Monday, June 28, 2021

प्रभु राम को क्यों लेनी पड़ी चित्रकूट में रहने की अनुमति?


चित्रकूट धाम भगवान राम की कर्मस्थली रही है। यहां प्रभु राम, सीता, लक्ष्मण ने चौदह वर्ष के वनवास के साढ़े ग्यारह वर्ष बिताये थे।  चित्रकूट विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी पर अवस्थित है। प्रभु राम ने जब वाल्मीकि ऋषि से पूछा कि वे बतायें कि वनवास काल में हम कहां रहें। तब वाल्मीकि जी ने कहा था- चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहं सब भांति तुम्हार सुपासू।।अर्थात हे प्रभु आप चित्रकूट गिरि पर निवास कीजिए, वहां आपको सब प्रकार की सुविधा मिलेगी। यहीं भाई भरत भगवान राम को मना कर अयोध्या वापस ले जाने आये थे। राम नहीं माने तो वे उनकी पादुकाएं लेकर अयोध्या लौट गये।

बहुत ही रमणीक स्थल है चित्रकूट। वहां मंदाकिनी नदी बहती है जिसे अत्रि मुनि की पत्नी अनुसूया तप बल से लायी थीं। संभवत: मंद गति से बहने के कारण इसका यह नाम पड़ा. इसका एक नाम पयस्वनी भी है. मान्यता है कि प्राचीन काल में दीपावाली की मध्य रात्रि में यहां पय अर्थात दूध की धारा बहा करती है।

चित्रकूट गिरि में कामतानाथ स्वामी निवास करते हैं इसलिए इसे कामदगिरि भी कहते हैं। कहते हैं कि कामदगिरि के दर्शन मात्र से दुखों का नाश होता है। रामचरित मानस में स्वयं पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास ने इस बारे में लिखा है -कामद भे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत विषादा।

रहीम और तुलसीदास में अच्छी मित्रता थी। जब तुलसीदास चित्रकूट में रह कर रामायण लिख रहे थे तो रहीम उनसे मिलने आते थे। कामदगिरि के परिक्रमा पथ पर अभी भी पांच सौ साल पहले लगाया गोस्वामी तुलसीदास का पीपल पेड़ विद्यमान है। हालांकि वह जर्जर हो गया है लेकिन अब तक उसकी दो-तीन शाखाएं हरी हैं। इसी के नीचे बैठ कर तुलसीदास रामायण लिखा करते थे। यहां स्थिति कुटी में उनके हस्तलिखित रामायण के पृष्ठ इस यूट्यूबर ने 2016 की अपनी चित्रकूट यात्रा में देखे थे। कुछ पृष्ठ तुलसीदास जी की जन्मस्थली राजापुर के तुलसी कुटीर में सुरक्षित हैं। 

 चित्रकूट पहले उत्तर प्रदेश के कर्वी जिले में आता था अब उस जिले का नाम बदल कर चित्रकूट धाम रख दिया गया है। चित्रकूट में वनवास काल में देवता प्रभु राम से मिलने आते थे। कुछ तो वहीं वनवासियों का जन्म लेकर बस गये थे ताकि प्रभु की सेवा कर सकें। कहते हैं देवांगन नामक स्थान पर वे प्रभु से मिलते थे। भगवान कामदगिरि की चोटी पर पर्णकुटी बना कर रखते थे। कहते हैं वहां सीता जी ने तुलसी के पौधे लगाये थे। अब जहां कोई लगभग बारह वर्ष रहेगा तो आसपास के पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन तो करेगा ही। यहां लगभग सौ साल पुराना एक ऐसा प्रसंग जोड़ रहा हूं जो मेरे पिता जी मंगल प्रसाद त्रिपाठी से जुड़ा है। अपनी एक चित्रकूट यात्रा के दौरान जब वे पहाड़ की चोटी की ओर जाने का प्रयास कर रहे थे तो लोगों ने रोका-अरे भाई ऊपर मत जाइए वहां जंगली जानवर हैं, बहुत खतरा है। पिता जी ने जवाब दिया- अब यहां आये हैं तो वह स्थान तो देखूंगा ही जहां प्रभु राम, सीता, लक्ष्मण पर्णकुटी बना कर रहे थे। 

चित्रकूट से लौट कर घर आये पिता जी ने लोगों से बताया कि चोटी पर तुलसी के पौधों का जंगल है और वह भाग जहां पर्णकुटी रही होगी समतल है। हमने क्या सभी ने यह उक्ति सुनी होगी-रामभरोसे जे रहें पर्वत पर हरियांय। तुलसी बिरवा बाग में सींचे से कुम्हलांय। 

रहीम ने भी चित्रकूट के बारे में लिखा है कि-चित्रकूट में रम रहे रहिमन अवध नरेस।जापर विपदा पड़त है सो आवत यहि देश। अर्थात रहीम जी कहते हैं कि  चित्रकूट में राम का निवास है। जिस पर भी विपत्ति आती है वही शांति पाने के लिए इस क्षेत्र की ओर खिंचा चला आता है।

कहते हैं कि एक बार रहीम और तुलसीदास कामद गिरि के परिक्रमा पथ पर साथ-साथ जा रहे थे कि तभी उन्होंने देखा कि एक रईस व्यक्ति हाथी पर सवार होकर आ रहा है। अपने स्वभाव के अनुसार हाथी सड़क से धूल उठा कर अपनी पीठ पर डाल रहा था। इससे उस रईस के कपड़े गंदे हो रहे थे इसलिए वह हाथी को पीट रहा था। इस पर तुलसी ने रहीम से पूछा-धूरि धरत निज शीश पर कहु रहीम केहि काज। इस पर रहीम ने कितना लाजवाब जवाब दिया वैसा जवाब उनके जैसा विद्वान ही दे सकता है। उन्होंने तुलसी की पंक्ति को इस तरह पूरा किया-जेहिं रज मुनि पत्नी तरी सो ढूंढ़त गजराज।। यानी जिस रज से अहिल्या तरी थीं यह गजराज वही रज ढूंढ़ रहा क्योंकि राम यहां भी बहुत दिनों तक रहे थे।

 चित्रकूट में मंदाकिनी के रामघाट पर ही हनुमान जी के सहयोग से  तुलसीदास को राम के दर्शन हुए थे। वहां तोते के रूप में हनुमान जी ने यह दोहा पढ़ कर उन्हें राम के दर्शन कराये थे-

चित्रकूट के घाट पे, भई सन्तन की भीर,

तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुवीर।

इस घटना की स्मृति स्वरूप आज भी तोतामुखी हनुमान की प्रतिमा चित्रकूट में स्थापित है। मंदाकिनी नदी में स्नान करने का बड़ा महत्व है यहां मौनी अमावस्या और दीपावली के दिन लाखों लोगों की भीड़ जुड़ती है जो मंदाकिनी में स्नान कर कामतानाथ के दर्शन करते हैं। 

कमादगिरि के परिक्रमा पथ पर विविध मंदिर हैं। यहीं प्राचीन पीलीकोठी संस्कृत विद्यालय है। इस पवित्र पर्वत का काफी धार्मिक महत्व है। श्रद्धालु कामदगिरि पर्वत की पांच किलोमीटर की परिक्रमा कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं। कुछ लोग परी परिक्रमा (पेट के बल लेट कर) भी करते हैं।जंगलों से घिरे इस पर्वत के तल पर अनेक मंदिर बने हुए हैं।  परिक्रमा पथ पर ही भरत मिलाप का स्थल है। जहां भरत, राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न आपस में एक-दूसरे से गले लगे थे। कहते हैं कि उस समय इन भाइयों का प्रेम देख पत्थर की शिला पिघल गयी थी और सभी भाईयों के पदचिह्न वहां अंकित हो गये थे। ये चिह्न आज भी परिक्रमा पथ पर देखे जा सकते हैं।

मन्दाकिनी नदी को सभी प्रकार के पापों को नष्ट करने वाला बताया गया है।

सुरसरी धार नाउ मंदाकिनी, जो सब पातक पोतक, डाकिनि।अत्रि आदि मुनिवर बहु बसहि, करहि जोग जप तप तन कसहीं।

जो मनुष्य इस मंदाकिनी गंगा के द्वारा विधिवत् पितृ और देवताओं का तर्पण करता है तथा श्राद्ध और पिण्ड दान करता है। उसे यज्ञों का-सा फल मिलता है। वह कायिक, वाचिक और मानसिक पापों से मुक्त हो जाता हैं। मन्दाकिनी नदी के किनारे सती अनुसूया अत्रि आश्रम, रामघाट, राघवप्रयाग श्री मत्तगयेन्द्र शिव मंदिर, प्रमोदवन, जानकी कुण्ड और स्फटिक शिला, तुलसीदास मंदिर और अनेक पावन तीर्थ हैं।  वाल्मिकि रामायण में चित्रकूट का विस्तृत वर्णन किया है-

नाना नागगणों पेतः किन्नरोरम सेवितः।

मयूर नादाभिरतों गजराजनि सेवितः।।

गम्यता भविता शैलस्चित्रकूटः स विश्रुतः,

पुण्यश्च रमणीयश्च बहु मूल फला युतः।

सरित्प्रस्त्रवण प्रस्थान्दरी कन्दर निर्झरान,

यावता चित्रकूटस्य नरः श्रृगाण्डय वेक्षते।।

अर्थात  सुविख्यात पर्वत नाना प्रकार के वृक्षों से हरा-भरा है। यहाँ पर बहुत से नाग, किन्नर सेवक जैसे सेवा करते हैं। मोरों के कलरव से वह अत्यंत रमणीय है। चित्रकूट पर्वत परम पवित्र है। रमणीय फल-फूलों से सम्पन्न है। मंदाकिनी नदी अनेकानेक जलस्रोत, पर्वत शिखर, गुफा, कंदरा, झरने से मन को आनन्द व कल्याणकारी पुण्य फल प्रदान करते हैं।

रामघाट

रामघाट मंदाकिनी नदी का एक महत्वपूर्ण घाट एवं स्थान है। मंदाकिनी नदी पर स्थित इस घाट पर वनवास काल में भगवान राम, लक्ष्मण और सीता  स्नान किया करते थे। इसलिए इसे रामघाट कहते हैं। यह घाट मंदाकिनी के ठीक मध्य में स्थित है। यहीं तुलसीदास को भगवान राम के दर्शन हुए थे।

पुनीत मंदाकिनी नदी में प्रतिदिन स्नान तपस्या से इन्द्रिय शमन और मन निग्रह से समस्त पाप दूर हो जाते हैं। भगवान श्रीराम ने जगत जननी जानकी को यहां स्नान करने की आज्ञा दी थी। दीपावली के अवसर पर दीपदान का दृश्य यहाँ देखते ही बनता है। यों तो यहां प्रतिदिन संध्या को मंदाकिनी की आरती होती है।

 मत्तगयेंद्र मंदिर

रामघाट में कई सीढ़ियां चढ़कर  ऊंचाई पर स्थित है मत्तगयेंद्र अर्थात शिवजी का प्राचीन  मंदिर । कहते हैं कि स्वयं ब्रह्मा जी ने इस शिवलिंग की स्थापना क्षेत्रपाल के रूप में की थी। यही कारण है कि जब राम यहां आये तो उन्होंने रामघाट में स्नान कर मत्तगयेंद्र स्वामी से उनके क्षेत्र में रहने की अनुमति मांगी थी। इतना ही नहीं जब सीता जी ने यह स्वप्न देखा कि भरत सेना लेकर चित्रकूट आ रहे हैं तो इस स्वप्न की शांति के लिए उन्होंने भी मत्तगयेंद्र मंदिर में शिव की पूजा की थी। इसकी स्थापना के बारे में यह श्लोक प्रचलित है-

प्रतिष्ठात्य शाम्भवं भूरि भावनः,

मत्त गयेन्द्र नामेदं क्षेत्रपालं समादद्ये।

भगवान शंकर का मत्त गयेन्द्र नामक शिवलिंग दर्शन और पूजन से शीघ्र ही बैकुण्ठ प्राप्ति का फल देने वाला है। हर क्षेत्र का एक क्षेत्रपाल होता है जो उस क्षेत्र का स्वामी होता है। यहां प्रश्न हो सकता है कि स्वयं विष्णु ने राम का अवतार लिया था जिन्हें साक्षात परमब्रह्म माना जाता है उन्हें भला कहीं रहने के लिए किसी देवता की अनुमति क्यों लेनी पड़ी। यहां स्पष्ट कर दें कि प्रभु राम अवतारी थे लेकिन उन्होंने मानव अवतार लिया था। जब विश्व में पाप बढ़ गया धरती देवताओं के पास रक्षा के लिए गयी तब सभी विष्णु के पास गये उनकी प्रार्थना की तो विष्णु ने उन्हें यह कह कर भरोसा दिया-जिन डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हंहि लागि धरिहौं नर बेसा।। अंशन सहित मनुज अवतारा। लेहंऊ दिनकर वंश उदारा।।

