिया। सुंदर शिशु देख कर माता अनुसूया के हृदय में मातृत्व भाव उमड़ पड़ा। शिशुओं को स्तनपान कराया, दूध-भात खिलाया, गोद में सुलाया। तीनों गहरी नींद में सो गए।

अनुसुइया माता ने तीनों को झूले में सुलाकर कहा- ‘तीनों लोकों पर शासन करने वाले त्रिमूर्ति मेरे शिशु बन गए, मेरे भाग्य को क्या कहा जाए। फिर वह मधुर कंठ से लोरी गाने लगीं।

 इस प्रसंग पर बहुत ही मनहारी गीत है-

माता अनुसुइया ने डाल दिया पालना,

झूल रहे तीन देव बन करके लालना।

मारे खुशी के मैया फूली नहीं समाती है,

गोदी में लेती कभी पालना झुलाती है।

उनके भाग्य की आज को करे सराहना,

झूल रहे तीन देव बन करके लालना।.....

स्वर्ग लोक छोड़ मृत्यु लोक पधारे हो,

ऋषियों की कुटिया में रहने को गुजारे हो।

आज मेरे घर में आये लेने को बड़ाई,

भूल गये भगवान तुम सारी चतुराई।

पतिव्रत देवियों से आज पड़ा सामना,

झूल रहे तीन देव बन करके लालना।......

उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा, एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम पर उड़ने लगा और एक राजहंस कमल को चोंच में लिए हुए आया और आकर द्वार पर उतर गया। यह दृश्य देखकर नारद, लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे।

 नारद ने विनयपूर्वक अनुसुइया से कहा- ‘माता अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर देख कर यह तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। यह अपने पतियों को ढूंढ़ रही थीं। कृपया इनके पतियों को इन्हें सौंप दीजिए।'

 अनुसुइया ने तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- ‘माताओं, झूलों में सोने वाले शिशु अगर आपके पति हैं तो इन्हें आप ले जा सकती हैं।'

 लेकिन जब तीनों देवियों ने तीनों शिशुओं को देखा तो एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती भ्रमित होने लगीं। 

नारद ने उनकी स्थिति जानकर उनसे पूछा- ‘आप क्या अपने पति को पहचान नहीं सकतीं? जल्दी से अपने-अपने पति को गोद में उठा लीजिए।'

 देवियों ने जल्दी में एक-एक शिशु को उठा लिया। वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां शर्मिंदा होकर दूर जा खड़ी हो गईं। तीनों देवियों ने माता अनुसूया से क्षमा याचना की और यह सच भी बताया कि उन्होंने ही परीक्षा लेने के लिए अपने पतियों को बाध्य किया था। फिर प्रार्थना की कि उनके पति को पुन: अपने स्वरूप में ले आएं। 

माता अनुसुइया ने त्रिदेवों को उनका रूप प्रदान किया। तीनों देव सती अनुसुइया से प्रसन्न हो बोले, देवी ! वरदान मांगो।

 त्रिदेव की बात सुन अनसूया बोलीः- “प्रभु ! आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें ये वरदान चाहिए।'  

 तभी से वह मां सती अनुसूया के नाम से प्रख्यात हुई तथा बाद में भगवान दतात्रेय रूप में भगवान विष्णु का, चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म माता अनुसूया के गर्भ से हुआ। कुछ लोग ऐसा मत बी प्रस्तुत करते हैं कि ब्रह्मा के अंश से चंद्र, विष्णु के अंश से दत्तात्रेय तथा शिव के अंश से दुर्वासा का जन्म हुआ। 

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Tuesday, March 23, 2021

क्या सचमुच द्रौपदी के पांच पति थे?


यह प्रश्न उठाते हुए कि क्या सचमुच द्रौपदी के पांच पति थे मुझे विश्वास है कि इस पर बहुत से लोग प्रश्न उठायेंगे कि मैं प्रचलित तथ्यों के विपरीत जा रहा हूं या उलटी धारा में बहने की कोशिश कर रहा हूं। मेरी ऐसी कोई इच्छा नहीं है लेकिन अगर यह प्रतीत हो कि द्रौपदी को लेकर प्रस्तुत किये गये तथ्य कहीं भ्रम पैदा करते हैं तो उनका भी निराकरण करना या उन पर प्रश्न उठाना सर्वथा उचित है। 

इस क्रम में यह तथ्य भी ध्यान में रखने लायक है कि हमारे मूल धार्मिक ग्रंथों में कुछ लोगों द्वारा कई तरह की विकृतियां की गयी हैं ताकि हमारे महापुरुषों, आदर्श धार्मिक पात्रों के चरित्र को विकृत किया जा सके। सत्य सनातन धर्म की गलत तस्वीर पेश की जा सके जिस पर भारत क्या विश्व को गर्व था। ऐसा संस्कृत के ज्ञाता विदेशी विद्वान व भारत के ही कुछ धन लोलुप विद्वान ब्राह्मणों द्वारा किया गया है। ऐसे में जहां संदेह हो वहां प्रश्न उठाना अनुचित तो नहीं। द्रौपदी युधिष्ठर की ही पत्नी थीं पांचों पांडवों की नहीं इसे सत्यापित करनेवाले कई प्रमाण मिलते हैं।

द्रौपदी का जन्‍म एक यज्ञ कुंड से हुआ था। द्रौपदी के पिता द्रुपद ने पुत्र की इच्‍छा से पुत्राकामेष्टि यज्ञ किया था। वह चाहते थे कि जो पुत्र इस यज्ञ कुंड से निकलेगा वह द्रोणाचार्य से बदला लेगा। मगर यज्ञ से दृष्‍टद्युम्न के साथ उसकी बहन द्रौपदी का भी जन्‍म हुआ। यही कारण है कि द्रौपदी को यज्ञसेनी भी कहा जाता है। वे राजा द्रुपद की पुत्री थीं इसलिए उनके पिता ने उन्‍हें अपना नाम दिया था। इसीलिए वे द्रौपदी कहलायीं और उनका यही नाम सर्वाधिक प्रचलित है। 

द्रौपदी का जन्‍म पांचाल राज्‍य में हुआ था और वह वहां कि राजकुमारी थी। इसलिए लोग उन्‍हें पांचाली भी कहते थे। ऐसा माना जाता है कि महाभारत की मूल कथा में अनेक परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों में आर्य-संस्कृति को काफी दयनीय स्थिति में प्रस्तुत किया गया है। द्रौपदी के पांच पति वाली कथा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। महाभारत के आदि-पर्व में द्रौपदी के पांच पतियों का उल्लेख पाया जाता है। महाभारत की द्रौपदी मूल कथा के अतिरिक्त द्रौपदी के एक और रूप का उल्लेख मिलता है। इनमें द्रौपदी के परस्पर विरोधी चरित्र सुनने को मिलते हैं। एक तरफ उसे पंचकन्या, सती जैसे सम्मानजनक स्थान दिया गया है तो दूसरी ओर उन्हें पांच पतियों की पत्नी कह कर उनका चरित्र हनन भी किया गया है।  द्रौपदी महाभारत की सबसे प्रसिद्ध एक आदर्श पात्र हैं जो पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री और बाद में तथाकथित पांचों पाण्डवों की पत्नी कही जाने लगी। 

 राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी के विवाह के लिए स्वयंवर रचाया था। उस स्वयंवर में ब्राह्मण वेश में पांच पांडव भी शामिल हुए थे जो उन दिनों अज्ञातवास झेल रहे थे। एक ओर धनुष-बाण पड़ा था और दूसरी ओर आकाश में कृत्रिम यंत्र में लिपटा लक्ष्य मछली। नीचे उसका प्रतिबिंब देख कर उस घूमते लक्ष्य को भेदना था जो आसान नहीं था। जो भी कुलीन वीर व्यक्ति या राजा उस लक्ष्य का भेदन कर दे वही द्रौपदी का पति बनता। लेकिन इस लक्ष्य को कोई भी राजा वेध नहीं सका। इसके बाद जब कर्ण उठा, तो द्रौपदी ने  यह कह कर उनका अपमान कर दिया कि मैं एक सूत पुत्र से विवाह नहीं करूंगी। तब ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन अपने आसन से उठे और उन्होंने लक्ष्य का वेध कर दिया। उनके पराक्रम से प्रसन्न होकर द्रौपदी ने उनके गले में जयमाला डाल दी। अर्जुन के लक्ष्य-वेध करने पर मंडप में बैठे हुए ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुए लेकिन राजाओं ने शोर मचाना प्रारम्भ कर दिया। युधिष्ठिर यह सह नहीं सके और नकुल एवं सहदेव को लेकर वहां चले गये जहां वे अपने अज्ञातवास में रह रहे थे। सभा में रह गये अर्जुन और भीम। द्रुपद ने इन दोनों वीरों से कोलाहल शांत करने के लिए कहा। अर्जुन कर्ण से भिड़ गया और भीम शल्य से। कर्ण ने ब्राह्मण विजय को स्वीकार कर लिया और शल्य भीम द्वारा बांह पकड़ कर दूर फेंक दिया गया। इतने में कृष्ण आ गये और उन्होंने यह कह कर मामला शांत कर दिया कि द्रौपदी का वरण न्यायपूर्वक हुआ है। द्रौपदी को लेकर जब अर्जुन कुंती के पास पहुंचे और कहने लगे कि मां, हम भिक्षा ले आये हैं, तो कुंती ने कहा- ‘पांचों भाई आपस में बांट लो।’ कुंती ने जब बाहर निकलकर  द्रौपदी को देखा, तो वह अपने निर्णय पर पछताने लगी। यहीं से द्रौपदी के पांच पति वाली कथा प्रारंभ होती है।

 यहां प्रश्न यह उठता है कि अगर पांडवों ने मां से यह कहा कि वे भिक्षा लाये हैं तो मां ने घर के भीतर से कह दिया आपस में बांट लो लेकिन जब बाहर उन्होंने पाया कि पुत्र भिक्षा नहीं एक स्त्री द्रौपदी लाये हैं तो क्या वे अपना निर्णय बदल नहीं सकती थीं। उनका कहा ब्रह्मवाक्य तो था नहीं कि बदला ना जाये। एक स्त्री को पांच पुरुषों में बांटने का अधर्म वे क्यों करतीं। 

  मां ने बस्तु समझ बेटों से उसे आपस में बांटने की बात कही थी जैसा वे सदैव करती थीं। स्त्री को वस्तु की तरह पांचों भाइयों में बांटने की बात उन्होंने नहीं कही थी। द्रौपदी के पांच पति होने की यह क्षेपक व बाद में गढ़ी गयी कहानी तो है पर सत्य नहीं है। यह द्रौपदी जैसे चरित्र के साथ उचित नहीं था। द्रौपदी जैसी विदुषी नारी के साथ इस तरह से बहुत अन्याय किया है। क्षेपक व सुनी सुनायी बातों के आधार पर द्रौपदी पर कई लांछन लगाये गये हैं, जिससे वह अत्यंत पथभ्रष्ट और धर्म भ्रष्ट नारी साबित होती है। एक ओर धर्मराज युधिष्ठिर जैसा परमज्ञानी उनके पति हैं, जिनका सर्वत्र गुणगान किया गया है दूसरी ओर द्रौपदी पर तर्कहीन आरोप लगाये गये। सबसे गंभीर आरोप तो यही है कि उनके पांच पति थे।

एक कथा यह भी आती है कि  द्रौपदी के स्वयंबर में उपस्थित ब्राह्मणवेशी वीर कौन हैं यह पता लगाने के लिए राजा द्रुपद के पुत्र द्रौपदी के भाई  धृष्टद्युम्न पांडवों के पीछे-पीछे उनका सही ठिकाना जानने और उनका वास्तविक रूप समझने के लिए भेष बदलकर उनका पीछा कर रहे थे। उन्होंने पांडवों की चर्चा सुनी उनका शिष्टाचार देखा। पांडवों द्वारा दिव्यास्त्रों, रथों, हाथियों, तलवारों आदि के विषय में चर्चा करते सुना। यह सुन कर उसका से उनका संशय दूर हो गया और वह समझ गये कि ये पांचों लोग पांडव ही हैं। वह प्रसन्न होकर वापस आये और उन्होंने अपने पिता से कहा-‘पिताश्री! जिस प्रकार वे युद्घ का वर्णन कर रहे थे उससे तनिक भी संदेह नहीं वे क्षत्रिय ही हैं। हमने सुना है कि वे कुंती पुत्र हैं जो लाक्षागृह की अग्नि में जलने से बच गये थे। वे पांचों पांडु पुत्र ही हैं।’.

पुत्र से यह समाचार पाकर राजा बहुत प्रसन्न हुए। तब उन्होंने अपने पुरोहित को पांडवों के पास भेजा कि उनसे यह जानकारी ली जाए कि क्या वह महात्मा पांडु के पुत्र हैं? पुरोहित ने जाकर पांडवों से कहा- पांचाल नरेश द्रुपद आप लोगों का परिचय जानना चाहते हैं। अर्जुन की ओर संकेत करते हुए वे ब लेृइस वीर पुरूष को लक्ष्यभेद करते देख कर राजा बहुत प्रसन्न हुए। उनकी इच्छा थी कि मैं अपनी इस पुत्री का विवाह पांडु कुमार से करूं। ” तब पुरोहित से धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा- ‘‘पांचाल राज द्रुपद ने  लक्ष्यभेद की शर्त रख कर अपनी पुत्री देने का निश्चय किया था। उस वीर पुरूष ने उसी शर्त को पूर्ण करके यह कन्या प्राप्त की है, परंतु हे ब्राहमण! राजा द्रुपद की जो इच्छा थी वह भी पूर्ण होगी।’ युधिष्ठिर कह रहे हैं कि द्रौपदी का विवाह उसके पिता की इच्छानुसार पांडु पुत्र से ही होगा। इस राज कन्या को मैं अपने लिए ग्रहण करने योग्य एवं उत्तम मानता हूं। ” अभी यह बात चल ही रही थी कि तभी पांचाल राज से एक व्यक्ति आया और उसने कहा-“राजभवन में आप लोगों के लिए भोजन तैयार है”। पूरे सम्मान के साथ पांडवों को राजा द्रुपद के राज भवन ले जाया गया। उन्हें देखकर राजा द्रुपद उनके सभी मंत्री, पुत्र, मित्र बहुत प्रसन्न हुए। भोग विलास की सामग्री छोड़ पहले वहां गये जहां युद्घ के हथियार और दूसरा साज-सामान रखा था। यह देख राजा द्रुपद बहुत अधिक प्रसन्न हुए। अब उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि ये राजकुमार पांडु पुत्र ही हैं। युधिष्ठिर ने पांचाल राज से कहा, “राजन! आप प्रसन्न हों ,आपके मन में जो कामना पूर्ण हो गयी है. हम क्षत्रिय महात्मा पांडु के पुत्र हैं”।  

 युधिष्ठिर के ये वचन सुनकर महाराज द्रुपद बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने पांचों पांडवों के अपने राजभवन में ही ठहराने का प्रबंध कर दिया। पांडव वही रहने लगे।