तो प्रभु मानव अवतार में सूर्यवंश में पैदा हुए। उन्होंने मनवोचित सभी धर्मों का पालन किया। इसीलिए उन्होंने मत्तगयेंद्र स्वामी से उनके क्षेत्र में रहने की अनुमति मांगी।

रामघाट के पास बालाजी का भव्य मंदिर बना हुआ है। इस आश्रम के आस-पास सात पावन शिलाएँ हैं। आश्रम के मंदिर में अनुसूया के पुत्र दत्तात्रेय तथा उनकी स्वयं की मूर्ति स्थापित है। मंदिर के नीचे अन्य पुत्रों चन्द्रमा तथा दुर्वासा की मूर्तियाँ विद्यमान हैं। यह वही स्थान है। जहाँ वनवास के समय चित्रकूट निवास में सीता जी को अनुसुइया ने पातिव्रत्य धर्म का उपदेश दिया था।  

चित्रकूट में महासती अनुसुइया एवं उनके पति अत्रि मुनि का अति प्राचीन आश्रम मंदाकिनी के किनारे स्फटिक शिला एवं कामतानाथ जी से 15 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यहाँ सती अनुसुइया और अत्रि से संबंधित ऐतिहासिक झाँकियाँ निर्मित हैं। इसी आश्रम से मंदाकिनी गंगा प्रकट हुई हैं। वे यहाँ स्वर्ग गंगा भी कहलाती हैं।

राघव प्रयाग 

राघव प्रयाग मंदाकिनी के पश्चिमी किनारे पर स्थित है।पर्वत के मध्य में गंगा नाम की जो नदी है उसे पयस्विनी कहते हैं। सावित्री, गंगा और मंदाकिनी इनका जहाँ पर संगम है उस स्थान को राघव प्रयाग कहते हैं। इस स्थान पर सनकादि मुनि आदि ने महान तप किया था। 

राघव प्रयाग में श्री राम ने सीता लक्ष्मण के साथ जंगली कंद मूल से विधिपूर्वक अपने पिता दशरथ जी का श्राद्ध किया था। कहते हैं इसीलिए यह राघव प्रयाग कहलाने लगा। राघव प्रयाग में जो भी स्नान करता है, उसके हृदय में श्री सीता राम की भक्ति उत्पन्न हो जाती है। 

हनुमान धारा के अनन्तर प्रमोद वन या राम तीर्थ नाम का तीनों लोकों में प्रशंसित तीर्थ है। उस तीर्थ के दर्शनादि कर्मों का फल यज्ञ के समान होता है।  रामघाट से दो किलोमीटर की दूरी पर पयस्विनी के किनारे प्रमोद वन है। यहाँ रामनारायण भगवान का मंदिर है।

जानकी कुण्ड

प्रमोद वन के कुछ दक्षिण भाग में रामघाट से दो किलोमीटर दूर जानकी कुण्ड स्थित है। कहते हैं वनवास के समय सीता जी इसी कुण्ड में नित्य स्नान किया करती थीं। इसी कारण इस कुण्ड को जानकी कुण्ड कहते हैं।

यहाँ पर श्री रामचन्द्र नित्य विहार करते हैं। उनके चरणों की रेणु यहाँ पर्वत के रूप में एकत्रित हो गई है। उसकी शिला स्फटिक समान स्वच्छ चिकनी है, जो संसार को पवित्र करती है। उस शिला में सुन्दर दाहिना चरण चिन्ह विद्यमान है। जानकी कुण्ड के नाम से प्रख्यात है। इस सीता कुण्ड में स्नान करके तथा भक्ति भाव से चरणों का पूजन करने से मनुष्य के पापों का नाश होता है व भक्ति भाव जगता है। कहा भी है-

सीता कुण्डे नरः स्नात्वा चरणं पूज्य भक्तितः,

भक्ति योगम् प्राप्नोति महापातक नाशनम्।

यह स्थान रम्य आश्रम के रूप में है। यहाँ महात्मागण, अनगिनत गुफाओं में तपश्चर्या में लीन रहते हैं।

स्फटिक शिला

स्फटिक शिला मंदाकिनी गंगा के किनारे स्थित है। हरे-भरे वृक्षों के कारण यह स्थान बहुत सुंदर लगता है। ऐसा कहा जाता है कि जब राम और सीता  चित्रकूट से अत्रि ऋषि के आश्रम को जाते थे तो रास्ते में मंदाकिनी के किनारे एक श्वेत धवल शिला पर बैठ विश्राम करते थे। इस मनोरम पवित्र स्थल पर श्री राम के पद चिन्ह एक शिला पर अंकित हैं। इसी स्थान पर इन्द्र के पुत्र जयंत ने  कौए का रूप धारण कर सीता जी के चरण में चोंच मारी थी। यहाँ सीता जी के चरण चिन्ह अंकित हैं जो सफेद पत्थर पर बने हैं जो अनेकों वर्ष के होंगे। यह शिला स्फटिक मणि के समान हैं, इसी कारण इसका नाम स्फटिक शिला पड़ा।

 गुप्त गोदावरी

तुंगारण्य नाम के पर्वत से निकली पापों को नष्ट करने वाली पुण्य नदी गोदावरी है जो गुप्त गोदावरी नाम से प्रसिद्ध है। इस स्थान पर महादेव जी भी विद्यमान हैं। जिनकी ऋषि-मुनि सेवा करते हैं।नगर से 18 किलोमीटर की दूरी पर गुप्त गोदावरी स्थित है। यहां दो गुफाएं हैं। एक गुफा चौड़ी और ऊंची है। प्रवेश द्वार संकरा होने के कारण इसमें आसानी से नहीं घुसा जा सकता। गुफा के अंत में एक छोटा तालाब है जिसे गोदावरी नदी कहा जाता है। दूसरी गुफा लंबी और संकरी है जिससे हमेशा पानी बहता रहता है। कहा जाता है कि इस गुफा के अंत में राम और लक्ष्मण ने दरबार लगाया था। यहाँ एक शिला पहाड़ की ऊपरी दीवार पर स्थित है जिसे मयंक या खटखटा राक्षस भी कहा जाता है। यहां चमगादड़ों का जमघट है जो इस शिला में उलटे लटके रहते हैं। इस शिला के बारे में कहा भी गया है-

शिलैका चोर रूपा च अंतरिक्षे प्रवर्तते,

गोदावर्ण नरः स्नात्वा कृत्वा संध्या यथा विधिः।

गोदावरी पुण्य सलिला है। पापमोचनी एवं आत्मिक आनन्द प्रदाता है।

 गुप्त गोदावरी का जल प्रवाह कुछ दूरी के बाद गायब हो जाता है।

चित्रकूट में मंदाकिनी के किनारे प्रत्येक अमावस्या एवं दीपावली को मेला लगता है। जहाँ लाखों श्रद्धालु चित्रकूट के विभिन्न मठों, मंदिरों के अतिरिक्त मन्दाकिनी के अलग-अलग पवित्र घाटों में स्नान एवं कामदगिरि की परिक्रमा के साथ ही दीपदान कर स्वयं को धन्य मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि चित्रकूट में आकर मन्दाकिनी में दीपदान करने वाला सुख, शांति, समृद्धि, वैभव और सद्गति को प्राप्त होता है। इसी मान्यता और मनोकामना की पूर्ति के लिए लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष चित्रकूट पहुँचते हैं।

 चित्रकूट- चित्र+कूट शब्दों के मेल से बना है। संस्कृत में चित्र का अर्थ है अशोक और कूट का अर्थ है शिखर या चोटी। इस संबंध में कहावत है कि चूंकि इस वनक्षेत्र में कभी अशोक के वृक्ष बहुतायत में मिलते थे, इसलिए इसका नाम चित्रकूट पड़ा। कुछ लोग चित्रकूट का अर्थ चित्त का हरण करनेवाला या मोहनेवाला भी बताते हैं।

 प्रभु श्रीराम की स्थली चित्रकूट की महत्ता का वर्णन पुराणों के प्रणेता संत  वेद व्यास, आदिकवि कालिदास,तुलसीदास, आदि ने अपनी कृतियों में किया है।  चित्रकूट के पाँच-छह मील  के क्षेत्र में  बहुत से धार्मिक महत्व के स्थान है| यह एक बहुत बड़ा कस्बा है| इसकी मुख्य बस्ती सीतापुर है| उसी को चित्रकूट कहते हैं| चित्रकूट जाने के लिए रेलवे स्टेशन या कर्वी पर उतरना पड़ता है| दोनों से चित्रकूट एक सामान दूरी पर है| कर्वी से यहाँ जाने में ज्यादा आसानी होती है | यहाँ से बस आटो आदि मिल जाते है|

हनुमान धारा

हनुमान धारा एक पहाड़ी चोटी पर स्थित है। यहां हनुमान जी की मूर्ति के कंधे पर एक झरना गिरता है और फिर सामने ही लुप्त हो जाता है। कहते हैं लंका दहन के बाद जब हनुमान जी के शरीर की जलन शांत नहीं हो रही थी राम ने ही उन्हें इस पहाड़ी पर रहने की सलाह दी थी। राम ने अपने बाण से वह झरना पैदा किया जो अनवरत हनुमान जी की मूर्ति के कंधे पर गिर रहा है।

सीता रसोई

पर्वत की चोटी पर एक छोटा सा मंदिर बना है जिसे सीता रसोई कहते हैं। कहते हैं कि प्रभु राम, लक्ष्मण और सीता जी के चित्रकूट प्रवास की अवधि में एक बार सीता जी ने अत्रि समेत तीन ऋषियों को अपने हाथों से खाना बना कर भोजन कराया था। यही कारण है कि यह स्थल सीता रसोई के नाम से प्रसिद्ध है। 

चित्रकूट मंदाकिनी नदी के किनारे पर बसा भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में एक है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 38.2 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला शांत और सुन्दर चित्रकूट प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन है। चित्रकूट जिले में ही राजापुर है जो पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली है।

राम घाट वह घाट है जहाँ प्रभु राम नित्य स्नान किया करते थे l इसी घाट पर गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रतिमा भी है l 

लक्ष्मण पहाड़ी

कामदगिरि के पास ही है लक्ष्मण पहाड़ी जहां कहते  हैं कि लक्ष्मण जी सदैव धनुष में बाण सादे भैया राम और भाभी सीता की रक्षा में तत्पर रहते थे। उन्हें नींद ना आये इसलिए उनकी पत्नी उर्मिला ने उनके हिस्से की नींद भी स्वयं भोगने का वरदान मांग लिया था। लक्ष्मण चौबीस घंटे जगते रहते थे और उनके बदले उर्मिला चौबीस घंटे सोती रहती थीं। कहते हैं उर्मिला की नींद लक्ष्मण के वन से अयोध्या वापसी पर ही खुली।

भरतकूप

 भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए भरत भारत की सभी पवित्र नदियों का जल लाये थे पर राम राज्याभिषेक करा कर अयोध्या वापस लौटने को तैयार नहीं हुए। इसके बाद अत्रि मुनि के परामर्श पर भरत ने वह पवित्र जल एक कूप में रख दिया था। इसी कूप को भरत कूप के नाम से जाना जाता है। भगवान राम को समर्पित यहां एक मंदिर भी है। 

वायु मार्ग

चित्रकूट का नजदीकी हवाई अड्डा प्रयागराज है। इसके अतिरिक्त नजदीकी एयरपोर्ट-भरहुत सतना (मध्य प्रदेश) भी है। चित्रकूट की देवांगना घाटी में भी हवाई पट्टी का निर्माण पूर्णता की ओर है। इसके बनने से तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को बहुत सुविधा होगी।

रेल मार्ग

चित्रकूट से 8 किलोमीटर की दूर कर्वी निकटतम रेलवे स्टेशन है। यहां से विविध शहरों के लिए ट्रेनें उपलब्ध हैं। 