उसके बाद महाराज द्रुपद ने अगले दिन अपने पुत्रों के साथ  जाकर युधिष्ठिर से कहा- पांडु कुल  को आनंदित करने वाले ये महाबाहु अर्जुन आज के पुण्यमय दिवस में मेरी पुत्री को विधि पूर्वक ग्रहण करें। और अपने कुलोचित विध-विधान पालन करना आरंभ कर देंष युधिष्ठिर बीच में ही बोल उठते हैं, “राजन! विवाह तो मेरा भी करना होगा. धर्मपुत्र युधिष्ठिर अनुचित विवाह सम्बंध के लिए हठ करते हैं। द्रुपद उनसे कहते हैं-

नैकस्या बहवःपुंसःश्रूयन्ते पतयःक्वचित्।

लोकवेदविरुद्धं त्वं नाधर्म धर्मविच्छुचिः।

कर्तुमर्हसि कौन्तेय कस्मात्ते बुद्धिरीदृशी।

इसका अर्थ यह है कि एक स्त्री के अनेक पति नहीं होते। अनेक पति वाली बात आर्यों के समाज में प्रचलित नहीं है। वह लोक में प्रचलित प्रथा के विरुद्ध है और वेद भी इसका विरोध करते हैं। हे युधिष्ठिर, तुम तो धर्मात्मा हो, ऐसा अधर्म का कार्य तुम क्यों करने जा रहे हो, तुम्हारी ऐसी धर्म-विरोधी बुद्धि कैसे हो गयी? 

महाभारत में ही ऐसे उदाहरण हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि द्रौपदी के एक ही पति थे और वे युधिष्ठिर थे। महाभारत के आदि पर्व के 32 वें अध्याय में लिखा है- तमब्रवीत् ततो राजा धर्मात्मा च युधिष्ठिर। ममापि दारसबन्धः कार्यस्तावद् विशापते।। ( 1.32.49) तब धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर ने उनसे कहा- राजन्! विवाह तो मेरा भी करना होगा। भवान् वा विधिवत् पाणिं गृह्णातु दुहितुर्मम। यस्य वा मन्यसे वार तस्य कृष्णामुपादिश।। (1.32.50) अर्थात् द्रुपद बोले- हे वीर! तब आप ही विधि पूर्वक मेरी पुत्री का पाणिग्रहण करें अथवा आप अपने भाइयों में से जिसके साथ चाहे, उसी के साथ कृष्णा को विवाह की आज्ञा दे दें। ततः समाधाय स वेदपारगो जुहाव मन्त्रैर्ज्वलितं हुताशनम्। युधिष्ठिरं चाप्युषनीय मन्त्रविद्नियोजयामास सहैव कृष्णया।। ( 1.32.51) द्रुपद के ऐसा कहने पर वेद के पारंगत विद्वान् मन्त्रज्ञ पुरोहित धौम्य ने वेदी पर प्रज्वलित अग्नि की स्थापना करके उसमें मन्त्रों द्वारा आहुति दी और युधिष्ठिर को बुलाकर कृष्णा के साथ उनका गठबन्धन कर दिया। प्रदक्षिणं तौ प्रगृहीतपाणिकौ समातयामास स वेदपारगः। ततोऽयनुज्ञाय तमाजिशोभिनं पुरोहितो राजगृहाद् विनिर्ययौ।। (1.32.52) वेदों के पारंगत विद्वान् पुरोहित ने उन दोनों का पाणिग्रहण कराकर उनसे अग्नि की प्रदक्षिणा करवाई, फिर (अन्य शास्त्रोक्त विधियों का अनुष्ठान कराके) उनका विवाह कार्य सपन्न कर दिया। तत्पश्चात् संग्राम में शोभा पाने वाले युधिष्ठिर को अवकाश देकर पुरोहित जी भी उस राजभवन से बाहर चले गये। महाभारत के इस पूरे प्रकरण से ज्ञात हो रहा है कि द्रौपदी का पाणिग्रहण अर्थात् विवाह संस्कार केवल युधिष्ठिर के साथ हुआ था। अर्थात् द्रौपदी का पति युधिष्ठिर ही थे न कि पाँचों पाँडव।

इसके बाद द्रुपद ने युद्धिष्ठर से कहा- हे वीर! तब आप ही विधि पूर्वक मेरी पुत्री से विवाह करें। अथवा आप अपने भाईयों में से जिसके साथ चाहें उसी के साथ मेरी पुत्री का विवाह करने की आज्ञा दें।'.इन घटनाओं से पांच पति वाली कथा आधारहीन ही प्रतीत होती है। यदि कुंती ने ‘पांचों बांट खाओ’ कह भी दिया हो, मूल कथा में कुंती के मुख से ये शब्द निकले ही नहीं। तैत्तिरीय उपनिषद की सूक्ति से भी इसका निराकरण हो जाना चाहिए – “यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि न इतराणि” अर्थात हमारे लिए जो सुंदर चरित्र है उसकी ही तुम उपासना या अनुसरण करो इसके सिवा दूसरी किसी चीज की नहीं। इन दो घटनाओं से पांच पति वाली कथा प्रमाणित नहीं होती।

 द्रुपद के कहने पर पुरोहित धौम्य ने वेदी में मंत्रों के साथ आहुति दी और युधिष्ठिर व द्रौपदी का विवाह संपन्न कराया। द्रौपदी ने सर्वप्रथम अपनी सास कुंती से आशीर्वाद लिया, तब माता कुंती ने कहा, “ पुत्री! जैसे इंद्राणी इंद्र में, स्वाहा अग्नि में, भक्ति भाव एवं प्रेम रखती थीं उसी प्रकार तुम भी अपने पति में अनुरक्त रहो।’ इस संदर्भ को सत्यापित करता महाभारत का एक श्लोक है-

यथेन्द्राणी, हरिहरे स्वाहा चैव विभावसौ।

रोहिणी व यथा सोमे दमयन्ती यथा नले।।

यथा वैश्रवणे भद्रा वसिष्ठे चाप्यरुन्धती।

यथा नारायणे लक्ष्मीस्तथा त्वं भव भर्तरि।।

जीवसूर्वीरसूभद्रि बहुसौख्यसमन्विता।

सुभगा भोगसम्पन्ना यज्ञपत्नी पतिव्रता।। 

इससे सिद्घ है कि द्रौपदी का विवाह अर्जुन से नहीं बल्कि युधिष्ठिर से हुआ था। इस सारी घटना का उल्लेख आदि पर्व में दिया गया है। उस साक्षी पर विश्वास करते हुए इस दुष्प्रचार से बचना चाहिए कि द्रौपदी के पांच पति थे। कुंती भी जब द्रौपदी को आशीर्वाद दे रही हैं तो उन्होंने भी कहा है कि तुम अपने पति में अनुरक्त रहो। उन्होंने पति शब्द का प्रयोग किया है पतियों का नहीं। इससे ही स्पष्ट हो जाता है कि द्रौपदी एक पति युधिष्ठर की पत्नी थीं पांचों पांडवों की नहीं। 

कुंती ने द्रौपदी को यह आशीर्वाद भी दिया था कि-

रूपलक्षणसंपन्नां शीलाचार रसमन्विताम्।

द्रौपदीमवद्त प्रेम्णा पृथाआशीर्वचनैः स्नुषाम्।।

जीवसूर्वोरसूर्भद्रे बहुसौख्यसमन्विता।

सुभगाभोगसम्पन्ना यज्ञपत्नी पतिव्रता।।

  अर्थात रूप लक्षण-सम्पन्ना, शील और आचार वाली द्रौपदी को आशीर्वाद देती हुई कुंती कहती है कि भद्रे, तुम वीरप्रसविनी, पतिव्रता और यज्ञपत्नी बनो। यहां पतिव्रता और यज्ञपत्नी दो शब्द उल्लेखनीय  हैं। एक पति ही जिसका व्रत है, उसे पतिव्रता और एक पति के साथ जो यज्ञ में भाग लेती है, उसे यज्ञपत्नी कहा जाता है। यदि यह मान लें कि द्रौपदी के पांच पति थे तो क्या वे इन मानकों पर खरी उतर पायेंगी। इससे यह सिद्ध होता है कि पांच पतियों वाली कथा बाद में जोड़ी गयी है। इसका सशक्त, सटीक प्रमाण विराटपर्व में मिलता है। प्रमाण यह है कि भीम कीचक का वध के बाद कहते हैं-

अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुर्भार्यापहारिणम्।

शांतिं लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रिकण्टकम्।।

अर्थात आज मैं कीचक को मारकर अपने भाई की पत्नी के ऋण से मुक्त हो गया.यहां भी भीम द्रौपदी को अपनी भार्या नहीं कहता. वह उसे अपने भाई की पत्नी कहता है। महाभारत के इन प्रमाणों से यही सिद्ध होता है कि द्रौपदी के पांच पति होने की कथा बाद में जोड़ी गयी है। ऐसी क्षेपक कथा को जोड़नेवालों का उद्देश्य क्या रहा होगा यह तो वही जानते होंगे।

इससे यह प्रमाणित होता है कि द्रौपदी के साथ बहुत अन्याय किया गया है। द्रौपदी को लेकर जो़ड़ी गयी इन क्षेपक कथाओं से भारतीय संस्कृति का अहित और अपमान हुआ है।

यह प्रश्न भी स्वाभाविक रूप से उठ सकता है कि जब स्वयंवर अर्जुन ने जीता तो विवाह युधिष्ठिर से क्यों हुआ। जो यह प्रश्न उठाते हैं वे द्रौपदी के पांच पति की कल्पित कथा पर प्रश्न क्यों नहीं उठाते।

द्रौपदी के विवाह का संपूर्ण वर्णन मात्र ४ श्लोक में है,  जिनका वर्णन हम पूर्व ही कर चुके हैं।

 द्रौपदी ने स्वयं को युधिष्ठिर की पत्नी कहा है। जब उनको कीचक बहुत परेशान करता है तो वे भीम के पास आकर कहती हैं 

"आशोच्यत्वं कुतस्तस्य यस्य भर्ता युधिष्ठिरः।

जानन् सर्वाणि दुःखानि कि मां त्वं परिपृच्छसि।।"

द्रौपदी कहती है— जिस स्त्री का पति युधिष्ठिर हो वह बिना शोक के रहे, यह कैसे सम्भव है? तुम तो मेरे दुःख को जानते हो तब भी पूछने क्यों हो?

  धृतराष्ट्र ने भी द्रौपदी को युधिष्ठिर की पत्नी कह कह संबोधित किया है-

हतोऽसि दुर्योधन मन्दबुद्धे यस्तवं सभायां कुरुपुंगवानाम्।

स्त्रियं समाभाषसि दुर्विनीत विशेषतो द्रौपदी धर्मपत्नीम्।।

महा० सभा—(७१-२५-९१२)

"रे मन्दबुद्धि दुर्योधन!  तू तो जीता ही मारा गया। दुर्विनीत! तू श्रेष्ठ कुरुवंशियों की सभा में अपने ही कुल की महिला एवं विशेषतः धर्मराज युधिष्ठिर की पत्नी द्रौपदी को लाकर उस से पापपूर्ण बात कर रहा है।

इन प्रमाणों से सिद्ध हो जाता है कि द्रौपदी के साथ सबसे बड़ा अन्याय हुआ है। द्रौपदी पर ये लांछन उन लोगो ने लगाये जो नारी को भोग की वस्तु समझते है।

महाभारत के कथानक में मिलावट की गयी है इसके लिए इतने प्रमाण काफी है। हमारा उद्देश्य किसी विवाद को हवा देना नहीं है हम यही चाहते हैं कि किसी विषय पर चर्चा हो तो समग्रता में हो उसके हर पक्ष का सम्यक विवेचन हो। अगर उस पर प्रश्न उठ रहे हों तो उन पर भी गौर करना चाहिए। हमारा उद्देश्य द्रौपदी के जीवन से जुड़े उस पक्ष को उजागर करना था जिसका उल्लेख ज्यादा नहीं हुआ। उद्देश्य द्रौपदी के जीवन का एक अलग पक्ष प्रस्तुत करना था इसलिए कोई इसे अन्यथा ना ले।

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Sunday, March 14, 2021

भीम में 10 हजार हाथियों के बल का रहस्य



वैसे तो महाभारत के पात्रों में कई वीरों की गाथा है लेकिन इनमें भीम को सबसे बली माना जाता है। कहते तो यहां तक हैं कि भीम में 10 हजार हाथियों का बल ता। पांच पांडवों में भीम पाण्डवों में दूसरे स्थान पर थे। उनकी माता भी कुंती और उनका जन्म पवनदेव के वरदान से हुआ था। ऋषि दुर्वासा ने कुंती की सेवा से प्रसन्न होकर उनको देवताओं का आह्वान करने का मंत्र सिखाया था।उसी के बल पर कुंती ने पवनदेव का आह्वान किया था जिनसे उन्हें भीम पुत्र के रूप में मिले। पांडु दूसरे पांडव भाइयों से अधिक भीम की प्रशंसा करते थे। सभी पाण्डवों में वे सर्वाधिक बलशाली हृष्ट-पुष्ट शरीर वाले थे। वे युधिष्ठर के भाई थे। भीम को भीमसेन नाम से भी पुकारा जाता था। महाभारत की गाथा उनके बल और शक्ति की प्रशंसा और वर्णन से भरी है। भीम सभी गदाधारियों में श्रेष्ठ थे इसमें उनकी बराबरी करनेवाला कोई नहीं था। हाथी की सवारी करने में भी कोई उनके जैसा योग्य नहीं  था। उनके बल के बारे में तो यह प्रसिद्ध था कि उनमें दस हज़ार हाथियों के बराबर का बल है। युद्ध कला में वे इतने कुशल थे कि अगर  क्रोध में आते तो कई धृतराष्ट्रों को परास्त कर सकते थे। वनवास काल में इन्होने  अनेक राक्षसों का वध किया जिसमें बकासुर एवं हिडिंब आदि प्रमुख हैं एवं अज्ञातवास में विराट नरेश के साले कीचक का वध करके द्रौपदी की रक्षा की। गदा युद़्ध में वे बहुत ही कुशल थे वे द्रोणाचार्य और बलराम के शिष़्य थे। उनसे ही उन्होंने युद्धकला व गदा युद्ध में प्रवीणता इन्हीं गुरुओं के बल पर पायी थी। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में राजाओं की कमी होने पर उन्होने मगध के शासक जरासंध को 

परास्त करके छियासी राजाओं को मुक्त कराया। द्रौपदी के चीरहरण का बदला लेने के लिए उन्होने दुःशासन की छाती फाड़ कर उसका रक्त पान किया।