चित्रकूट की यात्रा पर आने का सबसे  उपयुक्त  समय  फरवरी या मार्च होता है। यहां ठहरने के लिए कई धर्मशालाएं व उत्तर प्रदेश सरकार का राही गेस्ट हाउस भी है। अवसर मिले तो एक बार इस पुण्य क्षेत्र की यात्रा अवश्य करनी चाहिए क्योंकि यह तीर्थक्षेत्र ऐसा है जहां आकर प्रभु के होने की अनुभूति होती है।

 चित्रकूट की इस कहानी के बाद अब देखिए चित्रकूट पर वह वीडियो जो इस यूट्यूबर ने 2016 की अपनी चित्रकूट यात्रा में बनाया था। इसमें वहां का एक गाइड चित्रकूट के बारे में बता रहा है।

इस आलेख का वीडियो देखने के लिए कृपया यहां क्लिक कीजिए


Thursday, June 24, 2021

गोकर्ण ने कैसे दिलायी भाई धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्ति


 प्राचीन काल की कथा है। तुंगभद्रा नदी के किनारे अनुपम नामक एक नगर में आत्मदेव  नामक  का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम था धुन्धुली । आत्मदेव को सबसे बड़ा दुख यह था कि उनके कोई संतान नहीं थी।इससे वे सदा चिंतित रहते थे। एक दिन दु:खी होकर वे वन में चले गये । वहां उन्हें एक योगनिष्ठ संन्यासी के दर्शन हुए । आत्मदेव ने संन्यासी के सामने अपना दुख व्यक्त किया कि हे महात्मन मैं बहुत दुखी हूं, मेरे कोई संतान नहीं है।  संन्यासी ने ध्यान लगा कर देखा और फिर बताया कि भाग्य की प्रबलता तथा विधाता के लिखे लेख के चलते सात जन्मों तक आपको  संतान की प्राप्ति का कोई योग नहीं है। सन्तान न होने का संकेत करते हुए संन्यासी ने आत्मदेव से कहा कि वे सन्तान मोह छोड़ दें लेकिन आत्मदेव ने संन्यासी से आग्रह किया कि वे कोई ऐसा उपाय बतायें जिससे उन्हें संतान की प्राप्ति हो सके।  उसके आग्रह को देखते हुए संन्यासी ने उसे एक फल प्रदान किया और कहा कि इसे अपनी पत्नी को वह खिला दे और उसे नियम पूर्वक रहने को कहे तो निश्चित रूप से सन्तान की प्राप्ति होगी । आत्मदेव ने घर लौटकर वह फल पत्नी धुन्धुली को दिया और संन्यासी की बात बताते हुए उससे कहा की वह श्रद्धापूर्वक फल खा ले तो अवश्य संतान की प्राप्ति होगी। धुन्धुली ने पति से फल ले तो लिया लेकिन दुविधा में पड़ गयी कि इसे खाये या ना खाये।उसके मन में अनेक कुतर्क उपजने लगे और अंतत: उस फल को नहीं खाया और  अपनी बहिन की सलाह से चुपचाप उस फल को गाय को खिला दिया । धुन्धुली की बहिन उस समय गर्भवती थी। उसने धुन्धुली के साथ योजना बनायी उसके अनुसार जब उसके पुत्र हुआ तो उसने अपने पुत्र को धुन्धुली को दे दिया । आत्मदेव दोनों बहनों की इस योजना से पूरी तरह अनजान थे इसलिए उन्होंने उस पुत्र को अपना ही पुत्र  मान लिया । धुन्धुली ने पुत्र का नाम धुन्धुकारी रखा।

  संन्यासी दिया फल खाने के कारण गौ से भी एक सुन्दर मनुष्याकार बच्चा  हुआ । इससे आत्मदेव अति प्रसन्न हुए और उसने उस गौ से उत्पन्न पुत्र का नाम गोकर्ण रखा। समय व्यतीत होने के साथ-साथ दोनों पुत्र बडे हुए। धुन्धुकारी अति दुष्ट निकला तथा गोकर्ण अत्यन्त ज्ञानी। आत्मदेव धुन्धुकारी के उत्पातों से अत्यन्त दु:खी रहने लगा और एक दिन ज्ञानी गोकर्ण के उपदेश से घर छोड़ कर वन में चला गया । वहां भगवद् - आराधना से उसने भगवान् को प्राप्त किया । 

इधर धुन्धुकारी के उत्पात जारी रहे। वह नगर के बच्चों को नाव में बैठाता और नदी के बीच में ले जाकर सभी को तीव्र गति से बहती नदी की धारा में डुबो कर मार देता था। जब वे बचाने के लिए गिड़गिड़ाते तो धुंधकारी खूब खुश होता। नगर के लोग उससे परेशान थे पर करते तो क्या करते। धुंधकारी इतना क्रूर और दुष्ट था कि सभी उसके पास जाने में डरते थे।

 कौन-सा ऐसा दुर्गुण था जो धुंधकारी में नहीं था। गोकर्ण बड़ा होकर विद्वान पंडित और ज्ञानी निकला जबकि धुंधकारी दुष्ट, नशेड़ी और क्रोधी, चोर, व्याभिचारी, अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाला, माता पिता को सताने वाला । उसने माता पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी।

हद तो तब हो गयी जब धुंधकारी ने एक दिन अपने पिता को मार मार कर घर से बहार निकाल दिया। पिता रोने लगा और उसने दुखी होकर कहा कि अच्छा होता अगर मेरी पत्नी बांझ ही रहती। जब पिता यह सोच रहा होता है तभी वहां गोकर्ण आ जाता है। वह पिताजी को वैराग्य का उपदेश देता है और कहता है कि आप सभी छोड़ कर प्रभु की शरण में वन चले जाएं और भागवत भजन करें। भगवत भजन ही सबसे बड़ा धर्म है। गो से उत्पन्न पुत्र गोकर्ण की बात मान कर आत्मदेव वन चले जाते हैं। बाद में उसकी पत्नी धुन्धली को धुंधकारी सताने लगता है तो वह कुएं में कूद कर आत्महत्या कर लेती है।

  तब धुंधकारी पांच वेश्याओं के साथ रहने लगता है। वेश्याएं उसे अपनी इच्छानुसार चलाती थीं। धुंधकारी उन वेश्याओं के लिए ही धन जुटाने लगा। वह उनके लिए डाका डालता और चोरी करता था। बाद में वे वेश्याएं सोचने लगती हैं कि यदि एक दिन यह पकड़ा गया तो राजा इसके साथ हमें भी दंड देगा। यह सोच कर वह वेश्याएं सोते हुए धुंधकारी को रस्सियों से उसका गला दबाने का प्रयास करती हैं। जब वह गला दबाने से भी नहीं मरता है तो वे सभी मिल कर उसे दहकते अंगारों में डाल देती हैं। वहां वह तड़फ-तड़फ कर मर जाता है। बाद में उसे गड्डा खोद कर गाड़ दिया जाता है।

मरने के बाद धुंधकारी भयंकर दुख देने, झेलने और अपने कुकर्मों के कारण एक प्रेत बन जाता है। प्रेत बनने के बाद भूख और प्यास से वह व्याकुल हो जाता है। रह रह कर वह चिल्लाता भी रहता है क्योंकि उसे अंगारों से जलाया गया था इसीलिए उसकी अनुभूति उसे अभी भी सताती रहती है। उसे लगता है कि अभी भी उसका शरीर जल रहा है।

एक दिन उसका भाई गोकर्ण उसके गांव में कथा करने आता है। गोकर्ण सबसे नजर बचाते हुए अपने पुरखों के मकान में सोने चले जाते हैं। अपने ही घर में अपने भाई को सोया हुआ देख कर धुंधकारी खुश हो जाता है और आवाज लगाता है।

गोकर्ण यह आवाज सुनकर पूछता है कि तुम कौन हो?

धुंधकारी कहता है, मैं तुम्हारा भाई हूं, मेरे कुकर्मो की गिनती नहीं की जा सकती, इसी से में प्रेत-योनि में पड़ा ये दुर्दशा भोग रहा हूं, भाई। तुम दया करके मुझे इस योनि से मुक्ति दिलाओ।

गोकर्ण ने कहा कि मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है मैंने तुम्हारे लिए विधिपूर्वक गयाजी में श्राद्ध किया फिर भी तुम प्रेतयोनि से मुक्त कैसे नहीं हुए, मैं कुछ और उपाय करता हूं। कई उपाय करने के बाद भी जब कुछ नहीं हुआ तो अंत में वह सूर्यदेव से पूछते हैं तो सूर्यदेव ने बताया कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने से ही धुंधकारी की मुक्ति हो सकती है। इसलिए तुम सप्ताह पारायण करो।

 तब गोकर्ण व्यास गद्दी पर बैठ कर कथा कहने लगे देश, गांव से बहुत लोग कथा सुनने आने लगे इतनी भीड़ हो गई कि सब आश्चर्य करने लगे तब वह प्रेत भी वहां आ पहुंचा वह इधर-उधर स्थान ढूंढने लगा इतने में उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गांठ के बांस पर पड़ी वह वायु रूप से उसमें जाकर बैठ गया।

जब शाम को कथा को विश्राम दिया गया, तो एक बड़ी विचित्र बात हुई। सबके देखते-देखते उस बांस की एक गांठ तड़-तड़ करती फट गई इसी प्रकार सात दिनो में सातों गांठे फट गईं और बारह स्कंद सुनने से पवित्र होकर धुंधकारी एक दिव्य रूप धारण करके सामने खड़ा हो गया। उसने भाई को प्रणाम किया तभी बैकुण्ठवासी पार्षदों के सहित एक विमान उतरा। सबके देखते ही धुंधकारी विमान पर चढ़ गए।

उन पार्षदों को देख कर उनसे गोकर्ण ने कहा- भगवान के प्रिय पार्षदों यहां हमारे अनेकों शुद्ध हृदय श्रोतागण है उन सबके लिए एक साथ बहुत से विमान क्यों नहीं लाए? यहां सभी ने समान रूप से कथा सुनी है फिर फल में इस प्रकार का भेद क्यों?

भगवान के पार्षदों ने कहा- इस फल भेद का कारण इनमें श्रवण का भेद है श्रवण सबने समानरूप से ही किया किन्तु इसके जैसा मनन नहीं किया। इस प्रेत ने सात दिन तक सुने हुए विषय का स्थिरचित्त से खूब मनन भी किया। यह कह कर वे सब पार्षद बैकुंठ को चले गए।

श्रावण माह में गोकर्ण ने फिर से उसी प्रकार सप्ताह क्रम से कथा कही वहां भक्तों से भरे हुए विमानों के साथ भगवान प्रकट हो गए उस गांव में कुत्ते और चण्डाल पर्यंन्त जितने भी जीव थे सभी दिव्य देह धारण करके विमान पर चढ़ गए भगवान उन सभी को योगिदुर्लभ गोलोक धाम में ले गए।

इस कथा का यह निष्कर्ष है कि-अपने माता-पिता को कष्ट देने वाला, शराब पीने वाला, वेश्यागामी पुरुष प्रेतयोनि प्राप्त कर अनंतकाल तक भटकते रहते हैं। अब न गोकर्ण की तरह कथा सुनाने वाले हैं और न सुनने वाले। धुंधकारी को उसके पापों की सजा तो मिली ही साथ ही उसने प्रेतयोनि में रहकर भी सजा भुगती। बाद में जब उसे पछतावा हुआ तो भागवत कथा सुनकर मन निर्मल हो गया। निर्मल मन होने से उसके सारे संताप जाते रहे।

 यहां अपना एक अनुभव जोड़ना चाहता हूं। हमारे गांव में हमारे एक परिचित थे जो कभी-कभी भागवत सप्ताह करवाते थे। भागवत के व्यास बनते हमारे रामस्वरूप बाबा जी जो काशी से संस्कृत पढ़ कर आये थे और क्षेत्र के सुपरिचित कथा वाचक थे। अब सीधे-सादे ग्रामीणों को भागवत क्या समझ में आती वे आते प्रणाम करते और थोड़ी देर बैठ कर चले जाते थे। थोड़ी संस्कृत जानता था इसलिए मैं रोज भागवत सुनने पहुंचता था और पंडित जी श्लोक के साथ उसका अर्थ बताते थे। वहां जिस तख्त पर व्यास आसन बनाया गया था उसके एक कोने में सात गांठों वाला कच्चा बांस बंधा देख कर मैंने पंडित जी से पूछा तो उन्होंने यही धुंधकारी के मुक्त की कथा सुनायी थी और कहा था कि यह सात गांठ वाला बांस उसी का प्रतीक है। 