 महाभारत के युद्ध में भीम ने ही सारे कौरव भाइयों का वध किया था।भीम के द्वारा दुर्योधन के वध के साथ ही महाभारत के युद्ध समाप्त हुआ था। पाण्डु पुत्र भीम के बारे में माना जाता है की उसमे दस हज़ार हाथियों का बल था जिसके चलते एक बार तो उसने अकेले ही नर्मदा नदी का प्रवाह रोक दिया था। भीम में दस हज़ार हाथियों का बल कैसे आया इसकी भी एक कहानी है। कौरवों का जन्म हस्तिनापुर में हुआ था जबकि पांचों पांडवों का जन्म वन में हुआ था। पांडवों के जन्म के कुछ वर्ष बाद पाण्डु का निधन हो गया। पाण्डु की मृत्यु के बाद वन में रहने वाले साधुओं ने विचार किया कि पाण्डु के पुत्रों, अस्थि तथा पत्नी को हस्तिनापुर भेज देना ही उचित है। इस प्रकार समस्त ऋषिगण हस्तिनापुर आए और उन्होंने पाण्डु पुत्रों के जन्म और पाण्डु की मृत्यु के संबंध में पूरी बात भीष्म, धृतराष्ट्र को बतायी। भीष्म को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कुंती सहित पांचों पांण्डवों को हस्तिनापुर बुला लिया।

हस्तिनापुर में आने के बाद पाण्डवों के वैदिक संस्कार सम्पन्न हुए। पाण्डव तथा कौरव साथ ही खेलने लगे। दौडऩे, निशाना लगाने तथा कुश्ती आदि सभी खेलों में भीम सभी धृतराष्ट्र पुत्रों को हरा देते थे। भीमसेन कौरवों से होड़ के कारण ही ऐसा करते थे लेकिन उनके मन में कोई वैर-भाव नहीं था।  दुर्योधन के मन में भीमसेन के प्रति दुर्भावना पैदा हो गई। उसने उचित अवसर मिलते ही भीम को मारने का विचार किया। दुर्योधन ने एक बार खेलने के लिए गंगा तट पर शिविर लगवाया। 

 वहां खाने-पीने इत्यादि सभी सुविधाएं भी थीं।दुर्योधन ने पाण्डवों को भी वहां बुलाया। एक दिन मौका पाकर दुर्योधन ने भीम के भोजन में विष मिला दिया। विष के असर से जब भीम अचेत हो गए तो दुर्योधन ने दु:शासन के साथ मिलकर उन्हें गंगा में डाल दिया। भीम इसी अवस्था में नागलोक पहुंच गए। वहां सांपों ने भीम को खूब डंसा जिसके प्रभाव से विष का 

असर कम हो गया। जब भीम को होश आया तो वे सर्पों को मारने लगे। सभी सर्प डरकर नागराज  वासुकि के पास गए और पूरी बात बताई। तब वासुकि स्वयं भीमसेन के पास गए। उनके साथ आर्यक नाग ने भीम को पहचान लिया। आर्यक नाग भीम के नाना का नाना था। वह भीम से बड़े प्रेम से  मिला। तब आर्यक ने वासुकि से कहा कि भीम को उन कुण्डों का रस पीने की आज्ञा दी जाए जिनमें  हजारों हाथियों का बल है। वासुकि ने इसकी स्वीकृति दे दी। तब भीम आठ कुण्ड पीकर एक दिव्य शय्या पर सो गए।

जब दुर्योधन ने भीम को विष देकर गंगा में फेंक दिया तो उसे बड़ा हर्ष हुआ। शिविर के समाप्त होने पर सभी कौरव व पाण्डव भीम के बिना ही हस्तिनापुर के लिए रवाना हो गए। पाण्डवों ने सोचा कि भीम आगे चले गए होंगे। जब सभी हस्तिनापुर पहुंचे तो युधिष्ठिर ने माता कुंती से भीम के बारे में पूछा। तब कुंती ने भीम के न लौटने की बात कही। सारी बात जानकर कुंती व्याकुल हो गई तब उन्होंने विदुर को बुलाया और भीम को ढूंढने के लिए कहा। तब विदुर ने उन्हें सांत्वना दी और सैनिकों को भीम को ढूंढने के लिए भेजा।

उधर नागलोक में भीम आठवें दिन रस पच जाने पर जागे। तब नागों ने भीम को गंगा के बाहर छोड़ दिया। जब भीम सही-सलामत हस्तिनापुर पहुंचे तो सभी को बड़ा संतोष हुआ। तब भीम ने माता कुंती व अपने भाइयों के सामने दुर्योधन द्वारा विष देकर गंगा में फेंकने तथा नागलोक में क्या-क्या हुआ, यह सब बताया। युधिष्ठिर ने भीम से यह बात किसी और को नहीं बताने के लिए कहा। युद्ध के भयंकर कांड का समापन योद्धाओं की मां, बहन, पत्नियों के रुदन तथा मृत वीरों की अंत्येष्टि क्रिया से हुआ। इसी निमित्त हस्तिनापुर पहुँचने पर धृतराष्ट्र को रोती हुई द्रौपदी, पांडव, सात्यकि तथा श्रीकृष्ण  भी मिले। यद्यपि व्यास तथा विदुर धृतराष्ट्र को पर्याप्त समझ चुके थे कि उनका पांडवों पर क्रोध अनावश्यक है। इस युद्ध के मूल में उनके प्रति अन्याय कृत्य ही था, अत: जनसंहार अवश्यभावी था  तथापि युधिष्ठिर को गले लगाने के उपरांत धृतराष्ट्र अत्यंत क्रोध में भीम से मिलने के लिए आतुर हो 

उठे। श्रीकृष्ण उनकी मनोगत भावना जान गये, अत: उन्होंने भीम को पीछे हटा, उनके स्थान पर लोहे की आदमक़द प्रतिमा धृतराष्ट्र के सम्मुख खड़ी कर दी। धृतराष्ट्र में अपार बल था। वे 

धर्म से विचलित हो भीम को मार डालना चाहते थे, क्योंकि उसी ने अधिकांश कौरवों का हनन किया था। अत: लौह प्रतिमा को भीम समझकर उन्होंने उसे दोनों बांहों में लपेटकर पीस डाला। प्रतिमा टूट गयी किंतु इस प्रक्रिया में उनकी छाती पर चोट लगी तथा मुंह से ख़ून बहने लगा, फिर भीम को मरा जान उसे याद कर रोने भी लगे। श्रीकृष्ण भी क्रोध से लाल-पीले हो उठे। 

बोले- "जैसे यम के पास कोई जीवित नहीं रहता, वैसे ही आपकी बांहों में भी भीम भला कैसे जीवित रह सकता था। आपका उद्देश्य जानकर ही मैंने आपके बेटे की बनायी भीम की लौह-प्रतिमा आपके सामने प्रस्तुत की थी। भीम के लिए विलाप मत कीजिये, वह जीवित है।" तदनंतर धृतराष्ट्र का क्रोध शांत हो गया तथा उन्होंने सब पांडवों को बारी-बारी से गले लगा लिया।

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Wednesday, March 10, 2021

क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि

  


महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस बार यह पर्व गुरुवार 11 मार्च को है। ऐसी मान्यता है कि सृष्टि का प्रारम्भ भी इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ महादेव के विशालकाय स्वरूप अग्निलिंग के उदय से हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। साल में होने वाली 12 मासिक शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। 

महाशिवरात्रि हिंदुओं के सबसे पावन त्योहारों में से एक माना जाता है। यह पर्व हर वर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को पड़ता है। इसे भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन की रात के रूप में माना जाता है। इसे प्रकृति और पुरुष के मिलन की रात भी माना जाता है। महाशिवरात्रि के दिन शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ लग जाती है। दिन भर जलाभिषेक होता है।इसके अतिरिक्त शिव का दुग्ध अभिषेक भी किया जाता है। 

महाशिवरात्रि व्रत के बारे में एक कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों का शिकार कर वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ के अंदर कैद कर दिया।  उस दिन शिवरात्रि थी। दुख और तनाव में डूबा शिकारी ध्यान में लीन होकर मठ में हो रही शिव-संबंधी धार्मिक प्रवचन सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की व्रत कथा भी सुनी।

शाम को साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने को कहा। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वादा किया और उसको बंधन मुक्त कर दिया गया। मुक्त होने के बाद वह शिकारी हमेशा की तरह शिकार के लिए निकला। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधेरा हो गया तो उसने जंगल में ही रात बितानी की सोची। वह वन में तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। अपने लिए डालों के बीच बैठने की जगह बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भवती हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ा कर ज्यों ही डेर खींची, हिरणी बोली- 'मैं गर्भवती हूं। शीघ्र ही प्रसव होना है। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आऊंगी, तब मार देना।'

शिकारी ने धनुष की डोर ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में गायब हो गई। डोर चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उसके अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया।

कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनय करते हुए कहा- 'हे शिकारी! मैं  अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया।

दो बार शिकार को खोकर वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजा भी सम्पन्न हो गई।

इसके बाद एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह अच्छा मौका था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली- 'हे शिकारी! मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।'

 शिकारी हंसा और बोला- 'सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्याकुल हो रहे होंगे।'

उत्तर में हिरणी ने फिर कहा- जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करो, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने का वादा करती हूं।

हिरणी की बात सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी के धनुष की तनी डोर देखकर मृग बोला- ' हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे पास आ जाऊंगा।'

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा- 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार वचन देकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मान कर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे पास वापस आ जाऊंगा।'

 शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही सही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।

अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिवजी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जानकर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए।

शिकारी की कथानुसार महादेव तो अनजाने में किए गए व्रत का भी फल दे देते हैं। पर वास्तव में महादेव शिकारी की दया भाव से प्रसन्न हुए। अपने परिवार के कष्ट का ध्यान होते हुए भी शिकारी ने मृग परिवार को जाने दिया। यह करुणा ही वस्तुत: उस शिकारी को उन पंडित एवं पुजारियों से उत्कृष्ट बना देती है जो कि सिर्फ रात्रि जागरण, उपवास एवं दूध, दही, बेल-पत्र आदि द्वारा शिव को प्रसन्न कर लेना चाहते हैं। इस कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कथा में 'अनजाने में हुए पूजन' पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव किसी भी प्रकार से किए गए पूजन को स्वीकार कर लेते हैं अथवा भोलेनाथ जाने या अनजाने में हुए पूजन में भेद नहीं कर सकते हैं।

वास्तव में वह शिकारी शिव पूजन नहीं कर रहा था। इसका अर्थ यह भी हुआ कि वह किसी तरह के किसी फल की कामना भी नहीं कर रहा था। उसने मृग परिवार को समय एवं जीवन दान दिया जो कि शिव पूजन के समान है।

 पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है। मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। 

शिव जी की पूजा के लिए महाशिवरात्रि का पर्व सबसे उत्तम माना गया है। इस दिन को भोलेनाथ के भक्त चरम उत्साह से मनाते हैं।

शिव की स्तुति के कुछ श्लोक 

शिव पञ्चाक्षरि स्तोत्र

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय।

नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै न काराय नम: शिवाय ॥॥


मन्दाकिनी सलिल चन्दन चर्चिताय नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।

मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै म काराय नम: शिवाय ॥॥


शिवाय गौरी वदनाब्ज वृन्द सूर्याय दक्षाध्वर नाशकाय।

श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय ॥3॥

वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य मुनीन्द्रदे वार्चित शेखराय।

चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय तस्मै व काराय नम: शिवाय ॥4॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।

दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै य काराय नम: शिवाय ॥5॥

पंचाक्षरमिदं पुण्यं य: पठेत शिव सन्निधौ।

शिवलोकम अवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥॥

महाशिवरात्रि व्रत और पूजा का शुभ मुहूर्त

महाशिवरात्रि: 11 मार्च 2021

पूजा मुहूर्त: महा शिवरात्रि 11 मार्च दिन गुरुवार को है। महाशिवरात्रि पूजा का सबसे शुभ समय 11 मार्च को 12:06 मिनट से 12 मार्च को 12:55 तक है।

संक्षिप्त पूजा विधि

शिवरात्रि के दिन स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए।

इसके उपरांत विधिवत पूजा आरंभ करनी चाहिए।

पूजा के दौरान कलश में जल या दूध भरकर शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए।

शिवलिंग को बेलपत्र, आक या मदार के फूल, धतूरे के फूल आदि भी अर्पित करने चाहिए।

इस दिन शिवपुराण, महामृत्युंजय मंत्र, शिव मंत्र और शिव आरती का पाठ करना चाहिए।

महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण भी किया जाता है।

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Monday, March 8, 2021

शिव जी के सिर पर चंद्रमा होने का रहस्य

भगवान शिव का चित्र जब हम देखते हैं तो उनके हर चित्र में उनके मस्तक पर चंद्रमा शोभायमान रहता है। यही कारण है कि शिव का एक नाम शशिधर भी है। शशि अर्थात चंद्रमा को धारण करने वाले। अब प्रश्न उठता है कि आखिर शिव जी ने मस्तक पर चंद्रमा को क्यों और कैसे धारण किया। इस बारे में एक सर्वाधिक प्रचलित कथा यह है कि जब समुद्र मंथन से हलाहल अर्थात विष निकला और उससे सारे जीव-जंतुओं पर संकट उत्पन्न होने की आशंका हुई तो देवताओं ने देवाधिदेव शिव से प्रार्थना की कि वे इस हलाहल को पीकर पृथ्वी के जीवों की रक्षा करें। शिव ने देवताओं की विनती सुन कर विषपान तो कर लिया लेकिन जब भगवान शंकर विष के तीव्र प्रभाव को सहन नहीं कर पाये तब देवताओं ने उनसे आग्रह किया की वे मस्तक पर चंद्रमा को धारण कर लें इससे विष के तीव्र प्रभाव का शमन होगा। देवताओं के आग्रह को स्वीकार करते हुए शंकर भगवान ने अपने सिर पर चंद्रमा को धारण कर लिया। इससे विष के प्रभाव की तीव्रता धीरे –धीरे कम होने लगी। ऐसी मान्यता है बस तभी से चंद्रमा शिव के सिर पर शोभायमान है।

शिव जी अर्धचन्द्र को आभूषण की तरह अपनी जटा में धारण करते हैं। यही कारण है कि उनको चंद्रशेखर या सोम भी कहा जाता है। शिव पुराण की एक कथा के अनुसार धरती के विस्तार और इस पर विविध प्रकार के जीवन निर्माण के लिए देवताओं के भी देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने लीला रची और उन्होंने देव तथा उनके भाई असुरों की शक्ति का उपयोग कर समुद्र मंथन कराया। समुद्र मंथन कराने के लिए पहले कारण निर्मित किया गया।