  अगर इस कथा पर विचार करें और इसके प्रतीकों को मानव जीवन से जोड़ कर देखें तो तुङ्गभद्रा नदी हमारे भीतर प्रवाहित शुद्ध चैतन्य रूपी नदी इसके तट पर बसा हुआ अनुपम नगर मानों हमारा मनुष्य है । आत्मदेव मनुष्य की जीवात्मा है। अर्थात् मनुष्य स्वयं आत्मदेव है ।

 धुन्धुली हमारी अशुद्ध मन - बुद्धि की परिचायक है। धुन्धुली शब्द से धुंधली अर्थात अस्पष्ट का भान होता है । बुद्धि धुंधली है तो वह अच्चे-बुरे का फर्क नहीं कर सकेगी जैसा धुंधली के सात हुआ।

 आत्मदेव की सन्तान प्राप्ति की इच्छा मनुष्य की गुण- प्राप्ति की इच्छा का प्रतीक है ।


आत्मदेव का वन में जाना मानों मनुष्य का अन्तर्मुखी होना है।वन में मिलने वाला योगनिष्ठ संन्यासी जैसी अपनी अन्तरात्मा है। अन्तर्मुखी होने पर ही अन्तरात्मा से मिलन होता है, जहां से हमें हमारी आवश्यकता के अनुसार यथोचित निर्देश मिलता है ।

 संन्यासी द्वारा दिया हुआ फल अन्तरात्मा द्वारा दिए गए यथार्थ दिशा - निर्देश की ओर संकेत करता है, जिसको धुन्धुली रूपी हमारी अशुद्ध मन - बुद्धि स्वीकार नहीं कर पाती हैं ।

 अशुद्ध मन - बुद्धि की बहिर्मुखी चेतना या वृत्ति को ही धुन्धुली की बहन जानना चाहिए। ऐसी बहिर्मुखी चेतना से ही धुन्धुकारी का जन्म होता है । 

 हमारी अन्तर्मुखी चेतना या वृत्ति ही गौ है । हमारे अन्तरात्मा अर्थात् संन्यासी द्वारा निर्दिष्ट दिशा निर्देश (फल) को बहिर्मुखी व्यापार वाली अशुद्ध मन - बुद्धि (धुन्धुली) तो ग्रहण या स्वीकार नहीं करती परन्तु उसी दिशा - निर्देश को अन्तर्मुखी चेतना(गौ) सहज रूप में ग्रहण भी करती है और उस पर ध्यान भी देती है । यही  गोकर्ण की उत्पत्ति है । गोकर्ण में दो शब्द हैं - गो और कर्ण । गौ का अर्थ है अन्तर्मुखी चेतना और कर्ण का अर्थ है - कान देना या ध्यान देना अथवा सुनना । अन्तरात्मा के दिशा - निर्देश को सुनकर अथवा उस पर ध्यान देकर तदनुसार ज्ञानयुक्त व्यवहार(सत्कर्म) करने के कारण ही गोकर्ण इस कथा में ज्ञानी कहा गया है । ऐसी ज्ञानयुक्त चेतना अर्थात् गोकर्ण से ही निर्देशित होकर मनुष्य सच्चे मार्ग की ओर अग्रसर होकर अपने जीवन के अभीष्ठ लक्ष्य को प्राप्त करता है । इसी तथ्य को कहानी में आत्मदेव का गोकर्ण से उपदेश प्राप्त करके वन में जाना तथा वहां भगवत् आराधना द्वारा भगवान् को प्राप्त करना कहा गया है ।

 प्रेत योनि को प्राप्त धुन्धुकारी भागवत कथा श्रवण के लिए सात गांठों वाले एक बांस में प्रवेश कर गया । बांस की सात गांठें हमारी पांचों इन्द्रियों, छठे मन तथा सातवीं बुद्धि पर लगी हुई अज्ञान की, अशुद्धि की गांठे हैं। भागवत के श्रवण - मनन से पूर्व धुन्धुकारी पांचों इन्द्रियों, छठे मन तथा सातवीं बुद्धि नामक सातों स्तरों पर अशुद्धि तथा अज्ञान से युक्त था। यही उसका सात गांठों वाले बांस में बैठना है। भागवत के श्रवण - मनन के पश्चात् इन सातों स्तरों पर वह अशुद्धि, अज्ञान से मुक्त हो गया - यही बांस की सातों गांठों का फटना है ।

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Saturday, June 19, 2021

‘गणपति बप्पा मोरिया’ के जयकारे में मोरया कौन?

 


महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश में गणेश चतुर्थी को गणेशोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। पूरा महाराष्ट्र और विशेषकर मुंबई महानगर इस दौरान सजधज जाता है और सभी दिशाओं से 'गणपति बप्पा मोरया', 'मंगलमूर्ति मोरया' के जयकारे से गूंज जाता है। क्या कभी आपमें से किसी ने यह सोचा है कि गणपति मोरया में मोरया कौन है। इस कहानी पर आयेंगे पहले गणेशोत्सव के प्रारंभ और इसकी परंपरा पर आते हैं। सर्व प्रथम पेशवाओं ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया। सुना जाता है कि पुणे में कस्बा गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति की स्थापना शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई ने की थी। लेकिन इसे जनोत्सव बनाने और लोकप्रिय करने का श्रेय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को जाता है। गणोत्सव को उन्होंने जो स्वरूप दिया उससे गणेश उत्सव राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया। उनके प्रयास से परिवार तक सीमित इस उत्सव को सार्वजनिक महोत्सव का रूप मिला। यह केवल धार्मिक आयोजन तक ही सीमित नहीं रहा, अपितु तिलक ने इसे स्वतंत्रता संग्राम में मदद, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया। उन्होंने उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में गणेशोत्सव का जो सार्वजनिक आयोजन किया था उसने धीरे-धीरे विशाल स्वरूप ले लिया।महाराष्ट्र और मुंबई गणेशोत्सव के दौरान 'गणपति बप्पा मोरया' के जयकारे से गूंज उठता है। इसके बाद जब मूर्तियों का विसर्जन होता है तो उस दौरान शोभयात्रा में जो नारा गूंजता है वह है 'गणपति बप्पा मोरया पुड्च्यावर्षी लौकरिया' ( अर्थात गणपति मोरया अगले वर्ष जल्द आना)। अब जानते हैं कि गणपति बप्पा मोरया के जयकारे में जानिये ‘मोरया’ क्यों जोड़ा जाता है और कौन थे मोरया।

पुणे के पास के चिंचवाड़ा गांव से निकलकर यह जयकारा आज पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गया है। क्या आप जानते हैं की गणपति बप्पा के नाम के साथ मोरया शव्द क्यों लगाया जाता है। इस जयकारे की शुरुआत कैसे और कव हुई।

गणेश महोत्सव के अवसर पर गणपति बप्पा मोरया का  जयकारा क्यों लगाते हैं। यह बात सबको पता नहीं है। गणपति बप्पा के नाम के साथ मोरया शव्द कब और कैसे जुड़ा।मोरया का मतलब भगवान गणपती के नाम के साथ मोरया शब्द कैसे जुड़ा, इसके पीछे एक कहानी है। ये कहानी है भगवान गणपती के अनन्य भक्त मोरया गोसावी की। जिनकी भक्ति  के कारण सदा-सदा के लिए उनका नाम गणपती के साथ जुड़ गया।

 मोरया गोसावी भगवान गणपती के परम भक्त और सच्चे  उपासक थे। संत मोरया का जन्म महाराष्ट्र में पुणे के करीब चिंचवाड़ा नामक गांव में हुआ था। संत मोरया गोसावी रोज सच्चे मन से गणपती बप्पा की पूजा करते थे।अंत में उन्होंने गणेश मंदिर के पास ही समाधि ली थी। भगवान गणपती के सच्चे उपासक होने के कारण मोरया गोसावी का नाम सदा के लिए गणपती बप्पा के नाम के साथ जुड़ गया।कहते हैं की भक्त और भगवान के अटूट संबंध दर्शाने के लिए और उन्हें सम्मान देने के लिए भक्त मोरया का नाम भगवान के नाम से जोड़ दिया गया। कारण जो भी रहा हो लेकिन भक्त मोरया का नाम भगवान के नाम से जुड़ कर सदा के लिए अमर हो गया। भगवान और उनके एक परम भक्त की यह कहानी है,जिसकी भक्ति और आस्था ने उन्हें अमर बना दिया। जिस कारण उनका नाम गणपती के साथ हमेशा-हमेशा के लिए जुड़ गया।

भक्त मोरया और उनसे जुड़े भगवान गणपती की कहानी बहुत ही पुरानी है। जहां भक्‍त की परम भक्ति और अपार आस्था के फलस्वरूप भगवान के साथ हमेशा के लिय जुड़ गया उनके भक्त का नाम। 15 वीं शतावदी में भगवान गणपती के एक परम भक्त हुए जिमका नाम मोरया गोसावी था। उनका जन्म महाराष्ट्र के पुणे शहर से करीब 20 किमी दूर चिंचवाड़ नामक गांव में हुआ था।बचपन से ही वे भगवान गणपती  के परम भक्त थे। हर साल वे गणेश चतुर्थी के उत्सव पर पैदल ही चलकर मोरगांव भगवान गणपती के पूजा के लिए जाते थे। जैसे जैसे उनकी उम्र बढ़ने लगी उनकी भक्ति और विश्वास बढ़ता गया।

जब वे बूढ़े हो गये और बढ़ती उम्र के कारण मोरगांव अपने इष्ट के दर्शन के लिए नहीं जा पाते थे। वे लाचार और निराश रहने लगे। लेकिन भगवान की भक्ति नहीं छोड़ी।वे अपने जीते जी भगवान गणपती के दर्शन करना चाहते थे। कहते हैं की भगवान तो भक्त वात्सल्य होते हैं और वे अपने भक्तों की इच्छा को जरूर पूरा करते हैं।

 गणपती ने अपने भक्त मोरया गोसावी की आस्था और भक्ति से खुश होकर उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए। उन्होंने ने मोरया गोसावी से कहा की जब तुम सुबह नदी में स्नान कर रहे होगे उसी बक्त मैं तुम्हें किसी न किसी रूप में दर्शन दूंगा। अगले दिन जब मोरया गोसावी पास की नदी में स्नान कर रहे थे। तब जैसे ही वे स्नान के लिए कुंड में डुबकी लगाई और बाहर निकने तो उनके हाथ में भगवान गणेश की प्रतिमा थी।

भक्त मोरया गोसावी को रात के सपने की बात समझते देर नहीं लगी। उन्होंने अपने इष्ट देव के दर्शन पाकर अपने आप को धन्य समझा और उस मूर्ति को पास के मंदिर में रख कर दिन रात पूजा करने लगे।जैसे-जैसे मृत्यु का समय निकट आने लगा उनकी भक्ति प्रकाढ़ होती गयी। लोगों को विश्वास हो गया की वर्तमान में मोरया गोसावी से बड़ा गणपती बप्पा का कोई अन्य भक्त नहीं है।

धीरे-धीरे उनका नाम और प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी। दूर -दूर से लोग मोरया गोसावी से आशीर्वाद लेने और दर्शन के लिए आने लगे। जब लोग उनसे आशीर्वाद लेते तब वे लोगों को आशीर्वाद वचन में मंगल मूर्ति कहते।इस प्रकार जो भी लोग मोरया गोसावी के दर्शन के लिए आते वे गणपती के साथ भक्त मोरया का नाम जोड़ कर जयकारा लगाते। इस प्रकार भक्त मोरया गोसावी का नाम गणपती के नाम से जुड़ गया।

इस प्रकार यह जयकारा पुणे के पास के एक गाँव से निकलकर महाराष्ट्र सहित पूरे भारत में फैल कर प्रसिद्ध हो गया। लोगों की मान्यता है की गणपती बप्पा के नाम के साथ उनके परम भक्त मोरया का नाम लेने से वे जल्दी प्रसन्न होते हैं।

जब मोरया गोसावी की मृत्यु हुई तब उसी मंदिर के पास मोरया गोसावी की समाधि बनाई गई। जब लोग मोरया गोसावी मंदिर में भगवान गणपती के पूजा के लिए लिए जाते हैं तब उनके परम भक्त मोरया गोसावी की समाधि को नमन करना नहीं भूलते। जिस मंदिर में मोरया गोसावी गणपती की मूर्ति को स्थापित कर पूजा करते थे वह आज गोसावी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ हजोरों लोग प्रतिदिन गणपती बप्पा की पूजा करने के लिए आते हैं।

गोसावी मंदिर में साल में दो बार विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। गोसावी मंदिर में भगवान गणपती की अद्भुत मूर्ति विराजमान है। मोरया गोसावी मंदिर में साल में दो बार विशेष उत्सव का आयोजन की जाता है। पहला उत्सव यहाँ भादों के महीने में मनाया जाता है। जिसमें देखने देश भर से लोग पुणे के पास चिंचवाड़ गाँव आते हैं।दूसरा उत्सव माघ के महीने में आयोजित किया जाता है। इस उत्सव दौरान मोरया गोसावी मंदिर से पालकी निकाली जाती है। लोग पालकी के साथ गणपति बप्पा मोरिया के जयकारा के साथ मोरगाँव के गणपती मंदिर तक जाते हैं।

 मोरया गोसावी को गणपतियों का प्रमुख आध्यात्मिक संत माना जाता है और उन्हें गणेश का "सबसे प्रसिद्ध भक्त" बताया गया है।मोरया गोसावी का जीवनकाल 13 वीं से 17 वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है। मोरया गणेश को पूरी तरह समर्पित थे। जब उन्होंने गणेश के मंदिर मोरगाँव का दौरा करना शुरू किया तो कहते हैं कि लोकप्रिय गणेश मंदिर में कुछ लोग उनकी गणेश सेवा में बाधा डालने लगे। इस पर गणेश ने मोरया से कहा कि वह पूजा करने के लिए मोरया के लिए चिंचवाड़ में दिखाई देंगे, इसलिए मोरया मोरगांव से चिंचवाड चले गए, जहां उन्होंने स्वयं मोरया गणेश मंदिर बनवाया। कहते हैं कि मोरया ने अपने बनाये गणेश मंदिर के पास ही जीवित समाधि ले ली थी। मोरया के चिंतामणि नामक एक पुत्र था, जिसे गणेश के जीवित अवतार के रूप में माना जाता है और देव के रूप में संबोधित 

किया जाता है। मोरया गोसावी ने भक्ति कविताओं की भी रचना की।

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Thursday, June 17, 2021

क्या आज भी महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्यारत हैं परशुराम ?

 


 जिनको अमरत्व का वरदान प्राप्त है उनमें परशुराम जी का नाम भी सम्मिलित बताया जाता है। ऐसा माना जाता है कि वे आज भी सूक्ष्म शरीर में महेंद्रगिरि पर्वत पर आज भी तपस्या में लीन हैं। जब बहुत से अत्याचारी राजा तामसी प्रवृत्ति के हो गये तब विष्णु ने अपने अंश से परशुराम रूप में अवतार लिया और अत्याचारी राजाओं का नाश किया। जब राम ने जनकपुर के धनु, यज्ञ् में परशुराम के गुरु शिव जी का धनुष तोड़ दिया और यह संवाद परशुराम को मिला तो वे जनकपरु पहुंचे और गुरु के धनुष को खंडित देख कर बहुत क्रोध किया। राम के लघु भ्राता लक्ष्मण से उनका बड़ा तर्क वितर्क हुआ और अपनी शक्ति का बखान करने के लिए उन्होंने यह उल्लेख किया था कि उन्होंने अत्याचारियों से पृथ्वी को मुक्त किया। पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसका उल्लेख इन शब्दों में किया है-वीर विहीन मही मैं कीन्हीं। विपुल बार महिदेवन दीन्हीं।

परशुराम ने जब देखा कि कुछ राजाओं के अत्याचार बढ़ गया है तब उन्होंने हैहय वंशी राजाओं से कटिन संग्राम किया और विजय पायी। इनमें से ही एक सहस्त्रबाहु अर्जुन, थे जिनके बारे में यह प्रसिद्ध है कि उन्होंने महाप्रतापी रावण तक को कैद कर लिया था। उनसे भी परशुराम ने युद्ध किया और विजय पायी। जब शिव धनुष टूटने पर वे जनकपुर पहुंचे और उनकी लक्ष्मण जी से बहस होने लगी तो उन्हें डरवाने के लिए उन्होंने सहत्रबाहु अर्जुन पर विजय पाने की अपनी बात सुनायी। गोस्वामी तुलसीदास  ने अपने रामचरित मानस में इसका जिक्र इस तरह से किया है-सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥

भगवान परशुराम माता रेणुका और ऋषि जमदग्नि की चौथी संतान थे। शिव के अनन्य भक्त थे। शिव जी से उनको वरदान स्वरूप परशु (फरसा) मिला था। इसी कारण इनका नाम परशुराम पड़ा। धनुष यज्ञ के दौरान जब गुरु शिव का धनुष टूट जाने पर वे क्रोध करते हैं तो राम विनयी मुद्रा में जो कहते हैं उसका उल्लेख तुलसीदास ने रामचरित मानस में इस तरह किया है-राम मात्र लघु नाम हमारा परसु सहित बड़ नाम तोहारा।। देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें।।

माना जाता है कि भगवान परशुराम आज भी धरती पर हैं। इन्हें सात अमर देवताओं में एक माना जाता है।  भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार थे। भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ था। खास बात यह है कि इसी तिथि में भगवान के अन्य अवतार नर नारायण और हयग्रीव का अवतार भी इसी तिथि को हुआ था।

 

पिता की आज्ञा का मान रखने के लिए परशुराम को अपनी ही माता का वध करना पड़ा था। पिता से ही वरदान मांग कर उन्होंने अपनी माता को पुन: जीवित करा लिया। त्रेता युग में भगवान राम ने ही परशुराम को द्वापर युग तक सुदर्शन चक्र संभालने की जिम्मेदारी थी। इसीलिए गुरु संदीपनी के यहां आकर परशुराम ने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र सौंपा था।  परशुराम ने ही द्वापर युग के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारियों में गिने जानेवाले भीष्म और कर्ण को धनुर्विद्या सिखाई। कामधेनु का चमत्कार देखकर सहस्त्रबाहु उस पर मुग्ध हो गया। उसने जमदग्नि से कहा कि वे अपनी गाय उसे दे दें। किंतु जमदग्नि ने कामधेनु गौ देने से साफ मना कर दिया। उनके मना करने पर सहस्त्रबाहु ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले चलें।सहस्त्रबाहु कामधेनु को अपने साथ ले गया। उस समय आश्रम में परशुराम नहीं थे। परशुराम जब आश्रम में आए, तो उनके पिता जमदग्नि ने उन्हें बताया कि किस प्रकार सहस्त्रबाहु अपने सैनिकों के साथ आश्रम में आया  और किस प्रकार वह कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले गया। घटना सुन कर परशुराम क्रुद्ध हो उठे। वे कंधे पर अपना परशु रख कर सहस्त्रबाहु की नगरी महिष्मती की ओर चल पड़े। सहस्त्रबाहु अभी महिष्मती के मार्ग में ही था कि परशुराम उसके पास जा पहुंचे, सहस्त्रबाहु ने जब यह देखा कि परशुराम तीव्र गति से चले आ रहे हैं, तो उसने उनका सामना करने के लिए अपनी सेनाएं खड़ी कर दीं। एक ओर हज़ारों सैनिक थे, दूसरी ओर अकेले परशुराम थे, घनघोर युद्ध होने लगा।

परशुराम ने अकेले ही सहस्त्रबाहु के समस्त सैनिकों को मार डाला। जब सहस्त्रबाहु की संपूर्ण सेना नष्ट हो गई, तो वह स्वंय रण के मैदान में उतरा, वह अपने हज़ार हाथों से हज़ार बाण एक ही साथ परशुराम पर छोड़ने लगा। परशुराम उसके समस्त बाणों को दो हाथों से ही नष्ट करने लगे। जब बाणों का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा, तो सहस्त्रबाहु एक बड़ा वृक्ष उखाड़कर उसे हाथ में लेकर परशुराम की ओर झपटा। परशुराम ने अपने बाणों से वृक्ष को खंड-खंड कर ही दिया, सहस्त्रबाहु के मस्तक को भी काटकर पृथ्वी पर गिरा दिया। वह रणभूमि में सदा के लिए सो गया।परशुराम सहस्त्रबाहु को मारने के पश्चात कामधेनु को लेकर अपने पिता के पास लौट आये। महर्षि जमदग्नि कामधेनु को पाकर अतीव हर्षित हुए। उन्होंने परशुराम को ह्रदय से लगाया और उन्होंने बहुत-बहुत आशीर्वाद दिया। परशुराम अपने पिता के अनन्य भक्त थे। वे उन्हें परमात्मा मानकर उनका सम्मान किया करते थे। जमदग्नि बहुत बड़े योगी थे। उन्होंने योग द्वारा सिद्धियां प्राप्त की थीं।

 कहा जाता है वही महाबली अमर परशुराम महेंद्रगिरि पर्वत पर आज भी विद्यमान हैं। हर साल यहां बड़ी तादाद में श्रद्धालु आते हैं।  

- महेंद्रगिरि पर्वत उड़ीसा के गजपति जिले के परालखमुंडी में स्थित है।
- यह पर्वत धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह रामायण, महाभारत और पुराणों से जुड़ी हुई है।
- ऐसा माना जाता है कि महेंद्रगिरि पर्वत भगवान परशुराम की तप की जगह थी। और अंतत: वह उसी पर्वत पर तपस्या के लिए चले गए थे। - दरअसल, पौराणिक कथाओं में अश्वत्थामा, हनुमान की तरह परशुराम को भी चिरजीवी बताया गया है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस में भी यह उल्लेख है कि जब धनुष य़ज्ञ के समय राम ने शिव का धनुष तोड़ दिया गया तो परशुराम उन पर भी बहुत  क्रोधित हुए लेकिन बाद में वे बोले-राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥ देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥ जब संदेह मिट गया उसके बाद-कहि जय जय जय रघुकुल केतू। भृगुपति गये वनहिं तप हेतू। संदेह मिटने पर प्रभु राम से क्षमा मांग कर उन्हें प्रणाम कर परशुराम जी तपस्या करने वन को चले जाते हैं। मान्यता है कि तभी से वे महेंद्र गिरि पर्वत पर सूक्ष्म रूप से तपस्या में लीन हैं।

- महेंद्रगिरि पर्वत पर महाभारत काल के कई मंदिर मौजूद हैं, ऐसा कहा जाता है कि ये मंदिर पांडवों ने बनवाए थे।- यहां भीम, कुंती, युधिष्टिर के अलावा दारु ब्रह्म का मंदिर देखने मिलेंगे।  
 महाशिवरात्रि पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

 

 

Sunday, June 13, 2021

किसके श्राप के चलते राम ने किया था सीता का त्याग



वनवास से लौटने के बाद श्रीराम अपने छोटे भाई भरत के बार-बार आग्रह करने पर अयोध्या का राजपाट संभाल लिया। श्रीराम के सिंहासनारूढ़ होने से अयोध्या की जनता की प्रसन्नता का ठिकाना ना रहा। लोग चारों ओर मंगल गीत गाने और दीपक से नगर को जगमगाने में लगे थे। लोग आपस में मिठाइयां बांट रहे थे। सारी प्रजा प्रभु श्री राम के राज्य में सारी जनता ख़ुश थी। उनके राज्य में न तो कोई अपराध होता था न ही किसी को किसी चीज़ का अभाव था।

ऐसे ही सबका समय सुख से बीत रहा था। श्रीराम भी अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करते थे और समय-समय पर उनका हाल चाल लेते रहते थे| उन्होंने अपने द्वारपालों से कह रखा था कि ध्यान रखना मेरे द्वार से कोई भी याचक  खाली हाथ न लौटे। इसके साथ ही राज्य की जनता से कह रखा था की जब भी किसी को कोई जरूरत हो वह बिना किसी संकोच के उनसे मिलने आ सकता था।