 दुर्वासा ऋषि ने अपना अपमान होने के कारण देवराज इन्द्र को श्रीहीन अर्थात लक्ष्मी से हीन हो जाने का श्राप दे दिया। भगवान विष्णु ने इंद्र को शाप मुक्ति के लिए असुरों के साथ समुद्र मंथन के लिए कहा और दैत्यों को अमृत का लालच दिया। इसके बाद हुआ समुद्र मंथन। देवताओं तथा असुरों ने समुद्र मंथन प्रारंभ किया। तब भगवान विष्णु ने कच्छप बनकर मंथन में भाग लिया। वे समुद्र के बीचोबीच में वे स्थिर रहे और उनके ऊपर मथानी के रूप में रखा गया मदरांचल पर्वत। वासुकी नाग की रस्सी बनायी गयी और एक तरफ देवता और दूसरी ओर से दैत्यों ने मिल कर मथानी चलाना शुरू किया। समुद्र का मंथन में अमृत ही नहीं और भी बहुत सी वस्तुएं निकलीं। इन वस्तुओं का देवताओं और असुरों में बराबर-बराबर बांट दिया गया। 

समुद्र मंथन से अमृत के अतिरिक्त धन्वन्तरी, कल्पवृक्ष, कौस्तुभ मणि, दिव्य शंख, वारुणी अर्थात मदिरा, पारिजात अर्थात हरसिंगार वृक्ष, चंद्रमा, अप्सराएं, उचौ:श्राव अश्व, हलाहल या विष और कामधेनु गाय भी प्राप्त हुई थी। इसके बाद अमृत पीने के लिए देवता और असुरों में युद्ध हो गया। भगवान् विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर स्वयं अमृत बांटना शुरू किया। उनकी मदद से देवताओं को अमृत प्राप्त हो सका। जब समुद्र मंथन किया गया था तो उसमें से हलाहल विष भी निकला था। जिससे पूरी सृष्टि की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले उस विष का पान किया। मगर विष पीने के बाद उनका शरीर विष के प्रभाव से अत्यधिक गर्म होने लगा। आज आसमान में हम जो चंद्रमा देखते हैं वह समुद्र मंथन के दौरान उत्पन्न हुआ था। कहा यह भी जाता है कि देवताओं ने नहीं स्वयं चंद्रमा ने विषपान के बाद शिव के मस्तक पर हो रही जलन को देखते हुए उनसे प्रार्थना की थी कि वह उन्हें माथे पर धारण कर अपने शरीर को शीतलता प्रदान करें। ऐसे विष का प्रभाव भी कुछ कम हो जाएगा। ऐसी मान्यता है कि शिव जी पहले तो चंद्रमा के इस आग्रह को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उन्हें यह आशंका थी कि चंद्रमा श्वेत और शीतल होने के कारण उस विष की तीव्रता सहन नहीं कर पायेगा। बाद में जब देवताओं जब आग्रह किया तो शिव इसके लिए मान गए और उन्‍होंने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। ऐसी मान्यता है कि तभी से चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर शोभायमान हैं और पूरी सृष्टि को अपनी शीतलता प्रदान कर रहे हैं। 

इससे जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा भी है। इस कथा के अनुसार, चंद्रमा को पुनः जीवित करने के लिए शिवजी ने अपने मस्तक पर उन्हें धारण किया।एक कथा ऐसी भी मिलती है जिसमें कहा गया है कि चंद्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 नक्षत्र कन्याओं के साथ हुआ था जिसमें रोहिणी उनके सबसे समीप थीं। यह देख अन्य कन्याओं ने अपने पिता दक्ष से अपना दुख बताया तो राजा दक्ष ने चंद्रमा को शाप दे दिया। जिसके बाद क्षय रोग से ग्रस्त होने के कारण धीरे-धीरे चंद्रमा की कलाएं क्षीण होती गईं। चंद्रमा की यह स्थिति देख  नारदजी ने उन्हें भगवान शिव की आराधना करने को कहा।शिव जी ने प्रदोष काल में चंद्रमा को पुनः जीवित होने का वरदान दिया। जिससे चंद्रमा मृत्युतुल्य होते हुए भी मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए और फिर धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे और पूर्णमासी पर पूर्ण चंद्रमा के रूप में प्रकट हुए। इस तरह चंद्रमा को अपने सभी कष्टों से भगवान शिव की कृपा से मुक्ति मिली। 

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को चन्द्र दर्शन कलंक कारक माना जाता है। ऐसे में चंद्रमा को फल, मिष्ठान्न, दधि आदि समर्पित कर उनकी प्रार्थना करने पर दोषमुक्ति हो जाती है। इन श्लकों से करना चाहिए चंद्रमा की प्रार्थना- दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवं ।नमामि शशिनं भक्तया शम्भोर्मुकुटभूषणम्।।

तथा सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीः तवस्येषोस्यमन्तकः।।

कहते हैं कि चंद्रमा को कलंक मुक्त करने के लिए भगवान शिव ने अपने सिर पर धारण किया। तभी से भगवान शिव सोमनाथ कहलाये। सोम अर्थात चंद्रमा के नाथ।

चंद्रमा के 15 दिन तक क्षय होने के बाद के 15 दिन फिर पूर्ण होने के बारे में एक कथा और भी मिलती है जिसके अनुसार एक बार चंद्रमा ने भगवान गणेश के सूंड वाले स्वरूप को देख कर उनकी हंसी उड़ायी थी। इससे गणेश ने क्रोधित होकर चंद्रमा को क्षय यानी नष्ट हो जाने का श्राप दे दिया। चंद्रमा को तब अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने अपनी जान बचाने के लिए भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न हो भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने सिर पर धारण कर लिया इससे चंद्रमा के प्राण बच गये। बाद में चंद्रमा ने भगवान गणेश से क्षमा मांगी और गणेश ने उन्हें क्षमा कर दिया और  उसे श्राप मुक्त करते हुए कहा कि हर पक्ष में सिर्फ 15 दिन तुम्हारा क्षय हुआ करा करेगा। आगे के 15 दिन में तुम पूर्ण हो जाओगे। 

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Wednesday, March 3, 2021

भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र कैसे मिला?

 


भगवान विष्णु का नाम आते ही उनकी जो चतुर्भुजी छवि हमारे मन-मानस में उभरती है उसमें शंख, चक्र, गदा, पद्म लिए ही प्रभु विष्णु दृष्टिगोचर होते हैं। उनकी छवि की व्याख्या करने के लिए उनकी वंदना का यह श्लोक ही काफी है।  

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् ।

सहारवक्षस्स्थलशोभिकौस्तुभं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥

भगवान विष्णु का उल्लेख हो और उनके दिव्य,अचूक और शक्तिशाली अस्त्र सुदर्शन का नाम ना आये ऐसा हो ही नहीं सकता। आज हम विष्णु को कैसे मिला सुदर्शन चक्र, क्या हैं इसकी विशेषताएं और इससे जुड़े आख्यान का वर्णन कर रहे हैं। भगवान विष्णु का अस्त्र है सुदर्शन चक्र। कहते हैं कि इसे उन्होंने अपने कृष्णावतार में शिव की तपस्या कर प्राप्त किया था। सुदर्शन चक्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह चलाने के बाद अपने लक्ष्य पर पहुँच कर उसका संहार करने के बाद ही वापस आ जाता है। कृष्णावतार में उन्होंने इसे धारण किया और इससे अनेक राक्षसों का वध किया था। यह भगवान विष्णु का अमोघ अस्त्र है।  इस चक्र ने देवताओं की रक्षा तथा राक्षसों के संहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।यह चक्र भगवान विष्णु की तर्जनी अंगुली में रहता था। सबसे पहले यह चक्र विष्णु के पास था।देवताओं के पास ही चक्र होते थे।