श्रीराम स्वयं भी कई बार भेष बदल कर अपने राज्य में आम जनता के बीच जाकर उनके दुखों और कष्टों के बारे में जानकारी लेते रहते थे। इसी क्रम में एक दिन जब श्रीराम भेष बदल कर अपने राज्य की जनता के बीच गए तो उन्हें चौराहे पर लोगों की भीड़ दिखी। उत्सुकता वश श्रीराम भी वहाँ जा पहुंचे ताकि पता चल सके की भीड़ के जमा होने के पीछे क्या कारण था| वहाँ पहुँचे। 

उन्होंने देखा की एक धोबी अपनी पत्नी से झगडा कर रहा था।प्रभु श्रीराम भी झगड़े का कारण जानने के लिए वहीं रुक गये। धोबी ने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया था। जबकि धोबी की पत्नी का कोई अपराध नहीं था। लोगों ने जब बीच बचाव करते हुए उसे समझाने की कोशिश की तो उसने यह कह कर सबका मुंह बंद कर दिया की मैं कोई श्रीराम थोड़े ही हूं जिन्होंने रावण के पास वर्षों रही अपनी पत्नी सीता को अपना लिया।मुझे अपना सम्मान ज्यादा प्यारा है मैं पर पुरुष के पास रह कर आई हुई स्त्री को कभी अपना नहीं सकता। यह सुन कर श्रीराम मन ही मन विचलित हो उठे और वहां से सीधा अपने राजमहल में वापस आ गए। रावण के मरने के बाद भी उन्हें रोज रात को सपने में रावण का सर दिखता था जो की श्रीराम पर अट्टहास कर रहा होता था की तुमने मेरे द्वारा हरण की हुई स्त्री को अपना लिया। हालांकि राम को इस बात का पता था की रावण ने सीता का नहीं बल्कि माया सीता का हरण किया था और सीता बिलकुल पवित्र थीं। परन्तु लोक लाज के भय से उन्होंने देवी सीता का त्याग कर दिया था।

आइए अब उस प्रसंग पर चलते हैं जिसमें विस्तार से यह वर्णन है कि पूर्व जन्म में यह धोबी क्या था और उसने सीता से किस बात का बदला लेने के लिए श्रीराम पर लांक्षन लगाया। उस धोबी की ओर से लगाये गये लांक्षन के बाद ही श्रीराम ने गर्भवती पत्नी सीता का त्याग किया था। सीता ने वन में वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में आश्रय लिया और वहीं कुछ काल बाद अपने दो पुत्रों लव कुश को जन्म दिया।

धोबी के पूर्व जन्म की कथा जानने के लिए आइए मिथिला नगरी में प्राचीन काल में हुई एक घटना से जुड़ते हैं। मिथिला नाम की नगरी में महाराज जनक राज्य करते थे। उनका एक नाम सीरध्वज भी था। एक बार उनके राज्य में बरसात के बिना अकाल पड़ गया। राज्य के सारे किसान व्याकुल होकर महाराजा जनक के पास गए। उन्होंने राजा ने अपना कष्ट कह सुनाया। महाराज इस संकट के समाधान के लिए अपने गुरु शतानंद के पास गये। गुरु जी ने राजा को समझाया कि अगर राजा सोने के हल से जमीन जोतेंगे तो वर्षा होगी और अकाल का संकट टल जायेगा।

 गुरु की आज्ञा पाकर जनक जी ने रानी सहित खेत को स्वर्ण के हल से जोता और हल चलाते ही वहां पर वर्षा होने लगी। अचानक एक जगह हल का फाल अटक गया और आगे नहीं चल रहा था। राजा रानी ने उस जगह की मिट्टी उठा कर देखा तो उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। उन्होंने देखा एक घड़े के अंदर एक सुंदर कन्या है। राजा-रानी उसे घर ले आये और प्यार से उसका नाम  सीता रखा। सीता का एक अर्थ हल चलाने से जमीन पर जो रेखा बनती है वह भी होता है। सीता भूमि से उपजीं इसलिए उनका एक नाम भूमिजा भी है। जनक की पुत्री होने के नाते वे जानकी कहलायीं. विदेह पुत्री होने के चलते वैदेही कहलायीं।

परम सुंदरी सीता एक दिन सखियों के साथ उद्यान में खेल रही थीं। वहाँ उन्हें एक तोता पक्षी का जोड़ा दिखाई दिया,जो बहुत सुंदर था। वे दोनों पक्षी एक पर्वत की चोटी पर बैठ कर इस प्रकार बोल रहे थे —-‘पृथ्वी पर श्रीराम नाम से विख्यात एक बड़े सुंदर राजा होंगे। उनकी महारानी, सीता के नाम से विख्यात होंगी। श्रीराम, सीता के साथ ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करेंगे। धन्य हैं वे जानकी देवी और धन्य हैं वे श्री राम।'

तोते को ऐसी बातें करते देख सीता ने यह सोचा कि ये दोनों मेरे ही जीवन की कथा कह रहे हैं, इन्हें पकड़ कर सभी बातें पूछूँ।ऐसा विचार कर उन्होंने अपनी सखियों से कहा-‘यह पक्षियों का जोड़ा सुंदर है तुम लोग चुपके से जाकर इसे पकड़ लाओ।’

सखियाँ उस पर्वत पर गयीं और दोनों सुंदर पक्षियों को पकड़ लायीं।सीता उन पक्षियों से बोलीं—‘तुम दोनों बड़े सुंदर हो; देखो, डरना नहीं। बताओ, तुम कौन हो और कहाँ से आये हो? राम कौन हैं? और सीता कौन हैं? तुम्हें उनकी जानकारी कैसे हुई? सारी बातों को जल्दी जल्दी बताओ। भय न करो।'

सीता के इस प्रकार पूछने पर दोनों पक्षी सब बातें बताने लगे —–‘देवि ! 

वाल्मीकि नाम से विख्यात एक बहुत बड़े महर्षि हैं। हम दोनों उन्हीं के आश्रम में रहते हैं। महर्षि ने रामायण नाम का एक ग्रन्थ बनाया है जो सदा मन को प्रिय जान पड़ता है। उन्होंने शिष्यों को उस रामायण का अध्ययन भी कराया है।  हम लोगों ने उसे पूरा सुना है।

राम और जानकी कौन हैं, इस बात को हम बताते हैं तथा इसकी भी सूचना देते हैं कि जानकी के विषय में क्या क्या बातें होने वाली हैं; तुम ध्यान देकर सुनो।

‘महर्षि ऋष्यश्रंग के द्वारा कराये हुए पुत्रेष्टि-यज्ञ के प्रभाव से भगवान विष्णु राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न—ये चार शरीर धारण करके प्रकट होंगे। 

देवांगनाएँ भी उनकी उत्तम कथा का गान करेंगी।श्रीराम महर्षि विश्वामित्र के साथ भाई लक्ष्मण सहित हाथ में धनुष लिए मिथिला पधारेंगे। उस समय वहाँ वे शिव जी के धनुष को तोड़ेंगे और अत्यन्त मनोहर रूप वाली सीता को अपनी पत्नी के रूप में ग्रहण करेंगे। फिरउन्हीं के साथ श्रीराम अपने विशाल राज्य का पालन करेंगे। ये तथा और भी बहुत सी बातें वहाँ हमारे सुनने में आयी हैं। सुंदरी ! हमने तुम्हें सब कुछ बता दिया।अब हम जाना चाहते हैं, हमें छोड़ दो।

पक्षियों की ये अत्यंत मधुर बातें सुनकर सीता ने उन्हें मन में धारण किया और पुनः उन दोनों से पूछा —-‘राम कहाँ होंगे? वे किसके पुत्र हैं और कैसे वे आकर जानकी को ग्रहण करेंगे? मनुष्यावतार में उनका श्री विग्रह कैसा होगा?

उनके प्रश्न सुनकर तोती मन ही मन जान गयी कि ये ही सीता हैं। उन्हें पहचान कर वह सामने आ उनके चरणों पर गिर पड़ी और बोली —- श्री रामचन्द्र का मुख कमल की कली के समान सुंदर होगा। नेत्र बड़े बड़े तथा खिले हुए, नासिका ऊँची, पतली और मनोहारिणी होगी। भुजाएँ घुटनों तक, गला शंख के समान होगा। वक्षःस्थल उत्तम व चौड़ा होगा। उसमें श्रीवत्स का चिन्ह होगा। 

श्री राम ऐसा ही मनोहर रूप धारण करने वाले हैं। मैं उनका क्या वर्णन कर सकती हूँ। जिसके सौ मुख हैं, वह भी उनके गुणों का बखान नहीं कर सकता। फिर हमारे जैसे पक्षी की क्या बिसात है ।वे जानकी देवी धन्य हैं जो शीघ्र रघुनाथ जी के साथ हजारों वर्षों तक प्रसन्नतापूर्वक विहार करेंगी। परंतु सुंदरी ! तुम कौन हो?

पक्षियों की बातें सुनकर सीता अपने जन्म की चर्चा करती हुई बोलीं—-‘जिसे तुम लोग जानकी कह रहे हो, वह जनक की पुत्री मैं ही हूं। श्री राम जब यहाँ आकर मुझे स्वीकार करेंगे, तभी मैं तुम दोनों को छोड़ूँगी। तुम इच्छानुसार खेलते हुए मेरे घर में सुख से रहो।

यह सुनकर तोती ने जानकी से कहा —-‘साध्वी ! हम वन के पक्षी हैं। हमें तुम्हारे घर में सुख नहीं मिलेगा। मैं गर्भिणी हूँ, अपने स्थान पर जाकर बच्चे पैदा करूँगी। उसके बाद फिर यहाँ आ जाऊँगी।'

उसके ऐसा कहने पर भी सीता ने उसे नहीं छोड़ा। तब उसके पति ने कहा —-‘सीता ! मेरी भार्या को छोड़ दो। यह गर्भिणी है। जब यह बच्चों को जन्म दे लेगी, तब इसे लेकर फिर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। तोते के ऐसा कहने पर जानकी ने कहा — महामते ! तुम आराम से जा सकते हो, मगर मैं इसे अपने पास बड़े सुख से रखूँगी ।

जब सीता ने उस तोती को छोड़ने से मना कर दिया, तब वह पक्षी अत्यंत दुखी हो गया। उसने करुणायुक्त वाणी में कहा —-‘योगी लोग जो बात कहते हैं वह सत्य ही है—-किसी से कुछ न कहे, मौन होकर रहे, नहीं तो उन्मत्त प्राणी अपने वचनरूपी दोष के कारण ही बन्धन में पड़ता है। यदि हम इस पर्वत के ऊपर बैठकर वार्तालाप न करते होते तो हमारे लिए यह बन्धन कैसे प्राप्त होता। इसलिए मौन ही रहना चाहिए ।’ इतना कहकर पक्षी पुनः बोला—– ‘सुन्दरी ! मैं अपनी इस भार्या के विना जीवित नहीं रह सकता, इसलिए इसे छोड़ दो। सीता ! तुम बहुत अच्छी हो, मेरी प्रार्थना मान लो।’ इस तरह उसने बहुत समझाया, किन्तु सीता ने उसकी पत्नी को नहीं छोड़ा, तब उसकी भार्या ने क्रोध और दुख से व्याकुल होकर जानकी को श्राप दिया ——- ‘अरी ! जिस प्रकार तू मुझे इस समय अपने पति से अलग कर रही है, वैसे ही तुझे स्वयं भी गर्भिणी की अवस्था में श्रीराम से अलग होना पड़ेगा।’

यों कह कर पति वियोग के कारण उसके प्राण निकल गये। उसने श्री रामचंद्र जी का स्मरण तथा पुनः पुनः राम नाम का उच्चारण करते हुए प्राण त्याग किया था, इसलिए उसे ले जाने के लिए एक सुंदर विमान आया और वह पक्षिणी उस पर बैठकर भगवान के धाम को चली गई।

भार्या की मृत्यु हो जाने पर तोता पक्षी शोक से आतुर होकर बोला —— ‘मैं मनुष्यों से भरी श्रीराम की नगरी अयोध्या में जन्म लूँगा तथा मेरे ही वाक्य से इसे पति के वियोग का भारी दुख उठाना पड़ेगा।’

यह कह कर वह चला गया। क्रोध और सीता जी का अपमान करने के कारण उसका धोबी की योनि में जन्म हुआ।

उस धोबी के कथन से ही सीता जी निन्दित हुईं और उन्हें पति से अलगहोना पड़ा। धोबी के रूप में उत्पन्न हुए उस तोते का श्राप ही सीता का पति से विछोह कराने में कारण हुआ और वे वन में गयीं।

Tuesday, June 8, 2021

क्या आप जानते हैं शनिदेव पर तेल क्यों चढ़ाते हैं?


हम और आप अरसे से देखते आ रहे हैं कि सब शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित किया जाता है। नियम यह है कि किसी पात्र में तेल डाल कर उसमें अपना चेहरा देखने के बाद उसे शनिदेव को अर्पित कर दिया जाता है। कहते हैं कि इससे सभी प्रकार के शनि दोष कट जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों और कब शुरू हुआ। इसके पीछे क्या कहानी है। शायद आपमें से बहुत लोग नहीं जानते होंगे। आइए हम सुनाते हैं कि इसके पीछे क्या कहानी है।

 शनि देव को तेल अर्पित करने के बारे में दो कथाएं मिलती हैं। एक कथा के अनुसार, शनि देव को अपनी शक्ति और पराक्रम पर बहुत घमंड हो गया था। यह उस समय की बात है जब राम भक्त हनुमान जी के पराक्रम और बल की सर्वत्र चर्चा होती थी। जब शनि देव को इस बात का पता चला तो स्वयं को सबसे बलशाली सिद्ध करने के लिए  हनुमान जी से युद्ध करने के लिए निकल पड़े. वहां उन्होंने देखा कि हनुमानजी एकांत में बैठकर श्री राम जू की भक्ति में लीन हैं।

शनिदेव ने हनुमानजी को युद्ध के लिए ललकारा। हनुमान जी ने समझाते हुए कहा कि अभी वो अपने प्रभु श्री राम का ध्यान कर रहे हैं। हनुमान जी ने शनि देव को जाने के लिए कहा पर शनि देव उन्हें युद्ध के लिए ललकारते रहे और हनुमानजी के बहुत समझाने पर भी नहीं माने। शनि देव युद्ध की बात पर अड़े रहे तब हनुमानजी ने फिर से समझाते हुए कहा कि मेरा राम सेतु की परिक्रमा का समय हो रहा है आप कृपया यहां से चले जाइए। शनि देव के न मानने पर हनुमान जी ने शनि देव को अपनी  पूंछ में लपेट लिया और राम सेतु की परिक्रमा आरम्भ कर दी।

शनि देव का पूरा शरीर धरती और रास्ते  में आई चट्टानों से घिसता जा रहा था और उनका पूरा शरीर घायल हो गया। उनके शरीर से रक्त निकलने लगा और बहुत अधिक पीड़ा होने लगी। तब शनिदेव ने हनुमान जी से क्षमा मांगते हुए कहा कि मुझे अपनी उदंडता का परिणाम मिल गया है। कृपया मुझे मुक्त कर दीजिए। तब हनुमान जी ने कहा कि यदि मेरे भक्तों की राशि पर तुम्हारा कोई दुष्परिणाम नहीं होने का वचन दो तो मैं तुम्हे मुक्त कर सकता हूं।

शनि देव ने वचन देते हुए कहा कि आपके भक्तों पर मेरा कोई दुष्प्रभाव नहीं होगा। तब हनुमानजी ने शनि देव को मुक्त किया और उनके घायल शरीर पर तेल लगाया जिससे शनिदेव को पीड़ा में आराम मिला। तब शनि देव ने कहा कि जो व्यक्ति मुझे तेल अर्पित करेंगे उनका जीवन समृद्ध होगा और मेरे कारण कोई कष्ट नहीं होगा और तबसे ही शनि देव को तेल अर्पित करने की परंपरा का प्रारम्भ हुआ। इस कथा में कई जगह ऐसा भी कहा गया है कि हनुमान जी ने शनि से युद्ध कर के उन्हें घायल कर दिया था। उसके बाद उनके घावों में तेल लगा कर उनकी पीड़ा शांत की थी। उसके बाद सूर्यपुत्र शनिदेव ने हनुमान जी को आश्वस्त किया था कि उनके भक्तों को वे नहीं सतायेंगे।

 इस बारे में दूसरी कथा कुछ इस प्रकार है। लंकापति रावण प्रकांड ज्योतिषी था। उसने एक बार सभी ग्रहों को अपनी राशि के अनुरूप राशि में बैठाया परन्तु शनि देव ने रावण की बात मानने से मना कर दिया इसलिए रावण ने उन्हें उल्टा लटका दिया।

इसके पश्चात हनुमानजी लंका पहुंचे तब रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगवा दी। हनुमानजी ने उड़ कर सारी लंका जला डाली। आग लगने के बाद सभी बंदी ग्रह भाग गए परन्तु उल्टा लटका होने के कारण शनिदेव नहीं भाग पाए। शनिदेव की देह में बहुत पीड़ा हो रही थी। तब हनुमान जी ने शनि देव को तेल लगाया जिससे शनि देव की पीड़ा कुछ कम हुई। इसके बाद शनि देव ने कहा कि आज से मुझे तेल अर्पित करने वाले सभी व्यक्तियों की पीड़ा को मैं हर लूंगा। तब से ही शनि देव को तेल अर्पित किया जाने लगा।

शनि देव को तेल चढ़ाते समय उस तेल में चेहरा देखने से शनि दोषों से मुक्ति प्राप्त होती है और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

यों तो देश में कई जगह शनिदेव के मंदिर हैं लेकिन महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शिंगणापुर गांव का शनि देवता का मंदिर सर्वाधिक  प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यहां की मूर्ति  स्वयंभू है अर्थात स्वयं प्रकट हुई है।

इस गांव की सबसे बड़ी और विचित्र बात यह है यहां किसी घर या दूकान या दूसरे प्रतिष्ठानों में ताले नहीं लगते। घर में दरवाजे तक नहीं हैं। वहां के लोगों का मानना है कि उनके सामान की रक्षा स्वयं शनि भगवान करते हैं शनिदेव के डर से कोई चोर चोरी करने भी नहीं आता कहते हैं और चोरी करने के बाद कोई इंसान गांव से बाहर नहीं जा पाता।

शनि भगवान की स्वयंभू मूर्ति काले रंग की है। 5 फुट 9 इंच ऊँची व 1 फुट 6 इंच चौड़ी यह मूर्ति संगमरमर के एक चबूतरे पर खुले में धूप में ही स्थापित है। मूर्ति के ऊपर कोई छत्र भी नहीं है। यहां रोज हजारों की संख्या में रोज दर्शनार्थी आते हैं और शनि देवता की मूर्ति पर तेल चढ़ाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां आकर दर्शन करने और तेल चढ़ाने से सभी प्रकार के शनि दोष, शनि की दशा से होनेवाले कष्ट से मुक्ति मिलती है। शनिवार और अमावस्या को यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती है।

इस मूर्ति के प्रकट होने के बारे में एक घटना बतायी जाती है कि एक बार गांव में बड़ी बाढ़ आयी थी सब कुछ डूबने लगा किंतु किसी दैवीय शक्ति से गांव बच गया। कहते हैं दूसरे दिन गांव के एक आदमी ने पेड़ की डाल पर एक अजीब-सा पत्थर फंसा देखा। उसने सोचा अच्छा पत्थर है इसे ले जाकर इससे कुछ बनायेंगे   यह सोच उसने जैसे ही उस पर एक नुकीली चीज से चोट किया उस पत्थर से खून निकलने लगा। वह डर गया और भागा-भागा गांव आया और गांव वालों से सारी बात बतायी। गांव वाले भी यह देख दंग रह गये कि पत्थर खून निकल रहा है। सभी गांव लौट आये। उसी रात को गांव वाले एक व्यक्ति के सपने में शनिदेव आये और उससे कहा- मैं शनिदेव हूं, गांव के बाहर जो विचित्र पत्थर पड़ा है उसे लाकर गांव में स्थापित करो और मेरी पूजा करो। उसके बाद गांववालों ने उस मूर्ति की एक चबूतरे पर स्थापना कर दी और तभी से शिगणापुर में पूजे जा रहे हैं शनिदेव।शनि मंदिर हमेशा पवित्र मन और स्वच्छ शरीर से ही जाना चाहिए। शनिदेव के पूजन के बाद प्रसाद स्वरुप इलाइची दाना, नारियल और तेल समर्पित करना उत्तम माना गया है। शनिदेव को बेलपत्र और चंदन अति प्रिय है। इसलिए ये दो चीजें शनिदेव को समर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं। शनि मंदिर में शनि के वैदिक मंत्र या तांत्रिक मंत्र का जाप करना अत्यधिक लाभदायक माना जाता है। यदि स्वयं से मंत्र का जाप करना संभव ना हो तो कम से कम आरती में भी सम्मिलित होना चाहिए। शनिदेव की पूजा के बाद उन्हें प्रसाद समर्पित करके खुद ग्रहण करें और अन्य लोगों के बीच भी बंटाना चाहिए। मंदिर से कोई भी प्रतिमा लाकर घर में ना लाएं अथवा लगाएं। दान आदि कार्य भी मंदिर परिसर में ही संपन्न करना चाहिए।


 

Sunday, June 6, 2021

जब शिवजी ने लड़ा श्रीराम से युद्ध

 