विष्णु का सुदर्शन चक्र कैसे मिला इसके बारे में एक आख्यान मिलता है। एक बार जब दैत्यों के अत्याचार बहुत बढ़ गए, तब सभी देवता श्रीहरि विष्णु के पास गये। देवताओं ने विष्णु से प्रार्थना की कि वे राक्षसों के अत्याचार से उनकी रक्षा करें। कहते हैं इसके बाद भगवान विष्णु ने कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव की आराधना की। वे शिव की स्तुति उनके हाजर नामों का जाप कर करने लगे। वे शिव का एक नाम लेते और एक कमल पुष्प भगवान शिव को अर्पण करते। भगवान शंकर ने विष्णु की परीक्षा लेने के लिए उनके लाये एक हजार कमलों में से कमल का एक फूल छिपा दिया।  विष्णु को इसका पता नहीं चल पाया। एक फूल कम पाकर भगवान विष्णु उसे खोजने लगे। फूल कहीं नहीं मिला। इसके बाद विष्णु ने एक फूल की पूर्ति के लिए अपना एक नेत्र निकाल कर शिव को अर्पित कर दिया। विष्णु की भक्ति देख कर शंकर बहुत प्रसन्न हुए और विष्णु के सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। तब विष्णु ने दैत्यों को समाप्त करने के लिए अजेय शस्त्र का वरदान माँगा। तब भगवान शंकर ने विष्णु को सुदर्शन चक्र प्रदान किया। विष्णु ने उस चक्र से दैत्यों का संहार किया। इस प्रकार देवताओं को दैत्यों से मुक्ति मिली तथा सुदर्शन चक्र उनके स्वरूप के साथ सदैव के लिए जुड़ गया।यह भी कहा जाता है कि देवों के शिल्पकार विश्वकर्मा ने ही पुष्पक विमान और सुदर्शन चक्र का निर्माण किया था।  लेकिन जहां तक प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्र हैं उनमें ऐसी मान्यता है कि इसका निर्माण भगवान शंकर ने किया था। जिसे उन्होंने बाद में विष्णु को सौंप दिया था।

सुदर्शन चक्र को लेकर एक यह कथा भी है। प्राचीन काल में वीतमन्यु नामक एक ब्राह्मण थे। वह वेदों के ज्ञाता थे। उनकी पत्नी का नाम आत्रेयी थी। इऩके एक पुत्र था जिसका नाम उपमन्यु था। यह ब्राह्मण परिवार बहुत गरीब था। गरीबी इतनी कि ब्राह्मणी आत्रेयी अपने पुत्र को दूध भी नहीं दे पाती थी। वह उसे चावल का धोवन दूध कह कर पिला दिया करती थी। एक दिन वीतमन्यु अपने पुत्र के साथ कहीं भोज में गये। वहाँ उपमन्यु ने दूध से बनी हुई खीर का भोजन किया, तब उसे दूध के वास्तविक स्वाद का पता चला। घर आकर उसने चावल के धोवन को पीने से मना कर दिया। दूध पाने के लिए जिद पर अड़े बालक से उसकी माँ ने कहा- "पुत्र, यदि तुम दूध से भी अधिक पुष्टिकारक तथा स्वादवाला पेय पीना चाहते हो तो विरूपाक्ष महादेव की सेवा करो। उनकी कृपा से अमृत भी प्राप्त हो सकता है।' उपमन्यु ने अपनी माँ से पूछा- "माता, आप जिन विरूपाक्ष भगवान की पूजा करने को कह रही हैं, वे कौन हैं?"

आत्रेयी ने अपने पुत्र को बताया कि प्राचीन काल में श्रीदामा नामक असुर राजा था। उसने सारे संसार को अपने वश में करने के साथ ही लक्ष्मी को भी अपने वश में कर लिया था। उसका मान इतना बढ़ गया कि वह भगवान विष्णु के श्रीवत्स को ही छीनने की योजना बनाने लगा। श्रीवत्स भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर बना एक दिव्य चिह्न है। असुर श्रीदामा की इस योजना को जानने के बाद विष्णु ने  उसका वध करने की इच्छा से भगवान शिव तप करने के लिए हिमालय गये। वहां अनेक वर्ष तक पैर के अंगूठे पर खड़े रह कर शिव की उपासना की। उनकी उपासना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें 'सुदर्शन चक्र' प्रदान किया। उन्होंने सुदर्शन चक्र को देते हुए भगवान विष्णु से कहा- "देवेश! यह सुदर्शन नाम का श्रेष्ठ आयुध बारह अरों अर्थात तीलियों, छह नाभियों एवं दो युगों से युक्त, तीव्र गतिशील और समस्त आयुधों का नाश करने वाला है। सज्जनों की रक्षा करने के लिए इसके अरों में देवता, राशियाँ, ऋतुएँ, अग्नि, सोम, मित्र, वरुण, शचीपति इन्द्र, विश्वेदेव, प्रजापति, हनुमान,धन्वन्तरि, तप तथा चैत्र से  लेकर फाल्गुन तक के बारह महीने प्रतिष्ठित हैं। आप इसे लेकर निर्भीक होकर शत्रुओं का संहार करें। 

तब भगवान विष्णु ने उस सुदर्शन चक्र से असुर श्रीदामा को युद्ध में परास्त कर दिया। 

इस आयुध की विशेषता यह थी कि इसे तेजी से हाथ से घुमाने पर यह हवा के प्रवाह से मिल कर तीव्र वेग से अग्नि प्रज्जवलित कर दुश्मन को भस्म कर देता था। सुदर्शन चक्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लक्ष्य का भेदन कर चलानेवाले के पास वापस आ जाता था। इसके साथ ही यह अस्त्र कभी नष्ट नहीं होता था। इस अस्त्र में अपार ऊर्जा होती थी।

इसकी उत्पत्ति को लेकर कई कथाएं  हैं, कुछ का मानना है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश, बृहस्पति ने अपनी ऊर्जा एकत्रित कर इसे रचा| तो कहीं ऐसा भी उल्लेख आता है कि महाभारत काल में अग्निदेव ने कृष्ण को यह चक्र प्रदान किया था जिससे अनेकों का संहार हुआ था। इस दिव्य अस्त्र का नाम सुदर्शन है, दो शब्दों से मिल कर बना है, ‘सु’ अर्था शुभ और ‘दर्शन’। 

चक्र चांदी की तीलियों से निर्मित था। इसकी ऊपरी और निचली सतहों पर लोहे के शूल लगे हुए थे। कहते हैं कि इसमें अत्यंत विषैले किस्म के विष का भी उपयोग किया गया था।यह भी माना जाता है कि इस अस्त्र के धारक को इसे चलाने की आवश्यकता नहीं होती थी यह उसके  इच्छा करने मात्र से लक्ष्य की ओर तीव्र गति से चल पड़ता था। अर्थात यह इच्छाशक्ति से प्रेरित होता  था। लक्ष्य को नष्ट कर यह चलाने के पास स्वत: वापस आ जाता था।

अब आधुनिक मिसाइलों में भी सुदर्शन चक्र जैसी क्षमता लाने की कोशिश की जा रही है।  अर्थात अब ऐसी मिसाइलें तैयार करने की कोशिश हो रही है जो अपना लक्ष्य भेद कर वापस आ जा सकें और उनका दोबारा प्रयोग किया जा सके। सुप्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक एएस पिल्लई ने का कहना है कि सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का अगला वर्जन सुदर्शन चक्र की तरह होगा। सुदर्शन चक्र एकमात्र ऐसा दैविक हथियार है, जो अपना काम कर वापस आ जाता है। पिल्लई का कहना है कि दुनिया की अद्वितीय सुपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस-1 विकसित करने के बाद भारत अब ब्रह्मोस-2 मिसाइल विकसित कर रहा है, जिससे वह अपने लक्ष्य को भेद कर वापस आ जाएगी और पुन: प्रयोग की जा सकेगी। 

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