शिवजी भगवान राम के अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपनी अर्धांगिनी सती का त्याग तक इसलिए कर दिया था कि सती ने भगवान राम की परीक्षा लेनी चाही थी।        शिवजी भगवान राम के अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपनी अर्धांगिनी सती का त्याग तक इसलिए कर दिया था कि सती ने भगवान राम की परीक्षा लेनी चाही थी। शिवजी सर्वदा राम नाम जपते रहते थे। वनवास के दौरान जब रावण ने पंचवटी से सीता का हरण कर लिया और राम-लक्ष्मण उन्हें खोजते दुखी होकर वन-वन भटक रहे थे उस वक्त सती को संदेह हुआ। वे सोचने लगीं अगर यह ब्रह्म रूप हैं तो फिर साधारण मनुष्यों की तरह स्त्री के लिए विलाप क्यों कर रहे हैं। अपना यह संदेह उन्होंने शिव जी पर प्रकट किया तो शिवजी ने उनसे कहा कि अगर उन्हें संदेह तो वे स्वयं जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं। इस पर सती ने सीता का रूप धारण कर राम की परीक्षा लेनी चाही राम उन्हें पहचान गये और उनको माता कह कर प्रणाम किया। इस पर सती परेशान हो गयीं और परीक्षा की बात शिव जी से छिपा ली। शिव जी ने ध्यान लगा कर सब जान लिया कि सती ने सीता का रूप धारण कर उनके राम से छल किया उन्हीं सीता का जिन्हें शिवजी मां समान मानते हैं। वही शिव जी राम से युद्ध करें यह बात चौंकानेवाली है। लेकिन ऐसा हुआ था।
·          बात उन दिनों की है जब श्रीराम का अश्वमेघ यज्ञ अभियान चल रहा था। श्रीराम के छोटे भाई शत्रुघ्न के नेतृत्व में बड़ी सेना सारे प्रदेश पर विजय करने जा रही थी। यज्ञ का अश्व प्रदेश-प्रदेश घूम रहा था। इस दौरान कई राजाओं द्वारा यज्ञ का घोड़ा पकड़ा गया लेकिन अयोध्या की सेना के आगे उन राजाओं को झुकना पड़ा। शत्रुघ्न के अलावा सेना में हनुमान, सुग्रीव और भरत पुत्र पुष्कल सहित कई महारथी उपस्थित थे जिन्हें जीतना देवताओं के लिए भी संभव नहीं था। कई जगह भ्रमण करने के बाद यज्ञ का घोड़ा देवपुर पहुंचा जहां राजा वीरमणि का राज्य था।
राजा वीरमणि अति धर्मनिष्ठ तथा श्रीराम एवं महादेव के अनन्य भक्त थे। उनके दो पुत्र रुक्मांगद और शुभंगद वीरों में श्रेष्ठ थे। राजा वीरमणि के भाई वीरसिंह भी एक महारथी थे। राजा वीरमणि ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था और महादेव ने उन्हें उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान भी दिया था। वीरमणि के सिर पर भगवान महादेव का वरद हस्त होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं करता था।
जब अश्व उनके राज्य में पहुंचा तो राजा वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया और अयोध्या के सैनिकों से कहा कि यज्ञ का घोड़ा उनके पास है इसलिए वे जाकर शत्रुघ्न से कह दें कि विधिवत युद्ध कर के ही वे अपने अश्व छुड़ा सकते हैं। जब रुक्मांगद ने ये सूचना अपने पिता को दी तो वो बड़े चिंतित हुए और अपने पुत्र से कहा की अनजाने में तुमने श्रीराम के यज्ञ का घोड़ा पकड़ लिया है। श्रीराम हमारे मित्र हैं और उनसे शत्रुता करने का कोई औचित्य नहीं है इसलिए तुम यज्ञ का घोड़ा वापस लौटा आओ। इस पर रुक्मांगद ने कहा कि- हे पिताश्री, मैंने तो उन्हें युद्ध की चुनौती भी दे दी है अतः अब उन्हें बिना युद्ध के अश्व लौटना हमारा और उनका दोनों का अपमान होगा। अब तो जो हो गया है उसे बदला नहीं जा सकता इसलिए आप मुझे युद्ध की आज्ञा दें।
 पुत्र की बात सुन कर वीरमणि ने उसे सेना सुसज्जित करने की आज्ञा दे दी। राजा वीरमणि अपने भाई वीरसिंह और अपने दोनों पुत्र रुक्मांगद और शुभांगद के साथ विशाल सेना ले कर युद्ध क्षेत्र में आ गए।
  इधर जब शत्रुघ्न को सूचना मिली कि उनके यज्ञ का घोड़ा बंदी बना लिया गया है तो वो बहुत क्रोधित हुए एवं अपनी पूरी सेना के साथ युद्ध के लिए युद्ध क्षेत्र में आ गए। उन्होंने पूछा की उनकी सेना से कौन अश्व को छुड़ाएगा तो भरत पुत्र पुष्कल ने कहा कि तातश्री, आप चिंता न करें। आपके आशीर्वाद और श्रीराम के प्रताप से मैं आज ही इन सभी योद्धाओं को मार कर अश्व को मुक्त करता हूं। वे दोनों इस प्रकार बात कर रहे थे कि पवनसुत हनुमान ने कहा कि राजा वीरमणि के राज्य पर आक्रमण करना स्वयं परमपिता ब्रह्मा के लिए भी कठिन है क्योंकि यह नगरी महाकाल शिव द्वारा रक्षित है। उचित यही होगा कि पहले हमें बातचीत द्वारा राजा वीरमणि को समझाना चाहिए और अगर हम न समझा पाए तो हमें श्रीराम को सूचित करना चाहिए। राजा वीरमणि श्रीराम का बहुत आदर करते हैं इसलिए वे उनकी बात नहीं टाल पाएंगे। हनुमान की बात सुन कर शत्रुघ्न बोले, हमारे रहते अगर श्रीराम को युद्ध भूमि में आना पड़े तो यह हमारे लिए अत्यंत लज्जा की बात है, अब जो भी हो हमें युद्ध तो करना ही पड़ेगा। यह कह कर वे सेना सहित युद्धभूमि में पहुच गए।
  भयानक युद्ध छिड़ गया। भरत पुत्र पुष्कल सीधा जाकर राजा वीरमणि से भिड गया। दोनों अतुलनीय वीर थे। वे दोनों तरह-तरह के शस्त्रों का प्रयोग करते हुए युद्ध करने लगे। हनुमान राजा वीरमणि के भाई महापराक्रमी वीरसिंह से युद्ध करने लगे। रुक्मांगद और शुभांगद ने शत्रुघ्न पर धावा बोल दिया। पुष्कल और वीरमणि में बड़ा घमासान युद्ध हुआ। अंत में पुष्कल ने वीरमणि पर आठ नाराच बाणों से वार किया। इस वार को राजा वीरमणि सह नहीं पाए और मुर्छित होकर अपने रथ पर गिर पड़े। वीरसिंह ने हनुमान पर कई अस्त्रों का प्रयोग किया पर उन्हें कोई हानि न पहुंचा सके। हनुमान ने एक विकट पेड़ से वीरसिंह पर वार किया इससे वीरसिंह रक्त वमन करते हुए मूर्छित हो गए।
उधर शत्रुघ्न और राजा वीरमणि के पुत्रों में असाधारण युद्ध चल रहा था। अंत में कोई चारा न देख कर शत्रुघ्न ने दोनों भाइयों को नागपाश में बांध लिया। अपनी विजय देख कर शत्रुघ्न की सेना के सभी वीर सिंहनाद करने लगे। उधर राजा वीरमणि की मूर्छा दूर हुई तो उन्होंने देखा कि उनकी सेना हार के कगार पर है। यह देख कर उन्होंने भगवा शंकर का स्मरण किया।
महादेव ने अपने भक्त को मुसीबत में जान कर वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित सारे गणों को युद्ध क्षेत्र में भेज दिया। महाकाल के सारे अनुचर उनकी जयजयकार करते हुए अयोध्या की सेना पर टूट पड़े। शत्रुघ्न, हनुमान और सारे लोगों को लगा कि जैसे प्रलय आ गया हो। जब उन्होंने भयानक मुख वाले रुद्रावतार वीरभद्र, नंदी, भृंगी सहित महादेव की सेना देखी तो सारे सैनिक भय से कांप उठे. शत्रुघ्न ने हनुमान से कहा कि जिस वीरभद्र ने बात ही बात में दक्ष प्रजापति का मस्तक काट डाला था और जो तेज और क्षमता में स्वयं महाकाल के समान है उसे युद्ध में कैसे हराया जा सकता है?
 यह सुनकर पुष्कल ने कहा की हे तातश्री, आप दुखी मत हों. अब तो जो भी हो, हमें युद्ध तो करना ही होगा। यह
कहते हुए पुष्कल वीरभद्र से, हनुमान नंदी से और शत्रुघ्न भृंगी से जा भिड़े। पुष्कल ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग वीरभद्र पर कर दिया लेकिन वीरभद्र ने खेल-खेल में उसे काट दिया।
उन्होंने पुष्कल से कहा की हे बालक, अभी तुम्हारी आयु मृत्यु को प्राप्त होने की नहीं हुई है इसलिए युद्ध क्षेत्र से हट जाओ। उसी समय पुष्कल ने वीरभद्र पर शक्ति से प्रहार किया जो सीधे उनके मर्मस्थान पर जाकर लगा। इसके बाद वीरभद्र ने क्रोध से थर्राते हुए एक त्रिशूल से पुष्कल का मस्तक काट लिया और भयानक सिंहनाद किया। उधर भृंगी आदि गणों ने शत्रुघ्न पर भयानक आक्रमण कर दिया।
 अंत में भृंगी ने महादेव के दिए पाश में शत्रुघ्न को बांध दिया। हनुमान अपनी पूरी शक्ति से नंदी से युद्ध कर रहे थे। उन दोनों ने ऐसा युद्ध किया जैसा पहले किसी ने नहीं किया था। दोनों श्रीराम के भक्त थे और महादेव के तेज से उत्पन्न हुए थे। काफी देर लड़ने के बाद कोई और उपाय न देख कर नंदी ने शिवास्त्र का प्रयोग कर हनुमान को पराजित कर दिया। अयोध्या के सेना की हार देख कर राजा वीरमणि की सेना में जबरदस्त उत्साह आ गया और वे बाक़ी बचे सैनिकों पर टूट पड़े। यह देख कर हनुमान ने शत्रुघ्न से कहा कि मैंने आपसे पहले ही कहा था कि ये नगरी महाकाल द्वारा रक्षित है लेकिन आपने मेरी बात नहीं मानी। अब इस संकट से बचाव का एक ही उपाय है कि हम सब श्रीराम को याद करें। ऐसा सुनते ही सारे सैनिक शत्रुघ्न, पुष्कल एवं हनुमान सहित श्रीराम को याद करने लगे।
अपने भक्तों की पुकार सुन कर श्रीराम तत्काल ही लक्ष्मण और भरत के साथ वहां आ गए। अपने प्रभु को आया देख सभी हर्षित हो गए एवं सबको ये विश्वास हो गया कि अब हमारी विजय निश्चित है। श्रीराम के आने पर जैसे पूरी सेना में प्राण का संचार हो गया।. श्रीराम ने सबसे पहले शत्रुघ्न को मुक्त कराया और उधर लक्ष्मण ने हनुमान को मुक्त करा दिया। जब श्रीराम, लक्ष्मण और भरत ने देखा कि पुष्कल मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। भरत तो शोक में मूर्छित हो गए। श्रीराम ने क्रोध में आकर वीरभद्र से कहा कि तुमने जिस प्रकार पुष्कल का वध किया है उसी प्रकार अब अपने जीवन का भी अंत समझो। ऐसा कहते हुए श्रीराम ने सारी सेना के साथ शिवगणों पर धावा बोल दिया। जल्द ही उन्हें यह पता चल गया कि शिवगणों पर साधारण अस्त्र बेकार हैं इसलिए उन्होंने महर्षि विश्वामित्र द्वारा प्रदान किये दिव्यास्त्रों से वीरभद्र और नंदी सहित सारी सेना को विदीर्ण कर दिया। श्रीराम के प्रताप से पार न पाते हुए सारे गणों ने एक स्वर में महादेव का स्मरण करना शुरू कर दिया. जब महादेव ने देखा कि उनकी सेना बड़े कष्ट में है तो वे स्वयं युद्ध क्षेत्र में प्रकट हुए।
इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए परमपिता ब्रह्मा सहित सारे देवता आकाश में स्थित हो गए। जब महाकाल ने युद्ध क्षेत्र में प्रवेश किया तो उनके तेज से श्रीराम की सारी सेना मूर्छित हो गई। जब श्रीराम ने देखा कि स्वयं महादेव रणक्षेत्र में आए हैं तो उन्होंने शस्त्र का त्याग कर भगवान रूद्र को दंडवत प्रणाम किया एवं उनकी स्तुति की। उन्होंने महाकाल की स्तुति करते हुए कहा कि हे सारे ब्रह्मांड के स्वामी ! आपके ही प्रताप से मैंने महापराक्रमी रावण का वध किया, आप स्वयं ज्योतिर्लिंग में रामेश्वरम में पधारे। हमारा जो भी बल है वो भी आपके आशीर्वाद के फलस्वरूप हीं है। यह जो अश्वमेघ यज्ञ मैंने किया है वह भी आपकी ही इच्छा से ही हो रहा है इसलिए हम पर कृपा करें और इस युद्ध का अंत करें।
यह सुन कर भगवान रूद्र बोले की हे राम, आप स्वयं विष्णु के रूप है मेरी आपसे युद्ध करने की कोई इच्छा नहीं है फिर भी चूंकि मैंने अपने भक्त वीरमणि को उसकी रक्षा का वरदान दिया है इसलिए मैं इस युद्ध से पीछे नहीं हट सकता अतः संकोच छोड़ कर आप युद्ध करें।
श्रीराम ने इसे महाकाल की आज्ञा मान कर युद्ध करना शुरू किया। दोनों में महान युद्ध छिड़ गया जिसे देवता आकाश देख रहे थे। श्रीराम ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग महाकाल पर कर दिया पर उन्हें संतुष्ट नहीं कर सके। अंत में उन्होंने पाशुपतास्त्र का संधान किया और भगवान शिव से बोले की हे प्रभु, आपने ही मुझे ये वरदान दिया है कि आपके द्वारा प्रदत्त इस अस्त्र से त्रिलोक में कोई पराजित हुए बिना नहीं रह सकता, इसलिए हे महादेव आपकी ही आज्ञा और इच्छा से मैं इसका प्रयोग आप पर ही करता हूं। यह कहते हुए श्रीराम ने वो महान दिव्यास्त्र भगवान शिव पर चला दिया। वह अस्त्र सीधा महादेव के हृदयस्थल में समा गया और भगवान रूद्र इससे संतुष्ट हो गए।
उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम से कहा कि आपने युद्ध में मुझे संतुष्ट किया है इसलिए जो इच्छा हो वर मांग लें। इस पर श्रीराम ने कहा कि हे भगवान ! यहां इस युद्ध क्षेत्र में भ्राता भरत के पुत्र पुष्कल के साथ असंख्य योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए है, उन्हें कृपया जीवन दान दीजिए। महादेव ने मुस्कुराते हुए तथास्तु कहा और पुष्कल समेत दोनों ओर के सारे योद्धाओं को जीवित कर दिया। इसके बाद उनकी आज्ञा से राजा वीरमणि ने यज्ञ का घोड़ा श्रीराम को लौटा दिया और अपना राज्य रुक्मांगद को सौंप कर वे भी शत्रुघ्न के साथ आगे चल दिए।